जीवन परिचय श्री
गुरु नानक देव जी
जन्म तिथि : अप्रैल
15, 1469; तलवंडी (ननकाना साहिब, पाकिस्तान)
पिता : मेहता
कल्याण दास जी (मेहता कालू)
माता : माता
तृप्ता जी
बहन : बेबे नानकी(बहन)
पत्नी : माता
सुलखनी जी
साहिबजादे : बाबा
श्री चन्द जी, बाबा लखमी दास जी
ज्योति जोत : सितम्बर
22, 1539 श्री
करतारपुर साहिब (पाकिस्तान)
जन्म
का समय
गुरु नानक देव जी (अवतार)
का सृष्टि पर प्रभाव (भाई
गुरदास जी)
सतिगुरु नानक प्रगटिया मिटी धुंध जग चानण होआ ||
जिउ कर सूरज निकलिआ तारे छुपे अंधेर पलोआ ||
सिंघ बुके म्रिगावलि
भन्नी जाई न धीर धरोआ ||
जिथे बाबा पैर धरे
पूजा आसण
थापण सोआ ||
सिध आसण सभ जगत दे
नानक आदि मते जे कोआ ||
घर घर अंदर धरमसाल
होवै कीरतन
सदा विसोआ
||
बाबे तारे चार चके
नौ खंड प्रिथमी सचा ढोआ ||
गुरमुख कलि विच परगट होआ ||
जब पंडित जी ने मेहता
कालू से पूछा कि दाई से यह पूछो कि जन्म के समय बच्चे ने कैसी आवाज निकाली थी? तब दौलता दाई ने बताया कि पंडित जी!
मेरे हाथों से अनेकों बच्चों ने जन्म लिया है, पर मैंने ऐसा बालक आज तक नहीं देखा, और बच्चे तो रोते हुए पैदा होते है,
पर यह बच्चा तो हँसते हुए पैदा हुआ है| मानो
दोपहर का सूरज चढ़ गया हो,
और पूरे घर में
सुगंध फ़ैल गयी हो| दाई की बातों से
पंडित जी ने यह अनुभव कर लिया कि यह कोई अवतार पैदा हुआ है| गुरु नानक देव जी को हिंदी, हिसाब पढ़ने के लिए पांधे गोपाल के पास, संस्कृत के लिए पंडित ब्रिज लाल तथा
फारसी पढ़ने के लिए मुल्ला कुतबुद्दीन के पास भेजा गया |
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गुरु
नानक देव जी को चुपचाप व बिना किसी काम के घर में लेटे रहते देख मेहता जी ने
उन्हें किसी काम धंधे
में लगाने की सोची| पिता
का कहना मान कर अगले ही दिन गुरु नानक देव जी गाय- भैंसों को चराने ले गए| तीन-चार
दिन तो सब ठीक चलता रहा,
सुबह पशुओं को
बाहर ले जाते व सांयकाल वापिस घर ले आते| एक
दिन गुरु नानक देव जी पशुओं को चरते छोड़ आप अंतर ध्यान हो गए, अपनी
ही मौज में बैठे रहे| पास
में ही जमींदार का हरा भरा खेत था| पशुओं
ने वहां पहुँच कर बहुत नुकसान किया| कुछ
मुँह से चर लिया तथा कुछ पैरों के
नीचे दबा दिया| इतने में खेत का मालिक भी आ गया वह पशुओं को घेर कर राये बुलार
के पास ले गया| जमींदार ने राये बुलार के आगे पुकार की आपके पटवारी के लड़के
ने मेरा खेत उजाड दिया है,
मेरा हरजाना दिलवाया
जाये| तब गुरु नानक देव जी ने सहज भाव से कहा राये जी अपना आदमी भेज कर देख लो, इसकी कोई खेती नहीं उजड़ी, अगर
उजड़ी भी होगी तो हम हरजाना भर देंगे| राये
बुलार ने आदमी भेज कर पता लगाया कि खेती तो ज्यों की त्यों खड़ी है| जमींदार
व अन्य लोग गुरु नानक देव जी का यह कौतक देखकर
दंग रह गए व गुरु नानक देव जी की प्रशंसा करने लगे|
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साँप का छाया देना
गुरु नानक देव जी अब रोजाना ही पशुओं
को जंगल जूह में ले जाते| एक
दिन वैसाख के महीने में दोपहर के समय पशुओं को छाओं के नीचे बिठा कर गुरु नानक देव
जी लेट गए| सूरज के ढ़लने के साथ वृक्ष की छाया भी ढ़लने लगी| आप
के मुख पर सूरज की धूप देखकर एक सफ़ेद साँप अपने फन के साथ छाया करके बैठ गया| उस
समय राये बुलार अपने साथियोँ के
संग शिकार खेल कर वापिस अपने घर को जा रहा था| राये
बुलार ऐसे कौतक को देखकर दंग रह गया और गुरु नानक देव जी को नमस्कार करते हुए मन
ही मन गुरु नानक देव जी की महिमा गाता हुआ अपने घर की ओर रवाना हो गया|
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वृक्ष की छाया खड़ी
करनी
एक
दिन दोपहर ढ़लने के समय गुरु नानक देव जी पेड़ की छाया के नीचे चादर बिछा कर लेट गए| उस
वक्त सब वृक्षों की छाया ढ़ल चुकी थी पर
जहां गुरु नानक देव जी लेटे हुए थे उस वृक्ष का परछावां ज्यों का त्यों खड़ा था| दो
घड़ी उपरांत अपने खेतों की रखवाली करता राये बुलार उधर आ गया| यह
दृश्य देख कर वह दंग रह गया| उसने
अपने आदमियों को बताया कि जिस वृक्ष के नीचे गुरु नानक देव जी लेटे है उस
वृक्ष का परछावां ज्यों का त्यों खड़ा है, यह
निश्चय ही कोई अवतार है जो
अपने आप को प्रगट नहीं करना चाहते| इस
से पहले भी यह कौतक देखा था कि एक साँप अपने फन के साथ छाया कर रहा था| इस
प्रकार की प्रसंशा करता हुआ राये बुलार आप जी को नमस्कार करता हुआ घर की ओर बढ़
गया|
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सच्चा सौदा करना
एक दिन मेहता जी ने गुरु नानक देव जी को
20 रुपए देकर सच्चा सौदा करके लाने को कहा तथा भाई बाले को भी साथ
भेज दिया| गुरु नानक देव जी पिता जी को सत्य वचन कह कर 20 रूपए
लेकर तथा भाई बाले को साथ लेकर सच्चे सौदे के लिए निकल पड़े| जाते
-2 रास्ते में किसी गाँव में आप ने साधु मण्डली को देखा जो कि सारे ही भजन सिमरन
में लगे हुए थे| तभी गुरु नानक देव जी ने बाले को कहा कि हमें यहाँ खरा सौदा प्राप्त हुआ है, इसे
छोड़ना नहीं चाहिए| यह विचार करके गुरु नानक देव जी उस 20 रुपए
की रसद आटा, चावल,
मिष्टान व घी आदि
लेकर संत मण्डली के पास पहुँचे और उन्हें भेंट कर दिया और सभी संतो को प्रणाम करते
हुए भाई बाले के साथ खाली हाथ ही तलवंडी की ओर मुड़ गए|
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कलयुग से वार्तालाप
गुरु नानक देव जी मरदाने के साथ बैठकर शब्द कीर्तन कर रहे थे तो
अचानक अँधेरी आनी शुरू हो गई, जिसका
गुबार पूरे आकाश में फ़ैल गया| इस
भयानक अँधेरी में भयानक सूरत नजर आनी शुरू हो गई, जिसका
सिर आकाश के साथ व पैर पाताल के साथ थे| मरदाना
यह सब देखकर घबरा गया|
तब गुरु नानक देव जी
मरदाने से कहने लगे, मरदाना तू वाहेगुरु का सिमरन कर, डर
मत| यह बला तेरे नजदीक नहीं आएगी| उस
भयानक सूरत ने कई भयानक रूप धारण
किए पर गुरु नानक देव जी अडोल ही बैठे रहे| आप
की अडोलता व निर्भयता को देखकर उसने मानव का रूप धारण करके गुरु नानक देव जी को
नमस्कार की और कहने लगा इस युग का मैं राजा हूँ| मेरे
सेनापती झूठ, निंदा, चुगली व मार-धाड़ है| जुआ,
शराब आदि खोटे करम मेरी फ़ौज है| आप
मेरे युग के अवतार है,
मैं आपको मोतियों से
जड़े हुए सोने के मंदिर तैयार कर देता हूँ, आप
इसमे निवास करना| ऐसे मंदिर चन्दन व कस्तूरी से लिपटे होंगे, केसर
का छिड़काव होगा| आप उसमे सुख लेना व आनंदित रहना| तब
गुरु नानक देव जी ने इस शब्द का उच्चारण किया:
मोती त मंदर उसरहि
रतनी त होए जड़ाऊ ||
कस्तूरी कुंगू अगरि चंदनि लीपि आवै चाऊ ||
मतु देखि भूला
विसरै तेरा चिति न आवै नाऊ ||
धरती त हीरे लाल
जड़ती पलघि लाल जड़ाऊ ||
मोहणी मुखि मणी
सोहै करे रंगि पसाऊ
||
मतु देखि भूला
विसरै तेरा चिति न आवै नाऊ ||
हुकमु हासलु करी
बैठा नानका सभ वाऊ ||
मतु देखि भूला
विसरै तेरा चिति न आवै नाऊ ||
गुरु
नानक देव जी के ऐसे वचन सुनकर कलयुग ने कहा, महाराज!
मुझे निरंकार की आज्ञा है कि मैं सभी जीवो की बुधि उलट दू, जिसके
कारण वह चोरी, झूठ, निंदा व चुगली आदि खोटे कर्म करे, गुणवान
का निरादर हो और मूर्खों को राजे के पास बिठाकर आदर कराँऊ| कही
सत्य का नाम ना रहने दूँ,
पर आप मुझे जैसे
हुकुम करेंगे मैं उसका पालन करूँगा| गुरु
नानक देव जी ने कहा, जो हमारे प्रेमी श्रद्धावान व हरी
कीर्तन, सत्संग इत्यादि में
लिप्त हो उनपर यह सेना धावा ना बोले|
तेरा प्रभाव हमारे उन प्रेमियों पर भी ना पड़े जिन्हें हमारे वचनों पर भरोसा है| कलयुग ने तभी हाथ जोड़े और कहा, महाराज! जो व्यक्ति निरंकार के सिमरण
को अपने ह्रदय में बसाए रखेगा, उनपर
हमारा प्रभाव कम पड़ेगा| ऐसा
भरोसा देकर कलयुग अंतर्धयान हो गया|
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मक्के का काबा
फेरना
मक्के
में मुसलमानों का एक प्रसिद्ध पूजा स्थान है जिसे काबा कहते है| एक
बार श्री गुरु नानक देव जी रात के समय काबे की तरफ चरण करके लेटे हुए थे| तब जिओन(मौलवी)
ने गुस्से में आकर गुरु नानक देव जी से कहा कि तू कौन काफ़िर है जो खुदा के घर की
तरफ पैर पसारकर सोया हुआ है? गुरु
नानक देव जी ने बड़ी नम्रता के साथ कहा, मैं
यहाँ सारे दिन के सफर से थककर लेटा हूँ, मुझे
नहीं मालूम की खुदा का घर किधर है तू हमारे पैर पकड़कर उधर करदे जिधर खुदा का घर
नहीं है| यह बात सुनकर जिओन ने बड़े गुस्से में आकर गुरु नानक देव जी के
चरणों को घसीटकर दूसरी ओर कर दिया और जब चरणों को छोड़कर देखा तो उसे काबा भी उसी
तरफ ही नजर आने लगा| इस प्रकार उसने जब फिर चरण दूसरी तरफ किए तो काबा उसी ओर ही
घुमते हुआ नज़र आया| जिओन ने जब यह देखा कि काबा इनके चरणों के साथ ही घूम जाता है
तो उसने यह बात हाजी और मुलानो को बताई जिससे बहुत सारे लोग वहाँ एकत्रित हो गए| गुरु
नानक देव जी के
इस कौतक को देखकर सभी दंग रह गए और गुरु नानक देव जी के चरणों पर गिर पड़े| उन्होंने
गुरु नानक देव जी से माफ़ी भी माँगी| जब
गुरु नानक देव जी ने वहाँ से चलने की तैयारी की तो काबे के पीरों ने विनती करके गुरु
नानक देव जी की एक खड़ाव निशानी के रूप में अपने पास रख ली| भाई
गुरदास जी लिखते हैं:
धरी निशानी कौस दी
मक्के अंदर पूज कराई ||
जिथे जाए जगत विच
बाबे बाझ न खाली जाई ||
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जब गुरु नानक देव जी पूरब दिशा की तरफ बनारस जा रहे थे तो रास्ते में मरदाने ने कहा
महाराज! आप मुझे जंगल पहाडों में ही घुमाए जा रहे हो, मुझे
बहुत भूख लगी है| अगर कुछ खाने को मिल जाये तो कुछ खाकर चलने के लायक हो जाऊंगा| उस
समय गुरु नानक देव जी रीठे के वृक्ष के नीचे आराम कर रहे थे| आप
ने वृक्ष के ऊपर देखा और मरदाने से कहने लगे, अगर
तुम्हे भूख लगी है तो रीठे की टहनी को हिलाकर रीठे गिराकर खा लो| मरदाने
ने गुरु नानक देव जी के हुकुम का पालन किया| उसने
टहनी को हिलाया व रीठो को नीचे गिरा दिया| जब
मरदाने ने रीठे खाए तो वो छुहारे की तरह मीठे थे| उसने
पेट भरकर रीठे खाए| इस वृक्ष के रीठे आज भी मीठे है जो नानक
मते जाने वाले प्रेमियों को प्रसाद के रूप में दिए जाते है| मीठा रीठा नानक मते
से 45 मील दूर है|
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मलक भागो ने
ब्रह्म भोज करके सभी खत्रियों, ब्राह्मणों
और साधुओं, फकीरों
व नगर वासियों को
बुलाया| उसने यह निमंत्रण गुरु नानक देव जी को
भी दिया| पर गुरु नानक देव जी ने इस भोज में आने को मना कर दिया| बार-2
बुलाने पर भी गुरु नानक देव जी वहाँ ना पहुँचे, बल्कि
भाई लालो के घर चले गए| मलक
भागो ने भोज पर ना आने का कारण पूछा? तब
गुरु नानक देव जी ने कहा,
भाई लालो की कमाई का
भोजन दूध के समान है,
पर तेरी कमाई का भोजन
लहू के समान है| वहाँ पर उपस्थित सभी लोगों ने भोजन ग्रहण कर लिया, लेकिन
गुरु नानक देव जी ने नहीं किया| गुरु
नानक देव जी ने कहा कोई सूझ बूझ वाला व्यक्ति दूध को छोड़कर लहू नहीं पीता| मलक
भागो ने इस बात का सबूत गुरु नानक देव जी से माँगा| तब
गुरु नानक देव जी ने दाहिने हाथ में भाई लालो की सूखी रोटी ली और भागो के भोज से पुड़ी
मंगवाई| तब गुरु नानक देव जी ने दोनों हाथों की मुठियों को जोर से दबाया| लालो
की सूखी रोटी में से दूध और मलक भागो के भोजन से लहू के टपके गिरे| गुरु
नानक देव जी की
इस दैवी शक्ति से सारी सभा हैरान हो गयी| मलक
भागो मन ही मन में परेशान
हो गया और गुरु नानक
देव जी से
क्षमा माँगी| उसने गुरु नानक देव जी को नेक कमाई करने का वायदा भी किया|
****
गुरु नानक देव जी के वचन, "ना कोई हिंदू न
मुसलमान" को
जब काजी ने सुना तो उसने गुरु नानक देव जी से इसका भाव पूछा| गुरु
नानक देव जी ने
कहा इस समय अपने धर्म के अनुसार चलने वाला ना कोई सच्चा हिंदू है ना ही कोई
अपने दीन मजहब के अनुसार चलने वाला सच्चा मुसलमान है| काजी
ने जब यह सारी बात नवाब को बताई तो नवाब ने गुरु नानक देव जी को
बुलाकर कहा कि अगर आपकी नजर में हिंदू मुसलमान एक बराबर है तो
आज जुम्मे का दिन है,
आप मेरे साथ चलकर
मस्जिद में नमाज पढ़े|
गुरु नानक देव जी
उनकी यह बात मानते हुए मस्जिद में साथ चल पड़े| नवाब, काजी व
और लोग नमाज पड़ते रहे पर गुरु नानक देव जी चुपचाप खड़े रहे| नमाज
उपरांत आप जी से पूछा गया कि आप ने नमाज क्यों नहीं पड़ी? आप
ने बताया कि नवाब साहिब काबुल में घोड़े खरीद रहे थे और काजी यह सोच रहे थे कि
उनकी घोड़ी का बच्चा कही कुएँ में ना गिर पड़े, शीघ्रता
से घर पहुँच जाये| फिर आप ही बताएँ हम नमाज किसके साथ पड़ते? तन
रूप में हम सभी यहाँ माजूद थे, पर
मन रूप में आप गैर हाजिर थे| आपका
मन निजी कार्यों में लगा हुआ था और हम तो आपके मन की देखभाल ही करते रह गए| आपके
यह वचन सुनकर काजी और नवाब दोनों ने आपको नमस्कार की और अपनी भूल की क्षमा मांगी|
****
प्रवचन का महत्त्व या दौलत का
एक बार काशी के निकट के एक इलाके के नवाब ने गुरु नानक से पूछा, ‘आपके
प्रवचन का महत्व ज्यादा है या हमारी दौलत का?‘ नानक
ने कहा, ‘इसका जवाब उचित समय पर दूंगा।’ कुछ
समय बाद नानक ने नवाब को काशी के अस्सी घाट पर एक सौ स्वर्ण मुद्राएं लेकर आने को
कहा। नानक वहां प्रवचन कर रहे थे। नवाब ने स्वर्ण मुद्राओं से भरा थाल नानक के पास
रख दिया और पीछे बैठ कर प्रवचन सुनने लगा। वहां एक थाल पहले से रखा हुआ था। प्रवचन
समाप्त होने के बाद नानक ने थाल से स्वर्ण मुद्राएं मुट्ठी में लेकर कई बार
खनखनाया। भीड़ को पता चल गया कि स्वर्ण मुद्राएं नवाब की तरफ से नानक को भेंट की
गई हैं। थोड़ी देर बाद अचानक नानक ने थाल से स्वर्ण मुद्राएं उठा कर
गंगा में फेंकना शुरू कर दिया। यह देख कर वहां अफरातफरी मच गई। कई लोग स्वर्ण
मुदाएं लेने के लिए गंगा में कूद गए। भगदड़ में कई लोग घायल हो गए। मारपीट की नौबत
आ गई। नवाब को समझ में नहीं आया कि आखिर नानक ने यह सब क्यों किया। तभी नानक ने
जोर से कहा, ‘भाइयों,
असली स्वर्ण मुद्राएं
मेरे पास हैं। गंगा में फेंकी गई मुदाएं नकली हैं। आप लोग शांति से बैठ जाइए।’ जब
सब लोग बैठ गए तो नवाब ने पूछा, ‘आप
ने यह तमाशा क्यों किया?
धन के लालच में तो
लोग एक दूसरे की जान भी ले सकते हैं।’ नानक
ने कहा, ‘मैंने जो कुछ किया वह आपके प्रश्न का उत्तर था। आप ने देख लिया
कि प्रवचन सुनते समय लोग सब कुछ भूल कर भक्ति में डूब जाते हैं। लेकिन माया लोगों
को सर्वनाश की ओर ले जाती है। प्रवचन लोगों में शांति और सद्भावना का संदेश देता
है मगर दौलत तो विखंडन का रास्ता है।‘ नवाब
को अपनी गलती का अहसास हो गया।
****
लाखों
आकाश लाखों पाताल
श्री गुरु नानक देव जी कारूँ से चलकर बगदाद शहर के पूर्व की
पहाड़ी के नीचे जा बैठे|
यहां का राजा
अत्याचारी था| उसने
कई फकीरों को करामात दिखाने के लिए कैद किया हुआ था| गुरु जी ने वहां गुरुवर अकाल की बांग
लगाई तो सभी लोग सुन्न से रह गए| पीर
ने समाधि लगाकर यह पता किया कि यह शक्तिशाली बांग किसने दी है| उसे पता लगा कि किसी मस्ताने फकीर ने
बांग दी है और यह वही फकीर है जिसने मक्के को घुमाया, इमामों को चर्चा के साथ जीता है| दस्तगीर ने पूछा आपका नाम क्या है? आप किस स्वरूप के फकीर हो? मरदाने ने उत्तर दिया यह गुरु नानक है
और एक प्रभु के स्वरूप को ही मानते है|
पीर ने पूछा कि आप जो अपने कलाम में लाखों पतालों तथा लाखों आकाशों का जिकर करते
है, यह आप किस आधार पर
कहते है? हमारे हजरत साहिब ने
तीन आकाश और तीन ही पाताल बताएं है| हिन्दू
मजहब सात आकाश व सात पाताल मानता है| इसलिए
आपका कहना झूठ है गुरु जी ने कहा पीर जी! जितनी किसी को समझ होती है, वह उतनी ही बात कहता है| मुझे करतार ने लाखों की सूझ दी है, हम
ने लाखों कहे है| पीर ने कहा कि इसका यकीन हम कैसे करे| गुरु
जी कहने लगे कि आप हमारे साथ चलकर स्वयं ही देख ले| पीर
ने कहा आप मेरे बेटे को साथ लेकर जाए| मेरी
तस्सली हो जाएगी| तब गुरु जी ने पीर के पुत्र को आंखे बन्द करने को कहा| गुरु
जी पलक झपकते लाखों ही आकाशों में घूमने लगे व उसके बाद लाखों ही पातालों की सैर
कराई| पातालों से वापिस आते समय एक जगह पर संगत एकत्रित हुई थी| वहां
प्रसाद बंट रहा था| गुरु जी ने पीर के पुत्र को मिट्टी के ठूठे में कढ़ाह प्रसाद भर
कर दे दिया और वापिस पीर के पास आ बैठे| पीर के पुत्र ने वापिस आकर लाखों ही आकाशों व लाखों ही पातालों
का जिकर अपने पिता को किया| उसने
बताया कि लाखों पातालों व लाखों आकाशों को देखते-देखते में थक गया हूं| इनकी
गिणती नहीं की जा सकती|
उसने कढ़ाह प्रसाद
पिता के आगे रखकर बताया की इनके मुरीद सारे ही आकाशों व पातालों में है| यह
हलवा हमें इन्हीं के मुरीदों ने पाताल से दिया है| सारी
बात सुनकर पीर ने गुरु जी से क्षमा मांगी और नमस्कार की| इस
स्थान पर आप की याद में चबूतरा बना हुआ है जिसकी चार दीवारी की एक शिला पर गुरु जी
का आगमन उल्लेख लिखा हुआ है|
****
श्री
गुरु नानक देव जी ने सिआलकोट शहर में आकर बेरी के वृक्ष के नीचे अपना डेरा लगा
लिया| इस स्थान के पास ही
एक फकीर जिसका नाम हमजा गौंस था, मकबरे
के हजूरे में बैठा था| वह
यही कहता था कि यह शहर झूठों का है और इस शहर को मैंने श्राप से नष्ट कर देना है| उसकी वजह यह थी कि एक क्षत्रि ने मन्नत
मांगी कि अगर मेरे घर सन्तान होगी तो मैं पहला लड़का हमजा गौंस को दूंगा| पुत्र-रत्न प्राप्त होने पर उस क्षत्रि
ने हमजा गौंस को पुत्र देने से इन्कार कर दिया| क्रोधित होकर उसने शहर को नष्ट करना
शुरू कर दिया| गुरु जी उसके
मकबरे के पास पहुंचे| उसके
मुरीदों ने यह कहकर गुरु जी को जाने से रोक दिया कि जब तक यह शहर नष्ट नहीं हो
जाता तब तक हमजा गौंस न सूर्य देखेंगे न ही किसी स्त्री-पुरुष के दर्शन करेंगे| गुरु जी यह वचन करके अपने ठिकाने बेरी
के नीचे वापिस आ गए कि आज दोपहर को ही पीर सूर्य देख लेंगे और उनका प्रण भी टूट
जाएगा| पीर के मठ का गुबंज
खरबूजे को फांक की तरह तिड़-तिड़ करके नीचे तक फट गया और सूर्य की किरणें पीर के ऊपर
जा पड़ी| जिस समय पीर ने
देखा कि गुम्बज फट गया है तो शीघ्र ही दरवाजा खोलकर बाहर आ गया| गुरु जी के वचन से अपना प्रण टूटा
देखकर पीर शीघ्र ही गुरु जी के पास आ गया|
गुरु जी बोले, हे पीर जी! एक अपराधी के बदले आप सारे
शहर को नष्ट कर रहे हो| यह
अच्छी बात नहीं| दरवेशों को कहर की
बजाय दया की नजर रखनी चाहिए| गुरु
जी के वचन सुनकर गौंस को गलती का अहसास हुआ|
उसने गुरु जी से क्षमा मांगी| साथ ही साथ सब की भलाई का प्रण लिया| जिस स्थान पर बैठकर गुरु जी ने हमजा
गौंस को उपदेश दिया था उस स्थान पर गुरु जी का गुरुद्वारा बेर साहिब प्रसिद्द है|
****
श्री गुरु नानक देव जी आसाम देश के कामरुप क्षेत्र के गौहाटी
शहर से बाहर जा बैठे|
मरदाने को भूख लगी, कुछ
खाने के लिए शहर में चला गया| शहर
की प्रसिद्ध जादूगरनी नूर-शाह ने मरदाने को भेडू बना कर अपने घर में बांध लिया| अन्तर्यामी
गुरु जी को इस बात का पता लग गया| वे
उसी स्थान पर पहुंच गए जहां नूर-शाह ने जादू से मरदाने को भेडू बनाया था| उसने
अपने जादू से गुरु जी कोभी काबू करना चाहा, परन्तु
वह ऐसा करने में असमर्थ रहीं| जादूगरनी
ने गुरु जी के चरण पकड़ लिए| अपनी भूल की क्षमा मांगी और अपने उद्धार की विनती की| गुरु
जी ने कहा, आप सिक्खी धारण करो, धर्मशाला
बनवाओ, सत्य का संग करो, आपका
उद्धार हो जाएगा| गुरु जी की आज्ञा मानकर वह जादूगरनी प्रतिदिन सत्य का संग करने
लगी|
****
बाबर ने सैदपुर के इलाके में हमला कर दिया| सैदपुर
के पठानों ने इसका डटकर सामना किया| मगर
बाबर की फौजों के आगे पठानों की कोई पेश न गई| बाबर
ने खूनी होली खेली| शहर को लूट लिया| उसके सैनिकों ने हिन्दू-मुस्लिम सब
स्त्रियों का बहुत अनादर किया| इस
खून खराबे में जो बच्चे, बूढ़े
व स्त्री-मर्द बच गए उन्हें बाबर के द्वारा कैद कर लिया गया| श्री गुरु नानक देव जी और मरदाने को भी
कैदी बना लिया गया| लूट का माल साथ
लेकर, सबके सिरों पर रखवा
कर बाबर लाहौर की तरफ चल पड़ा| वहां
औरतों की ऐसी दशा देखकर आपने शब्द का भी उच्चारण किया| यह शब्द सुनकर सारे बंदियों को इस तरह
अनुभव हुआ कोई उनका दुःख बांटने वाला हमदर्द आ गया है| बाबर को कैदियों में जब दो फकीरों का
भी पता लगा तो उसने गुरु जी के दर्शन करने की इच्छा प्रगट की| गुरु जी के दर्शन करके बाबर प्रभावित
हो गया| उन्हें कामल फकीर
मानकर नमस्कार की और बेनती कि कोई सेवा बताओ|
गुरु जी विनम्रतापूर्वक कहने लगे कि आप
इन बंदी पुरुष औरतों को मुक्त कर दें| इन
का लूटा हुआ माल भी आप वापिस लूटा दें और इन्हे इनके घर वापिस भेज दें| गुरु जी का वचन मानते हुए बाबर ने सभी
स्त्री-पुरुष को समान के साथ छोड़ दिया| बाबर
ने गुरु जी के चरणों में नमस्कार की व अपनी इस भूल की क्षमा मांगी|
****
श्री गुरु नानक देव जी हेम कुन्ट के रास्ते बदरी नाथ पहुंचे| वे
वहां कैलाश पर्वत पर सिद्ध-मण्डली के स्थान मानसरोवर के पास पहुँच गए| वहां
गुरु जी को 84 सिद्ध व गोरख नाथ मण्डली मिली| उन्होंने
गुरु जी से प्रश्न किया - हे बालक! आपको यहां कौन सी शक्ति लेकर आई है? गुरु जी ने उत्तर
दिया - मैंने एक परमेश्वर का स्मरण किया है और प्रेमा भक्ति के साथ लिव लगाई है
जिसकी शक्ति से मैं यहां आया हूं| सिद्धों
ने कहा, हे बालक! आप अपना
नाम बताएं? गुरु जी ने कहा -
मेरा नाम नानक है| परमेश्वर का नाम
जपकर मैंने यह पद प्राप्त किया है| अपने
आप को नीच कहलाकर ही उच्च पद प्राप्त किया जाता है| हे सिद्धों! आप पहाड़ों में छिपकर बैठे
हो संसार की मुक्ति और कौन करे? आप
दिन रात शरीर पर खाक लगा कर रहते हो और कोई भी भलाई का कार्य आप नहीं करते| सिद्धों ने ऐसा सुनकर करामातें दिखानी
शुरू कर दी| उन करामातों से
गुरु जी को वश में करने का यत्न भी किया|
परन्तु वे विफल रहे| गुरु जी के ऊपर कुछ असर न होता देख सभी
सिद्ध आदेश-आदेश और अलख-अलख के बोल बोलते उठकर इधर उधर हो गए|
****
श्री
गुरु नानक देव जी मक्के से चलकर मदीने आ गए|
इस स्थान पर हजरत मुहम्मद साहिब दफनाएं
गए थे| इसलिए यह मुसलमानों
का बड़ा पूजनीय स्थान है|
गुरु जी ने कबर के पास बैठकर शब्द गाया| इस
शब्द गायन से बहुत मुसलमान शरई लोग गुरु जी को ईंट पत्थर मारने लगे| परन्तु
सब के हाथों के साथ ही पत्थर जुड़ गए| इस
कौतक का पता जब हकीम को लगा तो वह अपने कई प्रसिद्ध काजियों, मुल्लाओं
और पीर फकीरों को साथ लेकर गुरु जी के पास आ गया| गुरु
जी अपने शब्द गायन में मस्त थे| जब भोग पड़ा तो उन्होंने गुरु जी के चरणों में नमस्कार की व कई
प्रश्न भी किए| गुरु जी उनके प्रश्नों का उत्तर देते रहे| गुरु
जी के उत्तर सुनकर सब निरुत्तर हो गए| सबने
गुरु जी से माफी मांगी व उन्हें सच्चा पैगंबर मानकर चरणों पर दोबारा माथा रखकर
अपनी भूल की क्षमा मांगी|
इमाम ने गुरु जी के
पांव की पादुका निशानी के तौर पर अपने पास रख ली|
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श्री गुरु नानक देव जी बनारस पहुंचे तो गुरु जी की
वेश-भूषा-गेरुए रंग वाला करता, ऊपर
सफेद चादर, एक पांव में जूती एक पांव में खौंस, सर
पर टोपी, गले में माला, माथे
पर केसर का तिलक देखकर लोग इकट्ठे हो गए| वह
पंडित चतर दास को बुलाकर ले आए| पंडित
ने प्रश्न किया महाराज! हम रोज ही चाहे वेद-शास्त्र पढ़ते है, मगर
हमारे मन का अहंकार नहीं मिटता न ही मन को शान्ति हासिल होती है? गुरु
जी ने उत्तर दिया कि वेद-शास्त्र भी असर नहीं करते अगर मन के अन्दर सदा ही बुराई
का चितवन हो| अपने मन से पहले झूठ, निंदा, लोभ
व लालच आदि बुराईयों को दूर करो| फिर वेद शास्त्रों को पढ़-सुनकर उसके ज्ञान उपदेश को धारण करो| इससे
आपके मन को शांति प्राप्त होगी| गुरु
जी ने विस्तारपूर्वक समझाना शुरू किया, जिस
प्रकार नावें नदी से पार कराने वाली होती हैं| उस
पर कोई भी चढ़ जाए, वह बेड़ी नदी से पार उतार देती है| इसी
प्रकार गुरु रुपी मलाह जिस नाम रुपी बेड़ी पर चढ़ाये, उसी
पर चढ़कर ही पार उतरा जा सकता है| पंडितों ने फिर पूछा, महाराज!
हमें किस नाम का स्मरण करना चाहिए? गुरु
जी ने उत्तर दिया, आप सत्यनाम का स्मरण करें, आपकी
मुक्ति हो जाएगी| इस तरह ज्ञान का उपदेश देकर गुरु जी आगे की ओर चल दिए|
****
गुरु जी नित्य की मर्यादा के अनुसार नदी में स्नान करने गए तो
अपने वस्त्र सेवादार को पकड़ा कर नदी में गोते लगाने लगे| वे
इस तरह अलोप हुए कि बाहर न आए| सेवादारों
ने यह बात नवाब व जीजा जै राम को बताई| उन्होंने
गुरु जी को ढूंढने की पूरी कोशिश की, जाल
भी डलवाए, परन्तु आप का पता न चला| तीन दिन के पश्चात्
गुरु जी वेईं नदी से बाहर आए तो दर्शन करने वालों की भीड़ लग गई| स्नेहियों ने पूछा, महाराज! आप तीन दिन नदी में किस तरह
रहे? गुरु जी ने उत्तर
दिया, यहां से हम निरंकार
के पास सचखण्ड गए थे| निरंकार
ने हमें आज्ञा दी कि आप लोगों में प्रेमा भक्ति पैदा करके सत्य का प्रचार करो| वहां गुरु जी ने विनयपूर्वक शब्द का
उच्चारण भी किया|
मंत्र
- ੴसतिनामु करता पुरखु
निरभउ निरवैर अकाल मूरति अजूनि सैभं गुर प्रसादि (जपुजी साहिब) दिया| प्रसन्न होकर अकाल पुरख ने यह गुरु
मन्त्र दिया और उन्होंने आज्ञा दी इसको आप जपो और कलयुग के जीवों के कल्याण के लिए
उनसे इसका जाप कराओ|
****
महिता कालू जी ने श्री गुरु नानक देव जी को बहन नानकी व जीजा जै
राम के पास भेज दिया|
परन्तु वहां आप बेकार
बैठे आनन्द लेते रहे| जै राम जी ने आपको नवाब दौलत खां के पास मोदी का काम करने के
लिए लगवा दिया| गुरु जी के पास सुबह-शाम सौदा लेने वालों की भीड़ लगी रहती| गुरु
जी सौदा तोलते व तेरह-तेरह अंक की तोल के बाद फिर तेरह कहकर तोलने लगते| आप
जी के व्यवहार को देखकर निंदकों ने नवाब को शिकायत कर दी कि आप सब रसद लुटाए जा
रहे हैं तथा थोड़े ही समय में मोदी खाना खाली हो जाएगा|
यह सुनकर नवाब ने अपने अधिकारियों को मोदी खाने का
हिसाब करने की आज्ञा दे दी| हिसाब
होने पर एक सौ पैंतीस रुपये की बढ़ोतरी निकली| यह
देख नवाब प्रसन्न हो उठा व गुरु जी खुल्ले हाथों से मोदीखाने का धंधा करने लगे| श्री
गुरु नानक देव जी मोदी खाने को बड़ी उदारता के साथ चला रहे थे| अधिकारियों
ने नवाब को चुगली कर दी कि गुरु जी बड़ी लापरवाही व बेपरवाही के साथ मोदी खाना लुटा
रहे है, जिसकी वजह से मोदी खाना खाली हो जाएगा|
ईर्ष्यालु अधिकारियों की बात सुनकर नवाब ने मुंशी को मोदी खाने का हिसाब करने को
कहा| मुंशी ने अपनी सूझ-बूझ, मेहनत
व लगन से हिसाब की जांच की| उसने
नवाब को बताया कि मोदी के तीन सौ इक्कीस रुपये सरकार की ओर से ज्यादा निकले हैं| यह
बात सुनते ही नवाब खुश हो गए|
****
गुरु जी ने जैसे ही अयोध्या नगरी में प्रवेश किया, लोगों
की भीड़ एकत्रित हो गई|
गुरु जी ने एक पण्डित
से पूछा कि हमने सुना है कि अयोध्या नगरी को श्रीराम जी अपने साथ बैकुण्ठ में ले
गए थे, फिर यह तो यहीं के यहीं हैं|पंडितों
ने कहा वह केवल अयोध्या नगरी के जीवों को ही साथ लेकर गए थे, महल-माडिया
तो सब यहीं हैं| गुरु जी ने कहा उन लोगों ने श्री राम चन्द्र जी के दर्शन किए थे
जिसके लिए वह उनके साथ बैकुण्ठ चले गए थे| परन्तु
तुम बैकुण्ठ नहीं जा सकते,
जब तक गुरु उपदेश के
द्वारा भक्ति धारण नहीं करोगे| गुरु
जी से उन्होंने प्रश्न किया कि हम कौन सा गुरु धारण करें| गुरु
जी ने बताया कि जिसके मन में पूर्ण ज्ञान हो, मोह-माया
से निलौप हो, वह आप भी मुक्त हो जाता है और दूसरे भी उसके साथ चलते है जो
बैकुण्ठ धाम को प्राप्त करते हैं| पंडितों
के कहने कहने पर आपने उन्हें सत्यनाम का उपदेश देकर भाग्यशाली बनाया|
****
श्री गुरु नानक देव जी मुसलमान पीरों के प्रसिद्ध ठिकाने सरसे
में पहुंचे| पीरों ने पूछा सन्त जी! तप करना अच्छा है कि नहीं? गुरु
जी ने उत्तर दिया अगर मन विकारी है और शरीर के बल करके विकार करता हो तो शरीर को
निर्बल करके मन को शुद्ध बनाने के लिए तप करना ठीक है|
अगर मन और शरीर दोनों ही विकार रहित हो तो नाम स्मरण करना चाहिए, यह
सबसे बड़ा तप है| पीरों ने गुरु जी से उनके साथ बैठकर ४० (40 दिन)
तप करने को कहा ताकि हम भी देख सके आपके तप में कितनी शक्ति है? पीरों
ने जौं के दाने व पानी का सेवन करके 40 दिन
काटे| मगर गुरु जी निराहार नाम-सिमरण में बैठे रहे| 40 दिनों
के पश्चात् पीरो के शरीर कमजोर व चेहरे मुरझाए हुए थे| मगर
गुरु जी का शरीर पहले जैसा व चढ़दी कला में था| गरु जी का तेज देखकर पीरों ने गुरु जी को नमस्कार की और
उन्होंने आपके सिन्द्धातों को सहर्ष अपना लिया| आप
की याद में सरसे में गुरुद्वारा स्थित है और पास ही पांच पीरों की कोठड़िया भी है|
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पंडों को भ्रम से
निकालना
गुरु जी गया पहुंचे| यह
शहर गयासुर दैंत्य का बसाया हुआ है, जिसके
नाम पर ही इसका नाम गया प्रसिद्ध है| हिन्दुओं
के विश्वास अनुसार यहां प्राणियों के पिंड बनाने से उनकी गति हो जाती है|
जब गुरु जी यहां पहुंचे तो पंडो ने आपको भी अपने पितृों की गति के लिए पिंड भराने
को कहा| गुरु जी ने वहां शब्द का उच्चारण किया| इस
शब्द का मूल भाव समझाकर गुरु जी ने बताया कि अपने हाथ से किया हुआ दान कभी समाप्त
नहीं होता| इसलिए अपने जीते जी हाथों से दान करना ही लोक-परलोक में सहायक
होता है| तत्पश्चात प्राणी नमित पिंड आदि भरवाने और अन्य दान-पुण्य करना
उसके किसी काम नहीं आता|
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दिल्ली का बादशाह सिकंदर लोधी बहुत अत्याचारी था| उसने
भक्त कबीर, सधना व नामदेव आदि भक्तों को कष्ट दिए व अनेक ही फकीरों को
करामात दिखाने के लिए कैद किया हुआ था|गुरु
जी ने जब बादशाह का मरा हाथी जिंदा कर दिया तो वह अपने मसलती काजी को साथ लेकर
दर्शन करने आया| उसने प्रार्थना की कि आप मुझे उपदेश दें, खुदा
का रुप हो गुरु जी ने कहा,
"आप इन निर्दोष साधुओं
को मुक्त कर दें| धर्म व न्याय के मार्ग पर चले| किसी
भी निर्दोष को दुख न दें|"
सिकन्दर ने गुरु जी
का वचन मानकर संतों को रिहा कर दिया व आगे से ऐसा न करने का प्रण दिया| इस
स्थान पर यमुना नदी के किनारे गुरुद्वारा मजनूं का टिला करके प्रसिद्ध है| यहां
साधु मजनूं ने बहुत समय बैठकर भक्ति की थी|
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श्री गुरु नानक देव जी मरदाने को साथ लेकर जब सिआलकोट आए थे तो
एक मूले ने "मरना सच्च व जीना झूठ बताया था| उसी
मूले को गुरु जी साथ लेकर गए थे, परन्तु
कुछ दिनों के पश्चात् वह रास्ते से ही लौट कर वापिस आ गया|गुरु
जी सिआलकोट आकर उसके घर मिलने गए| उसकी
पत्नी ने इस डर से पति को उपलों के कोष्ठ में छुपा लिया कि कहीं गुरु जी उसके पति
को दुबारा साथ न ले जाएं|
गुरु जी ने उसके घर
के आगे खड़े होकर आवाज लगाई तो पत्नी ने कहा, सन्त
जी! मूला नहीं है| जब तीन बार मुल्ले की पत्नी ने यही कहा तो गुरु जी ने मरदाने से
कहा, आओ मरदाने अगर मूला नहीं है तो न सही| यह
वचन करके गुरु जी अपनी ठिकाने पर आकर बैठ गए| जल्द
ही यह खबर फैल गई कि उपलों के कोष्ठ में जहां मूले को उसकी पत्नी ने छुपाया था, वहां
उसे सांप ने डस लिया है और मूला मर गया है|
****
महिता कालू जी ने वंश की रीति अनुसार 11 साल
के होते ही आपको जनेयु पहनाने के लिए दिन निश्चित करके पुरोहित हरदियाल के पास भेज
दिया|पुरोहित
ने पुरे घर का गोबर से लेप किया व गुरु जी को पास बिठाकर मन्त्र उचारण करके जनेयु
पकड़ा व बताया कि यह क्षत्रि धर्म की मर्यादा आदि ब्रह्म से चली आ रही है, इसे धारण करना अति आवश्यक है| गुरु
जी ने कहा पुरोहित जी इसे मैला होने पर, उतार
कर नया पहनना पड़ता है और अन्त समय यहीं रह जाता है| इसके लिए ऐसा जनेयु पहना जाए जो सदा
साथ निभे व कभी मैला न हो| पण्डित
जी! यह चार कौड़ी का धागा खरीद कर, चौंके
पर बैठाकर गले में डालकर आप उपदेश देते हो कि तेरा गुरु ब्राह्मण है, मगर जब पुरुष मर जाता है तो वह जनेयु
भी साथ ही जल जाता है| जनेयु
के बिना ही पुरुष दरगाह में जाता है| तब
इस का क्या लाभ? पंडित ने आश्चर्य
चकित होकर पूछा ऐसा कौन सा जनेयु है जो कभी मैला नहीं होता, न ही टूटता है और अन्त समय दरगाह में
साथ जाता है| गुरु जी बोले, "परमेश्वर का नाम स्मरण से कपास उपजती
है और श्लाघा से सूत तैयार होता है| इस
धागे का जनेयु अगर धारण कर ले तो पवित्र जनेयु कभी भी नहीं टूटता और दरगाह में भी
साथ जाता है| यह सुनकर सब चुप हो
गए| महिता कालू जी कहने
लगे, अपनी गति को आप
जानने वाला यह अलौकिक बालक है| इसके
पश्चात भोजन ग्रहण करके व कालू जी से दक्षिणा लेकर सभी विदा हो गए|
****
हमीद कारूँ जी नसीहत देनी
श्री गुरु नानक देव जी रोम देश के सुलतान हमीद कारूँ को मिले| उसने
बड़ी कंजूसी से ४० गंज दौलत इकट्ठी की हुई थी|कारूँ
ने कबरों से मुर्दे निकाले व उनके मुंह से भी पैसे निकाल लिए| कारूँ
के राज में कोई घर में अपने पास पैसा नहीं रख सकता था| एक
दिन श्री गुरु नानक देव जी कारूँ के महल के आगे बैठकर ठीकरीयां इकट्ठी करने लगे| कारूँ
ने पूछा, पीर जी! इन ठीकरीयों का क्या करोगे? गुरु
जी ने स्वाभाविक ही वचन कह दिया कि हम इसे इकट्ठी करके परलोक में साथ लेकर जाएंगे| कारूँ
ने कहा, हे दरवेश! हमारा शरीर भी हमारे साथ नही जाता वहां आपकी ठीकरियां
क्या साथ जाएगी? अन्त समय एक तिनका भी साथ नहीं जाता| गुरु
जी हंसने लगे व कारूँ से बोले - हे बादशाह! तुम लोगों पर जुल्म करके 40 गंज
धन इकट्ठा किए हो, यह तुम्हारे साथ कैसे जाएगा? लोगो
पर किए जुल्म से तुम नर्कों में दुःख पाओगे| अगर
तुम अपनी भलाई चाहते हो तो यह पाप की कमाई गरीबों में बांट दो| गुरु
जी का यह वचन सुनकर कारूँ का मन पिघल गया| वह
अपने ही पापों को याद करके कांप उठा| गुरु
जी को कहने लगा कि मैं धन के लालच में तृष्णा की नदी में बहता जा रहा था| आप
की कृपा से में इससे निकला हूं| मुझे
खुदा का रास्ता बताओ जिस पथ को ग्रहण करके मेरा पार उतारा हो जाए| पश्चाताप
भरे शब्दों को सुनकर गुरु जी ने कहा यह 40 गंज
खजाना जो तुमने पाप से इकट्ठा किया है प्रभु के नाम पर गरीबों को बांट दो| अहंकार
से रहित होकर प्रभु की बंदगी करो| गुरु
जी के वचनों को मानकर कारूँ ने सभी खजाने गरीबों में अनाज-कपड़े के रूप में बांट
दिए| इससे लोग शान्ति से रहने लगे| कारूँ ने गुरु जी के चरणों पर नमस्कार करके कहा कि आप ने मुझ
जैसे भूलण-हार को सदमार्ग पर डाला है| आपकी
बड़ी कृपा है| कुछ दिन यहां विश्राम करके कारूँ को आनन्दित करके गुरु जी आगे
की ओर चल पड़े|
****
गुरु जी को गोपाल पांधे के पास पढ़ना
बाबा कालू जी ने शुभ दिन वार पूछ कर आपको नए वस्त्र पहना कर
पांधे के पास भेज दिया|
आप उनके लिए कुछ नकदी
व मिष्ठान भी साथ लेकर गए| महिता कालू जी गोपाल पांधे के साथ हिन्दी पढ़ाने
की बात पक्की करके घर आ गए| पांधा
भी गुरु जी को बुलार के पटवारी कालू चन्द का पुत्र समझ कर बड़े प्यार से पढ़ाने लगा| आपकी स्मरण शक्ति को देखकर पांधा
प्रशंसा करते व कालू जी को बताते कि आपका पुत्र कितना होनहार है| एक दिन श्री गुरु नानक देव जी पांधे
से कहने लगे पांधा जी| यह
बन्धन रूपी लेखा अब मुझसे वही पढ़ा जाता| आप
मुझे यमों के बन्धन से मुक्त होने को लेखा बताएं| आपने वहां शब्द का उच्चारण भी किया| आपके विचार सुनकर पांधे ने कहा कि
आपके विचार उत्तम है| नाम
जपने वालों को गरीबी की दशा में देखा जाता है| मरना भी सबका समान होता है| पांधा जी! ज्ञानी व अज्ञानी के मरने
में अन्तर है| अज्ञानी पुरुष
चिन्ता व शोक के साथ कई विषय विकारों को साथ लेकर मरते है, मगर ज्ञानी व्यक्ति परमात्मा को अंग
संग देखते हुए व यमों से निर्भय होकर शरीर त्यागते है| आप जी के वचन सुनकर पांधे ने हाथ जोड़कर
आपसे क्षमा मांगी|
****
राजा का तन, मन, धन
एक बार की बात है
श्री गुरुनानक देव जी ने किसी शहर में कृपा फरमाई| उनके आने की खबर सुनकर वहाँ का
राजा भी उनके दर्शनों के लिए गया और अपने साथ कुछ धन भेंट करने के लिए ले गया| जब
वह गुरुनानक जी के आगे भेंट करने लगा तो गुरु महाराज जी ने फरमाया राजा ये बेगानी
चीज क्यों दे रहा है?
कोई अपनी चीज दे तो राजा ने उत्तर दिया कि ये धन दौलत सब मेरा ही तो है तो गुरु नानक
देव जी ने कहा कि तेरे पिताजी भी यही कहते थे, लेकिन क्या वो सारा धन अपने साथ ले गए?
तो राजा ने कहा कि ये धन मेरा नही,
तो मेरा मन ले लो| तब गुरुनानक देव
जी ने कहा कि मन भी तेरा नही है|
क्या मन का तुम्हारे ऊपर जोर है? तुम यहाँ हो और तुम्हारा मन अपने राज्य में लगा
है| तो राजा ने कहा कि
ये धन भी मेरा नही, मन मेरा नही है तो मेरा तन ले लो| तो गुरु नानक देव जी ने
फरमाया कि तन भी तेरा नहीं है| तू जब संसार से जाएगा तो तन तेरे साथ जाएगा? तब राजा ने कहा कि
महाराज धन मेरा नहीं, मन मेरा नहीं, तन मेरा नहीं
तो आप बताओ मैं क्या दूँ? तो गुरुनानक जी ने फरमाया कि गुरु के आगे कहता है
मैं क्या दूँ? ये “मैं”
हमे दे दे| तू जो हर वस्तु को अपनी कहता है|
जरा सोच विचार कर देख! क्या वास्तव में ये संसार की वस्तु अपनी है? राजा गुरु नानक
देव जी के वचन सुनकर बहुत शर्मिंदा हुआ और गुरु नानक जी से विनती की स्वामी जी मैं
बहुत अज्ञानी हूँ| आप ही कृपा करो और मैं को मिटा दो तो गुरु महाराज जी ने राजा के
सिर पर हाथ रखा और अपने भक्त को कहा कि सुन राजा के दिल से क्या आवाज़ आ रही है? तो
भक्त ने राजा के सीने के पास कान लगाए तो अंदर से आवाज़ आई - तू ही तू| तब राजा की
मैं मिट गई| महापुरुष किसी न किसी तरह से जीव को सच की राह दर्शाते है|
****
मौत
कितनी दूर है
एक
बार गुरुनानक देव जी ने अपने भक्त मर्दाना से पूछा बता भाई मर्दाना मौत को कितना
नजदीक समझता है? तो मर्दाना ने फरमाया कि जहां तक मुझे पता है आज का सूरज देख रहा
हूँ, पता नहीं कल का देखूँ न देखूँ| तो गुरुनानक देव जी ने भाई बाला जी से पूछा तू
बता बाला मौत को कितना नजदीक समझता है? तो भाई बाला ने फरमाया जहां तक मुझे पता है
आज सुबह का समय गुजर चुका है, पता नही शाम का देखूँ या न देखूँ| तब गुरु महाराज जी
ने फरमाया इतनी दूर समझते हो मौत को| मौत तो एक पल की मेहमान है पता नहीं एक
स्वांस के बाद दूसरा स्वांस आये या न आये|
****
उजड़ जाओं और बसे
रहों
एक बार श्री
गुरुनानक देव जी अपने भक्तो के साथ कही जा रहे थे| तो रास्ते में उन्होंने देखा कि
कुछ अच्छे लोग है, जो भगवान का नाम ले रहे है| भगवान की भक्ति में लीन है| तो
गुरुनानक देव जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया उजड़ जाओ| उनके भक्त यह सुनकर हैरान हो गए
ये कैसा आशीर्वाद है? थोड़ी ही आगे चले तो गुरुनानक देव जी ने देखा कुछ गंदे लोग है
जो आपस में झगड़ रहे है| एक दूसरे को गालिया निकाल रहे है तो गुरुनानक देव जी ने
उन्हें आशीर्वाद दिया बसे रहो| गुरुनानक देव जी के साथ उनके भक्त थे वो बड़े हैरान
हुए|
उन्होने
गुरुनानक देव जी से पूछा कि स्वामी जी आपने अच्छे लोगो को तो उजड़ जाओ का आशीर्वाद
दिया और बुरे लोगो को बसे रहने का आशीर्वाद दिया| ये कैसा आशीर्वाद है? तब गुरुनानक
देव ने वचन फरमाए कि देखो जो बुरे लोग है वो जहां भी जाएँगे बुराई फैलाएँगे, इसलिए
इन्हें आशीर्वाद दिया कि बसे रहो ताकि ये कहीं भी अपनी बुराई न फैलाए| और जो अच्छे
लोग है, वो जहां भी जाएंगे अपनी अच्छाई साथ ले जाएंगे और दुसरो को भी अच्छा
बनाएंगे इसलिए इन्हें आशीर्वाद दिया उजड़ जाओ|
****
नित
नया आनंद
श्री
गुरुनानक देव जी फरमाते थे कि गुरु दरबार ही एक ऐसा दरबार है जहां नित्य नया आनन्द
होता है| बाकि हर वस्तु का आनन्द धीरे-धीरे खत्म हो जाता है| उदाहरण के लिए अगर
कोई व्यक्ति नई गाड़ी लेता है, तो पहले दिन उसे बड़ी ख़ुशी होती है| लेकिन अगले दिन
वह ख़ुशी कम हो जाती है किन्तु भगवान के दर पर नित्य नया आनन्द मिलता है और यह आनंद
निरंतर बढ़ता जाता है|
****
भूमिया को उपदेश
एक बार गुरुनानक
देव जी सत्संग का प्रचार करते हुए किसी गाँव में पहुँचे| उस गाँव में एक जमीदार
रहता था| जिसका नाम भूमिया था और जिसका काम लोगो के घर चोरी करना था| उसने साधू
संतो के लिए सबसे कह रखा था कि साधू संतो को कोई अपने घर पर नही आने देगा| अगर कोई
साधू या संत आये तो उसे मेरे घर भेज देना| जो साधू संतो को अपने घर लाएगा, तो उसका
घर लूट लिया जाएगा| जब गुरुनानक जी वहाँ पर पहुँचे तो किसी के घर के पास जाकर बैठ
गए तो उस घर के मालिक ने विनय की आप यहाँ ना बैठे अगर आपको बैठना ही है तो जमीदार
के घर चले जाएं| गुरुनानक जी उसे डरा हुआ देखकर वहाँ से चले गए और ज़मीदार के घर
पहुँचे| अब उनके दर्शन पाकर जमीदार को बहुत खुशी हुई उसने गुरुनानक जी को भोजन
करने के लिए विनय की तब गुरुनानक जी ने कहा कि तेरी पाप की कमाई है| हम यहाँ भोजन
नहीं कर सकते, तो जमीदार ने चरणों में गिरकर विनती की फिर मेरा कल्याण कैसे होगा?
तब गुरु नानक जी ने फरमाया कि तू यह धंधा
छोड़ दे, तो उसने कहा कि मैं ये काम नहीं छोड़ सकता तब गुरुनानक जी ने कहा कि ठीक है|
अगर ये काम नहीं छोड़ सकता तो फिर हमे तीन वचन दे (1) सदा सच बोलना (2) जिसका नमक
खाना उसके साथ बुरा मत करना (3) किसी गरीब को मत लूटना| उसने यह वचन मान लिए उसके
बाद गुरु नानकदेव जी ने भोजन किया|
अगले
दिन उसने चोरी करने का सोचा| तो उसे वचन याद आया कि गरीब के घर नही जाना तो वह
राजा के घर गया| अब उसने महल में आकर चोरी की और जब वह जाने लगा तो उसने एक डिब्बी
में चूर्ण को हाथ में लेकर स्वाद लिया तो उसमे नमक था| उसे फिर से अपना वचन याद
आया कि जिसका नमक खाया है, उसके साथ बुरा नहीं करना| तो वह सारा चोरी का सामान वही
छोड़ गया| अगले दिन राजा को पता चला तो राजा ने उसकी खोज करवाई पर वह न मिला| अंत
में राजा के सैनिको ने कई दूसरे चोरों को पकड़ लिया| तब भूमिया ने सोचा कि मेरी वजह
से किसी को तकलीफ क्यों हो? तो वह खुद ही राजा के पास चला गया और गुरुनानक जी से
वार्तालाप का सारा वृतांत सुनाया| भूमिया की बात सुनकर राजा ने कहा कि धन्य है वे
महापुरुष जो अपने उपदेशो से जीवो को
सतमार्ग पर लगा रहे है और धन्य हो तुम जो महापुरुषों के वचन पर विश्वास किया| आज
से मैं तुम्हे अपना मंत्री नियुक्त करता हूँ| तत्पश्चात दोनों गुरुनानक देव जी
महाराज के गुणवाद गाने लगे और अपना लोक परलोक संवार लिया|
****
बिच्छु की रक्षा
करना
एक बार श्री
गुरुनानक देव जी कहीं जा रहे थे तो रास्ते में उन्होंने देखा कि एक नदी में बिच्छु
डूब रहा है| तो गुरुनानक जी उस बिच्छु को बचाने के लिए नदी में गए और दोनों हाथो
से उसे उठा लिया लेकिन बिच्छु जैसे ही गुरुनानक जी के हाथो में जाकर डंक मार देता
और नीचे गिर जाता| ऐसा कई बार हुआ तभी किसी सेवादार ने गुरुनानक जी से कहा कि
स्वामी जी वो आपको बार–बार डंक मार रहा है तो आप उसे छोड़ क्यों नहीं देते? तो
गुरुनानक जी ने फरमाया कि जब यह बिच्छु
होकर अपना डंक मारने का स्वभाव नहीं छोड़ रहा तो मैं अपना परोपकारी स्वभाव क्यों
छोडू?
****
एक बार श्री
गुरुनानक देव जी मुलतान देश की सीमा पर पहुँचे और वहाँ के फकीरों को जब यह पता चला
तो वे ड़र गए कि ये महापुरुष कही सबको अपना न बना ले| तो उन्होंने श्री गुरुनानक
देव जी के पास ऊपर तक भरा हुआ दूध का एक बर्तन भेजा जिसका मतलब था कि मुलतान में
किसी और संत के लिए जगह नही है| श्री गुरुनानक देव जी ने एक चमेली का फूल उस दूध
के बर्तन पर रखा| वह दूध पर तैर रहा था और यह सन्देश भेजा की दूध बिलकुल नहीं गिरा
है अर्थात् उनका वहाँ आना एक फूल की सुगंध की तरह होगा| संत कोमल ह्रदय के होते है|
वे अपने शरीर पर कष्ट उठाकर लोगो की सहायता करते है| वे स्वयं कठिनाइयों को सहन
करते और मानवता के लिए एक आदर्श छोड़ जाते है|
****
सिद्धो
के प्रश्न
एक बार श्री
गुरुनानक देव जी विचरण करते हुए हिमाचल पर्वत पर जा निकले| वँहा हिमाचल के एक शिखर
पर सिद्धो का आश्रम था| गुरुनानक देव जी उस आश्रम पर पहुँचे तो सिद्धो की मण्डली
ने उन्हें घेर लिया और उन्हें भी सिद्धो में सम्मिलित होने को प्रेरित करने लगे| किन्तु
श्री गुरुनानक देव जी सिद्धी के दर्जे में बहुत ऊपर थे| उन्होंने भक्ति योग पर जोर
दिया तब वहाँ उन सिद्धो के साथ बहुत प्रश्न उत्तर हुए जिन्हें “सिद्धी-गोष्ठी”
नाम की पुस्तक के रूप में भी संग्रह किया
हुआ है| उसी क्रम में राजा गोपीचंद ने गुरुनानक देव जी की परीक्षा लेने के लिए
प्रश्न किया था –
कवन सु ज्ञानी कवन सु ध्यानी ||
कवन तीरथ मज्जन इस्नानी ||
कवन
सु निर्मल कवन सु मैला ||
कवन
सु वस्तु जित लागे गैला ||
कवन सु उपर कवन सु
थल्ले ||
कवन
युक्ति कर दीपक जल्ले ||
कहे गोपीचंद सुन
नानक तप्पे ||
कवन सु जाप जित
रसना जप्पे ||
अर्थ – “संसार
में कौन सा मनुष्य सच्चा ज्ञानी है? कौन सच्चा ध्यानी है और कौन सच्चा तीर्थ स्नान
करने वाला है? निर्मल क्या है और मैला क्या है? वह क्या वस्तु है जिसे प्राप्त
करके मनुष्य सुमार्ग पर लग सकता है? सबसे ऊपर क्या है और सबसे नीचे क्या है? मनुष्य
के भीतर मौजूद रहने वाला रूहानी प्रकाश या आत्मिक ज्योति किस उपाय से प्रकट होती
है? राजा गोपीचंद जी कहते है कि हे नानक तपीश्वर! जिह्वा को कौन सा जाप करना चाहिए
जिससे अमरतत्व या वास्तविक जीवन प्राप्त हो?”
तब श्री गुरुनानक देव जी ने इसका उत्तर यूँ दिया
-
ज्ञानी सो जो
गुरुमुख होवे |
ध्यानी सो जो सुरति
न खोवे ||
तीरथ मज्जन गुरु
दर्शन पाया |
परती लागे पाप
गवाया ||
निर्मल वाणी जित
मैल न राई |
गुरु पुरे बिन मैल
न जाई ||
गुरु-उपदेश ले कार
सिधाया |
धुर ही पहुंचे ,ठाक
नहीं पाया ||
हुकुम ही उपर हुकुम
ही थल्ले |
हुकुम पछाने ता
दीपक जल्ले ||
कहे नानक सुन
गोपीचंदा ,
मोह –माया के बंधन
कप्पे |
एह बिद जाप जित
रसना जप्पे ||
अर्थ – “सब
से बड़ा ज्ञानी वह है जो गुरुमुख है, जिसने गुरु –उपदेश से झूठी मोह–ममता को चित्त
से हटा कर सत-वस्तु (नाम, भक्ति,प्रेम और परमार्थ) में मन लगाया है| सच्चा धनी वह
है जिसकी सुरति सदा अपने ठिकाने पर रहती है और कभी इधर–उधर भटकती नहीं है| गुरु का
दर्शन पाना ही सच्चा तीर्थ स्नान है, क्योंकि श्रद्धा सहित गुरु के चरणों को
स्पर्श करने से ही जीव के सारे पाप धुल जाते है| गुरु का वचन ही निर्मल वस्तु है, जिसमे
किसी प्रकार की तनिक मात्र भी माया और मलिनता की मिलावट सम्मिलित नहीं| पूरे गुरु
के बिना जीव के अन्दर की मैल नहीं काटी जा सकती और जो पूछा है कि किस वस्तु को पकड़
लेने से जीव सुमार्ग पर चल सकता है? तो इसका उत्तर यह है कि जो कोई गुरु-उपदेश को
लेकर कमाई में लगा रहता है, वह सब प्रकार के बन्धनों से आजाद होता हुआ सीधा धुर धाम
में जा पहुँचता है जो कि रूह का असली स्थान है और उनके रस्ते में किसी प्रकार की
रुकावट तथा कठिनाई नहीं आती| सबसे ऊपर सच्चे मालिक का हुकुम है और सबसे नीचे भी
यही मालिक का हुकुम है|
जिसने
मालिक के हुकुम को पहचान कर मान लिया तो
उसके अन्दर आत्मिक ज्योति प्रज्वलित हो उठती है –अर्थात जिसने मालिक की मौज और
इच्छा में सिर झुकाना तथा जो अपनी अहंम और ममता को त्याग कर सच्चे मालिक की इच्छा
को मानता है वही अपने अन्दर में प्रकाश और मालिक की ज्योति देख सकता है| श्री
गुरुनानक देव जी फरमाते है कि –हे राजा गोपीचंद जी, सुनो! मोह-माया के सभी बन्धनों
को काटने के लिए सच्चे मालिक, सच्चे गुरु के सार शब्द का जाप करना ही असली जाप है
जिसको “अजपा”
जाप भी कहते है, जिसे हमेशा करना चाहिए”|
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घुड़सवार ने मर्दाने
को लात मारी
कहते है कि जब
गुरुनानक देव जी संसार को तारने के लिए यात्रा पर निकले तो उनके शिष्य बाला और
मर्दाना भी उनके साथ थे| गुरुनानकदेव जी आगे चल रहे थे और मर्दाना उनके पीछे| इतने
में एक व्यक्ति घोड़े पर सवार होकर आया उसने गुस्से में मर्दाना को लात मारी और वचन
उच्चारण किये ‘कुराइए के डूम’| कुराईया कहते है जो किसी को गलत राह पर ले जाते है
डूम कहते है भंगी को| यह कहकर वह व्यक्ति चला गया| जब गुरुनानक देव जी ने पीछे
मुड़कर देखा तो मर्दाना नीचे गिरा पड़ा था| तब उन्होंने मर्दाना से पूछा क्या हुआ? तब
उसने बताया कि महाराज वो घोड़े पर जो व्यक्ति जा रहा है उसने लात मारी है और उसने
जो वचन उच्चारण किये है, उससे मुझे बहुत दुःख हुआ है| वो मुझे कुछ भी कहता तो मैं
सुन लेता परन्तु उसने आप को कुराईया कहा है यह मुझे बहुत बुरा लगा है| आप
पारब्रह्म परमेश्वर, सर्व समर्थ है एक बार अपने मुख से फरमा दो, ओ घोड़े पर जाने
वाले घुड़सवार तेरा बेडा गर्क हो तब गुरुनानक जीने फरमाया कि हम बेडा गर्क करने के लिए नहीं आये है, हम तो बेड़े तारने
के लिए आये है| गुरुनानक देव जी ने मर्दाना को कहा कि तू एक बार ये कह कि घोड़े पे
जाने वाले घुड़सवार रब तेरा भला करें| तब मर्दाना ने कहा कि मैं तो नहीं कहता
क्योंकि इस व्यक्ति ने आपको गलत कहा है| तब गुरुनानक देव जी ने उसे समझाया| तब
मर्दाना ने कहा ठीक है महाराज मैं कहता तो ना, पर आप जिद करते हो तो मैं कह देता
हूँ कि ओं घोड़े पे जाने वाले घुड़सवार रब तेरा भला करे| अभी वह घोड़े पर जाने वाला
व्यक्ति थोड़ी दूर पर ही पहुंचा था, तो घोड़े को पत्थर लगा और वह घोड़ा गिर पड़ा और
उसने प्राण त्याग दिए उस व्यक्ति को भी चोट लगी| तब उसको एहसास हुआ कि मैंने आज
बहुत गलत काम किया है, उसी की सजा मुझे मिली है| उसने बड़ी शर्म महसूस की वह वापिस
माफ़ी मांगने के लिए आया| जब मर्दाना ने उस व्यक्ति को वापिस आते देखा तो गुरुनानक
देव जी से कहा कि वह व्यक्ति वापिस आ रहा है आप और बाला इसे पकड़ लो मैं इसकी पिटाई
लगाता हूँ| तब गुरुनानक जी ने कहा कि नहीं मर्दाना इसे मारना नहीं है इस पर शब्द
का तीर चला| तब गुरुनानक जी ने वचन उच्चारे “गर्व
न कीजे नानका, मत सिर लीजे भार”
बताया कि इंसान को कभी गर्व नहीं करना चाहिए, गर्व करने वाले को अपने सिर पर अनेको
भार लेने पड़ते है, जो वह अपने अगले जन्मो में उठाता है| आज तूने जो मेरे शिष्य को लात मारी इसके लिए तुझे चौरासी लाख
योनिया भुगतनी थी परन्तु मेरे कीर्तनी ने ये वचन उच्चारे कि ‘ओ घोड़े पे जाने वाले
रब तेरा भला करे’ तो आज तेरी चौरासी कट गई| तो कहने का मतलब यह है कि महापुरुष
कितने दया के सागर है जो कोई उनके साथ गलत करता है उसको भी सही राह दिखा कर तार
देते है|
****
भाई रूपां की भक्ति
श्री गुरुनानक जी
के समय की बात है उनका एक भक्त भाई रूपा रात-दिन उनको याद करके श्री चरणों में
दर्शनों की आस पूरी करने की विनती कर रहा है| मन में एक ही भाव है कि मेरे
गुरुनानक जी आ जाए और अपने दर्शनों से निहाल करे| कहते है कोई दिल से याद करे तो
परमात्मा उसकी पुकार जरुर सुनता है| गुरुनानक देव जी ने अमृत वेले के समय जब
मर्दाना कीर्तन शुरू करने लगा तब श्री गुरुनानक देव जी ने फरमाया कि मर्दाना आज
कीर्तन हम अपने भक्त के खेतो में जाकर करेंगे| श्री गुरुमहाराज जी और मर्दाना भाई
रूपा के खेतो में जा पहुँचे| जब वह भाई रूपा जी के सामने आये तो श्री गुरुनानक देव
जी ने आवाज़ दी भाई रूपा देख हम आ गए| जैसे ही भाई रूपा जी ने देखा कि मेरे गुरुनानक जी आ गए तो आँखों से आंसू आने
लगे| श्री गुरुनानक जी ने उन्हें दर्शन देकर निहाल कर दिया| गुरुनानक जी ने भाई
रूपा जी से कहा कि देख भाई हमारा स्वभाव है जिसे हम अपना बना ले, वो बेशक हमे छोड़
दे, लेकिन हम उसे नहीं छोड़ते| फिर श्री गुरुनानक जी ने कहा कि भाई रूपा तूने दर्शन
कर लिए अब हम चलते है तब भाई रूपा ने कहा कि महाराज आप न जाओ| तब गुरुनानक जी ने
कहा कि हम जाएंगे भी और तेरे पास भी रहेंगे| तब भाई रूपा ने पूछा कि महाराज ये
कैसे हो सकता है? तब गुरुनानक देव जी ने कहा भाई रूपा जो तू रोज सुबह अमृत वेले
उठकर हमे याद करेगा, पाठ पड़ेगा तो उस समय हम तेरे साथ रहेंगे|
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कीर्तन
से कल्याण
श्री गुरुनानक देव
जी से संगत ने एक बार विनय की महाराज हमारा कल्याण कैसे होगा? तब श्री गुरुनानक
देव जी ने फरमाया कि अगर कल्याण चाहते हो तो चरणों का ध्यान अपने मन में बसाये
रखो| जो चरणों का ध्यान हर समय मन में बसाएगा तो कल्याण ही कल्याण है| तब संगत ने
विनय की महाराज हम संसारिक जीव है| काम-धंधे भी करने होते है, हर समय चरणों का
ध्यान मन में नहीं रख सकते तब उन्होंने विनय की हमे कल्याण का कोई दूसरा रास्ता
बताओ| तब श्री गुरुनानक जी ने कहा कि अगर चरणों का ध्यान मन में नहीं बसा सकते तो
सारा दिन नाम जपते रहा करो “वाहेगुरु-वाहेगुरु”
तब तुम्हारा कल्याण हो जाएगा| संगत ने विनय की कि नाम भी सारा दिन नहीं जप सकते
कोई और मार्ग बताओ| तब श्री गुरुनानक देव जी ने फरमाया कि चरणों का ध्यान अपने मन
में नहीं रख सकते, नाम भी सारा दिन नहीं जप सकते तो दो समय सुबह –शाम कीर्तन में
चले जाया करो| तब संगत ने पूछा कि सारा दिन चरणों का ध्यान मन में रखना, सारा दिन
नाम जपना और कहाँ दो समय कीर्तन में जाना क्या पूर्ति हो जाएगी, बराबर फल मिलेगा? तब
श्री गुरुमहाराज जी ने फरमाया कि जो दो समय कीर्तन में जाकर बैठेगा गुरुबानी
सुनेगा| अपना ध्यान मालिक के चरणों में लगेगा तो उतना ही फल मिलेगा जितना की सारा
दिन चरणों का ध्यान और नाम जपने का होता
है|
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सालसराय को उपदेश
एक बार श्री गुरुनानक
देव जी अपने भक्त बाला, मर्दाना के साथ विसमरपुर की ओर चले गए| अभी शहर से दूर ही
थे तो गुरु नानक देव जी वही आराम करने लगे तब मर्दाना ने कहा कि महाराज मुझे तो
भूख लगी गई है तो गुरुनानक देव जी ने फरमाया कि हम यहाँ आराम कर रहे है| तू शहर
जाकर कुछ खाकर आ जाना| तब मर्दाना ने कहा कि महाराज मेरे पास तो धन ही नहीं है| तब
गुरुनानक देव जी ने मर्दाना को एक लाल(हीरा)दिया| लाल को लेकर मर्दाना कई
दुकानदारो के पास गया लेकिन किसी ने भी उस पत्थर के बदले कुछ नहीं दिया| मर्दाना
वापिस गुरुनानक देव जी के पास आया और बताया कि इस लाल के बदले मुझे किसी ने कुछ भी
नहीं दिया| तब गुरुनानक जी ने फरमाया कि तू इस लाल को लेकर साल सराये जौहरी जोकि
शहर में रहता है उसके पास जा| जब मर्दाना उस लाल को लेकर उस जौहरी के पास गया और
मर्दाना ने उसे वो लाल दिखाया तो जौहरी ने मर्दाना को कुछ भेंट दी और कहा कि यह
बड़ा ही कीमती पत्थर है मैं इसका मोल नहीं चुका सकता सिर्फ इसकी दिखाई तुम्हे दे
रहा हूँ| तब उस जौहरी ने पूछा कि आपको यह पत्थर कहाँ से मिला? तो मर्दाना ने बताया
कि मेरे गुरुनानक जी के पास ऐसे अनेको लाल है वह तो संसार के मालिक है| तब उस
जौहरी के मन में उनसे मिलने की इच्छा जागी तो उन्होंने अपने नौकर(अद्रंगा) को
मर्दाना के साथ भेजा कि तू जा और जाकर उन महापुरुषों को रोक मैं अभी आता हूँ कही
वो चले न जाये| जब मर्दाना गुरुनानक देव जी के पास पहुंचा तो उसने भेंटा को
गुरुनानक जी के चरणों में रखा और लाल भी उनके चरणों में रखा और कहा कि महाराज यह
लाल तो बड़ा ही कीमती है| तब गुरुनानक देव जी ने फरमाया कि मर्दाना तू इस लाल को
अनमोल मत समझ मैंने तो तुझे उससे भी ज्यादा कीमती लाल (कीर्तन, सत्संग) दे रखा है
जिसे तू कहीं पर भी जाकर सुनाएगा तो संसार के सारे पदार्थ तेरे चरणों में दौड़े चले
आएँगे| तब मर्दाना को सच्चे लाल की परख हुई| तब उस अद्रंगे ने जो कि मर्दाना के
साथ आया था, गुरुनानक देव जी के वचन सुनकर और दर्शन करके उनके चरणों में अपने शीश
को रख दिया| गुरुनानक जी ने उसे आशीर्वाद दिया| इतने में वह जौहरी भी आ गया| तब उसने
आकर गुरुनानक जी के चरणों में शीश नवाया तो गुरुनानक जी ने फरमाया कि साल सराये
तूने आने में बड़ी देर कर दी जो दात हमने तुझे देनी थी वो तेरे नौकर को मिल गई| तो
साल सराये ने कहा महाराज मुझे तो केवल आपके दर्शन चाहिए और कुछ नहीं चाहिए| तब
गुरुनानक देव जी ने साल सराये की नम्रता भाव को देखने के लिए उससे कहा कि अगर तू
दात चाहता है तो अपने नौकर के चरण पकड़ ले| तब साल सराये ने कहा कि महाराज आप कहो
तो मैं आपके कुत्तो के भी चरण पकड़ लू| तब गुरुनानक देव जी उसकी भावना को देखकर बड़े खुश हुए और फरमाया
कि तेरी उम्र बड़ी कम है लेकिन हम तुझे आशीर्वाद देते है कि तू जितना जीना चाहे जी
सकता है, अपने बाद वह दात अपने नौकर को दे दियो| इस तरह साल सराये और उसके नौकर ने
गुरुनानक जी से दात प्राप्त की और वापिस लौट आये|
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भाई
लालों के घर
श्री गुरु नानक देव
जी एक बार मर्दाना और बाला के साथ अहमदाबाद अपने भक्त लालो के घर गए| जैसे ही
मर्दाना ने घर पहुँचकर दरवाज़ा खोला तो भाई लालो ने पहली बार गुरु नानक जी के दर्शन
किये| लालो ने पूछा कि महापुरुषों आपके मुख पर इतना तेज है आप कौन है| तब मर्दाना
ने लालो को बताया कि ये परब्रहम परमेश्वर श्री गुरुनानक देव जी है| तब लालो की
आँखों में अपने गुरु के दर्शन कर आंसू आ गए| लालो गुरु नानक जी को अन्दर ले आया| लालो
बहुत गरीब है बैठने की जगह भी नहीं है, टूटी हुई चारपाई पर श्री गुरु नानक जी बैठ
गए| लालो ने गुरुनानक जी से पूछा महाराज कुछ खाने को लेकर आऊ? तब गुरु नानक जी ने
आज्ञा दी| लालो कोद्रे की रोटी ले आया और गुरुनानक जी को खाने के लिए दी| गुरुनानक
जी ने फरमाया कि बड़े प्रेम से लाया है तेरा प्रसाद स्वीकार है | गुरुनानक जी ने
मर्दाना से कहा कि भाई मर्दाना ले तेरे को बड़ी भूख लगी थी न, तब मर्दाना ने कहा कि
महाराज जब खाने को ढंग का खाना न मिले तो भूख मर जाती है| तब लालो ने मर्दाना से
विनय की| उसके बाद गुरुनानक देव जी ने मर्दाना से कहा कि बड़े प्यार से लाया है एक
टुकड़ा खाकर तो देख जब मर्दाना ने टुकड़ा लिया| तो गुरुनानक जी ने फरमाया कि मर्दाना
इस टुकड़े को चबाना मत, जीभ के नीचे रख ले| जब मर्दाना ने ऐसा किया तो अमृत का
स्वाद आया तब मर्दाना ने गुरुनानक देव जी से विनय की महाराज मुझे और रोटी दो तब
गुरुनानक देव जी ने फरमाया कि बस बाकि मेरे लिए क्योंकि जब लालो जैसा भक्त प्रेम
से भोग लगवाता है तो हमे भी भूख लग जाती है| इस तरह गुरु नानक जी ने लालो को अपना
प्यार बक्शा और सच्ची दात से मालो-माल कर दिया|
****
श्री
गुरु नानक जी एक बार बाला मर्दाना के साथ कही जा रहे थे तो रात का समय हो गया तो
श्री गुरु नानक जी ने देखा कि किसी व्यक्ति की दुकान खुली है| तो उन्होंने मर्दाना
से कहा कि जा भाई मर्दाना दुकानदार से पूछ के आ कि आज जब तू दूकान बंद कर के जाए
तो हम तेरी दूकान के आगे रात गुजार ले| तब उसने आज्ञा मानी और दुकानदार के पास
पूछने गया| लेकिन दुकानदार ने मना कर दिया| तब श्री गुरु नानक जी ने वचन फरमाए| चल
मर्दाना कही और चलते है| मर्दाना ने देखा कि दूर एक झोपड़ी है शहर से बाहर| तो उसने
गुरुनानक देव जी को बताया तो गुरु नानक जी ने कहा कि चल मर्दाना वही चल कर भगवान
का गुणगान गाते है और रात को सफल करते है| जब श्री गुरु नानक देव जी वहां पहुचे तो
मर्दाना को कहा कि जा झोपड़ी में जाकर पूछ के आ की आज हम यहाँ पर रात बिता ले? जब
मर्दाना अंदर गया तो क्या देखता है कि अंदर एक कौड़ी बैठा है जिसको भयंकर कौड़ हो
रखा है शरीर पूरा गला पड़ा है| झोपड़ी में बदबू फैली हुई है| मर्दाना बिना कुछ कहे
बाहर आ गया और श्री गुरु नानक जी को सारा वृतांत सुनाया| गुरु नानक जी ने मर्दाना
को कहा कि तू उस कौड़ी को बाहर ले आ खीचँ के| जब मर्दाना कौड़ी को बाहर ले कर आया|
तो उसने श्री गुरु नानक जी के दर्शन किये| गुरु नानक जी ने पूछा कि तू कौन है यहाँ
पर कैसे आया? तब उसने सारी बात बताई कि मैं पहले बहुत अमीर था, घर परिवार सब कुछ
था लेकिन बुरे काम करके मैंने जीवन ख़राब कर लिया| बुरी संगति में पड़ जाने से मैंने
अपना सब कुछ गवा दिया| बुरे कर्मो के कारण ही मुझे कौड़ का रोग हो गया| मेरे रिश्तेदार
मुझे यहाँ अकेले में छोड़ गए| तब उसने विनय की आप रब के बन्दे लगते हो मुझ पर कृपा
करो| तब श्री गुरु नानक जी ने कौड़ी के सामने शब्द का उच्चारण किया|
जीउ तपतु है बारो बार ॥
तपि तपि खपै बहुतु बेकार ॥
जै तनि बाणी विसरि जाइ ॥
जिउ पका रोगी विललाइ ॥१॥
बहुता बोलणु झखणु होइ ॥
विणु बोले जाणै सभु सोइ ॥१॥
जिनि कन कीते अखी नाकु ॥
जिनि जिहवा दिती बोले तातु ॥
जिनि मनु राखिआ अगनी पाइ ॥
वाजै पवणु आखै सभ जाइ॥२॥
जेता मोहु परीति सुआद ॥
सभा कालख दागा दाग ॥
दाग दोस मुहि चलिआ लाइ ॥
दरगह बैसण नाही जाइ ॥३॥
करमि मिलै आखणु तेरा नाउ ॥
जितु लगि तरणा होरु नही थाउ ॥
जे को डूबै फिरि होवै सार ॥
नानक साचा सरब दातार ॥४॥३॥५॥
तपि तपि खपै बहुतु बेकार ॥
जै तनि बाणी विसरि जाइ ॥
जिउ पका रोगी विललाइ ॥१॥
बहुता बोलणु झखणु होइ ॥
विणु बोले जाणै सभु सोइ ॥१॥
जिनि कन कीते अखी नाकु ॥
जिनि जिहवा दिती बोले तातु ॥
जिनि मनु राखिआ अगनी पाइ ॥
वाजै पवणु आखै सभ जाइ॥२॥
जेता मोहु परीति सुआद ॥
सभा कालख दागा दाग ॥
दाग दोस मुहि चलिआ लाइ ॥
दरगह बैसण नाही जाइ ॥३॥
करमि मिलै आखणु तेरा नाउ ॥
जितु लगि तरणा होरु नही थाउ ॥
जे को डूबै फिरि होवै सार ॥
नानक साचा सरब दातार ॥४॥३॥५॥
श्री
गुरु नानक जी जैसे -२ शब्द का उच्चारण करते कौड़ी का कौड़ ख़त्म होता जाता उसे आराम मिलता| कौड़ी ने विनती
की महाराज मेरा ये रोग ख़त्म करो| श्री गुरु नानक जी ने मर्दाना से जल मंगवाया और
उस जल को कौड़ी के ऊपर डालकर कहा कि जप सतनाम श्री वाहेगुरु जैसे ही कौड़ी ने नाम
जपा उसका कौड़ दूर हो गया| वह श्री गुरु नानक देव जी के चरणों में गिर गया| श्री गुरु
नानक जी ने कौड़ी को कहा कि और कुछ मांग| तब उस कौड़ी ने विनय की महाराज अगर संसार
में सुख होता तो पहले मेरे पास सब कुछ था दौलत, रिश्ते नाते, सगे सम्बन्धी, मित्र
लेकिन किसी ने साथ न निभाया और सुख न मिला| उन वस्तुओ में सुख नहीं है सुख तो आपके
नाम में है मुझे यही आशीर्वाद दो कि आपका नाम जपता रहूँ| नाम ही सच्चा सुख देने
वाला है|
****
दुनीचंद
को उपदेश
एक
बार गुरु नानक देव जी भ्रमण करते हुए किसी कस्बे में पहुंचे | वहां सेठ दुनी चन्द
नाम का एक धनि व्यक्ति रहता| जो उस जमाने में सात लाख रुपये का स्वामी था| यह पाँच
सौ साल पुरानी बात है उस समय इतना धन किसी के पास न होता था| जिस दिन गुरु नानक जी
उस कस्बे में पहुंचे तो दुनीचंद अपने पिता का श्राद्ध कर रहा था| श्री गुरु नानक
जी के आने का सुनकर वह उन्हें अपने घर ले आया तब गुरु नानक जी ने उससे पूछा कि आज
तुम्हारे घर क्या है? तब दुनीचंद ने विनय की महाराज आज मेरे पिता का श्राद्ध है| उनके निमित मैंने आज सौ
ब्राह्मणों को भोजन करवाया है| तब श्री गुरु नानक देव जी ने फरमाया कि दुनीचंद
तुम्हारे पिता जी को आज तीन दिन से कुछ खाने को नहीं मिला है तब दुनीचंद ने गुरु
नानक देव जी से पूछा कि वे कहाँ पर है? तब गुरु नानक देव जी ने बताया कि यहाँ से
पचास कोस की दूरी पर एक शेर की योनि में तुम्हारे पिता जी मिलेंगे| तुम प्रसाद
लेकर जाओ वे तुम्हे पहचान लेंगे| दुनीचंद वहां पर पंहुचा तब वह अपने पिता से मिला|
उसने अपने पिता से पूछा कि पिता जी आपकी ये हालत कैसे हुई? तब उसके पिता जी ने
बताया कि मैंने जीवन में कभी संत महापुरुषों की सेवा नहीं की कोई अच्छा काम नहीं
किया| अंत समय मेरा ध्यान मॉस खाने मे लगा था| इसी कारण मुझे ऐसी योनि मिली| तुम
भाग्यशाली हो क्योंकि पूर्ण महापुरुषों ने तुम्हारे घर कृपा की है| उनकी शरण ग्रहण
करो और नाम की कमाई कर अपना जन्म सुधार लो|”
दुनीचंद के पिता को अब विवेक हो गया था| अत: सत्पुरुषो की कृपा से उसकी मुक्ति हो
गई| दुनीचंद घर वापिस आया और श्री गुरु नानक देव जी के चरणों में समस्त वृतांत
सुनाया, फिर हाथ जोड़कर विनय की- “सच्चे
पाद्शाह! मेरे पास सात लाख रुपये है| जिनमे हर समय मेरा मन लगा रहता है| आप कोई
तरीका बताये कि जिससे यह माया परलोक में मेरे साथ जा सके| अत: गुरु नानक देव जी ने
दुनीचंद जी को एक सुई दी और फरमाया कि “तुम
यह सुई संभाल कर रख लो| परलोक में वापिस ले लेंगे| दुनीचंद ने सारी बात घर आकर
अपनी पत्नी को बताई और उसे सुई संभालने के लिए दे दी|
अपने
पति की बात को सुनकर वह बोली- “आप
क्या कह रहे है? संसार की कोई भी वस्तु यहाँ तक की मनुष्य की देह भी, जबकि जीव के
साथ नहीं जाती, तो फिर आप यह सुई कैसे साथ ले जायेंगे? यह सुई उन्हें वापिस दे
दीजिये| मालूम होता है यह सुई उन्होंने केवल आपकी आँखे खोलने के लिए आपको दी है|
ताकि आपको इस बात का ज्ञान हो जाए कि यहाँ से जाते समय एक सुई भी साथ नहीं जाती|
वे अवश्य ही पूर्ण महापुरुष है और हमारे कल्याण के लिए ही हमारे घर में पधारे है|
इसलिए मेरी मानिये तो उनकी शरण ग्रहण कर जीवन का उद्धार कीजिए| तत्पश्चात दोनों श्री गुरु नानक जी कि शरण में गए| और
उनके सच्चे नाम कि बख्शीश प्राप्त की और अपना लोक परलोक संवार गए|
****
डाकुओं
को ज्ञान
कहते है जब
गुरुनानक देव जी संसार को तारने के लिए निकले तो चलते-2 वह जंगलो में पहुँच गए| वही
कुछ डाकुओ ने उन्हें पकड़ लिया और गुरुनानक जी से कहने लगे कि जो कुछ भी तुम्हारे
पास है हमे दे दो नहीं तो तुम्हे जिन्दा जला दिया जाएगा| गुरुनानक जी ने फरमाया कि
जला दो| तब डाकुओ को गुस्सा आ गया और वे गुरुनानक जी को जलाने के लिए आग खोजने लगे
लेकिन आग न मिली| तब श्री गुरुनानक जी ने ऊँगली से इशारा किया और फ़रमाया कि आप उस
तरफ जाओ आपको आग मिलेगी| जब उनमे से कुछ लोग वहां गए तो वहां पर चिता जल रही थी| वो
लोग देखकर हैरान हो गए कि यहाँ तो सही में आग है| तभी उन्होंने क्या देखा कि ऊपर
से कुछ लोग आये और उस चिता में से निकली आत्मा को लेकर जा रहे थे और उसे मार रहे
थे| कह रहे थे कि तूने संसार में रहकर बड़े ही गलत काम किये है अब नरक में चल| तभी
ऊपर से एक सुन्दर विमान उतरा अब वही दूत जो आत्मा को मार रहे थे, उस आत्मा को बड़े
प्यार से उस विमान में बैठाने लगे और उसे कह रहे थे कि तेरे को स्वर्ग में चलना है
जब दूर खड़े डाकू ये नज़ारा देख रहे थे| तो मन में प्रश्न उठा कि अभी तो इस आत्मा को
मार रहे थे और अब इसे सम्मान से विमान में बैठा रहे है| तो उन डाकुओ ने उन दूतो से
पूछा तो दूतो ने कहा कि इसके कर्म बड़े ख़राब है लेकिन जब गुरुनानक देव जी जोकि पूर्ण
महापुरुष है इसकी तरफ ऊँगली की तो इसके पाप ख़त्म हो गए अब इसे स्वर्ग ले जा रहे है|
तब उन डाकुओ के मन में पश्चाताप हुआ कि जिसे हम जलाने के लिए आग खोज रहे है वो तो
पूर्ण महापुरुष है| उन्होंने जाकर माफ़ी मांगी और उनके शिष्य बन गए|
****
पण्डित
जी द्वारा सूर्य को जल चढ़ाना
कहते है एक समय का
वृतांत है एक पंडित जी किसी स्थान पर खड़े होकर सूर्य देवता को जल चढ़ा रहे थे| तो
नानक जी ने पंडित जी से पूछा कि आप क्या कर रहे है? तो पंडित जी ने बताया कि मैं
सूर्य को जल चढ़ा रहा हूँ| तब गुरुनानक देव जी उस पंडित को जान गए कि यह पंडित बाहर
से तो सारे पाठ-पूजा के कर्म करता है पर आंतरिक प्रेम नहीं है| सब दिखावे के तौर
पर करता है| तब गुरुनानक देव जी ने क्या किया| एक लौटा लिया पानी का और उसको सूर्य
की दूसरी दिशा अर्थात जहाँ से सूर्य निकलता है उसकी विपरीत जगह पर पानी डालने लगे
तब पंडित जी ने पूछा कि आप यह क्या कर रहे हो? सूर्य तो इधर है आप विपरीत दिशा में
पानी डाल रहे हो| तो गुरुनानक देव जी ने फ़रमाया कि पंजाब में अपने खेतो में पानी
डाल रहा हूँ| तो पंडित जी ने कहा कि पंजाब तो यहाँ से काफी दूर है वहां आपका पानी
कैसे जा सकता है? तब गुरुनानक देव जी ने उत्तर दिया कि जिस तरह मेरे खेतो में पानी
नहीं जा सकता क्योंकि वह काफी दूर है, उसी तरह सूर्य तो हमसे बहुत दूर है फिर वहां
पानी कैसे जा सकता है| तब पंडित जी को बड़ी शर्मिन्दगी महसूस हुई| उसने गुरुनानक जी
के चरणों में माफ़ी मांगी| और उनसे सत्संग ग्रहण किया| तब गुरुनानक देव जी ने यही
शिक्षा दी इंसान का प्रेम भगवान से अटूट होना चाहिए उसमे दिखावा न हो|
****
सांचा साहिब सांचा
नाम
एक बार गुरु नानक
देव जी एक सिद्ध मण्डली में पंहुचे तो वहां उन सिद्धो ने गुरुनानक देव जी से पूछा
कि मालिक कैसा है? तो गुरु नानक देव जी ने फरमाया कि ‘साचा साहिब साचा नाम’ मतलब
की मालिक का नाम और मालिक ही सच्चा है| तब फिर उन सिद्धो ने पुछा कि जब उस मालिक
के पास जाए तो हम क्या लेकर जाए?
अगर हम उसकी दी हुई वस्तु ही उसे अर्पित करे तो वो उसी की ही है| तब गुरुनानक देव
जी ने फरमाया कि मालिक को सिफत बहुत पसंद है
| जो कोई उसकी सिफत करता है तो मालिक की
नजर उस सिफत करने वाले की तरफ हो जाती है| सिफत ही ऐसी चीज है जो सही मायनो में
भगवान को अर्पित की जा सकती है|
****
असल उम्र
एक बार की बात है
गुरुनानक देव जी अपने भक्तो के साथ कहीं जा रहे थे तो रास्ते में कब्रिस्तान आया| वहां
हर मृतक शरीर के आगे उनकी उम्र लिखी थी| किसी की 5 साल, किसी की 10 साल, किसी की
15 साल, किसी की 20 साल तो भक्तो ने यह देखा तो बड़े हैरान हुए कि इतनी उम्र तो
सबकी नहीं हो सकती इंसान कम से कम 70, 80 साल तक जीता है, पर यहाँ तो अधिकतम 20
साल लिखा है| तो उन भक्तो ने श्री गुरुनानक देव जी से पूछा तब गुरुनानक जी ने
फ़रमाया कि जिस व्यक्ति ने जितने साल मालिक की भक्ति की है वही उम्र उस व्यक्ति की
असली उम्र है| भगवान की नज़र में वह व्यक्ति उतने साल ही ढंग से जीया है|
****
वली कंधारी का अहंकार तोड़ना (पंजा साहिब)
गुरु नानक देव जी होती मरदान और नौशहरे से होते हुए हसन अब्दाल
से बाहर पहाड़ी के नीचे आकर बैठ गए| उस
पहाड़ी पर एक वलि कंधारी रहता था जिसे अपनी करामातो पर बहुत अहंकार था| इसके
साथ की पहाड़ी पर ही पानी का एक चश्मा निकलता था| गुरु
नानक देव जी ने उसका अहंकार तोड़ने के लिए मरदाने को उस पहाड़ी पर चश्मे का पानी
लाने के लिए भेजा| पर वलि कंधारी ने वहाँ से पानी लाने को मना कर दिया| उसने
कंधारी के आगे बहुत मिन्नतें की पर वलि ने कहा अगर तेरा पीर शक्तिशाली है तो वह
नया चश्मा निकालकर तुम्हे पानी दे|
जब यह बातें मरदाने ने आकर गुरु नानक देव जी को बताई तो गुरु नानक देव जी ने
मरदाने से कहा कि सतनाम कहकर एक पत्थर उठाकर दूसरी तरफ रख दो, करतार
के हुकुम से पानी का चश्मा चल पड़ेगा| जब
पत्थर के नीचे से पानी का चश्मा निकला तो इसके चलने से ही पहाड़ी पर वलि कंधारी का
चश्मा बंद हो गया| जब वलि कंधारी ने यह देखा कि उसका चश्मा बंद हो गया है और नीचे
की पहाड़ी का चश्मा चल रहा है तो उसने क्रोध में आकर अपनी पूरी शक्ति के साथ
पहाड़ी की एक चट्टान को गुरु नानक देव जी की तरफ फैंक दिया| पर
गुरु नानक देव जी ने उसे अपने हाथ के पंजे से रोक दिया| गुरु
नानक देव जी की यह दोनो शक्तियाँ, पहले
पानी का चश्मा नीचे लेके आना और दूसरा पहाड़ को पंजे से रोकना, से
वलि कंधारी का अहंकार टूट गया और गुरु नानक देव जी से अपने अपमान भरे शब्दों के
कारण माफ़ी मांगने लगा| गुरु नानक देव जी के हाथ से लगा हुआ पंजे वाला पत्थर अभी तक गुरुद्वारा पंजा
साहिब हसन अब्दाल में दर्शन दे रहा है| हजारों संगते श्रद्धा के साथ इसके दर्शन
करके गुरु नानक देव जी की महिमा गाते हुए देखी गयी हैं|
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गुरुमुख
और मनमुख में फर्क
जब
जी गुरु नानक देव जी ने जब पंजे से उस पत्थर को थाम लिया और उसमे से सारा बावली का
पानी खीच लिया| उस समय वलि कंधारी समझ गया कि यह कोई छोटी हस्ती नहीं है| वह आकर
उनके चरणों में गिर गया और गुरु नानक जी से प्रशन किया की गुरुमुख कौन है और मनमुख
कौन है? इसकी व्याख्या आप मुझे बताये, वैसे तो सभी जानते है की गुरुमुख वो है
जिसकी अपनी मति न चले, अपनी बुद्धि का इस्तेमाल न करे गुरु की मति के अनुसार चले
वह गुरुमुख| जिसके मिलने से गुरु की याद आये वह है गुरुमुख| तो उस समय गुरु नानक
देव जी ने कहा कि वलि कंधारी आपका एक नियम
है आप रोज मक्का में नमाज अदा करने जाते हो| आप पहले वहां नमाज अदा करके आए| तो वह
आकाश मार्ग से गया| उसने देखा कि समुन्द्र में एक जगह बारिश हो रही है| उसने अपने
मन में सोचा कि बारिश का इस जगह क्या काम? यहाँ तो अथाह जल है| मन में आया की यहाँ
बारिश नहीं होनी चाहिए| वहां बारिश रुकवा दी| एक जगह उसने देखा कि जहाज डूब रहा है,
उसने प्रभु के चरणों में प्रार्थना की कि यह जहाज न डूबे तो वह जहाज नहीं डूबा| अब
वह मक्का मदीना आए| वहाँ आकर नमाज अदा की|
इनके साथ मुहमम्द के चार यार थे| सबने मिलकर नमाज अदा की| नमाज के पश्चात् सबके
लिए खाना आया जन्नत से लेकिन वलि कंधारी के लिए नहीं आया, तो वहाँ उसको जवाब मिला कि
वलि कंधारी बात यह कि तुमने ईश्वरीय रजा में अपनी मर्जी की है| तुमने कहा कि
समुन्द्र में अथाह जल हैं| वहाँ बारिश का क्या काम?
लेकिन
समुन्द्र में कुछ ऐसे जीव है जो समुन्द्र में रहकर भी समुन्द्र के जल को ग्रहण
नहीं करते, इसलिए उनको उस पानी की जरुरत है| पपीहा स्वाति नक्षत्र की बूंद के अलावा
और कोई जल ग्रहण नहीं करता| जब स्वाति नक्षत्र में वर्षा की बूंद होगी उसको वह
ग्रहण करेगा| उससे उसका जीवन है तो कुदरत ने उसका भी ख्याल करना है| वहाँ पर वर्षा
होनी जरुरी है, तुमने सोचा कि जहाज डूब रहा है तो उसे रोक दिया| वह जहाज तो डूबना
ही था| छोटे मोटे तूफ़ान तो समुन्द्र में आते ही रहते है| तो तुमने दुआ की इसलिए वह
जहाज नहीं डूबा| यही गुरुमुख और मनमुख में फर्क है| गुरुमुख उस मालिक की मौज में
राजी रहता है|
है
रजा – ए –यार अपनी जिन्दगी|
उनकी
मर्जी अपनी किस्मत हो गई||
अब
मालिक जिनको कह दिया और फिर उसके आगे ख्याल पेश करने यह तो मनमती है| यह मनमुखता
है| जब वह वापिस गुरु नानक देव जी के चरणों में पंहुचा तो उनके चरणों में गिर गया|
उसने कहा कि मालिक मुझे क्षमा करो| मैंने ईश्वरीय रजा में दखल दिया था, मुझे इसका
जवाब मिल गया|
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एक
बार श्री गुरु नानक देव जी ने भाई बाला को दो टके दिए और फरमाया कि जाकर एक टके का
सच और एक टके का झूठ ले कर आ| भाई बाला बाजार में जब जाकर एक टके का सच और एक टके
का झूठ लेने के लिए दुकानों पर गया तो सबने मना कर दिया कि हमारे यहाँ पर सच और
झूठ नहीं मिलता| तब उन्हें एक भक्त नजर आया जोकि पाठ पड़ रहा था| बाला उनके पास गया
तब उस भक्त ने कहा कि मैं बताता हूँ कि सच क्या है और झूठ क्या है| उन्होंने एक
कागज पर लिखा मरना सच है और दुसरे कागज पर लिखा कि जीना झूठ है| फिर दोनों कागज
बाला को देते हुए कहा कि ये लो एक टके का सच और एक टके का झूठ| तब बाला जब गुरु
नानक देव जी के पास वापिस आया तो उसने बताया कि मैं एक टके का सच और एक टके का झूठ
ले आया हूँ| तब गुरु नानक देव जी ने कागज खोला और फरमाया कि यह सही लिखा है मरना
जो है वो सच है और जीना झूठ है|
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तीर्थों
पर क्यूँ नहीं जाते
एक
बार भाई बाले और मरदाने ने श्री गुरु नानक देव जी से पूछा कि लोग जो है तीर्थो पर
जाते है स्नान करने, दर्शन करने लेकिन आप हमे नहीं ले कर जाते है हमारा भी मन करता
है तीर्थो पैर जाने का, तब श्री गुरु नानक देव जी ने फरमाया कि आप सब ये काम पहले
करके की हमारे पास आये हो, अब आप को इसकि आवश्यकता नहीं है| अर्थात सतगुरु के
चरणों में जीव तभी पहुँचता है जब वह सभी देवी देवताओं की पूजा कर लेता है|
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मुट्ठी में क्या है
एक बार की बात है
श्री गुरुनानक देव जी के आगे किसी ने एक टका मत्था टेका तो श्री गुरुनानक जी ने
टके को अपनी मुट्ठी में बंद करके वँहा बैठी संगत में सब से पूछा कि बताओ हमारी मुट्ठी
में क्या है? तब सबने अपनी अपनी समझ के हिसाब से उत्तर दिया किसी ने कहा कि स्वामी
जी आपके हाथ में टका, किसी ने कहा आपके हाथ में दान है, तो किसी ने कुछ और जवाब
दिया| तब श्री गुरुमहाराज जी ने भाई लहणा
जी से पूछा कि आप बताओ हमारी मुट्ठी में क्या है? तो भाई लहणा जी ने कहा -स्वामी
जी आपकी मुट्ठी में चारो लोको का धन है जिसपे मौज आए आप उसे दे देते हो|
महापुरुषों के पास तो सब कुछ ही होता है लेकिन इसकी समझ किसी -2 को होती है|
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गुरु
के दर्शनों से लाभ
एक
बार एक प्रेमी ने श्री गुरु महाराज जी के चरणों में विनय की कि संतों के दर्शन का
क्या लाभ है| तब श्री गुरु महाराज जी ईशारा करके फरमाते है कि आप इस रास्ते पर
जाओं आप को एक कौवा मिलेगा वह आपको जवाब देगा|
जब वह व्यक्ति वहाँ गया तो वहाँ उसे एक कौवा मिलता है जैसे ही वह प्रेमी प्रश्न
पूछता है तो वह कौवा उसी समय प्राण त्याग देता है वह प्रेमी वापिस श्री चरणों में
आकर प्राथना करता है तो श्री गुरु महाराज जी उसे ईशारा करके कहते है आप इस तरफ
जाओं वहाँ एक गाय ने बछड़ा दिया है वह आपको जवाब जरुर देगा जब वह प्रेमी दोबारा उस
तरफ जाता है उस गाय के बछड़े से जब वह
प्रश्न करता है तब वह बछड़ा उसी समय मर जाता है वह व्यक्ति बड़ा हैरान होता है मैं
जिससे से भी प्रश्न पूछता हूँ वह मर जाता है ऐसा क्यों हो रहा है वह दुबारा श्री
चरणों में जात है तब श्री गुरु महाराज जी उसे ईशारा कहते हुए कहते है कि अब आप इस
दिशा में जाओं एक इन्सान के बच्चे ने अभी -2 जन्म लिया हिया वह आपकों आपके प्रश्न
का उत्तर जरुर देगा| अब वे व्यक्ति घबरा गया कि कही मैं उस बच्चे से भी प्रशन
पूछूँ और वह बच्चा ना मर जाए| तब श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया कि घबराने की
जरुरत नहीं वह बच्चा आपको आपके प्रश्न का उत्तर जरुर देगा| जब वह व्यक्ति उस बच्चे
के पास पहुंचा तो उस बच्चे से प्रश्न पूछा तब उस बच्चे ने जवाब दिया कि आप जब मुझे
पहली बार मिले तो मैं कौवे की योनी में था| आप संतों के दर्शन करके मेरे पास आये
उसी के प्रताप से मुझे कौवे की योनी से मुक्ति मिली| अगली बार आप जब आये तो मुझे
बछड़े की योनी से मुक्ति मिली और सन्तों के दर्शन जो आप करके मेरे पास आये उसी के
प्रताप से मुझे अब मानुष का चोला मिला| वह व्यक्ति अब समझ गया कि सही में संतों के
दर्शनों का बहुत बड़ा लाभ है|
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भाई
मर्दाने को शिक्षा
श्री गुरु नानक देव जी अकाल पुरुष का सन्देश देते हुए आसाम में
जा पहुँचे। वहां एक नगर में बड़े ऊंचे और सुन्दर भवन दिखाई दे रहे थे। वहां के सभी
नागरिक ठाट-बाट से घूम रहे थे। उन्हें देखकर मर्दाने का मन चंचल हो उठा। उसने श्री
गुरु महाराज जी के चरणों में विनय की कि इस नगर के लोग बड़े सुखी प्रतीत होते हैं।
श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया-
बड़े बड़े जो दीसन लोग। तिन को व्यापै चिन्ता रोग।।
श्री गुरुनानक देव जी के भी वही वचन हैं जो ऊपर श्री गुरु
महाराज जी ने फरमाये हैं। कथन किया कि "मर्दाना! उनके अन्दर चिन्ता का रोग
लगा हुआ है जो उन्हें दिन रात खाये जा रहा है। तू इनकी बाहरी शान-शौकत को देखकर भूल मत जा'-किन्तु मर्दाना की तीव्र इच्छा थी कि मैं इस नगर के
बाज़ारों में चक्कर लगा आऊँ पुनः प्रार्थना की "भगवन्! मैं देर नहीं
लगाऊंगा-शीघ्रातिशीघ्र ही वापिस आ जाऊंगा, मुझे आज्ञा दीजिए।'' श्री गुरु महाराज जी ने सोचा कि यह इशारे को तो
समझता ही नहीं है-इसलिये कह दिया कि जैसे तुम्हारा विचार हो। इस वचन को आज्ञा
समझकर मर्दाना नगर में गया-जाने की देर थी-अभी पहली ही गली में पाँव रखा था कि एक
जादूगर ने जादू का धागा उसके गले में डाला और उसे भेड़ बनाकर एक खूँटे से बाँध
दिया। मर्दाना मन ही मन में बड़ा पछताने लगा और अन्दर ही अन्दर श्री गुरु महाराज जी
के चरणों में विनय करने लगा और अपनी भूल के लिये लगा क्षमा याचना करने। श्री गुरु महाराज जी अन्तर्यामी थे। उसकी पुकार को
सुना और अपना विरुद जानकर वहां पहुँचे। मर्दाना ने उन्हें दूर से देखते ही अपनी
भाषा में रोना और चिल्लाना शुरु कर दिया। श्री गुरु महाराज जी जैसे उसके निकट गये
वह उनके श्री चरणों में लिपट गया। श्री गुरु महाराज जी ने दया करके उसके गले से
धागा खोल कर उसे वास्तविक रुप दे दिया।
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ज्योति जोत समाना
गुरु गद्दी की सारी बातचीत भाई बुड्डा जी आदि निकटवर्ती सिक्खों
को समझाकर गुरु नानक देव जी ने बैकुंठ जाने की तैयारी कर ली| ऐसा
सुनकर दूर-दूर से सिक्ख आपके अन्तिम दर्शन करने ले लिए आ गए| गुरु
नानक देव जी अपनी धर्मशाला में बैठे थे और कीर्तन हो रहा था| इस
समय माता सुलखनी जी भी श्री गुरु नानक देव जी के पास आ बैठी| गुरु
नानक देव जी ने दोनों साहिबजादों को भी बुलाया| पर
वे थोड़ा समय बैठकर वहाँ से चल दिए|
22 सितम्बर, 1539
ई. को संगत के सामने गुरु नानक देव जी चादर तानकर लेट गए और संगत को धैर्य देते
हुए कहने लगे-आप सभी सतनाम का जाप करो| जाप
कर रही संगत ने जब कुछ समय बाद देखा तब गुरु नानक देव जी अपना शरीर छोडकर बैकुंठ
में जा चुके थे| आपका अन्तिम संस्कार करने के लिए हिन्दू कहे कि यह हमारे गुरु
है हमने संस्कार करना है|
मुस्लमान कहे कि
हमारे पीर है हमने दफ़न करना है| इस
प्रकार झगडा करते जब दोनों धर्मों के लोगों ने चादर उठाकर देखा तो आपका शरीर अलोप
था| केवल चादर ही वहाँ रह गई| इस
चादर को लेकर आधा हिन्दुओं ने संस्कार कर दिया और आधा मुसलमानों ने कबर में दफ़न
कर दिया|
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