Tuesday, May 12, 2020

श्री रामायण जी कथा -I

गुरु आज्ञा

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम अपने शिक्षा गुरु विश्वामित्र के पास बहुत संयम, विनय और विवेक से रहते थे। गुरु की सेवा में सदैव तत्पर रहते थे। उनकी सेवा के विषय में भक्त कवि तुलसीदास ने लिखा है-

मुनिवर सयन कीन्हीं तब जाई।

लागे चरन चापन दोऊ भाई॥

जिनके चरन सरोरुह लागी।

करत विविध जप जोग विरागी॥

बार बार मुनि आज्ञा दीन्हीं।

रघुवर जाय सयन तब कीन्हीं॥

गुरु ते पहले जगपति जागे राम सुजान।

सीता-स्वयंवर में जब सब राजा धनुष उठाने का एक-एक करके प्रयत्न कर रहे थे तब श्री राम संयम से बैठे ही रहे। जब गुरु विश्वामित्र की आज्ञा हुई तभी वे खड़े हुए और उन्हें प्रणाम करके धनुष उठाया।

सुनि गुरु बचन चरन सिर नावा। हर्ष विषादु न कछु उर आवा।

गुरुहिं प्रनाम मन हि मन किन्हा। अति लाघव उठाइ धनु लिन्हा॥

श्री सद्गुरुदेव के आदर और सत्कार में श्री राम जी कितने विवेकी और सचेत थे, इसका उदाहरण जब उनको राज्योचित शिक्षण देने के लिए उनके गुरु वशिष्ठ जी महाराज महल में आते हैं तब देखने को मिलता है। सद्गुरु के आगमन का समाचार मिलते ही सीता जी सहित श्री राम जी दरवाजे पर आकर सम्मान करते हैं-

गुरु आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार जाय पद नावउ माथा॥

सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भांति पूजि सनमाने॥

गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले राम कमल कर जोरी॥

इसके उपरांत भक्ति भावपूर्वक कहते हैं- 'नाथ! आप भले पधारे। आपके आगमन से घर पवित्र हुआ। परन्तु होना तो यह चाहिए था कि आप समाचार भेज देते तो यह दास स्वयं सेवा में उपस्थित हो जाता।' इस प्रकार ऐसी विनम्र भक्ति से श्री राम जी अपने गुरुदेव को संतुष्ट रखते हैं।

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भाईयों का परिचय पूछा (सेवक धर्म)

श्री राम चरित मानस मे वचन आता है कि एक बार श्री राम जी ने अपने भाईयों से पूछा कि अपना परिचय दो तो पहले शत्रुघ्न ने कहा कि मैं श्री राम जी का भाई हूँ फिर लक्ष्मण ने कहा कि मैं भी श्री राम जी का भाई हूँ, जब भरत जी से पूछा तो उन्होंने कहा कि मैं श्री राम जी का दास हूँ तब श्री राम जी बहुत प्रसन्न हुए| भगवान ने वचन किये कि संसार में जितने भी रिश्ते नाते है, सबसे बड़ा नाता प्रभु और दास, स्वामी और सेवक का है जो इस लोक में भी अटूट है और परलोक में भी अटूट है|

जिस समय प्रभु श्री राम जी से मिलने भरत जी चित्रकूट जा रहे थे, सभी किसी न किसी सवारी पर सवार थे| लेकिन भरत जी नंगे पाँव चल रहे थे, सबने अनुरोध किया कि आप रथ पर सवार हो जाये तो उस समय भरत जी ने कहा-

सिर भर जाउँ उचित अस मोरा, सब ते सेवक धरमु कठोरा ||

मेरा ये फर्ज है कि जिस मार्ग से प्रभु श्री राम जी नंगे पाँव गए हैं, जहाँ मेरे स्वामी के चरण लगे हैं वहाँ मेरा सिर लगना चाहिए| सेवक धर्म बड़ा ही कठिन है| हम अपने आपको सेवक कहते हैं| लेकिन सेवक बनना बड़ा ही कठिन है|

देखि भरत गति सुनि मृदु बाणी, सब सेवकजन गारहिं गलानी||

भरत जी की प्रेमपूर्वक वाणी सुनकर सब सेवक अपनी त्रूटियों के कारण लज्जित हो गए और भरत जी के प्रेम की सराहना करने लगे| ऐसा कथन है कि इस प्रकार पैदल चलने से भरत जी के कोमल चरणों में इतने छाले पड़ गए कि जब वे प्रयाग पहुँचे तो सेवकों ने विश्राम करते समय भरत जी के तलवों पर हुए उन छालों को देखा जो चमक रहे थे|

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बनवास का समय

प्रभु श्री रामचंद्र जी को अयोध्या से जाते हुए और अयोध्या को अनाथ होते हुए देखकर सब लोग व्याकुल होकर उनके साथ हो लिए| कृपा सागर प्रभु राम उन्हें अनेक प्रकार से समझाते हैं तो ये अयोध्या की ओर लौट जाते हैं, परन्तु प्रेमवश पुनः लौट आते हैं| उन्हें अपने घर बहुत ही भयानक प्रतीत होते हैं| मनुष्यों की तो बात ही क्या यहाँ तक कि पशु पक्षी भी श्री राम जी के वियोग में व्याकुल हुए जहाँ-तहां ऐसे चुपचाप स्थिर होकर खड़े हैं, मानो तस्वीरों में चित्रित किये गए हो| प्रभु राम की विरहाग्नि को लोग सह न सके| उन्होंने निश्चय कर लिया कि जहाँ श्री राम जी रहेंगे, वहाँ सारा समाज रहेगा| ऐसा विचार दृढ़ करके ये सुखों से पूर्ण अपने घरों को छोड़कर प्रभु राम जी के साथ चल पड़े| पहले दिन श्री रघुनाथ जी ने तमसा नदी के तट पर निवास किया| प्रजा को प्रेमवश देखकर उनके दयालु ह्रदय में बड़ा दुःख हुआ| उन्होंने प्रेमयुक्त कोमल और सुन्दर वचन कहकर लोगों को समझाया| और भी उपदेश दिए, परन्तु प्रेमवश लोग नहीं लौटें| जब सब लोग शोक और थकावट के मारे सो गए| जब दो पहर रात बीत गई तब प्रभु ने सारथी को उठाकर रथ चलाने की आज्ञा दी| प्रातः होते ही सब लोग जागे तो बड़ा शोर मचा कि श्री रघुनाथ जी चले गए| कहीं रथ की खोज नहीं पाते, ‘हे राम! हे राम!’ पुकारते हुए चारों और दौड़ रहे हैं मानों सागर में जहाज डूब गया हो जिससे व्यापारियों का समुदाय व्याकुल हो उठा हो| वे एक दूसरे को दोष देते हैं कि श्री राम जी को हम लोगों से कलेश होगा, यह जानकार छोड़ दिया| वे लोग अपनी निंदा करते हैं और यह भी कहते है कि–‘ श्री राम जी के बिना हमारा जीना धिक्कार है| इस प्रकार विलाप करते हुए वे संताप से भरे हुए अयोध्या जी में आये| उन लोगों के विषम वियोग की दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता| सब स्त्री पुरुष श्री राम जी के दर्शन के लिए नियम और व्रत करने लगे|

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धरती माँ से विनय

श्री राम जी, लक्ष्मण एवं माता सीता चित्रकूट पर्वत की ओर जा रहे थे, राह बहुत पथरीली और कंटीली थी| यकायक श्री राम के चरणों मे कांटा चुभ गया. श्री राम रुष्ट या क्रोधित नहीं हुए, बल्कि हाथ जोड़कर धरती माता से अनुरोध करने लगे| वे बोले माँ, मेरी एक विनम्र प्रार्थना है आपसे, क्या आप स्वीकार करेंगी? धरती माँ बोली प्रभु प्रार्थना नहीं, आज्ञा दें| प्रभु बोले, माँ, मेरी बस यही विनती है कि जब भरत मेरी खोज मे इस पथ से गुज़रे, तो आप नरम हो जाना| कुछ पल के लिए अपने आँचल के ये पत्थर और कांटे छुपा लेना| मुझे कांटा चुभा सो चुभा, पर मेरे भरत के पाँव मे आघात मत करना| श्री राम को यूँ व्यग्र देखकर धरती माता दंग रह गई! पूछा! भगवन्, धृष्टता क्षमा हो, पर क्या भरत आपसे अधिक सुकुमार है?  जब आप इतनी सहजता से सब सहन कर गए, तो क्या कुमार भरत सहन नही कर पाँएगें?  फिर उनको लेकर आपके चित मे ऐसी व्याकुलता क्यों?”

श्री राम बोले- नहीं-नहीं माते, आप मेरे कहने का अभिप्राय नही समझीं| यदि भरत को कांटा चुभा, तो वह उसके पाँव को नही, उसके हृदय को विदीर्ण कर देगा| हृदय विदीर्ण ऐसा क्यों प्रभुधरती माँ जिज्ञासा भरे स्वर में बोलीं! प्रभु श्री राम जी ने फरमाया कि “अपनी पीड़ा से नहीं माँ, बल्कि यह सोचकर कि इसी कंटीली राह से मेरे भैया राम गुज़रे होंगे और ये शूल उनके पैरों मे भी चुभे होंगे ! मैया, मेरा भरत कल्पना मे भी मेरी पीड़ा सहन नहीं कर सकता, इसलिए उसकी उपस्थिति मे आप कमल पंखुड़ियों सी कोमल बन जाना.

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भरत का प्रेम

भरत जी की भगवान के चरणों में इस प्रकार गहरी श्रद्धा, भक्ति देख कर स्वर्ग के राजा इंद्र को चिंता हुई क्योंकि यह जगत भले मानुष को भला और नीच को नीच दिखाई देता है| इंद्र ने सोचा यदि भगवान भरत जी का इस प्रकार प्रेम देखेंगे तो अवश्य ही अयोध्या को लौट जायेंगे| और अगर भगवान वापस अयोध्या को लौट गए तो हमारा कारज वहीं का वहीं रह जायेगा| यह सोचकर इंद्र ब्रहस्पति जी से प्रार्थना करने लगे, ‘हे गुरुदेव! कोई उपाय किया जाये जिससे भगवान और भरत का मिलाप ना हो सके| भगवान तो प्रेम के संकोची हैं अर्थात प्रेम के वश हैं और भरत जी प्रेम के समुन्द्र हैं, मालूम ऐसा होता है कि बनी बात बिगड़ना चाहती है| अब कोई छल-कपट का उपाय करना चाहिए जिससे भगवान वापस अयोध्या को न लौट पायें|’ गुरु ब्रहस्पति जी प्रभु भक्ति की महिमा को समझते हैं, इंद्र का स्वार्थ से भरा हुआ वचन सुनकर मन-ही-मन में हँसे और हजार नेत्र वाले इंद्र को बिना नेत्र के यानि अंधा जाना| ब्रहस्पति जी ने कहा, ‘हे इंद्र! दिल से मिथ्या भ्रम को निकाल दो और छल-कपट को छोड़ दो, यहाँ छल-कपट करोगे तो भांडा फूट जायेगा अर्थात छल प्रकट हो जायेगा और हानि होगी| हे स्वर्ग के राजा इंद्र, माया पति भगवान के सेवक से माया का छल कपट करने पर वह माया उसी करने वाले के सिर पर पलट पड़ती है| तब (वनवास के निमित) जो कुछ किया गया वह भगवान की इच्छा जान कर किया गया परन्तु अब कुछ भी करने से हानि होगी|’ इतिहास बताता है जब भगवान श्री राम जी को अयोध्या मे राज्य तिलक करने की तैयारी हो रही थी, तब देवताओं के राजा इंद्र को चिंता हुई कि यदि भगवान राजगद्दी पर बैठ गए तो राक्षसों के नाश का कारज नहीं होगा| ऐसा विचार कर उसने एक चाल चली और सरस्वती को ईशारा दिया| उसने रानी कैकेयी की दासी मंथरा की जुबान द्वारा रानी कैकेयी को प्रेरित किया कि वह इस अवसर पर राजा दशरथ से दो वर माँगे, एक तो राम को चौदह वर्ष का वनवास और दूसरा उसके बेटे भरत को अयोध्या का राजा बनाया जाये| यह चाल सफल हो गई थी और इंद्र का साहस बढ़ गया था| अब यहाँ तो बात दूसरी है| भरत और राम के बीच में  प्रेम भक्ति का सम्बन्ध है, स्वामी और सेवक का पुराना नाता है, इंद्र इस नाते को जानता नहीं, उसकी आँखों पर स्वार्थ की पट्टी बंधी है| वह नहीं देख पा रहा कि भगवान को अपने भक्तों से किस कदर प्यार होता है| इसी कारण उसके जवाब मे ब्रहस्पति जी ने उसे हजार नेत्र रखते हुए भी अंधा कहा और सत्य ही है जिसके पास भक्ति व परमार्थ की आँख नही है वह अंधा ही होता है ब्रहस्पति जी ने कहा, हे इंद्र, वनवास के समय तेरी कपट की चाल चल गई थी तो उसमे भगवान की अपनी मर्जी थी| उस समय जो कुछ किया गया था, उनकी मर्जी से ही हुआ था| परन्तु फिर आगे चलकर ब्रहस्पति जी इंद्र को उपदेश करते है

सुन सुरेश रघुनाथ सुभाऊ 

निज अपराध रिसाहि न काऊ।।

जो अपराध भगत कर करई।

राम रोष पावक सो जरई ||

 ‘हे इंद्र, भगवान का स्वभाव सुनो| वह अपने अपमान से किसी पर कोप नहीं करते अर्थात उनका अपना कोई अपमान कर देता है तो वह परवाह नहीं करते| परन्तु जो उनके भक्त का अपमान करता है वह भगवान के क्रोध की अग्नि में जरुर जलता है| भक्तों और संतो के अपराधी को ईश्वरीय नियम के अधीन अवश्य ही दंड भुगतना पड़ता है, उससे उसे कोई नहीं बचा सकता| हे इंद्र! भरत के समान भगवान का प्यारा कौन है| संसार तो भगवान का नाम जपता है और स्वयं भगवान उनका (भरत जी का) नाम जपते हैं| हे अमरपति(देवराज इंद्र) भगवान के भक्त का अकाज मन में न लाइए अर्थात भक्त के अकाज की मन में चितवन भी न कीजिए, नहीं तो इस लोक में अपयश और परलोक में दुखी होंगे और दिन- प्रतिदिन शोक संताप बढ़ते जायेंगे| आगे फिर कहते हैं

सुन सुरेश उपदेश हमारा |

रामहि सेवक परम प्यारा ||

मानत सुख सेवक सेवकाई |

सेवक वैर, वैर अधिकाई ||

‘हे इंद्र, हमारा उपदेश सुनो|  भगवान को अपना सेवक बहुत ही प्यारा है| उनके सेवक की जो सेवा करता है, उसे सुख मिलता है और जो उनके भक्त के साथ वैर रखते है उन्हें दुःख भोगना पड़ता है|’ ब्रहस्पति जी की सुंदर बाते सुन कर इंद्र को ज्ञान हुआ और मन की ग्लानि मिट गई| तब सुरराज इंद्र भी प्रसन्नता से फूल बरसाकर भरत जी के स्वभाव की बड़ाई करने लगे|

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मेरे उच्च भाग्य है

बनवास में जाते समय एक जगह पर माता सीता जी की नजर एक वृक्ष पर पड़ी| उस वृक्ष की बहुत सुंदर लटाएँ थी| उन लटाओं को देख कर माता सीता ने भगवान श्री राम जी से वचन किए कि प्रभु इस वृक्ष के कितने उच्चे भाग्य है जो लटाएँ इस वृक्ष की शोभा बढ़ा रही है| तब श्री राम जी ने फरमाया कि इस वृक्ष ने उच्चे भाग्य नहीं बल्कि इन लटाओं के उच्चे भाग्य है जो वृक्ष ने इन्हें सहारा दे रखा है तब श्री राम जी ने लक्ष्मण जी को बुलाया और उन्हें फरमाया कि माता सीता का कहना है कि इस वृक्ष के उच्चे भाग्य है जो लटाएं इनकी शोभा बढ़ा रही है और मेरा कहना है कि इन लटाओं के उच्चे भाग्य है जो वृक्ष ने इन्हें सहारा दे रखा है तुम बताओं किसके उच्चे भाग्य है| तब लक्ष्मण जी भगवान श्री राम जी के चरणों में बैठ गए और कहने लगे कि हे प्रभु मैं नहीं जनता कि इस वृक्ष के उच्चे भाग्य है या इन लताओं के उच्चे भाग्य है मैं तो बस इतना जानता हूँ कि मुझे मेरे ये उच्चे भाग्य है जो मुझे आपकी चरण शरण मिली है|
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खेवनहारे केवट को निहाल करना

कहते हैं जब भगवान श्री राम जी, लक्ष्मण जी और माता सीता अयोध्या से वनवास को जा रहे थे तो रास्ते में एक नदी पड़ी| अब श्री राम जी को वह नदी पार करनी थी लेकिन पार करने के लिए कोई साधन नजर ना आये, तभी श्री राम जी की नजर एक खेवनहारे पर पड़ी| तब उन्होंने खेवनहारे से नदी पार चलने के लिए कहा तब खेवनहारा बड़ा ही खुश हुआ वह जान गया कि आप साक्षात् नर रूप में नारायण है| तो उसने प्रभु के श्री चरणों में विनती की, ‘प्रभु मैं आपको नदी के पार ले जाऊंगा| लेकिन पहले आप मुझे अपने व लक्ष्मण जी और माता सीता जी के चरणों को धोने की अनुमति दें|’ तब भगवान ने उसे अनुमति दी| उसके बाद भगवान जी उसकी नाव में बैठे| अब वो खेवनहार बड़े ही आराम -2 से नाव को चला रहा है| ताकि भगवान जी के दर्शन ज्यादा से ज्यादा पा सके| अब रास्ते में भगवान श्री राम जी के मन में उस खेवनहारे की भक्ति देखकर उसे कुछ देने की सूझी| भगवान जी के पास तो कुछ था नहीं तो उन्होंने माता सीता की तरफ देखा तो माता सीता श्री राम प्रभु जी को देख कर समझ गई भगवान उस खेवनहारे को कुछ देना चाहते हैं| तो माता ने अपने बेहद कीमती कुंडल उतार कर भगवान श्री राम जी को दे दिए| अब वो कुंडल लेकर भगवान श्री राम जी मन में संकोच कर रहे है यह कुंडल उस भक्त को देने लायक है कि नहीं| क्योंकि उसकी भक्ति के सामने यह कुंडल भगवान को बड़े तुच्छ लग रहे थे| तब भगवान ने बहुत सकुचाते हुए उसे कहा कि ‘भईया हमारे पास और तो कुछ नहीं है लेकिन ये छोटी सी भेंट है आप इसे रख लो|’ कहते हैं भगवान अगर मिट्टी को भी हाथ लगाये तो वो भी बहुमूल्य बन जाती है फिर वो तो कीमती आभूषण थे| तो कितने दयालु हैं प्रभु जो अपने प्यार करने वालो पर हर वस्तु कुर्बान कर देते है| कहते भी हैं कि-

कोमल चित अति दीन दयाला |

कारण बिनु रघुनाथ कृपाला ||

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भवसागर के माझीं

जब भगवान श्री राम जी केवट की नांव में संवार हुए तो रास्ते में केवट से प्रभु श्री राम जी वार्तालाप करते जा रहे थे| तब केवट ने श्री राम जी कहा कि प्रभु मैं यहाँ पर रोज देखता हूँ कि अनेकों मछवारे आ कर जाल फैलाते है और मछलियाँ उनमें फस जाती है लेकिन जो मछलियाँ मछवारे के चरणों की तरफ  आ जाती है वह जाल में आने से बच जाती है| इसलिए हे प्रभु आज मैं भी आप के चरणों में आ गया हूँ मैं भी माया में कैसे फस सकता हूँ| कहते हैं परमात्मा की कृपा से जिनकों विवेक प्राप्त हो जाता है उन्हें पता होता है कि सही अवसर का फायदा कैसे उठाना है केवट ने भगवान के चरणों में विनय की कि प्रभु

मैं गंगा जी के तट पर

आप भव सागर के तट पर

मैं गंगा जी का मांझी

आप भव सागर के माझीं

उसने विनय  की कि एक मांझी भी किसी दूसरे माझीं  से मजदूरी लेता है मैंने आपको नौका में बिठा कर नदी पार करवाई आप मुझे अपनी नौका में बिठा कर भव से पार लगा देना| इस तरह भगवान ने उस पर अपनी कृपा बरसाई|

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श्री राम जी की हनुमान जी से मुलाकात

हनुमान जी की भेंट राम जी से उनके वनवास के समय तब हुई जब राम जी अपने भ्राता लक्ष्मण के साथ अपनी पत्नी सीता की खोज कर रहे थे। सीता माता को लंकापति रावण छल से हरण करके ले गया था। सीता जी को खोजते हुए दोनो भ्राता ॠषिमुख पर्वत के समीप पँहुच गये जहाँ सुग्रीव अपने अनुयाईयों के साथ अपने ज्येष्ठ भ्राता बाली से छिपकर रहते थे। वानर-राज बाली ने अपने छोटे भ्राता सुग्रीव को एक गम्भीर मिथ्या बोध के चलते अपने साम्राज्य से बाहर निकाल दिया था और वो किसी भी तरह से सुग्रीव के तर्क को सुनने के लिये तैयार नहीं था। साथ ही बाली ने सुग्रीव की पत्नी को भी अपने पास बलपूर्वक रखा हुआ था। राम और लक्ष्मण को आता देख सुग्रीव ने हनुमान को उनका परिचय जानने के लिये भेजा। हनुमान जी एक ब्राह्मण के वेश में उनके समीप गये। हनुमान के मुख़ से प्रथम शब्द सुनते ही श्री राम ने लक्ष्मण से कहा कि कोई भी बिना वेद-पुराण को जाने ऐसा नहीं बोल सकता जैसा इस ब्राह्मण ने बोला। रामजी को उस ब्राह्मण के मुख, नेत्र, माथा, भौंह या अन्य किसी भी शारीरिक संरचना से कुछ भी मिथ्या प्रतीत नहीं हुआ। राम जी ने लक्ष्मण से कहा कि इस ब्राह्मण के मन्त्र मुग्ध उच्चारण को सुनके तो शत्रु भी अस्त्र त्याग देगा। उन्होंने ब्राह्मण की और प्रशंसा करते हुए कहा कि वो नरेश(राजा) निःसंकोच ही सफ़ल होगा जिसके पास ऐसा गुप्तचर होगा। श्री राम जी के मुख़ से इन सब बातों को सुनकर हनुमान जी ने अपना वास्तविक रूप धारण किया और श्री राम जी के चरणों में नतमस्तक हो गये। श्री राम जी ने उन्हें उठाकर अपने ह्र्दय से लगा लिया। उसी दिन एक भक्त और भगवान का हनुमान और प्रभु श्री राम के रूप मे अटूट और अनश्वर मिलन हुआ।

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सुग्रीव और बाली का युद्ध

कहते हैं जब भगवान श्री राम जी सुग्रीव से मिले तो भगवान ने सुग्रीव को बाली से युद्ध करने के लिए कहा| तब सुग्रीव ने श्री राम जी से कहा कि मैं बाली से कैसे युद्ध कर सकता हूँ? वह तो बहुत शक्तिशाली है| तब श्री राम जी ने सुग्रीव को आश्वासन दिया कि वो चिंता न करे| जब वह युद्ध हारने लगेगा, तब हम तुम्हारी रक्षा करेंगे| अब सुग्रीव और बाली का युद्ध शुरू हुआ| बाली तो शक्तिशाली था ही उसने सुग्रीव को खूब मारा| श्री राम जी दूर खड़े यह नजारा देखते रहे| सुग्रीव को विश्वास था कि श्री राम जी उसकी रक्षा करेंगे| लेकिन श्री राम जी ने तीर न चलाया| जब युद्ध समाप्त हुआ तो सुग्रीव का सारा शरीर दर्द कर रहा था| वह बार-2 यही बोल रहा था कि श्री राम जी ने मेरी रक्षा न करके मेरे साथ अच्छा नही किया| जैसे ही श्री राम जी सुग्रीव के पास पहुँचें तो वह उनको देखकर और पीड़ा से चिल्लाने लगा और ताना मारते हुए कहने लगा, ‘वाह! श्री राम जी आपने तो  मेरी खूब रक्षा करी|’ तब श्री राम जी ने सुग्रीव को कहा कि सुग्रीव तूने अपनी बात कह दी हमारी विवशता भी तो सुन| तुम दोनों भाई दिखने में एक जैसे हो कद भी एक जैसा वस्त्र भी एक से डाले थे| मुझे तो ये ही नहीं पता चल रहा था कि सुग्रीव कौन है और बाली कौन है? अगर मैं गलती से तीर तुम पर चला देता तो फिर हमारी मित्रता कैसे निभती|’ जब श्री राम जी ने ये सब वचन सुग्रीव को कहे तो उसकी आँखों में आसूँ आ गए| भगवान के श्री चरणों में गिर पड़ा कहने लगा- ‘हे प्रभु| आपने मुझे बचाने के लिए ऐसा किया लेकिन मैं नहीं समझ पाया मुझे क्षमा करें|’ तब श्री राम जी ने उसको अपने कर कमलो द्वारा उठाया| जैसे ही श्री राम जी ने अपने कर कमल सुग्रीव के कंधे पर रखे उसकी सारी पीड़ा दूर हो गई| स्पर्श मात्र से उसका सारा दर्द दूर हो गया| उसमे नया उत्साह, नया जोश भर आया| तब सुग्रीव ने श्री राम जी से कहा- प्रभु मैं आपको पहचान नहीं पाया आप साक्षात् प्रभु परमेश्वर है जिनके स्पर्श मात्र से मेरी सारी पीड़ा दूर हो गई| अब आप जैसा कहेंगे मैं वैसा ही करूँगा|

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बाली का प्रभु को उलहाना देना

श्री राम चरितमानस में आता है कि जब बाली को प्रभु श्री राम जी ने मारा तब बाली ने उलहाना दिया-

मै बैरी सुग्रीव पिआरा, अवगुन कवन नाथ मोहि मारा ||

तो उस समय प्रभु ने कहा कि हे बाली! मैं तो न्याय का साथ देता हूँ| मैं न्यायशील भी हूँ और दयालु भी| न्याय तो मैंने यह किया कि तूने अपने भाई की स्त्री को अपने पास रखा हुआ था| शास्त्र की मर्यादा यह है कि जो अपनी बहन, कन्या, पुत्र वधू और भाई की स्त्री पर कुदृष्टि रखता है, वह मरने योग्य है इसलिए मैंने न्याय का साथ दिया| दयालु इसलिए हूँ कि अभी तो तेरे प्राण है, तू अगर चाहे तो प्राण रख सकता है| बाली ने प्रभु के दर्शन कर लिए थे, उसकी सद् बुद्धि जागृत हो गई थी| भगवान के सामने उसकी चतुराई न चल पाई उसने प्रभु से प्रार्थना की –

जन्म-जन्म मुनि जतन कराही अंत राम कहि आवत नाही ||

 

बाली ने श्री चरणों में प्रार्थना की ‘हे प्रभु, लोग बड़ी-बड़ी साधना करते है कि अंत समय में हमारा ध्यान आपके पावन श्री चरणों में हो| आज मैं यह अवसर प्राप्त कर रहा हूँ| अगर अपने प्राणों को बचा लेता हूँ तो पता नहीं फिर यह अवसर मिले न मिले| इसलिए हे श्री राम प्रभु मैं अपने प्राणों को आपके दर्शन करते हुए त्यागने में अपना सौभाग्य समझता हूँ’ इस तरह उसने प्राण त्याग दिए|

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बाली की पत्नी तारा को ज्ञान

भगवान श्री राम चन्द्र जी ने बाली को अपने परमधाम भेज दिया| नगर के सब लोग व्याकुल हो कर दौड़े| बाली की स्त्री तारा अनेकों प्रकार से विलाप करने लगी| केश खुल गए और देह की सुधि न रही| तारा को इस प्रकार व्याकुल देखकर भगवान ने उसे ज्ञान देकर उसका समस्त अज्ञान हर लिया| भगवान ने कहा हे तारा! पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु, इन पांच तत्वों द्वारा बना यह शरीर  प्रत्यक्ष रूप में तुम्हारे सामने सोया हुआ है| और यदि आत्मा के लिए रुदन करती हो, तो आत्मा तो नित्य है फिर इसके लिए तेरा रोना कैसा? ये वचन सुनकर तारा के हृदय में ज्ञान की उत्पत्ति हुई| तब भगवान के चरणों में गिरकर उसने परम भक्ति का वरदान माँगा| उदाहरण के तौर पर बाँसुरी में न तो कोई सुर है और न ही उसमे किसी सुर को निकालने की शक्ति है| उसमे से सुर तब निकलते हैं जब वह बाँसुरी बजाने वाले के हाथों में आती है| बाँसुरी बजाने वाला जैसे सुर उसमें से निकालना चाहता है उसी प्रकार के सुर बाँसुरी के छेदों में से निकलते हैं| बेजान बाँसुरी में ऐसी शक्ति नहीं है कि वह मन को मोह लेने वाले स्वर निकाल सके| इसी प्रकार कठपुतली स्वयं कुछ कर सकने का सामर्थ्य नहीं रखती, जब तक उससे कोई काम लेने वाला न हो| ठीक उसी तरह शरीर का आस्तित्व भी आत्मा के कारण ही है और इस चेतन सत्ता के कारण शरीर सब कार्य करता है, अन्यथा शरीर तो जड़ है|

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माता सीता की खोज में सुग्रीव

कहते हैं कि जब सुग्रीव और भगवान श्री राम जी की मित्रता हो गई तो सुग्रीव ने प्रभु जी को माता सीता की खोज कर उन्हें वापिस ले के आने का वायदा किया| कुछ समय बीत गया, श्री राम जी ने लक्ष्मण से कहा वर्षा ऋतु गई और शरद ऋतु आ गई परन्तु अभी तक जानकी जी की कोई सुध न मिली| जैसे कैसे एक बार कही से पता चल जाए कि जानकी किस जगह पर है तो मुझे काल से ही क्यों न लड़ना पड़े, एक पल में उसे जीत कर सीता जी को वापस ले आऊंगा| श्री राम जी ने फरमाया, मालूम होता है सुग्रीव ने भी राज्य तख्त, शहर, स्त्री और खजाना पाकर हमारी सुधि विसार दी है अर्थात सुग्रीव भी माया में फंस कर हमको भूल गया है| जिस बाण से मैंने बाली को मारा है| इस मूर्ख का भी उसी बाण से नाश करूंगा|

जासु कृपा छूटे मद मोहा 

ताकहु उमा कि सपनेहु कोहा।।

शिवजी कहते हैं, हे पार्वती! जिनकी कृपा मात्र से ही संसार के मद, मान, मोह, छूट जाते है| उसमे सपने के अन्दर भी क्रोध उत्पन्न नहीं हो सकता| यह केवल भय दिखाया है ताकि दास सावधान रहे| क्योंकि भय के बिना भक्ति नहीं हो सकती| भय तथा क्रोध के अन्तर्गत भी दास पर उनका प्यार भरा होता है| लक्ष्मण ने भगवान को क्रोधवंत जान धनुष बाण हाथ में लिया| भगवान ने देखा कि लक्ष्मण तो तैयार हो गया है, कहीं बेचारे सुग्रीव को मार ही ना डाले| तब करुणा सागर भगवान ने लक्ष्मण को समझाया कि हे भाई! सुग्रीव को केवल भय दिखाकर मेरे पास ले आओ, मारना नहीं क्योंकि वह मेरा मित्र है| उधर तो भगवान की मौज उठी कि लक्ष्मण जी के द्वारा वह सुग्रीव को अपने पास बुलाकर उससे अपना कारज करवाने की सोच रहे है तो इधर हनुमान जी के दिल में ख्याल हुआ कि भगवान का कार्य सुग्रीव ने विसार दिया है, उसे चेतन्य करना चाहिये|

सेवक स्वामी एक मत, जो मत में मत मिल जाय|

चतुराई रीझे नहीं, रीझे मन के भाये||

हनुमान जी ने सुग्रीव के पास जाकर सिर निवाया और राज्य नीति के चारो नियमों साम, दाम, भेद और दण्ड को कह कर समझाया| हे राजन! साम (समान दृष्टि) से भगवान आप के साथ मित्रता बना चुके हैं| दाम (धन दौलत) के साथ राज्य आदि दे चुके हैं| अब रहे भेद और दण्ड के लिए भगवान का बाण है, जिससे बाली को मारा था| इसलिए शीघ्र ही जानकी जी की खोज का कार्य आरम्भ करना चाहिये| तब सुग्रीव ने सुनकर बड़ा भय माना| कहने लगा सच है, विषयो ने मेरी बुद्धि मार दी और ज्ञान हर लिया| अब हे हनुमान! शीघ्र ही जहाँ तहाँ दूत भेजे जावे और जानकी जी की कोई खोज निकाली जाये| उसके पश्चात लक्ष्मण जी भगवान की आज्ञा से शहर में आते हैं और सुग्रीव पर क्रोध करते है| परन्तु इधर तो भगवान की प्रेरणा से हनुमान जी ने पहले ही मार्ग साफ़ कर रखा था| सुग्रीव जी, लक्ष्मण जी से क्षमा माँगते हैं और सब मिलकर भगवान के पास जाते हैं, तब सुग्रीव जी भगवान के चरणकमलों में सिर निवाय हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं| हे नाथ| मेरा कोई दोष नहीं है आपकी माया अति प्रबल है, जिसने मुझे भुला दिया है| हे देव! यह तब ही छूटती है जब आप दया करते हैं जैसे अब मैं माया में फंस गया था और आपने दया करके मुझे छुड़ा लिया| हे स्वामी! सुर, नर, मुनि लोग भी विषयों के वश में है तो फिर मैं अति नीच कामी पशु बन्दर की क्या गिनती है| हे नाथ! मेरा तो अनुभव यह है कि जिस मनुष्य को स्त्री के नेत्रों का बाण नहीं लगा, और जो मनुष्य क्रोध रुपी अँधेरी रात में जागा हुआ है अर्थात क्रोध और मोह अज्ञान से साफ़ है| हे प्रभु! जिसने लोभ रुपी फाँसी में अपना गला नहीं बंधाया है वह मनुष्य तो आपके समान है अर्थात तुम में और उसमे कोई भेद नहीं है| परन्तु यह गुण जीव को अपनी साधना और कमाई से प्राप्त नहीं हो सकता, ये तो केवल आप की दया से ही कोई पा सकता है| तब भगवान सुग्रीव की इस प्रकार ज्ञान, वैराग युक्त वाणी सुनकर हँसे| हे सुग्रीव! चिन्ता मत करो, तुम मुझे अपने भाई भरत के समान प्यारे हो| हे सखा अब मन लगाकर यही यतन करो जिससे जानकी की सुधि मिले| अब सीता जी की खोज शुरू हो जाती है, सुग्रीव जी आज्ञा पाते हुए, अनेक शूरवीर योद्धा अपनी-अपनी सेनाओं सहित सब दिशाओं को चल पड़ते है| सबसे पीछे अंगद, नील, जाम्बवन्त और हनुमान आदि योद्धाओं को मुखातिव करते हुए सुग्रीव इस प्रकार शिक्षा देकर उनको दक्षिण दिशा को भेजते हैं कि हे तात! भगवान अन्तर्यामी हैं, वह प्रत्येक के दिल की अवस्था को जानते है| अगर जीव कपट रख कर सेवा करता है तो भी वह अपने अन्तरीव रूप से उस कपट को जानते है| यदि वह बाहर से छल कपट से वर्ताव करता है तो भी वह जानते है| इसलिए भाईयों अन्दर और बाहर दो प्रकार से छल- हीन होकर सच्चाई के साथ जो सेवा का अवसर आपको मिला है उसे सफल बनाओ अर्थात स्वामी के सन्मुख रहकर सेवा करो, सन्मुख रहने से आपको शक्ति मिलेगी| इतनी वार्ता सुग्रीव के मुख से सुनकर वह सब योद्धा आज्ञा माँग और चरणों में सिर निवा कर हृदय में भगवान का ध्यान और सुमिरण करते हुए चल पड़े| सब से पीछे हनुमान जी ने सिर निवाया| तब भगवान ने यह विचार कर कि कार्य तो इनसे होगा, अपने निकट बुलाया| सिर के ऊपर कमल सा हाथ धर कर और अपना दास जान कर सीता की पहचान के निमित्त अँगूठी उतार कर दी और बोले- हे महावीर| जानकी जी को बहुत प्रकार से समझा कर हमारा विरह तथा बल बताना और धैर्य देकर शीघ्र वापस लौटना| यह वचन सुन कर हनुमान जी ने अपना जन्म सफल माना और कृपा निधान भगवान के सुन्दर रूप को हृदय में धर कर चल पड़े| हनुमान, अंगद, नल, नील, जाम्बवन्त आदि सब योद्धा अपनी सेना को साथ लिये हुए सीता जी की खोज कर रहे हैं| जंगल, पहाड़, गुफा, नदियाँ, तालाब और कुंए सब ढूंढे परन्तु सीता जी का कहीं भी पता जब नहीं मिलता, तब कुछ निराश होकर चिन्तातुर हो जाते हैं| समुन्द्र के किनारे कुछ बिछाकर बैठे हुए सोचते है कि अब क्या किया जाये, तब अंगद नेत्रों में जल भर के कहता है- हे भाईयों! अब दोनों और से हमारी मृत्यु पास आ गई है क्योंकि इधर तो सीता जी का कुछ पता नहीं चल रहा और उधर वापिस जाने पर सुग्रीव मारेंगे| अंगद जी के इस प्रकार के वचन सुनकर सब शूरवीर नीचे मुहं करके नेत्रों से जल बरसाने लगते हैं| इन सब में जाम्बवन्त बुजुर्ग थे और पुराने होने के कारण भगवान की महिमा को जानते थे| सब को दुखी देखकर बोले भाईयों! घबराओ नहीं, इस समय आप परीक्षा के एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जो दौर भक्ति और सेवकाई के रास्ते में अकसर भक्तों पर आया करते हैं इसलिए जो कुछ भी रास्ते में आता जाये उसे भगवान की इच्छा समझो और अपने कर्त्तव्य का पालन करते चलो| मोक्ष पद का सुख सबसे ऊपर है, बाकी सम्पूर्ण सुख इसमें आ जाते हैं| किन्तु भक्ति मार्ग में सेवक को एक छोटे से सुख से लेकर मोक्ष तक के सुख का भी त्याग कर देना चाहिये| इस प्रकार जब परस्पर वचन हो रहे थे, तब पहाड़ की गुफा में संपाती इनकी बाते सुन रहा था| बाहर निकल आया और इन सब को देखकर दिल में खुश हुआ कि आज विधाता ने बहुत अच्छा आहार दिया है| आज इन सब का भश्रण करूँगा| बहुत दिन से भूखा मरा जाता था| कभी पेट भर भोजन नहीं मिला था| सो आज विधाता ने एक ही बार में दे दिया| गीध के वचन सुनकर सब वानर डरे कि अब निश्चय ही मरण होगा| तब जाम्बवन्त सोचने लगे कि संपाती को देखकर यह दशा हुई तो आगे क्या बनेगा| अंगद चूँकि पहले से जानते थे कि यह संपाती उस जटायु का भाई है जो श्री रामचन्द्र जी के कार्य में अपना शरीर त्यागकर बैकुण्ठ को गया| यह बातें ऐसे ऊँचे स्वर से कहीं गई कि संपाती सुन ले| फिर अंगद बोले- जो जटायु के समान श्री राम चन्द्र जी के चरण कमलो में चित्त लगाता है उसके समान कोई धन्य नहीं है| यह वाणी सुनकर संपाती उनके निकट आ गया| तब सब वानर डरे| जानकी जी की सुधि न मिलने और सुग्रीव के भय से कुछ तो पहले ही घबराये हुए थे, परन्तु अब संपाती को देखकर रहा सहा खून भी खुश्क हो गया| जब उसे देखकर सब भागने लगे तब संपाती बोला डरो मत| मैं भी श्री रामचन्द्र जी का सेवक हूँ| तुम कौन हो अपनी कथा सुनाओ| तब उन्होंने जटायु के मरने का और सीता की सुधि के निमित्त अपने आने का वृतान्त सुनाया| तब संपाती ने भाई की करनी सुनकर बहुत प्रकार से भगवान की महिमा वर्णन की, तब वह अपनी कथा सुनाने लगा| हे शूरवीरो! सुनो, हम दोनों भाई पहले जोबन अवस्था में ईर्ष्या वश सूर्य के निकट उड़ गये| जटायु तो तेज न सह सका और वापस लौट आया| मैं अभिमान के वश हो सूर्य के निकट होने लगा| परन्तु सूर्य के अपार तेज से मेरे पंख जल गये और घोर चीत्कार कर पृथ्वी पर गिर पड़ा| एक चन्द्रमा नाम के महात्मा थे, मुझे देखकर उनके दिल में दया आई| बहुत प्रकार से उन महात्मा ने सत्संग सुनाया और देह से उत्पन्न हुए अभिमान को दूर किया| तब वे बोले हे गीधराज| त्रेतायुग में भगवान मनुष्य का शरीर धारण करेंगे और उनकी स्त्री को रावण हर लेगा| उनकी खोज करने को वे दूत भेजेंगे तब उनके मिलने से तुम पवित्र हो जाओगे| तुम्हारे पंख नये जम आवेंगे, तुम चिन्ता मत करो| उन्हें तुम सीता दिखा देना| यह कहकर वह महात्मा अपने आश्रम को गये, उस समय हृदय में कुछ ज्ञान हुआ| फिर संपाती बोला हे भाईयों| मेरी एक कथा और सुनो| जो आपके लिए परम हितकारी है| मेरा सुर्षण नाम का पुत्र इस स्थान पर मेरी सेवा करता था| भूख से व्याकुल होकर एक दिन मैंने उससे कहा, बेटा| शीघ्र कहीं से भोजन लाओ, नहीं तो प्राण निकलते है| पुत्र सिर पर आज्ञा धर कर चला| आकाश के मार्ग से एक घोर घने जंगल में जाकर उसने जंगल के अनेक जानवरों को मारा| सूर्य के अस्त होने पर जब वह भोजन लेकर वापस आया तब मारे भूख के मुझे बड़ा क्रोध आया| मैं नीच और क्रोध के वश पुत्र को श्राप देने लगा| तब उसने मेरी बाँह पकड़ कर समझाया और कहा पिताजी| मेरी बात चित्त लगाकर सुनो| जब मैं वन को शिकार के लिए गया तो वहाँ एक बड़ा उत्पात देखा| एक पुरुष जिसके दस सिर थे और बीस भुजा थी और शीघ्रता से मार्ग में चला जाता था उसके संग में एक सुंदर स्त्री थी| जिसका रूप कोई वर्णन नहीं कर सकता| उस पुरुष को भी एक जन्तु जानकर मैंने उसे पीछे से पकड़ा और मारने लगा| परन्तु उस स्त्री को देखकर दया आई और उसे छोड दिया| मुझसे बड़ी विनती करके और मुझसे छुटकारा पाकर वह दक्षिण दिशा को चला गया| इस कारण मुझे देर लग गई| वचन सुनते ही संपाती को अंगार सा लगा अर्थात क्रोध आ गया| और अपने पुत्र से कहा अरे! मेरे तो पंख नहीं है, लेकिन तू ऐसा अवसर पाकर क्यों चूक गया| यह कह कर पुत्र के बल को धिक्कार दिया| अरे! तू उसे पकड़ कर मेरे पास क्यों नहीं लाया| वह तो रावण था और श्री रामचन्द्र जी की स्त्री को हरे जाता था| फिर मुझे उस महात्मा जी के वचन हृदय में याद आये कि भगवान सीता की खोज के लिए अपने दूत भेजेंगे| उनके दर्शन पाकर तुम्हारे पंख जम आवेंगे और तुम उनको मिलकर पवित्र होंगे| ऐसा विचार कर मन को धीरज हुआ, सो उस दिन से प्रेम के साथ आपका मार्ग देखता था| सो आज उन महात्मा के वचन सत्य हुए| इसलिए मेरे वचनों को हृदय में धारण करो और भगवान का कार्य करो| और सुनो! त्रिकुट पर्वत के ऊपर लंकापुरी है| उस लंकापुरी में रावण का राज्य है| वहाँ अशोक नाम का एक बाग़ है वहाँ रावण की कैद में बैठी हुई जानकी जी सोचती रहती हैं| संपाती की वाणी सुनकर सब वानर दक्षिण दिशा को देखने लगे| संपाती बोला तुम यहाँ से उसे नहीं देख सकते परन्तु मैं देखता हूँ| क्योंकि गीध की दृष्टि बड़ी अपार होती है| अब मैं बूढ़ा हो गया हूँ, नहीं तो आपकी कुछ सहायता अवश्य करता| सौ योजन समुन्द्र की चौड़ाई है जो कोई बुद्धिमान सौ योजन समुन्द्र लाँघ सके वही भगवान का कार्य कर सकता है जो कोई श्री भगवान का कार्य कर सके, उसके समान कोई बड़भागी नहीं है| मुझे देखकर मन में धीरज धरो कि भगवान की कृपा से मेरा शरीर कैसा हो गया, फिर पंख जम आये| जब भगवान के सेवकों के दर्शन से इतना लाभ हो सकता है तो तुम उस भगवान के सेवक होकर चिंता न करो| यह समुन्द्र सौ योजन का है किन्तु तुम उस भगवान के सेवक हो जिनका नाम सुमिरण से अनेक पापी संसारी रुपी समुन्द्र से पार हो जाते हैं जिसका कोई पारावार ही नहीं है||          

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हनुमान जी की खोई हुई शक्तियां

रामायण में हनुमान और जाम्बवंत का यह प्रसंग इसी तथ्य को सिद्ध करता है। यह सर्वविदित है कि हनुमान जी की शक्ति अतुलनीय थी, किंतु एक मुनि के श्राप से वे अपनी क्षमताओं को भूल गए थे। इस श्राप का निदान यह था कि कोई अन्य व्यक्ति उन्हें अपने बल का स्मरण कराए तो उन्हें यह विस्मृत बात याद आ जाएगी। सीता माता की खोज में जब श्री राम की सेना दक्षिणी छोर पर समुद्र तक पहुँची, तो आगे सागर पार करके लंका जाने की कठिन समस्या सामने आ खड़ी हुई। सभी चिंतित व परेशान थे। समुद्र पार कैसे करें? तब जाम्बवंत आगे आए और उन्होंने हनुमान को अपने पूर्वकाल का असीम बल तथा क्षमताओं के विषय में स्मरण कराया। तब हनुमान जी को सब कुछ याद आ गया और उन्होंने अपनी शक्तियों को प्राप्त कर लिया| और छलाँग लगाकर समुन्द्र पार कर लंका में सहज ही पहुँच गए| वहाँ जाकर रावण और उनकी सेना को छठी का दूध याद दिलाया और सीता माता से भेंटकर उनका संदेश श्री राम को लाकर दिया। अपनी प्रिय भार्या का संदेश सुनकर श्री राम जी में भी एक अद्भूत बल का संचार हुआ और उनकी सेना अपने नायक को जोश में देखकर एक नवीन स्फूर्ति से भर गई। ऐसे उत्साह जनक माहौल में समुद्र पर पुल बनाना और लंका पहुँचकर रावण को मारकर युद्ध में विजय श्री का वरण करना आदि घटनाएं सर्वज्ञात ही हैं। जामवंत का हनुमान जी को प्रोत्साहन ही इस कड़ी का महत्वपूर्ण बिंदु है क्योंकि जामवंत ने ही हनुमान जी के अंदर आंतरिक प्रेरणा को जागृत किया था। कहने का आशय है कि हम भी अपनी आंतरिक क्षमताओ को भूल जाते हैं तब संत सतगुरु जीव को उसकी शक्ति याद दिलाते है|

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मैनाक पर्वत से हनुमान जी की वार्तालाप

हनुमान जी जब माता सीता की खोज में समुद्र पार कर रहे थे, उसी समय समुद्र ने मैंनाक पर्वत से कहा कि ये श्री रघुनाथ जी के सेवक है, इन्हें थोड़ी देर अपने ऊपर विश्राम करने दो| जब मैंनाक पर्वत ने हनुमान जी से विश्राम करने के लिए प्रार्थना की, तब हनुमान जी ने उत्तर दिया-   

हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम ।

राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम ||

हनुमान जी ने उसे हाथ से स्पर्श कर प्रणाम करते हुए कहा कि भगवान श्री रामचन्द्र जी का काम किये बिना मुझे विश्राम कहाँ? तात्पर्य यह है कि सेवक के लिए सेवा पहले है, विश्राम बाद में| आज्ञा पहले है, शरीर का सुख-आराम बाद में, क्योंकि उसका मुख्य लक्ष्य तो अपने प्रभु की प्रसन्नता प्राप्त करना है

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माता सुरसा और हनुमान जी संवाद

हनुमान जी को लंका की ओर जाते हुए देवताओं ने देखा तो उनकी बल बुद्धि को जाँचने के लिए सुरसा नामक साँपों की माता को भेजा| वह हनुमान जी के निकट पहुँच कर बोली- आज देवताओं ने मुझ को बहुत अच्छा भोजन दिया है मैं तुझे खाऊँगी| यह सुनकर हनुमान जी ने हँस कर कहा, ‘ऐ माता, मैं राम जी का कार्य करके लौट कर जब आऊँ और सीता जी की सुधि अपने प्रभु को सुना दूँ, उसके पश्चात् मैं स्वयं ही तेरे मुँह में आकर प्रवेश कर जाऊँगा मैं सत्य कहता हूँ, माता| मुझे अपने प्रभु का कार्य कर लेने दे| जो वचन मैं आप से कर रहा हूँ उसका पालन करूँगा| परन्तु इस समय मुझे जाने दे|’ ऐसे ही हनुमान जी ने अनेक प्रकार से सुरसा से विनय की परन्तु जब सफलता न मिली अर्थात सुरसा अपने हठ पर अड़ी रही कि मैं तो अवश्य तुमको खाऊँगी, तब हनुमान जी ने सोचा अब बात नरमी से निकलती दिखाई नहीं देती| मुस्कराते हुए बोले, आ फिर मुझे खा ले, देरी क्यों कर रही है? तब सुरसा ने योजन भर अपना मुख फैलाया शीघ्र ही हनुमान जी अपना शरीर दो योजन भर विस्तार का बना लिया|

फिर सुरसा ने अपना मुख सोलह योजन तक चौड़ा किया, तुरंत हनुमान जी बत्तीस योजन भर हो गए| इसी प्रकार ज्यो -2 सुरसा अपना मुख बढ़ाती गई| त्यों- त्यों हनुमान जी उससे दुगुना होते गए| जब सुरसा ने अपना मुख सौ योजन तक फैलाया तब हनुमान जी अति छोटा सा रूप धर कर सुरसा के मुँह के अंदर जाकर फिर बाहर आ गए| अपना वचन सत्य कर हनुमान जी ने सुरसा को सिर नवा कर विदा माँगी तब सुरसा बोली, हे पवनसुत, देवताओं ने मुझे जिस निमित भेजा था तुम्हारी बुद्धि- बल तथा पराक्रम का भेद मैंने पाया है आप धन्य हैं| सुरसा ने आशीर्वाद दिया| अब जाओ, तुम बल और बुद्धि के भंडार हो, भगवान का कार्य अवश्य पूरा होगा| इतना कहकर सुरसा चली गई और हनुमान जी हर्ष सहित मार्ग पर चल दिए|

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विभीषण और हनुमान जी संवाद

कहते हैं जब हनुमान जी माता सीता जी की खोज में लंका में गए| तो वहाँ उनकी मुलाकात विभीषण से हुई| तब विभीषण जी बोले, हे हनुमान जी,  मैं लंका में इस प्रकार रहता हूँ जिस प्रकार बेचारी जीभ दाँतों में रहती है| हे प्यारे! आप तो सदा श्री राम जी के संग रहते हैं| क्या मुझ अनाथ पर श्री भगवान जी  कृपा करके अपने चरणों में स्थान देंगे? विभीषण जी  बोले – हे हनुमान जी, मेरा तामसी शरीर है| कोई साधन भी नहीं है और न ही मन में प्रभु के चरणों का प्यार है| कोई गुण भी ऐसा नहीं, जिससे भगवान की कृपा का पात्र बन सकूँ, परन्तु आपके दर्शन से मुझे विश्वास हो रहा है कि बिना हरी कृपा के संतों का मिलाप नहीं होता| भगवान ने मुझ पर अति दया की है जो आपने मुझे घर बैठे बिठाये दर्शन दिए| हनुमान जी बोले – हे विभीषण जी प्रभु की यह सदा से रीति चली आ रही है कि वे अपने सेवक पर सदा ही प्रीती करते है| आप देखिये, मैं बंदर चंचल, सब प्रकार से हीन कौन से उच्च कुल का हूँ? मेरा विचार है यदि कोई प्रात: काल उठ कर हमारा नाम भी ले ले तो संभव है कि उस दिन उसे दिन भर भोजन भी न मिले| मैं ऐसा नीच हूँ, फिर भी मुझे अपना दास जानकर श्री राम जी ने मुझ पर कृपा की है इस प्रकार भगवान के गुणों का स्मरण करते हुए दोनों के नेत्रों में जल भर आया और दोनों ने सच्चा सुख पाया| दृष्टांत से यही सीखने को मिलता है कि हनुमान जी इतने उच्च कोटि के भक्त होते हुए भी अपने आप को कितना छोटा समझते हैं| यही एक भक्त का कर्तव्य  है| वह हर काम में प्रभु की कृपा समझे और हमेशा यहीं सोचे कि जो कुछ करने वाले है वो मेरे प्रभु है|

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हनुमान जी व माता सीता संवाद

कहते हैं जब हनुमान जी लंका में सीता जी को मिलने गए तो उन्हें आश्वासन दिया कि आप चिंता न करे| प्रभु श्री राम जी वानर- सेना सहित यहाँ आयेंगे और राक्षसों को मारकर आपको शोभा सहित ले जायेगे| सीता जी ने कहा – हे पुत्र! जिस वानर सेना की तुमने बात कही है, क्या उस सेना के सारे वानर तुम्हारे जैसे ही है? क्योंकि तुम तो बड़े छोटे से हो और राक्षस तो अति शूरवीर और बलवान है| मेरे मन में यह संदेह है कि छोटे-छोटे वानर इतने बलवान राक्षसों को कैसे जीतेंगे? यह सुनकर हनुमान जी ने अपना शरीर विशाल कर लिया| जो युद्ध में शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न करने वाला, अत्यंत बलवान और वीर था| यह देखकर सीता जी के मन में विश्वास हुआ और हनुमान जी ने फिर छोटा रूप धारण कर लिया| हनुमान जी बोले- सुनो माता| वानरों में बल नहीं होता; परन्तु प्रभु के प्रताप से बहुत छोटा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है अर्थात अत्यंत निर्बल भी बलवान को मार सकता है| तब हनुमान जी ने माता सीता जी को एक कथा सुनाई-

एक समय का वृतांत है कि गरुड़ जी ने एक सर्प के बच्चे को खाने का प्रयत्न किया| वह अपने प्राणों की रक्षा हेतु भगवान विष्णु जी के सिंघासन के नीचे जाकर छिप गया| गरुड़जी सिंघासन के सामने बैठ गए कि जब सर्प का बच्चा सिंघासन के नीचे से निकलेगा, तो मैं उसको खाऊँगा| भगवान ने विचारा कि गरुड़ मेरे शरणागत को भी खाना चाहता है| शरणागत की रक्षा हेतु भगवान ने उस सर्प को आशीर्वाद दिया कि तू गरुड़ को खाने में समर्थ हो| जब सर्प बलवान होकर गरुड़ पर झपटा, तब गरुड़ ने श्री चरणों में अपने प्राणों की रक्षा के लिए प्रार्थना की और तब प्रभु की कृपा से गरुड़ जी को उस सर्प ने छोड़ा| भक्ति, प्रताप, तेज और बल से युक्त हनुमान जी की वाणी सुनकर सीता जी के मन में संतोष हुआ| उन्होंने श्री रामचन्द्र जी का प्यारा भक्त जानकर हनुमान जी को आशीर्वाद दिया- हे पुत्र! तुम बल और शील के धनी हो| श्री रघुनाथ जी तुम पर बहुत कृपा करें तो कहने का भाव यही है कि भगवान के आशीर्वाद से इंसान कुछ भी कर सकता है |

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लंका में वाटिका उजाड़ना

कहते हैं जब हनुमान जी माता सीता की खोज करने के लिए लंका में पहुँचे| तो वहाँ उन्होंने बाग़ में प्रवेश किया तथा फल खाने लगे और वृक्षों को तोड़ने लगे| जो राक्षस सामने आये, कुछ को तो मार दिया और कुछ भाग कर रावण के पास जा पुकारे| हे नाथ! एक बड़ा भारी वानर आया है| उसने अशोक वाटिका उजाड़ दी है| फल खाकर वृक्षों को तोड़ डाला है और रखवालों को मसल कर पृथ्वी पर डाल दिया है| यह सुनकर रावण ने अनेक योधाओं को भेजा| उनको देखकर हनुमान जी गरजे, सब राक्षसों को मार डाला| कुछ अधमरे पुकार करते हए रावण के पास पहुँचे| फिर रावण ने अक्षय कुमार को भेजा| वह बहुत से योधाओं को साथ लेकर चला| उसको आते देखकर हनुमान जी वृक्ष पकड़ कर उछले और बड़े शब्द से गर्जना की| कुछ मार डाले, कुछ कुचल डाले, कुछ मिट्टी में मिला दिए, कुछ फिर रावण के पास जाकर पुकारे| हे नाथ! वानर बड़ा ही बलवान है| पुत्र अक्षय कुमार का मरण सुनकर रावण क्रोध में भर गया और मेघनाथ बलवान को भेजा| ऐ पुत्र! उसको मारना मत, बाँधकर लाना, देखे कहाँ का वानर है| पिता की आज्ञा पाकर मेघनाथ महाबली योधा चला| हनुमान जी का उसके साथ भी भारी युद्ध हुआ| जब मेघनाथ हनुमान जी को जीत न सका, तो अंत में ब्रह्मास्त्र हाथ में लिया| हनुमान जी ने सोचा यदि  ब्रह्मास्त्र को नहीं मानता तो संसार में ब्रह्मास्त्र की महिमा मिट जाएगी| इस कारण अपने आप को ब्रह्मास्त्र में बंधवा लिया| इसमें कुछ भेद भी था कि इस बहाने हनुमान जी रावण से भी दो-चार बाते करना चाहते थे| यह कथा शिवजी पार्वती जी को सुना रहे हैं| शिवजी बोले, हे पार्वती!

जासु नाम जपि सुनहु भवानी

भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥

तासु दूत कि बंध तरु आवा।

प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥

जिस प्रभु का नाम जप कर ज्ञानी मनुष्य संसार बंधन को काट देते है उस प्रभु का सेवक भला कैसे किसी के बंधन में आ सकता है| परन्तु यहाँ तो सेवक और स्वामी के सम्बन्ध में भक्ति का विषय चल रहा है| हनुमान जी ने अपने स्वामी के कारज के निमित शत्रु के हाथों कैद होना स्वीकार किया और अपने आप को बंधवाया| हनुमान जी मेघनाथ के बंधन में बंधे हुए रावण के दरबार में पहुँचते है| तब रावण बोलता है अरे! वानर तू कौन है? 1. किसके बल से तूने वन को उजाड़ दिया? 2. क्या तूने कभी मुझको कानो से नहीं सुना? 3. तूने राक्षसों को किस अपराध से मारा? ऊपर लिखे तीनों प्रश्नों का उत्तर हनुमान जी इस प्रकार देते है| हनुमान जी बोले, सुन रावण, जिसका बल पाकर माया अनेक ब्रह्मांडो की रचना करती है तथा जिसके बल से ब्रह्मा जी जगत को उत्पन्न करते है, विष्णु पालन करते है और शिव जी संहार करते है| जिसके बल से हजार मुख वाले शेष जी पार्वती और वनों सहित इस ब्रह्माण्ड को अपने मस्तक पर धारण किये हुए है| तथा जो प्रभु देवताओं की रक्षा करने, पृथ्वी पर बोझ उतारने और तुम जैसे मूर्खों को शिक्षा देने के लिए संसार में समय -2 पर अवतार धारण करते हैं| और जिस भगवान ने मिथिलापुरी अर्थात राजा जनक जी की राजधानी में शिवजी के कठिन धनुष को तोड़ा और तुम समेत अनेक राजाओं के समूह का अभिमान दूर किया तथा खर दूषण और बाली इन सब महाबली योधाओं को जिसने मारा और जिसका नाम जपने से बल पाकर तूने पूरे संसार में विजय प्राप्त कर रखी है, मैं उस प्रभु का दूत हूँ जिस प्रभु की प्रिय नारी को तू हर लाया है| यह है पहले प्रश्न का उत्तर जो हनुमान जी ने रावण को दिया| दूसरा प्रश्न यह था कि क्या तूने मेरे नाम को कभी नही सुना कि मैं रावण हूँ| इसका उत्तर हनुमान जी इस प्रकार देते है हनुमान जी बोले, मैं तुम्हारी प्रभुताई को भली भांति जनता हूँ| एक बार सहस्त्रबाहु से तुम्हारी लड़ाई हुई थी| वहाँ पर जो तेरी दशा हुई थी वह किसी से छिपी हुई नहीं है तथा बाली के साथ युद्ध करके तुमने जो यश पाया वह भी संसार में प्रसिद्ध है| हनुमान जी का यह वचन सुनकर रावण उत्तर तो न दे सका, हँसकर बात को टाल दिया|

सहस्त्रबाहु और बाली की कथाएँ इस प्रकार है- कहते हैं एक बार राजा सहस्त्रबाहु नदी में स्नान कर के पूजा पाठ कर रहे थे| तब रावण ने ऊपर से नदी में खड़े होकर नदी का सब जल रोक लिया था| राजा सहस्त्रबाहु को संदेह हुआ की नदी का पानी क्यों सूख गया है| रावण का अभिप्राय था की जब मैं नदी का पानी बंद कर दूँगा तो राजा सहस्त्रबाहु मुझ से लड़ाई करेगा| यह था उस रावण का अभिमान परन्तु वहा उसे लेने के देने पड़ गए| सहस्त्रबाहु ने रावण को कोई जानवर समझ कर घर लाकर बांध दिया| कुछ दिन वहा कैद में रहने के उपरांत  पुलस्त्य ऋषि सहस्त्रबाहु के घर पधारे, तब उन्होंने दया करके उसे छुड़ाया| और सुनो कहते हैं बाली जब एक पर्वत पर बैठ कर तपस्या कर रहा था, तब रावण ने उसके साथ भी युद्ध करने की ठानी| वह बाली के पास जाकर छेड़ छाड़ करने लगा| तब बाली ने कोई जंतु जानवर समझ कर बगल में दबा लिया और आप तप में लीन बैठा रहा| न जाने कब तक रावण बाली की बगल में ही बंद पड़ा रहा| जब बाली तपस्या से निवृत हुआ, तब उसने छोड़ा| यह है रावण के दूसरे प्रश्न का उत्तर, जो उसने कहा था, क्या तूने मेरे नाम को कभी सुना? अब हनुमान जी  रावण के तीसरे प्रश्न का उत्तर इस प्रकार देते है कि तूने मेरे राक्षसों को किस अपराध से मारा? तब हनुमान जी बोले फल तो मैंने इसलिए खाए की मुझे भूख लग रही थी और वृक्ष इस कारण तोड़े क्योंकि मैं वानर हूँ और वानरों का स्वाभाव ही तोड़ फोड़ करना है ऐ रावण! अपनी देह सबको प्यारी होती है जब तेरे राक्षस मुझे मारने को दौड़े , तब मैंने अपनी देह की रक्षा की खातिर उनको मारा| जिन्होंने मुझ को मारा, उनको मैंने मारा| तब मेघनाथ मुझको यहाँ बाँध लाया| दोष इसका है, मेरा नहीं| परन्तु मुझे बंधन में आने की कुछ लाज नहीं, क्योंकि जैसे कैसे भी हो मैं अपने प्रभु का कार्य करना चाहता हूँ| एक रामायण में तीसरे प्रश्न का उत्तर इस प्रकार वर्णन हुआ है हनुमान जी कहते हैं, ऐ रावण! जब मैं किसी पेड़ पर चढ़कर उसके फल तोड़कर खाने लगता था, तब प्रथम मन ही मन में अपने प्रभु को भोग लगाता था| इस प्रकार व सारा बाग़ मेरे भगवान का भोग प्रसाद बन गया था| जीतनी मेरी भूख थी, उतना मैंने ग्रहण कर लिया| वृक्षों को उखाड़ कर समुन्द्र में फैंकना इसलिए  उचित समझा कि ये दुष्ट राक्षस जो भगवान की भक्ति से बेमुख है मेरे प्रभु का भोग प्रसाद क्यों खाए क्योंकि भगवान का भोग खाना तो केवल उसके प्रेमियों को अधिकार है, बेमुखो को नहीं| इसलिए मैंने सारे बाग़ का सफाया कर दिया|

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पुत्र मकरध्वज से मिलना

यह कथा का उल्लेख बाल्मीकि रामायण में मिलता है। हनुमान जी जब लंका दहन कर रहे थे तब लंका नगरी से उठने वाली ज्वाला की तेज आँच से हनुमान जी को पसीना आने लगा। पूँछ में लगी आग को बुझाने के लिए हनुमान जी समुद्र में पहुँचे तब उनके शरीर से टपकी पसीने की बूँद को एक मछली ने अपने मुँह में ले लिया। इससे मछली गर्भवती हो गयी। कुछ समय बाद पाताल के राजा और रावण के भाई अहिरावण के सिपाही समुद्र से उस मछली को पकड़ कर लाए। मछली का पेट काटने पर उसमें से एक मानव निकला जो वानर जैसा दिखता था। सैनिकों ने वानर रूपी मानव को पाताल का द्वारपाल बना दिया। उधर लंका युद्घ के दौरान रावण के कहने पर अहिरावण राम और लक्ष्मण को चुराकर पाताल ले आया। हनुमान जी को जब इस बात की जानकारी मिली तब वह पाताल पहुँच गये। यहाँ द्वार पर ही उनका सामना एक और महाबली वानर से हो गया। हनुमान जी ने उसका परिचय पूछा तो वानर रूपी मानव ने कहा कि वह पवनपुत्र हनुमान का बेटा मकरध्वज है। अब हनुमान जी और ज्यादा अचंभित हो गए। वो बोले कि मैं ही हनुमान हूँ लेकिन मैं तो बालब्रह्मचारी हूँ। तुम मेरे पुत्र कैसे हो सकते हो। हनुमान जी की जिज्ञासा शांत करते हुए मकरध्वज ने उन्हें पसीने की बूँद और मछली से अपने उत्पन्न होने की कथा सुनाई। कथा सुनकर हनुमान जी ने स्वीकार कर लिया कि मकरध्वज उनका ही पुत्र है। हनुमान ने मकरध्वज को बताया कि उन्हें अहिरावण यानी उसके स्वामी की कैद से अपने राम और लक्ष्मण को मुक्त कराना है। लेकिन मकरध्वज ठहरा पक्का स्वामी भक्त। उसने कहा कि जिस प्रकार आप अपने स्वामी की सेवा कर रहे हैं उसी प्रकार मैं भी अपने स्वामी की सेवा में हूँ, इसलिए आपको नगर में प्रवेश नहीं करने दूँगा। हनुमान जी के काफी समझाने के बाद भी जब मकरध्वज नहीं माना तब हनुमान और मकरध्वज के बीच घमासान युद्घ हुआ। अंत में हनुमान जी ने मकरध्वज को अपनी पूंछ में बांध लिया और नगर में प्रवेश कर गये। अहिरावण का संहार करके हनुमान जी ने मकरध्वज को भगवान राम से मिलवाया और भगवान राम ने मकरध्वज को पाताल का राजा बना दिया। 

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लंका दहन करके वापिस आना

कहते हैं जब हनुमान जी माता की खोज कर लंका से वापिस आये तब भगवान श्री राम जी ने हनुमान जी को बधाई दी और उनसे पूछा कि आपने कैसे सारी लंका का दहन किया? ऐसा सुनकर हनुमान जी की आँखों में आँसू आ गए| वे भगवान के चरणों में गिर पड़े और बोले – ‘प्रभु रक्षा करो, रक्षा करो| श्री भगवान बार – बार उठाना चाहते हैं परन्तु प्रेम में मग्न हनुमान जी को उठना अच्छा नहीं लगता| पार्वती जी को शिवजी महाराज जी कथा सुनाते हुए जब यहाँ तक पहुँचे कि भगवान के चरण कमलों पर हनुमान जी का मस्तक है और प्रभु श्री राम जी के दोनों कर कमल हनुमान जी के शीश पर धरे हैं| इस दशा का स्मरण कर स्वयं शिवजी भगवान जी अपने मन को सावधान करके फिर सुंदर कथा कहने लगे|

शिवजी बोले, हे पार्वती, फिर श्री भगवान जी ने हनुमान को उठा कर हृदय से लगाया और हाथ पकड़कर अपने निकट बिठाकर पूछने लगे, कहो हनुमान| रावण की पाली हुई बड़ी लंका को तुमने किस प्रकार भस्म किया? तब हनुमान जी अपने मालिक को प्रसन्न जानकर अभिमान रहित वाणी से विनय करने लगे| प्रभु शाखामृग अर्थात वानरों की बड़ी वीरता यही है कि वे एक शाखा से दूसरी शाखा पर कूद कर जाते हैं| हे मेरे मालिक, जिस पर आप अनुकूल हो उसके लिए संसार में कोई भी काम कठिन नहीं है| इससे अधिक मैं कुछ नहीं जानता| हे नाथ! मेरे दिल में यही इच्छा है कि सर्व सुखों को देने वाली आपके चरणों की भक्ति मुझे मिले| शिवजी बोले, हे पार्वती, जिसने भगवान के स्वभाव को पहचान लिया उसको भजन भक्ति छोड़कर और कुछ अच्छा नहीं लगता|

हनुमान जी की सरल वाणी सुनकर भगवान बोले, ऐसा ही होगा| शिव जी ने पार्वती से कहा कि हे पार्वती! जो इस संवाद को सच्चे मन से अपने अंदर बसाएगा, वह भी प्रभु भक्ति के रसपान का अधिकारी बनेगा|

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हनुमान जी का अहंकार

हनुमान जी जब संजीवनी बुटी का पर्वत लेकर लौटते है तो भगवान से कहते है। प्रभु आपने मुझे संजीवनी बूटी लेने नहीं भेजा था, बल्कि मेरा भ्रम दूर करने के लिए भेजा था। और आज मेरा ये भ्रम टूट गया कि मै ही आपका राम नाम का जप करने वाला सबसे बड़ा भक्त हूँ। भगवान बोले कैसे? हनुमान जी बोले- वास्तव में मुझसे भी बड़े भक्त तो भरत जी है, मै जब संजीवनी लेकर लौट रहा था तब मुझे भरत जी ने बाण मारा और मै गिरा, तो भरत जी ने, न तो संजीवनी मंगाई, न वैध बुलाया. कितना भरोसा है उन्हें आपके नाम पर, उन्होने कहा कि यदि मन, वचन और शरीर से श्री राम जी के चरण कमलों में मेरा निष्कपट प्रेम हो, यदि रघुनाथ जी मुझ पर प्रसन्न हो तो यह वानर थकावट और पीड़ा से रहित होकर स्वस्थ हो जाए। उनके इतना कहते ही मै उठ बैठा। सच कितना भरोसा है भरत जी को आपके नाम पर।

शिक्षा :- हम भगवान का नाम तो लेते है पर भरोसा नही करते, भरोसा करते भी है तो अपने पुत्रो एवं धन पर, कि बुढ़ापे में बेटा ही सेवा करेगा, धन ही साथ देगा।

दूसरी बात प्रभु! बाण लगते ही मै गिरा, पर्वत नहीं गिरा, क्योकि पर्वत तो आप उठाये हुए थे और मै अभिमान कर रहा था कि मै उठाये हुए हूँ| मेरा दूसरा अभिमान भी टूट गया।

शिक्षा :- हमारी भी यही सोच है कि, अपनी गृहस्थी का बोझ को हम ही उठाये हुए है। जबकि सत्य यह है कि हमारे नही रहने पर भी हमारा परिवार चलता ही है।

फिर हनुमान जी कहते है:- एक और बात प्रभु! आपके तरकस में भी ऐसा बाण नहीं है जैसा बाण भरत जी के पास है। आपने सुबाहु, मारीच को बाण से बहुत दूर गिरा दिया। आपका बाण तो आपसे दूर कर देता है, पर भरत जी का बाण तो आपके चरणों में ला देता है। उन्होने अपने बाण पर बैठाकर मुझे आपके पास भेज दिया। भगवान बोले :- हनुमान, जब मैंने ताड़का को तथा और भी राक्षसों को मारा तो वे सब मरकर मुक्त होकर मेरे ही पास आये। इस पर हनुमान जी बोले :- प्रभु! आपका बाण तो मारने के बाद सबको आपके पास लाता है पर भरत जी का बाण तो जिन्दा ही भगवान के पास ले आता है।

सच्चे संत तो भरत जी ही है और संत का बाण है उनकी वाणी।

शिक्षा :- हम संत वाणी को समझते तो है पर सटकते नहीं है, और औषधि सटकने पर ही फायदा करती है। हनुमान जी को भरत जी ने पर्वत सहित अपने बाण पर बैठाया तो उस समय हनुमान जी को थोड़ा अभिमान हो गया कि मेरे बोझ से बाण कैसे चलेगा ? परन्तु जब उन्होंने रामचंद्र जी के प्रभाव पर विचार किया तो वे भरत जी के चरणों की वंदना करके चल दिए।

शिक्षा :- कभी-कभी हम भी संतो पर संदेह करते है, कि ये हमें कैसे भगवान तक पहुँचा देगे। जबकि एक संत ही हैं, जो हमें सोते से जगाते है जैसे (संत) भरत जी ने हनुमान जी को जगाया| क्योकि उनका मन, वचन, कर्म सब भगवान में लगा हुआ है। संतो पर भरोसा करोंगे तो वो तुम्हे तुम्हारे बोझ सहित भगवान के चरणों तक अवश्य पहुँचा देगे।

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गिलहरी को आशीर्वाद

कहते हैं जब लंका में जाने के लिए पुल बनाया जा रहा था| तब श्री राम जी ने सेवा के भंडार खोल दिए और सभी सेवक पुल बनाने की तैयारी में जुट गए| उसी स्थान पर एक गिलहरी  ने जब यह देखा तो उसके मन में भी प्रभु श्री राम जी के सेवकों के साथ मिलकर सेवा करने की भावना पैदा हुई| तो उसने भी सेवा करना शुरू कर दिया| वह गिलहरी मिट्टी में अपने शरीर को रगड़ती और पुल पर पड़े उन पत्थरों पर झाड़ आती फिर पानी में अपने आप को गिला करती, फिर मिट्टी रगड़ कर पत्थरों पर डाल आती| किसी ने देखा कि यह गिलहरी बार-बार क्या कर रही है, तो उसने गिलहरी से पूछा तो गिलहरी ने जवाब दिया कि प्रभु श्री राम जी ने हम जीवों के उद्धार के लिए सेवा का भंडार खोला है तो मैं भी सेवा करके अपना उद्धार करवाना चाहती हूँ| कहते हैं जब श्री राम जी को इस बारे में पता चला तो वह बहुत प्रसन्न हुए| उन्होंने अपनी तीन उंगलियाँ गिलहरी की पीठ पर रख कर उसे आशीर्वाद दिया तभी से गिलहरी की पीठ पर हमेशा वह निशान रह ते है|

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सेना को बढ़ावा देना

जब श्री भगवान राम जी ने लंका पर चढ़ाई की तैयारी की, समुन्द्र पर पुल बंध गया और सेना सहित समुन्द्र के किनारे पहुँच कर पुल को देखा तो मुस्कुराते हुए जो आपने प्रश्न किये और आगे से पुल को तैयार करने वाले प्रेमी भक्तों ने जो श्रद्धा भक्ति सहित उत्तर दिये उन को एक कवि ने अपने ढंग से कविता में इस प्रकार लिखा है| जो जीव भक्ति के मार्ग पर चल रहे हैं उनकी रोशनी के लिये इस प्रसंग में बहुत कुछ सामान मौजूद है और ऐसे विमल इतिहासों को पढ़ने सुनने और उन पर आचरण करने से सेवक अपने धर्म पर दृढ़ता से चल सकता है| अब इस प्रसंग को सुनिए-

श्री राम बैठे समुन्द्र किनारे|

हनुमान अंगद व नल नील सारे||

खुश होकर भगवान जी यू पुकारे|

मुझे एक से एक बंड़ कर हो सारे||

हर एक बात में हर इक ताक हो तुम|

बहादुर हो लायक हो और पाक हो तुम||

तराये जो पत्थर तो हैरान हूँ मैं|

यह पुल देखकर तुम पर कुरबान हूँ मैं||

अभी तक न समझा ये विज्ञान हूँ मैं|

ऐ नल- नील सच है परेशान हूँ मैं||

बड़े पत्थरों को यह कैसे धरा है|

पुल क्या बनाया यह जादू भरा है||

यह था प्रश्न जो भगवान ने अपने भक्तों की भक्ति को जांचने के लिये किया| लेकिन जिन के मन पर भक्ति का रंग चढ़ा होता है और जो जानते हैं कि सब कुछ करने कराने वाले तो अन्तर्यामी मालिक आप हैं, सेवक का तो केवल नाम ही होता है, वे इन भेदों को जानते हैं| इसलिये भगवान के प्रश्न का आगे से यू उत्तर देते हैं|

नल नील बोले हमारी क्या ताकत|

करे काम ऐसा जहाँ हो हमाकत||

प्रभु आपकी है यह सारी सदाकत|

भला बन्दरों में कहाँ यह लयाकत||

जो सच पूछिये तो कृपा राम की है|

यह सारी सिफत आप के नाम की है||

भक्तों की ओर से यह सुन्दर उत्तर पाकर भगवान अपने अन्तर में अति प्रसन्न हुए, परन्तु साथ ही एक और प्रश्न रख दिया| जब नल नील ने यह कहा कि ये समुन्द्र पर इतने भारी पत्थर भगवान की कृपा से ही तरे हैं, हम मूर्ख बन्दर क्या समझ सकते हैं| यह सब मालिक की अपनी ही कृपा है| भगवान इस का उत्तर यूँ देते हैं-

सुना प्रेम से तब तो मुस्काये रघुवर|

लिया हाथ में एक छोटा सा पत्थर||

उसे फैंका सागर में सब को दिखाकर|

गया डूब जल्दी से ठहरा न पल भर||

कहां मेरी ताकत से यह ठहर जाता|

मेरी कृपा थी तो यह भी तैर जाता||

मगर यह तो नल नील का काम समझो|

युगों तक चला जायेगा नाम समझो||

कोई मैंने पत्थर घना ही नहीं है|

लो अब मैंने फैंका तरा ही नहीं है||

जब भगवान ने ऐसा वचन किया कि देखो, मैंने एक पत्थर को सबके सामने समुन्द्र में फैंका, वह तैरा नहीं बल्कि डूब गया| तब आगे से सेवक अति सुन्दर उत्तर देते है जो हम सब के लिए विचारने योग्य है|

कहा नील और नल ने ऐ प्यारे रघुवर|

जिसे आपने फैंका व डूबेगा अक्सर||

जिसे दिल से फैंका नहीं जायेगा तर|

यह पत्थर तो क्या डूबे संसार सागर||

हे कृपालु भगवान! जिसे आपने फैंक दिया, वह तो अवश्य ही डूबेगा, वह तैर कैसे सकता है अर्थात जिसे आपने दिल से उतार दिया है वह जीव तो भवसागर में डूबेगा ही, इस में कुछ भी सन्देह नहीं है| हम दासों की तो आपके चरणरबिन्दों में यही प्रार्थना है कि सदा आपकी दया का हाथ हमारे सिरों पर रहे और सेवा मिलती रहे| इस के सिवाय हमको कुछ नहीं चाहिये| फिर आगे कहते हैं- हे नाथ!

हमारी क्या ताकत जो पत्थर को तारे|

पहाड़ो से जाकर उखाड़े उतारे||

यहाँ ला के उनको धरे और संवारे|

समुन्द्र पे जल्दी से पुल बाँध डारे||

न हरगिज हमारे किये काम होता|

लिखा पत्थरों पर न गर राम होता||

धन्य हैं ऐसे भक्त, जिनकी भक्ति की मिसाल हम सबके लिये एक रोशनी का मीनार है| सत्य है जिस के ऊपर मालिक के नाम की छाप नहीं लगी है वह भवसागर से कैसे पार हो सकता है||      

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गोवर्धन पर्वत उठा कर लाना

कहते हैं जब लंका में जाने के लिए पुल बनाया जा रहा था तो सभी दास श्री राम की पुल बनवाने में सहायता कर रहे थे| वे पत्थर उठा कर लाते ओर उसे समुंदर में डालते| तब उसी समय की बात है हनुमान जी के मन में विचार आया कि ये सारे छोटे छोटे पत्थर ला रहे है क्यों ना कोई बड़ा पत्थर उठा लाऊँ समुंदर में डालने के लिए, जिससे काम आसान हो जायेगा| तब हनुमान जी एक बड़ा सा पत्थर लेने गए| हनुमान जी की नजर गोवर्धन  पर्वत पर पड़ी| वह उसे उठाने लगे| तब गोवर्धन पर्वत ने हनुमान जी से विनती की कि मैं तभी आपके साथ चलूँगा जब आप मुझे श्री राम जी के दर्शन करवाओंगे, उनसे भेंट करवाओंगे| तब हनुमान जी ने वायदा किया कि मैं तुम्हें श्री राम जी से जरुर भेंट करवाऊँगा| जब हनुमान जी गोवर्धन पर्वत को उठा कर  बृजधाम  तक पहुँचे तभी श्री राम जी ने अपने दासों को आज्ञा दी कि लंका में जाने के लिए पुल तैयार हो गया है, अब और पत्थरों की जरुरत नहीं है जिसके पास भी पत्थर है वो वही छोड़ दे| अब सभी ने अपने हाथों के पत्थर नीचे छोड़ दिए| जब हनुमान जी ऐसा करने लगे तो पर्वत ने विनय की कि आपने तो वायदा किया था कि मुझे श्री राम जी के दर्शन होंगे| तब हनुमान जी ने प्रभु श्री राम जी के चरणों में विनती की, तब श्री राम जी ने वचन किये कि इस जन्म में तो नहीं लेकिन अगले जन्म में हम उस पर्वत की इच्छा अवश्य पूरी करेंगे| उन्ही वचनों को श्री राम जी ने द्वापर युग में कृष्ण रूप में जन्म लेकर पूरा किया और गोवर्धन पर्वत को अपनी उँगली से उठा कर उसका मान बढाया|

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विभीषण जी श्री राम जी की शरण में

रावण ने विभीषण को घर से निकाल दिया| विभीषण के मन में श्री राम जी के प्रति श्रद्धा भक्ति थी| इसलिए भाई ने जब श्री राम के गुणगान के मिथ्या आरोप में अपमानित कर दरबार से निकाल दिया तो विभीषण घबराया नहीं, उसे सभी को आश्रय देने वाले प्रभु के आश्रय पर विश्वास था, वह श्री राम जी के भेद को जानता था| इसलिए विभीषण जी श्री राम जी की शरण में चले गए, वानरों को संदेह हुआ| सुग्रीव ने कहा –प्रभु विभीषण पर विश्वास नहीं किया जा सकता| लेकिन श्री राम जी ने कहा –तुम्हारा कथन सही हो सकता है लेकिन मैं शरणागत को शरण दिए बिना नहीं रह सकता| यह मेरा धर्म है, मर्यादा है विभीषण को आदर सहित मेरे पास ले आओ| प्रभु श्री राम तो सब कुछ जानते थे| उन्हें बताने की आवशकता ही नहीं थी| किसी का परामर्श भी वह इसलिए मानते व सुनते थे क्योंकि वह नर रूप में नारायण थे| ज्योति स्वरूप परमब्रह्म  का रूप होते हुए भी नर की ही भाँति सोच और विचार कर रहे थे| वह तो सब जानते थे कि क्या होने वाला है? सत्य क्या है? इसलिए उन्होंने आदर सहित विभीषण को ले आने के लिए कह दिया| जब विभीषण प्रभु श्री राम जी के सम्मुख पहुँचे तो उनके दिव्य रूप को देखकर भक्त विभीषण की आँखों से प्रेम आँसू बह निकले| दंडवत किया, स्तुति की| श्री राम जी ने विभीषण को गले से लगाया| लक्ष्मण सहित अपने पास ही बिठा लिया| उसकी और उसके परिवार की कुशलता पूछी और फिर देखिये – विभीषण को लंकेश कह दिया| ऐसा कोई साधारण व्यक्ति नहीं कर सकता| दिव्य व्यक्ति ही कर सकता है| भयहारी ने उसके सकल भय दूर कर दिए| प्रभु श्री राम जी की शरण में जाने से विभीषण की समस्त चिंताये छूट गई, क्योंकि उसने ‘मैं’ को त्याग दिया था| किसी की शरण में तब ही जाया जाता है, जब मैं को तितालांजलि दी जाती है| ‘मैं ‘ के रहते अधीनता नहीं स्वीकार की जा सकती| जब वह प्रभु श्री राम जी के शरण में चला गया, उसके मन में रावण का भय खत्म हो गया उसकी चिंताएँ और भय को प्रभु ने अपने ऊपर ले लिया था| इसी प्रकार गुरुदेव भी अपने शिष्य को चिंता मुक्त कर देते है बात तो केवल शरण में आने की है, दीन-हीन बनने की है, झुकने की है, अपना आप त्याग करने की है, गुरुदेव का बनने की है|

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अंगद को लंका में दूत बना कर भेजना

कहते हैं भगवान श्री राम जी ने अंगद को दूत बना कर रावण के पास भेजा| जब अंगद रावण के पास पहुँचा तब रावण ने पूछा, तू कौन है? और कहाँ से आया है? अंगद जी बोले, हे रावण मैं श्री राम जी का दूत हूँ, मेरा नाम अंगद है और मैं बाली का पुत्र हूँ| मेरे पिता और आपके बीच मित्रता रही है, इस कारण आपकी भलाई के लिए यहाँ आया हूँ| हे राक्षस राज, अभिमान व मोह को छोड़कर मेरा कहना मानो| नगरवासियों के साथ अपनी रानी मन्दोदरी को संग ले चलो और आदर सहित जानकी जी को आगे करके भगवान श्री राम जी के चरणों में चलकर विनती करो कि हे दीनानाथ, अब मेरी रक्षा करो| मेरा पक्का विश्वास है भगवान बड़े दयालु है| वे तुम्हारे ये वचन सुनते ही तुम्हारे सब अपराध माफ़ करेंगे और तुम को अभय करेंगे| अंगद के वचन सुनते ही रावण गुस्से से बोला, अरे बंदर! मुँह संभाल कर बोल| तू जानता नहीं मैं रावण हूँ और जिसका तू पुत्र है, उसको भी मैं जानता हूँ कि वह एक वानर था और उसका पुत्र होकर तू तो अपने कुल का नाशक पैदा हुआ| जो ऐसे वीर का पुत्र होकर तपस्वियों का दूत कहलाया| अब कुशल कहो, बाली कहाँ है? यह रावण ने एक प्रकार से ताना दिया| तब अंगद हँस कर बोला| दस दिन बीतने पर बाली के पास जाकर अपने सखा को हृदय से लगाकर कुशल पूछना| राम जी से वैर करने पर जैसा कुशल होता है, सो तुमको वही सुनाऐगा| हे रावण! तुमने मुझे कुलघातक कहा है, शिवजी, ब्रह्मा, देवता, मुनि ये सब जिस प्रभु की सेवा करना चाहते हैं, उस प्रभु का दूत होकर मैंने कुल को डुबो दिया, ऐसी बुद्धि होने पर भी तेरा हृदय फट क्यों नहीं जाता? रावण बार-2 अपने बल की सराहना करता है| और श्री राम जी को बलहीन कहता है| रावण के कठोर वचन अगद जी सहन न कर सके| बोले, ऐ घमंडी रावण, मैं रघुनाथ जी के सेवक सुग्रीव का दूत हूँ और अपने मालिक की आज्ञा का पाबंद हूँ| उसका डर है वरन् तेरे देखते ही ऐसा कौतुक करूँ जो तू याद रखे| जब रावण ने श्री राम चन्द्र जी के बारे में गलत कहा तब अपने इष्टदेव की निंदा सुनकर अंगद जी ने क्रोधित होकर दोनों हाथों को बड़े जोर के साथ  पृथ्वी पर दे मारा| पृथ्वी हिल गई और सभा में बैठे हुए रावण समेत सब ओन्धे मुख गिर पड़े| रावण के दशों मुकुट भी धरती पर आ गिरे| रावण संभल कर उठा तो कुछ मुकुट तो उसने अपने सिरों पर रख कर संभाल लिए और कुछ अंगद जी ने अपने प्रभु के पास फैंक दिए| मुकुटों  को आता देखकर वानर भागने लगे कि हे विधाता! क्या दिन में ही तारे टूटने लगे है या रावण ने क्रोध कर वज्र फैंके हैं जो बड़े वेग से दौड़े चले आते हैं| तब भगवान हँस कर बोले, डरो मत ये रावण के मुकुट है और अंगद के फैकने से आ रहे है| तब हनुमान जी ने उछल कर उन मुकुटों को हाथ से पकड़ लिया| और प्रभु के पास ला रखा वे सूरज के प्रकाश के समान थे| रीछ वानर सब तमाशा देखने लगे| उधर रावण के दरबार की कथा सुनो| रावण क्रोधित होकर कहने लगा, इस वानर को पकड़ कर मार डालो, भाग कर जाने न पाए तब अंगद ने क्रोध कर भगवान का स्मरण करते हुए अपना पाँव धरती पर जमा लिया| हे रावण, तेरी सभा में से कोई भी योद्धा मेरे पाँव को धरती से हिला सके तो मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि सीता हार दी, श्री राम जी वहीं से वापिस लौट जाएँगे| तब रावण कहने लगा, सुनो मेरे शूरवीरों, इस वानर का पाँव पकड़ कर पृथ्वी पर पछाड़ दो| मेघनाथ आदि अनेक बलवान योद्धा प्रसन्न होकर वहाँ उठ खड़े हुए| बल और अनेक उपाय करके अंगद जी के पाँव पर झपटते हैं परन्तु पाँव नहीं हिलता| जब सब राक्षस हार गए, तब रावण आप उठा और अंगद जी के पाँव को पकड़ने लगा|

तब अंगद ने कहा, अरे रावण, मेरे पाँव पकड़ने से तेरा कल्याण नहीं होगा| तेरा उद्धार का सीधा रास्ता यह है कि श्री राम के चरण पकड़ कर उनसे क्षमा माँग| यह सुनते ही रावण लज्जित होकर वापिस लौटा| जैसे दोपहर में चन्द्रमा की शोभा जाती रहती है ऐसी ही रावण भी तेजहीन हो गया| सिर नीचा करके सिंघासन पर ऐसे बैठा रहा, मानो सब कुछ खो बैठा| कागभुशुण्डि जी गरुड़ जी से कहते हैं कि भगवान की भक्ति से विमुख रहने पर जीव की ऐसी ही दशा हो जाती है

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गरुड़ जी द्वारा नागपाश काटना

कहते हैं जब राम जी ने मेघनाद के द्वारा अपने आपको नागपाश  में बंधा लिया, तब उस समय फिरते-2 नारद जी वहाँ आ पहुँचे| उन्होंने देखा कि भगवान श्री राम जी सहित सारी सेना नागपाश में फँस गई है| नारद जी तुरंत बैकुण्ठ गए और उन्होंने गरुड़ जी को नागपाश काटने के लिए भेजा | जैसे ही गरुड़ जी युद्ध भूमि पर पहुँचे तो उनको देखकर सब साँप वहाँ से भाग गए| गरुड़ जी ने आकर नागपाश तो काट दी और सभी को बंधन मुक्त कर दिया परन्तु उनके मन में भारी विषाद उत्पन्न हो गया| श्री राम जी को बंधन मे देखकर उनके मन मे कई प्रकार के संशय आ गए| कहते हैं माया सब को नचाती है गरुड़ जी के मन में अनेकों सवाल दौड़ने लगे| अपने मालिक के प्रति मन में अनेकों तर्क वितर्क बढ़ने से अति व्याकुल हो गए| इसी अवस्था में वे नारद जी के पास गए और अपनी व्याकुलता के बारे में नारद जी को बताया| नारद जी ने कहा कि इस माया ने मुझे भी अनेकों बार नचाया है, मेरे विचार से आप ब्रह्मा जी के पास जाइये और वे जो आज्ञा दे वैसा करिए| यह सुनकर वे ब्रह्मा जी के पास गए| जब वे ब्रह्मा जी के पास पहुँचे तो अपने संशय को उनके सामने सुनाया, तब ब्रह्मा जी ने फरमाया कि हरि की माया अति प्रबल है, कई बार मैं भी इसके अंदर फँस चुका हूँ, आप भगवान शिव जी के पास जाये, वे आपकी मदद करेंगे| यह सुनकर गरुड़ जी भगवान शिव जी के पास पहुँचे जब वे भगवान जी के पास पहुँचे तो भगवान शिव जी उस समय कही जा रहे थे| तब  गरुड़ जी ने उनसे विनती की कि प्रभु मेरे संशय को दूर करो तब शिव जी ने उन्हें कहा कि यह संशय तभी दूर होगा जब आप सत्संग सुनेगे, भगवान की लीलाओं को श्रवण करेंगे| इसलिए आप को मैं ऐसी जगह भेजता हूँ, जहाँ आपको सत्संग मिलेगा और आपका संशय भ्रम दूर हो जायेगा| भगवान शिव जी ने उन्हें कागभुशुण्डि जी के आश्रम में भेजा| जहां जाकर उन्हें सत्संग मिला जिससे कि उनका संशय-भ्रम दूर हो गया|

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हनुमान जी का भरत जी से मिलाप

कहते हैं जब हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर राम जी के पास जा रहे थे, तो रास्ते में भरत जी ने  देखा कि कोई व्यक्ति पूरा पहाड़ उठा कर ले जा रहा है तो उन्होंने समझा कि कोई गलत काम हो रहा है और अपने तीर कमान से तीर चला दिया| वो तीर हनुमान जी को लगा और वह नीचे आ गए और नीचे आकर बोलने लगे जय श्री राम| भरत जी को पता चला कि ये तो श्री राम जी के भक्त लगते है| तब उन्होंने उनका परिचय पूछा, तब हनुमान जी ने सारा हाल सुनाया कि लक्ष्मण जी कैसे मूर्छित हो गए है? उनके प्राण संकट में है| यह सुनकर भरत जी रोने लगे और पूरे अयोध्या में यह खबर फैल गई| चारों ओर शोक का माहौल उत्पन्न हो गया इस बात का लक्ष्मण जी की पत्नी उर्मिला को भी पता चला लेकिन उसने जरा सा भी शोक नही जताया| तब भरत जी ने उनसे पूछा कि उर्मिला तुम्हें पता है कि लक्ष्मण के प्राण संकट में है फिर भी तुम्हें इस बात का दुःख नहीं है| तो उर्मिला ने हनुमान जी से पूछा कि लक्ष्मण जी को क्या हुआ है और अब वे कहाँ है? तो हनुमान जी ने बताया कि उन्हें तीर लगा है और अब वे राम जी की गोद में लेटे हुए है और श्री राम जी उन्हें देख-देख कर रो रहे हैं|

तब उर्मिला ने कहा कि हनुमान जी एक बात बताओ जिसको तीर लगता है वह रोता है या सोता है तो हनुमान जी ने कहा जिसको तीर लगता है वो तो रोता है दर्द से, तो उर्मिला ने कहा तो बताओ कि रो कौन रहा है और सो कौन रहा है? हनुमान जी ने कहा कि राम जी रो रहे है लक्ष्मण जी सो रहे है| तो उर्मिला ने कहा कि इसका मतलब दर्द श्री राम जी को हो रहा है| जो वो रो रहे है| उर्मिला ने कहा कि जिसके सिर पर तीनों लोकों के मालिक श्री राम जी का हाथ हो उसको भला कुछ हो सकता है? लक्ष्मण तो श्री राम प्रभु की गोद में थोड़ी देर के लिए विश्राम कर रहे हैं| उर्मिला का ऐसा विश्वास देखकर सब हैरान रह गये|

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श्री राम जी व लक्ष्मण जी का हरण

अहिरावण पाताल में राज्य करता था| वह रावण की भाँति महा बलवान, योद्धा और राक्षसी माया को जानने वाला बहुत ही छल बलिया था| वह देवी का पुजारी भी था, और हर वर्ष देवी का यज्ञ करता था, जिसमे मनुष्य का बलिदान दिया जाता था| देवी से उसने बड़े वरदान प्राप्त कर रखे थे| वह पाताल में राक्षस कुल का तिलक था| रावण ने सोचा  इस कष्ट के समय अहिरावण की सहायता लेनी चाहिए| उसको याद किया, तब अहिरावण भी आ गया| उसने आते ही रावण से पूछा जो मेरे योग्य सेवा हो मैं उसे करने के लिए तैयार हूँ| रावण ने उसको सीता हरण से ले कर इस समय तक के सारे समाचार सुनाये| ऐ भाई! राक्षसी सेना मर चुकी है पुत्र मेघनाथ और भाई कुम्भकर्ण जैसे योधा भी राम लक्ष्मण ने मार दिए है| मुसीबत की घड़ी में मेरी सहायता करो| वह बोला कोई बात नहीं मैं अपनी माया के छल से राम लक्ष्मण दोनों भाईयों को हर कर पाताल में ले जाता हूँ| वहाँ इन दोनों को देवी की भेंट कर दूँगा| यह सुनकर रावण प्रसन्न हो गया| अँधेरी रात का समय था| अहिरावण रावण को प्रणाम कर श्री राम जी की सेना में पहुँचा| हनुमान जी पहरा दे रहे थे तथा श्री राम जी, लक्ष्मण सहित सब सेना सो रही थी| अहिरावण विभीषण के रूप में अंदर चला गया| हनुमान जी ने यह जानकर कुछ न कहा कि विभीषण जी अपने साथी है| अंदर जा कर अहिरावण ने दोनों भाईयों को उठाया और आकाश मार्ग से पाताल ले गया| प्रात: होते ही वानरी सेना जब जागी तो श्री राम लक्ष्मण दोनों भाईयों को न पाकर अति व्याकुल हो गई| जैसे माता पिता के बिना अनाथ बच्चे रोते हैं ऐसे ही सब वानर रोने लगे| जैसे बिना जल के नदी, बिना चन्द्रमा के रात, बिना सूर्य के दिन, बिना जीव के देह और बिना दीपक के घर दिखाई देता है, सारी सेना की ऐसी अवस्था हो गई| एक से एक पूछने लगे कि त्रिलोकी के नाथ कहाँ गए? सब योद्धा ऐसे दुखी हुए जैसे जल के बिना जल के जीव दुखी हो जाते हैं| सब कहते हैं कि श्री राम लक्ष्मण दोनों भाई कहाँ हैं? ऐसा कहते ही दुखी और मुर्छित होकर गिर पड़े| विभीषण की दशा तो कही नहीं जाती| हनुमान और जामवंत भी बड़े दुखी थे| काकभुशुण्डि जी कहते हैं – ऐ गरुड़ जी| उस समय वहा महा घोर अन्धकार छा गया| किसी को कुछ दिखाई नहीं देता था| फिर सब मिल कर हनुमान जी के पास गए कि तुम रात को पहरे पर थे कोई शत्रु तुम्हारे सामने बाहर से अंदर तो नहीं आया? हनुमान जी ने कहा, मैं रात भर जागकर पहरा देता रहा| कोई शत्रु मैंने अंदर आते नहीं देखा| केवल विभीषण एक बार बाहर से अंदर आये| मैंने यह समझ कर उनको कुछ नहीं कहा कि किसी कार्यवश बाहर गए होंगे| विभीषण जी घर के भेदी थे, विभीषण जी तत्काल बोल उठे- बस पता चल गया| श्री राम लक्ष्मण दोनों भाईयों को अहिरावण पाताल ले गया है| क्योंकि संसार में अहिरावण के बिना मेरे रूप को कोई धारण नहीं कर सकता| वह बड़ा बलवान है और बहुत सी माया के छल बल जानता है निश्चय ही रावण ने उसको भेजा होगा| वह हर वर्ष देवी का यज्ञ करता है और उसमे मनुष्य की आहुति देता है| अगर किसी में बल हो तो पाताल में जाए और अहिरावण को जीत कर दोनों भाईयों को ले आये| तब जामवंत जी बोले, ऐ हनुमान! यह काम तुम्हारा है| विभीषण की बात सुनकर मुझे संदेह होता है कि देर करने पर समय हाथ से निकल ना जाए| तुम शीघ्र जाओ और शत्रु को मार कर दया के समुन्द्र दोनों भाईयों को ले आओ| यह कारज तुम्हारे बिना और कोई नहीं कर सकता| यह सुनकर हनुमान जी बोले- सब भाई चित्त को स्थिर करो और सेना चलायमान न होने पावे| चौदह भुवनों और तीनों लोकों से भी भगवान को ढूँढ कर लाऊँगा| तुम शोक को छोड़ दो, पीछे सब सावधान रहना| यदि काल भी चढ़ आवे तो उससे भी लड़ना| यह कहकर हनुमान जी प्रलय काल के बादल के सामान गरज कर चले| दृढ़ विश्वास तथा दृढ़ भावना से काम करने वाले की कुदरत सहायक बन जाती है और रस्ते आप से आप खुल जाते हैं| हनुमान जी जाते वक्त एक वृक्ष के नीचे गए, वहाँ गीध और गिधानी परस्पर बाते कर रहे थे की अहिरावण श्री रामचंद्र जी को पाताल में ले गया है वह जाकर उन्हें देवी को बलिदान देगा| देखिये क्या बनता हैं? हनुमान जी ने उनकी बातों को सुना और शीघ्र ही पाताल में पहुँच कर छोटा सा रूप धारण कर अहिरावण के नगर में घूमते हुए देवी के स्थान पर जा पहुँचे और मंदिर में प्रवेश किया| चरण छूते ही देवी की मूर्ति तो पृथ्वी में समा गई और हनुमान जी उसकी जगह पर भयंकर रूप बनाकर मुँह खोलकर खड़े हो गए| दर्शन पाने वाले राक्षसों के समूह अति प्रसन्न थे की अहिरावण बड़ा भाग्यशाली है जो राम लक्ष्मण को देवी की बलि देने को लाया तो देवी साक्षात् प्रकट हो गई| पहले तो यह होता था की इस अवसर पर राक्षस लोग देवी की पूजा कर उसे जो भी भोग लगवाते थे उसे घरों में ले जाकर बाँट कर खाते थे| परन्तु अब की देवी तो पहली देवी नहीं थी| राक्षस लोग जब पूजा करके भोग लगाते तो हनुमान जी मेवा, पकवान, मिठाई जो कुछ भी आता सब खा जाते, बचाते कुछ नहीं| अहिरावण अपने मन में इसलिए प्रसन्न था की उसका यज्ञ सिद्ध हुआ जो साक्षात् देवी प्रकट हो गई| तब लक्ष्मण और श्री रामचंद्र को वहाँ ले आया और देवी के मंदिर के सामने लाकर खड़ा किया| मंत्रिमंडल और सब योधा राक्षस उसके साथ थे| हाथ में तलवार ली और यो कहने लगा की तुम्हारा जो कोई भी हो उसको याद कर लो| किसी को बुलाना हो तो बुला लो, तुम्हारा काल आ गया है| काकभुशुण्डि जी कहते हैं, ऐ गरुड़ जी! प्रभु की लीला का क्या वर्णन किया जाए| लक्ष्मण जी भगवान की ओर देखते हैं और भगवान लक्ष्मण की ओर देखते है| ऐ लक्ष्मण! अहिरावण कह रहा है जिसका स्मरण करना हो कर लो| सारा संसार तो हमारा स्मरण कर रहा है हम किस का स्मरण करे? सो हम अपने भक्तों का स्मरण करेंगे| सुनते ही हनुमान जी बादल के सामने गरजे और अहिरावण के हाथ से तलवार छीन कर राक्षसों के नाक, कान और भुजाओं तथा सिरों को काट -2 कर अग्निकुंड में डालने लगे| अपनी पूँछ का परकोट किला बनाया जिससे कोई भाग ना जाए| इस प्रकार सब राक्षस मार डाले| पीछे अहिरावण का सिर काट कर अग्नि में डाला और देवी की पूर्णाहुति दे कर दोनों भाईयों को कंधे पर बिठा कर ले चले और अपनी सेना में आ पहुँचे| श्री राम और लक्ष्मण के दर्शन पाकर वानरी सेना की जान में जान आई और जय जयकारो से आकाश गूँज उठा| फिर सब हनुमान जी से मिलकर कहने लगे, हे तात! तुमने सबके प्राण बचाए, उस समय आकाश से देवताओं ने पुष्प वर्षा की| यदि कोई प्रश्न करे कि यह कैसे भगवान हैं, जिनको एक राक्षस हर कर पाताल में ले जाता है और हनुमान जी उनको छुड़ा लाते हैं| इसका उत्तर केवल एक है की यह मनुष्य लीला है और इस मनुष्य लीला में कुदरत के कई भेद छिपे थे| अगर ऐसा न होता तो राक्षसों का नाश कैसे होता| इसी प्रकार अनेक राक्षसों के समूह जो जहाँ तहाँ पृथ्वी पर रहते थे, वे किसी न किसी कारण से इस अवसर पर युद्ध में बुलवाये गए या स्वयं आये और श्री राम रावण के युद्ध में सब मारे गए| श्री रामचंद्र जी महाराज का अवतार धरती से पाप नाश करने के लिए पूरा होना था, चाहे कारण कोई भी बन जाए| अंत में रावण भी सेना सहित मारा जाता है और सच्चाई की जीत होती है|

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युद्ध की निती

लंका का राजा रावण अपने समय में वेदों-शास्त्रों का महान ज्ञाता था| यद्यपि वह अहंकार के वशीभूत होकर पथ भटक गया और अधर्मी एवं अत्याचारी बन गया था, जिसका फल भी उसको भुगतना पड़ा, तथापि इसमें कोई दो मत नहीं कि वह वेदों और नीति शास्त्र का महान ज्ञाता था| कहते हैं कि जब वह युद्ध भूमि मे मरण अवस्था में पड़ा हुआ अंतिम स्वास गिन रहा था, भगवान श्री राम चन्द्र जी ने लक्ष्मण जी को अपने निकट बुलाकर फरमाया रावण नीति शास्त्र का मुख्य ज्ञाता है, अतैव उसके पास जाओ और युद्ध का नीति ज्ञान प्राप्त करो| रावण नीति शास्त्र का ज्ञाता है यह सुनकर लक्ष्मण जी को बड़ा आश्चर्य हुआ, परन्तु भगवान का आदेश था, इसलिए वह रावण के पास गए और उसके सिर की ओर खड़े होकर बोले- रावण, मैं श्री राम जी का छोटा भाई लक्ष्मण तुमसे युद्ध की नीति का ज्ञान प्राप्त करने आया हूँ| मुझे कुछ इस विषय में बताओ| रावण ने आँखे खोली, लक्ष्मण जी को देखा और पुन: आँखे बंद कर ली| लक्ष्मण जी ने दो- तीन बार अपनी बात दोहराई, परन्तु रावण ने उत्तर तो क्या देना था? उनकी ओर देखा तक नहीं| लक्ष्मण जी निराश होकर वापिस लौट आये| भगवान श्री राम चन्द्र जी ने पूछा रावण ने क्या उपदेश दिया? लक्ष्मण जी बोले- वह बड़ा अहंकारी है| यद्यपि मरने के निकट है, फिर भी अहंकार अभी तक उसके सिर पर सवार है| दो-तीन बार कहने पर भी उसने मेरी बात का कोई उत्तर नहीं दिया| भगवान श्री रामचंद्र जी ने पूछा –तुम उसके पास कैसे गए और किस प्रकार तुमने अपनी जिज्ञासा उसके समक्ष रखी सो सब हमें बताओ? तब लक्ष्मण जी ने सब वृतांत सुनाया| भगवान श्री राम जी ने पूछा ‘तुम खड़े किस ओर हुए थे?’ लक्ष्मण जी बोले- उसके सिर की ओर|’ यह सुनकर भगवान श्री राम जी ने, जो स्वयं नीति निधान थे, फरमाया- लक्ष्मण| गलती तुम्हारी है, तुम जिज्ञासु बनकर रावण के पास ज्ञान प्राप्त करने गए थे, परन्तु यह पूरी तरह से भूल गए कि जिज्ञासु का कर्तव्य क्या है? नीति अनुसार तुम्हारा धर्म यह था कि उसके चरणों की ओर खड़े होकर विन्रमता पूर्वक पूछते|

अब ऐसा करके देखो, लक्ष्मण जी पुन: वहाँ गए, जहाँ रावण मरण अवस्था मे पड़ा था और उसके पैरों की ओर खड़े होकर तथा हाथ जोड़कर विनम्रता पूर्वक बोले- श्री रामचंद्र जी का अनुज लक्ष्मण आपको प्रणाम करता है| मुझे नीति शास्त्र का कुछ ज्ञान दीजिए| रावण ने आँखे खोली, संकेत से लक्ष्मण को अपने निकट बैठने को कहा फिर उसे नीतिशास्त्र के विषय में उपदेश दिया| अभिप्राय यह है कि जब कोई मनुष्य किसी के पास ज्ञान प्राप्ति की अभिलाषा से जाता है, तो उसका कर्तव्य हो जाता है कि उसके पास जिज्ञासु बनकर जाए और उसका पूरा- पूरा सम्मान करे| उसके समक्ष हाथ जोड़कर खड़ा हो और अत्यंत विनम्रता पूर्वक अपनी जिज्ञासा उसके सम्मुख प्रकट करे|

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लंका की स्त्रियों की विनय

जब श्री राम जी ने रावण का वध कर दिया और सब राक्षसों का नाश कर दिया, तो लंका में केवल बच्चे और स्त्रियाँ रह गये| वे श्री राम जी के पास गए कि प्रभु अब हमारा वंश कैसे चलेगा| स्त्रियों ने कहा कि हमारे पति तो राजा की तरफ से लड़ रहे थे और अपना धर्म निभा रहे थे| श्री राम जी ने उन्हें अमृत कलश दिया और फरमाया कि आप यह अमृत अपने -2 पतियों की मृतक देह को पिला दें| जिनका भी जन्म मरण का चक्र चल रहा होगा| वे सब जीवित हो जायेंगे| स्त्रियों ने ऐसा ही किया लेकिन कोई भी जीवित न हुआ| वो निराश होकर श्री  राम  जी के पास गए ये कहने कि कोई भी जीवित न हुआ| तब श्री राम  ने कहा कि हमने कहा था कि जिसका भी जन्म-मरण का चक्र होगा वह जीवित होगा| पर पूरी राक्षस सेना लड़ तो रावण की तरफ से रही थी| लेकिन सबका ध्यान हमारी ओर था| सब जानते थे कि श्री राम जी साक्षात् भगवान है और वे ही जीतेंगे तो अंत समय में जो मेरा ध्यान करेगा वो अमर पद को पायेगा और मेरे धाम सचखंड में जायेगा| इसलिए कोई भी जीवित न हुआ| तो कहने का मतलब है जो अंत समय मालिक को याद करता है वह मोक्ष पद को पाता है तो जो हर समय मालिक को याद करेगा भगवान उसकी रक्षा हमेशा ही करेंगे|

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