भक्त
पीपा जी
भक्त
पीपा जी की कथा है| उनका जन्म गागरों जात के एक राजपूत घराने में हुआ था| इनके
जन्म के विषय में कोई प्रमाणिक तिथि नहीं मिलती, परन्तु इतना उल्लेखनीय है कि इनका
जन्म विक्रमी सम्वंत 1460 में अर्थात आज से लगभग 600 वर्ष पूर्व हुआ था| युवा होने
पर वह गागरों के राजा बने| राजा पीपा देवी के उपासक थे और अपनी उपासना से इन्होने
देवी को इतना प्रसन्न कर लिया था कि देवी साक्षात प्रकट होकर इन्हें दर्शन देती
थी| इसके साथ-2 वह साधु-संतो की सेवा भी अत्यंत प्रेम से किया करते थे| एक बार एक
साधु-मंडली गागरों आई| राजा ने उनका बड़ा आदर सत्कार किया | राजा के अतिथि सत्कार
से साधु-मंडली बड़ी प्रसन्न हुई तो मंडली के महंत ने कहा- “राजन
| हम तुम्हारी सेवा-
भावना से अति प्रसन्न हैं| तुम किसी पूर्ण महापुरुष से गुरु दीक्षा लेकर भजन –
सुमिरन की कमाई भी किया करो| जिससे की तुम मुक्ति पद को प्राप्त कर सको| राजा ने
उत्तर दिया- “मैं देवी का उपासक
हूँ और देवी मुझसे हर तरह से प्रसन्न है, वही मुझे इस सांसारिक बंधन से मुक्त
करेगी|”
महंत ने कहा- “राजन, सुनो| जब देवी प्रसन्न होती है तो धन-
पदार्थ तथा भाग्य प्रदान करती है| मुक्ति तो केवल सतगुरु की कृपा से प्राप्त होती
है| उनके मार्गदर्शन में जब मनुष्य भजन भक्ति की कमाई करता है, तभी वह मुक्ति पद
को प्राप्त करता है|”
राजा को यह बात अच्छी नहीं लगी, यह बात महंत ने जान ली और बात को टालते हुए हँसते
हुए बोले- “राजन,
रुष्ट मत हो| जब देवी तुम्हे दर्शन दे तो स्वयं ही देवी से पूछ लेना|”
राजा के जाने के बाद साधु मंडली ने परमेश्वर
के चरणों में प्रार्थना की- ‘हे प्रभु राजा को अपने चरणों में लगाओ और उसे
अपनी भक्ति प्रदान करो|’ राजा पीपा अपने विश्रामग्रह में चले गए, परन्तु आधी रात
तक उन्हें नींद न आई| महंत के वचन उनके कानों में अब भी गूँज रहे थे| आधी रात के
बाद जैसे ही राजा की आँख लगी, उन्होंने एक भयानक सपना देखा| वह देखते है कि एक अति
भयानक प्रेत उनके सीने पर चढ़ कर उनका गला दबा रहा
है| राजा भय से पसीने -2 हो गया और उसकी आँख खुल गई| भय अभी भी उनके मुख पर
स्पष्ट झलक रहा था| वे देवी का स्मरण करने लगे| तभी देवी वहाँ प्रकट हुई और उन्हें
भयभीत देखकर उनके सर पर हाथ रखते हुए तथा उन्हें आश्वस्त करते हुए बोली- “हे
पुत्र, तू आज इतना भयभीत और शोकातुर क्यों है? किसने तुझे दुःख दिया है? मुझे बता,
मैं अभी उसका नाश करती हूँ|”
राजा ने दोनों हाथ जोड़कर देवी को प्रणाम किया| तभी महंत के वचन उनके हृदय में फुर
आये| उन्होंने देवी से विनती की – “हे
माता, यदि आप मुझ पर प्रसन्न है तो मुझे मुक्ति का वरदान दीजिए| देवी बोली- “हे
पुत्र, संसार की जो वस्तु तू चाहे, मैं तुझे दे सकती हूँ| किसी राज्य पर विजय पाना
चाहे तो उसका वरदान दे सकती हूँ, धन- धान्य, भाग्स्वरी के सम्मान , संतान आदि
संसार की जो वस्तु तू चाहे, वह सब कुछ दे सकती हूँ, परन्तु तेरे हृदय में यह जो
मुक्ति की कामना पैदा हुई है, तेरी यह कामना मैं पूरी नहीं कर सकती|”
राजा बोले – “मुझे केवल मुक्ति
का वरदान चाहिए, अन्य किसी वस्तु की मुझे चाह नहीं है|”
देवी ने कहा – “संसार बंधन से
मुक्त करने की सामर्थ्य समय के पूर्ण संत
सतगुरु में होती है| मुक्ति प्रभु की भक्ति से प्राप्त होती है अथवा ज्ञान से, और
इन दोनों की प्राप्ति सतगुरु से होती है वे ही भक्ति तथा ज्ञान के दाता है| इसलिए
राजन, तुम स्वामी रामानंद जी की शरण में जाओ और उन्हें गुरु धारण करो क्योंकि वे इस समय के पूर्ण महापुरुष है, उनकी
कृपा से ही तुम्हारी मुक्ति की अभिलाषा पूर्ण होगी| इसके बाद वे श्री रामानंद जी
की शरण में गया और मुक्तिपद को प्राप्त कर जन्म सफल किया|
*****
गुरु
चरणामृत
राजा पीपा जी का
नाम आप सभी ने सुना ही होगा। वह एक राजा थे जो कि बाद में उच्च कोटि के महात्मा बन
कर उभरे।
राजा पीपा जी को
अध्यात्म में गहरी रूचि थी । एक दिन राजा पीपा ने अपने मंत्री से किसी उच्च कोटि
के महात्मा का पता करने को कहा तो मंत्री ने बताया कि "अपने ही राज्य में एक
महात्मा हैं, अगर आप कहें तो
उन्हें दरबार में हाज़िर होने की आज्ञा भिजवा दी जाए ?"
"क्या
नाम है उनका?"
"उनका
नाम रविदास है, पर........"
"पर
क्या?"
"जी, वो चमड़े का काम करते हैं, अपने हाथ से जूते गांठते हैं, लोग बताते हैं कि बहुत ऊंची हस्ती है
उनकी, अगर आप आज्ञा दें
तो उन्हें दरबार में हाज़िर होने का हुक्म भिजवा दिया जाए?" "नहीं, किसी महात्मा को हुक्म नही करना चाहिए, उनके पास खुद चल कर जाना चाहिए "।
राजा पीपा जी रविदास जी के पास जाने की सोचने लगे, पर एक उलझन में फस गये, उलझन ये थी कि पीपा खुद एक राजा थे और
रविदास जी चमड़े का काम करते थे। अब कैसे जाएँ, सोचते हैं कि लोगों को पता लगेगा तो
लोग क्या कहेंगे कि राजा होकर एक जूते गांठने वाले के आगे सिर झुका दिया। बहुत
हँसी होगी। अब
राजा पीपा जी ने बीच का रास्ता निकाला कि उस समय जाए जब कोई देखने वाला न हो। उन्हें
रविदास जी के पास जाने के लिए सांझ का समय ठीक लगा, सो एक दिन सांझ को वे चुपचाप अकेले ही
रविदास जी की कुटिया पर पहुँच गये। रविदास जी उस वक्त जूते गाँठ रहे थे। पास ही एक
बड़े से बर्तन में पानी भरा हुआ था जिसमे चमड़ा भिगो कर रखा हुआ था। रविदास जी ने
राजा पीपा को आने का कारण पूछा तो पीपा जी जवाब दिया, "मुझे सत्य की तलाश है, मैं हर हाल में प्रभु को पाना चाहता
हूँ, कृप्या मुझे अपना
शिष्य कबूल करें।"
रविदास
जी ने पीपा जी की तरफ गौर किया तो उन्हों ने पाया कि राजा तो सच में ही सत्य का
जिज्ञासु था| राजा एक तो न्याय
प्रिय था, दयालुता से भरा हुआ
था और वह खुद चल कर आया था । रविदास जी सोचने लगे कि राजा है तो दीक्षा के काबिल
पर इसके पास इतना समय ही न होगा कि यह भजन बन्दगी कर सके। रविदास जी सोचने लगे कि क्यों
ना राजा को सीधा ही सतलोक(सचखंड) में प्रवेश दे दिया जाये। रविदास जी ने कहा, "राजन, हमने आपको अपना शिष्य कबूल किया, यह लो चरणामृत"। इतना कहते हुए
रविदास जी ने बर्तन, जिसमे चमड़ा भिगो
रखा था में से थोड़ा सा पानी निकाल कर राजा पीपा जी की हथेली पर उंडेल दिया और उसे
ग्रहण करने को कहा । राजा पीपा जी अपनी हथेली को मुख तक ले गये और रविदास जी से
आँख बचा कर अपने कुर्ते की आस्तीन में उंडेल दिया। रविदास जी से कुछ भी छिपा न था
चाहे वे उस वक्त जूते गाँठ रहे थे। राजा पीपा जी घर(अपने महल) आये, कुरता उतार कर रानी को दिया। रानी ने
देखा कि कुर्ते की बाजू की कोहनी वाले स्थान पर दाग लगा हुआ था। अगले दिन सुबह
धोबी आया और धोने वाले कपड़े लेकर
चल दिया। रानी ने उसे दाग दिखाते हुए अच्छी तरह दाग साफ़ करने का निर्देश दिया।
धोबी ने काफी कोशिश की पर दाग नही छूट रहा था। धोबी की दस बरस की बेटी पास खड़ी सब
देख रही थी। उसने अपने पिता के हाथ से कुरता लिया और दाग वाली जगह को मुख में ले
कर चूसना शुरू कर दिया। बच्ची का मकसद दाग साफ़ करना था। पर यह क्या, कुछ ही पलों में लड़की बेहोश सी हो गयी।
बच्ची को होश में लाया गया । होश में आते ही बच्ची ने ज्ञान उपदेश की बातें शुरू
कर दीं। बच्ची अंतर के भेद इस प्रकार से खोल रही थी जैसे कोई उच्च कोटि की महात्मा
हो। देखते ही देखते भीड़ लग गयी। सभी उसकी बातें बहुत गौर से सुनने लग गये। अब यह
सिलसिला रोज़ का हो गया। बच्ची को सुनने के लिए लोग दूर दूर से आने लग गये। राजा को
भी खबर लगी। राजा अध्यात्मिक प्रवृत्ति का तो था ही। राजा पीपा ने भी बच्ची के
दर्शन दीदार की सोची। सो एक दिन पीपा जी भी बच्ची का दीदार करने पहुँच गये। बच्ची
को राजा ने नमस्कार किया तो बच्ची ने कहा,
"राजन, आप मुझे क्यों नमस्कार कर रहे हो, मैं आपको नमस्कार करती हूँ क्योंकि जो
कुछ मुझे आज मिला, आपकी कृपा से ही
मिला है।"
पीपा जी ने पूछा, "मैंने
तो आपको पहले कभी नही देखा, फिर
आपको मुझसे कैसे मिल गया ?" बच्ची
ने सारी बात बताई कि कैसे उसे इतना ज्ञान हुआ। बच्ची ने बताया कि दाग चूसते ही उसका
सारा शरीर प्रकाशमय (भीतर से) हो गया था । उसने और भी बहुत कुछ बताया। राजा पीपा
समझ गये कि ये सारी कृपा रविदास जी की थी। पीपा जी वहाँ से सीधा रविदास जी की
कुटिया पहुँचे और अपने किये की बात बताई कि किस प्रकार से उन्होंने चरणामृत को
आस्तीन में उंडेल दिया था। पीपा जी ने रविदास जी से क्षमा मांगते हुए दोबारा कृपा
करने को कहा। रविदास जी ने जवाब में कहा,
"राजन, हमने तो आपके लिए द्वार खोल दिया था, पर आपने खुद ही प्रवेश नही किया। आपके
स्थान पर वो बच्ची प्रवेश कर गयी। राजन, अब
आपको खुद ही मेहनत करनी होगी, आप
द्वार खटखटाओ, द्वार
खुलेगा।"
राजा पीपा जी ने मेहनत की, उनकी
भजन बन्दगी को रंग लगा और वे उच्च कोटि के महात्मा बन कर उभरे । इसी लिए कहा है की
अंतर का अँधेरा दूर करने के लिए गुरु की शरण लेनी ही पड़ती है। अँधेरा दूर करने
वाले की जाति, बिरादरी, देश, धर्म इत्यादि की तरफ ध्यान नही देना
चाहिए।
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