राजा परीषित को
श्राप
एक
बार राजा परिषित जंगल से गुजर रहे
थे| वहाँ उन्होंने
शमिक ऋषि को गहरे ध्यान में बैठे देखा|
राजा परिषित ने एक मृत सांप को उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया| ऋषि – पुत्र श्रृंगी ऋषि ने क्रोध वश
राजा परिषत को श्राप दे दिया कि यही सांप आठ दिन के बाद तुम्हें डसेगा जो
प्राणघातक होगा| राजा परिषत अब
अपने किये पर पछताने लगे|
उन्होंने अपने सतगुरु की शरण में जाकर प्रार्थना की, हे प्रभु| मैंने ऋषि के प्रति पाप किया है | यदि मैं सर्प के द्वारा काटा गया तो मैं नरको में
गिरूंगा| हे प्रभु! मैं
विनय करता हूँ, मुझे बचा लो|
उनके सतगुरु शुकदेव मुनि उनकी प्रार्थना
सुनकर दया से द्रवित हो गये और उन्होंने कहा कि वे श्री महाभागवत पढ़ेगे जिसे वह
एकाग्रता से प्रार्थना में लीन होकर और शुद्ध ह्रदय से पश्चाताप करते हुए सुने| इस प्रकार आठ दिन बीत गये| अब सांप ने राजा को काटना था| लेकिन प्रार्थना के द्वारा राजा पहले
से ही प्रभु के साथ मिलकर एक हो गये थे|
इससे पहलें कि सर्प उन्हें काटे, वे अपने पांच भौतिक शरीर को त्यागकर नित्यता को प्राप्त कर चुके थे| सर्प केवल उनके मृतक शरीर को ही काट
सका| इतनी दिव्य शक्ति
है प्रार्थना और प्रायश्चित में|
प्रार्थना के द्वारा मनुष्य कर्मो के सब बन्धनों से मुक्त हो सकता है| लेकिन शर्त यह है कि उनकी प्रार्थना ह्रदय के भीतर से उठी
हुई हो |
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