राजा हरिचंद
एक हरिचन्द नाम का राजा था| उसकी रानी का नाम तारा रानी था| रानी को बचपन से ही सद् पुरुषों के वचन
सुनने की लगन थी| छोटे-से राज्य की
धार्मिक विचारों वाली रानी विवाह के पश्चात भी पूजा पाठ में लगी रहती थी| एक दिन राज भवन के निकट एक भजन मण्डली
आ गई, वह हरि कीर्तन करने
लगी| सारी रात ही कीर्तन
होता रहता| रानी को जब पता चला
तो वह भी उस कीर्तन में जाने लगी| अब यह उसका नित्य नियम था| परमात्मा का नाम ही उसके जीवन का आसरा
था| वह बिना किसी भय के
इस नेक रास्ते पर जाया करती थी| भाई गुरदास जी के
कथन अनुसार एक दिन तारा रानी जब कीर्तन सुनने गई तो बाद में राजा जाग गया| राजा धार्मिक नहीं था इसलिए
रानी का भी उसे कीर्तन में जाना अच्छा नहीं लगता था| वह सदा अपने राज कार्य में जुटा रहता
तथा धर्म-कर्म की ओर ध्यान देने के स्थान पर रंगरलियां मनाने में लगा रहता| ऐसे पुरुष प्राय: शकी स्वभाव के होते
हैं| राजा हमेशा अपनी
रानी पर शक करता रहता था| रानी जितनी नेक थी उतनी ही रूपवती भी थी| परमात्मा ने उसे सभी सुख दिए थे, वह शांति से दिन काट रही थी| जब राजा जागा तो उसने देखा कि रानी की
सेज खाली है| वह कहां गई? राजा के मन में हैरानी हुई| उसने उठ कर देखा पर रानी उसे कहीं भी न
मिली| राज भवन के
पहरेदारों से पूछा तो उन्होंने भी कुछ न बताया, क्योंकि जब रानी जाती थी तो उस समय
पहरेदारों को नींद आ जाया करती थी| वह रानी को जाते हुए नहीं देख पाते थे| यह सब भगवान की ही लीला थी| जब रानी वापिस आ गई तो राजा चुप ही रहा| उसने रानी को कुछ न पूछा| पर अगली रात को उसे नींद न आई| वह जागता रहा और उसने नजर रखी कि कब
रानी उठ कर जाती है लेकिन रानी अपने नित्य नियम अनुसार सो गई| जब अमृत के समय कीर्तन का समय आया, आधी रात बीत गई तो रानी उठी| स्नान किया, साधारण भक्ति भाव वाले वस्त्र पहने और
कीर्तन में चल पड़ी| राजा वास्तव में
सोया नहीं था| वह तो ऐसे ही आंखें
बंद करके लेटा था| जब तारा रानी चली
तो राजा ने उसका पीछा किया| रानी कीर्तन में जा बैठी, वहाँ पर हरि कीर्तन हो रहा था| वहाँ पर सब भक्त कीर्तन में अन्तर्ध्यान हुए विराजमान थे| परम शांति और प्यार का वातावरण था| राजा रानी का पीछा करते-करते कीर्तन
में पहुँच गया| वह वहाँ पर खड़ा पहले तो कुछ देर सोचता रहा, फिर रानी की एक खड़ाऊं उठा कर अपने राज
भवन में आ गया| राज भवन आकर आराम
से अपनी सेज पर सो गया| उसको दीन दुनिया का कोई ख्याल नहीं था, वह तो राज-काज, रंग-राग और माया का पुतला था| उस दिन वह सोते हुए कई स्वपन देखता रहा| कीर्तन समाप्त हुआ तथा भोग पड़ गया| जब रानी बाहर आ कर अपनी खड़ाऊं पहनने
लगी तो एक खड़ाऊं गायब थी| एक खड़ाऊं को देखकर रानी कुछ हैरान हुई कि यह कैसे हो गया? एक खड़ाऊं किसने चुरा ली है| उस समय सत्संगियों को भी पता चल गया| संगत ने अरदास की कि है पारब्रह्म!
तुम्हारा यश गान करते हुए रानी की खड़ाऊं का चले जाना भय का कारण है| तुम्हारा यश किस तरह प्रगट होगा? कोई चमत्कार दिखाओ, रानी ने राज भवन जाना है| संगत ने ऐसी अरदास की कि उसी समय
खड़ाऊं के साथ वही जो पुरानी खड़ाऊं थी, आ कर जुड़ गई| रानी तारा ने खड़ाऊं के साथ वही जोड़ी पहनी और राज भवन में आ
गई| जब वह अपने कक्ष
में गई तो राजा ने पूछा, 'रानी! आप की खड़ाऊं कहां है?' हे नाथ! मेरी खड़ाऊं मेरे पैरों में है| क्या बात है जो आज आप ने यह पूछने का कष्ट किया|' तारा रानी ने उत्तर दिया| 'कहां है? राजा ने फिर पूछा|' 'दासी के पैरों में|' राजा हरिचन्द ने देखा दोनों खड़ाऊं
रानी के पैरों में थी एक जैसी थी, एक जैसी ही घिसी हुई|
राजा को हैरानी हुई और उसने जल्दी से
उठा कर लाई हुई खड़ाऊं देखनी चाही, पर वह खड़ाऊं वहाँ नहीं थी| इस तरह के चमत्कार से राजा बड़ा हैरान
हुआ| रानी सारी बात समझ
गई कि राजा बाद में जाग गया होगा और शक पड़ने पर मेरे पीछे लग गया होगा| पर सत्संग के कारण मेरी लाज रह गई| पारब्रह्म परमेश्वर बड़ा दयालु और लीला
करने वाला है| कोई भी उसका
पारावार नहीं ले सकता| तब रानी ने स्पष्ट तौर पर राजा से पूछा, हे नाथ! अब तो आपको विश्वास हो गया कि
मैं आधी रात को उठ कर कहां जाती हूं| मैं परमात्मा की भक्ति करती हूं| भक्ति ही मेरे जीवन का उद्देश्य है| इस मायावादी जगत में और है भी क्या? कितना अच्छा हो अगर आप भी वहाँ सत्संग में जाया
करें| सत्संग में बैठ कर
थोड़ा-सा तन मन को शांत कर लिया करो, राज-काज तो होते ही रहते हैं| राजा हरिचन्द ने तारा रानी से क्षमा
मांगी तथा उसे कीर्तन में जाने की आज्ञा दे दी| वह स्वयं भी भक्ति मार्ग पर चल पड़ा|
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