भक्त
सुथरा जी
एक
भक्त जी थे सुथरा जी, जिनका मन साफ़ होने के कारण उनका नाम सुथरा पड़ा| एक बार उनसे
किसी भक्त जी ने कहा- कि हम भी रोज वेद की कथा सुनते हैं, हमे इतना समय देने पर भी
आंतरिक प्रकाश दिखाई नहीं देता; और आप है कि बिना कथा श्रवण किये घर बैठे कहते हो
कि आत्मिक प्रकाश को देख लिया| इस पर भक्त सुथरे जी ने कहा कि भाई| हम भी एक दिन वेद का प्रसंग, सुनकर
देख लेंगे| एक बार सुथरा जी उस मंदिर में गए जहाँ वेद के श्लोकों और गाथाओं एवं
सद्गुणों की व्याख्या पंडित जी बड़े सरस, सरल और मधुर वाणी में करते थे| वहा पर
हजारों भक्त नित्यप्रति कथा का लाभ उठाते और आनंद से झूमते| अब वह भक्त भी उनके
साथ था जिसने सुथरा जी से पूछा था| दोनों कथा में बैठ गए| एकाग्रता से थोड़ा- सा
प्रसंग सुना| उस समय प्रसंग में चल रहा था कि गुण- ग्राही बनो, दूसरों के अवगुणों
पर ध्यान न दो| अवगुण देखने से मन मलिन हो जाता है| कथा समाप्त होते ही सुथरा जी
उठकर उच्च स्वर में कटु वचन कहने लगे कि कथा के श्रोतागण सब मूर्ख हैं, अयोग्य है,
इन्हें कथा सुनने से कोई लाभ नहीं मिल रहा| समय व्यर्थ खो रहे है, इतना सुनते ही
झट सब लोग अपनी निंदा सुनकर क्रोध में भरकर इन्हें पकड़ने के लिए दौड़े| “पकड़ो
और इन्हें खूब मारो| ये इसी योग्य है”-
की आवाजें चारों ओर गूँज रही थी| लेकिन वो चकमा देकर किसी स्थान में-जाकर छिप गये|
5-10 दिन तक लोग इन्हें इनके ठिकाने व आने – जाने के मार्ग पर ढ़ूँढ़ते रहे कि कही
तो मिल ही जायेंगे , परन्तु ये न मिल पाए| 10 दिन बाद इन्होंने खिड़की से जैसे ही
बाहर झाँका तो लोगों ने इन्हें देख लिया| ये झट से बाहर निकले और दौड़ते -2 अपने
सतगुरु जी के आश्रम पर आकर श्री चरणों में बैठ गये| पीछा करते हुए लोग भी वहाँ
पहुँच गए| सतगुरु जी ने पूछा – ‘सुथरा| यह लोग तेरे पीछे क्यों लगे हुए है? क्या अपराध किया है तूने? सच-2 सब
कुछ बता दो| क्या किसी का धन चुराया है? या कोई अशुभ कर्म किया है? सबने मिलकर
गुरुदेव के श्री चरणों में विनती की- ‘महाराज, इन्होनें मंदिर में आकर हम सबको
अपशब्द कहे हैं| क्या भक्त बनकर इन्हें ऐसा करना चाहिए? सुथरे ने गुरुदेव जी से
विनम्र स्वर में विनती की – “गुरुदेव|
इनसे यह पूछिए कि जिस दिन मैं मंदिर में गया था, उस समय क्या प्रसंग चल रहा था?
जिस प्रसंग में मैंने इनको दुर्वचन सुनाये| वह कथा का प्रसंग और श्लोक जो उस समय
चल रहा था, वह मुझे बता दे तो शायद मुझे भी याद आ जाएगा कि मैंने ऐसा क्यों किया?
वे सब एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे| किसी को कुछ भी याद नहीं था| उन्होंने विनती
की- ‘महाराज, कथा श्लोक तो याद नहीं है कि किस प्रसंग पर था? परन्तु इन्होंने सबको
अपशब्द कहे| सुथरे ने कहा –‘गुरुदेव| अब बताइए कि दोषी यह है या मैं हूँ| दो घंटे
तक कथा प्रसंग रोज ही सुनते हैं, उनमे से तो कुछ भी याद नहीं और एक मिनट में मैंने
जो दुर्वचन कहे वे एक के अनेक बनकर याद है| एक भी अपशब्द नहीं भूल पाए| फिर पूछते
है मंदिर क्यों नहीं आते? इसके पश्चात उन्होंने लोगों को संबोधित करते हुए कहा-
‘नित्य प्रति कथा श्रवण करते हो और उस दिन भी यही प्रसंग चल रहा था कि
नित
सुनदे हो गुण बन्ह, पल्ले ओगुण नूं बिसराओ |
कि
फायदा है कथा सुनन दा, जे न हृदय बसाओ ||
गुण
ग्रहण करो और अवगुणों का त्याग करो | यदि यह बात हृदय में धारण नहीं की तो सुनने
मात्र से क्या लाभ होगा? आचरणमयी जीवन बनाओ| यह सुनकर सब ने विचार किया|
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