Monday, May 11, 2020

परम भक्त सूरदास जी


सूरदास की भक्ति
प्रभु प्रेम के रंग में जो रंग जाते है उन दीवानों को अपने तन की सुध नहीं रहती| ऐसे ही सूरदास जी भगवान के दर्शनों के लिए चल दिए और जाकर कुएँ में गिर गए, जहाँ आस-पास कोई रहता भी नहीं था| जहाँ कोई नहीं वहाँ प्रभु होते हैं| बालरूप कृष्ण वहीं प्रकट हो गये, प्रेम की डोरी में प्रभु खिंचे चले आये| अपने सुकोमल कर कमलों से सूरदास जी को छूकर कहा- बाबा, मेरा हाथ पकड़ लो, मैं तुम्हें कूएँ से बाहर निकाल देता हूँ| मधुर वाणी, एवं अलौकिक स्पर्श ने सूरदास जी के हृदय के सारे तार हिला कर रख दिए| सूरदास को तुरंत ही कुँए से बाहर कर दिया| अब कहने लगे- बाबा मैं जा रहा हूँ| जैसे ही भगवान ने हाथ झटका त्यों ही सूरदास के मन में लहरे हिलोरे लेने लगी| वे तड़पकर बोले- प्रभु| हाथ छुड़ाकर तो जा रहे हो, मुझे निर्बल जान कर, मगर मेरे हृदय से निकल कर दिखाओ तब मैं तुम्हे मानूंगा| मैं समझ गया तुम्ही मेरे प्रियतम प्यारे श्याम सुंदर हो| तब श्री कृष्ण भगवान ने सूरदास जी को नेत्र प्रदान किए| तब उन्हें श्री कृष्ण जी के दिव्य रूप के दर्शन हुए| सुंदर दर्शन देकर जब प्रभु जाने लगे तो सूरदास जी ने कहा- प्रभु ये नेत्र लेते जाइये| भगवान ने फरमाया कि सूरदास, आँखे जीवन का प्रधान अंग है| तो सूरदास जी ने कहा कि जिन आँखो से आपके माधुरी रूप के दर्शन किये हैं, उन आँखो से अब और कुछ देखना शेष नही रह जाता| जब दोबारा दर्शन देना तो यह नेत्र भी दोबारा देना| मुझे आपका प्रेम मिल गया, दर्शन भी मिल गए, अब इस संसार को देखकर क्या करूँगा| सूरदास जी कहते हैं कि प्रभु, आपके चरणों में मेरा मन विश्राम पा चुका है| अब मुझे संसार से क्या लेना? पवित्र गंगा को छोड़कर प्यास बुझाने के लिए कही ओर क्यों जाँऊ? आप कामधेनु है आपको छोड़ कर माया की तरफ क्यों जाँऊ? ये है ‘प्रेम की उच्च अवस्था|’
*****

No comments:

Post a Comment