Monday, May 11, 2020

परम संत जनक विदेही जी


जनक विदेही जी
राजा जनक अपने समय के पूर्ण महापुरुष थे| एक बार राजा जनक के मंत्री जी ने राजा से पूछा कि आप हमारी तरह संसार की वस्तुओं को इस्तेमाल करते संसार की माया में ही जीवन व्यतीत कर रहे है फिर भी आपको जनक विदेही कहा जाता है| आप संसार में रहते हुए भी इस मोह माया से कैसे अलग हो? मंत्री के जाने के बाद राजा जी ने सोचा कि इसके संशय का अवश्य निवारण करना चाहिए| एक दिन राज दरबार के कार्य में मंत्री से कोई गलती हो गई, इस पर राजा जनक ने अपने मंत्री से नाराज होकर उन्हें फाँसी का दंड सुना दिया| अब उस बेचारे को  दिन-रात को चैन नहीं, भूख-प्यास भी समाप्त हो गई| जिस दिन उसने सूली पर चढ़ना था|
उस दिन जनक जी ने मंत्री को निमंत्रण दिया कि सूली पर चढ़ने से पहले वे हमारे राज्य में भोजन करे| उधर राजा ने राज्य में आदेश दिया कि छत्तीस प्रकार के व्यंजन बनाये जाए लेकिन मीठी वस्तुओं में शक्कर ना हो और सब्ब्जियों अथवा नमकीन वस्तुओ में नमक ना हो| अब सभी वस्तुँए तैयार हो गई| जब मंत्री आया तो उसने खाना शुरू किया| भोजन करने के पश्चात राजा ने मंत्री से पूछा कि खाना कैसा लगा? तब मंत्री ने कहा कि महाराज खाने के स्वाद पर तो मेरा ध्यान गया ही नहीं मेरा तो पूरा ध्यान सूली चढ़ने पर था| अब मुझे काल के अतिरिक्त कुछ नजर नहीं आ रहा| तब राजा जनक ने कहा मंत्री जी ये आपके सवाल का जवाब है| देखो आपको बिना नमक का खाना दिया गया लेकिन मौत को आपने नजदीक समझा तो आपको खाने में कोई स्वाद नहीं आया| ऐसे ही मैं संसार की वस्तुओ को इस्तेमाल करते हुए अपनी मौत को हमेशा याद रखता हूँ| इसी भांति संसार में रहता हुआ संसार से निर्लिप्त हूँ|
सत समरथ ते राख मन, करिये जगत के काम
जग जीवन यह मंत्र है सदा सुख बिसराम
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राजा जनक का प्रश्न
एक बार राजा जनक जी के पास कुछ ब्राह्मण आये और राजा से भिक्षा मांगने लगे| तब जनक जी ने ब्राह्मणों से पूछा कि भिक्षा तो मैं आपको दे दूंगा लेकिन आप मुझे ये बताओ की इस भिक्षा (दान) देने का लाभ क्या होता है| तब ब्राह्मणों ने कहा कि दान से भगवान खुश होते है और भगवान को प्राप्त करने का भी यह तरीका है| तब राजा जनक जी ने कहा ठीक है आप जितना दान कहेंगे उतना दान आपको मैं दे दूंगा लेकिन पहले आप मेरे तीन प्रश्न का उत्तर दे दे| पहला प्रश्न भगवान कहाँ रहता है, दूसरा प्रश्न भगवान इस समय कहाँ मिलेगा और तीसरा प्रश्न भगवान करता क्या है|  इन तीनो प्रश्नों का उत्तर मुझे चाहिये और उत्तर जो है बड़ा ही प्रैक्टिकल होना चाहिये कोई कथा कहानी नहीं सुनूंगा| अब सब ब्राह्मण एक दूसरे को देखने लगे क्योंकि कथा कहानी करना तो सबको आता था लेकिन वह उत्तर प्रैक्टिकल करके देना था| जोकि उनमे से किसी को नहीं पता था| उन सभी ब्राह्मणों में एक युवक ब्राह्मण था जोकि समझ गया कि यहाँ पर खड़े सभी ब्राह्मणों में से किसी को भी उत्तर नहीं पता| तब उसने राजा से कहा कि महाराज आपका प्रश्न तो बहुत आसन है इनका जवाब तो कोई भी दे सकता है, आपको उन प्रश्नों के उत्तर नहीं पता लेकिन हमतो सभी जानते है भगवान के बारे में मेरे बड़े बुजुर्ग इस प्रश्नों का उत्तर क्या देंगे इनका उत्तर मैं देता हूँ| अब उत्तर तो उस युवक को भी नहीं पता थे लेकिन सबकी लाज बचने के लिए उसने झूठ बोल दिया| तब राजा ने कहा कि ठीक है मुझे उत्तर आप दे दो| तब उस युवक ने कहा कि महाराज मैं आपको प्रश्नों का उत्तर जरुर दूंगा लेकिन मेरा कुछ काम रह गया है पहले मैं अपना काम कर आऊ, फिर आकर उत्तर दूंगा| तब राजा ने कहा ठीक है| अब वह युवक ब्राह्मण वहाँ से चला गया, उसने सोचा कि हम में से तो किसी को प्रश्न का उत्तर पता नहीं है, अब शायद भगवान ही कोई बंदा मदद के लिए भेज दे| यही सोच कर वह भगवान के मंदिर की तरफ बढ़ गया| तभी रास्ते में उसे एक संत जी जिनका नाम अष्टावक्र जी था मिले| उनका नाम अष्टावक्र  इसलिए पढ़ा क्योंकि उनका शरीर आठ जगह से टेढ़ा था| अष्टावक्र जी थे तो बहुत बड़े संत लेकिन वे बड़ी फकीरी में रहते थे| उस समय भी वे फटे पुराने कपड़ो में जमींन पर बैठे थे| उन्होंने जब युवक को परेशान देखा तो उन्होंने परेशानी का करण पूछा| तब युवक ने सारी बात उन्हें बताई| तब अष्टावक्र जी ने युवक से कहा कि आप परेशान ना हो मैं आपके साथ चलता हूँ| राजा को प्रश्नो का उत्तर मैं दूंगा| राजा को मेरे बारे में कुछ मत बताना अगर राजा कुछ पूछे तो यह कहना कि यह हमारे यहाँ घास काटता है हमारा घसियारा है| तब अष्टावक्र जी ने जहाँ वे बैठे थे वही से उगी हुई कुछ घास काटी और अपने थैले में डाल कर राजा के पास चल दिए| जब युवक और  अष्टावक्र जी राजा जनक जी के पास पहुचे तो युवक ने राजा से कहा कि महाराज आपके जो प्रश्न थे बहुत ही आसन थे| उन प्रश्नों का उत्तर कोई भी दे सकता है ये उत्तर तो हमारे यहाँ का घसियारा भी दे देंगा| तब जनक जी ने कहा कि ठीक है हमे उत्तर चाहिये जो कोई भी दे| लेकिन होना प्रैक्टिकल चाहिये कोई कथा कहानी नहीं चलेगी| तब अष्टावक्र जी चप्पल उतार कर वही जमीन पर बैठ गए| राजा को प्रणाम कर उनसे विनती की कि महाराज मुझे एक दूध से भरा पतीला चाहिये| तब राजा के कहने पर एक दूध का पतीला आ गया| अब अष्टावक्र जी क्या करते दूध के पतीले में अपने हाथ की उंगुली को घुमाते और फिर उस उंगुली को निकाल कर उसे देखने लगते| ऐसा उन्होंने कई बार किया| राजा जनक जी व अन्य सभी उन्हें देख रहे थे कि ये क्या हो रहा है किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था| तब राजा जनक जी ने उस घसियारे से कहा की आप ये क्या पहेली बुझा रहे हो| सीधे से प्रश्नों का उत्तर दे अन्यथा यहाँ  से जाए| तब अष्टावक्र जी ने कहा कि महाराज मैं इस दूध में घी ढ़ूढ़ रहा हूँ तब जनक जी हसने लगे और फरमाया कि इस तरह से तुम दूध में घी देख रहे हो इस तरह से तो तुम्हे कभी घी नजर नहीं आयेगा| हां अगर घी देखना है तो उसकी एक प्रक्रिया है कि दूध को पहले गर्म किया जाए उसके बाद मलाई निकाली जाये, उसके बाद उसका मक्खन बनाया जाए उसके बाद मक्खन से घी बनेगा| तब अष्टावक्र जी ने कहा कि महाराज ये आपके पहले दो प्रश्नों का उत्तर है आप कहते है ना भगवान कहा रहता है और इस समय कहाँ मिलेगा| तो आपका उत्तर ये है कि भगवान् संसार में ही रहता है और इस समय हमारे बीच में ही मिलेगा| लेकिन जिस तरह दूध में घी देखने के लिए एक प्रक्रिया को अपनाना पड़ता है ठीक इसी तरह भगवान को देखने के लिए भी एक प्रक्रिया को अपनाना पड़ेगा| उसको अगर हम अपनी मायावी आखों से देखाना चाहे तो कभी नहीं देख सकते|  उसको देखने के लिए अपने मन को साफ़ करके अपने अंदर से सभी बुराइयों को हटा करके ही देखा जा सकता है| अष्टावक्र जी की इतनी सी बाते सुन कर राजा जनक को अपने प्रश्नों का उत्तर मिल गया| राजा जनक ने अष्टावक्र जी को अपने राज सिहासन पर बिठा लिया और खुद नीचे जमीन पर बैठ गये अष्टावक्र जी के चरणों में और अष्टावक्र जी से विनती करने लगे महाराज मुझे दो प्रश्नों का उत्तर तो मिल गया लेकिन मुझे अपने आखिरी प्रश्न का उत्तर चाहिए कि भगवान करता क्या है तब अष्टावक्र जी ने फरमाया कि भगवान क्या करता है ये तेरे सामने है वो एक पल में जो जमीन पर हो उसे राज सिहासन पर बिठा देते और जो राज सिहासन पर हो उसे जमीन पर बिठा देता है जैसा की अब हो गया है आप जमीन पर आ गये और मैं राज सिहासन पर आ गया| तब राजा को उसके तीनो प्रश्नों के उत्तर मिल गए|
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जनक जी का स्वप्न
एक बार महाराजा जनक अपने राजप्रसाद के शयनकक्ष में दोपहर के भोजन के उपरांत विश्राम कर रहे थे कि उन्हें नींद आ गई| नींद में उन्होंने एक दुस्वप्न देखा कि मिथिला पर किसी राजा ने आक्रमण कर दिया है दोनों सेनाओ में भीषण युद्ध होने के बाद वह राजा विजयी हो गया और राजा जनक को बंदी बनाकर उस राजा के सन्मुख पेश किया जाए| अब उस राजा ने जनक के कपड़े उतरवा दिये और उसे तीन दिन के अन्दर राज्य की सीमा से बाहर चले जाने के लिए कहा| नहीं तो तुम्हे मृत्यु दण्ड दिया जाएगा| अब जनक ने कपड़े उतारकर एक मैंला सा कपड़ा लपेट कर चल दिया| राजा ने सारे राज्य में घोषणा करवा दी कि जो भी व्यक्ति राजा जनक को भोजन अथवा आश्रय देगा, उसे कठोर दण्ड दिया जाएगा| अब भूखा प्यासा वह राज्य की सीमा पार पहुँचा वहाँ उसे बहुत भूख लग रही थी कि तभी उसे किसी व्यक्ति ने बताया कि आगे अन्न  श्रेत्र है जहाँ भूखों को खिचड़ी बाँटी जाती है| तुम वहाँ चले जाओ तो तुम्हें भी खिचड़ी मिल जायेगी| यह सुनकर वह वहाँ गया वहाँ पर कर्मचारी ने जवाब दिया कि खिचड़ी तो बंट चुकी है यह देखकर उन्हें चक्कर आ गये और वे वही बैठ गये| उसकी यह दशा देखकर कर्मचारी ने कहा कि खिचड़ी की खुचरन बर्तनों से निकाल देता हूँ उसी से काम चलाओ| जब उस कर्मचारी ने वह खुचरन राजा जनक को दी उसी समय एक दम आकाश से एक चील आई और झपट्टा मारा| उनका पंजा लगने से वे भय मारे चीख पड़े और उनकी नींद खुल गई| किन्तु सपना देखते-देखते वह सचमुच ही चिल्ला उठे| जब उनकी आँख खुली तो उन्होंने अपने आप को अपने राज्य में पाया| सभी रानियों ने उनसे पूछा- आपको क्या हो गया था? महाराजा जनक ने प्रश्न का उत्तर देने की बजाय उल्टा उनसे प्रश्न किया- यह सच या वह सच है| अभी किसी को कुछ समझ न आया कि राजा क्या कह रहे हैं| राजवैद्य को बुलाया तो उनसे भी राजा ने यही पूछा कि यह सच है या वह सच है| किसी को कुछ समझ नहीं आया| तब राजा जनक के गुरु जी को बुलवाया गया| वे सारी दशा समझ गये कि राजा ने सपना देखा है जिसमे वे निर्धन बन गये थे और जगह-जगह भूखे भटक रहे थे| तब ऋषि अष्टावक्र बोले- जनक| जो एक काल में रहे और दूसरे काल में न रहे| वह कभी सत्य नहीं होता| इस समय तुम्हारे स्वप्न का कोई अस्तित्व नहीं है वह नष्ट हो चुका है जो रचना तुमने स्वप्न में देखी है इसलिए वह सच नहीं और स्वप्नावस्था में तुम्हारे इस राज्य वैभव का कहीं अस्तित्व न था इसलिए संसार की यह रचना भी सच नहीं अथार्त न यह सच है और न वह सच है, क्योंकि सच वही होता है जो प्रत्येक काल में विद्ममान होता है तब राजा को तसल्ली हो गई और उन्हें अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया|   
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