मुर्शिद के लिए
पानी लाना
बाबा फरीद अपने पीर
मुर्शिद के स्नान के लिए पानी गर्म करते थे| एक दिन बरसात हो रही थी और उन्हें
अपने गुरुदेव के नहाने के लिए पानी गर्म करने के लिए कही आग नहीं मिल रही थी|
उन्हें कहीं दूर आग जलती नजर आई, वह आग लेने के लिए वहाँ पहुँचे, वह वैश्या का घर
था| फरीद जी उनके द्वार पर गए और उससे कहने लगे कि मुझे आग चाहिए मुझे अपने गुरु
देव के लिए पानी गर्म करना है| उस समय आजकल की तरह माचिस नहीं होती थी| उन दिनों
चकमक पत्थर से आग सुलगाते थे| और एक घर दूसरे घर से आग लेता था| बाबा फरीद बहुत
सुंदर थे| उस वैश्या ने कहा कि आग तो आँख के बदले मिलेगी| गुरु सेवा का जिन्हें
शौक होता है तो वह रह नहीं सकते| उन्होंने कहा कि आप आँख ले लो उसी समय उन्होंने
अंगुली से अपनी आँख निकल कर उसे दे दी| वह वैश्या हैरान रह गई| उन्होंने आँख पर पट्टी बाँध ली कि कही गुरु
महाराज जी को पता न चले| उन्होंने जाकर पानी गर्म करके स्नान कराया | गुरुदेव ने
देखा कि आँख पर पट्टी बंधी है| उन्होंने पूछा फरीद क्या हुआ तो फरीद ने उत्तर दिया
की आँख आ गई है उनके पीर मुर्शिद बोले कि फरीद आँख आई तो पट्टी खोलो यह पट्टी
क्यों बांध रखी है? उन्होंने पट्टी खोली तो पहले से बड़ी आँख थी| फरीद के अब भी
जितने वंशज है उनकी एक आँख थोड़ी बड़ी है क्योंकि वह गुरु महाराज जी द्वारा दी गई
आँख है|
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फरीद को अहंकार
कहते हैं फरीद
साहिब जी की माता ने बचपन से ही अपने बच्चे को भक्ति मार्ग पर लगाये रखा| काफी समय
फरीद जी ने जंगल में वृक्ष के नीचे बैठ कर तपस्या की| एक दिन का समय था कि कुछ
चिड़ियाँ उसी वृक्ष के ऊपर बैठ कर शोर कर रही थी| फरीद जी की भक्ति में विघ्न पड़ा
तो उन्होंने क्रोधवश कहा कि हे चिडियों|
तुम मर क्यों नही जाती| तो जैसे ही फरीद जी ने ये वचन किए सभी चिड़ियाँ वहीं मर गई
तभी उन्हें याद आया कि उनकी माता जी ने कहा कि किसी भी जीव की हत्या करना बहुत बड़ा
पाप है| फरीद जी ने देखा कि मेरे कहने से यहाँ तो कई सारी चिड़ियाँ मारी गई है| तब
फरीद जी ने फरमाया कि अगर मेरे कहने से मरी हो तो सारी की सारी चिड़ियाँ जिन्दी हो
जाओं| उसी समय सारी चिड़ियाँ जिन्दा हो गयी| फरीद जी ने देखा कि मेरे कहने से
चिड़ियाँ मर भी गई और जिन्दा भी हो गई मेरी भक्ति पूर्ण हो चुकी है| फरीद जी अब आगे
चल दिए आगे चलते-2 रास्ते में उनकी नजर एक माई पर पड़ी जो कुएँ में से पानी निकाल
रही थी फरीद जी ने माई से पानी पिलाने के लिए कहा| माई ने कहा कि अभी रूक जा| माई
ने पानी की बाल्टी कुएँ में डाली, और पानी निकाल कर बाहर डाल दिया| फरीद जी को
गुस्सा आ गया| माई ने कहा कि फरीदा मैं कोई जंगल की चिड़ियाँ नही हूँ जिन्हें तू
मार और जीवा लेंगा, मैं पतिव्रता स्त्री हूँ| तब फरीद जी हैरान हुए कि मैंने तो
बहुत दूर चिड़ियाँ मारी और जिवाई इसे कैसे पता चला? फरीद जी ने माई से पूछा कि माई
तुझे कैसे पता चला कि मैंने चिड़िया मारी और जिवाई| तब माई ने कहा कि इस समय जो भी
तीनों लोकों में हो रहा है वो मेरी आँखों के सामने है| फरीद जी ने पूछा कि ये
शक्तियाँ आपको कहाँ से प्राप्त हुई? तो उसने बताया कि ये सब शक्तियाँ मुझे अपने
पति की सेवा करके प्राप्त हुई| फरीद जी को अब समझ आ गया कि शक्ति पाना कोई बड़ी बात
नहीं है, ये तो भक्ति से अपने आप मिल जाती है| असली मंजिल परमात्मा की प्राप्ति है
वो मंजिल बड़ी दूर है| तब फरीद जी ने उससे पूछा कि माई तू बार-2 पानी क्यों फैला
रही है? तब माई ने कहा कि मेरी बहन के घर आग लगी है उसी आग को बुझा रही हूँ| फरीद
जी ने पूछा कि तेरी बहन का घर कहाँ है? तो माई ने कहा कि वो तो कोसों दूर है| फरीद
जी समझ गए कि माई बहुत पहुँची हुई है| तब फरीद जी ने विनय की माई तू मुझे ये बता
कि मेरे सतगुरु कहाँ मिलेंगे? तब माई ने कहा कि फरीदा तुझे गुरु अजमेर शहर में
मिलेंगे| फिर फरीद जी अजमेर गए और वहाँ जाकर सतगुरु की शरण ग्रहण की|
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दुखिया स्त्री की
रक्षा
एक बार बाबा ‘फरीद
साहब’ शक्कर गंज वाले किसी शहर में से गुजर रहे थे कि अचानक उनकी दृष्टी एक दुखिया
स्त्री पर जा पड़ी जिसे उसकी मालकिन डंडे से मार रही थी तथा वह दुखी स्त्री रोते
हुए बार-2 हाथ जोड़कर उसके पैरों पर क्षमा माँग रही थी कि ‘बीबी जी’ अब इस बार मुझे
क्षमा कर दो, आगे से ऐसा कभी नहीं होगा| परन्तु उस निर्दया ने उसे माफ़ नहीं किया
और उस पर लाठी तथा पैरों से प्रहार किये जा रही थी| यह दृश्य जब बाबा फरीद जी ने देखा
तो उनका ह्रदय करुणा से भर आया| वह उस अबला के दुःख को सहन न कर सके| उन्होंने उस
औरत के पास जाकर उस स्त्री को मारने का कारण पूछा| पहले तो उसने बाबा जी की ओर
तनिक भी ध्यान न दिया| परन्तु फ़कीर जी के बार-2 पूछने पर वह अकड़कर बोली ‘सांई जी| क्या पूछते हो? यह ऐसी नालायक है कि
इसको कोई भी काम उचित ढंग से करना नहीं आता है| आज मैंने इसको कहा था कि मेरे लिए
ऐसा बारीक काजल पीस कर तैयार कर जो कि माखन से भी ज्यादा नर्म हो| परन्तु इस नलायक
ने ऐसा काजल बनाया कि जब से मैंने लगाया है उसी समय से अब तक मेरी आँखों में चुभन
हो रही है | बाबा फरीद जी ने कहा –माता|
इस बार तो आप इसे हमारे कहने से माफ़ कर दो| आगे से यह उचित ढंग से काम करेगी| फरीद
जी के कहने पर उसने उसे छोड़ दिया| तत्पश्चात बाबा जी कहीं आगे चल दिए| कुछ समय बाद
एक बार बाबा जी किसी मरघट के पास से गुजर रहे थे| उन्होंने एक मनुष्य का शव पड़ा
देखा जिस पर पक्षी बैठ उसकी आँखों को अपनी चोंच से फोड़े जा रहे थे| जब बाबा जी ने
यह दृश्य देखा तो कहने लगे –ऐ मेरे मालिक|
ऐसा कौन भाग्यहीन मनुष्य है जिसको कि मृत्यु के उपरान्त भी कब्र के भीतर स्थान न
मिल सका| तब उस समय देववाणी हुई- ऐ मेरे प्यारे| यह उसी घमंडी औरत का शव है जो उस
बारीक काजल के न पीसने पर अपनी नौकरानी को कोड़ो से पीट रही थी| इसलिए कभी किसी के
साथ बुरा नहीं करना चाहिए क्योंकि बुरे का फल भी बुरा ही होता है|
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फरीद
के नाम का दरवाजा
पाकिस्तान में बाबा
फरीद नाम के एक फकीर हो गये। वे अनन्य गुरुभक्त थे। गुरुजी की सेवा में ही उनका
सारा समय व्यतीत होता था। एक बार उनके गुरु ख्वाजा बहाउद्दीन ने उनको किसी खास काम
के लिए मुलतान भेजा। उन दिनों वहाँ शम्स तबरेज के शिष्यों ने गुरु के नाम का
दरवाजा बनाया था और घोषणा की थी कि आज इस दरवाजे से जो गुजरेगा वह जरूर स्वर्ग में
जायेगा। हजारों फकीर दरवाजे से गुजर रहे थे। नश्वर शरीर के त्याग के बाद स्वर्ग
में स्थान मिलेगा ऐसी सबको आशा थी। फरीद को भी उनके मित्र फकीरों ने दरवाजे से
गुजरने के लिए खूब समझाया, परंतु
फरीद तो उनको जैसे-तैसे समझा-पटाकर अपना काम पूरा करके, बिना दरवाजे से गुजरे ही अपने गुरुदेव
के चरणों में पहुँच गये। सर्वान्तर्यामी गुरुदेव ने उनसे मुलतान के समाचार पूछे और
कोई विशेष घटना हो तो बताने के लिए कहा। फरीद ने शाह शम्स तबरेज के दरवाजे का
वर्णन करके सारी हकीकत सुना दी। गुरुदेव बोलेः "मैं भी वहीं होता तो उस पवित्र
दरवाजे से गुजरता। तुम कितने भाग्यशाली हो फरीद कि तुमको उस पवित्र दरवाजे से
गुजरने का सुअवसर प्राप्त हुआ !" सद्गुरु की लीला बड़ी अजीबों गरीब होती
है। शिष्य को पता भी नहीं चलता और वे उसकी कसौटी कर लेते हैं। फरीद तो सतशिष्य थे।
उनको अपने गुरुदेव के प्रति अनन्य भक्ति थी। गुरुदेव के शब्द सुनकर बोलेः "कृपानाथ ! मैं तो उस दरवाजे से नहीं गुजरा। मैं
तो केवल आपके दरवाजे से ही गुजरूँगा। एक बार मैंने आपकी शरण ले ली है तो अब किसी
और की शरण मुझे नहीं जाना है।"
यह
सुनकर ख्वाजा बहाउद्दीन की आँखों में प्रेम उमड़ आया। शिष्य की दृढ़ श्रद्धा और
अनन्य शरणागति देखकर उसे उन्होंने छाती से लगा लिया। उनके हृदय की गहराई से
आशीर्वाद के शब्द निकल पड़ेः "फरीद ! शम्सतबरेज का दरवाजा तो केवल एक ही दिन
खुला था, परंतु तुम्हारा
दरवाजा तो ऐसा खुलेगा कि उसमें से जो हर गुरुवार को गुजरेगा वह सीधा स्वर्ग में
जायेगा।"
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