शुकदेव जी राजा जनक
जी के पास
महर्षि वेदव्यास जी के सुपुत्र श्री
शुकदेव मुनि पाँच वर्ष की अवस्था में घर बार त्याग कर भजन करने के लिये वन को चले
गये थे और पूरे सोलह वर्ष तक एकान्त सेवन और भजन किया लेकिन मन को शान्ति न आई| तब पिता वेदव्यास जी के पास आकर अपने
मन का सब वृतान्त सुनाया|
श्री वेद व्यास जी पूर्ण ज्ञानवान, महान तत्वक्ता गुरु थे| शुकदेव जी की कहानी सुन कर जान गये कि
इन्होने भजन तो किया परन्तु गुरु धारण नहीं किया और गुरु के बिना सफलता कहाँ? अब
यदि मैं इनको अपनी शरण में लेकर गुरु दीक्षा देता हूँ तो पिता पुत्र के नाते जो
गुरु के चरणों में शिष्य का श्रद्धा विश्वास होना चाहिये, वह नहीं बन सकता| जनक जी
पूर्ण महापुरुष है| उनको गुरु धारण करने से इनका कल्याण होगा| यह सोचकर श्री शुकदेव जी को समझा बुझा
कर राजा जनक जी के पास भेज दिया|
पिता जी की आज्ञा पाकर श्री शुकदेव जी राजा जनक जी को गुरु धारण करने के लिए जा
रहे थे| चलते भी जाते और
मन में सोचते भी जाते थे कि मुझे इतना त्याग वैराग्य धारण करने पर भी मन को शान्ति
नहीं मिली तो जिनके चरणों में मैं जा रहा हूँ वे तो मुझ से अधिक गुणवान अधिक वैराग्य और त्याग का स्वरुप होंगे| मन के अन्दर इसी प्रकार के संकल्प
उठाते और सोचते हुये श्री जनक महाराज के दरबार में पहुँचे| क्या देखते है- श्री जनक जी स्वर्ण के
सिंघासन पर विराजमान है सुंदर-सुंदर रूप वाली स्त्रियाँ और बन्दीगण हाथ बांधे
सिंघासन के आस पास खड़े हुये हुक्म की प्रतीक्षा कर रहे है तथा सिंघासन के पास नाना
प्रकार के सुख सम्पत्ति के सामान भरे पड़े है|
इस दृश्य को देखते ही श्री शुकदेव जी के मन में सन्देह हुआ कि यह कैसे गुरु है
जिनके इर्द गिर्द सब माया ही माया है|
जनक जी महाराज नेत्र मूंदे हुऐ थे|
शुकदेव जी को दरबार में आता देखकर उनके दिल की जान गये कि इनके मन में भ्रम
उत्पन्न हो गया है| उस समय शुकदेव जी
का भ्रम निवारण करने के लिये और उनके संकल्प की दृढ़ता को परखने के लिये कई
युक्तियों से परीक्षा ली|
अन्त में जनक जी ने मिथिलापुरी को आग लगाने की माया रची| इतने में उस समय द्वार का सन्तरी घबरा
कर भाग आया और कहने लगा- महाराज|
सारी मिथिलापुरी को आग लग गई है और अब आग राजदरबार के अन्दर तक आ पहुँची है| उस के बुझाने का शीघ्र उपाय होना
चाहिये| सन्तरी की बात को
सुन कर राजा जनक जी ने तो कोई उत्तर नहीं दिया परन्तु शुकदेव जी के मन में संकल्प
उठा कि द्वार के पास तो मेरा पोथी-पत्तर और कपड़े, खड़ावा आदि सामान का बस्ता पड़ा
है, कहीं वह न आग को भेंट हो जाए|
शुकदेव जी आग से अपना बस्ता बचाने के लिए द्वार की तरफ जाने के लिये सोच ही रहे थे
कि इतने में राजा जनक जी ने शुकदेव जी को एक शलोक पढ़ कर सुनाया जिस का अर्थ यह है-
“हे
शुकदेव| मेरा जो आत्मिक धन
है, वह अनन्त व अपार है वह कभी नाश नहीं हो सकता| यदि सारी मिथिला पुरी जल कर राख हो
जाये तो भी मेरे रूहानी धन की विंचितमात्र भी हानि नहीं हो सकती|”
फिर कहा- हे शुकदेव| जो कुछ आप मुझे
समझ रहे हैं, मैं वह नहीं हूँ, मैं और हूँ|
मुझे देखने के लिये तुझको आँख की जरुरत है|
जब वह आँख खुल जायेगी, तब तू मेरे वास्तविक स्वरुप को देख सकेगा| उत्तम अधिकारी के लिए गुरु का एक वचन
ही काफी होता है| चूँकि श्री शुकदेव
परमार्थ के परम अधिकारी थे, गुरु के वचनों का इशारा पाते ही समझ गये अर्थात श्री
जनक महाराज जी के वचन सुनते ही शुकदेव जी के मन का भ्रम दूर हो गया और चरणों पर
गिर कर क्षमा माँगी| महापुरुषों ने
अपनी दया का हाथ श्री शुकदेव जी के सिर पर रखा और परमार्थ की दीक्षा दी| तत्पश्चात गुरु की आज्ञा पाकर श्री
शुकदेव जी पिता वेदव्यास जी के पास आये|
वे मन में अति प्रसन्न थे|
पिता ने पूछा- बेटा| गुरु कैसे मिले?
शुकदेव जी कुछ उत्तर न दे सके|
पिता ने फिर पूछा- बेटा|
क्या गुरु चाँद जैसे उज्जवल मिले? तो शुकदेव जी बोले- नहीं पिता जी| चाँद से अधिक उज्जवल, क्योंकि चाँद
में दाग है परन्तु मेरे गुरु में दाग नहीं है| फिर पूछा- हे बेटा| क्या तेरा गुरु सूर्य जैसा है? तब
शुकदेव जी बोले- नहीं, पिता जी|
सूर्य से बहुत विशेष है क्योंकि सूर्य में तपश है और मेरे गुरु में तपश नहीं है| श्री वेदव्यास जी ने फिर पूछा- अच्छा
बेटा| कुछ तो बताओ- गुरु
कैसे मिले? तब शुकदेव जी ने बड़ी प्रसन्नता से कहा- पिता जी| गुरु मिले पर उन के साथ किसी वस्तु का
प्रमाण नहीं दिया जा सकता, वे अपना प्रमाण आप है| वे परमदयाल स्वरूप है जो शिष्य की
करनी की तरफ ध्यान नहीं देते कि इसमें कितने अवगुण हैं बल्कि अपनी दयालुता की ओर
देखते हैं| वे शरणागतपाल हैं
और शरण आये की रक्षा करते हैं, उनके गुण तो अनन्त और अपार हैं|
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शुकदेव की
परीक्षा
राजा जनक ने शुकदेव जी की अज्ञानता की मैल धोने के लिये कितनी
रचना की! भाँति-भांति से बाज़ारों को सजवाया। उन्हें दूध का भरा कटोरा देकर कहा कि
जनकपुरी का चक्र लगाकर आओ, परन्तु
खबरदार! इस कटोरे में से एक बूँद भी न गिरने पाये वरना सैनिक जो तुम्हारे साथ
होंगे तुम्हारा सिर काट देंगे। पूरी की पूरी सुरति हाथ पर रखे दूध के कटोरे में
जमा कर बाज़ार के बीचों-बीच चक्र लगाकर जब शुकदेव जी वापिस आये, तो जनक जी ने पूछा-शुकदेव! बाज़ार में क्या देखा? शुकदेव जी ने उत्तर दिया-भगवन्! मैने तो कुछ भी नहीं देखा, क्योंकि मेरी पूरी सुरति कटोरे में एकाग्र हो चुकी थी। तब राजा
जनक ने उन्हें समझा-बुझाकर फरमाया कि जिनकी सुरति इसी प्रकार शब्द में जुड़ी रहती
है, वे संसार में रहकर भी न्यारे रहते हैं। तुम
भी इसी प्रकार न्यारे एवं निर्लेप रहा करो। सत्पुरुष जनक जी महाराज के सत्संग के
वचनों को सुनकर शुकदेव जी का मोह-अज्ञान व संशय-भ्रम सब नष्ट हो गये। उन्होंने
श्रद्धा-भावना से उनकी शरण ली और नाम दान पाकर कृतकृत्य हो गये।
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