कबीर का जन्म
मानवतावादी व्यवहारिक धर्म को बढ़ावा देने वाले कबीर
दास जी का इस दुनिया में प्रवेश भी अद्भुत प्रसंग के साथ
हुआ। माना जाता है कि उनका
जन्म सन् 1398 में
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन वाराणसी के निकट लहराता नामक स्थान पर हुआ था। उस
दिन नीमा
नीरू संग ब्याह कर डोली में बनारस जा रही थीं, बनारस के पास एक सरोवर पर कुछ विश्राम
के लिये वो लोग रुके थे। अचानक नीमा को किसी बच्चे के रोने की आवाज आई वो आवाज की दिशा में आगे बढ़ी। नीमा ने सरोवर
में देखा कि एक बालक कमल पुष्प में लिपटा हुआ रो रहा है। नीमा ने जैसे ही
बच्चा गोद में लिया वो चुप हो गया। नीरू ने उसे साथ घर ले चलने को कहा किन्तु नीमा
के मन में ये प्रश्न उठा कि परिजनों को क्या जवाब देंगे। परन्तु बच्चे के स्पर्श
से धर्म, अर्थात कर्तव्य बोध
जीता और बच्चे पर गहराया संकट टल गया। बच्चा बकरी का दूध पी कर बङा हुआ। छः माह का
समय बीतने के बाद बच्चे का नामकरण संस्कार हुआ। नीरू ने बच्चे का नाम कबीर रखा
किन्तु कई लोगों को इस नाम पर एतराज था क्योंकि उनका कहना था कि, कबीर का मतलब होता है महान तो एक
जुलाहे का बेटा महान कैसे हो सकता है? नीरू पर इसका कोई असर न हुआ और बच्चे का नाम कबीर ही रहने
दिया। ये कहना अतिश्योक्ति न होगी कि अनजाने में ही सही बचपन में दिया नाम बालक के
बङे होने पर सार्थक हो गया। बच्चे की किलकारियाँ नीरू और नीमा के मन को मोह लेतीं।
अभावों के बावजूद नीरू और नीमा बहुत खुशी-खुशी जीवन यापन करने लगे। कबीर को बचपन से ही
साधु संगति बहुत प्रिय थी। कपड़ा बुनने का पैतृक व्यवसाय वो आजीवन करते
रहे। बाह्य आडम्बरों के विरोधी कबीर निराकार ब्रह्म की उपासना पर जोर देते हैं। बाल्यकाल
से ही कबीर के चमत्कारिक व्यक्तित्व की आभा हर तरफ फैलने लगी थी। कहते हैं- उनके
बालपन में काशी में एक बार जलन रोग फैल गया था। उन्होने
रास्ते से गुजर रही बुजुर्ग महिला की देह पर धूल डालकर उसकी जलन
दूर कर दी थी।
*****
रामनंद व् कबीर का
मिलाप
संत कबीर जी की बात
है, स्वामी रामानंद जी उनके गुरुदेव हुए| शिष्य जो पूर्ण जिज्ञासु है वह पूर्ण
सतगुरु के पास पहुँच जाता है| उन्हें वो प्राप्त भी कर लेता है| सब जानते थे कि
काशी में गंगा के किनारे स्वामी रामानंद जी स्नान करने जाते थे| वह किसी अन्य जाति
वाले के मत्थे नहीं लगते थे क्योंकि स्वामी रामानंद जी वैष्णव संत थे| रात्रि के
दूसरे पहर में वह जाते थे और स्नान आदि करके वापिस आकर भजन करने बैठते थे| ये उनका
नियम था| कबीर जी को पता था कि ये अन्य जाति वालों को वह मत्थे नहीं लगाते| वह रात
को उसी घाट की सीढ़ियों पर जाकर लेट गए| स्वामी रामानन्द जी स्नान करने आये, तो
अँधेरे में उनका पैर कबीर जी के शरीर से लगा| उस समय उन्हें पता चला कि आगे कोई
लेटा हुआ है| उन्होंने ये शब्द कहे- “उठ
राम के राम राम कर|”
उस समय कबीर जी हाथ जोड़कर खड़े हो गए और विनती की- “मैं
कबीर हूँ| राम नाम की साधना उन्होंने की| आप जानते हैं कि सारा जीवन उनका काशी
बनारस में बीता और काशी भगवान शिव की नगरी कहलाती है काशी के सब कंकर शंकर समान
है, और यह भी कहा जाता है कि जो काशी में शरीर छोड़ता है, वह भगवान शिव के धाम को
प्राप्त होता है| अंत समय में कबीर जी ने काशी का परित्याग कर दिया और मगहर को चले
गए| क्योंकि मगहर के बारे में ये प्रशिद्ध
था कि जो मगहर में शरीर छोड़ता है वह गधे की योनि में जाता है| परन्तु धरती का कोई
दोष नहीं होता, यह तो कर्मो का फल होता है| जब कबीर को यह पता चला कि इस भूमि पर
शरीर छोड़ने से गधे की योनि में जाते है तो उन्होंने काशी का परित्याग कर दिया, उस
समय कबीर जी ने शब्द उच्चारण किये-
“क्या
काशी क्या उसर मगहर राम हृदय बस मोरा|
जो तन काशी तजै
कबीरा तो रामहि काहे निहोरा||”
क्या काशी क्या
मगहर की धरती है? भगवान राम मेरे वश में है| क्योंकि भगवान भक्त के वश में होते
है| कबीर जी ने सारी आयु सबकी खरी-2 सुनी, धर्म की कुरीतियों को दूर करने के लिए|
कबीर जी के देहावसान के पश्चात इस बात पर
झगड़ा हो गया कि इनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति से होगा या मुस्लिम| कबीर जी
ने जिस झगड़े को निपटाने के लिए सारी आयु लगा दी, वही झगड़ा अंतिम समय फिर हो गया|
तब कबीर जी ने जो चादर ओढ़ी हुई थी, उसे उठाकर देखा तो नीचे से शरीर की बजाये फूल
मिले| हिंदू और मुसलमानों ने उन्हें बाँट लिया और अपनी -2 रीति से उनका क्रिया
कर्म किया| अब एक ओर मंदिर बना है और एक ओर मस्जिद है| एक दिन कबीर जी गुरु महाराज जी के दर्शन करने
गए| गुरुदेव पर्दा करके ठाकुर जी की पूजा कर रहे थे| वह माला चढ़ा रहे थे ठाकुर जी
को, परन्तु माला उनसे चढ़ नहीं रही थी| कारण यह था कि मुकुट उन्होंने पहले चढ़ा दिया
था और माला अब उसके ऊपर से नहीं चढ़ रही थी| कबीर जी बाहर ध्यान में बैठे अंदर का
दृश्य देख रहे थे कि अंदर गुरुदेव कैसे भगवान की पूजा कर रहे है| उस समय कबीर जी
ने आवाज दी- “महाराज जी आप पहले
माला चढ़ाये और फिर मुकुट पहनाए|”
यह सुनकर रामानंद जी ने सारे परदे उठा दिए और कबीर जी को गले से लगा लिया| गुरु तो
अंतर्यामी होते है, पर शिष्य भी अंतर्यामी हो जाते है गुरु की सेवा और गुरु का
ध्यान करते -2|
*****
चींटी चावल ले चली
एक चींटी चावल का एक दाना मुख में लेकर
जा रही थी| मार्ग में उसे दाल
का दाना पड़ा हुआ दिखाई दिया|
वह उसे देखकर वही रुक गई|
मन में सोचने लगी की दाल का यह दाना भी साथ में ले लूँ| परन्तु यह कहाँ संभव था| अपने छोटे मुख में
वह चावल का दाना भी बड़ी कठिनाई से पकड़े थी|
अब वह यदि दाल पकड़ती तो चावल का दाना छूट जाता है| वह बड़ी दुविधा में पड़ गई| संयोगवश परमसंत श्री कबीर साहिब जी
वही से जा रहे थे| उनकी दृष्टि चींटी
पर पड़ गई| चींटी को इस तरह
परेशान और दुविधा में देखकर उनके मुख से स्वभाविक ही ये वचन निकले|
चींटी चावल लै चली, विच में मिल गई दार
कह कबीर दोउ न मिले, इक लै दूजी डार||
फ़रमाया
कि ऐ भोली चींटी| दोनों दाल भी और
चावल भी तू एक साथ नहीं ले जा सकती|
इसलिए एक को छोड़ दे तभी तू दूसरी चीज को ले जा सकेगी| इसी तरह मनुष्य को भी दोनों चीजे नहीं
मिल सकती| मनुष्य या तो
भक्ति को ही प्राप्त कर सकता है अथवा माया को, एक का त्याग तो उसे करना पड़ेगा|
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मन की पवित्रता
एक दिन श्री वचन हुये कि कोई ब्रह्माण तेरह वर्ष तक विद्या पढ
कर जब बनारस मे वापिस आया तो वाद विवाद के विचार से श्री कबीर साहिब के पास गया।
कबीर जी ने उस की बड़ी भाव भगत की और उसको सूखा सीधा देकर कहा महाराज जी पहले आप
भोजन बना कर खा लीजिये। ब्राह्मण जी ने कबीर के चारों ओर घर की तरफ देखा कही ताना
लगा है कपड़ा बुना जा रहा है कही मक्खियाँ भिनक रही है। इस लिए नदी के किनारे जा
कर एक जगह भोजन बनाया और खाया। सन्तों का काम तो जीव को सन्मार्ग दिखाना होता है। जहाँ
बाह्मण ने खाना बनाया था कबीर जी ने वहाँ की जगह खोदकर देखा तो वहाँ से ऊँट की
हड्डी निकली और ब्राह्मण को दिखाया आप ने इस स्थान को पवित्र समझा था पंड़ित जी
अभी आप ने तेरह वर्ष बाहर की शुद्धता और पवित्रता ही पढ़ी है। अब वह विद्या पढ़नी
चाहिये जिस से अन्तकरण की मैल साफ हो यानि अन्दर की पवित्रता का ज्ञान हो, ज्ञान
पुस्तके को पढ़ने से नही होता उस पर अमल करने से होता है अर्थात ज्ञान के भंडार मे
प्रभु को नही पाया जा सकता। तू अपने ह्रदय की पुस्तक पढ़। इससे उत्तम कोई पुस्तक
नही है।
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सर्वजित का अभिमान
परमसन्त सन्त कबीर साहिब जी के समय में
काशी में एक ऐसा ही विद्वान था, जिसने
बड़े-बड़े दिग्गज
विद्वानों को अपनी तर्क शक्ति से शास्त्रार्थ में पराजित किया था| जहाँ भी और जब भी उसने किसी को भी
हराया उससे विजय पत्र लिखवाकर उससे हस्ताक्षर करवा लिए| इस प्रकार बड़े-बड़े विद्वानों को पराजित कर जब वह काशी
वापिस लौटा, तो उसका अहंकार
सातवें आसमान पर पहुँच चुका था| सबको
पराजित करने के कारण उसने अपना नाम 'सर्वजित' रख लिया था| काशी वापिस जाकर उसने अपने सारे विजय-पत्र अपनी माता के सामने रख दिए और बड़े
गर्व से बोला- "माते| ये सब वे विजय पत्र है जो बड़े-बड़े विद्वानों ने शास्त्रार्थ में
परास्त होने के बाद मुझे लिखकर दिये है| आज
से मैंने अपना नाम सर्वजित रख लिया है| माते| आज से आप भी मुझे सर्वजित कहकर बुलाया
करे|" लेकिन
माता बिल्कुल भी खुश न हुई उसने माता से प्रश्न किया- "माते| मेरी इस दिग्विजय पर क्या आपको कोई
प्रसन्नता नहीं हुई?" उसकी
माँ जानती थी कि मेरे पुत्र ने केवल उन्ही को हराया है, जो मात्रवाचक ज्ञानी थे| वास्तविकता की जिन्हें तनिक भी समझ
नहीं थी| वह इस बात को भली भांति
समझती थी कि परमसन्त श्री कबीर साहिब जी इस समय के पूर्ण महापुरुष है जो इसे सही
मार्ग दिखा सकते है| यह सोचकर उसने उत्तर दिया- "कौन माता अपने पुत्र की विजय पर
प्रसन्न नहीं होती? किन्तु तुम्हारी
विजय अभी अधूरी है इसलिए मैं तुम्हें सर्वजित नहीं कह सकती| यदि तुम कबीर साहिब जी को पराजित कर दो, मैं तुम्हें सर्वजित मान लूंगी| सर्वजित ने कहा- माते कबीर साहिब जी तो अनपढ़ है| माता ने कहा- "सांसारिक दृष्टि से वे चाहे अनपढ़ है
परन्तु उन जैसा ज्ञानवान मेरी दृष्टि में कोई नहीं है| सर्वजित ने कहा ठीक है माते| जब बड़े-बड़े विद्वान मेरे आगे न टिके, तो एक अनपढ़ व्यक्ति मेरे सामने क्या
टिकेगा| यह कहकर सर्वजित
परमसंत श्री कबीर जी के घर जा पहुँचा और उन्हें बताया कि मैं आपसे शास्त्रार्थ
करने के लिए आया हूँ| श्री
कबीर साहिब जी ने फ़रमाया- मैं
तो अनपढ़ हूँ फिर तुम्हारे जैसे विद्वान के साथ शास्त्रार्थ कैसे कर सकता हूँ| "सर्वजित ने कहा- यदि आप शास्त्रार्थ नहीं कर सकते तो
फिर अपना पराजय पत्र लिखकर मुझे दे दीजिये|"
कबीर जी ने फ़रमाया- कि मैं तो पढ़ा लिखा नहीं हूँ, तुम विजयपत्र लिख लो कि सर्वजित जीता
और कबीर हारा| मैं टूटे फूटे
अक्षरों से उस पर हस्ताक्षर कर दूंगा| तुम
सबको यह विजय पत्र दिखा देना| सर्वजित
ने विजय पत्र लिखा, परन्तु लिखते समय
कुछ का कुछ लिख गया| लिखना तो यह था कि
सर्वजीत जीता और कबीर हारा| परन्तु
लिख बैठा कबीर जीते और सर्वजित हारा| कबीर
जी ने उस पर हस्ताक्षर कर दिए| सर्वजित
ख़ुशी-ख़ुशी घर पहुँचा और
विजय पत्र माता को दिखाया| माता
विजय पत्र पढ़कर हँसी और उसे पत्र को वापस करते हुए कहा कि अच्छी तरह पढ़ इसमें क्या
लिखा है| सर्वजित ने पढ़ा तो
हैरान रह गया कि यह भूल उससे कैसे हो गई|
वह पुनः श्री कबीर साहिब जी के पास गया
और दोबारा विजय पत्र लिख कर उनके हस्ताक्षर करवाए| घर वापिस आकर माता को विजय पत्र दिया
तो माता ने पुनः लौटते हुए कहा कि अच्छी तरह पढ़ इसमें क्या लिखा है| सर्वजित ने पढ़ा तो उसमे फिर वही शब्द
लिखे हुए थे कि कबीर जीते और सर्वजित हारा|
यह पढ़कर वह बहुत लज्जित हुआ उसका सारा
अहंकार चूर-चूर हो गया| तब माता ने उसे समझाया कि तूने केवल
पुस्तकी विद्या पढ़ी है अब श्री कबीर साहिब जी की शरण में जाकर आत्मिक विद्या ग्रहण
कर| जिस विद्या को पढ़
लेने पर सारी विद्या अपने आप ही आ जाती है|
सर्वजित ने माता की बात मानकर परमसंत
श्री कबीर साहिब जी की शरण ग्रहण की और आत्म ज्ञान को प्राप्त कर अपना जन्म सफल कर
लिया| इस आत्म ज्ञान के
विषय में ही परमसंत श्री कबीर साहिब जी ने फ़रमाया है कि-
जो यह एक न जानिया, बहु जाने का होय|
एकै ते सब होत है, सब ते एक न होय||
जो यह एकै जानिया, तौ जानो सब जान|
जो यह एक न जानिया, तौ सबही जान अजान||
अर्थ- "यदि इस एक विद्या अर्थात आत्मिक विद्या
को ना जाना, तो अत: बहुत सारी विद्यायें
जानने से क्या होगा| क्योंकि एक आत्मिक विद्या
को जान लेने से सब विद्याओं का ज्ञान अपने आप हो जाता है| जबकि अन्य सब विद्याओं को जान लेने से
आत्मिक विद्या का ज्ञान नहीं होता||
*****
सेठ को उपदेश देना
एक बार की बात है,
कबीर साहिब जी कही से गुजर रहे थे तो रास्ते में उन्होंने एक दुकान पर एक सेठ को
देखा जोकि था तो बड़ा धनवान लेकिन हमेशा परेशान रहता था| कबीर साहिब तो वैसे ही
बहुत उच्च कोटि के संत थे वे हमेशा दूसरों की भलाई के बारे में सोचते थे जब वह सेठ
के पास गए तो उन्होंने सेठ से कहा कि सेठ जी मैं तुम्हारे अंदर कुछ सच की पहचान
करवाना चाहता हूँ तो यह सुनकर सेठ जी को गुस्सा आ गया और उसने कबीर साहिब को कहा- “मुझे
कोई सच की पहचान नहीं करनी अपना रास्ता नापो|”
लेकिन कबीर साहिब तो उच्च कोटि के महापुरुष थे वो तो दूसरों की भलाई के लिए बड़े से
बड़ा कष्ट भी सहन कर लेते थे| उन्होंने सेठ से फिर कहा- “सेठ
जी थोड़ी-सी बात सुन लो|”
तो सेठ ने कहा- “जल्दी बता दो मेरे
पास ज्यादा समय नहीं है|”
कबीर साहिब जी ने सेठ से कहा सेठ जी ये जो धन दौलत आप कमा रहे हो यह आपकी पिछली
कमाई है जो आपको अब मिल रही है कुछ अगले जन्म के बारे में भी सोचा है या नहीं|”
तो सेठ ने कहा कि तू कौन होता है मेरे जन्मों की चिंता करने वाला| कहते हैं जब सिर पर
मोह माया का भूत चढ़ा हो तो इन्सान किसी की
बात समझना नहीं चाहता यही हाल उस सेठ का था| कबीर साहिब ने सेठ से फरमाया कि- “कुछ
भगवान का नाम लिया करो| सत्संग में जाया करो| ये लोक भी संवरेगा और परलोक भी|”
लेकिन सेठ ने सुनी अनसुनी कर दी और कबीर जी को जाने के लिए कहा| कबीर साहिब जी
वहाँ से चले आये| कुछ समय बाद कबीर साहिब जी फिर वही से गुजर रहे थे, महापुरुष तो
वैसे भी बड़े कोमल स्वभाव के होते है, वे तो सांसारिक इंसान की दशा को समझते है|
उन्होंने सोचा पहले समय कुछ और था, अब कुछ और है क्या पता सेठ अब बात मान ले तो वे
दोबारा सेठ के पास गए और कहने लगे कि सेठ जी कुछ भजन भक्ति किया करो| यह तन बड़ा
अनमोल है, इसे सांसारिक काम-धंधो में बेकार मत गंवाओ| लेकिन इस बार भी सेठ ने कबीर
साहिब की बात नहीं मानी और कबीर साहिब को आगे जाने को कहा| काफी समय बीत गया|
एक
बार फिर कबीर साहिब जी वही से गुजर रहे थे, महापुरुषों का तो जन्म ही दूसरों के
कल्याण के लिए होता है फिर चाहे कोई उन्हें भला कहे या बुरा वे तो संसार में आते
ही है दुनिया को सही राह दिखाने के लिए, उन्होंने फिर सोचा पहले समय और था अब और
है, वे दोबारा सेठ के पास चले गए और सेठ से कहने लगे कि सेठ जी भक्ति किया करो जो
भक्ति नहीं करता उसे चौरासी के चक्कर में फँसना पड़ता है| यह सुनकर सेठ ने कबीर
साहिब जी से कहा- “तू
फिर आ गया, लगता है तू ऐसे नहीं मानेगा|”
सेठ ने अपने नौकरों से कहा कि इसे मार-मार कर बाहर निकालों| नौकरों ने ऐसा ही
किया| कबीर साहिब जी को बहुत कष्ट सहन करने पड़े और वे वापिस चले गए काफी समय बाद
एक बार कबीर साहिब जी सैर को जा रहे थे, रास्ते में उन्होंने देखा कि एक बैलगाड़ी
में काफी सारा सामान लदा हुआ है और बैल आगे नहीं बढ़ पा रहा है तथा उससे सामान का
बोझ नहीं उठाया जा रहा है और उस गाड़ी का मालिक बैल पर तेज-तेज कोड़े मारे जा रहा है
यह दृश्य देखकर कबीर साहिब जी के मन में आया कि देखे तो यह रूह कौन है? संतो के
पास तो शक्तियाँ होती है, उन्होंने पता लगाया| तो पता चला कि यह वही सेठ है जिसकी
दुकान पर कबीर साहिब जी जाया करते थे, वो अब बैल की योनि में आ गया है तो कबीर
साहिब बैल के पास गए और कहा कि सेठ जी हमने आपको समझाया था कि भजन-भक्ति किया करो
नहीं तो चौरासी के चक्कर में फंस जाओगे लेकिन आपने नहीं मानी| अब भुगतो योनियाँ|
ठीक इसी प्रकार जो इंसान भगवान के दिए इस सुंदर मानव शरीर का कोई लाभ नहीं उठाता,
मालिक की भक्ति नहीं करता, उसे चौरासी के चक्कर में फँसना पडता है |
*****
शिष्य इंदुमती की
भक्ति
एक कथा संत कबीर जी
के समय की है| उनकी एक शिष्य रानी इन्दुमती नाम- उपदेश धारण करने के बाद नाम के
अभ्यास और ध्यान के द्वारा निजधाम पहुँच गई| वहाँ उसने श्री कबीर साहिब जी को
परमात्मा के सिंहासन पर विराजमान देखा| उसने श्री कबीर साहिब से विनती की कि यदि
आपने मुझे पहले बताया होता कि आप स्वयं ही परम पिता परमेश्वर है, तब मैं आपको उस
समय ही भगवान मान लेती| श्री कबीर साहिब जी ने उत्तर दिया,- “उस
समय तुमने मुझ पर विश्वास नहीं करना था|”
हजारों लोग सतगुरु के पास आते है, वे उनके दर्शन करते हैं, उनके प्रवचनों को सुनते
हैं और उनके बारे में अपने -2 विचारों और भावनाओं का निर्माण करते हैं| कुछ उन्हें
दयालु महानुभाव मानते हैं| कुछ उन्हें तत्व ज्ञानी समझते हैं; कुछ उन्हें विद्वान
समझते हैं, कई और लोग उन्हें ब्रह्म ज्ञानी मानते हैं| अपनी-2 बुद्धि के अनुसार सब
उनकी प्रशंसा करते हैं| लेकिन कोई विरला मनुष्य ही उनको परमात्मा के रूप में देखता
है| यदि सतगुरु केवल साधारण मनुष्य ही होते तो वे हमें मानवी गुणों के अतिरिक्त
कुछ और नहीं दे सकते थे| वास्तव में वे सबकी बुद्धि से परे और दिव्य पुरुष होते
है, केवल प्रभु की कृपा से यानि (उनकी) सतगुरु की अपनी कृपा से उनके दिव्य स्वरुप
को पहचाना जा सकता है| सदैव उनकी कृपा की याचना करो|
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कद्दू की तीर्थ
यात्रा
एक बार एक व्यक्ति के मन में इच्छा उठी
कि वो क्यों ना सारे-के-सारे तीर्थ स्थानों पर हो आए ताकि उसके पाप धुल जाए और
कर्म भी बन जाए अब इसी आस में वह तीर्थ स्थानों पर जाने के लिए तैयार हुआ| रास्ते में उसे पता चलता है कि कबीर
साहिब जोकि बड़े उच्च कोटि के सन्त हैं|
वो भी इसी स्थान पर रुके हुए हैं|
तो उस व्यक्ति के मन में कबीर साहिब जी से मिलने की इच्छा हुई जब वह कबीर जी से
मिला| उसने अपने बारे
में बताया, और यह भी बताया कि मैं तीर्थ स्थानों पर जा रहा हूँ| अन्त में उस व्यक्ति ने कबीर जी से
विनय की, कि आप भी मेरे साथ
तीर्थ स्थानों पर चले|
महापुरुष तो बहुत ज्ञानी होते हैं,
तभी कबीर जी को एक युक्ति सोची|
उन्होंने उस व्यक्ति को एक कद्दू दिया और कहा कि जहाँ-जहाँ जाओगे तीर्थ स्थान पर
इस कद्दू को भी ले जाना और इसे भी स्नान करवाना और जब वापिस आओ तीर्थ स्थानों से
तो यह कद्दू मुझे वापिस देते जाना|
उस व्यक्ति ने ऐसा ही किया जहाँ-जहाँ वह जाता तीर्थ स्थान पर कद्दू साथ ले जाता और
कद्दू को भी स्नान करवाता|
जब वह वापिस आया कबीर जी के पास तो वह काफी थक चुका था उसने वह कद्दू कबीर जी को
दिया| कबीर जी ने उस
व्यक्ति को कहा कि तुम काफी थक चुके हो कुछ देर विश्राम कर लो, तुम्हारे लिए भोजन की व्यवस्था कर देते
है तब उस व्यक्ति ने ऐसा ही किया|
इतने में कबीर साहिब जी ने अपने घर में भोजन की व्यवस्था कर दी और भोजन में जो
सब्जी बनवाई वो उसी कद्दू की बनवाई जोकि इतने दिनों में कड़वा हो चुका था अब जब उस
व्यक्ति ने सब्जी खानी शुरू की तो वह तो थूकने लगा तो कबीर साहिब जी ने उस व्यक्ति
से पूछा कि क्या हुआ तो उसने बताया कि यह तो बड़ी कड़वी सब्जी है| तो कबीर साहिब जी ने उस व्यक्ति से
पूछा कि यह वही कद्दू है जो आप तीर्थ स्थानों पर ले गए थे| लेकिन तीर्थ स्थानों से आने के बाद भी
यह कड़वा ही है| तो उस व्यक्ति ने
कहा कि कद्दू की प्रवृति है कि ज्यादा दिन पड़ा रहे तो वह कड़वा हो जाता है, तीर्थ
स्थानों पर जाने से उसकी प्रवृति बदल थोड़ी ना जाएगी तो कबीर साहिब जी ने फ़रमाया कि
यही तो मैं आपके मुख से सुनना चाहता था कि तीर्थ स्थानों पर जाने से इंसान का
स्वभाव तो नहीं बदलता|
स्वभाव तो वैसे का वैसा ही रहता है अगर हम सोचे| कि तीर्थ स्थानों में जाने से हमारे
पाप धुल जायेंगे तो ऐसा नहीं होता|
पाप को मिटाने के लिए हमे अपने में बदलाव लाना पड़ेगा|
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चोर की रक्षा
एक बार एक चोर चोरी करने के बाद अपने
आप को पीछा करती हुई पुलिस से बचाने हेतु सन्त कबीर जी के घर में घुस गया| सन्त कबीर साहिब जी ने चोर को देखा तो
सारी बात समझ आ गई| उन्होंने उसे
तुरंत ही साथ वाले कमरे में जाने के लिए कहा|
शीघ्र ही पुलिस उस चोर के बारे में पूछती हुई श्री कबीर जी के घर में प्रवेश हुई| श्री कबीर साहिब जी ने उत्तर दिया, मैंने किसी को नहीं देखा, दूसरे कमरे में मेरे बच्चे गहरी नींद
में सो रहे है| तब पुलिस ने सारे
घर की तलाशी ली और चली गई|
अब तो चोर बहुत शर्मिन्दा हुआ तथा जाने के लिए तैयार ही था| कि श्री कबीर साहिब जी ने उसे भोजन
दिया| चोर माफ़ी माँगते
हुए उनके चरणों में गिर पड़ा तथा प्रतिज्ञा की- कि भविष्य में वह बुरे काम नहीं
करेगा| तब कबीर साहिब जी
ने उसे पवित्र नाम की दीक्षा दी|
उस नाम का सुमिरण ही मनुष्य को बुराई और भलाई दोनों से ऊपर उठाने में सहायता करता
है| इस तरह से उस चोर
का जीवन एक सदाचारी जीवन बन गया|
लालच का त्याग करके सच्चाई तथा भक्ति मार्ग पर चलने लगा| जब मनुष्य सन्त महापुरुषों की शरण में
आता है तो उसे अच्छे और बुरे की विवेक शक्ति प्राप्त होती है| बुराई अच्छाई से दब जाती है| बुराई से
किस प्रकार ऊपर उठना है, यह सन्त महापुरुषों से सीखा जाता है| दुनिया में अच्छे तथा बुरे कर्म करने
वालो में भिन्नता इस प्रकार दर्शायी गई है|
जैसे कि सन्त कबीर साहिब जी ने कहा है-
हंसा बगुला एक रंग, मानसरोवर माँहि|
बगुला ढूंढें माधुरी, हंसा मोती खाहि||
अर्थात हंस और बगुला दोनों पक्षी एक ही
रंग और प्राय: एक ही आकार के
होते है| तथा दोनों मान
सरोवर में रहते हैं| लेकिन विलक्षण
अंतर दोनों में यह है कि बगुला मछली ढूंढ़ता है जबकि हंस मोती चुगता है||
*****
भगवान
की लीला
भगत
जी, आज घर मे खाने को कुछ नही है,आटा, नमक,दाल, चावल,गुड़
शक्कर सब खत्म हो गया है,शाम को बाजार से आते हुए घर के लिए राशन का सामान लेते आईयेगा|
कन्धे पर कपड़े का थान लादे,
हाट बाजार जाने की तैयारी करते हुए,
भगत कबीर जी को माता लोई जी ने सम्बोधन करते हुए कहा देखता हूँ,
लोई जी, अगर कोई अच्छा मूल्य मिला,
तो निश्चय ही घर मे आज धन धान्य आ जायेगा| कबीर जी ने उत्तर दिया| सांई जी,
अगर अच्छी कीमत ना भी मिले तब भी इस बुने थान को बेच कर कुछ राशन तो ले आना,
घर के बड़े बूढ़े तो भूख बर्दाश्त कर लेंगे पर कमाल और कमाली अभी छोटे हैं, उनके
लिए तो कुछ ले ही आना, जैसी मेरे राम की इच्छा,
ऐसा कह के कबीर जी बाजार को चले गए| बाजार में
उन्हें किसी ने पुकारा वाह सांई,
कपड़ा तो बड़ा अच्छा बुना है,
ठोक भी अच्छी लगाई है, तेरा परिवार बसता रहे,
ये फकीर ठंड में कांप कांप कर मर जाएगा,
दया के घर मे आ, और रब के नाम पर 2 चादरे
का कपड़ा इस फकीर की झोली में डाल दे| 2
चादरे में कितना कपड़ा लगेगा फकीर जी? फकीर
ने जितना कपड़ा मांगा,
इतेफाक से कबीर जी के
थान में कुल कपड़ा उतना ही था| कबीर जी ने थान फकीर को दान कर दिया
दान करने के बाद,
जब घर लौटने लगे तो उनके सामने अपनी माँ नीमा, वृद्ध
पिता नीरू, छोटे बच्चे कमाल और कमाली के भूखे चेहरे नजर आने लगे
फिर लोई जी की कही
बात घर मे खाने की सब सामग्री खत्म है,दाम
कम भी मिले तो भी कमाल ओर कमाली के लिए कुछ ले आना अब दाम तो क्या?
थान भी दान जा चुका था| कबीर गंगा तट पर आ गए| जैसी मेरे राम की इच्छा, जब
सारी सृष्टि की पालना वह खुद करता है, अब
मेरे परिवार की पालना भी वो ही करेगा, कबीर अपने राम की बन्दगी में खो गए| अब
भगवान कहां रुकने वाले थे, कबीर ने सारे परिवार की जिम्मेवारी अब उनके सुपुर्द कर दी थी
अब भगवान जी ने कबीर जी की झोपड़ी का दरवाजा खटखटाया कौन है
माता
लोई जी ने पूछा कबीर का घर यहीं है ना? भगवान
जी ने पूछा! घर से आवाज आई हांजी,
लेकिन आप कौन? सेवक की क्या पहचान होती है भगतानी? जैसे
कबीर राम का सेवक, वैसे मैं कबीर का सेवक ये राशन का सामान रखवा लो| माता लोई जी
ने दरवाजा पूरा खोल दिया फिर इतना राशन घर मे उतरना शुरू हुआ कि घर के जीवों की घर
में रहने की जगह कम पड़ गई इतना सामान, कबीर
जी ने भेजा? मुझे नही लगता हाँ भगतानी,
आज कबीर का थान सच्ची सरकार ने खरीदा है| जो
कबीर का सामर्थ्य था उसने भुगता दिया जो मेरी सरकार का सामर्थ्य है वो चुकता कर
रही है जगह और बना, सब कुछ आने वाला है भगत जी के घर में शाम ढ़लने लगी थी,रात
का अंधेरा अपने पांव पसारने लगा था| समान रखवाते रखवाते लोई जी थक चुकी थी,
नीरू और नीमा घर मे अमीरी आते देख खुश थे, कमाल
ओर कमाली कभी बोरे से शक्कर निकाल कर खाते, कभी
गुड़,कभी मेवे देख कर मन ललचाते, झोली
भर भर कर मेवे ले कर बैठे उनके बाल मन, अभी
तक तृप्त नही हुए थे| कबीर अभी तक घर नही आये थे|
सामान आना लगातार जारी था| आखिर लोई जी ने हाथ जोड़ कर कहा सेवक जी,
अब बाकी का सामान कबीर जी के आने के बाद ही आप ले आना,हमे
उन्हें ढूंढने जाना है, वो अभी तक घर नही आए| वो तो गंगा किनारे सिमरन कर रहे हैं,
भगवन बोले| नीरू, नीमा, लोई जी,
कमाल और कमाली को ले गंगा किनारे आ गए| कबीर जी को समाधि से उठाया सब परिवार को सामने
देख, कबीर जी सोचने लगे जरूर ये भूख से बेहाल हो मुझे ढूंढ रहे हैं|
इससे पहले कबीर जी कुछ बोलते उनकी माँ नीमा जी बोल पड़ी कुछ पैसे बचा लेने थे,
अगर थान अच्छे भाव बिक गया था,
सारा सामान तूने आज ही खरीद कर घर भेजना था क्या?
कबीर जी कुछ पल के लिए विस्मित हुए फिर लोई जी, माता
पिता और बच्चों के खिलते चेहरे देख कर उन्हें एहसास हो गया जरूर मेरे राम ने कोई लीला
कर दी है, उन्होंने कबीर से कहा कि अच्छी सरकार को आपने थान बेचा, वो
तो समान घर मे फैंकने से रुकता ही नही था, पता
नही कितने वर्षों तक का राशन दे गया, उससे
मिन्नत कर के रुकवाया, बस कर, बाकी कबीर जी के आने के बाद उनसे पूछ कर कहीं रखवाएँगे लोई जी
ने शिकायत की कबीर हँसने लगे और बोले लोई जी, वो
सरकार है ही ऐसी, जब देंना शुरू करती है तो सब लेने वाले थक जाते है, उसकी
बख्शीश कभी भी खत्म नही होती,उस
सच्ची सरकार की तरह सदा कायम रहती है|
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कबीर
और माता लोई का त्याग
एक बार बारिश के मौसम में कुछ साधु- महात्मा अचानक कबीर जी के घर आ गए, बारिश के कारण कबीर साहिब जी बाज़ार में कपड़ा बेचने नही जा सके, और घर पर खाना भी काफी नही था, उन्होंने अपनी पत्नी लोई से पूछा, "क्या कोई दुकानदार कुछ आटा -दाल हमें उधार दे देगा, जिसे हम बाद में कपड़ा बेचकर चुका देंगे" पर एक गरीब जुलाहे को भला कौन उधार देता जिसकी कोई अपनी निशिचत आय भी नही थी| लोई दुकानदार के पास सामान लेने गई पर सभी ने नकद पैसे माँगे| आखिर एक दुकानदार ने उधार देने के लिए उसके सामने एक शर्त रखी, वह एक रात उसके साथ बिताएगी, इस शर्त पर लोई को बहुत बुरा तो लगा, लेकिन वह खामोश रही, जितना आटा-दाल उन्हें चाहिए था, दुकानदार ने दे दिया, जल्दी से घर आकर लोई ने खाना बनाया, और जो दुकानदार से बात हुई थी कबीर साहिब को बता दी, रात होने पर कबीर साहिब ने लोई से कहा कि दुकानदार का क़र्ज़ चुकाने का समय आ गया है, साथ में यह भी कहा कि चिंता मत करना, सब ठीक हो जाएगा, जब वह तैयार हो कर जाने लगी, कबीर जी बोले क़ि बारिश हो रही है और गली कीचड़ से भरी है, तुम कम्बल ओढ़ लो, मैं तुम्हें कंधे पर उठाकर ले चलता हूँ| जब दोनों दुकानदार के घर पर पहुँचे , लोई अन्दर चली और कबीर जी दरवाजे के बाहर उसका इंतज़ार करने लगे| लोई को देखकर दुकानदार बहुत खुश हुआ, पर जब उसने देखा की बारिश के बावजूद न लोई के कपड़े भीगे है और ना पाँव, तो उसे बहुत हैरानी हुई, उसने पूछा " यह क्या बात है क़ि कीचड़ से भरी गली में से तुम आई हो, फिर भी तुम्हारे पाँवो पर कीचड़ का एक दाग भी नही , तब लोई ने जवाब दिया " इसमें हैरानी की कोई बात नही, मेरे पति मुझे कम्बल ओढ़ा कर अपने कंधे पर बिठाकर यहाँ पर लाये है| यह सुनकर दुकानदार बहुत दंग रह गया, लोई का निर्मल और निष्पाप चेहरा देखकर वह बहुत प्रभावित हुआ और अविश्वास से उसे देखता रहा, जब लोई ने कहा कि उसे पति कबीर साहिब जी वापस ले जाने के लिए बाहर इंतज़ार कर रहे है तो दुकानदार अपनी नीचता ओर कबीर साहिब जी की महानता को देखकर शर्म से पानी-पानी हो गया| उसने लोई ओर कबीर साहिब जी से दोनों घुटने टेक कर क्षमा माँगी| कबीर साहिब जी ने उसको क्षमा कर दिया और दुकानदार, कबीर जी के दिखाए हुए मार्ग पर चल पड़ा जोकि था परमार्थ का मार्ग, और समय के साथ उनके प्रेमी भक्तों में गिना जाना लगा| भटके हुए जीवों को सही रास्ते पर लाने के लिए संतो के अपने ही तरीके होते है
" संत न छोड़े संतई चाहे कोटिक मिले असंत ,
चन्दन विष व्यामत नही लिपटे रहत भुजंग "
पूर्ण संत हर काल में हर किसी के मन की मैल और विकारों को हटाकर प्रभु का ज्ञान करवाकर प्रभु की कृपादृष्टि का पात्र बना देते है|
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यह
तन विष की बेलरी
ये वचन परमसन्त भी कबीर साहिब जी के हैं उन्होने ये वचन उस समय
फरमाये थे जब एक जिज्ञासु श्री कबीर साहिब जी से नाम दीक्षा लेने और उन्हें अपना
गुरु धारण करने के लिये उनके श्री चरणों में उपस्थित हुआ था। जब वह श्री कबीर
साहिब जी के घर गया तो वे उस समय घर पर नहीं थे। घर में माता लोई जी थीं। माता लोई
जी को उसने प्रणाम किया और अपने आने का कारण बताया कि मैने सत्संग में श्रवण किया
है और सद्शास्त्रों में भी पढ़ा हैं कि
दुधां बाझ न रिझदी खीर जिवें मुर्शिद
बाझ न मिलें रहमान भाई।
लिखया विच हदीसां दे आया ऐ हुक्म अल्लाह दा विच कुरान भाई।।
मैंने सुना है कि जिस प्रकार दूध के बिना खीर नहीं बनती इसी तरह
ही सतगुरु के बिना परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती, ना हीं परलोक मे जीव की सद्गति
होती है। श्री कबीर साहिब जी की बड़ी महिमा सुनी है कि वे परमात्मा से मिलाने वाले
हैं, भवसागर से पार लगाते हैं। इसलिये उनसे नाम दीक्षा लेने और
उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु बनाने के लिये उपस्थित हुआ हूँ। माता लोई ने कहा कि
वे अभी घर पर नहीं हैं देर से आयेंगे। आपको अगर जल्दी हो तो नाम दीक्षा मैं भी दे
सकती हूँ क्योंकि उनकी मुझे आज्ञा है नाम देने का अधिकार उन्होंने मुझे दे रखा है।
उस जिज्ञासु ने विनय की कि ठीक है आप ही नाम दीक्षा दे दीजिए आपकी अति कृपा होगी।
माता लोई अन्दर गर्इं। एक तराजू और छुरी लेकर बाहर आर्इं और उस जिज्ञासु के सामने
बैठकर छुरी तेज़ करने लगी। वह जिज्ञासु ये देखकर बड़ा हैरान भी हुआ और भीतर- भीतर
भयभीत भी हो रहा था और सोचने लगा कि नाम दीक्षा देने में छुरी तेज़ करने का क्या
काम है? कहीं मैं गलत जगह पर तो नहीं आ गया? उसने
माता लोई से कहा कि पहले आप मेरा काम करदें तो अति कृपा होगी? माता
लोई ने कहा कि आपका ही काम कर रही हूँ। उसने कहा कि मेरा ही काम कर रहीं हैं? मैं
समझा नहीं। माता लोई ने कहा इस छुरी से तुम्हारा सिर काटा जायेगा और उसे इस तराज़ू
के एक पलड़े में रखा जायेगा। दूसरे पलड़े में गुरुमन्त्र (प्रभु का सच्चा नाम) रखा
जायेगा अगर तुम्हारा सिर नाम के बराबर वज़न में तुल गया तो नाम दे दिया जायेगा और
वज़न में अगर कम रहा तो नाम नहीं मिलेगा। यह सुनते ही वह भयभीत होकर वहाँ से नौ दो
ग्यारह हो गया और मन में कहने लगा जो मैं विचार कर रहा था कि मैं कहीं गलत जगह पर
तो नहीं आ गया? मेरा विचार ठीक ही निकला। जब सिर ही कट जायेगा तो नाम कौन लेगा? नाम
तो क्या मिलना था जान से और हाथ धो बैठता। वह डर के भागा जा रहा था और श्री कबीर
साहिब जी के बारे में भला बुरा कहता जा रहा था। आगे से रास्ते में श्री कबीर साहिब
जी मिल गये ।उन्होंने उसे रोक कर उससे पूछा कि भाई श्री कबीर साहिब ने तुम्हारा
क्या बिगाड़ा है? जो उन्हें भला बुरा कह रहे हो? श्री
कबीर साहिब जी को वह व्यक्ति पहचानता नहीं था। उसने अत से इति तक सब वृतान्त कह
सुनाया कि उनकी बड़ी महिमा सुनी थी परन्तु वहाँ तो सब कुछ उसके विपरीत ही पाया। बड़ी
मुश्किल से जान बचा कर आया हूँ नहीं तो आज काम तमाम हो जाता। जान बची सो लाखों
पाये। श्री कबीर साहिब जी ये सुनकर मन ही मन मुस्काये और सोचने लगे ये बेचारा
कच्चा जिज्ञासु है। इसे शरीर की नश्वरता और सतगुरु के नाम की कीमत, महत्व
और प्रभाव का पता नहीं है। इसीलिये ऐसा कह रहा है। तब उन्होंने वचन उच्चारण किये।
ये तन विष की बेलरी गुरु अमृत की खान।
सीस दिये जो गुरु मिलें तो भी सस्ता जान।।
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भिखारी
को ज्ञान
एक
बार श्री कबीर साहिब जी रमता राम भ्रमण करते हुए एक स्थान पर पहुँचे| वहाँ पर एक
व्यक्ति हाथ पसारे भिक्षा माँग रहा था| श्री कबीर साहिब जी ने पूछा, “क्यों
भाई इतनी अपार सम्पति का मालिक होते हुए भी तू भिक्षा माँग रहा है?”
भिक्षुक ने कहा- “महाराज, मैं तो अति
दरिद्र व कंगाल हूँ| सारा दिन भिक्षा याचना करते-2 ही व्यतीत हो जाता है और जो कुछ प्राप्त होता है, उसी से
अपनी पूर्ति करता हूँ| श्री कबीर साहिब जी ने फरमाया – “अरे
भाई| तुम कंगाल हो? तो
ऐसा करो मैं तुम्हे दस हजार रुपये देता हूँ और तुम मुझे अपनी एक आँख निकाल कर दे
दो|”
भिखारी बोला- “मैं अपनी आँख नहीं
दे सकता|”
तब उन्होंने कहा- “अच्छा| तो बीस हजार में एक हाथ काट कर दे दो
अथवा पच्चीस हजार में एक पाँव काट कर दे दो|”
इस प्रकार श्री कबीर साहिब जी ने उससे प्रत्येक अंग देने के लिए अनुरोध किया और यह
भी कहा कि बदले में जितना धन कहोगे देंगें परन्तु उसने तो एक भी बात स्वीकार न की
| उसने कहा- “महाराज, यदि मैं
अपना अंग काट कर दे दूँ तो मैं अपंग हो जाऊंगा| अपने शारीरक क्रिया कलाप के भी
योग्य न रहूँगा| इसलिए मैं ऐसा किसी मूल्य पर भी नहीं कर सकता|”
संत महापुरुष तो जीव को समझाने तथा सत्य पथ पर अग्रसर करने के लिए कौतुक रचाते है|
श्री कबीर साहिब जी कहने लगे- “जब
तुम्हारा एक-2 अंग इतना बहुमूल्य है तो सब अंगों को मिला कर तुम्हारे शरीर की कितनी
कीमत हुई? फिर तुम इतनी सम्पदा के मालिक होकर दरिद्र कैसे हुए? इन अंगों के साथ-2
अन्य भी कई सम्प्रदायें मालिक ने मनुष्य को प्रदान की है, जिनका मूल्याँकन नहीं
किया जा सकता और ऐसे अनमोल शरीर को पा कर तुम मालिक की भक्ति करके इस लोक में सुखी
अर्थात मालामाल हो जाओ और परलोक भी सवार लो|
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सच्चे नाम की कमाई
एक बार काशी से एक बड़ा सेठ किसी काम से
बोम्बे को गया वहाँ एक दिन वह कुछ खरीदने के लिए किसी दूकान पर गया तो उसने दूकान
दार को बताया कि मैं काशी से आया हूँ तो वह दूकान दार कहने लगा कि वही काशी जहाँ
पर कबीर जी रहते है वह सेठ यह सुनकर हैरान हो गया कि कबीर जी तो छोटी सी झोपड़ी में
रहते है मैं काशी में सबसे ज्यादा पैसे वाला हूँ तो लोग मुझे नहीं जानते लेकिन
कबीर जी को जानते है यहीं मन में उसके विचार चलने लगा जब वह काशी वापिस गया तो वो
पहले अपने घर नहीं गया सीधा कबीर जी के पास गया और वहाँ जाकर कबीर जी से कहने लगा
कि आपके पास ऐसा क्या है ऐसा कौन सा धन है आपके पास जो आपके नाम से काशी प्रसिद्ध
है और मेरे पास इतनी दौलत है जितनी काशी में किसी के पास नहीं लेकिन मुझे कोई नहीं
जानता तब कबीर जी ने फरमाया कि काशी तो क्या अगर आप ह्रदय के अंदर सच्चे नाम की कमाई करोंगे तो ये बाहर
की काशी आपके अंदर बस जाएगी और जिस महादेव के दर्शन करने काशी में आती है उन्हीं
महादेव आपको ह्रदय में होंगे|
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धन को तुच्छ जाना
कमाल साहिब परम संत
श्री कबीर साहिब जी के गुरुमुख चेले थे और नाम भक्ति की सच्ची व सार सम्पदा से
मालोमाल थे| उनकी ख्याति सुनकर काशी नरेश ने उनकी परीक्षा लेने का विचार किया| वे
एक अत्यंत मूल्यवान हीरा लेकर कमाल साहिब के पास गए और चरणों में हीरा रखते हुए
कहा –‘मेरी ओर से यह तुच्छ भेंट स्वीकार करो|’ कमाल साहिब ने कहा कि मैं इस पत्थर
के टुकड़े को लेकर क्या करूँगा? काशी नरेश बोले यह पत्थर नहीं बहुमूल्य हीरा है|
इसे रख लीजिये, काम आएगा| कमाल साहिब ने हँसते हुए कहा –‘ऐसे कंकड़-पत्थर हजारों की
संख्या में इधर उधर बिखरे पड़े है| क्या मैं अब भजन छोड़कर उन पत्थरों को बटोरना
शुरू कर दूँ?’ काशी नरेश फिर भी जिद्द पर अड़े रहे और बोले- ‘यह हीरा मैं आपकी झोपड़ी
में रख जाता हूँ, आवश्यकता पड़ने पर आप इसे उपयोग में ला सकते हो|’ यह कहकर काशी
नरेश ने वह हीरा उनके सामने ही झोपड़ी में रख दिया और वापिस चले गए| काफी समय के
बाद वे फिर कमाल साहिब के चरणों में उपस्थित हुए और उनसे हीरे के विषय में पूछा|
कमाल साहिब ने कहा-‘कौन सा हीरा?’ काशी नरेश ने कहा-‘वही हीरा जो मैं आपकी कुटिया
में रख गया था|’ कमाल साहिब ने कहा –‘मुझे तो कुछ याद नहीं है जहाँ रखा हो वही से
उठा लो|’ काशी नरेश ने देखा तो हीरा वहीँ पर वैसा का वैसा पड़ा हुआ था| हीरे को
देखकर काशी नरेश को बड़ा आश्चर्य हुआ| उन्होंने हीरा कमाल साहिब के समक्ष रखते हुए
कहा –‘मैं इस हीरे की बात कर रहा हूँ| इसका मूल्य कई लाख है|’ कमाल साहिब हँसते
हुए बोले –‘कमाल है| अभी भी आप वही
गलती कर रहे हैं और इस पत्थर को हीरा कह रहे है|’ काशी नरेश समझ गए कि कमाल साहिब
की दृष्टी में संसारिक धन-पदार्थ सब तुच्छ है| वे उनके चरणों में नतमस्तक हो गए|
इसी प्रकार भक्तिमयी रबिया संसारिक दृष्टी से यद्यपि अत्यंत ही निर्धन थी, परन्तु
नाम-भक्ति के सच्चे धन से मालोमाल थी| एक दिन एक धनवान व्यक्ति जिसके मन में रबिया
के लिये बड़ा सम्मान था उसके पास आया| वह ऊंट पर सोने की मोहरे बांध के लाया था,
जिनका मूल्य हजारों रुपए था| उसने वे स्वर्ण मुद्राएँ उसके सामने रखते हुए कहा कि
मेरी ओर से यह तुच्छ भेंट स्वीकार कीजिये| रबिया ने कहा –‘मैं इनका क्या करुँगी?’
उस व्यक्ति ने कहा कि आप प्रभु की भक्त है इसलिए मैं आपका बहुत आदर करता हूँ| आप
इतनी निर्धनता में दिन गुजारे और फटे वस्त्र पहने ये मुझे सहन नहीं होता| इसलिए मेरी ओर से ये तुच्छ भेंट
स्वीकार करनी ही होगी| राबिया ने कहा –‘मैं इन कंकड़ो को कहाँ संभालती फिरुंगी?
उचित यही है कि आप इन्हें वापिस ले जाओ|’ उस व्यक्ति ने बहुत आग्रह किया, परन्तु
राबिया किसी तरह भी वह धन लेने को राजी ना हुई| वह व्यक्ति मन ही मन विचार करने
लगा कि रबिया के पास ऐसे कौन सी मुद्राएँ है जिसके कारण ये इन स्वर्ण-मुद्राओं को
पत्थरों से अधिक महत्व नही देती? वही वस्तु प्राप्त करने का मुझे यत्न करना चाहिए|
यह विचार कर उसने अपना सारा धन दींन दुखियों में बाँट दिया और रबिया के सम्मुख
उपस्थित होकर कहा ‘जिस वस्तु के कारण आप स्वर्ण मुद्राओं को पत्थर समझते हैं, मुझे
भी वह प्रदान कीजिये|’ रबिया ने उसे प्रसिद्ध फ़कीर हसन बंसरी के पास जाने का
परामर्श दिया| रबिया के परामर्श के अनुसार उसने बंसरी का शिष्यत्व ग्रहण किया| जिन
कृपा से वह भक्ति के सच्चे धन से मालोमाल हो गया|
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