दाँतो पर भाला रोकना
श्री प्रथम पादशाही जी ने एक बार वचन फरमाये कि एक तालाब के किनारे एक बगुला रहता था उसका यह स्वभाव था कि जब कभी मछली पकड़ता, उसको अपनी चोंच से पकड़ कर आकाश की ओर उछालकर फिर उसे अपनी चोंच से रोकता और निगल जाया करता| एक व्यक्ति ने उसे ऐसा करते देखकर मन में विचार किया कि इस करतब को सीखना चाहिए और वह मुँह से लकड़ी उछालकर दाँतों पर रोकने का अभ्यास करने लगा| धीरे-धीरे उसे अभ्यास हो गया| वह लोहे के भाले को उछालकर दाँतों पर रोकने का अभ्यास करने लगा| धीरे-धीरे उसे ऐसा अभ्यास हो गया वह लोहे के भाले को उछालकर अपने दाँतों पर रोकने लगा| उसके इस करतब की प्रसिद्धी दूर-दूर तक फ़ैल गई| एक राजा ने भी उस व्यक्ति के विषय में सुना और यह तमाशा देखने के लिए उसको अपने दरबार में बुलवाया| उसके करतब को देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ और उसने पूछा कि तुमने यह करतब कहाँ से सीखा और तुम्हारा गुरु कौन है| उस व्यक्ति को बगुले का नाम बताने में शर्म महसूस हुई| अत: वास्तविकता को छिपा कर कहने लगा- "राजा साहिब| मैंने यह करतब किसी से नहीं सीखा, यूँही अपने आप ही मुझको आ गया है राजा बड़ा दूरदर्शी था| वह अपने मंत्री से कहने लगा-इसको अपने गुरु का नाम लेने में शर्म आ रही है इसका कभी कल्याण ना होगा"| और हुआ भी ऐसा ही| दोबारा करतब दिखाते हुए जब वह भाला दाँतों पर रोकने लगा, तो उसके शरीर का संतुलन बिगड़ गया जिससे उसका मुँह खुल गया और भाला उसके गले से नीचे उतर गया और उसकी मृत्यु हो गई| यह कथा सुनकर श्री परमहंस दयाल जी ने फ़रमाया- सतगुरु तो तत्वज्ञान का उपदेश देते और भक्ति की दात बक्शते है, परन्तु उनके अतिरिक्त परमार्थी जीव को जहाँ कहीं से भी शिक्षा मिले, उसे वह शिक्षा ग्रहण कर लेनी चाहिए और उस प्राणी अथवा पदार्थ को अपना गुरु मान लेने तथा उसका नाम लेने में झिझकना नहीं चाहिए|
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दवाई का असर
श्री परमहंस अद्वैत मत के महान प्रवर्तक श्री श्री 108 श्री परमहंस दयाल जी श्री स्वामी अद्वैतानन्द जी महाराज के श्री चरणों में एक बार रायसाहिब दीवान ईश्वरदास जी उपस्थित हुए| दीवान ईश्वरदास जी के छोटे भाई का क्षयरोग के कारण देहांत हो गया था| दीवान साहिब उसके विषय में चर्चा करने लगे और श्री चरणों में निवेदन किया- महाराज जी| मैंने कितने ही अच्छे-अच्छे हकीमों और वैद्धों को उसे दिखलाया, हजारों तरह की दवाईयाँ दी गई, परन्तु कुछ भी लाभ ना हुआ क्या दवा आदि में कुछ भी असर नहीं होता? श्री परमहंस दयाल जी का प्राय: यह नियम था कि किसी भी विषय को अच्छी तरह समझाने के लिए कोई ना कोई प्रमाण दिया करते थे उस समय भी आपने ऐसा ही किया| श्री परमहंस दयाल जी ने फरमाया- हमें एक कहानी याद आई| एक हकीम साहिब दवा-दारु के विषय में अत्यंत प्रसिद्ध एव दक्ष थे| उनके हाथ में कुछ ऐसी शिफा थी कि जिस किसी का भी उपचार करते थे वह चाहे कैसा भी रोगी क्यों ना हो, ठीक हो जाता था| चिकित्सा शास्त्र की पुस्तकों से लदे सत्तर उँठ हमेशा उनके साथ रहते थे| एक बार वे कही जा रहे थे कि मार्ग में उन्हें एक विचित्र आकृति का व्यक्ति मिला| हकीम साहिब ने उनसे पूछा- तुम कौन हो और क्या करते हो| उसने उत्तर दिया- मैं मौत का फरिशता हूँ और लोगों के प्राण हरना मेरा काम है| हकीम साहिब ने पूछा- अब कहाँ जा रहे हो? उसने उत्तर दिया- आज अमुक व्यक्ति के प्राण लेने है| हकीम साहिब ने फिर पूछा- किस तरह से उसके प्राण लोगे? उसने कहा- उस व्यक्ति के पेट में ऐसा दर्द पैदा करूंगा जिससे वह अच्छा ना हो सकेगा और अंततः प्राण त्याग देगा| यह कहकर वह गायब हो गया| हकीम साहिब ने औषधियों का बक्सा संभाला और उस व्यक्ति के घर जा पहुँचे जिसके बारे में मौत के फ़रिश्ते ने बतलाया था| नियत समय पर जब उस व्यक्ति के पेट में दर्द प्रारंभ हुआ| तो उस रोग की एक अचूक औषधि उसे दी, परन्तु जब कोई लाभ ना हुआ तो फिर अन्य अनुभृत औषधियाँ आजमानी शुरू की| गोली, अर्क, चूरण, जोशांदा, माजून, अवलेह - सभी कुछ दिया, परन्तु कुछ असर ना हुआ, अपितु दर्द बढ़ता ही गया| अन्तत: दो तीन घंटे दर्द से तड़प-तड़पकर रोगी ने प्राण त्याग दिए| हकीम साहिब सोचने लगे कि जब मृत्यु अटल एवं अवश्य भावी है और कोई औषधि प्रभावकारी नहीं हो सकती, तो फिर हम उपचार किसका करें और ये पुस्तक तथा औषधियाँ लादे-लादे क्यों मारे-मारे फिरे? यह सोचा और सब सामान-पुस्तकें तथा औषधियाँ आदि लेकर इस निश्चय के साथ नदी के किनारे पहुँचे कि सब सामान नदी में डुबो देंगे कि उसी समय वही विचित्र आकृति का व्यक्ति सामने आ उपस्थित हुआ और कहने लगा- हकीम साहिब| यह क्या धुन सवार हुई? हकीम साहिब ने उत्तर दिया- जब इन औषधियों से रोगी को कोई फायदा ही नहीं होता, न इनका प्रभाव रोगी पर होता है, तो फिर इनके रखने से क्या लाभ? क्यों ना इनको डूबो दिया जाये? मौत के फ़रिश्ते ने कहा- हकीम साहिब| ऐसी बात नहीं है कि इन औषधियों में असर न हो| परमात्मा ने जिस वस्तु में जो असर रखा है| वह वस्तु वह असर अवश्य प्रकट करती है| परन्तु उसी समय जिस समय उसे प्रकट करने का अवसर मिले| फिर जितनी औषधियाँ हकीम साहिब ने रोगी को दी थी, वे सब दिखाकर के मौत के फ़रिश्ते ने कहा- जिस समय रोगी के गले से औषधि उतरती थी, मैं लेता जाता था उसे पेट में जाने ही नहीं देता था| अब आप ही बताइये कि असर कैसे प्रकट होता? असर तो तब प्रकट होता, जब मैं औषधि पेट में जाने देता? और हकीम साहिब को समझा- बुझाकर उन्हें औषधियाँ तथा पुस्तकें नदी में डुबोने से रोका| यह कथानक् सुनकर श्री परमहंस जी ने दीवान ईश्वरदास जी से फ़रमाया- दीवान साहिब| प्रभाव तो हर वस्तु का होता है, परन्तु जब मौत का समय आ जाता है, तो फिर कोई औषधि प्रभावकारी सिद्ध नहीं होती| सब औषधियाँ प्रभावहीन हो जाती हैं|
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नाविक से विद्वान ने प्रश्न किया
श्री परमहंस दयाल जी ने एक बार श्री वचन फरमाये के एक विद्वान व्यक्ति एक बार नदी पार करने के लिए नाव में सवार हुआ| कुछ समय बाद उस विद्वान ने नाविक से पूछा कि क्यों भाई तुम्हें खगोल विद्या आती है नाविक ने उत्तर दिया- साहिब! मैं क्या जानूँ| विद्वान ने कहा कि फिर तुम्हारा एक चौथाई भाग तो यूहीं गया| कुछ समय आगे चलकर नदी के दोनों ओर अनाज के हरे भरे वृक्षों को देखकर विद्वान ने नाविक से फिर पूछा कि क्या तुम वनस्पति विज्ञान के बारे में कुछ जानते हो| उत्तर मिला- हजूर| मैंने तो यह नाम आपके ही मुख से सुना है| विद्वान ने कहा कि फिर तुम्हारे जीवन का दूसरा चौथाई भाग भी व्यर्थ गया| थोड़ी देर बाद विद्वान का ध्यान नदी के जल की गति पर गया| तो उसने फिर प्रश्न किया- गणित के विषय में तो तुम्हें अवश्य ही जानकारी होगी| यह बात सुनकर नाविक बेचारा क्या कहता इसलिए मौन हो गया| तब विद्वान ने कहा कि फिर तुम्हारे जीवन का तीसरा चौथाई भाग भी व्यर्थ गया| अभी ये बाते हो ही रही थी कि एकाएक जोरों का तूफ़ान आया और नाव उलटने को हुई| नाविक ने पानी में छलांग लगाई और विद्वान को भी सम्बोधित करते हुए कहा- साहिब आप भी तैर कर आ जाये| विद्वान ने कहा कि भाई कैसे आये हमें तैरना नहीं आता| उनकी बाते सुनकर नाविक जला-भुना तो बैठा ही था उनका उत्तर सुनकर बोल उठा- तब तो आपका सारा जीवन ही नष्ट हो गया| अब अंतिम यात्रा की तैयारी कीजिये| यह कथा सुनाकर श्री परमहंस दयाल जी ने फ़रमाया कि वह विद्या किस काम की जो मनुष्य को मौत के कष्टों से बचने में कुछ सहायता न दे सके| इसलिए अध्ययन करके ब्रहम विद्या प्राप्त करनी चाहिए जिससे परलोक का मार्ग भी ख़ुशी-ख़ुशी कट जाये और मनुष्य संसार सागर से सुगमतापूर्वक पार हो जाये|
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बिना मजदूरी के काम
एक बार श्री परमहंस दयाल जी ने फरमाया कि कर्म चाहे एकाम हो या निष्काम| कर्म होते हैं उसका फल जरूर मिलता है लेकिन निष्काम कर्म का फल कई गुणा बढ़- चढ़कर मिलता है उदाहरण के लिए यू समझो कि एकाम कर्म करने वाला तो मजदूर के सामान है, जो कर्म करके सायंकाल मजदूरी लेकर प्रसंनतापूर्वक चलता बनता है| परन्तु इसके विपरीत कोई इस काम को बिना इच्छा के करता है तो वह मालिक का कृपापात्र बन जाता है इस पर हमें एक कथा याद आई है किसी नगर में एक विधवा रहती थी| उसका एक लड़का था वह स्त्री चक्की पीसकर अपने लड़के का पेट भरती थी एक दिन उनके वहाँ से राजा की सवारी निकली तो उसके लड़के ने देखा कि राजा रथ पे सवार होकर आ रहा है उसकी सेना भी उसके साथ है| जब राजा चला गया तो उस लड़के ने अपने साथियों से कहा- कि राजा ने मुझसे तो बात भी नहीं की| तो सभी उसकी हँसी उड़ाने लगे| यह बात उसके दिल में चुभ गई| उसने निश्चय कर लिया कि बात तो तब बनेगी जब राजा स्वयं मुझसे मेरा हाल पूछें| अब उस लड़के ने साधु संतों की शरण में जाना शुरू कर दिया वहाँ जाकर वह लड़का साधु संतों की सेवा करने लगा| वह उनके हर एक काम को बड़ी लगन और परिश्रम से करता कि वे सभी उससे बहुत प्रसन्न होते| अन्त में उन संतों ने एक दिन उस लड़के से कहा कि हम तुमसे बहुत प्रसन्न है| जो कुछ तुम्हें चाहिए माँग लो| तो उस लड़के ने कहा कि मेरे दिल में यही कामना है कि राजा मुझसे पूछे कि क्यों भाई तेरा क्या हाल है और तू क्या चाहता है? तो यह बात सुनकर साधु हैरान हो गए कि ये कैसी कामना है किसी अन्य चीज की आवश्यकता है तो माँग लो पर ये हम कैसे दे सकते है| तो उस लड़के ने कहा कि मेरी अभिलाषा तो यही है अगर आप इसे पूरा कर सकते है तो कर दे वरना मेरी और कोई इच्छा नहीं है| तो संतों ने उस लड़के को एक युक्ति बताई कि राजा का नया महल जो बन रहा है तुम वहाँ जाकर मजदूरी का काम शुरू कर दो और पूरी लगन से काम करना जब मजदूरी बटने लगे तब वहाँ से चल देना और यदि तुम्हें कोई मजदूरी देना चाहे तो कहना ये तो मेरे घर का काम है इसकी क्या मजदूरी लूँ| वे साधु सन्त तो वहाँ से चले गए और लड़के ने उस जगह पर जाकर काम करना शुरू कर दिया वहाँ ऐसा काम करने लगा कि और मजदूर एक टोकरी लाते इतने में वह तीन- चार टोकरी ला देता और काम खत्म करने के बाद मजदूरी भी ना लेता| कई दिन बीत गए एक दिन प्रबंधक ने उससे पूछा कि तुम मजदूरी क्यों नहीं लेते? तो उस लड़के ने कहा कि यह तो मेरे घर का काम है इसकी मजदूरी क्या लूँ | प्रबंधक बड़ा हैरान हुआ उसने लड़के को मजदूरी देनी चाही| परन्तु वह लडका हर बार वही उत्तर देता| एक दिन राजा भी वहाँ आ पहुँचा राजा ने जब उस लड़के को काम करते हुए देखा तो वह उसकी लगन को देखकर हैरान रह गया| उसने लड़के को कहा कि ये लड़का बडा मेहनती है इसे ज्यादा मजदूरी देना| तो प्रबंधक ने बताया कि हजूर ये तो हर समय ऐसे ही काम करता है और जब इसे मजदूरी देते हैं तो मना कर देता है कहता है कि मजदूरी किस बात की यह तो मेरे घर का काम है| राजा को भी बड़ा आश्चर्य हुआ उसने लड़के को बुला कर कहा- क्यों भाई क्या हाल है और तू क्या चाहता है? अपनी मजदूरी क्यों नहीं लेता? यह सुनते ही लड़का हाथ जोड़कर बोला- सरकार मैंने अपनी सब मजदूरी पा ली है| यह सुनकर राजा हैरान हो गया और पूछा कि तूने अपनी सारी मजदूरी कैसे पा ली| उसने उत्तर दिया कि मेरा एक मनोरथ था कि कभी राजा साहिब स्वयं मुझसे पूछे कि क्यों भाई| तेरा क्या हाल है और तू क्या चाहता है? मेरी यही अभिलाषा थी सो पूरी हो गई| राजा हैरान हुआ कि सचमुच निराला लड़का है जिसने इतनी सी बात के लिए इतना परिश्रम किया| वह उस पर प्रसन्न होकर उसे अपने साथ ले गए और उसे एक विशेष पद पर नियुक्त कर दिया| उसने उस पद पर भी बड़ी ईमानदारी से काम किया जिसे देखकर राजा के हृदय में उसका स्थान बन गया| बाद में उसे मंत्री बना दिया| तत्पश्चात अपनी इकलौती कन्या का विवाह उस लड़के से कर दिया| जब राजा की मृत्यु का समय निकट आया| तो राजा का पुत्र ना होने के कारण उस लड़के को अपना कार्य सौंप दिया| इस कथा को सुनाकर श्री परमहंस दयाल जी ने समझाया कि यदि वह लड़का मजदूरी ले लेता, तो वह कुछ ही रुपये होते और देखो दो- तीन मास के निष्काम कर्म से एक दिन विधवा का लड़का राजा बन गया, तो जो परमारथ के धाम में पहुँचने के लिए निष्काम कर्म करता है, क्या उसको उसका फल नहीं मिलेगा? नहीं ऐसा नहीं है| उसका फल उसे अवश्य मिलेगा| परमारथ की कृपा उस पर अवश्य उतरेगी और वह उसके प्यारो में गिना जाऐगा|
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हंस और परमहंस
एक दिन एक व्यक्ति ने श्री परमहंस दयाल जी के चरणों में विनय की| लंगर और भंडारों का काम तो व्यर्थ का मालूम होता है| इससे क्या लाभ होता है? यूँ ही साधु-महात्मा आकर खा-पी जाते हैं| यह सुनकर परमहंस दयाल जी ने फ़रमाया कि किसी राजा ने सुना कि मानसरोवर में हंस होते हैं और वहाँ बहुत सर्दी होती है तो हर किसी व्यक्ति का जाना वहाँ संभव नहीं| उस राजा के मन में हंसों को देखने का चाव उत्पन्न हुआ| उसने अपने एक बुद्धिमान मंत्री को बुलाकर अपना विचार प्रकट किया| तो मंत्री ने राजा से कहा कि मैं हंसों के दर्शन आपको यहीं करवा देता हूँ लेकिन इसमें धन बहुत खर्च होगा और लोग भी बाते बनायेंगे और कहीं उनकी बाते सुनकर आपके मन में मेरे प्रति गलत विचार ना आ जाए| राजा ने उसे हर तरह से विश्वास दिलवाया और कहा कि चाहे जितना भी धन व्यय हो, परन्तु हमको हंसों के दर्शन यहीं करा दो| मंत्री ने अपने राज्य के वन में पक्षियों को दाना डलवाने का प्रबंध करवाया और भांति-भांति का अनाज वन में प्रतिदिन डाला जाने लगा और हर प्रकार से पक्षियों की सुविधा का प्रबंध कर दिया गया| राजा का आदेश हो जाने के कारण कोई उन पक्षियों को कष्ट नहीं पहुँचा सकता था| इस सुविधा के कारण देश-देश के पक्षी वहाँ आकर एकत्र हो गए| यहाँ तक मानसरोवर के पक्षी उड़- उड़कर वहाँ चले आये और मानसरोवर खाली सा दिखाई देने लगा, तो एक दिन एक हंसिनी ने एक हंस से इसका कारण पूछा| उसने सब हाल कह दिया कि अमुक देश में पक्षियों के खाने पीने और रहने का बहुत अच्छा प्रबंध है, इसलिए सब पक्षी वहाँ चले गए है| अब तो हंसिनी ने वहाँ जाने के लिए हंस को भी बाध्य किया कि ऐसे धर्मात्मा और उदार व्यक्ति का, जो पक्षियों तक की देख-रेख करता है अवश्य दर्शन करना चाहिए| दोनों मानसरोवर से उड़कर उस राजा के देश में आये और मंत्री ने राजा को हंसों का दर्शन कराया| यह कथा सुनाकर श्री परमहंस दयाल जी ने फ़रमाया कि जब मनुष्य भण्डारे आदि में धन व्यय करता है और प्रत्येक धर्म के साधुओं का आना जाना बना रहता है तो उसकी उदारता तथा धार्मिक कार्यो के विषय में सुनकर कभी न कभी हंस और परमहंस भी वहाँ आ जाते हैं और भण्डारा करने वालो को अध्यात्मिक धन से मालोमाल कर देते हैं|
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लोगों की बातो में आना
एक दिन किसी वृद्ध कुम्हार का यात्रा पर जाने का सयोंग हुआ| उसका छोटा लड़का भी साथ था| उस लड़के को गधे पर सवार करके चल पड़े| मार्ग में कुछ व्यक्ति मिले| उन्होंने उसकी हँसी उड़ाते हुए कहा देखो बूढ़ा कैसा मूर्ख है लड़के को तो गधे पर बिठा रखा है और आप बूढ़ा होकर भी पैदल चल रहा है| वृद्ध ने उनको खुश करने के लिए लड़के को नीचे उतार कर पैदल चलने को कहा और स्वंय गधे पर सवार हो गया| कुछ दूर जाने पर एक अन्य व्यक्ति मिला| उसने कहा - वाह रे बूढ़े मियां| ये क्या बात है कि बच्चा तो पैदल चले और आप सवार होकर जा रहे हो| वृद्ध उसकी बात मान कर नीचे उतर गया और फिर दोनों पैदल चलने लगे| आगे चल कर किसी और व्यक्ति ने कहा- यह बूढ़ा कैसा मूर्ख है? आप भी पैदल चल रहा है और लड़के को भी पैदल घसीट रहा है और गधा है कि खाली चल रहा है| दोनों उस पर सवार क्यों नही हो जाते| यह सुनकर कुम्हार स्वयं भी गधे पर सवार हो गया और लड़के को भी चढ़ा दिया| कुछ दूर गए थे की एक और व्यक्ति मिला| उसने कहा बूढ़े| तू बड़ा जालिम है जो इस बेजुबान जानवर पर इतना बोझ लाद रखा है परलोक में इसका कुछ हिसाब भी होगा के नही ? अच्छा यही है की जितनी दूर तुम दोनों इस पर सवार हुए हो उतनी ही दूर - इसको उठाकर चलो| वृद्ध कुम्हार ने उसकी बात मानकर लड़के को उतार दिया और स्वयं भी उतर गया| तत्पश्चात गधे के चारों पैर बांधे और उस अपने कंधे पर बिठा कर रवाना हुआ| आगे चल कर एक नदी के पुल के ऊपर से गुजर रहे थे गधा बहुत प्यासा था| पानी देखे कर तड़प गया और कंधे से उछल कर नदी में जा में गिरा| पानी का बहाव अधिक था और उसके पाव बंधे हुए थे, इसलिए निकल न सका और डूब गया| वृद्ध दुःख से हाथ मलता रह गया| श्री परमहंस दयाल जी ने फ़रमाया - इस कथा से आश्रय यह है कि जो व्यक्ति सबको प्रसन्न करने का प्रयत्न करता है, वह सबको प्रसन्न तो कर नहीं सकता अपितु अपनी हानि अवश्य करा बैठता है| इसलिए भक्ति पथ पर चलने वाले जिज्ञासु को चाहिए कि संसारियों के कहे - सुने की परवाह ना करे और अपने उद्देश्य की पूर्ति में लगा रहे|
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राजा का अँगूठा कट गया
एक राजा बड़ा ही सत्यप्रिय था एवं संत सेवी था| एक बार संतों के दर्शनों को नंगे पैर गया, जब उनके दर्शन करके आ रहा था तो सहसा पैर में ठोकर लगी और अँगूठा घायल हो गया | बहुत दिनों तक उपचार करवाया , परन्तु कुछ लाभ न हुआ अन्त में अँगूठा काटा गया | तब पैर अच्छा हुआ| जो लोग भौतिकवादी थे उन्हें राजा का सत्संग में जाना पसंद नही था , उपरोक्त घटना से उनको निंदा करने का खूब अवसर मिला | राजा के मन में भी कुछ विचार उत्पन्न हुए, परन्तु अंत में सोचा की अवश्य ही इसमे कुछ भलाई होगी| एक दिन राजा शिकार के के लिए गया| और साथियों से अलग होकर वन में भटकता फिरता था की कुछ डाकुओं ने उसको पकड़ लिया और अपने सरदार के पास ले गए| वह एक यज्ञ कर रहा था, जिसकी समाप्ति पर बलिदान के लिए एक मनुष्य की आवश्यकता थी| अन्त में राजा को यज्ञशाला में ले गए| जब बलि देने लगे तो पंडित की दृष्टि राजा के पैर पर जा पड़ी और वह उठा की यह बलि के योग्य नही है| क्योंकि इसका अंग भंग है | डाकुओं ने भी उसके पैर का अँगूठा कटा हुआ देखकर उसे छोड़ दिया| तब राजा की समझ में आया की अँगूठा काटने में यह भेद था , वर्ना आज प्राण ही चले जाते| उस दिन से वह नितप्रति सत्संग में जाने लगा |
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मेंढ़कों को पकड़कर लाना
एक बार एक वैद्य जी थे जिसका प्रेम मालिक से बहुत था और वे भक्ति भाव में रहते थे| उनका एक मित्र था जो की सांसारिक काम धंधो में लगा रहता था| वैद्य जी उसे समझाते थे की कुछ भक्ति का काम कर लो, क्योंकि अंत में ये सभी काम धंधे यही रह जाने है लेकिन उसका मित्र हमेशा यही कहता कि मेरे जिम्मे कितने अधिक काम है उन कामो से फुर्सत मिल जाये तो मैं और तुम दोनों हरिद्वार चलेंगे फिर दोनों खूब सिमरण करेंगे| वैद्य जी ने उसे समझाया की भजन - सिमरण के लिए हरिद्वार जाना जरूरी नही है ना ही काम धंधे छोड़ने की जरूरत है संसार के काम धंधो के साथ- साथ ही मनुष्य भजन का असली काम कर सकता है| लेकिन उसको कुछ समझ ना आई| एक दिन वैद्य जी के घर पर वही मित्र आया हुआ था| वही निकट में वर्षा होने के कारण मेंढक टर्र- टर्र कर रहे थे| मेंढ़को की टर्र -टर्र सुनकर वैद्य जी के मन में एक विचार आ गया| उन्होंने नौकर से एक मटका मँगवाया और अपने मित्र को देते हुआ कहा -मित्र मुझे एक औषधि बनाने के लिए मेढ़कों की आवश्यकता है| जो तालाब में टर्र- टर्र कर रहे हैं तुम नौकर के साथ जाओ और तीन किलों के लगभग मेंढ़क पकड़कर इस मटके में ले आओ| और मेंढ़क जीवित होने चाहिए| अब वे दोनों मेंढ़क पकड़ने गए और थोड़ी देर बाद मटके में मेंढ़क पकड़ कर ले आये| जब वह मित्र मेंढ़क लेकर वैद्य जी के पास आया तो वैद्य जी ने कहा कि मैं तुम्हें एक तराजू देता हूँ| इसमे तीन किलो मेंढ़क तोल कर मेरे पास ले आओ| मैं परीक्षा के लिए तैयारी करता हूँ| अब वह मित्र तराजू में मेंढ़क ढालता| लेकिन वह मेंढ़क फुदक- फुदक कर चला जाता ऐसे वह काफी देर तक कोशिश करता पसीने से लत -पथ हो गया लेकिन मेंढ़क ना तोल पाया| फिर यह देख कर वैद्य जी बोले देखो मित्र जिस प्रकार इन मेंढ़को को तोलने में तुम सफल नही हो सके| उसी प्रकार संसार के काम धंधो को को पूरा करना भी असंभव है| जिस प्रकार मेंढ़क तुम्हारी पकड़ में नही आये| उसी प्रकार संसार के काम धंधों को समझो, उनको पूरा करना भी मनुष्य के लिए असभव है| मनुष्य एक काम निपटाता है तो दूसरा शुरू हो जाता है| दूसरा निपटाता है तो तीसरा| इसी प्रकार इन धंधों में फसंकर मनुष्य अपना जीवन यूँ ही बिता देता है|
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संतों की सेवा
एक बार की बात है एक भक्त का संतों के प्रति अति स्नेह था पर उसकी पत्नी को ये पसंद नही था| एक दिन उसका पति सन्त जी को भोजन के लिए अपने घर ले आया और अपनी पत्नी को सन्त जी के लिए भोजन बनाने के लिए कहा| उसकी पत्नी गुस्से में बेकार सा खाना बनाने लगी| इतने में उस औरत के माईके से उसके पिता जी भी आ गए| अब उसने सोचा की अगर मैं इनको भी यही खाना खिला दूंगी तो मेरी बेइज्जती हो जाएगी| इसलिए वह दुबारा से स्वादिष्ट खाना तैयार कर देती है| बाद में वह अपने पति को खाना देती है दो थालियां बना कर, जिसमे से एक थाली में तो ख़राब खाना होता है जो सन्त जी के लिए बनाया था| दूसरी थाली में स्वादिष्ट जो अपने पिता के लिए बनाया था| अब वह अपने पति को दोनों थालियाँ देते हुए कहती है कि कहती है कि ये थाली (जिसमे खराब खाना था) सन्त जी को दे देना और ये थाली(जिसमे स्वादिष्ट खाना था) मेरे पिता जी को| उसका पति समझ जाता है कुछ गड़बड़ है तो वह स्वादिष्ट खाने वाली थाली सन्त जी को देता है और ख़राब वाली थाली उसके पिता जी को| जब वह अपनी पत्नी के पास वापिस जाता है| तो उसकी पत्नी कहती है की आज तो तुमने हमारी नाक कटवा दी| तब वह भक्त बोला कि हमारी यहाँ नाक कटी है| तुम्हारे पिता जी के सामने| लेकिन भगवान की दरगाह में हमारी नाक नही कटेगी| क्योंकि हमने संतों को भोजन खिलाया है| इसलिए हमेशा ऐसा काम करो कि भगवान के सामने शर्मिंदा ना होना पड़े|
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सत्संगति का लाभ
एक बार एक व्यक्ति प्राय सत्संग में जाया करता था और उसका मित्र गलत संगति में होने के कारण वैश्या के पास जाया करता था| एक दिन दोनों आपस में बहस करने लगे कि तुझे सत्संग में जाकर क्या मिलता है और दूसरा कहने लगा कि तुझे वैश्या के पास जाकर और गलत संगति में क्या मिलता है| तो दोनों ने निर्णय किया कि आज मैं सत्संग में जाता हूँ और तू वैश्या के पास| शाम को हम दोनों मिलेंगे तो देखते है कि पूरे दिन में किसने अच्छा प्राप्त किया है| तो वह वैश्या के पास जाने वाला लड़का वही चला जाता है और उसका मित्र अपने गुरु के पास सत्संग में| जब वह वैश्या वाला लड़का वहाँ जाता है तो उस दिन वैश्या का दरबार बंद होता है तो वह वापिस आ जाता है जब वापिस आ रहा होता है तो रास्ते में उसे एक साँप नजर आता है जो कि एक ही जगह पर रेंग रहा था| कहते हैं कि जहाँ साँप रेंगते है वहाँ खजाना मिलने की संभावना होती है, ऐसा विचार कर उसने साँप को हटा कर उस जगह को खोदना शुरू किया तो वहाँ उसे एक घड़ा मिला जिसमे एक सोने का सिक्का मिला और बाकी मटका कंकड़ से भरा हुआ था| वह बहुत खुश हुआ और वह सिक्का उठा कर ले आया| और सत्संग वाला मित्र जब सत्संग से आ रहा था तो रास्ते में उसे काँटा चुभ गया जिससे उसके खून आने लग गया| जब दोनों शाम को मिले तो दोनों ने बताया कि एक को जो सत्संग में जाता था उसे चोट लग गयी और जो वैशया के पास से आया था उसे सोने का सिक्का मिला तो वह उस सत्संग वाले व्यक्ति को ताना मारते हुए कहने लगा कि मैंने तेरे को कहा था कि सत्संग में जाने से कुछ नहीं मिलता| यह सुनकर वह व्यक्ति निराश हो गया| उसने कहा कि मैं अपने गुरु के पास जाता हूँ और उनसे पूछ के आता हूँ कि ऐसा क्यों हुआ| तो उसके मित्र ने कहा कि मैं भी चलता हूँ|
तब वह दोनों उसके गुरु जी के पास जाते हैं तब गुरु जी से वह व्यक्ति पूछता है कि ऐसा क्यों हुआ कि मुझे तो चोट लग गयी जब कि मैं रोज सत्संग में आता हूँ और इसे सोने का सिक्का मिला जब कि ये रोज गलत संगति में रहता है| तब गुरु जी ने कहा कि इस व्यक्ति ने पिछले जन्म में अच्छे कर्म किये थे जिसके कारण इसे आज सोने के सिक्कों से भरा मटका मिलना था लेकिन इसके दुष्ट कर्मो ने सारे सिक्के कंकड़ में बदल दिए| आज का एक सिक्का रह गया था और तेरे पिछले गलत कर्म थे जिसकी वजह से आज सूली पर चढ़ना था| लेकिन इस जन्म में अच्छे कर्म कि वजह से तेरी सूली कांटे में बदल गयी|
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पानी के लिए गद्दे खुदवाये
एक बार किसी व्यक्ति ने किसी सन्त से सवाल पूछा कि सन्त जी मैं हर जगह जाता हूँ मंदिर मैं, मस्जिद मैं, गुरूद्वारे और भी कई स्थानों पर जाता हूँ| पर फिर भी मुझे कही पर शांति नहीं मिलती ऐसा क्यों| तो संतों ने कहा एक काम करो एक कस्सी ले आओ और एक गड्ढ़ा खोदो और उसमे से पानी निकालो तो उस व्यक्ति ने गड्ढा खोदना शुरू किया अभी गड्ढा थोड़ा सा ही खुदा था, महात्मा जी ने कहा छोड़ दो इस गड्ढे को, दूसरा गड्ढा खोदो उसमे से पानी निकालो, उस व्यक्ति ने दूसरा गड्ढा खोदना शुरू किया फिर महात्मा जी ने कहा छोड़ दो| इस प्रकार महात्मा जी ने कई सारे गड्ढे खुदवाये तो उस व्यक्ति ने परेशान होकर पूछा महात्मा जी आप ये क्या कर रहे हो | अगर आप एक गड्ढा ढंग से खुद्वायेंगे तो उसमे से जरूर पानी निकलेगा | लेकिन आप तो पानी निकलने से पहले गड्ढा बदलवा देते हैं ऐसा क्यों | तो महात्मा जी ने फ़रमाया की ये सब तुम्हारे सवाल का जवाब था जो तुम्हें अब मिल गया जिस तरह से गड्ढे बदलने से पानी नही निकल सकता उसी प्रकार जगह-जगह भटकने से शांति नही मिल सकती अगर शांति चाहिए तो एक जगह ही मिलेगी|
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किसान को हीरा मिला
एक बार की बात है एक किसान खेत में हल चला रहा था उतने में उसकी नजर एक चमकदार वस्तु पे पड़ी उसने उसे उठा लिया| अब उसे क्या मालूम था वह चमकीली वस्तु हीरा है और लाखों रूपए का है| उसने उस हीरे को अपने बैल के गले में लटका दिया| कुछ दिनों बाद उस गाँव के जमींदार के घर में उसकी लड़की की शादी थी| उस जमींदार ने किसी नौकर को कहा कि तू शहर जा वहाँ जा कर जौहरी को बोलना की हमे जेवरात चाहिए तो हमारी हवेली में आ जाये| हम पसंद कर लेंगे एक नही दो जौहरी के पास जाइओ क्योंकि एक के पसंद नही आये तो दूसरे से ले लेंगे| अब कुछ दिनों बाद जब जौहरी कार में बैठ कर आ रहा था तो रास्ते में वही किसान मिल गया उसने ड्राइवर को कहा कि इससे जमींदार के घर का रास्ता पूछो| ड्राइवर रास्ता पूछ ही रहा था की उस जौहरी की नजर उस हीरे पे चली गयी जो की बैल के गले में लटका था जौहरी ने समझ लिया कि इस किसान को हीरे के मोल के बारे में कुछ पता नही है| तभी बैल की गले में डाल रखा है| उसने किसान से कहा मुझे ये वस्तु कितने में बेचोगे| किसान ने मन में सोचा की यह व्यक्ति इस पत्थर को खरीदना चाहता है जरूर कोई बात होगी इस वस्तु में| किसान ने कहा कि एक हज़ार में| तो जौहरी ने कहा जब इसे हीरे की कीमत पता ही नही तो क्यों न इसे और बेवकूफ बना दू| तो उस जौहरी ने कहा ये तो पत्थर है मैं इसके 100 रूपये दूँगा| किसान ने सोच लिया की ये व्यक्ति इतनी जिद कर रहा है इस वस्तु को लेने के लिए तो जरूर कोई बात है तो उसने कहा कि मैं हज़ार से कम नही दूँगा| जौहरी ने सोचा की ये तो नादान है मैं एक काम करता हूँ पहले हवेली से हो आता हूँ| आ कर के एक हज़ार में ही ले लूंगा तो वह चला जाता है| इतने में दूसरा जौहरी भी आ जाता है| वह भी कार में बैठ ड्राइवर से पता पूछने के लिए कहता है| उसकी नजर भी किसान के उस हीरे पर पड़ती है| वह भी समझ जाता है| किसान को हीरे के बारे में पता नही है| जो बैल के गले में डाल रखा है| तो वह भी किसान से खरीदने को कहता है| अब किसान मन में सोचता है की पहले वाला व्यक्ति भी इसे खरीदना चाहता था और अब ये भी खरीदना चाहता है, जरूर दाल में कुछ काला है, तभी किसान ने कहा कि ठीक है 10000 रूपये में बेचूँगा| यह सुनकर जौहरी खुश हो गया, उसने उसी समय 10000 रूपये निकाल कर उस किसान को दे दिए और वापिस शहर आ गया| जब थोड़ी देर बाद पहला जौहरी आया तो उसने किसान को कहा लो अपने हज़ार रूपये और वो वस्तु मुझे दे दो| तब किसान ने कहा कि वह वस्तु तो मैं 10000 रूपये में बेच दी तब जौहरी को बहुत गुस्सा आया उसने उस किसान को कहा कि पता है तुमने कितनी बड़ी गलती की है वो पत्थर नही था हीरा था जिसकी कीमत लाखों की थी यह सुनकर किसान हँसने लगा| तो वह जौहरी बोला मूर्ख एक तो इतनी बड़ी गलती कर दी और हँस रहा है| तो किसान ने जवाब दिया में अपनी मूर्खता पर नही बल्कि तुम्हारी मूर्खता पर हँस रहा हूँ| मैं तो अनजान था मुझे पता नही था की वह हीरा लाखों का है| पर तुम्हें तो पता था फिर भी तुम 100 रूपये से ज्यादा नही दे रहे थे| ऐसे ही संसारिक लोगों को नही पता इस अनमोल जीवन के बारे में वो तो अनजान है पर गुरुमुखों को तो इस अनमोल जीवन के बारे में पता है कितनी मुश्किल से ये तन प्राप्त हुआ है उन्हें तो पहले जौहरी की तरह इस अनमोल जीवन का नुकसान नही करना चाहिए|
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तोते ने अपनी मुक्ति माँगी
एक बार की बात है एक भक्त को अपने गुरु के प्रति बड़ी आस्था थी| एक दिन वह अपने मित्र के घर गया| उसने अपने मित्र से कहा तुम भी सत्संग में चला करो संतों के दर्शन किया करो सत्संग सुना करो| तो उसके मित्र ने पूछा क्या होता है संतों के पास जाने से? उसने बताया कि संत मुक्ति का राह दिखाते है तो यह सुन कर उसके मित्र ने कहा मुझे शौंक नही है सत्संग में जाने का उसने जाने से मना कर दिया| उसी के मित्र के घर में पिंजरे में एक तोता लटका हुआ था| वो भी ये बात सुन रहा था| उसने जब मुक्ति कि बात सुनी तो उसने उस भक्त से कहा कि सच-मुच संत मुक्ति की राह दिखाते है तो भक्त ने कहा क्यों नही| तोता बोला ठीक है मैं भी इस पिंजरे से अपनी मुक्ति चाहता हूँ आप अपने गुरु जी से मेरी मुक्ति के बारे में पूछ के आना| भक्त ये सुन कर चला गया और अपने गुरु के पास जाकर पूछने लगा कि स्वामी जी मेरे मित्र के घर में एक तोता टंगा है पिंजरे में वह अपनी मुक्ति चाहता है आप ही कुछ बताये कि उसकी मुक्ति कैसे होगी| यह सुन कर उसके गुरु ने कुछ जवाब नही दिया और अपनी गर्दन टेढी कर ली| भक्त को कुछ समझ नही आया और वह वापिस चला आया| अब तोते ने उससे पूछा कि क्या बताया तेरे गुरु ने तो उस भक्त ने कहा कि उन्होंने कुछ जवाब ही नही दिया तो तोते ने कहा अगली बार जब जाओ तब पूछ के आना| जब वह भक्त अगली बार गया तो उसने अपने गुरु जी से फिर तोते की मुक्ति के बारे में पूछा तो गुरु जी ने फिर गर्दन टेढी कर ली| उस भक्त को फिर कुछ समझ नही आया| ऐसा कई बार हुआ वह अपने गुरु से तोते की मुक्ति के बारे में पूछने जाता तो कभी गुरु जी गर्दन दांयी तरफ टेढी कर लेते तो कभी बांयी तरफ| तोता भी परेशान हो गया उसने भक्त से पूछा कुछ तो बता कि वह करते क्या है कुछ इशारा करते हैं, तो वो बता दो, तब भक्त ने कहा कि हाँ जब भी मैं उनसे तुम्हारी मुक्ति के बारे में पूछता हूँ तो वो अपनी गर्दन टेढी कर लेते है अब तोता समझ गया कि मेरी मुक्ति कैसे होगी वह भी गर्दन टेढी करके आँखे बंद करके पिंजरे में बैठ गया| जब उसके मित्र ने ये देखा कि तोते की आँखे भी बंद है गर्दन भी टेढी है तो उसने सोचा कि तोता मर गया है उसने जैसे ही तोते को बहार निकला क्योंकि मरे हुए तोते को तो कोई नही रखता| वह तोता बाहर निकलते ही उड़ गया| कहने का भाव यही है कि गुरु के पास मुक्ति का रहस्य होता है लेकिन वह संक्षेप में नही बताते इस रहस्य को, अपितु इशारा देते है जो समझ जाये उसका जीवन सफल होता है|
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संत जी के वचन माने
एक बार की बात है एक व्यक्ति भगवान के दर पे जाया करता था लेकिन वहाँ पर सत्संग व कार्यक्रमों में रुकता नही था तो उस आश्रम के जो सन्त थे उन्होंने एक बार उस व्यक्ति से कहा कि आप यहाँ आते हैं कुछ समय रुका करे तो उस व्यक्ति ने कहा कि मेरे पास इतना समय नही होता कि मैं यहाँ रूकू तो सन्त जी ने कहा कि चलो एक नियम बना लो जो तुम रोज पूरा कर सको तो उस व्यक्ति ने कहा कि मैं कोई नियम पूरा नहीं कर सकता, तो सन्त जी ने कहा कि चलो तुम खुद ही कोई ऐसा नियम बता दो जो तुम पूरा कर सको तो उस व्यक्ति ने बहुत सोच समझ के बाद सन्त जी को कहा कि ठीक है मेरे घर के पास एक कुम्हार है जो कि बड़ा वफादार और नेक इंसान है| मैं रोज सुबह उठ कर पहले उसे देखूंगा फिर और कोई काम करूँगा| तो सन्त जी ने कहा ठीक हैं| अब वह व्यक्ति रोज सुबह उठकर अपने घर की पिछली खिड़की से उस कुम्हार को देखता फिर अपने दिन के काम करता| काफी दिनों तक ऐसा करने के बाद एक दिन उस व्यक्ति ने खिड़की से देखा तो उसे कुम्हार नजर नही आया तो वह बड़ा परेशान हुआ कि अगर कुम्हार नज़र नही आया तो मैं आगे के अपने काम कैसे करूँगा और सन्तों को दिया वचन भी टूट जाऐगा| तो वह बहुत परेशान हो गया| इतने में उसे कुम्हार का लड़का नज़र आया तो उस व्यक्ति ने कुम्हार के लड़के से पूछा कि तेरे पिता जी कहाँ है तो उसने बताया कि वो तो कही गए है, तो उस व्यक्ति ने उस लड़के से कहा कि तू मुझे वहाँ ले जा सकता है तो उस लड़के ने जवाब दिया चलो| तो वह कुम्हार के पास जाते हैं और देखते है कि कुम्हार किसी गड्ढे में घुस कर काम कर रहा है| वह व्यक्ति उस कुम्हार को आवाज लगाता है| कुम्हार उसकी तरफ देखता है तो वह व्यक्ति कुम्हार से कहता है कि बस देख लिया अब तुम अपना काम कर लो| तभी कुम्हार कहता है कि देख लिया तो आ जाओ फिर मुझे सोने से भरा घड़ा मिला है आधा-आधा बाँट लेते है तो वह व्यक्ति इतना हैरान होता है कि ये सब सन्तों कि बात मानने का ही फल है| वह सन्त जी के पास जाता है उनके चरणों में गिर कर दण्डवत करता है कि सन्त जी मैंने आपकी एक बात मानी मेरा इतना बड़ा फायदा हुआ अगर हमेशा आपकी बात मानता तो कितना बड़ा फायदा होता मेरा तो जीवन संवर जाता| तो कहने का भाव यही है कि सन्त महापुरुषों के वचनो में बहुत शक्तियाँ होती है|
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चारों मित्रों का ब्रह्म
कानपुर नगर में चार मित्र रहते थे| एक बार सैर के विचार से गंगा के किनारे गए| गंगा के किनारे बड़ी भीड़ थी| वही एक स्थान पर एक व्यक्ति भाँग घोट रहा था| तब उन मित्रों की नज़र भी उस भाँग वाले पर पड़ी तब उन्होंने भी भाँग का सेवन किया जब कुछ देर बाद उन्हें नशा चढ़ा तो उनमे से एक मित्र कहने लगा कि आज नाव से प्रयागराज चलते है| एक ने कहा कि नाव किराये पर कर लेते हैं रात के समय थोड़ी-थोड़ी देर नाव में चप्पू चलाते रहेंगे| इस तरह वे नाव पर बैठ गए| पहले मित्र ने चप्पू चलाया और तीनों ने आराम किया इस प्रकार दूसरे और फिर तीसरे मित्र ने रात्रि में चप्पू चलाया| जब चौथे को जगाया| उस समय कुछ उजाला हो गया था तो उसने मंदिर और मकान देखे तो उन्होंने सोचा कि हम प्रयागराज पहुँच गए| तब उसने तीनों को जगाया और कहा हम प्रयागराज पहुँच चुके है जब उन्होंने उजाले में ध्यान से वे मंदिर देखे तो उन्हें लगा कि ये तो देखी हुई जगह है तो एक मित्र ने कहा पूरी रात चप्पू चलाया है हम प्रयागराज पहुँच गए है| लेकिन जब वे वहाँ थोड़ा सा घूमे तो उन्हें पता चल गया कि वे तो कानपुर में ही है अब वे काफी परेशान हो उठे और आपस में वाद- विवाद करने लगे गंगा के किनारे| हम पूरी रात चप्पू चलाते रहे फिर भी हम कानपुर में में ही है| तब उनका विवाद सुनकर एक व्यक्ति उनके पास आया तब उन्होंने सारी बात उस व्यक्ति को बताई कि हमने पूरी रात चप्पू चलाया फिर भी कानपुर ही है, उन्होंने वह नांव भी उस व्यक्ति को दिखाई| नांव को देखकर वह व्यक्ति हँसने लगा| उन मित्रों ने उन व्यक्ति से पूछा कि आप हँस क्यों रहे हैं| तब उस व्यक्ति ने कहा अगर तुम्हें जाना ही था तो किसी नाविक को बोल देते तुम्हें ले जाता| तुमने अपने को समझदार समझा| नशा करके तुम्हें होश ही नहीं था कि तुम्हारी नाव की रस्सी तो खूंटे से बंधी हुई है, यही हाल मनमुखो का है एक तो माया का नशा पी रखा है और दूसरा अपने मनुष्य तन रूपी नौका को मनमति के खूंटे में बाँध रखा है लेकिन जो भाग्यशाली मनुष्य सद्गुरु की शरण लेते है जो की संसार के खेवैया है तो कर्णधार सद्गुरु मनमति रूपी खूंटे से उनकी नैया को खोलकर उन्हें संसार सागर से पार कर देते हैं|
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बिना टिकट यात्रा
एक बार की बार है कोई व्यक्ति रेलगाडी में सफर कर रहा था और रेलगाड़ी की टिकट नही ली थी| उसी रेलगाड़ी में एक महात्मा जी भी सफर कर रहे थे तो वे क्या देखते है कि जैसे ही टी.टी आया तो वह व्यक्ति टॉयलेट में चला गया और जब तक टी.टी उसी डिब्बे में चेकिंग के लिए रहा तब तक वह व्यक्ति टॉयलेट से नही निकला| लगभग 1 या 2 घंटे के बाद जब टी.टी वहाँ से चला गया तो वह व्यक्ति बाहर आया| तब महात्मा जी ने उस व्यक्ति से पूछा कि आप इतनी देर तक टॉयलेट में क्यों रहे? क्या आपके पास टिकट नही है| उस व्यक्ति ने कहा कि नहीं मेरे पास टिकट नही है इसी वजह से मुझे टॉयलेट में बंद रहना पड़ा| महात्मा जी ने उसे समझाया कि तुम्हारे पास टिकट होती तो तुम हमारी तरह निश्चिंत होकर रेलगाड़ी में सफर करते| अब तुम्हारे पास टिकट नही है तो तुम्हें गन्दगी में बैठना पड़ गया ठीक, उसी तरह जब इंसान संसार छोड़ कर जाता है तो अगर उसके पास सच्चे नाम की टिकट होगी तो वह निश्चिंत रहेगा नहीं तो वहाँ पर भी गंदगी में यानि के नरकों में जाना पडेगा||
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गीता का पाठ
एक ब्राह्मण युवक अनेक वर्षो तक काशी जी में अध्ययन करने के उपरान्त घर वापिस आया| यद्यपि वह विद्वान था परन्तु उसके दिन बड़ी दीनता से कटे| तब किसी ने उसे कह दिया कि राजा के पास जा वहाँ तुझे कुछ धन भी मिलेगा और सम्मान भी| जब वह राजा के पास गया तो राजा ने दोनों हाथ जोड़कर कहा| हे ब्राह्मण मेरे योग्य कोई सेवा है तो बताईये| तब ब्राह्मण ने कहा, कि श्रीमद् भगवत गीता के श्लोकों को सही-सही उचित ढंग से समझाने वाला मुझ जैसा कोई नही मिलेगा मेरी इच्छा है कि मैं आपको गीता सुनाऊँ| तब राजा ने कहा कि ब्राह्मण के मुख से गीता श्रवण करना ये तो बड़े सौभागय की बात है परन्तु अभी आप कुछ और दिन गीता का अध्ययन करे| तब वह ब्राह्मण चला आया तब उसने दोबारा अध्ययन किया ऐसे ही तीन-चार बार राजा के पास गया लेकिन राजा हमेशा उसे कहता कि दोबारा अध्यनन करो| एक दिन वह अपने आप से कहने लगा कि धिक्कार है मुझे मैं अपने आप को शास्त्रों का ज्ञाता समझता हूँ परन्तु धन और सम्मान के लोभ में बार-बार राजा के पास जाता हूँ| जो जगत के मालिक है उनकी शरण नही लेता| झूठे धन की इच्छा रखता हूँ परन्तु धन की तरफ जो परलोक में मेरे काम आएगा वहाँ मेरा ध्यान ही नही है| यह सोचकर उसने संसार त्याग दिया और भजन सिमरन करने लगा| एक दिन राजा उसकी कुटिया में आ गया और हाथ जोड़कर बोला ब्राह्मण मुझे माफ़ किजिएगा| मनुष्य ग्रंथो को पड़े लेकिन भगवत प्रेम पैदा न हो तो उसका फायदा ही क्या| गीता का वास्तविक रहस्य अब आपने समझा है| अब आप मुझे गीता का सही अर्थ समझा सकेंगे||
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पहलवान का पत्नी प्रेम
एक गाँव में एक पहलवान रहता था जोकि अपनी पहलवानी के लिए बहुत प्रसिद्ध था| पूरे गाँव में कोई भी उसके मुकाबले का नही था| कुछ समय बाद उस पहलवान का किसी स्त्री पर दिल आ गया और वह उस स्त्री के प्रेम में इतना पागल हो गया कि उससे शादी भी कर ली अब वह उसके प्रेम में इतना पागल था कि जहाँ वह जाती उसी के साथ जाता| हमेशा उसे देखता रहता अगर कही चलता तो उसी की तरफ मुख करके उल्टा चलता| यह देखकर लोग भी हँसा करते थे| एक दिन उसकी पत्नी ने उसे किसी मेले में ले जाने के लिए कहा जोकि हर वर्ष उनके गाँव में लगा करता था| वह भक्तिमय सम्मेलन था जिसमे कई सन्त भी आए थे और उनमे से एक सन्त मुख्य थे जिनकी देख-रेख में सारा आयोजन हो रहा था| अब वह पहलवान अपनी पत्नी के साथ उसी सन्त सम्मलेन में गया जब वह वहाँ जा रहा था तो उसका मुख अपनी स्त्री की तरफ था सभी लोग जो उसे जानते थे और जो नही जानते थे वह दृश्य देख कर हँस रहे थे लेकिन पहलवान ने किसी की परवाह नही की| उस सम्मेलन के मुख्य सन्त जी ने भी यह दृश्य देखा तो उन्होंने किसी से पूछा कि यह व्यक्ति कौन है तो किसी ने बताया कि यह गाँव का पहलवान है जो अपनी स्त्री के प्रेम में इतना दीवाना है कि उसे ही देखता रहता है तो सन्त जी ने उस व्यक्ति से कहा कि उस पहलवान को कहो कि हम उससे मिलना चाहते हैं वह शाम के समय आकर हमसे मिले| उस व्यक्ति ने पहलवान से जाकर कहा कि इस आयोजन के मुख्य सन्त आप से मिलना चाहते हैं तो वह घबरा गया और सोचने लगा कि जरूर वे मुझसे मेरी स्त्री के प्रति इतना प्रेम के बारे में पूछना चाहते होंगे तो उसने मन में सोचा कि कही कुछ गलत ना कहे इसलिए जाता ही नहीं| लेकिन कुछ समय बाद उसके मन में ख्याल आया कि इतने बड़े सन्त है बुलाया है, ना जाऊं तो अच्छा नहीं लगता| ज्यादा से ज्यादा डांट ही तो लगाएंगे चला जाता हूँ| तो वह शाम के समय उन सन्त जी से मिलने के लिए चला गया| जब वह सन्त जी के पास पहुँचा तो सन्त जी ने फ़रमाया कि भक्ति व धार्मिक जगह पर तुम इस तरह से आते-जाते हो अपनी स्त्री की तरफ देखते हुए तो यह चीज़ शोभा तो नही देती| पहलवान ने कहा! कि मैं अपनी पत्नी से अत्यंत प्रेम करता हूँ इसलिए उसे देखता रहता हूँ तो सन्त जी ने उस पहलवान से कहा कि चलो हम तुम्हें एक काम बताते हैं वो करोगे, तो पहलवान ने कहा कि मुझे अपनी पत्नी से अलग होने के लिए या उसे ना देखने के लिए मत कहना बाकी सब काम करूंगा| सन्त जी ने कहा कि हम तुम्हें तुम्हारी पत्नी से अलग होने को नहीं कहेंगे बस तुम एक काम करना शाम के समय श्री कृष्ण जी की आरती होती है मंदिर में| उसके लिए आ जाना और अकेले ही आना| वह पहलवान वहाँ से चला गया और खुश भी हुआ कि सन्त जी ने मुझे डांटा भी नही| शाम के समय जब वह आरती पर पहुँचा| तो सन्त जी ने उसे आरती की थाली दे दी और कहा कि आज भगवान की आरती तुम उतारोगे| जब वह भगवन की आरती उतार रहा था तो उसे भगवान जी ने पूर्ण रूप में दर्शन दिए तो वह हैरान रह गया| वह रूप इतना सुन्दर था कि वह पहलवान उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता था| लेकिन यह दर्शन कुछ पल के हुए और वह दर्शन उस पहलवान के मन में बस गए और वह सन्त जी के चरणों में विनय करने लगा की संत जी कृपा करके मुझे वही दर्शन दोबारा करवाओ| उसकी आँखों में से आँसू आने लगे तब संत जी ने समझाया कि जिस भगवान ने इतना सुन्दर शरीर दिया है इंसान को, तो वह भगवान खुद कितना सुन्दर होगा, उसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती| अभी कुछ क्षण के दर्शन ने ही तुम्हें इतना दीवाना बना दिया| अगर सच्ची लगन से उन्हें प्यार करोगे तो तुम्हें उनके दर्शन भी होते रहेंगे और सच्चा सुख भी मिलेगा| फिर उस पहलवान ने सन्त जी को अपना गुरु बना लिया और तबसे उनकी आज्ञा अनुसार जीवन व्यतीत करने लगा|
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बच्चे की बलि
एक बार की बात है एक राजा के पास काफी धन था| लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी| वह हमेशा परेशान रहता था कि मेरा वारिस कौन बनेगा| एक बार किसी प्रसिद्ध तांत्रिक ने कहा- कि अगर देवी के सामने किसी 10-12 साल के बच्चे की बलि दी जाए तो तुम्हारी संतान हो सकती है लेकिन राजा परेशान तब हुआ जब तांत्रिक ने बताया कि बलि का फायदा तभी है कि जिस बच्चे की बलि दोगे उसके माता- पिता राजी होने चाहिए| तब राजा ने सोचा कि कोई फायदा नहीं है क्योंकि कोई माँ- बाप ऐसा नहीं चाहेंगे| तब उसके मंत्री ने सलाह दी कि एक बार राज्य में घोषणा करवा देते हैं कि जो बलि के लिए अपना 10-12 साल का लड़का देगा तो राजा उसे मालो माल कर देगा| तब एक किसान जिसके तीन लड़के थे जिनमे से दो तो काम करते थे किन्तु तीसरा जो छोटा था सत्संग में जाया करता था कोई काम नहीं करता था| तब किसान ने धन के लालच में राजा को वह लड़का बलि के लिए दे दिया| राजा जब बलि के लिए उस लड़के को ले गया तो वह लड़का बिल्कुल भी चिंता नही कर रहा था तब राजा ने उससे पूछा कि अब तुम्हारी बलि दी जाएगी तुम्हारी कोई आखिरी इच्छा? तब लड़के ने कहा कि मुझे चार मुट्ठी मिट्टी ला दो| जब मिट्टी आई तो लड़के ने मिट्टी की चार ढेरी बना ली और दूर-दूर रख दिया अब उसने पहली ढेरी की परिक्रमा लगाई फिर उसे लात मार दी| फिर दूसरी ढेरी की परिक्रमा लगाई फिर उसे लात मार दी| फिर तीसरी ढेरी की परिक्रमा लगाई फिर उसे लात मार दी| लेकिन चौथी ढेरी की परिक्रमा लगाकर उसे लात नही मारी| अपितु मथा टेका| तब राजा ने उस लड़के से पूछा कि तूने ये क्या किया| तब उसने कहा कि पहली ढेरी मेरी माँ- बाप की थी| माँ- बाप ही बच्चों के रक्षक होते हैं लेकिन उन्होंने अपने स्वार्थ के लिए मुझे बेच दिया| दूसरी ढेरी आपके नाम की थी क्योंकि राजा का कर्तव्य होता है प्रजा की रक्षा करना| लेकिन आप तो अपने स्वार्थ के लिए अपनी प्रजा के साथ मेरे साथ अन्याय कर रहे हो| तीसरी ढेरी देवी- देवताओं की थी जो इंसान को सुख-शांति देते हैं लेकिन ये तो अपने स्वार्थ के लिए मेरी बलि ले रहे हैं| ये चौथी ढेरी मेरे गुरु देव की है जिन्होंने मुझे ज्ञान दिया मेरी इस लोक में भी रक्षा करी और परलोक में भी रक्षा करेंगे जिनका प्रेम निस्वार्थ है| तब राजा ने क्षमा माँगी और उसके गुरु जी के पास गया और उस लड़के को गोद ले लिया||
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रोम के चित्रकार
बहुत समय पहले की बात है रोम के सम्राट के सामने कुछ चीनी चित्रकार उपस्थित हुए जो चित्रकारी की कला में अत्यंत ही निपुण थे उन्होंने वहाँ रहकर ऐसे सुंदर और मनमोहक चित्र बनाएं, जिन्हें देखकर सम्राट और रोम की जनता सभी आश्चर्य चकित रह गए और उनकी कला की सबने मुक्तकंठ से प्रशंसा की| सम्राट ने उन्हें बहुत से पुरस्कार दिए| एक दिन सम्राट के मन मे एक विचार उत्पन्न हुआ और उसने अपने मंत्री को बुलाकर पूछा - क्या हमारे देश में ऐसे चित्रकार नहीं है जो उन चीनी चित्रकारों की तरह ही सुंदर और चित्राकर्षक चित्र बना सके| मंत्री ने उत्तर दिया- "राजन| हमारे देश में भी ऐसे चित्रकार है और अवश्य है| आप कहे तो उन्हें भी अपने कला का प्रर्दशन करने के लिए बुलाया जाये"| मंत्री का उत्तर सुनकर सम्राट ने आदेश दिया की चीनी चित्रकारों के साथ उन्हें भी दूसरे दिन दरबार में उपस्थित होने के लिए कहा जाए| आदेशानुसार जब दूसरे दिन रोमी और चीनी चित्रकार दरबार में उपस्थित हुए तो सम्राट ने रोम के चित्रकारों को संबोधित करते हुए कहा- "ये चित्रकार चीन से आये हैं| ये अपनी कला में अद्वितीय है और ऐसे चित्रकारी करते हैं कि मनुष्य देखते ही मुग्ध हो जाता है क्या तुम लोग भी उनके सामान सुंदर चित्रकारी कर सकते हो|
रोमी चित्रकारों ने उत्तर दिया- "राजन| यदि आप आदेश दे और समय दिया जाये तो हम अपनी कला का नमूना आपके सम्मुख प्रस्तुत कर सकते है, इसके अतिरिक्त इस समय हम मुँह से कुछ नहीं कह सकते"| सम्राट ने उनकी बात स्वीकार ली और इसके लिए दो महीने की अवधि निश्चित की गईं ताकि दोनों पक्षों को अपनी-अपनी कला का उत्कृष्ट नमूना पेश कर सके| इस कार्य के लिए एक ही हाल कमरे की आपने सामने की दो दीवारों का चयन किया गया और मध्य में एक पर्दा डाल दिया गया| मंत्री को यह आदेश भी दे दिया गया कि इस कार्य के लिए उन लोगों को जिस-जिस सामान की आवश्यकता हो, दे दिया जाए| चीनी चित्रकारों ने अनेक प्रकार के रंग तथा ब्रुश आदि जो-जो सामान मंगाकर उन्हें दे दिया गया| किन्तु रोमी चित्रकारों ने केवल पत्थरो की कुछ बाटिया माँगी, इसके अतिरिक्त और कुछ ना माँगा| यह सुनकर सभी आश्चर्य में पड़ गए और सोचने लगे की बिना ब्रुश और रंग आदि के ये चित्र कैसे बनेंगे| भला पत्थर के टुकडों से कही चित्र बनते है| कार्य आरम्भ हुआ चीनी चित्रकारों ने अपनी दक्षता एवं श्रेष्टता सिद्ध करने के लिए अत्यंत परिश्रम से कार्य किया और दिन रात एक करके सुंदर एवं चित्राकर्षक चित्र बनाये कि लोग देखकर स्तब्ध रह जाये| उधर रोम के चित्रकारों ने क्या किया कि पत्थर की उन बाटियों से दीवार को घिसना आरंभ कर दिया और दिन रात दीवार को रगड़ने के कार्य में लगे रहे, परिणाम यह हुआ कि दो मास में दीवार दर्पण की न्याई चमक उठी| दो मास की अवधि समाप्त होने पर सम्राट अपने तथा सभासदों सहित दोनों पक्षों की कला का निरीक्षण करने के लिए उस हाल कमरे में पहुँचा|
सर्वप्रथम वह उस ओर गया जिधर चीनी कलाकारों ने चित्रकारी की थी उनके द्वारा की गई उच्चकोटि की चित्रकारी देखकर सम्राट सहित सभी सभासद दंग रह गये और उनकी कला की भूरी-भूरी प्रशंसा करने लगे| सम्राट ने मन ही मन विचार किया कि हमारे देश के चित्रकार ऐसे सुंदर एवम चित्राकर्षक चित्र कहा बना सके होंगे| उन्होंने तो सामग्री भी कुछ नही ली| फिर भी रोमी चित्रकारों की कला देखने के लिए उसने पर्दा हटाने का आदेश दिया| जैसे ही पर्दा हटा, तो सब यह देखकर विस्मय्मुग्ध हो गये कि चीनी चित्रकारों द्वारा निर्मित चित्रों का प्रतिबिम्ब सामने की दीवार में मौलिक से भी अधिक चमकदार होकर झलक रहा है| सम्राट रोमी चित्रकारों की बुद्धिमता पर अति प्रसन्न हुआ, तत्पश्चात दोनों पक्षों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया| जिस प्रकार पत्थर की बाटियों की निरंतर रगड़ से दीवार भी साफ़-सुधरी और चमकदार बन गई, उसी प्रकार नाम की निरंतर रगड़ लगने से अर्थात उसका निरंतर सुमिरन करने से मन भी शुद्ध, पवित्र, एवम निर्मल बन जाता है|
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छात्र ने कक्षा में चोरी की
एक बार की बात है किसी कक्षा के अन्दर एक छात्र था जो कि हमेशा दूसरे लड़को के सामान की चोरी किया करता था| कई बार बच्चों ने अध्यापक से शिकायत की, लेकिन अध्यापक ने कुछ नहीं किया| उन्होंने यही कहा कि एक बार जब तक मैं नहीं देख लेता चोरी करते हुए मैं नहीं मान सकता कि उसने चोरी की है| एक बार वह छात्र चोरी करते हुए पकड़ा गया| तब अध्यापक ने भी देख लिया तब सभी बच्चों ने अध्यापक से कहा कि अब तो आपने भी इसे चोरी करते हुए देख लिया| अब इसे दण्ड दो| तो अध्यापक ने कहा कि मुझे सोचने का समय दो कल बताऊंगा| सभी बच्चों ने कहा या तो विद्यालय में ये रहेगा या हम रहेंगे| तब अध्यापक ने खूब सोचा अगले दिन जब कक्षा में आया तब वह बच्चा कक्षा में नहीं था जिसने कक्षा में चोरी की थी| तब अध्यापक ने बच्चों से कहा कि मैं उसे विद्यालय से नहीं निकालूँगा अगर तुमने जाना है तो चले जाओ| उन्होंने बच्चों को समझाया कि मुझे पता है वह बच्चा गलत है लेकिन वो मेरी नजर में तो है मैं उसे उसकी गलती के बारे में बता सकता हूँ| लेकिन अगर वो कही और जाता है तो वहाँ किसी को नहीं पता होगा कि वह लड़का कैसा है ना ही कोई उसे सुधरने के लिए बोलेगा| इसलिए मैं उसे नहीं निकालूँगा| वही बाहर खड़ा होकर वह लड़का यह बात सुन रहा था उसने जब यह बात सुनी तो वह रोने लगा, उसने कक्षा में आकर अध्यापक व सभी बच्चों से अपने किये की माफ़ी माँगी और भविष्य में ऐसा न करने का आश्वासन दिया| तो कहने का भाव यही है कि गुरु कभी भी अपने बच्चों को उनकी गलती पर दूर नहीं करते| अपितु उन्हें अपने ज्ञान से शिक्षा देते हैं, गलत काम ना करने की| वे उसे अपनी ही शरण में रखते हैं क्योंकि उन्हें तो सब मालूम है कि मेरा शिष्य कैसा है इसमें कहाँ कमी है| उस कमी को दूर करने की शिक्षा देते हैं| वचन भी हैं कि
गुरु कुम्हार शिष्य कुंभ है, घढ-घढ काडे खोट|
अन्दर हाथ सहारदे, ते बाहरो मारन चोट||
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चोर सत्संग में पहुँच गए
एक बार की बात है कुछ चोरों के पीछे पुलिस लग गई तो वे पुलिस से बचने के लिए मंदिर में चले गए| उसी समय मंदिर में सत्संग चल रहा था तो वहाँ सत्संग में बताया जा रहा था कि भगवान की कोई परछाई नहीं होती भगवान सर्वशक्तिमान है हर जगह व्यापक है, तो उनके कानों में भी यही बात पड़ी| अब पुलिस से उनकी जान भी बच गई और वे ये सोच के वापिस आ गए कि आज तो मंदिर में होने वाले सत्संग ने हमें बचा लिया| अब कुछ समय बाद उन्होंने काली माता के मंदिर में चोरी करने की योजना बनाई| जब वे ये योजना बना रहे थे तो वहाँ पर कोई व्यक्ति उनकी सारी बाते सुन रहा था उसने पुलिस में खबर कर दी| पुलिस ने चोरों को पकड़ने के लिए काली माता की जगह किसी व्यक्ति को रूप बदल कर उसे काली माता जैसा बना दिया और वही खड़ा कर दिया ताकि जब वे चोरी करने आए तो हमें पता चल जाए| अब चोर गए चोरी के लिए जब वह मंदिर पहुँचे तो एक चोर ने कहा कि मैं जाके देखकर आता हूँ अन्दर कोई है तो नहीं| जब वह काली माता की मूर्ति के पास पहुँचा तो वहाँ उसने देखा कि काली माता की परछाई नजर आ रही है| तो वह बहुत परेशान हुआ कि हमने तो सत्संग में सुना था कि भगवान की परछाई नहीं होती लेकिन यहाँ तो परछाई नजर आ रही है फिर उसे शक हो गया कि यहाँ मूर्ति की जगह कोई व्यक्ति है, तो वह बाहर आ गया और अपने दोस्तों को कहा कि यहाँ से भागो यहाँ पर मूर्ति की जगह कोई व्यक्ति है और मुझे लगता है कि पुलिस भी है यहाँ| तो वे सभी चले गये| तब उन्होंने विचार किया कि पिछली बार भी हम सत्संग में गये थे तो पुलिस से बच गए थे इस बार भी सत्संग में सुनी हुई बात ने ही हमें पुलिस से बचा लिया| अगर हम हमेशा ही सत्संग में जाए तो हमें कितना फायदा मिलेगा| तब से उन्होंने चोरी का काम छोड़ दिया और नित्यप्रति सत्संग में जाकर उन्ही बातों को अपने जीवन में अपनाने लगे और अपना जीवन सफल बना लिया|
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सत्संग की महिमा
एक भक्तानी रोज सत्संग में जाती थी| वह अपने पति को भी सत्संग में जाने के लिए कहती थी लेकिन उसका पति रोज टाल देता था कि फिर कभी जाऊँगा| एक दिन उस व्यक्ति को कही जरुरी काम से जाना था| तो उसने अपनी पत्नी से कहा कि मुझे आज कहीं जाना है तुम मेरा खाना बना दो और उसे पैक कर देना| उस समय उस भक्तानी के सत्संग पर जाने का समय हो रहा था| तब उसने अपने पति से कहा कि मेरा तो सत्संग पर जाने का समय हो रहा है अगर खाना बनाती हूँ तो सत्संग पर नहीं जा पाउंगी| तब उसने अपने पति से कहा कि आप आज मेरी जगह चले जाओ| अधिकतर हमे घर में एक दूसरे की बात को मानना पड़ता है| तो वह व्यक्ति भी अपनी पत्नी की बात को मान कर सत्संग में चला गया| जब वह वहाँ सत्संग में पहुंचा तो बहुत भीड़ थी| तब एक महात्मा जी ने बड़ी ही ऊँची आवाज में पूछा कि आ गए हो| तो सबने कहा कि जी आ गए है| उस व्यक्ति ने भी यही कहा और वही दरवाजे के किनारे टेक लगा कर बैठ गया| जब सब बैठ गए तो महात्मा जी ने फिर बड़ी ऊँची आवाज में फरमाया कि बैठे हो तब फिर सबने यहीं कहा कि जी बैठे है| फिर सत्संग शुरू हुआ इतने में उस व्यक्ति को नींद आ गई| जब प्रसाद बटने का समय आया तो उसकी नींद खुली तब उस व्यक्ति ने प्रसाद लिया और वहाँ से जाने लगा तब महात्मा जी ने फिर फरमाया कि जा रहे हो| तब सबने यही कहा कि जी महाराज जा रहे है| और वह व्यक्ति वापिस आ गया| जब वह व्यक्ति घर वापिस आया तो उसकी पत्नी ने अपने पति से पूछा कि सत्संग में क्या सुना मुझे भी सुनाओं ताकि मेरी भी हाजरी लग जाए| अब सत्संग तो उस व्यक्ति ने सुना नहीं था| तो उसने बात टाल दी अभी मैं काम कर आऊ रात को आकर सुनाऊंगा| जब वह रात को घर वापिस आया तो उसकी पत्नी ने अपने पति से फिर से पूछा तो उसने फिर जवाब दिया कि अभी खाना खा ले सोते वक्त सुनाऊंगा| जब वे सोने लगे तो पत्नी ने फिर पूछा तब उसी समय हुआ यूँ कि उनके घर में चोर घुस आये| वह कमरे में अपनी पत्नी को सारी बात बताने लगा कि जब मैं सत्संग में पहुंचा तो वहाँ महात्मा जी ने बड़ी जोर से फरमाया कि आ गए हो| अब यह आवाज चोरों ने भी सुनी तो वे घबरा गए कि यह आवाज तो घर के मालिक की है वह घबरा कर बैठ गए| तब उस व्यक्ति ने अपनी पत्नी को बताया कि उसके बाद जब सब बैठ गए तो महात्मा जी फरमाया कि बैठे हो| तो यह सुनकर चोर और घबरा गए कि घर के मालिक को हमारा पता चल गया है यहाँ से जाना चाहिए| फिर व्यक्ति ने अपनी पत्नी से कहा कि उसके बाद बैठते ही मुझे नींद आ गई और मैं सो गया जब उठा और प्रसाद लिया तो जाने लगा तो महात्मा जी ने फिर ऊँची आवाज में कहा कि जा रहे हो| जब चोरो ने यह सुना तो बड़े ही हैरान कि अब हम जा रहे है तो जाने भी नहीं देता वह वहाँ से फटा फट भाग गए| और किसी और के घर में जाकर चोरी की लेकिन पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया| अगले दिन उन्होंने पुलिस को सारी बात बताई कि हम कहा कहा गए चोरी के लिए| तब उस व्यक्ति को भी थाने में बुलावाया गया यह जानने के लिए कि उनको कोई समान चोरी तो नहीं हुआ, उसका पता चल सके| जब वह व्यक्ति वहाँ पहुंचा तो उसने पुलिस को बताया कि हमारे घर तो कोई भी समान चोरी नहीं हुआ और ना ही चोर हमारे घर आये थे| तब उन चोरों ने बताया कि हम आपके घर आये थे तो आपने ही कहा कि आये हो, बैठे हो, जा रहे हो| तब वह व्यक्ति सारी बात समझ गया| उसने घर आकर सारी बात बताई| उसने कहा कि सत्संग में सुनी तीन लाईनों का इतना फायदा है तो जब हम सत्संग की हर बात को मानेगे तो कितना लाभ मिलेगा| तब से उसने सत्संग में नित्य प्रति जाना शुरू कर दिया खुद भी जाता और अपने बच्चों को भी ले जाता|
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स्वप्न में अपनी माँ को मारना
एक बार की बात है कि एक व्यक्ति जो कुछ समय जेल की सजा काट कर आया था तब से उसे सपना आया करता था कि वह अपनी माँ को कुल्हाडी से मार रहा है| वह बहुत परेशान रहने लगा कि ऐसा अजीब सपना क्यों आता है तो वह एक दिन किसी सन्त के पास गया और सन्त जी को बताया कि मैं कुछ समय जेल में रहकर आया हूँ तब से मुझे ऐसा अजीब सपना आता है मैं बहुत परेशान हूँ| तब उनसे सन्त जी ने पूछा कि तुम्हारे आस-पास में जेल के लोगों का आचरण कैसा था| तब उसने बताया कि जो व्यक्ति हमें खाना बना के खिलाया करता था वह अपनी माँ को कुल्हाडी मारने के जुर्म में जेल में था| तब सन्त जी ने कहा कि जैसा इन्सान अन्न खाता है वैसा उसका मन होता है वो व्यक्ति जिसने अपनी माता की ह्त्या की| वह उसी सोच के साथ, उसी वृति के साथ खाना बनाता था जो तुम खाते थे तो प्रभाव मन पर भी पड़ता है वही तुम्हारे स्वप्न में आता है| सन्त जी ने कहा कि प्रभु के नाम को मन में बसाओ| जब मन में प्रभु नाम चलेगा तो बुरे विचार सभी दूर भाग जायेंगे|
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