जैसा खाओ अन्न वैसा
होवे मन
बासमती चावल बेचने
वाले एक सेठ की स्टेशन मास्टर से साँठ-गाँठ हो गयी। सेठ को आधी कीमत पर बासमती
चावल मिलने लगा । सेठ ने सोचा कि इतना पाप हो रहा है, तो कुछ धर्म-कर्म भी करना चाहिए। एक
दिन उसने बासमती चावल की खीर बनवायी और किसी साधु बाबा को आमंत्रित कर भोजन प्रसाद
लेने के लिए प्रार्थना की। साधु बाबा ने बासमती चावल की खीर खायी। दोपहर का समय
था। सेठ ने कहाः "महाराज! अभी आराम कीजिए। थोड़ी धूप कम हो जाए फिर पधारिएगा।
साधु बाबा ने बात स्वीकार कर ली। सेठ ने 100-100
रूपये वाली 10 लाख जितनी रकम की
गड्डियाँ उसी कमरे में चादर से ढँककर रख दी। साधु बाबा आराम करने लगे। खीर थोड़ी
हजम हुई। साधु बाबा के मन में हुआ कि इतनी सारी गड्डियाँ पड़ी हैं, एक-दो उठाकर झोले में रख लूँ तो किसको
पता चलेगा? साधु बाबा ने एक
गड्डी उठाकर रख ली। शाम हुई तो सेठ को आशीर्वाद देकर चल पड़े। सेठ दूसरे दिन रूपये
गिनने बैठा तो 1 गड्डी (दस हजार
रुपये) कम निकली। सेठ ने सोचा कि महात्मा तो भगवतपुरुष थे, वे क्यों लेंगे? नौकरों की धुलाई-पिटाई चालू हो गयी।
ऐसा करते-करते दोपहर हो गयी। इतने में साधु बाबा आ पहुँचे तथा अपने झोले में से
गड्डी निकाल कर सेठ को देते हुए बोलेः "नौकरों को मत पीटना, गड्डी मैं ले गया था।" सेठ ने कहाः
"महाराज! आप क्यों लेंगे? जब
यहाँ नौकरों से पूछताछ शुरु हुई तब कोई भय के मारे आपको दे गया होगा और आप नौकर को
बचाने के उद्देश्य से ही वापस करने आये हैं क्योंकि साधु तो दयालु होते है। "
साधुः "यह दयालुता नहीं है। मैं सचमुच में तुम्हारी गड्डी चुराकर ले गया था।
साधु ने कहा सेठ ....तुम सच बताओ कि तुमने कल खीर किसकी और किसलिए बनायी थी ?" सेठ ने सारी बात बता दी कि स्टेशन
मास्टर से चोरी के चावल खरीदता हूँ, उसी
चावल की खीर थी। साधु बाबाः "चोरी के चावल की खीर थी इसलिए उसने मेरे मन में
भी चोरी का भाव उत्पन्न कर दिया। सुबह जब पेट खाली हुआ, तेरी खीर का सफाया हो गया तब मेरी
बुद्धि शुद्ध हुई कि 'हे
राम.... यह क्या हो गया?
मेरे कारण बेचारे नौकरों पर न जाने क्या बीत रही होगी। इसलिए तेरे पैसे लौटाने आ
गया। "इसीलिए
कहते हैं कि....
जैसा खाओ अन्न ...
वैसा होवे मन ।
जैसा पीओ पानी ....
वैसी होवे वाणी ।
****
सेठ की चिंता
एक नगर का सेठ अपार
धन सम्पदा का स्वामी था। एक दिन उसे अपनी सम्पत्ति के मूल्य निर्धारण की इच्छा
हुई। उसने तत्काल अपने लेखा अधिकारी को बुलाया और आदेश दिया कि मेरी सम्पूर्ण
सम्पत्ति का मूल्य निर्धारण कर ब्यौरा दीजिए,
पता तो चले मेरे पास कुल कितनी सम्पदा
है। सप्ताह भर बाद लेखाधिकारी ब्यौरा लेकर सेठ की सेवा में उपस्थित हुआ। सेठ ने
पूछा- “कुल कितनी सम्पदा
है?” लेखाधिकारी नें कहा– “सेठ जी, मोटे तौर पर कहूँ तो आपकी सात पीढ़ी
बिना कुछ किए धरे आनन्द से भोग सके इतनी सम्पदा है आपकी”| लेखाधिकारी के जाने के बाद सेठ चिंता
में डूब गए, ‘तो क्या मेरी आठवी
पीढ़ी भूखों मरेगी?’ वे रात दिन चिंता
में रहने लगे। तनाव ग्रस्त रहते, भूख भाग चुकी थी, कुछ ही दिनों में कृशकाय हो गए। सेठानी
द्वारा बार बार तनाव का कारण पूछने पर भी जवाब नहीं देते। सेठानी से हालत देखी
नहीं जा रही थी। उसने मन स्थिरता व शान्त्ति के किए साधु संत के पास सत्संग में
जाने को प्रेरित किया। सेठ को भी यह विचार पसंद आया। चलो अच्छा है, संत अवश्य कोई विद्या जानते होंगे
जिससे मेरे दुख दूर हो जाय। सेठ सीधा संत समागम में पहूँचा और एकांत में मिलकर
अपनी समस्या का निदान जानना चाहा। सेठ नें कहा- “महाराज मेरे दुख का तो पार नहीं है, मेरी आठवी पीढ़ी भूखों मर जाएगी। मेरे
पास मात्र अपनी सात पीढ़ी के लिए पर्याप्त हो इतनी ही सम्पत्ति है। कृप्या कोई उपाय
बताएँ कि मेरे पास और सम्पत्ति आए और अगली पीढ़ियाँ भूखी न मरे। आप जो भी बताएं मैं
अनुष्ठान, विधि आदि करने को
तैयार हूँ” संत ने समस्या
समझी और बोले- “इसका तो हल बड़ा
आसान है। ध्यान से सुनो सेठ, बस्ती
के अन्तिम छोर पर एक बुढ़िया रहती है, एक
दम कंगाल और विपन्न। उसके न कोई कमाने वाला है और न वह कुछ कमा पाने में समर्थ है।
उसे मात्र आधा किलो आटा दान दे दो। अगर वह यह दान स्वीकार कर ले तो इतना पुण्य
उपार्जित हो जाएगा कि तुम्हारी समस्त मनोकामना पूर्ण हो जाएगी। तुम्हें अवश्य अपना
वांछित प्राप्त होगा।”
सेठ को बड़ा आसान उपाय मिल गया। उसे सब्र कहां था, घर पहुँच कर सेवक के साथ किलो भर आटा
लेकर पहुँच गया बुढिया के झोपडे पर। सेठ नें कहा- “माताजी मैं आपके लिए आटा लाया हूँ इसे
स्वीकार कीजिए” बूढ़ी मां ने कहा- “बेटा आटा तो मेरे पास है, मुझे नहीं चाहिए” सेठ ने कहा- “फिर भी रख लीजिए” बूढ़ी मां ने कहा- “क्या करूंगी रख के मुझे आवश्यकता नहीं
है” सेठ ने कहा- “अच्छा, कोई बात नहीं, किलो नहीं तो यह आधा किलो तो रख लीजिए” बूढ़ी मां ने कहा- “बेटा, आज खाने के लिए जरूरी, आधा किलो आटा पहले से ही मेरे पास है, मुझे अतिरिक्त की जरूरत नहीं है” सेठ ने कहा- “तो फिर इसे कल के लिए रख लीजिए” बूढ़ी मां ने कहा- “बेटा, कल की चिंता मैं आज क्यों करूँ, जैसे हमेशा प्रबंध होता है कल के लिए
कल प्रबंध हो जाएगा” बूढ़ी
मां ने लेने से साफ इन्कार कर दिया। सेठ की आँख खुल चुकी थी, एक गरीब बुढ़िया कल के भोजन की चिंता
नहीं कर रही और मेरे पास अथाह धन सामग्री होते हुए भी मैं आठवी पीढ़ी की चिन्ता में
घुल रहा हूँ। मेरी चिंता का कारण अभाव नहीं तृष्णा है। वाकई तृष्णा का कोई अन्त
नहीं है।
****
पंडित
के पाँच सौ रुपये
एक
बार ऐसा हुआ कि एक पंडित जी थे।
पंडित जी ने एक
दुकानदार के पास पाँच सौ रुपये रख दिये। उन्होंने
सोचा कि जब बच्ची की शादी होगी, तो
पैसा ले लेंगे। थोड़े दिनों के बाद जब बच्ची सयानी हो गयी, तो
पंडित जी उस दुकानदार के पास गये। उसने
नकार दिया कि आपने कब हमें पैसा दिया था। उसने पंडित जी से कहा कि क्या हमने कुछ
लिखकर दिया है।
पंडित जी इस हरकत से परेशान हो गये और चिन्ता में डूब गये।
थोड़े दिन के बाद उन्हें याद आया कि क्यों न राजा से इस बारे में शिकायत कर दें ताकि वे कुछ फैसला कर दें एवं मेरा पैसा कन्या के विवाह के लिए मिल जाये। वे राजा के पास पहुँचे तथा अपनी फरियाद सुनाई। राजा ने कहा कि कल हमारी सवारी निकलेगी- तुम उस लाला जी की दूकान पर खड़े रहना| अगले दिन राजा की सवारी निकली। सभी लोगों ने फूलमालाएँ पहनायीं, किसी ने आरती उतारी। पंडित जी लालाजी की दुकान के पास खड़े थे। राजा ने पंडित जी को देखते ही कहा कि गुरु जी आप यहाँ कैसे- आप तो हमारे गुरु है? आइये इस बग्घी में बैठ जाइये। लालाजी यह सब देख रहे थे। उन्होंने आरती उतारी, सवारी आगे बढ़ गयी। थोड़ी दूर चलने के बाद राजा ने पंडित जी को उतार दिया और कहा कि पंडित जी हमने आपका काम कर दिया। अब आगे आपका भाग्य। उधर लालाजी यह सब देखकर हैरान थे कि पंडित जी की तो राजा से अच्छी साँठ गाँठ है कही वे हमारा कबाड़ा न करवा दे| लालाजी ने अपने मुनीम को पंडित जी को ढूँढ़कर लाने को कहा| पंडित जी एक पेड़ के नीचे बैठ कर कुछ विचार कर रहे थे| मुनीम जी आदर के साथ उन्हें अपने साथ ले गये। लालाजी ने प्रणाम किया और बोले पंडित जी हमने काफी श्रम किया तथा पुराने खातो को देखा तो पाया कि हमारे खाते में आपका पाँच सौ रुपये जमा है। पंडित जी दस साल में ब्याज के बारह हजार रुपये हो गये। पंडित जी आपकी बेटी हमारी बेटी है। अत: एक हजार रुपये आप हमारी तरफ से ले जाइये तथा उसे लड़की की शादी में लगा देना। इस प्रकार लालाजी ने पंडित जी को तेरह हजार रुपये देकर प्रेम के साथ विदा किया। अर्थात जब एक राजा के साथ सम्बन्ध रखने से परेशानी दूर हो जाती है तो अगर उस परम पिता मालिक से अगर हम अपना रिश्ता बना लेंगे तो हमारी सारी परेशानी दूर हो जायेगी|
पंडित जी इस हरकत से परेशान हो गये और चिन्ता में डूब गये।
थोड़े दिन के बाद उन्हें याद आया कि क्यों न राजा से इस बारे में शिकायत कर दें ताकि वे कुछ फैसला कर दें एवं मेरा पैसा कन्या के विवाह के लिए मिल जाये। वे राजा के पास पहुँचे तथा अपनी फरियाद सुनाई। राजा ने कहा कि कल हमारी सवारी निकलेगी- तुम उस लाला जी की दूकान पर खड़े रहना| अगले दिन राजा की सवारी निकली। सभी लोगों ने फूलमालाएँ पहनायीं, किसी ने आरती उतारी। पंडित जी लालाजी की दुकान के पास खड़े थे। राजा ने पंडित जी को देखते ही कहा कि गुरु जी आप यहाँ कैसे- आप तो हमारे गुरु है? आइये इस बग्घी में बैठ जाइये। लालाजी यह सब देख रहे थे। उन्होंने आरती उतारी, सवारी आगे बढ़ गयी। थोड़ी दूर चलने के बाद राजा ने पंडित जी को उतार दिया और कहा कि पंडित जी हमने आपका काम कर दिया। अब आगे आपका भाग्य। उधर लालाजी यह सब देखकर हैरान थे कि पंडित जी की तो राजा से अच्छी साँठ गाँठ है कही वे हमारा कबाड़ा न करवा दे| लालाजी ने अपने मुनीम को पंडित जी को ढूँढ़कर लाने को कहा| पंडित जी एक पेड़ के नीचे बैठ कर कुछ विचार कर रहे थे| मुनीम जी आदर के साथ उन्हें अपने साथ ले गये। लालाजी ने प्रणाम किया और बोले पंडित जी हमने काफी श्रम किया तथा पुराने खातो को देखा तो पाया कि हमारे खाते में आपका पाँच सौ रुपये जमा है। पंडित जी दस साल में ब्याज के बारह हजार रुपये हो गये। पंडित जी आपकी बेटी हमारी बेटी है। अत: एक हजार रुपये आप हमारी तरफ से ले जाइये तथा उसे लड़की की शादी में लगा देना। इस प्रकार लालाजी ने पंडित जी को तेरह हजार रुपये देकर प्रेम के साथ विदा किया। अर्थात जब एक राजा के साथ सम्बन्ध रखने से परेशानी दूर हो जाती है तो अगर उस परम पिता मालिक से अगर हम अपना रिश्ता बना लेंगे तो हमारी सारी परेशानी दूर हो जायेगी|
*****
बहु
बीती, थोड़ी
रही
एक राजा था जिसे राज भोगते काफी समय हो गया था बाल भी सफ़ेद
होने लगे थे। एक दिन उसने अपने दरबार मे उत्सव रखा। उत्सव मे मुजरा करने वाली और
अपने गुरु जी को भी बुलाया और दूर देश के राजाओं को भी। राजा ने कुछ मुद्राए अपने गुरु जी को दी और कहा कि जो
अदा मुजरा करने वाली की आपको अच्छी लगेगी तब वह मुद्रा गुरु जी उस मुजरा वाली को दे देंगे।
सारी रात मुजरा चलता रहा। सुबह होने वाली थी,
मुज़रा करने वाली ने देखा मेरा तबले
वाला ऊँघ रहा है उसको जगाने के लिये मुज़रा करने वाली ने
एक दोहा पढ़ा,
"बहु
बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिहाई
एक पलक के कारने, ना कलंक लग जाए"
अब इस दोहे का अलग अलग व्यक्तियों ने अलग अलग अपने अपने
अनुरूप अर्थ निकाला। तबले वाला सतर्क हो कर बजाने लगा। जब
ये बात गुरु ने सुनी, गुरु ने सारी मोहरे उस मुज़रा करने वाली को दे दी। वही दोहा
उसने फिर पढ़ा तो
राजा की लड़की ने अपना नवलखा
हार दे दिया। उसने फिर वही दोहा दोबारा बोलने लगी तो राजा के लड़के ने अपना मुकट उतारकर दे दिया। वही दोहा
दोहराने लगी राजा ने कहा बस कर एक दोहे से तुमने वैश्या होकर सबको लूट
लिया है। जब ये बात राजा के गुरु ने सुनी गुरु के नेत्रो मे जल आ गया
और कहने लगा, "राजा
इसको तू वैश्या न कह, ये मेरी गुरू है। इसने मुझें मत दी है कि मै सारी उम्र जंगलो
मे भक्ति करता रहा और आखरी समय मे मुज़रा देखने आ गया हूँ। भाई मै तो चला। राजा की लड़की ने
कहा, "आप
मेरी शादी नहीं कर रहे थे, आज मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना
था। इसनें मुझे सुमति दी है कि कभी तो तेरी शादी होगी । क्यों अपने पिता को कलंकित
करती है ?" राजा
के लड़के ने कहा, "आप
मुझे राज नहीं दे रहे थे। मैंने आपके सिपाहियो से मिलकर आपका क़त्ल करवा देना था।
इसने समझाया है कि आखिर राज तो तुम्हे ही मिलना है। क्यों अपने पिता के खून का
इलज़ाम अपने सर लेते हो? जब ये बातें राजा ने सुनी तो राजा ने सोचा क्यों न मै अभी अपने पुत्र का राजतिलक कर दूँ, गुरु जी भी मौजूद है। उसी समय उसने अपने पुत्र का राजतिलक कर दिया और लड़की से कहा बेटा, "मैं आपकी शादी
जल्दी कर दूँगा।" मुज़रा करने वाली कहती है, "मेरे एक दोहे से
इतने लोग सुधर गए, मै तो ना सुधरी। आज
से मै अपना धंधा बंद करती हूँ। हे प्रभु! आज से मै भी तेरा नाम सुमिरन करुँगी
*****
सौ
रूपये जगन्नाथ जी में
एक
सेठ के पास एक व्यक्ति काम करता था। सेठ उस व्यक्ति पर बहुत विश्वास करता था जो भी
जरुरी काम हो वह सेठ हमेशा उसी व्यक्ति से कहता
था|
वो व्यक्ति भगवान का बहुत बड़ा भक्त था वह सदा भगवान के चिंतन भजन कीर्तन सिमरन
सत्संग आदि का लाभ लेता रहता था। एक दिन उस वक्त ने सेठ से श्री जगन्नाथ धाम
यात्रा करने के लिए कुछ दिन की छुट्टी मांगी सेठ ने उसे छुट्टी देते हुए कहा भाई
मैं तो हूं संसारी आदमी हमेशा व्यापार के काम में व्यस्त रहता हूं जिसके कारण कभी
तीर्थ गमन का लाभ नहीं ले पाता। तुम जा ही रहे हो तो यह लो 100 रुपए
मेरी ओर से श्री जगन्नाथ प्रभु के चरणों
में समर्पित कर देना। भक्त सेठ से सौ रुपए लेकर श्री जगन्नाथ धाम यात्रा पर निकल
गया| कई दिन की पैदल यात्रा करने के बाद वह श्री जगन्नाथ पुरी
पहुंचा। मंदिर की ओर प्रस्थान करते समय उसने रास्ते में देखा कि बहुत
सारे संत, भक्त जन, वैष्णव
जन, हरि नाम संकीर्तन बड़ी मस्ती में कर रहे हैं। सभी की आंखों से अश्रु धारा बह रही है। जोर-जोर से हरि बोल, हरि
बोल गूंज रहा है। संकीर्तन में बहुत आनंद आ रहा था। भक्त
भी वहीं रुक कर हरिनाम संकीर्तन का आनंद लेने लगा। फिर
उसने देखा कि संकीर्तन करने वाले भक्तजन इतनी देर से संकीर्तन करने के कारण उनके
होंठ सूखे हुए हैं वह दिखने में कुछ भूखे ही प्रतीत हो रहे थे उसने सोचा क्यों ना
सेठ के सौ रुपए से इन भक्तों को भोजन करा दूँ। उसने उन सभी को उस सो रुपए में से
भोजन की व्यवस्था कर दी सबको भोजन कराने के बाद उसे भोजन व्यवस्था में उसे कुल 98 रुपए
खर्च करने पड़े। उसके पास दो रुपए बच गए उसने सोचा चलो अच्छा हुआ दो रुपए जगन्नाथ
जी के चरणों में सेठ के नाम से चढ़ा दूंगा। जब सेठ पूछेगा तो मैं कहूंगा वह पैसे
चढ़ा दिए। सेठ यह नहीं कहेगा 100 रुपए
चढ़ाए। सेठ पूछेगा पैसे चढ़ा दीजिए। मैं बोल दूंगा कि, पैसे
चढ़ा दिए। झूठ भी नहीं होगा और काम भी हो जाएगा। वह भक्त श्री जगन्नाथ जी के
दर्शनों के लिए मंदिर में प्रवेश किया श्री जगन्नाथ जी की छवि को निहारते हुए हुए
अपने हृदय में उनको विराजमान कराया। अंत में उसने सेठ के दो रुपए श्री जगन्नाथ जी
के चरणो में चढ़ा दिए। और बोला यह दो रुपए सेठ ने भेजे हैं। उसी रात सेठ के पास
स्वप्न में श्री जगन्नाथ जी आए और बोले सेठ तुम्हारे 98 रुपए
मुझे मिल गए हैं यह कहकर श्री जगन्नाथ जी अंतर्ध्यान हो गए। सेठ सोचने लगा मेरा
नौकर बड़ा ईमानदार है, पर अचानक उसे क्या जरुरत पड़ गई थी वह दो रुपए भगवान को कम
चढ़ाया? उसने दो रुपए का क्या खा लिया? उसे
ऐसी क्या जरूरत पड़ी?
ऐसा विचार सेठ करता
रहा। काफी दिन बीतने के बाद भक्त वापस गांव आया और सेठ के पास पहुंचा। सेठ ने कहा
कि मेरे पैसे जगन्नाथ जी को चढ़ा दी?
भक्त बोला हां मैंने पैसे चढ़ा दिए। सेठ ने कहा पर तुमने 98 रुपए
क्यों चढ़ाए दो रुपए किस काम में प्रयोग किए तब
भक्त ने सारी बात बताई की उसने 98 रुपए
से संतो को भोजन करा दिया था। और ठाकुर जी को सिर्फ दो रुपए चढ़ाये थे। सेठ
बड़ा खुश हुआ वह भक्त के चरणों में गिर पड़ा और बोला आप धन्य हो आपकी वजह से मुझे
श्री जगन्नाथ जी के दर्शन हीं बैठे-बैठे हो गए। भक्तमाल की कथा कहते हुए, संत
कहते हैं कि भगवान को आपके धन की कोई आवश्यकता नहीं है। भगवान को वह 98 रुपए
स्वीकार है जो उनके भक्तों की सेवा में खर्च किए गए और उस दो रुपए की कोई महत्व
नहीं है जो उनके चरणों में नगद चढ़ाए गए। इसलिए जहां तक हो सके भक्तों का सम्मान
कीजिए, उनकी सेवा कीजिए उन्हें कोई आवश्यकता हो तो उसको पूरा कीजिए। भक्तों
की सेवा करने से भगवान के पास आपका नाम रजिस्टर हो जाता है।
******
चंदनपुर का राजा
बहुत समय पहले की बात है , चंदनपुर का राजा बड़ा प्रतापी था , दूर-दूर तक उसकी समृद्धि की चर्चाएं
होती थी, उसके महल में हर एक
सुख-सुविधा की वस्तु उपलब्ध थी पर फिर भी अंदर से उसका मन अशांत रहता था। उसने कई
ज्योतिषियों और पंडितों से इसका कारण जानना चाहा, बहुत से विद्वानो से मिला, किसी ने कोई अंगूठी पहनाई तो किसी ने
यज्ञ कराए , पर फिर भी राजा का
दुःख दूर नहीं हुआ, उसे शांति नहीं
मिली। एक दिन भेष बदल कर
राजा अपने राज्य की सैर पर निकला। घूमते- घूमते वह एक खेत के निकट से गुजरा , तभी उसकी नज़र एक किसान पर पड़ी , किसान ने फटे-पुराने वस्त्र धारण कर
रखे थे और वह पेड़ की छाँव में बैठ कर भोजन कर रहा था। किसान के वस्त्र
देख राजा के मन में आया कि वह किसान को कुछ स्वर्ण मुद्राएं दे दे ताकि उसके जीवन
मे कुछ खुशियां आ पाये। राजा किसान के सम्मुख जा कर बोला – ”मैं एक राहगीर हूँ, मुझे तुम्हारे खेत पर ये चार स्वर्ण
मुद्राएँ गिरी मिलीं, चूँकि यह खेत तुम्हारा है इसलिए ये मुद्राएं तुम ही रख लो।“ किसान: ना–ना सेठ जी, ये मुद्राएं मेरी नहीं हैं, इसे आप ही रखें या किसी और को दान कर
दें , मुझे इनकी कोई
आवश्यकता नहीं।“ किसान की यह प्रतिक्रिया राजा को बड़ी
अजीब लगी, वह बोला, ”धन की आवश्यकता किसे नहीं होती भला आप
लक्ष्मी को ना कैसे कर सकते हैं?” सेठ जी, मैं रोज चार आने कमा लेता हूँ , और उतने में ही प्रसन्न रहता हूँ| किसान बोला। “क्या? आप सिर्फ चार आने की कमाई करते हैं, और उतने में ही प्रसन्न रहते हैं, यह कैसे संभव है!”, राजा ने अचरज से पूछा। सेठ
जी”, किसान
बोला,” प्रसन्नता
इस बात पर निर्भर नहीं करती की आप कितना कमाते हैं या आपके पास कितना धन है प्रसन्नता उस धन के
प्रयोग पर निर्भर करती है। “तो तुम इन चार आने का क्या-क्या कर लेते हो ?, राजा ने उपहास के लहजे में प्रश्न
किया। किसान भी बेकार की
बहस में नहीं पड़ना चाहता था उसने आगे बढ़ते हुए उत्तर दिया,” इन चार आनो में से एक मैं कुएं में डाल
देता हूँ, दूसरे से कर्ज चुका देता हूँ, तीसरा उधार में दे देता हूँ और चौथा
मिटटी में गाड़ देता हूँ” राजा सोचने लगा, उसे यह उत्तर समझ नहीं आया। वह किसान से इसका अर्थ पूछना
चाहता था, पर वो जा चुका था। राजा ने अगले दिन
ही सभा बुलाई और पूरे दरबार में कल की घटना कह सुनाई और सबसे किसान के उस कथन का
अर्थ पूछने लगा। दरबारियों ने अपने-अपने तर्क पेश किये पर कोई भी राजा को
संतुष्ट नहीं कर पाया, अंत में किसान को ही दरबार में बुलाने का निर्णय लिया गया। बहुत खोज-बीन के
बाद किसान मिला और उसे अगले दिन की सभा में प्रस्तुत होने का निर्देश
दिया गया। राजा ने किसान को उस दिन अपने भेष बदल कर भ्रमण करने के बारे
में बताया और सम्मान पूर्वक दरबार में बैठाया। मैं तुम्हारे उत्तर से प्रभावित हूँ, और तुम्हारे चार आने का हिसाब जानना
चाहता हूँ; बताओ, तुम अपने कमाए चार आने किस तरह खर्च
करते हो जो तुम इतना प्रसन्न और संतुष्ट रह पाते हो?” , राजा ने प्रश्न किया। किसान बोला,” हुजूर, जैसा की मैंने बताया था, मैं एक आना कुएं में डाल देता हूँ, यानि अपने परिवार के भरण-पोषण में लगा
देता हूँ, दूसरे से मैं कर्ज चुकाता हूँ, यानि इसे मैं अपने वृद्ध माँ-बाप की
सेवा में लगा देता हूँ, तीसरा मैं उधार दे देता हूँ, यानि अपने बच्चों की शिक्षा-दीक्षा में
लगा देता हूँ, और चौथा मैं मिटटी
में गाड़ देता हूँ, यानि मैं एक पैसे
की बचत कर लेता हूँ ताकि समय आने पर मुझे किसी से माँगना ना पड़े और मैं इसे
धार्मिक, सामजिक या अन्य
आवश्यक कार्यों में लगा सकूँ। “ राजा को अब किसान की बात समझ आ चुकी थी। राजा की समस्या का
समाधान हो चुका था, वह जान चुका था की
यदि उसे प्रसन्न एवं संतुष्ट रहना है तो उसे भी अपने अर्जित किये धन का सही-सही
उपयोग करना होगा।
****
इस
जन्म में या अगले जन्म में
एक
सेठ जी थे। बहुत दयालु थे,
धरम-करम में यकीन
करते थे। उनके पास कोई भी व्यक्ति उधार मांगने आ जाता तो वो उसे मना नहीं करते थे।
वो मुनीम को बुलाते और जो उधार मांगने वाला होता, उससे
पूछते कि तुम उधार कब लौटाओगे? इस
जन्म में या अगले जन्म में? जो
लोग ईमानदार होते, वो कहते इसी जन्म में। कुछ लोग चतरे भी होते है। तो कई चतरे मन
ही मन खुश होते कि अच्छा सेठ है, अगले
जन्म में उधार वापसी की उम्मीद लगाए बैठा है। ऐसे लोग मुनीम से कहते कि वो अगले
जन्म में लौटाएंगे। मुनीम कभी किसी से कुछ पूछता नहीं था। जो जिस जन्म की बात कह
देता, मुनीम लिख लेता। एक
दिन एक चोर सेठ के पास उधार मांगने पहुंचा। उसे मालूम था कि सेठ अगले जन्म तक के
लिए उधार देता है। हालांकि उसका मकसद उधार लेने से अधिक सेठ की तिजोरी को देखना भी
था। चोर ने सेठ से कुछ पैसे उधार मांगे, सेठ
ने मुनीम को बुला कर उधार देने को कह दिया। मुनीम ने चोर से पूछा कि इस जन्म में
लौटाओगे या अगले जन्म में?
चोर ने कहा अगले जन्म
में। मुनीम ने तिजोरी खोल कर पैसे उसे दे दिए। चोर ने तिजोरी देख ली। अब
चोर ने तय कर लिया कि इस मूर्ख सेठ की तिजोरी रात में उड़ा दी जाए। वो रात में सेठ
के घर पहुँच गया और वो वहीं भैंसों के तबेले में छिप कर सेठ के सोने का इंतज़ार
करने लगा। अचानक चोर ने सुना कि भैंसे आपस में बातें कर रही हैं। चोर
भैंसो की भाषा ठीक से समझ पा रहा था। एक भैंस ने दूसरी से पूछा कि तुम तो आज ही आई
हो न, बहन?
भैंस ने जवाब दिया, “हां, आज
ही सेठ के तबेले में आई हूं। तुम कब से यहाँ हो?” “मुझे
तो तीन साल हो गए। मैंने सेठ से उधार लिया था यह कह कर कि अगले जन्म में लौटाऊंगी।
सेठ से उधार लेने के बाद जब मेरी मृत्यु हो गई तो मैं भैंस बन गई और सेठ के तबेले
में चली आई। अब दूध देकर उसका कर्ज़ उतार रही हूं। जब तक कर्ज़ की रकम पूरी नहीं
हो जाएगी, तब तक यहीं रहना होगा।”
चोर ने पूरी बात सुनी और वहाँ बंधी भैसों की ओर देखा। वो समझ गया कि उधार चुकाना ही पड़ता है। इस जन्म में या अगले जन्म में। उसे चुकाना ही होगा। वो उल्टे पांव सेठ के घर की ओर भागा और जो कर्ज़ उसने लिया था उसे फटाफट मुनीम को लौटा कर रजिस्टर से अपना नाम कटवा लिया। हम सब भी इस दुनिया के अंदर इसलिए हैं कि कुछ लेने देने के हिसाब चुकाने हैं। बाबा जी कहते हैं कि अगर सब के लेने देने के हिसाब चुकता हो जाये तो इस दुनिया का ही अंत हो जाये। चाहे दुःख हो या सुख हिसाब तो देने ही होंगे। सिमरन करो जी दुःख का बोझ कुछ कम हो जायेगा।
चोर ने पूरी बात सुनी और वहाँ बंधी भैसों की ओर देखा। वो समझ गया कि उधार चुकाना ही पड़ता है। इस जन्म में या अगले जन्म में। उसे चुकाना ही होगा। वो उल्टे पांव सेठ के घर की ओर भागा और जो कर्ज़ उसने लिया था उसे फटाफट मुनीम को लौटा कर रजिस्टर से अपना नाम कटवा लिया। हम सब भी इस दुनिया के अंदर इसलिए हैं कि कुछ लेने देने के हिसाब चुकाने हैं। बाबा जी कहते हैं कि अगर सब के लेने देने के हिसाब चुकता हो जाये तो इस दुनिया का ही अंत हो जाये। चाहे दुःख हो या सुख हिसाब तो देने ही होंगे। सिमरन करो जी दुःख का बोझ कुछ कम हो जायेगा।
*****
बुढ़िया
माई
एक
बुढ़िया माई को उनके गुरु जी ने बाल-गोपाल की एक मूर्ती देकर कहा- "माई ये
तेरा बालक है,इसका अपने बच्चे के समान प्यार से लालन-पालन करती रहना ।" बुढ़िया माई बड़े लाड-प्यार से ठाकुर जी का लालन-पालन करने लगी| एक
दिन गाँव के बच्चों ने देखा माई मूर्ती को अपने बच्चे की तरह लाड कर रही है! बच्चो
ने माई से हँसी की और कहा - "अरी मैय्या सुन यहाँ एक भेड़िया आ गया है, जो
छोटे बच्चो को उठाकर ले जाता है।
मैय्या अपने लाल का अच्छे से ध्यान रखना, कही भेड़िया इसे उठाकर ना ले जाये!" बुढ़िया माई ने अपने बाल-गोपाल को उसी समय कुटिया मे विराजमान किया और स्वयं लाठी (छड़ी) लेकर दरवाजे पर बैठ गयी।
अपने लाल को भेड़िये से बचाने के लिये बुढ़िया माई भूखी -प्यासी दरवाजे पर पहरा देती रही। पहरा देते-देते एक दिन बीता, फिर दूसरा, तीसरा, चौथा और पाँचवा दिन बीत गया। बुढ़िया माई पाँच दिन और पाँच रात लगातार, बगैर पलके झपकाये -भेड़िये से अपने बाल-गोपाल की रक्षा के लिये पहरा देती रही । उस भोली-भाली मैय्या का यह भाव देखकर, ठाकुर जी का ह्रदय प्रेम से भर गया, अब ठाकुर जी को मैय्या के प्रेम का प्रत्यक्ष रुप से आस्वादन करने का लोभ हो आया! भगवान बहुत ही सुंदर रुप धारण कर, वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर माई के पास आये। ठाकुर जी के पाँव की आहट पाकर मैय्या ड़र गई कि "कही दुष्ट भेड़िया तो नहीं आ गया, मेरे लाल को उठाने !" मैय्या ने लाठी उठाई और भेड़िये को भगाने के लिये उठ खड़ी हूई! तब श्यामसुंदर ने कहा - "मैय्या मैं हूँ, मैं तेरा वही बालक हूँ -जिसकी तुम रक्षा करती हो!" माई ने कहा - "क्या? चल हट तेरे जैसे बहुत देखे है, तेरे जैसे सैकड़ो अपने लाल पर न्यौछावर कर दूँ, अब ऐसे मत कहियो ! चल भाग जा यहा से..!" (बुढ़िया माई ठाकुर जी को भाग जाने के लिये कहती है, क्योकि माई को ड़र था की कही ये बना- ठना सेठ ही उसके लाल को ना उठा ले जाये)। ठाकुर जी मैय्या के इस भाव और एकनिष्ठता को देखकर बहुत ज्यादा प्रसन्न हो गये । ठाकुर जी मैय्या से बोले :-"अरी मेरी भोली मैय्या, मैं त्रिलोकीनाथ भगवान हूँ, मुझसे जो चाहे वर मांग ले, मैं तेरी भक्ति से प्रसन्न हूँ" बुढ़िया माई ने कहा - "अच्छा आप भगवान हो, मैं आपको सौ-सौ प्रणाम् करती हूँ ! कृपा कर मुझे यह वरदान दीजिये कि मेरे प्राण-प्यारे लाल को भेड़िया न ले जाए" अब ठाकुर जी और ज्यादा प्रसन्न होते हुए बोले - "तो चल मैय्या मैं तेरे लाल को और तुझे अपने निज धाम लिए चलता हूँ, वहाँ भेड़िये का कोई भय नहीं है।" इस तरह प्रभु बुढ़िया माई को अपने निज धाम ले गये।
मैय्या अपने लाल का अच्छे से ध्यान रखना, कही भेड़िया इसे उठाकर ना ले जाये!" बुढ़िया माई ने अपने बाल-गोपाल को उसी समय कुटिया मे विराजमान किया और स्वयं लाठी (छड़ी) लेकर दरवाजे पर बैठ गयी।
अपने लाल को भेड़िये से बचाने के लिये बुढ़िया माई भूखी -प्यासी दरवाजे पर पहरा देती रही। पहरा देते-देते एक दिन बीता, फिर दूसरा, तीसरा, चौथा और पाँचवा दिन बीत गया। बुढ़िया माई पाँच दिन और पाँच रात लगातार, बगैर पलके झपकाये -भेड़िये से अपने बाल-गोपाल की रक्षा के लिये पहरा देती रही । उस भोली-भाली मैय्या का यह भाव देखकर, ठाकुर जी का ह्रदय प्रेम से भर गया, अब ठाकुर जी को मैय्या के प्रेम का प्रत्यक्ष रुप से आस्वादन करने का लोभ हो आया! भगवान बहुत ही सुंदर रुप धारण कर, वस्त्राभूषणों से सुसज्जित होकर माई के पास आये। ठाकुर जी के पाँव की आहट पाकर मैय्या ड़र गई कि "कही दुष्ट भेड़िया तो नहीं आ गया, मेरे लाल को उठाने !" मैय्या ने लाठी उठाई और भेड़िये को भगाने के लिये उठ खड़ी हूई! तब श्यामसुंदर ने कहा - "मैय्या मैं हूँ, मैं तेरा वही बालक हूँ -जिसकी तुम रक्षा करती हो!" माई ने कहा - "क्या? चल हट तेरे जैसे बहुत देखे है, तेरे जैसे सैकड़ो अपने लाल पर न्यौछावर कर दूँ, अब ऐसे मत कहियो ! चल भाग जा यहा से..!" (बुढ़िया माई ठाकुर जी को भाग जाने के लिये कहती है, क्योकि माई को ड़र था की कही ये बना- ठना सेठ ही उसके लाल को ना उठा ले जाये)। ठाकुर जी मैय्या के इस भाव और एकनिष्ठता को देखकर बहुत ज्यादा प्रसन्न हो गये । ठाकुर जी मैय्या से बोले :-"अरी मेरी भोली मैय्या, मैं त्रिलोकीनाथ भगवान हूँ, मुझसे जो चाहे वर मांग ले, मैं तेरी भक्ति से प्रसन्न हूँ" बुढ़िया माई ने कहा - "अच्छा आप भगवान हो, मैं आपको सौ-सौ प्रणाम् करती हूँ ! कृपा कर मुझे यह वरदान दीजिये कि मेरे प्राण-प्यारे लाल को भेड़िया न ले जाए" अब ठाकुर जी और ज्यादा प्रसन्न होते हुए बोले - "तो चल मैय्या मैं तेरे लाल को और तुझे अपने निज धाम लिए चलता हूँ, वहाँ भेड़िये का कोई भय नहीं है।" इस तरह प्रभु बुढ़िया माई को अपने निज धाम ले गये।
*****
राजा
का स्वप्न
एक
राजा ने एक दिन स्वप्न देखा कि कोई परोपकारी साधु उससे कह रहा है कि बेटा! कल
रात को तुझे एक विषैला सर्प काटेगा और उसके
काटने से तेरी मृत्यु हो जायेगी। वह सर्प अमुक पेड़ की जड़ में रहता है, पूर्व
जन्म की शत्रुता
का बदला लेने के लिए वह तुम्हें काटेगा।
प्रातःकाल राजा सोकर उठ और स्वप्न की बात पर विचार
करने लगा। धर्मात्माओं
को अक्सर सच्चे ही स्वप्न हुआ करते हैं।
राजा धर्मात्मा था, इसलिए
अपने स्वप्न की सत्यता पर उसे विश्वास था। वह
विचार करने लगा कि अब आत्म- रक्षा के लिए
क्या उपाय करना चाहिए? सोचते- सोचते राजा इस निर्णय पर पहुँचा कि मधुर व्यवहार
से बढ़कर शत्रु को जीतने वाला और कोई
हथियार इस पृथ्वी पर नहीं है। उसने सर्प के साथ मधुर व्यवहार करके उसका मन बदल देने का
निश्चय किया। संध्या होते ही राजा ने उस
पेड़ की जड़ से लेकर अपनी शय्या तक फूलों का
बिछौना बिछवा दिया, सुगन्धित जलों का छिड़काव करवाया, मीठे दूध के कटोरे जगह- जगह रखवा दिये और सेवकों से कह दिया कि रात को जब सर्प निकले तो कोई उसे किसी प्रकार कष्ट पहुँचाने या छेड़- छाड़ करने का प्रयत्न न करे।
रात को ठीक बारह बजे सर्प अपने बिल में से फुसकारता हुआ निकला और राजा के महल की तरफ चल दिया। वह जैसे- जैसे आगे बढ़तागया, अपने लिए की गई स्वागत व्यवस्था को देख- देखकर आनन्दित होता गया। कोमल बिछौने पर लेटता हुआ मनभावनी सुगन्ध का रसास्वादन करता हुआ, स्थान- स्थान पर मीठा दूध पीता हुआ आगे बढ़ता था। क्रोध के स्थान पर सन्तोष और प्रसन्नता के भाव उसमें बढ़ने लगे। जैसे- जैसे वह आगे चलता गया, वैसे ही वैसे उसका क्रोध कम होता गया। राजमहल में जब वह प्रवेश करने लगा तो देखा कि प्रहरी और द्वारपाल सशस्त्र खड़े हैं, परन्तु उसे जरा भी हानि पहुँचाने की चेष्टा नहीं करते। यह असाधारण सौजन्य देखकर सर्प के मन में स्नेह उमड़ आया। सद्व्यवहार, नम्रता, मधुरता के जादू ने उसे मन्त्र- मुग्ध कर लिया था। कहाँ वह राजा को काटने चला था, परन्तु अब उसके लिए अपना कार्य असंभव हो गया। हानि पहुँचाने के लिए आने वाले शत्रु के साथ जिसका ऐसा मधुर व्यवहार है, उस धर्मात्मा राजा को काटूँ तो किस प्रकार काटूँ ? यह प्रश्न उससे हल न हो सका। राजा के पलंग तक जाने तक सर्प का निश्चय पूर्ण रूप से बदल गया। सर्प के आगमन की राजा प्रतीक्षा कर रहा था। नियत समय से कुछ विलम्ब में वह पहुँचा। सर्प ने राजा से कहा- ‘हे राजन् ! मैं तुम्हें काटकर अपने पूर्व जन्म का बदला चुकाने आया था, परन्तु तुम्हारे सौजन्य और सद्व्यवहार ने मुझे परास्त कर दिया। अब मैं तुम्हारा शत्रु नहीं मित्र हूँ। मित्रता के उपहार स्वरूप अपनी बहुमूल्य मणि मैं तुम्हें दे रहा हूँ। लो इसे अपने पास रखो।’ इतना कहकर और मणि राजा के सामने रखकर सर्प उलटे पाँव अपने घर वापस चला गया। भलमनसाहत और सद्व्यवहार ऐसे प्रबल अस्त्र हैं, जिनसे
बुरे- से स्वभाव के दुष्ट मनुष्यों को भी परास्त होना पड़ता है।
बिछौना बिछवा दिया, सुगन्धित जलों का छिड़काव करवाया, मीठे दूध के कटोरे जगह- जगह रखवा दिये और सेवकों से कह दिया कि रात को जब सर्प निकले तो कोई उसे किसी प्रकार कष्ट पहुँचाने या छेड़- छाड़ करने का प्रयत्न न करे।
रात को ठीक बारह बजे सर्प अपने बिल में से फुसकारता हुआ निकला और राजा के महल की तरफ चल दिया। वह जैसे- जैसे आगे बढ़तागया, अपने लिए की गई स्वागत व्यवस्था को देख- देखकर आनन्दित होता गया। कोमल बिछौने पर लेटता हुआ मनभावनी सुगन्ध का रसास्वादन करता हुआ, स्थान- स्थान पर मीठा दूध पीता हुआ आगे बढ़ता था। क्रोध के स्थान पर सन्तोष और प्रसन्नता के भाव उसमें बढ़ने लगे। जैसे- जैसे वह आगे चलता गया, वैसे ही वैसे उसका क्रोध कम होता गया। राजमहल में जब वह प्रवेश करने लगा तो देखा कि प्रहरी और द्वारपाल सशस्त्र खड़े हैं, परन्तु उसे जरा भी हानि पहुँचाने की चेष्टा नहीं करते। यह असाधारण सौजन्य देखकर सर्प के मन में स्नेह उमड़ आया। सद्व्यवहार, नम्रता, मधुरता के जादू ने उसे मन्त्र- मुग्ध कर लिया था। कहाँ वह राजा को काटने चला था, परन्तु अब उसके लिए अपना कार्य असंभव हो गया। हानि पहुँचाने के लिए आने वाले शत्रु के साथ जिसका ऐसा मधुर व्यवहार है, उस धर्मात्मा राजा को काटूँ तो किस प्रकार काटूँ ? यह प्रश्न उससे हल न हो सका। राजा के पलंग तक जाने तक सर्प का निश्चय पूर्ण रूप से बदल गया। सर्प के आगमन की राजा प्रतीक्षा कर रहा था। नियत समय से कुछ विलम्ब में वह पहुँचा। सर्प ने राजा से कहा- ‘हे राजन् ! मैं तुम्हें काटकर अपने पूर्व जन्म का बदला चुकाने आया था, परन्तु तुम्हारे सौजन्य और सद्व्यवहार ने मुझे परास्त कर दिया। अब मैं तुम्हारा शत्रु नहीं मित्र हूँ। मित्रता के उपहार स्वरूप अपनी बहुमूल्य मणि मैं तुम्हें दे रहा हूँ। लो इसे अपने पास रखो।’ इतना कहकर और मणि राजा के सामने रखकर सर्प उलटे पाँव अपने घर वापस चला गया। भलमनसाहत और सद्व्यवहार ऐसे प्रबल अस्त्र हैं, जिनसे
बुरे- से स्वभाव के दुष्ट मनुष्यों को भी परास्त होना पड़ता है।
******
संगीतकार
इंग्लैंड में एक
बहुत बड़ा संगीतकार था जिसकी मशहूरी केवल यूरोप में ही नहीं बल्कि अमेरिका तक फैली
हुई थी। वह साल में एक बार अपनी कला का पर्दर्शन केवल आधे घंटे के लिए किया करता
था। सारा साल लोग बड़ी बेसब्री से उस तारीख का इंतज़ार करते रहते। तारीख का एलान
होते ही लोग धडाधड टिकटें खरीदना शुरू कर देते। कई बार यह टिकटें ब्लैक मार्किट
में बिकने लगती। निश्चित दिन वह संगीतकार अपने समय पर आता और अपनी कला का पर्दर्शन
करके चला जाता। उसकी उंगलियाँ जब वायलन पर थिरकतीं तो लोग दीवाने हो जाते। यह
मशहूर था कि उसके संगीत में वह जादू था कि मुर्दे जीवित हो उठते। वह एक विशेष धुन
बजाता तो लोग रोने लगते। दूसरी धुन बजाने पर लोग हंसने लगते। तीसरी और अंतिम धुन
लोगों को मस्त सा बना देती और लोगो को उसके रंगमंच से जाने का पता न चलता था। एक
बार जब यह संगीतकार अपनी कला का पर्दर्शन करके जा रहा था तो एक युवक ने पूछा- “आप
केवल आधे घंटे के लिए कई हज़ार पाऊंड बटोर लेते है। कितना महंगा है आपका संगीत
पर्दर्शन?”
संगीतकार यह बात सुनकर युवक की और देखता हुआ बोला- “मैं
केवल आधे घंटे के संगीत की इतनी फीस नहीं लेता, वर्ष के 364 दिन और साढ़े 23 घंटो के परिश्रम और अभ्यास का मूल्य
लेता हूँ। इतना रियाज़ न करूं तो मेरे सुरों में वह दर्द और जादू न उत्पन्न हो सके
जो लोगों को मस्त बना देता है।”
जैसे आधे घंटे के संगीत के कार्यक्रम के पीछे उसकी कई महीने की रियाज़ तथा दिन रात
का परिश्रम और अभ्यास छिपा होता है, इसी प्रकार हर रचना न जाने कितनी मेहनत, त्याग
और बलिदान मांगती है।
*******
जाको राखे साइयां
एक
बार यात्रियों से भरी एक बस कहीं जा रही थी। अचानक मौसम बदला धुलभरी आंधी के बाद
बारिश की बूंदे गिरने लगी| बारिश तेज होकर
तूफान मे बदल चुकी थी| घनघोर अंधेरा छा गया| भयंकर बिजली चमकने
लगी बिजली कड़क कर बस की तरफ आती और वापस चली जाती| ऐसा कई बार हुआ| सब की सांसे ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे। ड्राईवर ने आखिरकार बस को एक बडे से पेड़ से करीब पचास कदम की दूरी पर रोक दिया और यात्रियों से कहा कि इस बस मे कोई ऐसा यात्री बैठा है जिसकी मौत आज निश्चित है| उसके साथ साथ कहीं हमे भी अपनी जिन्दगी से हाथ न धोना पडे| इसलिए सभी यात्री एक एक कर जाओ और उस पेड़ के हाथ लगाकर आओ जो भी बदकिस्मत होगा उस पर बिजली गिर जाएगी और बाकी सब बच जाएंगे। सबसे पहले जिसकी बारी थी उसको दो तीन यात्रियों ने जबरदस्ती धक्का देकर बस से नीचे उतारा| वह धीरे धीरे पेड़ तक गया डरते डरते पेड़ के हाथ लगाया और भाग कर आकर बस मे बैठ गया। ऐसे ही एक एक कर सब जाते और भागकर आकर बस मे बैठ चैन की सांस लेते। अंत मे केवल एक आदमी बच गया उसने सोचा मेरी मौत तो आज निश्चित है| सब उसे किसी अपराधी की तरह देख रहे थे जो आज उन्हे अपने साथ ले मरता उसे भी जबरदस्ती बस से नीचे उतारा गया| वह भारी मन से पेड़ के पास पहुँचा और जैसे ही पेड़ के हाथ लगाया तेज आवाज से बिजली कडकी और बिजली बस पर गिर गयी बस धूं धूं कर जल उठी सब यात्री मारे गये सिर्फ उस एक को छोडकर जिसे सब बदकिस्मत मान रहे थे वो नही जानते थे कि उसकी वजह से ही सबकी जान बची हुई थी। "दोस्तो हम सब अपनी सफलता का श्रेय
खुद लेना चाहते है जबकि क्या पता हमारे साथ रहने वाले की वजह से हमे यह हासिल हो पाया हो।
तूफान मे बदल चुकी थी| घनघोर अंधेरा छा गया| भयंकर बिजली चमकने
लगी बिजली कड़क कर बस की तरफ आती और वापस चली जाती| ऐसा कई बार हुआ| सब की सांसे ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे। ड्राईवर ने आखिरकार बस को एक बडे से पेड़ से करीब पचास कदम की दूरी पर रोक दिया और यात्रियों से कहा कि इस बस मे कोई ऐसा यात्री बैठा है जिसकी मौत आज निश्चित है| उसके साथ साथ कहीं हमे भी अपनी जिन्दगी से हाथ न धोना पडे| इसलिए सभी यात्री एक एक कर जाओ और उस पेड़ के हाथ लगाकर आओ जो भी बदकिस्मत होगा उस पर बिजली गिर जाएगी और बाकी सब बच जाएंगे। सबसे पहले जिसकी बारी थी उसको दो तीन यात्रियों ने जबरदस्ती धक्का देकर बस से नीचे उतारा| वह धीरे धीरे पेड़ तक गया डरते डरते पेड़ के हाथ लगाया और भाग कर आकर बस मे बैठ गया। ऐसे ही एक एक कर सब जाते और भागकर आकर बस मे बैठ चैन की सांस लेते। अंत मे केवल एक आदमी बच गया उसने सोचा मेरी मौत तो आज निश्चित है| सब उसे किसी अपराधी की तरह देख रहे थे जो आज उन्हे अपने साथ ले मरता उसे भी जबरदस्ती बस से नीचे उतारा गया| वह भारी मन से पेड़ के पास पहुँचा और जैसे ही पेड़ के हाथ लगाया तेज आवाज से बिजली कडकी और बिजली बस पर गिर गयी बस धूं धूं कर जल उठी सब यात्री मारे गये सिर्फ उस एक को छोडकर जिसे सब बदकिस्मत मान रहे थे वो नही जानते थे कि उसकी वजह से ही सबकी जान बची हुई थी। "दोस्तो हम सब अपनी सफलता का श्रेय
खुद लेना चाहते है जबकि क्या पता हमारे साथ रहने वाले की वजह से हमे यह हासिल हो पाया हो।
*****
शिक्षा
का निचोड़
काशी
में गंगा के तट पर एक संत का आश्रम था। एक दिन उनके एक शिष्य ने पूछा, ‘गुरुवर, शिक्षा
का निचोड़ क्या है?’ संत ने मुस्करा कर कहा, ‘एक
दिन तुम खुद-ब-खुद जान जाओगे।’ बात
आई और गई। कुछ समय बाद एक रात संत ने उस शिष्य से कहा, ‘वत्स, इस
पुस्तक को मेरे कमरे में तख्त पर रख दो।’ शिष्य
पुस्तक लेकर कमरे में गया लेकिन तत्काल लौट आया। वह डर से कांप रहा था। संत ने
पूछा, ‘क्या हुआ? इतना
डरे हुए क्यों हो?’ शिष्य ने कहा, ‘गुरुवर, कमरे
में सांप है। संत ने कहा,
‘यह तुम्हारा भ्रम
होगा। कमरे में सांप कहां से आएगा। तुम फिर जाओ और किसी मंत्र का जाप करना। सांप
होगा तो भाग जाएगा।’ शिष्य दोबारा कमरे में गया। उसने मंत्र का जाप भी किया लेकिन
सांप उसी स्थान पर था। वह डर कर फिर बाहर आ गया और संत से बोला, ‘सांप
वहाँ से जा नहीं रहा है।’
संत ने कहा, ‘इस
बार दीपक लेकर जाओ। सांप होगा तो दीपक के प्रकाश से भाग जाएगा।’
शिष्य इस बार दीपक लेकर गया तो देखा कि वहाँ सांप नहीं है। सांप की जगह एक रस्सी लटकी हुई थी। अंधकार के कारण उसे रस्सी का वह टुकड़ा सांप नजर आ रहा था। बाहर आकर शिष्य ने कहा, ‘गुरुवर, वहाँ सांप नहीं रस्सी का टुकड़ा है। अंधेरे में मैंने उसे सांप समझ लिया था।’ संत ने कहा, ‘वत्स, इसी को भ्रम कहते हैं। संसार गहन भ्रम जाल में जकड़ा हुआ है। ज्ञान के प्रकाश से ही इस भ्रम जाल को मिटाया जा सकता है लेकिन अज्ञानता के कारण हम बहुत सारे भ्रम जाल पाल लेते हैं और आंतरिक दीपक के अभाव में उसे दूर नहीं कर पाते। यह आंतरिक दीपक का प्रकाश संतों और ज्ञानियों के सत्संग से मिलता है। जब तक आंतरिक दीपक का प्रकाश प्रज्वलित नहीं होगा, हम भ्रम जाल से नही निकल पायेंगे|
शिष्य इस बार दीपक लेकर गया तो देखा कि वहाँ सांप नहीं है। सांप की जगह एक रस्सी लटकी हुई थी। अंधकार के कारण उसे रस्सी का वह टुकड़ा सांप नजर आ रहा था। बाहर आकर शिष्य ने कहा, ‘गुरुवर, वहाँ सांप नहीं रस्सी का टुकड़ा है। अंधेरे में मैंने उसे सांप समझ लिया था।’ संत ने कहा, ‘वत्स, इसी को भ्रम कहते हैं। संसार गहन भ्रम जाल में जकड़ा हुआ है। ज्ञान के प्रकाश से ही इस भ्रम जाल को मिटाया जा सकता है लेकिन अज्ञानता के कारण हम बहुत सारे भ्रम जाल पाल लेते हैं और आंतरिक दीपक के अभाव में उसे दूर नहीं कर पाते। यह आंतरिक दीपक का प्रकाश संतों और ज्ञानियों के सत्संग से मिलता है। जब तक आंतरिक दीपक का प्रकाश प्रज्वलित नहीं होगा, हम भ्रम जाल से नही निकल पायेंगे|
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कपड़ों को खाना
एक बार की बात है किसी गाँव में एक पंडित रहता था । वैसे तो
पंडित जी को वेदों और शास्त्रों का बहुत ज्ञान था लेकिन, वह बहुत ग़रीब थे
। ना ही रहने के लिए अच्छा घर था और ना ही अच्छे भोजन के लिए पैसे। एक
छोटी सी झोपड़ी थी, उसी में रहते थे और
भिक्षा माँगकर जो मिल जाता उसी से अपना जीवन यापन करते थे। एक
बार वह पास के किसी गाँव में भिक्षा माँगने गये,| उस समय उनके कपड़े
बहुत गंदे थे और काफ़ी जगह से फट भी गये थे। जब उन्होने एक घर
का दरवाजा खटखटाया तो सामने से एक व्यक्ति बाहर आया, उसने जब पंडित को फटे चिथड़े कपड़ों
में देखा तो उसका मन घृणा से भर गया और उसने पंडित को
धक्के मारकर घर से निकाल दिया, बोला- पता नहीं कहाँ से गंदा पागल चला आया है । पंडित
दुखी मन से वापस चला आया, जब अपने घर वापस लौट रहा था तो किसी अमीर आदमी की नज़र पंडित
के फटे कपड़ों पर पड़ी तो उसने दया दिखाई और पंडित को पहनने के लिए नये कपड़े दे
दिए । अगले दिन पंडित फिर से उसी गाँव में उसी व्यक्ति के पास
भिक्षा माँगने गया । व्यक्ति ने नये कपड़ों में पंडित को देखा और हाथ जोड़कर पंडित
को अंदर बुलाया और बड़े आदर के साथ थाली में बहुत सारे व्यंजन खाने को दिए। पंडित जी ने एक भी
टुकड़ा अपने मुँह में नहीं डाला और सारा खाना धीरे धीरे अपने कपड़ों पर डालने लगे
और बोले- ले खा और खा। व्यक्ति ये सब बड़े आश्चर्य से देख रहा
था, आख़िर उसने पूछ ही
लिया कि- पंडित जी आप यह क्या कर रहे हैं सारा खाना अपने कपड़ों पर क्यूँ डाल रहे
हैं। पंडित जी ने बहुत शानदार उत्तर दिया- क्यूंकी तुमने ये खाना
मुझे नहीं बल्कि इन कपड़ों को दिया है इसीलिए मैं ये खाना इन कपड़ों को ही खिला रहा हूँ, कल जब में गंदे कपड़ों में तुम्हारे घर
आया तो तुमने धक्के मारकर घर से निकाल दिया और आज तुमने मुझे साफ और नये कपड़ों
में देखकर अच्छा खाना पेश किया। असल में तुमने ये खाना मुझे नहीं, इन कपड़ों को ही दिया है, वह व्यक्ति यह सुनकर बहुत दुखी हुआ ।
*****
बिहारी
जी की लीला
एक
राजा ने भगवान कृष्ण का एक मंदिर बनवाया और पूजा के लिए एक पुजारी को लगा दिया|
पुजारी जी बड़े भाव से बिहारी जी की सेवा करने लगे| भगवान की पूजा-अर्चना और सेवा-टहल
करते पुजारी की उम्र बीत गई| राजा रोज एक फूलों की माला सेवक के हाथ से भेजा करता
था| पुजारी जी वह माला बिहारी जी को पहना देते थे| जब राजा दर्शन करने आता तो पुजारी जी वह
माला बिहारी जी के गले से उतारकर राजा को पहना देते थे| यह रोज का
नियम था| एक दिन राजा किसी वजह से मंदिर नहीं जा सका|
उसने एक सेवक से कहा- माला लेकर मंदिर जाओ| पुजारी से कहना
आज मैं नहीं आ पाउंगा| सेवक ने जाकर माला पुजारी को दे दी और
बता दिया कि आज महाराज का इंतजार न करें| सेवक वापस आ
गया| पुजारी ने माला बिहारी जी को पहना दी| फिर उन्हें विचार आया कि आज तक मैं अपने बिहारी जी की चढ़ी माला राजा को ही पहनाता रहा| कभी ये सौभाग्य मुझे नहीं मिला| जीवन का कोई भरोसा नहीं कब रूठ जाए. आज मेरे प्रभु ने मुझ पर बड़ी कृपा की है राजा आज आएंगे नहीं, तो क्यों न माला
मैं पहन लूं| यह सोचकर पुजारी ने बिहारी जी के गले से माला
उतारकर स्वयं पहन ली| इतने में सेवक आया और उसने बताया कि राजा की सवारी बस मंदिर में पहुँचने ही वाली है| यह सुनकर
पुजारी जी कांप गए| उन्होंने सोचा अगर राजा ने माला मेरे गले में देख
ली तो मुझ पर क्रोधित होंगे| इस भय से उन्होंने अपने गले से
माला उतारकर बिहारी जी को फिर से पहना दी| जैसे ही राजा
दर्शन को आया तो पुजारी ने नियमआनुसार फिर से वह माला
उतार कर राजा के गले में पहना दी| माला पहना रहे थे तभी राजा को माला में एक सफ़ेद बाल दिखा| राजा को सारा माजरा समझ गया
कि पुजारी ने माला स्वयं पहन ली थी और फिर निकालकर
वापस डाल दी होगी| पुजारी ऐसा छल करता है, यह सोचकर राजा
को बहुत गुस्सा आया| उसने पुजारी जी से पूछा- पुजारी जी यह
सफ़ेद बाल किसका है? पुजारी को लगा कि अगर सच बोलता हूं
तो राजा दंड दे देंगे इसलिए जान छुड़ाने के लिए पुजारी ने कहा- महाराज यह सफ़ेद बाल तो बिहारी जी का है| अब तो राजा गुस्से
से आग- बबूला हो गया कि ये पुजारी झूठ पर झूठ बोले जा रहा
है| भला बिहारी जी के बाल भी कहीं सफ़ेद होते हैं| राजा ने कहा-
पुजारी जी अगर यह सफेद बाल बिहारी जी का है तो सुबह शृंगार के
समय मैं आउंगा और देखूंगा कि बिहारी जी के बाल सफ़ेद है या
काले| अगर बिहारी जी के बाल काले निकले तो आपको फांसी हो जाएगी| राजा हुक्म सुनाकर चला गया| अब पुजारी रोकर बिहारी जी से विनती करने लगे- प्रभु मैं जानता हूं, आपके सम्मुख मैंने झूठ बोलने का अपराध किया| अपने गले में डाली माला पुनः आपको पहना दी| आपकी सेवा करते-करते वृद्ध हो
गया| यह लालसा ही रही कि कभी आपको चढ़ी माला पहनने का
सौभाग्य मिले| इसी लोभ में यह सब अपराध हुआ| मेरे ठाकुर जी पहली बार यह लोभ हुआ और ऐसी विपत्ति आ पड़ी है| मेरे नाथ अब नहीं होगा ऐसा अपराध| अब आप ही बचाइए नहीं तो कल सुबह मुझे फाँसी पर चढा दिया जाएगा| पुजारी सारी रात रोते रहे| सुबह होते ही राजा मंदिर में आ गया| उसने कहा कि आज प्रभु का श्रृंगार वह स्वयं करेगा| इतना कहकर राजा ने जैसे ही मुकुट हटाया तो हैरान रह गया बिहारी जी के सारे बाल सफ़ेद थे| राजा को लगा, पुजारी ने जान बचाने के लिए बिहारी जी के बाल रंग दिए होंगे| गुस्से से तमतमाते हुए उसने बाल की जांच करनी चाही| बाल असली हैं या नकली सब समझने के लिए उसने जैसे ही बिहारी जी के बाल तोडे, बिहारी जी के सिर से खून की धार बहने लगी| राजा ने प्रभु के चरण पकड़ लिए और क्षमा
मांगने लगा| बिहारी जी की मूर्ति से आवाज आई- राजा तुमने आज तक मुझे केवल मूर्ति ही समझा इसलिए आज से मैं तुम्हारे लिए मूर्ति ही हूँ| पुजारी जी मुझे साक्षात भगवान् समझते हैं| उनकी श्रद्धा की लाज रखने के लिए आज मुझे अपने बाल सफेद करने पड़े व रक्त की धार भी बहानी पड़ी| तुझे समझाने के लिए| यह कहानी किसी पुराण से तो नहीं है लेकिन इसका मर्म किसी पुराण की कथा से कम भी नहीं है| कहते हैं- समझो तो देव नहीं तो पत्थर| श्रद्धा हो तो उन्हीं पत्थरों में भगवान सप्राण होकर भक्त से मिलने आ जाएंगे।
नियम था| एक दिन राजा किसी वजह से मंदिर नहीं जा सका|
उसने एक सेवक से कहा- माला लेकर मंदिर जाओ| पुजारी से कहना
आज मैं नहीं आ पाउंगा| सेवक ने जाकर माला पुजारी को दे दी और
बता दिया कि आज महाराज का इंतजार न करें| सेवक वापस आ
गया| पुजारी ने माला बिहारी जी को पहना दी| फिर उन्हें विचार आया कि आज तक मैं अपने बिहारी जी की चढ़ी माला राजा को ही पहनाता रहा| कभी ये सौभाग्य मुझे नहीं मिला| जीवन का कोई भरोसा नहीं कब रूठ जाए. आज मेरे प्रभु ने मुझ पर बड़ी कृपा की है राजा आज आएंगे नहीं, तो क्यों न माला
मैं पहन लूं| यह सोचकर पुजारी ने बिहारी जी के गले से माला
उतारकर स्वयं पहन ली| इतने में सेवक आया और उसने बताया कि राजा की सवारी बस मंदिर में पहुँचने ही वाली है| यह सुनकर
पुजारी जी कांप गए| उन्होंने सोचा अगर राजा ने माला मेरे गले में देख
ली तो मुझ पर क्रोधित होंगे| इस भय से उन्होंने अपने गले से
माला उतारकर बिहारी जी को फिर से पहना दी| जैसे ही राजा
दर्शन को आया तो पुजारी ने नियमआनुसार फिर से वह माला
उतार कर राजा के गले में पहना दी| माला पहना रहे थे तभी राजा को माला में एक सफ़ेद बाल दिखा| राजा को सारा माजरा समझ गया
कि पुजारी ने माला स्वयं पहन ली थी और फिर निकालकर
वापस डाल दी होगी| पुजारी ऐसा छल करता है, यह सोचकर राजा
को बहुत गुस्सा आया| उसने पुजारी जी से पूछा- पुजारी जी यह
सफ़ेद बाल किसका है? पुजारी को लगा कि अगर सच बोलता हूं
तो राजा दंड दे देंगे इसलिए जान छुड़ाने के लिए पुजारी ने कहा- महाराज यह सफ़ेद बाल तो बिहारी जी का है| अब तो राजा गुस्से
से आग- बबूला हो गया कि ये पुजारी झूठ पर झूठ बोले जा रहा
है| भला बिहारी जी के बाल भी कहीं सफ़ेद होते हैं| राजा ने कहा-
पुजारी जी अगर यह सफेद बाल बिहारी जी का है तो सुबह शृंगार के
समय मैं आउंगा और देखूंगा कि बिहारी जी के बाल सफ़ेद है या
काले| अगर बिहारी जी के बाल काले निकले तो आपको फांसी हो जाएगी| राजा हुक्म सुनाकर चला गया| अब पुजारी रोकर बिहारी जी से विनती करने लगे- प्रभु मैं जानता हूं, आपके सम्मुख मैंने झूठ बोलने का अपराध किया| अपने गले में डाली माला पुनः आपको पहना दी| आपकी सेवा करते-करते वृद्ध हो
गया| यह लालसा ही रही कि कभी आपको चढ़ी माला पहनने का
सौभाग्य मिले| इसी लोभ में यह सब अपराध हुआ| मेरे ठाकुर जी पहली बार यह लोभ हुआ और ऐसी विपत्ति आ पड़ी है| मेरे नाथ अब नहीं होगा ऐसा अपराध| अब आप ही बचाइए नहीं तो कल सुबह मुझे फाँसी पर चढा दिया जाएगा| पुजारी सारी रात रोते रहे| सुबह होते ही राजा मंदिर में आ गया| उसने कहा कि आज प्रभु का श्रृंगार वह स्वयं करेगा| इतना कहकर राजा ने जैसे ही मुकुट हटाया तो हैरान रह गया बिहारी जी के सारे बाल सफ़ेद थे| राजा को लगा, पुजारी ने जान बचाने के लिए बिहारी जी के बाल रंग दिए होंगे| गुस्से से तमतमाते हुए उसने बाल की जांच करनी चाही| बाल असली हैं या नकली सब समझने के लिए उसने जैसे ही बिहारी जी के बाल तोडे, बिहारी जी के सिर से खून की धार बहने लगी| राजा ने प्रभु के चरण पकड़ लिए और क्षमा
मांगने लगा| बिहारी जी की मूर्ति से आवाज आई- राजा तुमने आज तक मुझे केवल मूर्ति ही समझा इसलिए आज से मैं तुम्हारे लिए मूर्ति ही हूँ| पुजारी जी मुझे साक्षात भगवान् समझते हैं| उनकी श्रद्धा की लाज रखने के लिए आज मुझे अपने बाल सफेद करने पड़े व रक्त की धार भी बहानी पड़ी| तुझे समझाने के लिए| यह कहानी किसी पुराण से तो नहीं है लेकिन इसका मर्म किसी पुराण की कथा से कम भी नहीं है| कहते हैं- समझो तो देव नहीं तो पत्थर| श्रद्धा हो तो उन्हीं पत्थरों में भगवान सप्राण होकर भक्त से मिलने आ जाएंगे।
****
सत्य,
प्रेम, न्याय, त्याग
एक
राजा था| उसके राज्य में कभी भी उपद्रव नहीं होते थे| प्रजा
बहुत सुखी थी| उसके राज्य से सटा एक दूसरे राजा का छोटा-सा राज्य था, लेकिन
उसमें आए दिन लड़ाई-झगड़े होते रहते थे| लोग
आपस में लड़ते रहते थे|
उसकी प्रजा बहुत ही
दुखी थी, जिसकी वजह से राजा भी बहुत परेशान था| एक
दिन वह राजा दूसरे राजा के पास आकर बोला- "मेरा छोटा-सा राज्य है, पर
उसमें आए दिन उत्पात होते रहते हैं| आपका
राज्य इतना बड़ा है, फिर भी यहाँ पूर्ण शांति है, इसका
कारण क्या है? राजा हंसते हुए बोला- "आप ठीक कहते हैं| मेरे
राज्य में बड़ा चैन है|
उसका कारण यह है कि
मैंने अपने यहाँ चार चौकीदार तैनात कर रखे हैं, जो
हर घड़ी मेरी रक्षा करते रहते हैं| दूसरे
ने कहा- "बस चार,
मेरे यहाँ तो
चौकीदारों की फौज है,
पर इसका कोई फायदा
नहीं, फिर आपका काम चार चौकीदारों से कैसे चल जाता है?" राजा
बोला- "जी, मेरे रक्षक दूसरी तरह के हैं|" "कैसे?" दूसरे
राजा ने उत्सुकता से पूछा| राजा ने उत्तर दिया- "पहला रक्षक है सत्य| वह
मुझे असत्य नहीं बोलने देता|" "और
दूसरा?" राजा बोला- "दूसरा है प्रेम| वह
मुझे घृणा से बचाता है|" "तीसरा?" राजा बोला- "तीसरा है न्याय| वह
मुझे अन्याय नहीं करने देता|" "और
चौथा?" राजा ने गंभीर होकर कहा - "चौथा है त्याग| वह
स्वार्थी होने से मेरी रक्षा करता है|" राजा की शंका का समाधान हो गया| जिस
राजा के सत्य, प्रेम,
न्याय और त्याग, जैसे
चौकीदार होते हैं, उसे कोई परेशानी नहीं हो सकती|
****
नदी में हीरे
फैंकना
एक व्यक्ति रोज
जंगल में लकड़ी काटने जाया करता था| एक दिन उसे जंगल में काफी समय लग गया| अन्धेरा
होने के कारण उसके मन में विचार आया कि क्यों ना आज रात यही पास में नदी है, उसके
पास ही बिता लूँ| उजाला होते ही जंगल के रास्ते से वापिस घर लौट जाऊँगा| यह विचार
कर वह वही नदी के किनारे एक वृक्ष था वही पर लेट गया| सुबह 4 बजे के करीब उसकी आँख
खुली अभी उजाला नहीं हुआ था| वह इधर उधर करवट बदलने लगा तभी अचानक उसके हाथ में एक
थैला आ गया| उसने उस थैले में हाथ डाला तो उसको लगा कि थैले में पत्थर है| अब नींद
तो उसे आ नहीं रही थी, तब समय बिताने के लिए उसने पत्थर निकाल कर नदी में फैंकना
शुरू कर दिया| जब आखिरी पत्थर फैकने लगा तो उसने देखा कि वह पत्थर तो बड़ा ही
चमकदार था और बड़ा ही कीमती लग रहा था| वह उस पत्थर को लेकर अपने घर लौट गया| और
उसने वह पत्थर जाकर अपने मित्र को दिखाया| उस मित्र ने जब पत्थर देखा तो उसे भी वह
बड़ा ही कीमती पत्थर लगा| तब वह दोनों उसकी असली कीमत जानने के लिए जौहरी के पास
गए| जब जौहरी ने वह पत्थर देखा तो वह हैरान हो गया और कहने लगा कि यह पत्थर तुम्हे
कहा से मिला| यह तो बड़ा ही अनमोल पत्थर है,
इसकी तो बहुत कीमत है| तब यह सुनकर वह व्यक्ति रोने लगा कि और कहने लगा कि मुझे तो
इन्ही पत्थरों से भरी थैली मिली थी| मैंने अपने हाथों से सारे के सारे पत्थर पानी
में डाल दिए| मुझसे बड़ा बेवकूफ और कौन होगा? अर्थात इन्सान भी उस व्यक्ति की तरह
यही काम कर रहा है, अपने हाथ में आये अनमोल स्वासों की पूंजी को व्यर्थ कर नदी में
ही फैकता जा रहा है जब स्वांस ख़त्म हो जायेंगे तो पछताना पड़ेगा|
*****
मन की आवाज
एक बुढ़िया बड़ी सी गठरी लिए चली जा रही थी।
चलते-चलते वह थक गई थी तभी उसने देखा कि एक घुड़सवार चला आ रहा है। उसे देख
बुढ़िया ने आवाज दी, ‘अरे बेटा, एक
बात तो सुन।’ घुड़सवार रुक गया। उसने
पूछा, ‘क्या बात है माई?’ बुढ़िया
ने कहा, ‘बेटा, मुझे
उस सामने वाले गांव में जाना है। बहुत थक गई हूं। यह गठरी उठाई नहीं जाती। तू भी
शायद उधर ही जा रहा है। यह गठरी घोड़े पर रख ले। मुझे चलने में आसानी हो जाएगी।’ उस
व्यक्ति ने कहा, ‘माई तू पैदल है। मैं घोड़े पर हूं। गांव अभी
बहुत दूर है। पता नहीं तू कब तक वहाँ पहुँचेगी। मैं तो थोड़ी ही देर में पहुँच जाऊंगा। वहाँ पहुँचकर क्या तेरी प्रतीक्षा करता रहूंगा?’ यह
कहकर वह चल पड़ा। कुछ ही दूर जाने के बाद उसने अपने आप से कहा, ‘तू
भी कितना मूर्ख है। वह वृद्धा है, ठीक
से चल भी नहीं सकती। क्या पता उसे ठीक से दिखाई भी देता हो या नहीं। तुझे गठरी दे
रही थी। संभव है उस गठरी में कोई कीमती सामान हो। तू उसे लेकर भाग जाता तो कौन
पूछता। चल वापस, गठरी ले ले। वह
घूमकर वापस आ गया और बुढ़िया से बोला, ‘माई, ला
अपनी गठरी। मैं ले चलता हूं। गांव में रुककर तेरी राह देखूंगा।’ बुढ़िया
ने कहा, ‘न बेटा, अब
तू जा, मुझे गठरी नहीं देनी।’ घुड़सवार
ने कहा, ‘अभी तो तू कह रही थी कि ले चल। अब ले चलने
को तैयार हुआ तो गठरी दे नहीं रही। ऐसा क्यों? यह
उलटी बात तुझे किसने समझाई है?’ बुढ़िया
मुस्कराकर बोली, ‘उसी ने समझाई है जिसने तुझे यह समझाया कि
माई की गठरी ले ले। जो तेरे भीतर बैठा है वही मेरे भीतर भी बैठा है। तुझे उसने कहा
कि गठरी ले और भाग जा। मुझे उसने समझाया कि गठरी न दे, नहीं
तो वह भाग जाएगा। तूने भी अपने मन की आवाज सुनी और मैंने भी सुनी।
****
खुद
को बदलो
बहुत
समय पहले की बात है, एक राज्य में एक राजा राज करता था| एक दिन वो अपने राज्य की सैर
पर निकला| राज्य की सड़के अच्छी नहीं थी, और
राजा पहली बार इतने लम्बे सफर पर निकला था| वापस
आने पर उसके पैर में बहुत दर्द हो रहा था| उसने आदेश दिया की राज्य की सारी सड़को
पर चमड़ा चढ़ा दिया जाए| सभी दरवारियों ने विचार किया की इसमें तो बहुत सारा पैसा
बर्बाद होगा और बहुत से जानवर मारे जाएंगे, पर
किसी को राजा से बात करने की हिम्मत नही हुई| एक दरवारी ने हिम्मत करके राजा को
कहा कि 'राजन इतना पैसा बर्बाद करने से तो अच्छा है की आप एक चमड़े के
टुकड़े से अपने पैरो को ढँक ले| ' राजा
ने इस सलाह को मान कर अपने लिए एक जूता बनवा लिया| दरवारी को उसकी बुद्धिमत्ता के
लिए पुरस्कार दिया गया| सीख - अगर आप दुनिया को बेहतर बनाना चाहते है तो दुनिया को
नहीं खुद को बदले| दुनिया को बदल पाना जितना कठिन है, अपने
को बदलना उतना ही आसान|
****
चार तरह के व्यक्ति
एक बार एक राजन ने अपने मंत्री से एक सवाल किया, 'मुझे
चार प्रश्नों के जवाब लाकर दो।
पहला सवाल - जो यहाँ हो पर वहाँ नहीं,
दूसरा सवाल - जो वहाँ हो पर यहाँ नहीं,
तीसरा सवाल- जो यहाँ भी नहीं हो और वहाँ भी नहीं हो,
और चौथा सवाल- जो यहाँ भी हो और वहाँ भी हो।'
मंत्री ने कहा 'राजन! मुझे आप दो दिन का समय दें। मैं आपके सारे प्रश्नो का उत्तर दे दूंगा।'
दो दिनों के बाद मंत्री चार व्यक्तियों को लेकर राज दरबार में हाजिर हुआ और बोला, 'राजन! हमारे धर्मग्रंथों में अच्छे-बुरे कर्मों और उनके फलों के आधार पर स्वर्ग और नरक की अवधारणा प्रस्तुत की गई है।
यह पहला व्यक्ति भ्रष्टाचारी है, यह गलत कार्य करके यहाँ तो सुखी और संपन्न दिखाई देता है, पर इसकी जगह वहाँ यानी स्वर्ग में नहीं होगी।
दूसरा व्यक्ति सद्गृहस्थ है, यह यहाँ ईमानदारी से रहते हुए कष्ट जरूर भोग रहा है, पर इसकी जगह वहाँ यानी स्वर्ग में जरूर होगी।
तीसरा व्यक्ति भिखारी है, यह पराश्रित है इसलिये यह न तो यहाँ सुखी है और न वहाँ सुखी रहेगा।
यह चौथा व्यक्ति एक दानवीर सेठ है, जो अपने धन का सदुपयोग करते हुए दूसरों की भलाई भी कर रहा है और सुखी संपन्न है। अपने उदार व्यवहार के कारण यह यहाँ भी सुखी है और अच्छे कर्म करन से इसका स्थान वहाँ भी सुरक्षित है।'
पहला सवाल - जो यहाँ हो पर वहाँ नहीं,
दूसरा सवाल - जो वहाँ हो पर यहाँ नहीं,
तीसरा सवाल- जो यहाँ भी नहीं हो और वहाँ भी नहीं हो,
और चौथा सवाल- जो यहाँ भी हो और वहाँ भी हो।'
मंत्री ने कहा 'राजन! मुझे आप दो दिन का समय दें। मैं आपके सारे प्रश्नो का उत्तर दे दूंगा।'
दो दिनों के बाद मंत्री चार व्यक्तियों को लेकर राज दरबार में हाजिर हुआ और बोला, 'राजन! हमारे धर्मग्रंथों में अच्छे-बुरे कर्मों और उनके फलों के आधार पर स्वर्ग और नरक की अवधारणा प्रस्तुत की गई है।
यह पहला व्यक्ति भ्रष्टाचारी है, यह गलत कार्य करके यहाँ तो सुखी और संपन्न दिखाई देता है, पर इसकी जगह वहाँ यानी स्वर्ग में नहीं होगी।
दूसरा व्यक्ति सद्गृहस्थ है, यह यहाँ ईमानदारी से रहते हुए कष्ट जरूर भोग रहा है, पर इसकी जगह वहाँ यानी स्वर्ग में जरूर होगी।
तीसरा व्यक्ति भिखारी है, यह पराश्रित है इसलिये यह न तो यहाँ सुखी है और न वहाँ सुखी रहेगा।
यह चौथा व्यक्ति एक दानवीर सेठ है, जो अपने धन का सदुपयोग करते हुए दूसरों की भलाई भी कर रहा है और सुखी संपन्न है। अपने उदार व्यवहार के कारण यह यहाँ भी सुखी है और अच्छे कर्म करन से इसका स्थान वहाँ भी सुरक्षित है।'
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असली हीरा
एक बार एक वृद्ध व्यक्ति ने मरने से पहले अपने पुत्र को 2
हीरे दिए और कहा कि इनमे से एक हीरा असली और एक हीरा कांच का है| मैं आज तक इस बात
का पता नहीं लगा पाया की कौन सा हीरा असली कौन सा नकली और ना ही कोई ओर बता सका|
वह दोनों हीरे देखने में एक जैसे लगते थे| अब वह वृद्ध व्यक्ति मरने से पहले अपने
लड़के को वह दोनों हीरे दे गया| अब उसका लड़का असली हीरे की पहचान करवाने के लिए
राजा के पास गया| उसने राजा से कहा कि मेरे पास दो हीरे है अगर आपके राज्य में कोई
असली हीरे का बता देगा तो मैं यह हीरा आप को दे दूंगा अगर नहीं बता पाया तो आपको
मुझे इसकी किम्मत देनी पड़ेगी| राजा ने
अपने दरबार के बड़े जौहरियों को बुलाया लेकिन उनमे से कोई भी असली हीरे की पहचान ना
कर पाए| तब राजा को उसके हीरे की कीमत देनी पड़ी| इस तरह वह अनेको राज्य में गया और
वहाँ भी यही शर्त रखता लेकिन हर जगह से उसे हीरे की कीमत मिल जाती कोई हीरे की
पहचान ना कर पाता| इस तरह वह काफी धनवान हो गया| एक दिन वह अपना धन लेकर जंगल के
रास्ते से जा रहा था| उस समय जाड़े का समय था| एक राजा का दरबार रास्ते में खुले
में लगा था ताकि धुप ली जा सके| तब वह व्यक्ति वहाँ रजा के पास भी गया और वही शर्त
रखी| लेकिन कोई हीरे को ना पहचान पाया| तभी एक अँधा व्यक्ति आया तो उसने कहा कि
मैं बताता हूँ कि असली हीरा कौन सा है और कांच कौन सा है| उसने जैसे ही दोनों हीरे
को हाथ लगाया तो पहचान गया कि असली और नकली कौन सा और सही जवाब दिया| तब सबने पूछा
कि तुम्हे कैसे पता चला| तब उसने कहा कि देखो धूप के समय में कांच गर्म हो जाता है
और हीरा ठंडा रहता है| इसी तरह से जो हीरा ठंडा है वो असली हीरा है और जो धूप से
गर्म हो गया वह नकली है| शिक्षा हमे यही मिलती है की हीरा वही जो हर परिस्थिति में
ठंडा रहे कभी क्रोध ना करे|
****
बेचारे
का क्या हाल होगा
एक
राजा था, उसका नाम था श्रेणिक| उसकी
चेतना नाम की एक रानी थी,
एक बार वे दोनों
भगवान महावीर के दर्शन करके लौट रहे थे तो रानी ने देखा, भंयकर
शीत में एक मुनि तप में लीन हैं| उनकी
कठोर साधना के लिए उसने मन-ही-मन उन्हें बारम्बार प्रणाम किया| महल
में लौटकर रानी सो गई|
संयोग से रानी का हाथ
बिस्तर से नीचे लटक गया और सर्दी से अकड़ गया| रानी
की आंखें खुलीं तो उसकी बाह में बड़ा दर्द हो रहा था| चूंकि
सर्दी के कारण ऐसा हुआ था,
इसलिए आग से उसका
सेंक किया गया| जब सेंक किया जा रहा था, तभी
रानी को अचानक उस तपस्वी का ध्यान हो आया, जो
जंगल में अविचल भाव से बैठा तपस्या कर रहा था| रानी
के मुंह से अनायास निकला- "हाय! उस बेचारे का क्या हाल होगा?" रानी
के मुंह से ये शब्द निकलने थे कि राजा के मन में एकदम संदेह पैदा हो गया| उन्होंने
सोचा, हो-न-हो रानी का लगाव और किसी से है| उन्होंने
क्रोध से पागल होकर मंत्री को आदेश दिया कि अंत:पुर (रानियों का निवास स्थल) को
जला दो| इसके बाद राजा भगवान महावीर के पास गए और उन्हें अपनी व्यथा कह
सुनाई| महावीर ने कहा- "चेतना पतिव्रता है, पवित्र
है|" अब तो श्रेणिक का बुरा हाल हो गया| वह
तत्काल लौटा और मंत्री को बुलाकर पूछा - "क्या उसने अंत:पुर को जला दिया?" मंत्री
ने कहा - "जी हां,
आपकी आज्ञा का तत्काल
पालन करना आवश्यक था|"
राजा बड़ा दुखी हुआ| उसका
सारा क्रोध शांत हो गया|
तब मंत्री ने कहा -
"राजन आप दुखी न हों मैं जानता था कि आपने जो आदेश दिया है वह क्रोध में दिया
है, इसलिए मैंने हस्तिशाला को जला दिया, अंत:पुर
सुरक्षित है|" राजा बहुत आनंदित हुआ| उस
दिन से उसने क्रोध में कभी कोई निर्णय
नहीं लिया|
*****
भगवान
पर विश्वास
एक
बार एक गांव में सूखा पड़ा। सारे तालाब और कुएं सूख गए। तब लोगों ने एक सभा की। उस
सभा में सभी ने एक स्वर में तय किया कि गांव के बाहर जो शिवजी का मंदिर है, वहाँ
चलकर भगवान से वर्षा करने के लिए सामूहिक प्रार्थना करें। अगले दिन सुबह होते ही
गांव के सभी लोग शिवालय की ओर चल दिए। बच्चे, बूढ़े, स्त्री, पुरुष
सभी जोश से भरे हुए जा रहे थे। इन सभी में एक बालक ऐसा था, जो
हाथ में छाता लेकर चल रहा था। सभी उसे देखकर उसका उपहास उड़ाने लगे। पंडितजी
ने कहा- अरे बावले! यह छाता क्यों उठा लाया? एक
ग्रामीण ने विनोद किया। एक बुजुर्ग ने भी उससे पूछा- बेटा अभी न धूप है न बारिश।
फिर ये छाता क्यों उठा लाया? बालक
ने उत्तर दिया- बाबा अभी तो कुछ नहीं है, किंतु
हम सभी भगवान के पास प्रार्थना करने जा रहे हैं कि वर्षा कर देना। भगवान हमारी
प्रार्थना सुनकर वर्षा तो करेगा ही न, तो
जब हम गांव वापस लौटेंगे और वर्षा होगी, तब
इसकी जरूरत पड़ेगी। बालक की बात सुनकर सभी हंस पड़े, किंतु
बुजुर्ग ने गंभीर होकर कहा- बात तो तूने बहुत ही पते की कही है| भगवान
पर तेरा अटूट विश्वास है। यदि वर्षा हुई भी तो तेरी प्रार्थना सुनकर ही होगी। गांव
के सभी लोगों ने मंदिर में पहुँचकर प्रार्थना की और लौट पड़े किंतु आधे रास्ते में
ही वर्षा जोरों से शुरू हो गई। बालक ने अपना छाता तान लिया और बाकी सभी भीगते हुए
घर लौटे। भोजन-भोजन कहने और भोजन करने में बहुत अंतर है। केवल ईश्वर-ईश्वर
चिल्लाने से ईश्वर की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसके लिए हमें अनुभव, आभास
और अभ्यास करना चाहिए तथा आस्था को दृढ़ बनाना चाहिए।
*****
भजन
की आवाज
काशी
में एक कर्मकांडी पंडित का आश्रम था, जिसके
सामने एक जूते गांठने वाला बैठता था। वह जूतों की मरम्मत करते समय कोई न कोई भजन
जरूर गाता था। लेकिन पंडित जी का ध्यान कभी उसके भजन की तरफ नहीं गया था। एक बार
पंडित जी बीमार पड़ गए और उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया।
उस समय उन्हें वे भजन सुनाई पड़े। उनका मन रोग की तरफ से हट कर भजनों की तरफ चला गया। धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि जूते गांठने वाले के भजन सुनते-सुनते उनका दर्द कम हो रहा है। एक दिन एक शिष्य को भेज कर उन्होंने उसे बुलाया और कहा, ‘भाई तुम तो बहुत अच्छा गाते हो। मेरा रोग बड़े-बड़े वैद्यों के इलाज से ठीक नहीं हो रहा था लेकिन तुम्हारे भजन सुन कर मैं ठीक होने लगा हूं।’ फिर उन्होंने उसे सौ रुपये देते हुए कहा, ‘तुम इसी तरह गाते रहना।’ रुपये पाकर जूते गांठने वाला बहुत खुश हुआ। लेकिन पैसा पाने के बाद से उसका मन कामकाज से हटने लगा। वह भजन गाना भूल गया। दिन-रात यही सोचने लगा कि रुपये को कहां संभालकर रखे। काम में लापरवाही के कारण उसके ग्राहक भी उस पर गुस्सा करने लगे। धीरे-धीरे उसकी दुकानदारी चौपट होने लगी। उधर भजन बंद होने से पंडित जी का ध्यान फिर रोग की तरफ जाने लगा। उनकी हालत फिर बिगड़ने लगी। एक दिन अचानक जूते गांठने वाला पंडित जी के पास पहुँचकर बोला, ‘आप अपना पैसा रख लीजिए।’ पंडित जी ने पूछा, ‘क्यों, क्या किसी ने कुछ कहा तुमसे?’ जूते गांठने वाला बोला, ‘कहा तो नहीं, लेकिन इस पैसे को अपने पास रखूंगा तो आप की तरह मैं भी बिस्तर पकड़ लूंगा। इसी रुपये ने मेरा जीना हराम कर दिया। मेरा गाना भी छूट गया। काम में मन नहीं लगता, इसलिए कामकाज ठप हो गया। मैं समझ गया कि अपनी मेहनत की कमाई में जो सुख है, वह पराये धन में नहीं है। आपके धन ने तो परमात्मा से भी नाता तुड़वा दिया।’
उस समय उन्हें वे भजन सुनाई पड़े। उनका मन रोग की तरफ से हट कर भजनों की तरफ चला गया। धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि जूते गांठने वाले के भजन सुनते-सुनते उनका दर्द कम हो रहा है। एक दिन एक शिष्य को भेज कर उन्होंने उसे बुलाया और कहा, ‘भाई तुम तो बहुत अच्छा गाते हो। मेरा रोग बड़े-बड़े वैद्यों के इलाज से ठीक नहीं हो रहा था लेकिन तुम्हारे भजन सुन कर मैं ठीक होने लगा हूं।’ फिर उन्होंने उसे सौ रुपये देते हुए कहा, ‘तुम इसी तरह गाते रहना।’ रुपये पाकर जूते गांठने वाला बहुत खुश हुआ। लेकिन पैसा पाने के बाद से उसका मन कामकाज से हटने लगा। वह भजन गाना भूल गया। दिन-रात यही सोचने लगा कि रुपये को कहां संभालकर रखे। काम में लापरवाही के कारण उसके ग्राहक भी उस पर गुस्सा करने लगे। धीरे-धीरे उसकी दुकानदारी चौपट होने लगी। उधर भजन बंद होने से पंडित जी का ध्यान फिर रोग की तरफ जाने लगा। उनकी हालत फिर बिगड़ने लगी। एक दिन अचानक जूते गांठने वाला पंडित जी के पास पहुँचकर बोला, ‘आप अपना पैसा रख लीजिए।’ पंडित जी ने पूछा, ‘क्यों, क्या किसी ने कुछ कहा तुमसे?’ जूते गांठने वाला बोला, ‘कहा तो नहीं, लेकिन इस पैसे को अपने पास रखूंगा तो आप की तरह मैं भी बिस्तर पकड़ लूंगा। इसी रुपये ने मेरा जीना हराम कर दिया। मेरा गाना भी छूट गया। काम में मन नहीं लगता, इसलिए कामकाज ठप हो गया। मैं समझ गया कि अपनी मेहनत की कमाई में जो सुख है, वह पराये धन में नहीं है। आपके धन ने तो परमात्मा से भी नाता तुड़वा दिया।’
*****
शिष्य
की गुरु दक्षिणा
पुराने
जमाने की बात है। एक गुरुकुल के आचार्य अपने शिष्य की सेवा भावना से बहुत प्रभावित
हुए। विद्या पूरी होने के बाद शिष्य को विदा करते समय उन्होंने आशीर्वाद के रूप
में उसे एक ऐसा दिव्य दर्पण भेंट किया, जिसमें
व्यक्ति के मन के भाव को दर्शाने की क्षमता थी। शिष्य
उस दिव्य दर्पण को पाकर प्रसन्न हो उठा। उसने परीक्षा लेने की जल्दबाजी में दर्पण
का मुंह सबसे पहले गुरुजी के सामने कर दिया। वह यह देखकर आश्चर्यचकित हो गया कि
गुरुजी के हृदय में मोह,
अहंकार, क्रोध
आदि दुर्गुण परिलक्षित हो रहे थे। इससे उसे बड़ा दुख हुआ। वह तो अपने गुरुजी को
समस्त दुर्गुणों से रहित सत्पुरुष समझता था। दर्पण
लेकर वह गुरुकूल से रवाना हो गया। उसने अपने कई मित्रों तथा अन्य परिचितों के
सामने दर्पण रखकर परीक्षा ली। सब के हृदय में कोई न कोई दुर्गुण अवश्य दिखाई दिया।
और तो और अपने माता व पिता की भी वह दर्पण से परीक्षा करने से नहीं चूका। उनके
हृदय में भी कोई न कोई दुर्गुण देखा, तो
वह हतप्रभ हो उठा। एक दिन वह दर्पण लेकर फिर गुरुकुल पहुंचा। उसने गुरुजी से
विनम्रतापूर्वक कहा, ‘गुरुदेव, मैंने
आपके दिए दर्पण की मदद से देखा कि सबके दिलों में नाना प्रकार के दोष हैं।’ तब
गुरु जी ने दर्पण का रुख शिष्य की ओर कर दिया।शिष्य दंग रह गया. क्योंकि उसके मन
के प्रत्येक कोने में राग,द्वेष,
अहंकार, क्रोध
जैसे दुर्गुण विद्यमान थे। गुरुजी बोले, ‘वत्स
यह दर्पण मैंने तुम्हें अपने दुर्गुण देखकर जीवन में सुधार लाने के लिए दिया था
दूसरों के दुर्गुण देखने के लिए नहीं। जितना समय तुमने दूसरों के दुर्गुण देखने
में लगाया उतना समय यदि तुमने स्वयं को सुधारने में लगाया होता तो अब तक तुम्हारा
व्यक्तित्व बदल चुका होता। मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वह दूसरों के
दुर्गुण जानने में ज्यादा रुचि रखता है। वह स्वयं को सुधारने के बारे में नहीं
सोचता। इस दर्पण की यही सीख है जो तुम नहीं समझ सके।’
*****
छोटी
सी वस्तु का महत्व
एक
बार एक शिष्य ने विनम्रतापूर्वक अपने गुरु जी से पूछा-‘गुरु
जी,कुछ लोग कहते हैं कि जीवन
एक संघर्ष है, कुछ अन्य कहते हैं कि जीवन एक खेल है और कुछ जीवन को एक उत्सव
की संज्ञा देते हैं |
इनमें कौन सही है?’गुरु
जी ने तत्काल बड़े ही धैर्यपूर्वक उत्तर दिया-‘पुत्र,जिन्हें
गुरु नहीं मिला उनके लिए जीवन एक संघर्ष है; जिन्हें
गुरु मिल गया उनका जीवन एक खेल है और जो लोग गुरु द्वारा बताये गए मार्ग पर चलने
लगते हैं,मात्र वे ही जीवन को एक उत्सव का नाम देने का साहस जुटा पाते
हैं|’ यह उत्तर सुनने के बाद भी शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट न था| गुरु
जी को इसका आभास हो गया |वे कहने लगे-‘लो,तुम्हें
इसी सन्दर्भ में एक कहानी सुनाता हूँ| ध्यान
से सुनोगे तो स्वयं ही अपने प्रश्न का उत्तर पा सकोगे|’ उन्होंने
जो कहानी सुनाई,वह इस प्रकार थी-एक बार की बात है कि किसी गुरुकुल में तीन
शिष्यों नें अपना अध्ययन सम्पूर्ण करने पर अपने गुरु जी से यह बताने के लिए विनती
की कि उन्हें गुरुदाक्षिणा में, उनसे
क्या चाहिए| गुरु जी पहले तो मंद-मंद मुस्कराये और फिर बड़े स्नेहपूर्वक
कहने लगे-‘मुझे तुमसे गुरुदक्षिणा में एक थैला भर के सूखी पत्तियां चाहिए,ला
सकोगे?’ वे तीनों मन ही मन बहुत प्रसन्न हुए क्योंकि उन्हें लगा कि वे
बड़ी आसानी से अपने गुरु जी की इच्छा पूरी कर सकेंगे |सूखी
पत्तियाँ तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती हैं| वे
उत्साहपूर्वक एक ही स्वर में बोले-‘जी
गुरु जी, जैसी आपकी आज्ञा |’ अब
वे तीनों शिष्य चलते-चलते एक समीपस्थ जंगल में पहुँच चुके थे |लेकिन
यह देखकर कि वहाँ पर तो सूखी पत्तियाँ केवल एक मुट्ठी भर ही थीं ,उनके
आश्चर्य का ठिकाना न रहा |
वे सोच में पड़ गये
कि आखिर जंगल से कौन सूखी पत्तियां उठा कर ले गया होगा? इतने
में ही उन्हें दूर से आता हुआ कोई किसान दिखाई दिया |वे
उसके पास पहुँच कर, उससे विनम्रतापूर्वक याचना करने लगे कि वह उन्हें केवल एक थैला
भर सूखी पत्तियां दे दे|
अब उस किसान ने उनसे
क्षमायाचना करते हुए,
उन्हें यह बताया कि
वह उनकी मदद नहीं कर सकता क्योंकि उसने सूखी पत्तियों का ईंधन के रूप में पहले ही
उपयोग कर लिया था| अब,
वे तीनों, पास
में ही बसे एक गाँव की ओर इस आशा से बढ़ने लगे थे कि हो सकता है वहाँ उस गाँव में
उनकी कोई सहायता कर सके |वहाँ पहुँच कर उन्होंने जब एक व्यापारी को देखा तो बड़ी उम्मीद
से उससे एक थैला भर सूखी पत्तियां देने के लिए प्रार्थना करने लगे लेकिन उन्हें
फिर से एकबार निराशा ही हाथ आई क्योंकि उस व्यापारी ने तो, पहले
ही, कुछ पैसे कमाने के लिए सूखी पत्तियों के दोने बनाकर बेच दिए थे
लेकिन उस व्यापारी ने उदारता दिखाते हुए उन्हें एक बूढी माँ का पता बताया जो सूखी
पत्तियां एकत्रित किया करती थी|पर
भाग्य ने यहाँ पर भी उनका साथ नहीं दिया
क्योंकि वह बूढी माँ तो उन पत्तियों को अलग-अलग करके कई प्रकार की ओषधियाँ बनाया
करती थी |अब निराश होकर वे तीनों खाली हाथ ही गुरुकुल लौट गये| गुरु
जी ने उन्हें देखते ही स्नेहपूर्वक पूछा- ‘पुत्रो, ले
आये गुरुदक्षिणा?’ तीनों ने सर झुका लिया |गुरू
जी द्वारा दोबारा पूछे जाने पर उनमें से एक शिष्य कहने लगा- ‘गुरुदेव,हम
आपकी इच्छा पूरी नहीं कर पाये| हमने
सोचा था कि सूखी पत्तियां तो जंगल में सर्वत्र बिखरी ही रहती होंगी लेकिन बड़े ही
आश्चर्य की बात है कि लोग उनका भी कितनी तरह से उपयोग करते हैं|’ गुरु
जी फिर पहले ही की तरह मुस्कराते हुए प्रेमपूर्वक बोले-‘निराश
क्यों होते हो? प्रसन्न हो जाओ और यही ज्ञान कि सूखी पत्तियां भी व्यर्थ नहीं
हुआ करतीं बल्कि उनके भी अनेक उपयोग हुआ करते हैं; मुझे
गुरुदक्षिणा के रूप में दे दो|’ तीनों
शिष्य गुरु जी को प्रणाम करके खुशी-खुशी अपने-अपने घर की ओर चले गये| वह
शिष्य जो गुरु जी की कहानी एकाग्रचित्त हो कर सुन रहा था, अचानक
बड़े उत्साह से बोला-‘गुरु जी,अब
मुझे अच्छी तरह से ज्ञात हो गया है कि आप क्या कहना चाहते हैं |आप
का संकेत,
वस्तुतः इसी ओर है न
कि जब सर्वत्र सुलभ सूखी पत्तियां भी निरर्थक या बेकार नहीं होती हैं तो फिर हम
कैसे, किसी भी वस्तु या व्यक्ति को छोटा और महत्त्वहीन मान कर उसका
तिरस्कार कर सकते हैं? चींटी से लेकर हाथी तक और सुई से लेकर तलवार तक-सभी का
अपना-अपना महत्त्व होता है |’गुरु
जी भी तुरंत ही बोले- ‘हाँ,
पुत्र, मेरे
कहने का भी यही तात्पर्य है कि हम जब भी किसी से मिलें तो उसे यथायोग्य मान देने
का भरसक प्रयास करें ताकि आपस में स्नेह, सद्भावना, सहानुभूति
एवं सहिष्णुता का विस्तार होता रहे और हमारा जीवन संघर्ष के बजाय उत्सव बन सके| दूसरे,यदि
जीवन को एक खेल ही माना जाए तो बेहतर यही होगा कि हम निर्विक्षेप, स्वस्थ
एवं शांत प्रतियोगिता में ही भाग लें और अपने निष्पादन तथा निर्माण को ऊंचाई के
शिखर पर ले जाने का अथक प्रयास करें|’ अब
शिष्य पूरी तरह से संतुष्ट था | अंततः,मैं
यही कहना चाहता हूँ कि यदि हम मन, वचन
और कर्म- इन तीनों ही स्तरों पर इस कहानी का मूल्यांकन करें, तो
भी यह कहानी खरी ही उतरेगी| सब
के प्रति पूर्वाग्रह से मुक्त मन वाला व्यक्ति अपने वचनों से कभी भी किसी को आहत
करने का दुःसाहस नहीं करता और उसकी यही ऊर्जा उसके पुरुषार्थ के मार्ग की समस्त
बाधाओं को हर लेती है|
वस्तुतः,हमारे
जीवन का सबसे बड़ा ‘उत्सव’
पुरुषार्थ ही होता
है-ऐसा विद्वानों का मत है |
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