कुरु वंश का निमार्ण
कुरुवंश के प्रथम पुरुष का नाम कुरु था| कुरु बड़े प्रतापी और बड़े तेजस्वी थे| उन्हीं के नाम पर कुरुवंश की शाखाएं
निकलीं और विकसित हुईं| एक से एक प्रतापी और तेजस्वी वीर कुरुवंश में पैदा हो चुके
हैं| पांडवों और कौरवों
ने भी कुरुवंश में ही जन्म धारण किया था|
महाभारत का युद्ध भी कुरुवंशियों में
ही हुआ था| किंतु कुरु कौन थे
और उनका जन्म किसके द्वारा और कैसे हुआ था –
वेदव्यास जी ने इस पर महाभारत में
प्रकाश डाला है| हम यहाँ संक्षेप में उस
कथा को सामने रख रहे हैं| कथा बड़ी रोचक और प्रेरणादायिनी है| अति प्राचीन काल में हस्तिनापुर में एक प्रतापी राजा राज्य
करता था| उस राजा का नाम
सवरण था| वह सूर्य के समान
तेजवान था और प्रजा का बड़ा पालक था| स्वयं कष्ट उठा लेता था,
पर प्राण देकर भी प्रजा के कष्टों को
दूर करता था| सवरण सूर्यदेव का अनन्य भक्त था| वह प्रतिदिन बड़ी ही श्रद्धा के साथ
सूर्यदेव की उपासना किया करता था| जब तक सूर्यदेव की उपासना नहीं कर लेता था, जल का एक घूंट भी कंठ के नीचे नहीं
उतारता था| एक दिन सवरण एक पर्वत पर आखेट के लिए
गया| जब वह हाथ में
धनुष-बाण लेकर पर्वत के ऊपर आखेट के लिए भ्रमण कर रहा था, तो उसे एक अतीव सुंदर युवती दिखाई पड़ी| वह युवती सुंदरता के सांचे में ढली हुई
थी| उसके प्रत्येक अंग
को विधाता ने बड़ी ही रुचि के साथ संवार-संवार कर बनाया था| सवरण ने आज तक ऐसी स्त्री देखने की कौन
कहे, कल्पना तक नहीं की
थी| सवरण स्त्री पर आसक्त हो गया, सब कुछ भूलकर अपने आपको उस पर निछावर कर
दिया| वह उसके पास जाकर, तृषित नेत्रों से उसकी ओर देखता हुआ
बोला, “तन्वंगी, तुम कौन हो? तुम देवी हो, गंधर्व हो या किन्नरी हो? तुम्हें देखकर मेरा चित चंचल हो उठा| तुम मेरे साथ गंधर्व विवाह करके सुखोंपभोग करो|” पर युवती ने सवरण की बातों का कुछ भी उत्तर नहीं दिया| वह कुछ क्षणों तक सवरण की ओर देखती रही, फिर अदृश्य हो गई| युवती के अदृश्य हो जाने पर सवरण
अत्यधिक आकुल हो गया| वह धनुष-बाण फेंककर उन्मतों की भांति विलाप करने लगा, “सुंदरी ! तुम कहां चली गईं? जिस प्रकार सूर्य के बिना कमल मुरझा
जाता है और जिस प्रकार पानी के बिना पौधा सूख जाता है, उसी प्रकार तुम्हारे बिना मैं जीवित
नहीं रह सकता| तुम्हारे सौंदर्य
ने मेरे मन को चुरा लिया है| तुम प्रकट होकर मुझे बताओ कि तुम कौन हो और मैं तुम्हें किस
प्रकार पा सकता हूं?” युवती पुन: प्रकट हुई| वह सवरण की ओर देखती हुई बोली, “राजन ! मैं स्वयं आप पर मुग्ध हूं, पर मैं अपने पिता की आज्ञा के वश में
हूं| मैं सूर्यदेव की
छोटी पुत्री हूं| मेरा नाम तप्ती है| जब तक मेरे पिता आज्ञा नहीं देंगे, मैं आपके साथ विवाह नहीं कर सकती| यदि आपको मुझे पाना है तो मेरे पिता को
प्रसन्न कीजिए|” युवती
अपने कथन को समाप्त करती हुई पुन: अदृश्य हो गई| सवरण पुन: उन्मत्तों की भांति विलाप
करने लगा| वह आकुलित होकर
पृथ्वी पर गिर पड़ा और तप्ती-तप्ती की पुकार से पर्वत को ध्वनित करने लगा| सवरण तप्ती को पुकारते-पुकारते धरती पर
गिर पड़ा और बेहोश हो गया| जब उसे होश आया, तो पुन: तप्ती याद आई,
और याद आया उसका कथन – यदि मुझे पाना चाहते हैं, तो मेरे पिता सूर्यदेव को प्रसन्न
कीजिए| उनकी आज्ञा के बिना
मैं आपसे विवाह नहीं कर सकती| सवरण की रगों में
विद्युत की तरंग-सी दौड़ उठी| वह मन ही मन सोचता रहा,
वह तप्ती को पाने के लिए सूर्यदेव की
आराधना करेगा| उन्हें प्रसन्न
करने में सबकुछ भूल जाएगा| सवरण सूर्यदेव की आराधना करने लगा| धीरे-धीरे सालों बीत गए, सवरण तप करता रहा| आखिर सूर्यदेव के मन में सवरण की
परीक्षा लेने का विचार उत्पन्न हुआ| रात का समय था| चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था| सवरण आंखें बंद किए हुए ध्यानमग्न बैठा
था| सहसा उसके कानों
में किसी की आवाज पड़ी, “सवरण, तू यहाँ तप में संलग्न है| तेरी राजधानी आग में जल रही है|” सवरण फिर भी चुपचाप अपनी जगह पर बैठा रहा| उसके मन में रंचमात्र भी दुख पैदा नहीं
हुआ| उसके कानों में
पुन: दूसरी आवाज पड़ी, “सवरण, तेरे कुटुंब के सभी लोग आग में जलकर मर गए|” किंतु फिर भी वह हिमालय-सा दृढ़ होकर
अपनी जगह पर बैठा रहा, उसके कानों में पुन: तीसरी बार कंठ-स्वर पड़ा, ” सवरण, तेरी प्रजा अकाल की आग में जलकर भस्म
हो रही है| तेरे नाम को सुनकर
लोग थू-थू कर रहे हैं|” फिर भी वह दृढ़तापूर्वक तप में लगा रहा| उसकी दृढ़ता पर सूर्यदेव प्रसन्न हो
उठे और उन्होंने प्रकट होकर कहा, “सवरण, मैं तुम्हारी दृढ़ता पर मुग्ध हूं| बोलो, तुम्हें क्या चाहिए?” सवरण सूर्यदेव को प्रणाम करता हुआ बोला, “देव ! मुझे आपकी पुत्री तप्ती को
छोड़कर और कुछ नहीं चाहिए| कृपा करके मुझे तप्ती को देकर मेरे जीवन को कृतार्थ कीजिए|” सूर्यदेव ने प्रसन्नता की मुद्रा में उत्तर दिया, “सवरण, मैं सब कुछ जानता हूं| तप्ती भी तुमसे प्रेम करती है| तप्ती तुम्हारी है|” सूर्यदेव ने अपनी पुत्री तप्ती का सवरण के साथ विधिवत विवाह
कर दिया| सवरण तप्ती को लेकर
उसी पर्वत पर रहने लगा| और राग-रंग में अपनी प्रजा को भी भूल गया| उधर सवरण के राज्य में भीषण अकाल पैदा हुआ| धरती सूख गई, कुएं, तालाब और पेड़-पौधे भी सुख गए| प्रजा भूखों मरने लगी| लोग राज्य को छोड़कर दूसरे देशों में
जाने लगे| किसी देश का राजा
जब राग रंग में डूब जाता है, तो उसकी प्रजा का यही हाल होता है| सवरण का मंत्री बड़ा बुद्धिमान और उदार हृदय का था| वह सवरण का पता लगाने के लिए निकला| वह घूमता-घामता उसी पर्वत पर पहुंचा, जिस पर सवरण तप्ती के साथ निवास करता
था| सवरण के साथ तप्ती
को देखकर बुद्धिमान मंत्री समझ गया कि उसका राजा स्त्री के सौंदर्य जाल में फंसा
हुआ है| मंत्री ने बड़ी ही
बुद्धिमानी के साथ काम किया| उसने सवरण को वासना के जाल से छुड़ाने के लिए अकाल की आग में
जलते हुए मनुष्यों के चित्र बनवाए| वह उन चित्रों को लेकर सवरण के सामने उपस्थित हुआ| उसने सवरण से कहा, “महाराज ! मैं आपको चित्रों की एक
पुस्तक भेंट करना चाहता हूं|” मंत्री ने चित्रों
की वह पुस्तक सवरण की ओर बढ़ा दी| सवरण पुस्तक के पन्ने उलट-पलट कर देखने लगा| किसी पन्ने में मनुष्य पेड़ों की
पत्तियां खा रहे थे, किसी पन्ने में
माताएं अपने बच्चों को कुएं में फेंक रही थीं| किसी पन्ने में भूखे मनुष्य जानवरों को
कच्चा मांस खा रहे थे| और किसी पन्ने में प्यासे मनुष्य हाथों में कीचड़ लेकर चाट
रहे थे| सवरण चित्रों को
देखकर गंभीरता के साथ बोला, “यह किस राजा के राज्य की प्रजा का दृश्य है?” मंत्री ने बहुत ही धीमे और प्रभावपूर्वक स्वर में उत्तर दिया, “उस राजा का नाम सवरण है|” यह सुनकर सवरण चकित हो उठा| वह विस्मय भरी दृष्टि से मंत्री की ओर
देखने लगा| मंत्री पुन: अपने
ढंग से बोला, “मैं
सच कह रहा हूं महाराज ! यह आपकी ही प्रजा का दृश्य है| प्रजा भूखों मर रही है| चारों ओर हाहाकार मचा है| राज्य में न अन्न है, न पानी है| धरती की छाती फट गई है| महाराज, वृक्ष भी आपको पुकारते-पुकारते सूख गए
हैं|” यह सुनकर सवरण का हृदय कांप उठा| वह उठकर खड़ा हो गया और बोला, “मेरी प्रजा का यह हाल है और मैं यहाँ मद में पड़ा हुआ
हूं| मुझे धिक्कार है| मंत्री जी ! मैं आपका कृतज्ञ हूं, आपने मुझे जगाकर बहुत अच्छा किया|” सवरण तप्ती के साथ अपनी राजधानी पहुंचा| उसके राजधानी में पहुँचते ही जोरों की
वर्षा हुई| सूखी हुई पृथ्वी
हरियाली से ढक गई| अकाल दूर हो गया| प्रजा सुख और शांति के साथ जीवन व्यतीत
करने लगी| वह सवरण को
परमात्मा और तप्ती को देवी मानकर दोनों की पूजा करने लगी| सवरण और तप्ती से ही कुरु का जन्म हुआ
था| कुरु भी अपने
माता-पिता के समान ही प्रतापी और पुण्यात्मा थे| युगों बीत गए हैं, किंतु आज भी घर-घर में कुरु का नाम
गूंज रहा है|
*****
कुंती
की कथा
प्राचीन
काल में मथुरा में एक प्रतापी नृपति राज्य करते थे| उनका
नाम शूरसेन था| वे भगवान श्री कृष्ण के
पिता वसुदेव के पिता था|
वे बड़े धर्मात्मा
एवं प्रतिज्ञापालक थे|
शूरसेन के एक अनन्य
मित्र थे, जिनका नाम कुंतिभोज था| कुंतिभोज
के पास सबकुछ तो था, किंतु संतान नहीं थी| वे
संतान के अभाव में दिन-रात दुखी और चिंतित रहा करते थे| शूरसेन
ने कुंतिभोज के दुख को देखकर उन्हें वचन दिया था कि वे अपनी प्रथम संतान उन्हें
दान में दे देंगे|
शूरसेन की प्रथम
संतान एक पुत्री थी| उन्होंने बड़े ही प्यार के साथ उसका नाम पृथा रखा था| पृथा
जब बड़ी हुई, तो शूरसेन ने अपने वचन के अनुसार उसे कुंतिभोज को सौंप दिया| कुंतिभोज
ने उसे अपने घर ले जाकर उसका नाम कुंती रखा| कुंती बड़ी रूपवती और गुणवती थी| गुणवती
होने के कारण कुंतिभोज ने उसे अतिथियों और साधु-महात्माओं की सेवा का कार्य
सुपुर्द किया था| वह बड़े ही मनोयोग के साथ इस कार्य को पूर्ण किया करती थी|
एक बार कुंतिभोज के
घर दुर्वासा जी का आगमन हुआ| वे
कई दिनों तक कुंतिभोज के घर उसके अतिथि के रूप में रहे| उनकी
भी सेवा कुंती ही किया करती थी| कुंती
की सेवा और उसके विनीत व्यवहार ने दुर्वासा के मन को जीत लिया| वे
जब जाने लगे, तो उन्होंने कुंती को अपने पास बुलाकर कहा, "पुत्री
! मैं तुम्हारी सेवा से प्रसन्न हूं| मैं
तुम्हें एक मंत्र दे रहा हूं| तुम
इस मंत्र को पढ़कर किसी भी देवता को अपने पास बुला सकती हो और मनचाहा वरदान
प्राप्त कर सकती हो|" दुर्वासा कुंती को मंत्र देकर चले गए| प्रभात
के पश्चात का समय था|
सुर्योदेव हो चुका था, आकाश
में पक्षी उड़ रहे थे|
कुंती राजकीय उद्यान
में एक शिलाखंड पर बैठी हुई थी| सहसा
उसका ध्यान दुर्वासा के मंत्र की ओर गया| उसने
सोचा, क्यों न दुर्वासा के मंत्र की परीक्षा ली जाए|
कुंती ने मंत्र को
पढ़कर सूर्यदेव का आह्वान किया| आश्चर्य, सूर्यदेव
कुंती के सामने प्रकट हो गए| कुंती
स्तब्ध हो गई| उसका मस्तक अपने आप ही सूर्य के समक्ष नत हो गया| सूर्य
देव बोल उठे, "तुमने मेरा आह्वान क्यों किया?"
कुंती बोली, "देव, दुर्वासा
ऋषि ने मुझे एक मंत्र दिया था| मैंने
मंत्र की परीक्षा के लिए उसे पढ़कर आपका आवाहन किया| मुझे
क्षमा कर दीजिए|" सूर्यदेव ने कुंती की ओर देखते हुए कहा, "अब
तो मैं प्रकट हो गया हूं|
मेरा प्रकट होना
व्यर्थ नहीं जाता| मैं तुम्हारे साथ रमण करना चाहता हूं| तुम्हें
एक पुत्र देना चाहता हूं|" कुंती बोली, "देव
! मैं कुँवारी हूँ| कुँवारी लड़की के साथ रमण करना पाप है| मेरे
गर्भ से जब पुत्र पैदा होगा, तो
मैं समाज में कैसे रह सकूंगी?"
सूर्यदेव बोले, "तुम
चिंता मत करो| मेरे समागम से तुम्हारा कौमार्य नष्ट नहीं होगा, पुत्र
पैदा होने पर भी तुम्हारा कौमार्य बना रहेगा| गर्भ
की स्थिति में भी पता नहीं चल सकेगा कि तुम गर्भवती हो|" इसी
प्रकार जब सूर्यदेव ने कुंती को सांत्वना प्रदान की तो वह उनके साथ समागम के लिए
उद्यत हो गई| परिणामत: सूर्यदेव ने कुंती के साथ रमण किया| कुंती
गर्भवती हो गई| सूर्यदेव तो चले गए, कुंती
गर्भस्थ बालक के उत्पन्न होने की प्रतीक्षा करने लगी|
समय पर गर्भस्थ बालक
पैदा हुआ| कुंती बालक को छिपाए तो कैसे छिपाए| उसने
लोकापवाद के भय से नवजात बालक को एक संदूक में रखकर उसे गंगा में प्रवाहित कर दिया| वह
संदूक हस्तिनापुर में अधिरथ नामक सारथि के हाथ लगा| उसकी
पत्नी का नाम राधा था|
उनके कोई संतान नहीं
थी|
अधिरथ संदूक में
नवजात शिशु को देखकर प्रसन्न हो उठा| शिशु
भी कैसा? बड़ा तेजोमय| वह
कानों में स्वर्ण कुंडल और छाती पर कवच धारण किए हुए था| अधिरथ
ने ऐसा बालक आज तक नहीं देखा था| वह
उस बालक को अपने घर में ले जाकर उसका पालन-पोषण करने लगा| अधिरथ
द्वारा पालित वही नवजात शिशु बड़ा होने पर कर्ण के नाम से प्रसिद्ध हुआ| कर्ण
बड़ा शूरवीर और दानी था|
उसके शौर्य और दान ने
उसे अमर बना दिया|
*****
अंबा की कथा
बेटा
देवव्रत, तुमने तो मेरे विवाह के समय ही जीवन भर अविवाहित रहने की
प्रतिज्ञा कर ली थी| इसलिए तुम्हारे विवाह करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता जबकि बड़ा
भाई होने के नाते पहले तुम्हारा विवाह होना चाहिए था|" राजमाता
सत्यवती ने अपने ज्येष्ठ पुत्र देवव्रत से कहा जिन्हें संसार उनकी आजीवन अविवाहित
तथा अखंड ब्रह्मचारी रहने की भीष्म प्रतिज्ञा के कारण 'भीष्म' कह
कर पुकारने लगा था| आप ठीक कहती हैं माताश्री" भीष्म ने कहा "लेकिन आज
मेरे विवाह के विषय में चिंतित क्यों हो उठी हैं?" "तुम्हारे पिता का स्वर्गवास हुए कई वर्ष व्यतीत हो चुके हैं| तुमने
विवाह न करने की प्रतिज्ञा कर ली है| और
तुम्हारे दोनों छोटे भाई विचित्र वीर्य और चित्रांगद अभी तक कुंवारे हैं| हस्तिनापुर
के इस विशाल राज्य के लिए उत्तराधिकारी की आवश्यकता है पुत्र, क्या
कुरु वंश तुम तीनों भाईयों के बाद समाप्त हो जाएगा?" "नहीं मां, भीष्म
के जीते जी ऐसा कभी नहीं होगा|" भीष्म
ने कहा, "इतने विशाल और विस्तृत राज्य का स्वामी होते हुए भी
विचित्रवीर्य और चित्रांगद में एक कमी है| न
जाने उनके शरीर इतने दुबले-पतले क्यों हैं| और
यही कारण है कि वे जिस स्वयंवर में भी गए हैं राजकन्याओं ने उन्हें अनदेखा कर दिया
है|" "मैंने सुना है कि काशी राज एक साथ ही अपनी तीन कन्याओं का
स्वयंवर आयोजित करने जा रहे हैं| स्वयंवर
का निमंत्रण आ चुका है|
मैं चाहती हूं कि इस
बार अपने भाईयों के साथ तुम भी स्वयंवर में जाओ|" "मैं स्वयंवर में जाऊं? - आप
यह क्या कह रही हैं माताश्री?" भीष्म
ने आश्चर्य से कहा, "आपने अभी-अभी तो मुझे मेरी प्रतिज्ञा का स्मरण कराया था|" "मैंने यह कब कहा कि तुम स्वयंवर में अन्य राजाओं और राजकुमारों
की तरह भाग लेने जाओ,
तुम अपने छोटे भाईयों
के संरक्षक के रूप में इस स्वयंवर में भाग लो और जैसे भी हो सके अपने भाईयों का
विवाह कराकर उनकी वधुओं के साथ लौटो|" सत्यवती
की बात सुनकर भीष्म कुछ देर तक सोच में डूबे खड़े रहे फिर दोनों हाथ जोड़कर सिर
झुकाते हुए बोले: "आपकी आज्ञा शिरोधार्य है माता श्री|" विचित्रवीर्य
और चित्रांगद के साथ वही हुआ जो पिछले कई स्वयंवरों में उनके साथ होता आया था| काशीराज
की तीनों पुत्रियां अंबा,
अंबिका और अंबालिका
हाथों में जयमाला लिए स्वयंवर के मंडप में पहुंचीं और एक छोर से अपने-अपने आसनों
पर बैठे राजाओं और राजकुमारों पर नजर डालती हुई आगे बढ़ने लगीं| फिर जैसे ही तीनों राजकन्याएं विचित्रवीर्य और चित्रांगद
पर एक उचटती हुई नजर डालकर आगे बढ़ने लगीं संरक्षक के रूप में दोनों राजकुमारों के
पीछे बैठे भीष्म उठकर खड़े हो गए और उन तीनों राजकन्याओं के पास पहुँचकर अपना धनुष
संभाल कर बोले,
"काशीराज और स्वयंवर
में पधारे अन्य सभी राजा तथा राजकुमार ध्यान से सुनें| मैं
इन तीनों राजकन्याओं का अपहरण करके हस्तिनापुर ले जा रहा हूं| आप
लोग ही नहीं समूचा विश्व मुझसे भली भांति परिचित है और याद रखिए, मानव
देह मिलना न जाने कितने पूर्वजन्मों के सत्कर्मों का परिणाम होती है| इसलिए
व्यर्थ ही मेरे मार्ग में बाधक बनने की चेष्टा करके इस सुंदर देह को मत गंवाइए|" भीष्म
की गर्जना भरी घोषणा सुनकर स्वयंवर सभा में उपस्थित राजाओं और राजकुमारों के चेहरे
झुक गए| उन्हें लगा जैसे भीष्म के शब्दों में कोई ऐसा जादू था जिसने
उन्हें आसनों के साथ इस तरह चिपका दिया है कि वे चाह कर भी उठ नहीं पा रहे हैं| भीष्म
की गर्जना ने उनके हाथ-पैरों की शक्ति छीन ली थी| मद्र
देश के राजा शल्य भी अपनी प्रेयसी अंबा का अपहरण चुपचाप बैठे देखते रहे| उन्हें
स्वयंवर से पहले ही यह समाचार मिल चुका था कि अंबा उन्हीं के गले में जयमाला
डालेगी, लेकिन उनमें भी इतनी शक्ति नहीं थी कि वह भीष्म का विरोध कर
पाते|
स्वयंवर में आए हुए राजा और राजकुमार चुपचाप उठे
और मंडप से निकलकर अपने-अपने नगर की ओर चल दिए| भीष्म
ने तीनों राजकुमारियों को अपने रथ पर बैठाया और तीव्रता से हस्तिनापुर की ओर चल
दिए| उनका विरोध कर पाने की शक्ति काशीराज और उनकी सेना में भी नहीं
थी| हस्तिनापुर पहुँचकर भीष्म को पता चला कि अंबा पहले ही मद्र नरेश
शल्य का वरण कर चुकी है|
इसलिए उन्होंने
अंबिका का विवाह चित्रांगद के साथ और अंबालिका का विवाह विचित्रवीर्य के साथ बड़ी
धूमधाम से कर दिया| "अंबा,
मुझे अब पता चला है
कि तुम मद्र नरेश शल्य को पति के रूप में वर चुकी हो| अगर
मुझे यह बात पहले मालूम होती तो मैं तुम्हें कभी हस्तिनापुर लेकर नहीं आता| भीष्म
ने राजकुमारी अंबा से कहा,
तुम शल्य के पास जा
सकती हो| मैं तुम्हें मद्र देश पहुंचाने की व्यवस्था किए देता हूं| अंबा
ने कृतज्ञता से सिर झुका लिया और
कहा कि मैं आपकी यह कृपा आजीवन नहीं भूलूंगी|" भीष्म
ने कुछ सैनिकों के साथ अंबा को उसी दिन रथ में बैठाकर मद्र देश भेज दिया| अंबा
को देखकर मद्र नरेश शल्य चौंक पड़े| और
कहा कि भीष्म ने तुम्हें कैसे छोड़ दिया राजकुमारी? अंबा
ने बताया कि उन्होंने अंबिका का विवाह राजकुमार चित्रांगद के साथ और
अंबालिका का विवाह विचित्रवीर्य के साथ कर दिया| दरअसल
भीष्म को पहले ही पता चल चुका था कि मैं आपसे प्रेम करती हूं और मैंने मन ही मन
आपको पति के रूप में वरण करने का निश्चय कर लिया है| साथ
ही आप भी मुझे स्नेह करते हैं और अपनी पत्नी बनाना चाहते हैं, इसलिए
विवाह कार्य से फुरसत पाने के बाद उन्होंने मुझे आपके पास भेज दिया|" "नहीं
अंबा, यह असंभव है|" शल्य
ने स्पष्ट शब्दों में कहा,
"यह सच है कि जिस तरह
तुम मुझे प्रेम करती थीं और तुमने मेरे साथ विवाह करने का निश्चय कर लिया था उसी
प्रकार मैं भी तुम्हें प्रेम करता था और मैंने भी निश्चय कर लिया था कि मैं
तुम्हें ही महारानी बनाऊंगा| लेकिन
अंबा, अब तो सब कुछ समाप्त हो गया| मैंने
अपनी आंखों से भीष्म को तुम्हारा हाथ पकड़कर अपने रथ में बैठाते हुए देखा था| उसके
बाद तुम इतने दिनों भीष्म के घर में रह चुकी हो| कोई
भी पुरुष तुम जैसी सुंदर युवती को अपहरण करके ले जाए और इतने दिनों तक अपने घर में
रखे - नहीं अंबा, दूध के धुले तो वे देवता भी नहीं थे जिनकी हम वंदना करते हैं और फिर जब किसी स्त्री का हाथ कोई पुरुष पकड़ लेता है तो
शास्त्रों के अनुसार वह उसी की हो जाती है| तुम
भीष्म की हो चुकी हो|
इतने दिन उसके घर में
रह भी चुकी हो, इसके बाद तो तुम दोनों को एक दूसरे को अपनाने में कोई आपत्ति
नहीं होनी चाहिए| तुम वापस भीष्म के पास हस्तिनापुर चली जाओ| हस्तिनापुर
से तुम्हारे साथ आए हुए अंगरक्षक सैनिक और रथ अभी यहीं हैं| वे
लोग तुम्हें बड़े आराम से हस्तिनापुर ले जाएंगे|" शल्य
की बात सुनकर अंबा क्रोध और ग्लानि की अधिकता के कारण रो पड़ी| उसने
रुंधे हुए स्वर में रोते-रोते कहा, "आपका
विचार गलत है मद्रराज|
केवल हाथ पकड़ लेने
से ही कोई स्त्री किसी पुरुष की पत्नी नहीं बन जाती| और
उस स्थिति में तो बिल्कुल नहीं जब वह इससे पहले ही किसी का वरण कर चुकी हो|" अंबा
ने कहा; "मैं आपकी ही हूँ शल्य, मुझे
इतनी निष्ठुरता से ठुकराइए मत|" अंबा
बिलख-बिलख कर रोने लगी|
लेकिन शल्य पर पर
उसके आंसुओं का कोई प्रभाव नहीं पड़ा| विवश
और निराश अंबा-प्रेमी द्वारा ठुकराई गई प्रेमिका फिर रथ में जा बैठी और रथ वेग से
हस्तिनापुर की ओर चल पड़ा|
"मद्र नरेश शल्य ने
तुम्हें मेरे पास क्यों भेज दिया?" भीष्म
ने आश्चर्य भरे स्वर में कहा, "इसका
अर्थ है उसे तुमसे कभी प्रेम नहीं था| इससे
स्पष्ट हो जाता है कि वह पुरुष नहीं है| उसकी
प्रेमिका का हाथ जिस व्यक्ति ने पकड़ा था उसके मन में उसकी प्रेमिका के प्रति न तो
अनुरक्ति थी, न वासना और न उसे पाने की कामना| शल्य
कायर हैं जो अपनी निर्दोष,
गंगा जैसी पवित्र
प्रेमिका को इस साधारण सी बात पर अपना नहीं सका| कायर-पुरुष, भीष्म का क्रोध बढ़ता जा रहा था| उन्होंने
अपना धनुष उठा लिया, "चलो अंबा, मैं
स्वयं तुम्हें तुम्हारे प्रेमी के पास पहुंचाए देता हूं|" "नहीं महाराज, शल्य
ने मुझे ठुकरा दिया है|
मैं नारी हूं| कोई
भी नारी इस अपमान को सहन नहीं कर सकती| मेरे
हृदय में भी ऐसे कायर के लिए अब कोई स्थान नहीं है|" अंबा
ने कहा, "क्योंकि स्वयंवर में एकत्र इतने लोगों के सामने आपने मेरा हाथ
थामा था इसलिए अब इस हाथ को कोई दूसरा नहीं थाम पाएगा| अब
तो आप को ही मुझे आश्रय देना पड़ेगा, क्योंकि
संसार की दृष्टि में और सामाजिक तथा धार्मिक नियमों के अनुसार मैं आपकी हो चुकी
हूं|" "अंबा,
जिस समय मैंने
तुम्हारा हाथ पकड़ा था न तो मेरे मन में तुम्हारे प्रति स्नेह की भावना थी और न
तुम्हारे मन में मेरे प्रति ही अनुराग था| जिस
कार्य में न तो कर्म हो और न भावना हो वह कार्य - कार्य नहीं माना जा सकता| और
फिर सारा संसार जानता है कि मैं जीवन भर अविवाहित रहने की ही नहीं अखंड ब्रह्मचारी
रहने की प्रतिज्ञा कर चूका हूं| इसलिए
तुम्हें पत्नी या उपपत्नी के रूप में रख पाना मेरे लिए नितांत असंभव है | मैं
तुम्हारे पिता के पास तुम्हें पहुंचाने की व्यवस्था कर देता हूं| अब
तुम्हारे लिए अंतिम स्थान तुम्हारे माता-पिता का घर ही रह गया है|" "नहीं अब तो मुझे मृत्यु ही आश्रय दे सकती है|" अंबा
ने दृढ़ता भरे स्वर में कहा, "प्रेमी
ने मुझे ठुकरा दिया, इस अपराध में कि आपने भरी सभा में मेरा हाथ पकड़ा था| और
आप मुझे इसलिए स्वीकार नहीं कर रहे कि आप आजीवन अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा कर
चुके हैं| मैं अपने माता-पिता के घर इसलिए नहीं जा सकती कि मेरा अपहरण
किया गया है| अर्थात इस संसार में अब मेरे लिए कहीं भी स्थान शेष नहीं रहा|" "नहीं अंबा, अपहरण
के लिए तुम दोषी नहीं हो|
कोई भी माता-पिता
इतने निष्ठुर नहीं होते कि अपनी निर्दोष कन्या को निराश्रित छोड़ दें|" "भीष्म!"
अंबा की आंखों से आंसुओं के स्थान पर क्रोध की चिंगारियां बरसने लगीं| मेरी
यह दशा तुम्हारे ही कारण हुई है| मैं
तुमसे प्रतिशोध लिए बिना चैन से नहीं बैठूंगी|" यह
कहकर अंबा राजभवन से निकली और नदी की ओर चल पड़ी जहां भीष्म के गुरु भगवान परशुराम
का आश्रम था| "भीष्म,
तुमने जिस उद्देश्य
से अविवाहित रहने की प्रतिज्ञा की थी वह पूरा हो चूका है| तुमने
स्वयं राज्य ग्रहण नहीं किया| तुमने
अपनी विमाता के पुत्र को राज्य के समस्त अधिकार दे दिए| इस
तरह तुम्हारी प्रतिज्ञा पूरी हो चुकी है| अत:
यदि तुम अब विवाह कर लेते हो तो उससे तुम पर कोई दोष नहीं लगता| तुम्हारी
विमाता भी केवल यही चाहती हैं कि उनके पुत्र और उसके पुत्रों की संतान ही इस राज्य
की अधिकारी बने| उनका यह उद्देश्य पूरा हो चूका है| इसलिए
मेरी राय है कि तुम अंबा को अपना लो," गुरु
परशुराम ने भीष्म को समझाया| "नहीं
गुरुदेव, प्रतिज्ञा उद्देश्य की प्राप्ति के साथ समाप्त नहीं हो जाती, वह
तो प्रतिज्ञा करने वाले व्यक्ति के जीवन के साथ समाप्त होती है| मैंने
अपनी मां गंगा को साक्षी बनाकर प्रतिज्ञा की थी| मैं
न तो अपनी माता के साथ विश्वासघात कर सकता हूं न अपनी विमाता के साथ| मेरी
प्रतिज्ञा को तो मेरे जीवन के साथ ही अंत होगा|" भीष्म
ने बड़ी विनम्रता से कहा|
"अगर तुम मेरी आज्ञा
का पालन नहीं करते तो युद्ध के लिए तैयार हो जाओ|" परशुराम
ने अपना धनुष संभालते हुए कहा| "जैसी आपकी आज्ञा गुरुदेव|" भीष्म
ने भी अपनी धनुष उठा लिया,
"लेकिन यदि मैं पराजित
भी हो गया - जिसकी संभावना ही अधिक है - तो भी मैं अंबा के साथ विवाह नहीं करूंगा| अपनी
प्रतिज्ञा भंग करने के बजाय स्वयं को अग्नि को समर्पित कर देना श्रेष्ठ समझूंगा|" दोनों
ने अपने-अपने शस्त्र संभाल लिए| गुरु-शिष्य
का युद्ध घंटों चलता रहा|
जब सूर्यास्त हो गया
तो युद्ध बंद हो गया|
इसी प्रकार सात दिन
बीत गए| न कोई विजयी हुआ न पराजित| अंत
में परशुराम ने युद्ध समाप्त करते हुए कहा, "भीष्म, तुमने
अपनी प्रतिज्ञा के मद में अपने गुरु का अपमान किया है| उस
पर शस्त्र उठाया है| मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि युद्ध में तुम्हारी मृत्यु का
कारण तुम्हारे ये शस्त्र ही बनेंगे| तुम्हारे
शस्त्र लक्ष्यहीन हो जाया करेंगे|" शिष्य
को श्राप देकर गुरु परशुराम अपने आश्रम में लौट गए| परशुराम
के जाने के बाद अंबा ने क्रोध और दुख भरे स्वर में कहा, "भीष्म, मेरे
लिए अग्नि की लपलपाती लपटों में आश्रय लेने के अतिरिक्त और कोई उपाय शेष नहीं रहा| मेरी
इस मृत्यु का कारण जिस प्रकार आज तुम बन रहे हो उसी प्रकार एक दिन मैं तुम्हारी
मृत्यु का कारण बनूंगी|"
यह कह कर अंबा वहाँ
से चल पड़ी| निर्जन वन में जाकर उसने भीष्म से प्रतिशोध लेने के लिए तपस्या
करनी आरंभ कर दी| फिर एक दिन उसने यज्ञ करते हुए अग्निदेव का आवाहन किया| उसकी
निष्ठा, भक्ति और साधना से प्रभावित होकर अग्निदेव यज्ञ कुंड में प्रगत
हुए| "तुमने मेरा स्मरण किसलिए किया पुत्री?" अग्निदेव
ने पूछा| "पूज्य,
मैं भीष्म से
प्रतिशोध लेना चाहती हूं|
मुझे अपनी शरण में
लेकर मुझे ऐसा जीवन दीजिए जिसमें मैं भीष्म से अपने अपमान और तिरस्कार का प्रतिशोध
ले सकूं|" "ऐसा ही होगा पुत्री, आओ
मेरी गोद में आ जाओ|" अग्निदेव ने कहा| अंबा
उठी और उसने अग्निकुंड में छलांग लगा दी| अंबा
ने दूसरे जन्म में महाराजा द्रुपद के घर में शिखंडी के रूप में जन्म लिया| महाभारत
के युद्ध में इसी शिखंडी की आड़ लेकर अर्जुन ने भीष्म पर बाण वर्षा की तो भीष्म
उसके बाणों का समुचित उत्तर नहीं दे पाए क्योंकि वह अर्जुन की ओर देखे बिना बाण
चलाते थे| वह अर्जुन की ओर इसलिए नहीं देखते थे कि शिखंडी अर्जुन के आगे
खड़ा था और भीष्म जानते थे कि शिखंडी और कोई नहीं वही अंबा है जिसने
उसने अपने तिरस्कार और अपमान का बदला लेने के लिए शिखंडी के रूप में जन्म लिया है|
*****
भीम में हजारों हाथियों का बल आना
पाँचों पाण्डव - युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल
और सहदेव - पितामह भीष्म तथा विदुर की छत्रछाया में बड़े होने लगे। उन पाँचों में
भीम सर्वाधिक शक्तिशाली थे। वे दस-बीस बालकों को सहज में ही गिरा देते थे।
दुर्योधन वैसे तो पाँचों पाण्डवों से ईर्ष्या करता था किन्तु भीम के इस बल को देख
कर उससे बहुत अधिक जलता था। वह भीमसेन को किसी प्रकार मार डालने का उपाय सोचने
लगा। इसके लिये उसने एक दिन युधिष्ठिर के समक्ष गंगा तट पर स्नान, भोजन
तथा क्रीड़ा करने का प्रस्ताव रखा जिसे युधिष्ठिर ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। गंगा
के तट पर दुर्योधन ने विविध प्रकार के व्यंजन तैयार करवाये। स्नानादि के पश्चात्
जब सभी ने भोजन किया तो अवसर पाकर दुर्योधन ने भीम को विषयुक्त भोजन खिला दिया।
भोजन के पश्चात् सब बालक वहीं सो गये। भीम को विष के प्रभाव से मूर्छा आ गई।
मूर्छित हुए भीम को दुर्योधन ने गंगा में डुबा दिया। मूर्छित अवस्था में ही भीम
डूबते-उतराते नागलोक में पहुँच गये। वहाँ पर उन्हें भयंकर विषधर नाग डसने लगे तथा
विषधरों के विष के प्रभाव से भीम के शरीर के भीतर का विष नष्ट हो गया और वे
सचेतावस्था में आ गये। चेतना लौट आने पर उन्होंने नागों को मारना आरम्भ कर दिया और
एक के पश्चात् एक नाग मरने लगे।
भीम के इस विनाश लीला को देख कर कुछ नाग भागकर अपने राजा वासुकि के पास पहुँचे और
उन्हें समस्त घटना से अवगत कराया। नागराज वासुकि अपने मन्त्री आर्यक के साथ भीम के
पास आये। आर्यक नाग ने भीम को पहचान लिया और उनका परिचय राजा वासुकि को दिया।
वासुकि नाग ने भीम को अपना अतिथि बना लिया। नागलोक में आठ ऐसे कुण्ड थे जिनके जल
को पीने से मनुष्य के शरीर में हजारों हाथियों का बल प्राप्त हो जाता था। नागराज
वासुकि ने भीम को उपहार में उन आठों कुण्डों का जल पिला दिया। कुण्डों के जल पी
लेने के बाद भीम गहन निद्रा में चले गये। आठवें दिन जब उनकी निद्रा टूटी तो उनके
शरीर में हजारों हाथियों का बल आ चुका था। भीम के विदा माँगने पर नागराज वासुकि ने
उन्हें उनकी वाटिका में पहुँचा दिया। उधर
सो कर उठने के बाद जब पाण्डवों ने भीम को नहीं देखा तो उनकी खोज करने लगे और उनके
न मिलने पर राजमहल में लौट गये। भीम के इस प्रकार गायब होने से माता कुन्ती
अत्यन्त व्याकुल हुईं। वे विदुर से बोलीं, "हे
आर्य! दुर्योधन मेरे पुत्रों से और विशेषतः भीम से अत्यन्त ईर्ष्या करता है। कहीं
ऐसा तो नहीं है कि उसने भीम को मृत्युलोक में पहुँचा दिया?" उत्तर
में विदुर ने कहा, "हे देवी! आप चिन्तित मत होइये। भीम की जन्मकुण्डली के अनुसार वह
दीर्घायु है तथा उसे अल्पायु में कोई भी नहीं मार सकता। वह अवश्य लौट कर
आयेगा।" इस प्रकार हजारों हाथियों का बल प्राप्त कर के भीम लौट आये।
*****
द्रोण द्वारा कुएँ
में गेद को भेदना
हस्तिनापुर के राजभवन में कौरव और पांडव
राजकुमार एक साथ रहते थे|
भीष्म और विदुर उनकी देखभाल किया करते थे| भीष्म को राजकुमारों को धनुर्विद्या का ज्ञान देने के लिए
उपयुक्त शिक्षक की आवश्कता थी| एक दिन सभी राजकुमार उद्यान में गेंद खेल रहे थे| उनकी गेंद लुढ़ककर पास ही एक कुएँ में जा गिरी| गेंद को बाहर कैसे निकाला जाए, इसी सोच में सब कुमार कुएँ के पास खड़े थे| उसी समय एक तेजस्वी ब्राह्मण उधर से निकले| उन्होंने राजकुमारों से पूछा, "क्या तुम गेंद को बाहर नहीं निकाल सकते? तुम सब तो क्षत्रिय प्रतीत होते हो, क्या अस्त्रविद्या नहीं जानते?" तुरन्त ही भीम बोल उठा, "यदि आप जानते है तो हमें यह गेंद निकाल दीजिए|" देखते ही देखते, उस ब्राह्मण ने एक बाण कुएं के अन्दर फेंका जिसने गेंद को
भेद दिया| उन्होंने दूसरा तीर छोड़ा जिसने पहले तीर को भेद दिया, फिर तीसरा तीर
जिसने दूसरे बाण को भेद दिया| और इस तरह वे एक के बाद एक बाण फैंकते चले गये, जब तक कि उनके
हाथ में अंतिम बाण न आ गया| फिर उन्होंने धीरे से आखिरी बाण को खींचकर गेंद कुएँ से
बाहर निकाल ली| राजकुमार अचंभे में पड़ गए| राजभवन लौटने पर जब उन्होंने भीष्म को इस घटना के बारे में
बताया तब भीष्म ने प्रसन्नता से कहा,
"मैं जानता हूँ, वे कौन थे| वे महान
धनुर्धारी द्रोणाचार्य के अतिरिक्त और कोई नहीं हो सकते| मैं चाहता हूँ कि
वे तुम्हें शिक्षा प्रदान करें| इस सम्बन्ध में मैं स्वयं जाकर उनसे प्रार्थना करूंगा|" भीष्म की विनती पर वे हस्तिनापुर में आ गए और राजकुमारों को अस्त्र शस्त्र की विद्या
देने लगे| सभी राजकुमार धनुर्विद्या में प्रवीण थे परन्तु अर्जुन श्रेष्ठ था| द्रोण के मन में
अर्जुन के प्रति विशेष सद्भाव था| वे चाहते थे कि अर्जुन अद्वितीय धनुर्धर बने|
*****
एकलव्य की परीक्षा
अर्जुन के विद्यार्थी काल की ही घटना है| एक रात भोजन करते समय हवा से दिया बुझ गया| अर्जुन तथा उसके भाई खाना खा रहे थे| एकाएक अर्जुन के मन में विचार आया कि आदत होने के कारण अँधेरे में भी
हाथ सीधा मुँह की ओर ही जाता है| अर्थात अभ्यास से कुछ भी संभव हो सकता है| उस दिन से अर्जुन ने अँधेरे में भी
निशाना लगाने का अभ्यास शुरू कर दिया| द्रोण बहुत प्रसन्न हुए और अर्जुन को संसार का श्रेष्ठतम
धनुर्धर बनने का आशीर्वाद दिया| एक बार द्रोणाचार्य
की आज्ञा से सब कुमार गण जंगल में शिकार खेलने गए| उनके साथ एक कुत्ता भी था| जंगल में वह कुत्ता भटक गया और जब वापस
लौटा तब उसका मुँह बाणों से कुछ इस चतुराई से भेदा गया था कि वह भौंक नहीं पा
रहा था| उस निपुण वीर को
ढूंढ़ते हुए-जिसने कुत्ते की यह दशा की थी- अर्जुन श्यामल-वर्ण
के एक युवक के पास जा पहुँचे| उन्होंने पूछा, "आप कौन हैं? और आपको ऐसी श्रेष्ठ धनुर्विद्या
किसने सिखाई है?" "मैं निषाद नामक भील जाति के राजा
हिरन्यधनु का पुत्र एकलव्य हूँ| द्रोणाचार्य मेरे
गुरुवर हैं| उन्होंने स्वयं एक
भील युवक को सिखाने से इनकार कर दिया था इसलिए मैं उनकी इस प्रतिमा
के सामने निरंतर अभ्यास करता हूँ|" जब द्रोण को अर्जुन
से इस घटना का पता चला, वे अत्यंत चिंतित हुए|
"क्या एकलव्य इन राजकुमारों से आगे निकल
जाएगा?" वे
सोचने लगे| बहुत सोच-विचार के
बाद वे अर्जुन को लेकर उसी वन में गए| वहाँ उन्होंने एकलव्य को अपनी प्रतिमा के
समक्ष दृढ़ता के साथ अभ्यास करते देखा| एकलव्य ने गुरु
द्रोण को देखते ही उनके चरण छूकर प्रणाम किया|
द्रोण ने कहा,
"यदि तुम सच में मेरे शिष्य हो तो
तुम्हें मुझे गुरु दक्षिणा देनी होगी|"
एकलव्य बोला,
"गुरुवर, मेरा सर्वस्व आपका है, आज्ञा दें|"
"तुम मुझे अपने
दाहिने हाथ का अँगूठा गुरु दक्षिणा में दे दो," द्रोण ने कहा|
द्रोण के कठोर शब्दों को सुनकर भी एकलव्य ने हँसते-हँसते अपने
हाथ का अँगूठा काटकर दे दिया| इसके पश्चात निषाद
राजकुमार ने हाथ की चार उँगलियों से धनुर्विद्या
आरंभ कर दी परन्तु फिर वह पहले के सामान निपुणता न कर सका| गुरुवर ने ऐसा क्यों किया? शायद उनके मन में वही बात रही होगी कि
अर्जुन संसार का सबसे अद्वितीय धनुर्धर बने|
*****
चिड़ियाँ की आखँ भेदना
अपने शिष्यों की कुशलता परखने के लिए एक बार द्रोणाचार्य ने
एक पेड़ पर एक कृत्रिम पक्षी रखा और सब कुमारों को बुलाया| सबसे पहले युधिष्ठिर को बुलाकर
उन्होंने पूछा, "क्या
तुम पेड़ पर बैठी चिड़ियों को देख सकते हो? उसकी आँख पर लक्ष्य साधो|"
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, "जी हाँ, मैं देख सकता हूँ|"
द्रोण ने पुनः प्रश्न किया, "क्या तुम और भी कुछ
देख रहे हो?"
युधिष्ठिर बोला,
"मैं आकाश, पेड़ और बादल भी देख रहा हूँ|"
द्रोण ने कहा,
"नहीं, रहने दो, तुमने पर्याप्त शिक्षा नहीं पाई है|" उन्होंने दुर्योधन
को बुलाकर वही प्रश्न दुहराए, और उसने भी वही उत्तर दिए|
द्रोण झुंझलाकर बोले,
"नहीं, नहीं, तुम भी अभी परिपूर्ण नहीं हो"
द्रोण ने एक-एक करके सभी राजकुमारों से वही प्रश्न किये
परन्तु उन्हें संतोषजनक उत्तर नहीं मिला|
अर्जुन की बारी आने पर उन्होंने उससे
भी वही सब पूछा|
अर्जुन ने कहा,
"मैं सिर्फ पक्षी देख रहा हूँ|"
द्रोण ने पुनः प्रश्न किया, "पक्षी का कौन-सा
भाग तुम्हें दिखाई दे रहा है?"
अर्जुन बोले, "केवल उसकी आँख|"
द्रोण प्रसन्नतापूर्वक बोले, "ठीक है, तुम ही सच्चे अर्थों में धनुर्धारी हो|
एक धनुर्धारी को अपने लक्ष्य के आलावा और कुछ नहीं
दिखना चाहिए, तभी वह सफलता से
बाण चला सकता है| निस्संदेह तुम एक
महान धनुर्धारी बनोगे|"
*****
द्रोणाचार्य का द्रुपद से बदला
द्रोणाचार्य का जीवन बड़े सुख से व्यतीत हो रहा था| उन्हें
हस्तिनापुर राज्य की ओर से अच्छी वृत्ति तो मिलती ही थी, अच्छा
आवास भी मिला हुआ था|
राजकुटुंब के
छोटे-बड़े सभी लोग उन्हें मस्तक झुकाया करते थे| स्वयं
देवव्रत भी उनका बड़ा आदर किया करते थे|
पर्व और त्योहारों पर द्रोणाचार्य राजकुटुंब में बुलाए जाते थे| उनका
सम्मान तो किया ही जाता था, उन्हें
अच्छी दक्षिणा भी दी जाती थी| किंतु
द्रोणाचार्य मन – ही - मन
खिन्न रहा करते थे| ऐसा लगता था, जैसे
उनके मन में कोई चिंता हो|
कोई पीड़ा हो| सचमुच
द्रोणाचार्य के मन को एक चिंता की आग जलाया करती थी| वह
चिंता की आग थी, द्रुपद से बदला| द्रुपद
उनका विद्यार्थी जीवन का मित्र था| उन्होंने
बाण विद्या प्राप्त करने में उसकी सहायता की थी| उसने
उन्हें आधा राज्य देने का वचन दिया था| किंतु
जब वे उसके पास गए, तो आधा राज्य देने की कौन कहे, उसने
पहचानने से भी इनकार कर दिया था| द्रोणाचार्य
का मन भीतर ही भीतर अपमान की आग से जला करता था| उन्होंने
यह सोच रखा था, जब तक वे द्रुपद से अपमान का बदला नहीं लेंगे, संतोष
की सांस नहीं लेंगे| ज्यों-ज्यों दिन बीतते जा रहे थे, द्रोणाचार्य
के भीतर की व्यथा तीव्र होती जा रही थी| उन्हें
न तो रात में नींद आती थी,
न दिन में खान-पान
अच्छा लगता था| मनुष्य के मन में जब कोई गहरी व्यथा पैदा हो जाती है, तो
जब तक वह दूर नहीं होती,
उसे अपना ही जीवन
भार-सा प्रतीत होने लगता है|
काफी दिन बीत चुके थे|
द्रोणाचार्य की उम्र
का सूर्य ढलने लगा था|
सिर के बाल श्वेत
होने लगे थे| वे पांडव और कौरव राजकुमारों को बहुत कुछ शिक्षा दे चुके थे|
सुबह का समय था| द्रोणाचार्य ने क्रम-क्रम से अपने शिष्यों को बुलाकर उनसे पूछना
प्रारंभ किया - पांचाल के नृपति (राजा) द्रुपद ने मेरा अपमान किया है| क्या
तुम उसे बंदी बनाकर मेरे सामने ला सकते हो?
सभी शिष्यों का एक ही उत्तर था, "गुरुवर्य, मैं
अकेला द्रुपद को बंदी बनाकर कैसे ला सकता हूँ? वह
पांचाल देश का नृपति है|
उसके पास सेना है, सिपाही
हैं, अस्त्र-शस्त्र हैं|"
सबसे अंत में द्रोणाचार्य ने अर्जुन को बुलाया| उन्हें
अर्जुन पर बड़ा गर्व था|
उन्होंने बड़े प्रेम
से अर्जुन को बाणविद्या की शिक्षा दी थी| उनके
पास जो कुछ था, उन्होंने सबकुछ अर्जुन को सिखा दिया था| सबसे
बड़ी बात तो यह थी कि अर्जुन को उनका आशीर्वाद प्राप्त था| अर्जुन
स्वयं इंद्र का अंश था|
वह बाण विद्या का
अद्भुत पंडित था| वह अपने बाणों से आकाश के तारों को भी फल के समान नीचे गिरा
सकता था| सूर्यमंडल को भी निस्तेज बना सकता था|
द्रोणाचार्य ने अर्जुन से भी वही प्रश्न किया, जो
दूसरे राजकुमारों से किया था, "पांचाल-नरेश
द्रुपद ने मेरा अपमान किया है| क्या
तुम उसे बंदी बनाकर मेरे सामने ला सकते हो?" अर्जुन
बोला, "गुरुवर! आपके आशीर्वाद से मैं द्रुपद तो क्या, तीनों
लोकों के नरेशों को भी बंदी बनाकर आपके समक्ष ला सकता हूँ|"
गुरु द्रोणाचार्य ने
प्रसन्न होकर अर्जुन के मस्तक पर अपना दाहिना हाथ रख दिया| अर्जुन
नतमस्तक हो गया| वह धनुष बाण लेकर पांचाल की राजधानी की ओर चल पड़ा| वहाँ
पहुँचकर सावधानी के साथ वह द्रुपद की गतिविधि का निरीक्षण करने लगा - वह कब बाहर
निकलता है और कब और कहां जाता है| अर्जुन
को ज्ञात हुआ कि द्रुपद प्रतिदिन प्रात: काल राजोद्यान में भ्रमण करने के लिए जाता
है| अर्जुन ने उसे उसी समय बंदी बनाने का निश्चय किया|
प्रभात का समय था| सूर्योदय हो चुका था| गगनमंडल
पर चहचहाते हुए पक्षी उड़ रहे थे| पुष्पों
पर भौंरे गुँजार कर रहे थे| मंद-मंद
सुगंधित हवा चल रही थी|
द्रुपद राजोद्यान में
धीरे-धीरे भ्रमण कर रहा था| सहसा
विद्युत के समान पहुँचकर अर्जुन ने उसे बंदी बना लिया| साथ
के अनुचरों ने जब बाधा उपस्थित की तो अर्जुन ने उन्हें मारकर भगा दिया| थोड़ी
ही देर में द्रुपद के बंदी होने का समाचार राजधानी के घर-घर में फैल गया| सैनिक-सिपाही
अस्त्र-शस्त्र लेकर दौड़ पड़े| सबने
एक साथ मिलकर द्रुपद को छुड़ाने का प्रयत्न किया, किंतु
अर्जुन की बाण वर्षा ने सबको असहाय कर दिया| जिस
प्रकार सिंह अपने शिकार को लेकर गीदड़ों के बीच से बाहर निकल जाता है, उसी
प्रकार अर्जुन द्रुपद को बंदी बनाकर उसकी सेना की पहुँच से बाहर निकल गया|
अर्जुन के तेज और उसके अद्भुत शौर्य ने द्रुपद को मुग्ध कर दिया| वह
बोला, "बड़े शूरवीर हो तुम किंतु यह तो बताओ तुम कौन हो? तुमने
मुझे क्यों बंदी बनाया है?
तुम बंदी बनाकर मुझे
कहाँ ले जाना चाहते हो?" अर्जुन बोला, "मैं
कौन हूँ, यह तो नहीं बताऊंगा, किंतु
आपके दूसरे और तीसरे प्रश्न का उत्तर यह है कि मैंने अपने गुरु की आज्ञा से आपकी
बंदी बनाया है| मैं अपने गुरु के पास ही आपको ले चल रहा हूँ| मेरे
गुरु ही आपके संबंध में निर्णय करेंगे| विश्वास
रखिए, मैं आपके साथ अभद्रता का बरताव नहीं करूंगा|"
द्रुपद आश्चर्य भरे स्वर में बोला, "तुमने
मुझे अपने गुरु की आज्ञा से बंदी बनाया है| क्या
नाम है तुम्हारे गुरु का?"
अर्जुन ने उत्तर दिया, "मेरे
गुरु का नाम है द्रोणाचार्य !"
द्रुपद के मुख से आश्चर्य के साथ निकल पड़ा, "द्रोणाचार्य
!"
द्रुपद की आँखों के सामने एक चित्र नाच उठा| उसने
उस चित्र में देखा - उसके विद्यार्थी जीवन का मित्र द्रोणाचार्य दीनभाव से उसके
सामने खड़ा है| उसे अपनी मित्रता की याद दिलाकर उससे सहायता की याचना कर रहा है, किंतु
उसने उसकी ओर से अपना मुख फेर लिया है और बड़ी उपेक्षा के साथ उत्तर दिया है - वह
तो उसे जानता ही नहीं| द्रुपद मन-ही-मन सोचने लगा, वह
तब तक सोच-विचार में डूबा रहा, जब
तक अर्जुन उसे बंदी रूप में लेकर द्रोणाचार्य के सामने नहीं पहुँच गया| उसने
द्रुपद को द्रोणाचार्य के सामने खड़ा कर दिया| अर्जुन
बोला, "गुरुवर,
पहचानिए, यही
है न द्रुपद?" द्रोणाचार्य ने द्रुपद की ओर देखा| उसका
मस्तक झुका हुआ था| द्रोणाचार्य बोले, "हाँ, बेटा
अर्जुन! यही है पांचाल देश के नृपति द्रुपद! इन्होंने ही एक दिन मेरी गरीबी का
उपहास किया था| यह मेरे विद्यार्थी जीवन के साथी हैं, पर
इन्होंने ही कहा था, मैं तो तुम्हें पहचानता ही नहीं| तुमने
मेरी आज्ञा का पालन किया है| तुम्हारी
कीर्ति युग-युगों तक अक्षय और अमर बनी रहेगी|"
द्रोणाचार्य ने द्रुपद की ओर देखते हुए कहा, "द्रुपद, मस्तक
उठाकर मेरी ओर देखो| अब तो मुझे पहचान रहे हो न?" पर
द्रुपद ने कोई उत्तर नहीं दिया| उसका
मस्तक झुका ही रह गया|
द्रोणाचार्य ने
द्रुपद की ओर देखते हुए पुन: कहा, "घबराओ
नहीं द्रुपद! मैं तुम्हारा अपमान नहीं करूंगा| अर्जुन!
इन्हें बंधन से मुक्त कर दो| द्रुपद, तुम
अपने को स्वतंत्र समझो|
तुम चाहे जहाँ जा
सकते हो|" अर्जुन ने द्रुपद को मुक्त कर दिया| द्रुपद
का मस्तक ऊपर नहीं उठा|
उसकी समझ में नहीं आ
रहा था कि वह द्रोणाचार्य की बात का क्या उत्तर दे, द्रोणाचार्य
के सामने से जाए तो किस ओर जाए? मनुष्य
जब अपने किए पर लज्जित हो जाता है, तो
उसका यही हाल होता है|
*****
मन्त्र की शक्ति
अर्जुन पर गुरुदेव जी की
विशेष कृपा है, यह बात द्रोणाचार्य जी के
अन्य शिष्यों को सहन नहीं होती थी। इसलिए, वे सब अर्जुन की
उपेक्षा करते थे । एक समय, द्रोणाचार्य
जी अर्जुन सहित अपने शिष्यों को
लेकर स्नान करने के लिए नदी पर
गए और वट वृक्ष के नीचे खड़े होकर बोले, ‘अर्जुन, मै आश्रम में
अपनी धोती भूलकर आया हूं। जाओ, तुम उसे लेकर आओ । गुर्वाज्ञा के
कारण अर्जुन धोती लाने के लिए आश्रम गया, उस समय गुरु द्रोणाचार्य जी ने
कुछ शिष्यों से कहा, ‘गदा एवं धनुष में शक्ति होती है; परंतु मंत्र में उससे अधिक शक्ति होती है। मंत्र जाप करने
वाले इसका महत्त्व एवं पद्धति समझ लें, तो मंत्र में अधिक सामर्थ्य होता है, यह बात वे समझ जाएंगे। मैं अभिमंत्रित एक ही बाण से इस वट
वृक्ष के सब पत्तियों को छेद सकता हूं । यह कहकर, द्रोणाचार्य जी ने भूमि पर एक मंत्र लिखा एवं उसी मंत्र से
अभिमंत्रित एक बाण छोडा। बाण ने वृक्ष के सभी पत्तों को छेद दिया। यह देखकर, सब शिष्य आश्चर्य में पड गए। इसके पश्चात गुरु
द्रोणाचार्य जी सब शिष्यों के साथ स्नान करने
गए। उसी समय अर्जुन धोती लेकर आया। उसकी दृष्टि वृक्ष की
पत्तियों पर पडी। वह सोचने लगा। इस वट वृक्ष की
पत्तियों पर पहले तो छेद नहीं थे। मैं जब सेवा करने गया था, उस समय गुरु देव जी ने
शिष्यों को एक रहस्य बताया था। यदि रहस्य बताया था, तो उसके कुछ सूत्र होंगे, प्रारंभ होगा, इसके चिह्न भी होंगे। अर्जुन ने
इधर-उधर देखा, तो उसे भूमि पर
लिखा हुआ मंत्र दिखाई दिए। वृक्षच्छेदन के सामर्थ्य से युक्त यह मंत्र अद्भुत है, यह बात उसके मन में समा गई। उसने यह
मंत्र पढना आरंभ किया। जब उसके मन में दृढ़ विश्वास उत्पन्न
हो गया कि यह मंत्र निश्चित सफल होगा, तब उसने धनुष पर बाण चढाया और
मंत्र का उच्चारण कर छोड दिया । इससे वट वृक्ष की
पत्तियों पर, पहले बने छेद के समीप दूसरा छेद
बन गया । यह देखकर अर्जुन को अत्यंत आनंद हुआ। गुरुदेव जी ने
अन्य शिष्यों को जो विद्या सिखाई,
वह मैंने भी सीख ली, ऐसा विचार कर, वह गुरुदेव जी को
धोती देने के लिए नदी की ओर चल पड़ा। स्नान से
लौटने के पश्चात जब द्रोणाचार्य जी ने
वट वृक्ष की पत्तियों पर
दूसरा छेद देखा, तो उन्होंने अपने
साथ के सभी शिष्यों से प्रश्न किया -
द्रोणाचार्य : स्नान से पहले वट वृक्ष की
सभी पत्तियों पर एक छेद था। अब दूसरा छेद आपमें से
किसने किया? सब शिष्य: हमने
नहीं किया। द्रोणाचार्य (अर्जुन
की ओर देखकर): यह कार्य तुमने किया है
क्या? (अर्जुन
कुछ डरा; परंतु झूठ कैसे
कहूं; इसलिए बोला) अर्जुन:
मैंने आपकी आज्ञा के बिना आपके मंत्र का
प्रयोग किया। क्योंकि, मुझे लगा कि आपने इन सबको यह विद्या सिखा दी है, तो आपसे इस विषय में
पूछकर आपका समय न गंवाकर अपने
आप सीख लूं। गुरुदेव जी, मुझसे चूक हुई हो, तो क्षमा कीजिएगा।
द्रोणाचार्य : नहीं अर्जुन, तुममें जिज्ञासा, संयम एवं सीखने की
लगन है। उसी प्रकार, मंत्र पर तुम्हारा
विश्वास है। मंत्र शक्ति का प्रभाव देखकर सब केवल चकित होकर
स्नान करने चले गए। उनमें से एक ने भी दूसरा छेद करने का विचार भी नहीं किया। तुम धैर्य
दिखाकर एवं प्रयत्न कर उत्तीर्ण हो गए। तू मेरा सर्वोत्तम शिष्य है। अर्जुन, तुमसे श्रेष्ठ धनुर्धर होना असंभव है।
शिष्य इतना जिज्ञासू हो कि गुरु का अंतः करण
अभिमान से भर जाए!
*****
सदा सत्य बोलो का पाठ
यह
उन दिनों की बात है जब पांडव तथा कौरव शिक्षा ग्रहण कर रहे थे| एक दिन आचार्य ने
उन्हें एक पाठ पढ़ाया, जिसका शीर्षक था ‘सदा सत्य बोलो|’ दूसरे दिन आचार्य के पूछने
पर कि क्या कल का पाठ याद हो गया? सबने उत्तर दिया कि जी हाँ, आचार्य जी पाठ याद
हो गया है, परन्तु धर्मराज युधिष्ठिर मौन खड़े रहे, उन्होंने उत्तर न दिया| आचार्य
ने पूछा- ‘युधिष्ठिर क्या तुम्हें पाठ याद नहीं हुआ? धर्मराज युधिष्ठिर ने उत्तर दिया- ‘जी
नहीं|’ आचार्य जी बोले- ‘अच्छा कल अवश्य याद करके आना|’ तीन-चार दिन तक निरंतर ऐसा
ही होता रहा कि आचार्य के पूछने पर युधिष्ठिर यही उत्तर देते कि पाठ अभी याद नहीं
हुआ| जब आचार्य उन पर अत्यंत क्रोधित हुए तो युधिष्ठिर ने विन्रमता से उत्तर दिया-
आचार्य आप क्रोधित न हो| यदि आपका अभिप्राय पाठ को मात्र कंठस्थ करने से है, तो
फिर मुझे पाठ अच्छी तरह कठंस्थ है| आप आदेश दे तो अभी पूरा पाठ सुना सकता हूँ|
किन्तु मेरे विचार में मात्र कठंस्थ कर लेने से ही पाठ याद नहीं हो जाता| मुझे पाठ
भली-भाँति याद हो गया है यह तो मैं तभी समझूंगा जब मैं इन शब्दों का ‘सदा सत्य बोलो’ अपने जीवन में पूरी तरह
अंगीकरण कर लूँगा, उन्हें हृदय से अपना लूँगा, उन्हें आचरण में ले आऊंगा| धर्मराज
युधिष्ठिर का उत्तर सुनकर आचार्य अति प्रसन्न हुए और बोले- वत्स| पाठ तो वास्तव में तुम्ही ने पढ़ा है|
शेष सबने तो उसे तोते की तरह रटा ही है| ठीक इसी प्रकार शास्त्रों को केवल पढ़ लेने
से अथवा उन्हें कंठस्थ कर लेने से ही कोई विद्वान अथवा पंडित नहीं बन जाता|
शास्त्रों का पढ़ना तो तभी सार्थक है जब शास्त्रों के तत्व अथवा सार का, जोकि प्रभु
प्रेम है, जीवन में पूरी तरह अंगीकरण कर लिया जाए अर्थात अपने हृदय को प्रभु प्रेम
में पूरी तरह रंग लिया जाए| जिसने ऐसा कर लिया अर्थात जिसने हृदय में भगवान का
अनन्य प्रेम बसा लिया, ऐसा सच्चा प्रेमी ही वास्तव में पंडित अथवा शास्त्रों का
ज्ञाता कहलाता है, संतो का कथन है कि
रैन
दिवस पौथी पड़े, सो नहीं पंडित होय
प्रभु प्रेम हिये उपजे, पंडित कहाए सोये||
*****
अंग देश का राजा कर्ण
राजकुमारों का प्रशिक्षण पूरा होने के उपरांत भीष्म ने एक
खेल-कूद प्रतियोगिता का आयोजन किया| हस्तिनापुर की सीमा पर एक विशाल रंग मंडप
बनाया गया| इसमें राजकुमारों
ने हस्तिनापुर निवासियों को अपनी धनुर्विद्या का परिचय दिया| अर्जुन का कौशल देखकर सबने दाँतों तले उंगली दबा
ली| अर्जुन हवा में
अग्निबाण चलाकर ज्वाला प्रज्वलित कर सकते थे;
आग की लपटों को शांत करने के लिए वे
वरुण बाण का प्रयोग करना जानते थे और वायु द्वारा आकाश के बादलों को हटा भी सकते
थे| प्रशंसा के बोल सब तरफ गूँज ही रहे थे कि उसी
समय एक नवयुवक आगे आया और अर्जुन को ललकार कर बोला, "अर्जुन, तुमने जो कला दिखाई है, उसमें मैं भी पारंगत हूँ| मैं तुम्हें दिखा सकता हूँ कि मैं तुमसे अधिक
उच्चकोटि का धनुर्धारी हूँ|"
इन शब्दों को सुनकर सभी दर्शक स्तब्ध रह गए| कौन था यह सुन्दर, तेजस्वी, वीर युवक? वह था- कुंती-पुत्र कर्ण
जिसे कुंती ने तुरन्त पहचान लिया| परन्तु वह कुछ बोल न पाई| कर्ण जैसे ही अपनी कुशलता दिखाने के
लिए आगे बढ़ा, कुल गुरु
कृपाचार्य बोले,
"अर्जुन राजकुँवर है| उसके स्पर्धी को भी अपना कुल-गोत्र
बतलाना होगा| नवयुवक ने उत्तर दिया, "मैं कर्ण हूँ|" इससे अधिक कुछ कहना
सूतपुत्र कर्ण के लिए संभव नहीं था| कर्ण अपने पिता का नाम प्रकट नहीं कर पाया, इसलिए अर्जुन ने उसके साथ स्पर्धा से
इनकार कर दिया| ठीक उसी समय दुर्योधन कर्ण की सहायता
के लिए आगे बढ़ा| अर्जुन को नीचा
दिखाने का अच्छा अवसर देखकर दुर्योधन ने घोषणा की, "मैं इस नवयुवक को अंग
देश का राजा नियुक्त करता हँ| अर्जुन! अब तुम इससे प्रतियोगिता कर सकते हो| यदि
तुम राजकुमार हो तो यह राजा है|"
तभी वृद्ध सारथी, कर्ण को ले जाने के लिए वहाँ आ पहुँचा| इस तरह सबको ज्ञात हो गया कि कर्ण
सारथी-पुत्र था| भला सूतपुत्र को राजकुमारों के समान स्थान कैसे मिलता! अतः कर्ण
बोझिल मन से, सिर झुकाए, रंग भूमि छोड़कर चला गया| वह
हृदय से अर्जुन से घृणा करने लगा| दुर्योधन
ने भरी सभा में उसका पक्ष लिया था इसलिए उसके प्रति कर्ण सदैव आभारी रहा| कर्ण
ने सोचा, "यदि कभी दुर्योधन को मेरी सहायता की आवश्कता
होगी, मैं
उसकी अवश्य मदद करूंगा और
अवसर मिलने पर अर्जुन का वध करूंगा|"
*****
परशुराम जी द्वारा कर्ण को श्राप
द्वापर
युग में कौरवों -पांडवों की आपस में जब पटती नहीं थी तब कौरव दल के ह्रदय में ईर्ष्या
के बीज अंकुरित (पैदा) होने लगे जिससे वे भीतर ही भीतर पांडवों से युद्ध करने की
तैयारियों में जुट गए| अर्जुन तो उन्हें कांटे की तरह चुभता था क्योंकि
द्रोणाचार्य जी ने अर्जुन को शस्त्र – विद्या
में अच्छी तरह से पारंगत (होशियार) किया था| अर्जुन के इस शस्त्र विद्या कौशल को
देखकर कौरव ईर्ष्या व घृणा की अग्नि से सुलगते रहते थे| कौरव दल में उसके समान शस्त्र
–विद्या में अन्य कोई भी प्रवीण न था| अत: उन्होंने वीर कर्ण को श्री परशुराम जी
से धनुर्विद्या सिखने के लिए प्रेरित किया जिसके बल से वे पांडवों को पराजित कर अपनी
ईर्ष्या को शांत कर सके| श्री परशुराम जी ब्राह्मण थे, वे धनुर्विद्या अच्छी तरह
से जानते थे| पहले तो वे सभी वर्णों को धनुर्विद्या सिखाया करते थे किन्तु एक बार
किसी क्षत्रिय द्वारा उनका अपमान हो जाने से उन्होंने ये प्रण किया था की मैं किसी
भी क्षत्रिय को शस्त्र विद्या नहीं सिखाऊँगा|
इस बात से सभी परिचित थे कि श्री परशुराम जी क्षत्रिय वंश को शस्त्र विद्या तो सिखाने
से रहे| फिर भी कर्ण को शिक्षा ग्रहण तो करनी थी| अत: उसने ब्राह्मण का वेश बनाया
और परशुराम जी के द्वार पर जा उपस्थित हुआ| जब वीर कर्ण श्री परशुराम जी के पास
पंहुँचा और उसने शस्त्र विद्या सिखने की इच्छा प्रकट की| तब परशुराम जी ने उससे
उसका वर्ण व नाम पूछा| वीर कर्ण ने अपना नाम एवं वर्ण बदलकर अपने को एक ब्राह्मण
परिवार का सदस्य बताया| ब्राह्मण कुल में उत्पन्न जान तथा वीरों से अकार प्रकार को
देख कर परशुराम जी ने उसको विद्या देना स्वीकार कर लिया| अब वीर कर्ण श्री परशुराम
जी के पास रह कर धनुर्विद्या सीखने लगा| वह अत्यंन्त श्रद्धा भाव से उनकी सेवा
करता था परन्तु उसके दिल में हर समय यह शंका रहती थी कि कहीं गुरुदेव को मेरी
वास्तविकता का पता न लग जाए की मैं क्षत्रिय वंश का हूँ| श्री परशुराम जी ने तो
उसके कथन पर विश्वास कर लिया था और समझ लिया था की वास्तव में यह क्षत्रिय वर्ण का
ही है| हार्दिक भावना से उसे धनुर्विद्या सिखाते रहे और वीर कर्ण धनुर्विद्या में
जब अच्छी तरह निपुण हो गया तब एक बार का वृतांत है कि श्री परशुराम जी को कही अन्य
स्थान पर जाना था| उस समय वह अपने साथ वीर कर्ण को भी ले गए| यात्रा करते -2 दोपहर
होने को आई| तब वह कही जंगल में किसी वृक्ष की छाया में विश्राम करने के लिए रुक
गए| कर्ण ने अपनी चदर श्री परशुराम जी के नीचे बिछा दी| भोजन करने के पश्चात्
परशुराम जी को जब नींद आने लगी तब उन्होंने वीर कर्ण से कहा कि ‘सिर के नीचे रखने
के लिए एक पत्थर तो ले आओ|”
तब वीर कर्ण ने विनय की कि ‘गुरदेव आप मेरी जांघ पर सिर रख कर विश्राम कर लीजिये|”
श्री परशुराम जी ने अपनी स्वीकृति दे दी और विश्राम में हो गए| गहरी निद्रा के आने
पर एक भयंकर ‘दंदशूक’ नाम का कीट उधर आया और उसने कर्ण के पाँव में जोर से काट
लिया| वह डंक इतना पचंद था की खून की धारा बह निकली| तब वीर कर्ण ने दिल में सोचा
की यदि मैं पाँव को हिलाता हूँ तो गुरु जी के आराम में बांधा पहुँचेगी अत: वह पीड़ा
को अगाध धैर्य से सहन करता हुआ स्थिर बैठा रहा| कुछ देर बाद जब परशुराम जी की आँख
खुली तो क्या देखा की कर्ण का पाँव खून से लथपथ हुआ पड़ा है| उन्होंने पूछ लिया की
यह क्या हुआ?’ तब कर्ण ने कहाँ – ‘भगवन कुछ नहीं एक कीड़े ने काट लिया है, मैंने
आपको सोया हुआ जान अपनी जांघ को हिलाना उचित नहीं समझा|’ यह बात सुनकर श्री परशुराम जी ने कहा कि
एक बात पुछूँ| सच -2 बताना की
तुम वास्तव में कौन हो? तुम ब्राह्मण नहीं हो क्योंकि ब्राह्मण तो इतनी पीड़ा को
सहन नहीं कर सकता| तुम्हारे पाँव से इतनी अधिक रक्त की धारा बह रही है, परन्तु
तुमने चूँ तक नहीं की| इस अगाध धैर्य को देख कर मुझे तो क्षत्रिय वंश के ही प्रतीत
हो रहे हो| यह सुनकर कर्ण को मानो साँप सूँघ गया और विवश होकर उसे अपना वास्तविक
परिचय देना पड़ा की ‘गुरुदेव |
मैं कुरु –कुल में उत्पन्न कर्ण हूँ –क्षत्रिय मेरा वर्ण है | शस्त्र विद्या सीखने
के स्वार्थ से ही मैंने आपके समक्ष असत्य बोला है क्योंकि आपके इस प्रण को मैं सुन
चुका था कि मैं क्षत्रियों से समस्त भू मंडल को खाली कर दूँगा| इसलिए मैंने अपने
वर्ण व नाम को आपसे गुप्त रखा| इस पर परशुराम जी ने कहा कि तुमने मुझे गुरु कह कर
मेरे साथ धोखा किया है| गुरु से छल करने वाले शिष्य का कभी भला नही होता| यह विद्या
जो कि तुमने मेरे यहाँ से पाई है तुम्हारे किसी काम न आएँगी| यह कहकर उसी समय
परशुराम ने कर्ण को विदा कर दिया और साथ ही अपनी तरफ से सेवा के फलस्वरूप पांच बाण
दे दिए जिससे की बड़े -2 शत्रुओं को मारा जा सकता था| आचार्य का वचन किसी भी दशा
में टल नहीं सकता चाहे कुछ भी हो जाए| वीर कर्ण का भी यही हाल हुआ उसे इस धनुर्विद्या
व गुरु द्वारा दिए गए बाणों से कुछ लाभ न प्राप्त हुआ| महाभारत का युद्ध शुरू होने
से पूर्व ही कर्ण की माता कुंती ये पांच बाण भिक्षा में माँग कर ले गई| परिणाम यह
हुआ की अर्जुन और वीर कर्ण के युद्ध में कर्ण अर्जुन द्वारा उन्ही बाणों से मारा
गया|
*****
कर्ण
की दानवीरता
महादानी कर्ण का
नाम दान के लिए स्वर्णाक्षरों में इतिहास में अंकित है| वह दान किये बिना भोजन
ग्रहण नहीं करता था| दान उसके जीवन का अभिन्न अंग था| दान उसका स्वभाव था| दान की
आदत उसका नियम था| जिसकी ऐसी आदत बन जाए तथा जीवन का अभिन्न अंग बन जाए तो वह इसके
बिना जी नहीं सकता| ऐसे ही एक बार इन्द्रप्रस्थ में पांडवों की सभा में भगवान श्री
श्याम सुंदर ने कर्ण की दानवीरता की प्रशंसा इस प्रकार की- कि कर्ण कौरवों के मध्य
रहता हुआ भी दानवीर है दान उसका स्वभाव बन गया है और दानी कर्ण के नाम से जाना
जाता है| उसका भाग्य सितारा ही दान है आदि आदि| पांडवों के बीच बैठे श्री कृष्ण जी
कौरवों के साथी की प्रशंसा करे| यह अर्जुन को कब बर्दाश्त था? उसने पूछा कि
युधिष्ठिर में किस गुण की कमी है? श्री कृष्ण जी ने समझाते हुए कहा – अर्जुन, मैं
तो उसके स्वभाव की प्रशंसा कर रहा हूँ न की उसकी| वह दान का आदी है| इसी दान से वह
विख्यात है| गुणों का समावेश और आदत बनना अलग-2 पहलू है| थोड़े समय में तुम अपने आप
कह उठोगे सच है केशव, जो आप कहते हैं सब सच है| थोड़े समय पश्चात श्री कृष्ण जी ने
एक लीला रचाई| उन्होंने स्वयं ब्राह्मण का वेश धारण किया और अर्जुन को साथ लेकर पांडवों
कें राजमहल में पधारे| उधर जोरों से वर्षा हो रही थी| ऐसी वर्षा की जिसने नगर में
थल को जल से भर दिया था| भगवान आये और युधिष्ठिर से कहा राजन, मैं अपने हाथों से
भोजन बनाकर खाता हूँ| भोजन बनाने में चन्दन की लकड़ी जलाता हूँ| मुझे आटा, घी आदि
दीजिए और ध्यान रहे चन्दन की लकड़ी गीली नहीं होनी चाहिए, ऐसा प्रबंध करिये| एक
विप्र युधिष्ठिर के द्वार पर आया है और उसकी मनोकामना पूर्ण करना उसका कर्तव्य
था| राजा ने पूरे राजमहल में तथा सारे नगर
में नौकर- चाकर, सेवक सूखी लकड़ी लाने का प्रबंध करने के लिए भेज दिए| यह तो उनकी
अपनी एक लीला थी| युधिष्ठिर ने विनय
की विप्रवर| यदि आज्ञा हो तो कुछ लकड़ियों को सूखाकर दे दूँ| थोड़ा समय प्रतीक्षा
करनी पड़ेगी| ‘राजन|- हमारा मनोरथ आप
सिद्ध नहीं कर पाए इसलिए हम यहाँ से चलते हैं - श्री कृष्ण जी ने विप्र रूप में उत्तर
दिया| वहाँ से वे सीधा कर्ण के राजमहल के द्वार पर पहुँचे और यहाँ अपना मनोरथ
दोहराया| हमें अपने हाथ से बनाया भोजन अभीष्ट है| कर्ण, चन्दन की सूखी लकड़ी जो
तनिक भी भीगी न हो, वह हमें जलने के लिए चाहिए| यदि चाहो तो विप्र की माँग को पूरा
करो| कर्ण ने कहा- ‘ब्राह्मण देव अवश्य आइये यह कौन से बड़ी माँग है?’ सेवकों को
नगर में भेजा परन्तु यही खबर मिली कि कही भी एक भी लकड़ी सूखी नहीं पाई सब कुछ गीला
हो चुका है| कर्ण ने कहा- ‘ठीक है नगर में वर्षा होने से ईंधन गीला हो चुका है,
परन्तु राजमहल में तो सब कुछ सूखा है| राजमहल के किवाड़ उसमे पड़े पलंग तथा अन्य कई
समान सब चन्दन के बने है| यह यदि मेरे अतिथि के काम आ जाये तो मेरा सौभाग्य|’ कर्ण
ने धनुष उठाया और पल भर में उनको लकड़ियों के रूप में बदल दिया| ‘और कहा लीजिए
ब्राह्मण देव, यह बिल्कुल सूखी लकड़ी है| शीघ्र भोजन बनाये|’ अब प्रभु अपने वचन में
बन्ध गए| बैठकर भोजन बनाया और तृप्त होकर वहाँ से बाहर आये| अर्जुन से कहा- ‘अब
बताओ अर्जुन| युधिष्ठिर के गुण और कर्ण के गुण की स्वयं तुलना कीजिये| क्या
युधिष्ठिर के राजमहल के द्वार, सामान अथवा अन्य वस्तुए कुछ भी चन्दन का न था? उसे
यह समझ क्यों नहीं आई कि यदि नगर से चन्दन नहीं मिला तो वह स्वयं ही चन्दन दे
देता| कर्ण का स्वभाव दान करने का बन चुका है| वह अपने स्वभाव वश दानी है| उसी
प्रवृति ने उसे राजमहल के सामान को लकड़ियों का रूप बनाने के लिए मजबूर किया और
उसने मूल्यवान कलाकृतियों कों भी नष्ट कर दिया| दान धर्म उसके प्राण का अभिन्न अंग
बन गए है|’ अर्जुन को ज्ञात हुआ और राजप्रसाद में कर्ण वीर की दानशीलता की बात
स्मरण हो आई| उसने संकोच व लज्जा से सिर झुका लिया और कहा- ‘माधव आपने किसी गुण को
आदत बनाना – इस सत्य का रहस्य दर्शा दिया
*****
राजसूय यज्ञ में श्री कृष्ण सेवा
एक बार युधिष्ठिर ने राजसूर्य यज्ञ करवाया| बहुत-से लोगों को आमंत्रित किया| भगवान श्री कृष्ण भी आए| उन्होंने युधिष्ठिर से कहा - "सब लोग काम कर रहे हैं| मुझे भी कोई काम दे दीजिए|" युधिष्ठिर ने उनकी ओर देखकर कहा - "आपके लिए हमारे पास कोई काम नहीं है|" श्री कृष्ण बोले - "लेकिन मैं बेकार नहीं रहना चाहता|
मुझे कुछ-न-कुछ काम तो दे ही दीजिए|" युधिष्ठिर ने कहा - "मेरे पास तो कोई काम है नहीं| यदि आपको कुछ करना ही है तो अपना काम आप स्वयं तलाश कर लीजिए|" श्री कृष्ण बोले - "ठीक है मैंने अपना काम खोज लिया|" युधिष्ठिर ने उत्सुकता से पूछा - "क्या काम खोज लिया?" कृष्ण ने कहा - "मैं सबकी जूठी पत्तलें उठाऊंगा और सफाई करूंगा|" यह सुनकर युधिष्ठिर अवाक् रह गए| कृष्ण ने वही किया| सेवा से बढ़कर और क्या हो सकता है|
*****
अंधे का पुत्र अँधा
पांडवों ने
इन्द्रप्रस्थ में जब राजसूर्य यज्ञ का आयोजन किया तो अन्य राजाओं के साथ कौरवों कों
भी निमंत्रण भेजा| इन्द्रप्रस्थ में ऐसी कारीगरी की थी कि आँखों को धोखा हो जाता
था| मनुष्य जल को थल और थल को जल समझ बैठता था, दीवार को द्वार और द्वार को दीवार
समझकर धोखा खा जाता था| यज्ञ के पश्चात पांडव दुर्योधन को इन्द्रप्रस्थ दिखाने के
लिए बुलाने लगे| वहाँ की कला ऐसी थी कि दुर्योधन भी धोखा खा गया| एक जगह पर जल-सा
प्रतीत हुआ और दुर्योधन ने धोती को ऊपर कर लिया लेकिन भीम ने बताया कि यहाँ फर्श
है| दूसरी जगह जल था तो दुर्योधन ने समझा फर्श होगा तो वह जल में जा गिरा यह देख
कर पांडव हँसने लगे| आगे चल कर दीवार थी जो कि द्वार की तरह लग रही थी वहाँ
दुर्योधन जाने लगा तो उसका सिर टकरा गया और वह दीवार से जा टकराया| द्रोपदी वही छत
पर खड़ी बाल सुखा रही थी तो उसने दुर्योधन
को ताना मारा कि अंधे की औलाद भी अंधी हुआ करती है| यह शब्द दुर्योधन को तीर की
तरह चुभे| उसने मन-ही-मन प्रतिज्ञा की कि यदि तुझे बालों से खींच कर अपनी राजसभा
में न बुलवाया और भरी सभा में तुझे अपमानित न किया, तो मेरा नाम दुर्योधन नहीं|
फिर उसने पांडवों के साथ जुआ खेला और द्रोपदी को जुएँ में जीत लिया| तथा उसे
घसीटते हुए राजसभा में बुलवाया| तभी भीम ने प्रतिज्ञा ली कि दुर्योधन का वध करेगा,
उसके बाद सब जानते हैं| कहने का मतलब यह है कि इस विनाशकारी महायुद्ध का कारण
द्रोपदी के वचन हुए जो उसने दुर्योधन को कहे थे| इसलिए हमेशा सोच समझ कर बोलना
चाहिए ताकि कही किसी को बुरा ना लगे| बाद में वही चीज कितनी बढ़ जाती है|
*****
द्रुपद
सुता का प्रेम समर्पण
एक
बार भगवान श्री कृष्णचन्द्र जी अपनी पटरानियों सहित बैठे थे| सखियाँ परस्पर एक
दूसरे के प्रेम की स्पर्धा सहित प्रशंसा
कर रही थी| भगवान कृष्ण चाकू से कोई फल काट रहे थे, साथ ही उनकी प्रेम वार्ता
सुन-2 कर मुस्करा भी रहे थे| उनके प्रेम की परीक्षा लेने हेतु एवं संसार में प्रेम
का अनुपम आदर्श स्थापित करने के लिए उन्होंने स्वयं चाकू से अपने हाथ की अँगुली पर
थोड़ा सा जख्म कर दिया, जिससे रक्त की धारा बह निकली| यह देख सब इधर-उधर भागने लगी-
कोई दवा लेने को भागी- कोई हाथ दबाने लगी इत्यादि| प्रेम प्रतिमा द्रुपद सुता भी
वही उपस्थित थी| जब उसने देखा कि मधुसूदन की अँगुली से लहू निकलता जा रहा है तो झट
से अपनी धारण की हुई बहुमूल्य साड़ी में से कुछ कपड़ा फाड़ दिया और उसे जलाकर उस घाव
पर लगाकर ऊपर से पट्टी बाँध दी| उसका ऐसा त्याग व् सच्चा प्रेम देखकर भगवान
मुस्कराते हुए वचन फरमाने लगे- ‘द्रोपदी, तू कितनी नादान है, साधारण से जख्म के
लिए हजारों की कीमत रखने वाली साड़ी को तूने व्यर्थ ही फाड़ दिया| यह तनिक-सा घाव
था- साधारण चिकित्सा करवाने से ही ठीक हो जाता|’ भगवान के मुख से यह वचन श्रवण कर
उसके नेत्र से आँसू आ गए | अंत में भगवान
श्री कृष्ण चन्द्र जी ने द्रोपदी को एक साड़ी के बदले कई साड़ियाँ प्रदान की जिससे
सर्वसाधारण परिचित ही है|
*****
श्री कृष्ण द्वारा
द्रौपदी की रक्षा करना
संसार में प्राय: देखा जाता है कि यदि कोई मनुष्य किसी
दुःख, कष्ट, विपदा आदि मे घिर जाता है तो उससे
छुटकारा पाने के लिए सम्बंधियों एवं मित्रों आदि से सहायता की आशा रखता है जो
स्वयं असहाय है| तनिक विचार करो कि
जो स्वयं ही असहाय है उनसे यह आशा रखना कि वे दुःख-कष्ट दूर कर देंगे, क्या भूल नहीं है? जो स्वयं ही असहाय है, वे भला दूसरे की क्या सहायता कर सकेंगे? द्रौपदी की ही मिसाल लो| जब दुर्योधन के कहने से दुशासन द्रोपदी
के केशों को पकड़कर घसीटता हुआ दरबार में ले आया और दुर्योधन के ही आदेश से द्रौपदी
को भरे दरबार में अपमानित करने लगा तो उस महान विपदा की घड़ी में द्रौपदी ने
सर्वप्रथम पांडवों की ओर देखा, क्योंकि
उनके बाहुबल पर उसे बहुत विश्वास था| किन्तु
जब वे नीची नजर करके चुप बैठे रहे, तो
फिर द्रौपदी ने भीष्म पितामह और आचार्य द्रौण आदि बुजुर्गो की ओर इस आशा से देखा
कि शायद वे इस मुश्किल की घड़ी में सहायता करे| परन्तु जब उन्होंने भी आँखे झुका ली तो
फिर अन्य सभासदों की ओर कायर दृष्टि से देखा|
सब ओर से निराश होकर अतत: उसने अति व्याकुल होकर भगवान को याद
किया तो भगवान तुरंत उसकी सहायता को पहुँच गये और उसकी लाज बचाई| सत्पुरुष श्री गुरु तेग बहादुर जी महाराज
इस विषय में कथन करते है कि|
पंचाली कउ राज सभा मैं राम नाम सुधि आई|
ता को दुःख हरिओ करुना मैं अपनी पैज
बढाई||
अर्थात कौरवों की राजसभा में जब
द्रौपदी ने प्रभु नाम का सुमिरन किया, तो
करुणामय प्रभु ने अपने विरद की लाज रखते हुए उसके दुःख का तुरंत हरण किया|
*****
हिडिम्बा
का विवाह
सुरंग
के रास्ते लाक्षागृह से निकल कर पाण्डव अपनी माता के साथ वन के अन्दर चले गये। कई
कोस चलने के कारण भीमसेन को छोड़ कर शेष लोग थकान से बेहाल हो गये और एक वट वृक्ष के
नीचे लेट गये। माता कुन्ती प्यास से व्याकुल थीं इसलिये भीमसेन किसी जलाशय या
सरोवर की खोज में चले गये। एक जलाशय दृष्टिगत होने पर उन्होंने पहले स्वयं जल पिया
और माता तथा भाईयों को जल पिलाने के लिये लौट कर उनके पास आये। वे सभी थकान के
कारण गहरी निद्रा में निमग्न हो चुके थे अतः भीम वहाँ
पर पहरा देने लगे| इधर अपनी बहन को लौट कर आने में विलम्ब होता देख कर हिडिम्ब उस
स्थान में जा पहुँचा जहाँ पर हिडिम्बा भीमसेन से वार्तालाप कर रही थी। हिडिम्बा को
भीमसेन के साथ प्रेमालाप करते देखकर वह क्रोधित हो उठा और हिडिम्बा को दण्ड देने
के लिये उसकी ओर झपटा। यह देख कर भीम ने उसे रोकते हुये कहा, "रे
दुष्ट राक्षस! तुझे स्त्री पर हाथ उठाते लज्जा नहीं आती? यदि
तू इतना ही वीर और पराक्रमी है तो मुझसे युद्ध कर।" इतना कह कर भीमसेन ताल
ठोंक कर उसके साथ मल्ल युद्ध करने लगे। कुन्ती तथा अन्य पाण्डव की भी नींद खुल गई।
वहाँ पर भीम को एक राक्षस के साथ युद्ध करते तथा एक रूपवती कन्या को खड़ी देख कर
कुन्ती ने पूछा, "पुत्री! तुम कौन हो?" हिडिम्बा
ने सारी बातें उन्हें बता दी। अर्जुन ने
हिडिम्ब को मारने के लिये अपना धनुष उठा लिया किन्तु भीम ने उन्हें बाण छोड़ने से
मना करते हुये कहा, "भैया! आप बाण मत छोड़िये, यह
मेरा शिकार है और मेरे ही हाथों मरेगा।" इतना कह कर भीम ने हिडिम्ब को दोनों
हाथों से पकड़ कर उठा लिया और उसे हवा में अनेकों बार घुमा कर इतनी तीव्रता के साथ भूमि पर पटका कि उसके प्राण-पखेरू उड़ गये। हिडिम्ब के मरने पर वे लोग वहाँ से प्रस्थान की तैयारी करने लगे, इस
पर हिडिम्बा ने कुन्ती के चरणों में गिर कर प्रार्थना करने लगी, "हे
माता! मैंने आपके पुत्र भीम को अपने पति के रूप में स्वीकार कर लिया है। आप लोग
मुझे कृपा करके स्वीकार कर लीजिये। यदि आप लोगों ने मझे स्वीकार नहीं किया तो मैं
इसी क्षण अपने प्राणों का त्याग कर दूँगी।" हिडिम्बा के हृदय में भीम के
प्रति प्रबल प्रेम की भावना देख कर युधिष्ठिर बोले, "हिडिम्बे!
मैं तुम्हें अपने भाई को सौंपता हूँ किन्तु यह केवल दिन में तुम्हारे साथ रहा
करेगा और रात्रि को हम लोगों के साथ रहा करेगा।" हिडिम्बा इसके लिये तैयार हो
गई और भीमसेन के साथ आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगी। एक वर्ष व्यतीत होने पर
हिडिम्बा का पुत्र उत्पन्न हुआ। उत्पन्न होते समय उसके सिर पर केश (उत्कच) न होने
के कारण उसका नाम घटोत्कच रखा गया। वह अत्यन्त मायावी निकला और जन्म लेते ही बड़ा
हो गया। हिडिम्बा
ने अपने पुत्र को पाण्डवों के पास ले जा कर कहा, "यह
आपके भाई की सन्तान है अतः यह आप लोगों की सेवा में रहेगा।" इतना कह कर
हिडिम्बा वहाँ से चली गई। घटोत्कच श्रद्धा से पाण्डवों तथा माता कुन्ती के चरणों
में प्रणाम कर के बोला,
"अब मुझे मेरे योग्य
सेवा बतायें।? उसकी बात सुन कर कुन्ती बोली, "तू
मेरे वंश का सबसे बड़ा पौत्र है। समय आने पर तुम्हारी सेवा अवश्य ली जायेगी।"
इस पर घटोत्कच ने कहा,
"आप लोग जब भी मुझे
स्मरण करेंगे, मैं आप लोगों की सेवा में उपस्थित हो जाउँगा।" इतना कह कर
घटोत्कच उत्तराखंड की ओर चला गया।
*****
सर्प द्वारा
युधिष्ठिर से प्रश्न
एक बार वन में घूमते हुए महाबली भीमसेन
को एक बहुत बड़े सर्प ने अपने शिकंजे में जकड़ लिया| भीमसेन ने उससे छुटकारा प्राप्त करने
का बहुत प्रयास किया, परन्तु
उस सर्प के आगे उसकी एक न चली|
कुछ देर के उपरान्त भीमसेन को ढूँढ़ते हुए जब धर्मराज युधिष्ठिर वहाँ पहुँचे, तो भीमसेन को सर्प के शिकंजे में देखकर
चकित रह गए| उन्होंने भीम के
प्राणों की रक्षा के लिए सर्प से विनय की|
सर्प ने कहा- आप पहले मेरे कुछ प्रश्नों के उत्तर दे, तब में भीम को छोड़ूगा| युधिष्ठिर ने कहा- "आप प्रश्न
पूछिये, मैं उनके उत्तर देने का प्रयास करूंगा"| सर्प ने युधिष्टर से कई प्रश्न पूछे
जिनका युधिष्ठिर ने यथोचित उत्तर दिया|
यह प्रसंग महाभारत ग्रन्थ में है|
यह उदाहारण स्वरूप दो प्रश्न और उनके उत्तर दिए जा रहे है| सर्प ने पूछा- ब्राह्मण: को भवेद राजन
वेध कि च युधिष्ठिर| अर्थ- " राजा युधिष्ठिर| यह बताओ कि ब्राह्मण कौन है और उसके
लिए जानने योग्य तत्व क्या है?
उसका पहला प्रश्न था कि ब्राह्मण कौन है?
उत्तर में युधिष्ठिर ने कहा-
सत्यं दानं श्रमा शीलमानशस्यं तपो दया|
दृश्यन्ते यत्र नागेंद्र स ब्राह्मण
ईति स्मृत:||
अर्थ - "हे नागराज| जिसमे सत्य, दान, क्षमा, सुशीलता, अकूरता, तपस्या और दया- ये सद्गुण दिखाई दे, वही ब्राह्मण कहा गया है"|
सर्प का दूसरा प्रश्न था कि जानने
योग्य तत्व क्या है? इसका उत्तर युधिष्ठिर
ने इन शब्दों में किया-
वेधं सर्प परंब्रह्म निर्दु:खमसुखं च
यत|
यत्र गत्वा न शोचान्ति भवत: कि
विवश्रतम||
अर्थ- "हे सर्प| जानने योग्य तत्व तो परब्रहम ही है जो
दुःख और सुख से परे है तथा जिसे जानकर अथवा जहाँ पहुँचकर मनुष्य शोक के पार हो
जाता है| इस प्रकार के
प्रश्न पूछे उस सर्प ने और धर्मराज युधिष्ठिर ने उनका सम्यक उत्तर दिया| तत्तपश्चात युधिष्ठिर ने भी सर्प से
कुछ धर्म सम्बंधी प्रश्न किये, जिन
का सर्प ने यथोचित उत्तर दिया|
तब युधिष्ठिर ने सर्प से पूछा कि इतने विद्वान और ज्ञानवान् होने पर भी आपको सर्प
की योनि किस कारण प्राप्त हुई?
सर्प ने उत्तर दिया- युधिष्ठिर|
मैं पूर्व जन्म में तुम्हारा पूर्वज था और संसार में राजा नहुष के नाम से विख्यात
था| यज्ञ, तप तथा अन्य अनेक प्रकार के शुभ कर्म
करने से मुझे तीनों लोकों का ऐश्वर्य प्राप्त हो गया जिससे मेरा अहंकार बहुत बढ़
गया| अहंकार के वशीभूत
होकर मैं किसी को कुछ नहीं समझता था|
यहाँ तक कि मैं ऋषियों- मुनियों से अपनी पालकी उठवाने लगा| ऋषि-मुनि यद्यपि सहनशीलता की प्रतिमा
होते है, पर सहनशीलता की भी
एक सीमा होती है| "एक
बार की बात है कि मुनिवर अगस्त जी से मैंने पालकी उठवा रखी थी, तो उस समय अहंकार के वशीभूत होकर
मैंने उन्हें लात मारी|
तब मुनि अगस्त जी ने मुझे श्राप दिया- अहंकार के वश होकर तू हर समय सर्प की तरह
फुंकारता रहता है, अत: सर्प होकर
नीचे गिर| उनके मुख से यह वचन
निकलने की देर थी कि मेरे सारे राज चिह्न लुप्त हो गये| उस समय मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि मानो
मैं सर्प के रूप में मुँह नीचे किये गिर रहा हूँ| सर्प के रूप में अपने आपको नीचे गिरते
देखकर मेरा सारा अहंकार चूर हो गया|
मैंने मुनि अगस्त जी से अपने कुकृत्यों के लिए क्षमा माँगी और श्राप से मुक्ति की
याचना की| मेरे क्षमा - याचना करने से कृपालु मुनि जी बोले-
धर्मराज युधिष्ठिर से वार्तालाप होने पर तुम इस श्राप मुक्त हो जाओगे| संसार में आम तौर पर लोगों की यही हालत है कि
जरा-जरा सी बात पर
अहंकार करने लगते है और अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझते| इस अहंकार के कारण दु:खी भी होते हैं
और अन्त में पतन के गर्त में भी जा गिरते है|
मनुष्य स्वयं विचार करे कि वह जो धन-सम्पदा का शारीरिक बल का, सुन्दरता का, राज्य-वैसर का, पदधिकार का अथवा किसी अन्य
वस्तु का अहंकार करता है,
तो क्या यह उचित है? कदापि नहीं ; क्योंकि यह सब तो परमात्मा की देन है| यदि वह चाहे तो पलक झपकते ही वापस भी
ले जा सकता है| बड़े-बड़े धनी देखते ही देखते दर-दर के भिखारी बन जाते है| किसी अन्य देश से पराजित हो जाने पर
अथवा देश में क्रांति होने पर पल भर में ही राजधिकार छिन् जाता है, रोग लगने पर जगत प्रसिद्ध पहलवान इतने
दुर्बल हो जाते हैं कि उनसे बिना सहारे के चला भी नहीं जाता, चेचक होने पर सब सुन्दरता चली जाती है, यह प्राय: संसार में देखने में आता है
इसी प्रकार की प्रत्येक वस्तु के विषय में समझना चाहिए| इसलिए जो कुछ भी प्राप्त है उस पर कभी
भी अहंकार नहीं करना चाहिए,
अपितु उसे परमेश्वर की दात समझकर और ह्रदय में नम्रता एवं दीनता धारण करके हर समय
परमेश्वर की गुण-स्तुति गायन करनी चाहिए|
इस बात को हर समय ध्यान में रखना चाहिए कि उसकी यदि कृपादृष्टि हो जाये तो भिखारी
को राजा बनते देर नहीं लगती और यदि उसकी नजर उलटी हो जाये तो फिर सब कुछ छिनने में
भी देर नहीं लगती|
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कीचक
का वध
द्रौपदी
के साथ पाण्डव वनवास के अंतिम वर्ष अज्ञातवास के समय में वेश तथा नाम बदलकर राजा
विराट के यहाँ रहते थे|
उस समय द्रौपदी ने
अपना नाम सैरंध्री रख लिया था और विराट नरेश की रानी सुदेष्णा की दासी बनकर वे
किसी प्रकार समय व्यतीत कर रही थीं| परस्त्री
में आसक्ति मृत्यु का कारण होती है| राजा
विराट का प्रधान सेनापति कीचक सुदेष्णा का भाई था| एक
तो वह राजा का साला था,
दूसरे सेना उसके
अधिकार में थी, तीसरे वह स्वयं प्रख्यात बलवान था और उसके समान ही बलवान उसके
एक सौ पांच भाई उसका अनुगमन करते थे| इन
सब कारणों के कीचक निरंकुश तथा मदांध हो गया था| वह
सदा मनमानी करता था| राजा विराट का भी उसे कोई भय या संकोच नहीं था| उल्टे
राजा ही उससे दबे रहते थे और उसके अनुचित व्यवहारों पर भी कुछ कहने का साहस नहीं
करते थे| दुरात्मा कीचक अपनी बहन रानी सुदेष्णा के भवन में एक बार किसी
कार्यवश गया| वहाँ अपूर्व लावण्यवती दासी सैरंध्री को देखकर उस पर आसक्त हो
गया| कीचक ने नाना प्रकार के प्रलोभन सैरंध्री को दिए| सैरंध्री
ने उसे समझाया, "मैं पतिव्रता हूं| अपने
पति के अतिरिक्त किसी पुरुष की कभी कामना नहीं करती| तुम
अपना पाप-पूर्ण विचार त्याग दो|" लेकिन
कामांध कीचक ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया| उसने
अपनी बहन सुदेष्णा को भी तैयार कर लिया कि वे सैरंध्री को उसके भवन में भेजेंगी| रानी
सुदेष्णा ने सैरंध्री के अस्वीकार करने पर भी अधिकार प्रकट करते हुए डांटकर उसे
कीचक के भवन में जाकर वहाँ से अपने लिए कुछ सामग्री लाने को भेजा| सैरंध्री
जब कीचक के भवन में पहुंची, तब
वह दुष्ट उसके साथ बल प्रयोग करने पर उतारू हो गया| उसे
धक्का देकर वह भागी और राजसभा में पहुंची| परंतु
कीचक ने वहाँ पहुँचकर राजा विराट के सामने ही उसके केश पकड़कर भूमि पर पटक दिया और
पैर की एक ठोकर लगा दी|
राजा विराट कुछ भी
बोलने का साहस न कर सके|
सैरंध्री बनी द्रौपदी
ने देख लिया कि इस दुरात्मा से विराट उसकी रक्षा नहीं कर सकते| कीचक
और भी धृष्ट हो गया| अंत में व्याकुल होकर रात्रि में द्रौपदी भीमसेन के पास गई और
रोकर उसने भीमसेन से अपनी व्यथा कही| भीमसेन
ने उसे आश्वासन दिया|
दूसरे दिन सैरंध्री
ने भीमसेन की सलाह के अनुसार कीचक से प्रसन्नतापूर्वक बातें कीं और रात्रि में उसे
नाट्यशाला में आने को कह दिया| राजा
विराट की नाट्यशाला अंत:पुर की कन्याओं के नृत्य एवं संगीत सीखने में काम आती थी| वहाँ
दिन में कन्याएं गान-विद्या का अभ्यास करती थीं, किंतु
रात्रि में वह सूनी रहती थी| कन्याओं
के विश्राम के लिए उसमें एक पलंग पड़ा था, रात्रि
का अंधकार हो जाने पर भीमसेन चुपचाप आकर नाट्यशाला के उस पलंग पर सो गए| कामांध
कीचक सज-धजकर वहाँ आया और अंधेरे में पलंग पर बैठकर, भीमसेन
को सैरंध्री समझकर उसके ऊपर उसने हाथ रखा| उछलकर
भीमसेन ने उसे नीचे पटक दिया और वे उस दुरात्मा की छाती पर चढ़ बैठे|
कीचक बहुत बलवान था| भीमसेन
से वह भिड़ गया| दोनों में मल्लयुद्ध होने लगा, किंतु
भीमसेन ने उसे शीघ्र ही पछाड़ दिया और उसका गला घोंटकर उसे मार डाला| फिर
उसका मस्तक तथा हाथ-पैर इतने जोर से दबा दिए कि सब धड़ के भीतर घुस गए| कीचक
का शरीर एक डरावना लोथड़ा बन गया|
प्रात:काल सैरंध्री
ने ही लोगों को दिखाया कि उसका अपमान करने वाला कीचक किस दुर्दशा को प्राप्त हुआ| परंतु
कीचक के एक सौ पांच भाईयों ने सैरंध्री को पकड़कर बांध लिया| वे
उसे कीचक के शव के साथ चिता में जला देने के उद्देश्य से श्मशान ले गए| सैरंध्री
क्रंदन करती जा रही थी|
उसका विलाप सुनकर
भीमसेन नगर का परकोटा कूदकर श्मशान पहुँचे| उन्होंने
एक वृक्ष उखाड़कर कंधे पर रख लिया और उसी से कीचक के सभी भाईयों को यमलोक भेज दिया| सैरंध्री
के बंधन उन्होंने काट दिए|
अपनी कामासक्ति के
कारण दुरात्मा कीचक मारा गया और पापी भाई का पक्ष लेने के कारण उसके एक सौ पांच
भाई भी बुरी मौत मारे गए|
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