संत एकनाथ जी का
शांत स्वाभाव
सन्त एकनाथ जी पैठन (दक्षिण भारत का एक
नगर) के निवासी थे| अति शान्त एवं
मृदुल स्वभाव क्षमा, दया और करुणा से ओतप्रोत जीवन| अक्रोध तो मानो एकनाथ जी का स्वरूप ही
था| उनके मुखमण्डल पर
सदैव शान्ति विराजमान रहती|
परन्तु संसार में यदि अक्रोध है तो क्रोध भी है, शान्ति है तो अशान्ति भी है दया
और करुणा है तो क्रूरता भी है तथा सन्त है तो असन्त भी है| सन्त एकनाथ जी नित्यप्रति प्रात:काल
गोदावरी नदी पर स्नान करने जाया करते थे|
मार्ग में एक सराय (धर्मशाला) पड़ती थी, जिसमे एक पठान रहता था| वह दुष्ट स्वभाव का था| वह आते- जाते व्यक्तियों को बहुत तंग
किया करता था| एकनाथ जी जब नदी
से स्नान करके लौटते तो वह पठान उनके ऊपर कुल्ला कर देता| एकनाथ जी वापस लौट जाते और पुनः नदी
पर स्नान करते| जब वे पुनः स्नान
करके वापस आते, वह पठान फिर उन पर कुल्ला कर देता| किसी - किसी दिन तो उन्हें चार – पांच
बार स्नान करना पड़ता, परन्तु एकनाथ जी तनिक भी क्रुद्ध न होते| उनके मुखमण्डल पर सदैव की ही भांति
शान्ति बनी रहती और वे अपने अन्तर में नाम का सुमिरण करते रहते| वह पठान सोचता, यह कैसा मनुष्य है जो
तनिक भी क्रोध नहीं करता|
एक दिन – आज मैं इनको क्रोधित करके ही रहूँगा- यह पठान की जिद थी अथवा यूँ कहा जाए
कि नित्यप्रति सन्तों के दर्शन करते - करते उसके पुण्य – पुण्य संस्कार उदय होने
तथा उसके सुधरने का समय आ गया था तो अनुचित न होगा| एक दिन एकनाथ जी बार – बार स्नान करके
आते और वह पठान बार – बार उनके ऊपर कुल्ला कर देता| कहते हैं कि सन्त एकनाथ जी को उस दिन
एक सौ आठ बार स्नान करना पड़ा, परन्तु क्या मजाल जो उनके मुख पर क्रोध की रेखा भी
उमड़ी हो| “आप
मुझे क्षमा करें| मैंने बहुत बड़ा
पाप किया है जो आपको प्रतिदिन कष्ट दिया है|
आप वास्तव में ही सच्चे सन्त हैं|”
कहते हुए उस पठान ने एकनाथ जी के चरण पकड़ लिये| “अरे-अरे| यह क्या करते हो? आपकी कृपा से मुझे
आज एक सौ आठ बार गोदावरी – स्नान का सौभाग्य प्राप्त हुआ”
– यह कहते हुए सन्त एक नाथ जी ने उस पठान को प्रेम से गले लगा लिया| उस दिन से वह पठान पशुता त्यागकर मानव
बन गया और संतो का श्रद्धालु बन गया|
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गधे
को पानी पिलाना
संत
एकनाथ महाराष्ट्र के विख्यात संत थे स्वभाव से अत्यंत सरल और परोपकारी संत| एकनाथ
के मन में एक दिन विचार आया कि प्रयाग पहुँचकर त्रिवेणी में स्नान करें और फिर
त्रिवेणी से पवित्र जल भरकर रामेश्वरम में चढ़ाएं। उन्होंने अन्य संतों के समक्ष
अपनी यह इच्छा व्यक्त की। सभी ने हर्ष जताते हुए सामूहिक यात्रा का निर्णय लिया।
एकनाथ सभी संतों के साथ प्रयाग पहुँचे। वहाँ त्रिवेणी में सभी ने स्नान किया। तत्पश्चात
अपनी-अपनी कावड़ में त्रिवेणी का पवित्र जल भर लिया। पूजा-पाठ से निवृत्त हो सबने
भोजन किया, फिर रामेश्वरम की यात्रा पर निकल गए। जब संतों का यह समूह
यात्रा के मध्य में ही था,
तभी मार्ग में सभी को
एक प्यासा गधा दिखाई दिया। वह प्यास से तड़प रहा था और चल भी नहीं पा रहा था। सभी
के मन में दया उपजी, किंतु कावड़ का जल तो रामेश्वरम के निमित्त था, इसलिए
सभी संतों ने मन कड़ा कर लिया। किंतु एकनाथ ने तत्काल अपनी कावड़ से पानी निकालकर
गधे को पिला दिया| प्यास बुझने के बाद
गधे को मानो नवजीवन प्राप्त हो गया और वह उठकर सामने घास चरने लगा। संतों ने एकनाथ
से कहा- आप तो रामेश्वरम जाकर तीर्थ जल चढ़ाने से वंचित हो गए। एकनाथ बोले- ईश्वर
तो सभी जीवों में व्याप्त है। मैंने अपनी कावड़ से एक प्यासे जीव को पानी पिलाकर
उसकी प्राण रक्षा की। इसी से मुझे रामेश्वरम जाने का पुण्य मिल गया।
वस्तुत: धार्मिक विधि-विधानों के पालन से बढ़कर
मानवीयता का पालन है जिसके निर्वाह पर ही सच्चा पुण्य प्राप्त होता है। सभी
धर्मग्रंथों में परोपकार को श्रेष्ठ धर्म माना गया है अत: वही पुण्यदायी भी है।
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