भृतहरि जी का
वैराग्य
भृत हरि जी तख्त के मालिक एक राजा थे| इनको भी कारण वैराग्य ही हुआ| वह कथा इस प्रकार है| भृतहरि जी का अपनी स्त्री के साथ बड़ा
मोह प्यार था| एक बार राजा
भृतहरि के सम्मुख किसी ने अमृतफल भेंट किया और साथ ही विनय की कि- राजन! इस अमृत
फल में यह गुण है कि जो इसे खायेगा वह अमर हो जाएगा| भृत जी ने फल ले लिया और उस व्यक्ति
को कुछ ईनाम देकर विदा किया|
कुदरती बात है मनुष्य जब किसी उत्तम और बहुमूल्य वस्तु को पाता है तो वह अपने
प्रीतम के आगे ला रखता है|
भृत जी का चूँकि अपनी स्त्री के साथ बहुत प्यार था इसलिए उन्होंने वह अमृतफल
स्त्री को दे दिया| लेकिन स्त्री का
प्यार अन्दर ही अन्दर अपने हाथीवान से चल रहा था| उसने वह फल हाथीवान को दे दिया| उस हाथीवान का प्यार एक वैश्या के साथ
था| उसने वह फल वैश्या
को दे दिया| वैश्या ने सोचा
मेरे फल खाने से अगर मैं अमर हो जाऊं तो क्या होगा? क्यों न यह अमृतफल राजा भृतहरि
जी को भेंट कर दूँ| वे देश के नेता
है, उनके अमर हो जाने से देश को लाभ होगा|
यह सोचकर उसने वह अमृतफल राजा भृतहरि जी को भेंट कर दिया| भृतहरि जी ने जब उस फल को देखा तो
उनके आश्चर्य की कोई सीमा न रही|
सोचने लगे, यह तो वही फल है जो मैंने अपनी रानी को दिया था| वह वैश्या के पास कैसे आ गया| यह सोचते ही उन्होंने सारे मामले की
निजी तौर पर खोज की तो इस पाखंड का भांडा फूट गया| भृतहरि जी के दिल को भारी चोट लगी कि
इस संसार का मोह प्यार धोखा है, जिसका फल यह हुआ कि वे संसार से उपराम होकर भगवान
के भजन में लग गये| एक बार जब भृतहरि
जी साधु रूप में भ्रमण करते हुए एक ग्राम में गये तो किसी जिज्ञासु ने वार्तालाप
में उनसे यह प्रश्न किया- महाराज|
आप राजा होते हुये वैरागी योगी क्यों बन गये? तब भृतहरि जी ने उत्तर दिया- जिसकी
मैं अपने चित्त में नित ही चितवन करता रहता था अर्थात मेरे चित्त में जिसका प्यार
था उस मेरी रानी की प्रीति मेरे तन के साथ रद्दी भर भी ना निकली| वह अन्दर ही अन्दर एक दूसरे पुरुष के
साथ अपने मन का प्यार जोड़े हुई थी|
आश्चर्य यह है कि वह पुरुष भी उसका ना था|
वह एक वैश्या को दिल दे चुका था|
धिक्कार है मेरी अबला पर|
पुनः धिक्कार है उस हाथीवान पर, और सबसे बड़ा धिक्कार है मुझ पर जो मैं धोखे में
आकर जन्म व्यर्थ खो रहा था अर्थात, जब मैंने सारे मामले की जांच पड़ताल की तो समझा
कि इस संसार का मोह प्यार सब माया की ठगी है, यहाँ कोई भी किसी का अपना नहीं है| यह सोच कर मैं राजा होते हुये सब की
प्रीति को त्याग कर वैराग्य की अवस्था में ईश्वर के भजन में लग गया||
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