Monday, May 11, 2020

परम संत तुकाराम जी


संत तुकाराम जी
सन्त तुकाराम जी के मुख मण्डल पर हर समय शान्ति विद्ममान रहती थी| उनका चित्त हर समय प्रभु के सुमिरण ध्यान में ही लगा रहता था| माता – पिता परलोक सिधार चुके थे और बड़े भ्राता घर – बाहर छोड़कर न जाने कहाँ चले गए थे, अतएव भाई – बहनों और पत्नी के अतिरिक्त बड़े भाई के परिवार के पालन – पोषण का भार भी उनके कन्धों पर ही था| कमाई का साधन थोड़ी सी खेती बाड़ी थी जिससे परिवार का निर्वाह बड़ी ही कठिनता से होता था| सन्त तुकाराम जी प्रभु की मौज में प्रसन्न रहते हुए संतोंषी जीवन व्यतीत करते और हर समय नाम की मस्ती में मस्त रहते| संतों के सभी लक्षण उनमे विद्ममान थे परन्तु उनकी पत्नी बड़ी क्रोधी स्वभाव की थी| वह बात – बात पर तुकाराम जी से झगडा करती परन्तु वे हँस के बात टाल जाते| एक बार का वृतान्त है- सन्त तुकाराम जी ने अपने खेत में गन्ने काटे, उनको बांधकर गट्ठर बना कर सिर पर लादा और बाजार की ओर चल दिए ताकि गन्ने बेचकर अनाज आदि खरीद ले परन्तु मार्ग में तुकाराम जी के पीछे बच्चे गन्ने लेने के लिए लग गये| सन्त तुकाराम जी आम संसारी तो थे नहीं, वे तो थे सन्त, अतएव बच्चो के आग्रह को कैसे अस्वीकार करते? परिणाम यह हुआ कि गन्ने बच्चो में बँट गए| केवल एक गन्ना सन्त तुकाराम जी के पास शेष रह गया| वे उसे लेकर घर की ओर चल दिए| सन्त तुकाराम जी एक गन्ना लेकर घर पहुँचे| पत्नी को सम्पूर्ण वृतान्त पहले ही ज्ञात हो चुका था और वह क्रोध में भरी पड़ी थी| सन्त तुकाराम जी ने जैसे ही गन्ना उसके हाथ में पकडाया, क्रोध में उसने वही गन्ना उनकी पीठ पर दे मारा| गन्ना टूट गया उसके दो टुकड़े हो गए| सन्त तुकाराम जी मुस्कुराते हुए बोले- मैं सोच ही रहा था कि गन्ने के दो टुकड़े करके एक स्वयं लूँ और एक तुम्हे दूँ, परन्तु तुम तो बहुत समझदार हो क्योंकि बिना कहे ही तुमने इसके दो टुकड़े कर दिये| यह शब्द सुनते ही उनकी पत्नी का क्रोध पानी की तरह बह गया| सन्त तुकाराम जी के चरणों में गिरकर क्षमा तो उसने माँगी ही, उस दिन से उसके व्यवहार में भी  परिवर्तन आ गया| वह भी विनम्र बन गई|
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संत की विनम्रता
सन्त तुकाराम जी महाराष्ट्र के सन्तों में से एक उच्च कोटि के सन्त माने जाते हैं। वे प्रारब्धवश उच्च वंश के न थे। छोटे कुल में उत्पन्न होने के कारण इनसे ब्राह्मण कुलोत्पन्न कई पण्डित ईष्र्या किया करते थे। इनकी सच्चाई गहरी थी ह्मदय में उनके अपने इष्टदेव श्री पाण्डुरंग जी का असीम प्रेम लहराया करता था। अन्तःकरण अत्यन्त निर्मल एवं सरल था। प्रभु-भक्ति के रस में आठों पहर मग्न रहते थे। गुरु-कृपा से इनकी वाणी में इतनी मधुरता थी कि लोग इनके प्रवचन सुनने के लिये बड़े लालायित रहते थे। भगवद् अनुकम्पा से इनकी रसना से भक्ति भरे "अभंग'अपने आप ही फूटा करते थे। सैंकड़ों ही अभंग इन्होंने रच डाले थे जिन में भक्ति-ज्ञान-वैराग्य तथा कर्तव्य-भावना भरी होती थी। उधर पंडित रामेश्वर भट्ट जी को अपनी कुलीनता का बड़ा अभिमान था। जब उन्होने सुना कि तुकाराम शूद्र जाति का होकर भगवान की कथा करता है-कितने ही उच्च कुल के लोग भी उसके सत्संगों में आते जाते हैं। उसकी बड़ी प्रसिद्धि होती जाती है और किन्हीं को नाम-मन्त्र की दीक्षा भी दे देता है वह अपने चरणों को पुजवाता है। यह सब जानकर रामेश्वर पंडित तो आग बबूला हो गये। उन्होने निश्चय कर लिया कि तुकाराम को तो पाण्डुरंग जी के मन्दिर में जाने से भी रोक देना है और पण्ढरपुर नगर से भी निकलवाना है। उन्होने ऐसा ही किया। भट्ट जी की उच्चाधिकारियों तक अच्छी पहुँच थी उनसे मेल जोल करके उन्होने तुकाराम जी का देव-दर्शन करना बन्द करा दिया और उनके बड़े परिश्रम से लिखे हुए अभंगों की पुस्तक को भी इन्द्रायणी नदी में प्रवाहित कर दिया। परन्तु तुकोबा सन्त चुप हैं-शान्त हैं उन्हें अपने इष्टदेव श्री पाण्डुरंग जी पर अनन्य विश्वास और श्रद्धा थी वे घर में बैठकर मन ही मन में अपने प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि प्रभो! आप सब कुछ कर लीजिये किन्तु अपने मन्दिर प्रवेश से तो वञ्चित न कीजिये। मुझ से कोई भी अपराध हुआ हो तो क्षमा कर दीजिये। भक्त की गुहार प्रभु देव ने सुनी-तुकोबा जी की शिष्य मण्डली को इस बात का बड़ा रोष था कि हमारे गुरुदेव की वह अभंगों की विशाल पुस्तक जिसमें अलौकिक जीवनोपयोगी अभंग शोभा पा रहे हैं आज नदी में बहा दी गई है और उन्होने जाकर देखा कि उसका एक एक पन्ना अलग-अलग नदी की लहरों में तैर रहा है। यह सब काण्ड देखकर वे अश्रुओं के घूँट पीते रहे। उधर क्षमाशील उदार ह्मदय, निष्कपट और सरलचित्त तुकाराम जी ब्रााहृण के दर्शन करने के लिये रामेश्वर भट्ट जी के द्वार पर पहुँचे और उनके चरणों में मस्तक रख कर बैठ गये। भट्ट जी-कहो तुकाराम! कैसे आये?
तुका-मुझे क्षमा करें, यह जो कुछ भी आप देख रहे हैं इसमें मेरा अपना कोई भी हाथ नहीं। मेरे भगवान पाण्डुरंग देव जी की अपनी कृपा हो रही है। मेरे अन्तस्तल में लेशमात्र भी यश प्राप्त करने की इच्छा नहीं। मेरा ग्रन्थ आपने नदी के अगाध जल में फिंकवा दिया है। मुझे इसकी भी चिन्ता नहीं किन्तु श्री पाण्डुरंग जी के पूजा मन्दिर में मुझे जाने की आज्ञा हो जाए तो आपका अत्यन्त अनुग्रह होगा। रामेश्वर जी ने श्री मन्दिर दर्शन की तो आज्ञा प्रदान कर दी शेष रही इन्द्रयाणी के अथाह जल में अभंग ग्रन्थ के डलवा देने की बात इस पर वे चुप हो गये भक्त पुरुष क्या करे। उस समय वह असहाय है। परन्तु कृपा के सागर भगवान तो तुकाराम के परम सहायक हैं। श्री पाण्डुरंग जी क्या लीला करते हैं कि इन्द्रयाणी के जल में चार दिनों से ग्रन्थ की पाण्डुलिपि में लिखा हुआ एक एक पन्ना तैर रहा है परन्तु उसकी लिपि वैसी की वैसी अक्षुण्ण है। सूखे सूखे पन्ने दूर दूर तक बिखरे हुये थे उनकी थोड़ी सी भी क्षति नहीं हुई थी। शिष्य मण्डली से रहा नहीं गया। वे प्रेमी इन्द्रायणी पर गये और पन्नों को इकट्ठा करने लगे। इधर रामेश्वर भट्ट जी को भी अपने आप ही उस अपनी क्रूरता पर बड़ा अनुताप हुआ। तुकाराम जी की इतनी साधुता और विनम्रता का उन पर और भी गहरा प्रभाव पड़ा। वे मन ही मन उनकी विशुद्ध भक्ति भावना की भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे और स्वयं उस ग्रन्थ के पन्नों को बचाने के लिये इन्द्रायणी नदी में उतर पड़े वहाँ जब उन्होंने यह चमत्कार देखा कि पुस्तक के पन्ने वैसे के वैसे ही सूखे हैं उनपर तनिक भी आँच नहीं आई-वे दंग रह गये और मान गये कि तुकाराम कोई अलौकिक पुरुष हैं। भगवान के परम भक्त हैं। और तुकाराम की भक्ति का भट्ट पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि अपने ब्राह्मणत्व के अभिमान को एक ताक पर रखकर उन्होने उनसे नाम मन्त्र ले लिया। यह है सच्ची मानवता। मनुष्य को इस प्रकार की संकीर्णता को छोड़कर विशाल ह्मदय बनना चाहिये। विरोधी के ह्मदय को भी जीत लेना चाहिये ऐ मनुष्य! तेरी सुन्दरता तो यह हैः-
जो तो को काँटा बुवै, ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरसूल।।
""मनुष्य का धर्म तो यह है कि वह संसार को कभी ठगने का प्रयत्न न करे। स्वयं घाटा उठा ले वह अच्छा है। दूसरे के ह्मदय को ठेस लगाना सज्जन को उचित नहीं।'' ऐ मानव तेरा कर्तव्य क्या है-""ज्ञान रुपी हाथी पर सवार हो जा-सरल स्वभाव रुपी दुलीचे को बैठने के लिये नीचे बिछा ले और आनन्द मग्न होकर चलता जा-संसार तो बुरा-भला कहता ही रहता है। उसकी परवाह दृढ़ प्रतिज्ञ पुरुष नहीं किया करते।''
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