गीता का पाठ
एक बार महाप्रभु
चैतन्य भ्रमण करते हुए जब एक नगर में पहुँचे, तो वहाँ के कुछ विद्वानों ने एक
ब्राह्मण की शिकायत करते हुए कहा कि– “एक
ब्राह्मण अपने घर के बाहर बैठकर नित्यप्रति गीता का पाठ बड़े ही ऊँचे स्वर में करता
है| किन्तु वह चूँकि संस्कृत पढ़ा हुआ नहीं है इसलिए उसका पाठ बहुत ही अशुद्ध होता
है| हम सबने उसे कई बार समझाया और ऊँचे स्वर में गीता का पाठ करने से मना किया,
परन्तु वह किसी की सुनता ही नहीं| आप उसे समझाइये| हो सकता है कि आपके कहने से वह
रुक जाए|”
महाप्रभु चैतन्य ने उनकी बात मान ली और दूसरे दिन उन विद्वानों को साथ लेकर उसके
घर पहुँचे| घर क्या था? एक छोटा-सा कच्चा मकान था, जिसके बाहर एक चबूतरा था|
चबूतरे के बीचो बीच एक पीपल का वृक्ष था| ब्राह्मण उस वृक्ष के नीचे बैठकर ऊँचे
स्वर में गीता का पाठ कर रहा था| उसके नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी|
महाप्रभु उसकी ऐसी अवस्था देखकर चकित रह गये और प्रेम विभोर होकर मौन खड़े, उसे पाठ
करते देखते रहे| जब वह ब्राह्मण पाठ कर चुका, तो स्वाभाविक ही उसकी दृष्टि चैतन्य
महाप्रभु तथा अन्य लोगों पर पड़ी| वह तुरंत अंदर से चटाई निकाल लाया, सबको आदर-
सम्मान के साथ बिठाया, फिर हाथ जोड़ कर बोला- मेरे अहोभाग्य है जो आप सबने मुझ जैसे
गरीब की कुटिया पर कृपा की| कहिये, क्या आज्ञा है? महाप्रभु चैतन्य ने बड़ी ही मधुर
वाणी में कहा – “इन विद्वान
ब्राह्मणों का कहना है कि आप गीता का बहुत ही अशुद्ध पाठ करते हैं क्योंकि आपको
संस्कृत भाषा का सही ज्ञान नहीं है| अभी हमने स्वयं भी आपको गीता का पाठ करते
देखा| शब्दों का उच्चारण आपका वास्तव में ही बहुत अशुद्ध है| आप क्या सोचकर गीता
का पाठ करते हैं और पाठ करते समय आप क्या भाव रखते हैं?”
ब्राह्मण ने उत्तर दिया- “भाषा-
वाषा की बात मैं जानता नहीं, क्योंकि मैं कुछ विशेष पढ़ा लिखा नहीं हूँ| मुझे तो बस
इतना पता है कि गीता में भगवान श्री कृष्ण तथा उनके प्रिय भक्त का संवाद है| गीता
पढ़ते समय मुझे ऐसा अनुभव होता है कि मेरे सामने रथ में साक्षात् भगवान श्री कृष्ण
तथा भक्त अर्जुन बैठे है और भगवान अर्जुन के प्रति वचन फरमा रहे हैं| उनके
साक्षात् दर्शन कर मेरा हृदय प्रेम – विभोर हो जाता है और मैं संसार को पूर्णतया
भूल जाता हूँ|” यह सुनते ही
महाप्रभु चैतन्य एकदम उठे और उसे सीने से लगाते हुए कहा- “कौन
कहता है कि तुम अशुद्ध पाठ करते हो? तुम्हारे जैसा गीता का पाठ करने वाला हमने आज
तक नहीं देखा| सच पूछो तो गीता का वास्तविक पाठ तुम्ही ने समझा है| माखन तुम खाते
हो और छाछ ये ब्राह्मण पाते है, जो अपने को विद्वान समझते हैं| विद्वान वास्तव में
ये सब नहीं तुम हो, क्योंकि जिनके हृदय में प्रभु प्रेम का निवास है| वही सच्चा
विद्वान अथवा पंडित है| उदाहरण के तौर पर शबरी, गोपियाँ ये सब ज्यादा पढ़ी लिखी विद्वान
नहीं थी लेकिन इनके मन में भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा भक्ति थी|”
*****
चैतन्य
प्रभु की कृपा
एक
बार श्री चैतन्य महाप्रभु रास्ते में से जा रहे थे|
उनके पीछे भक्त जन भी थे|
महाप्रभु हरे कृष्णा
का कीर्तन करते हुए जा रहे थे|
हरे
कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण
कृष्ण, हरे हरे।
हरे
राम, हरे राम, राम
राम, हरे हरे॥
कीर्तन
करते करते महाप्रभु थोड़ा सा आगे निकल गए, उन्हें
बड़ी जोर की प्यास लगी,
परन्तु कही पानी नहीं
मिलाl एक व्यापारी सिर पर मिट्टी का घड़ा रखे सामने से चला आ रहा था l महाप्रभु
ने उसे देखते ही कहा 'भईया बड़ी प्यास लगी है थोड़ा सा जल मिल जायेगा'? व्यापारी
ने कहा - 'मेरे पास जल तो नहीं है, हाँ
इस घडे में छाछ जरुर है'
इतना कहकर उसने छाछ
का घड़ा नीचे उतारा| महाप्रभु बहुत प्यासे थे इसलिए सारी की सारी छाछ पी गए और
बोले 'भईया बहुत अच्छी छाछ थी, प्यास
बुझ गई'| व्यापारी
बोला - 'अब छाछ के पैसे लाओ'!
महाप्रभु- 'भईया पैसे तो मेरे पास नहीं है'? व्यापारी महाप्रभु के रूप और सौंदर्य को देखकर इतना प्रभावित हुआ कि उसने सोचा इन्होने नहीं दिया तो कोई बात नहीं इनके पीछे जो इनके साथ वाले आ रहे है इनसे ही मांग लेता हूँ| महाप्रभु ने उसे खाली घड़ा दे दिया उसे सिर पर रखकर वह आगे बढ़ गया| पीछे आ रहे नित्यानंद जी और भी भक्तों से उसने पैसे मांगे तो वे कहने लगे 'हमारे मालिक तो आगे चल रहे है जब उनके पास ही नहीं है तो फिर हम तो उनके सेवक है हमारे पास कहाँ से आयेगे'? उन सब को देखकर वह बड़ा प्रभावित हुआ और उसने कुछ नहीं कहाl जब घर आया और सिर से घड़ा उतारकर देखा तो क्या देखता है कि घड़ा हीरे मोतियों से भरा हुआ है| एक पल के लिए तो बड़ा प्रसन्न हुआ पर अगले ही पल दुखी हो गया, मन में तुरंत विचार आया उन प्रभु ने इस मिट्टी के घड़े को छुआ तो ये हीरे मोती से भर गया, जब वे मिट्टी को ऐसा बना सकते है तो मुझे छू लेने से मेरा क्या ना हो गया होता? अर्थात प्रभु की भक्ति मेरे अन्दर आ जाती| झट दौड़ता हुआ उसी रास्ते पर गया जहाँ प्रभु को छाछ पिलाई थी| अभी प्रभु ज्यादा दूर नहीं गए थे. तुरंत उनके चरणों में गिर पड़ा 'प्रभु मुझे प्रेम का दान दीजिये| प्रभु ने उठाकर उसे गले से लगा लिया और उसका जीवन बदल गया| हमारी ऐसी दशा कब होगी जब कृष्ण नाम लेते ही हम भी प्रेम का 'शुबीरस' पीये हुए से छके हुए से नाचते गाते रहेगे|
महाप्रभु- 'भईया पैसे तो मेरे पास नहीं है'? व्यापारी महाप्रभु के रूप और सौंदर्य को देखकर इतना प्रभावित हुआ कि उसने सोचा इन्होने नहीं दिया तो कोई बात नहीं इनके पीछे जो इनके साथ वाले आ रहे है इनसे ही मांग लेता हूँ| महाप्रभु ने उसे खाली घड़ा दे दिया उसे सिर पर रखकर वह आगे बढ़ गया| पीछे आ रहे नित्यानंद जी और भी भक्तों से उसने पैसे मांगे तो वे कहने लगे 'हमारे मालिक तो आगे चल रहे है जब उनके पास ही नहीं है तो फिर हम तो उनके सेवक है हमारे पास कहाँ से आयेगे'? उन सब को देखकर वह बड़ा प्रभावित हुआ और उसने कुछ नहीं कहाl जब घर आया और सिर से घड़ा उतारकर देखा तो क्या देखता है कि घड़ा हीरे मोतियों से भरा हुआ है| एक पल के लिए तो बड़ा प्रसन्न हुआ पर अगले ही पल दुखी हो गया, मन में तुरंत विचार आया उन प्रभु ने इस मिट्टी के घड़े को छुआ तो ये हीरे मोती से भर गया, जब वे मिट्टी को ऐसा बना सकते है तो मुझे छू लेने से मेरा क्या ना हो गया होता? अर्थात प्रभु की भक्ति मेरे अन्दर आ जाती| झट दौड़ता हुआ उसी रास्ते पर गया जहाँ प्रभु को छाछ पिलाई थी| अभी प्रभु ज्यादा दूर नहीं गए थे. तुरंत उनके चरणों में गिर पड़ा 'प्रभु मुझे प्रेम का दान दीजिये| प्रभु ने उठाकर उसे गले से लगा लिया और उसका जीवन बदल गया| हमारी ऐसी दशा कब होगी जब कृष्ण नाम लेते ही हम भी प्रेम का 'शुबीरस' पीये हुए से छके हुए से नाचते गाते रहेगे|
*****
चैतन्य जी की सहनशीलता
बंगाल
के परम कृष्ण भक्त श्री गौरांग महाप्रभु जी के जीवन में एक घटना आती है कि वे
प्रभात में गंगा तट पर प्रतिदिन स्नान करने जाते थे। मार्ग में एक छात्रावास था,
जहां कुछ विधर्मी बालक निवास करते थे। एक दिन पता नहीं क्यों उनमें से चार लड़कों
को चैतन्य जी से शरारत करने की सूझी। वे ज्यों ही चार बजे स्नान करके छात्रावास के
सामने से गुज़रे लड़कों ने उन पर जूठा पानी उछाल दिया। गौरांग शान्त रहे- उन्होंने
उन्हें अपने मुख से एक शब्द भी न कहा- चुपके से लौट गये और भागीरथी में पुनः स्नान
कर आये। उन लड़कों ने फिर वही कुचेष्टा की -चैतन्य
उलटे कदम लौट गये और स्नान कर लिया। उन विद्यार्थियों ने भी आज चित्त में ना जाने
क्या ठान रखा था-भक्त जी के समीप आने पर फिर वही कुल्ले कर दिये-उनका जूठा पानी
फैंकना और भक्त चैतन्य का बार बार नहा लेना- यह क्रम 108 बार तक चलता रहा-धन्य है उस विनय मूर्ति गौरांग की
धीरता-सहिष्णुता और उनका अदम्य संयम वे तनिक भी न तिल मिलाये- माथे पर एक भी
सिकुड़न न आई- मुखमण्डल शान्त और कान्त विनम्रता की प्रतिमूर्ति बन चुके थे वे।
कुदरत ने भी बड़ी उग्र परीक्षा ली उस प्रभु भक्त की- वे उद्दण्ड छात्र भी उस समय
अपनी उच्छृंखला पर तुले रहे- जब अति हो गई तो भगवान की भेजी हुई उस अग्नि परीक्षा
में भक्त जी उत्तीर्ण हो गये तब 109 वीं
बार जब गौरांग स्नान करके लौटे उन लड़कों
ने उनके चरण पकड़ लिये और अपनी गलती की क्षमा माँगी और भविष्य के लिये उद्ण्डता न
करने का व्रत ले लिया। यह है नमन का प्रताप और फल। चैतन्य केवल मुस्करा दिये उनकी
करतूत पर और अपने इष्टदेव भगवान श्री कृष्ण जी की उस अद्भुत लीला के ध्यान में ही
मग्न हुए अपने स्थान पर लौट आये।
*****
No comments:
Post a Comment