तीन माताओं की
कुरबानी
कहते हैं संसार में
तीन मातायें हुई है जिन्होंने अपनी संतान को भक्ति की शिक्षा देकर परलोक सुधारने
के निमित्त भगवान का भजन करने के लिए वन में भेजा था| पहली ध्रुव की माता, जिसने
अपने 5 वर्ष के नादान बेटे को भजन के निमित्त जंगल में भेजते समय यह शिक्षा दी- “बेटा
यह संसार कुछ नहीं है| मनुष्य जन्म रोज-2 मिलने का नहीं है, इसलिए जाओ और भजन कर
के अपना परलोक सवारों| दूसरी माता हुई बाबा फरीद साहब की, जिसने अपने बेटे का मोह
त्याग कर उसकी आत्मा के कल्याण हेतु उसे भजन करने के लिए वन में भेज दिया| तीसरी
माता हुई राजा गोपीचंद की| कहते हैं पिता के देहांत के पश्चात जब गोपीचंद राजा बना
तो उसकी माता ने जो बड़ी विचारवान थी, बेटे को यह शिक्षा दी कि बेटा, जिस तख़्त पर
आज तुम बैठ कर राज्य कर रहे हो, इस तख़्त पर एक दिन तेरे पिता जी बैठते थे लेकिन
मैंने अपनी आँखो से देखा कि वे अंत में
मिट्टी हो गए| ऐ बेटा, इस संसार का मोह धोखा है, जिसमें पड़कर मनुष्य का परलोक बिगड़
जाता है इसलिए बेटा, मेरी शिक्षा यह है कि जब इस राजपाट को मरने के बाद भी छोड़ना
है, तो तुम जीते जी इसको छोड़ दो और भगवान का भजन करके जन्म सवारों| माता की शिक्षा
को स्वीकार करके गोपीचंद भजन करने के लिए निकल पड़ा| और गुरु से दीक्षा लेकर नाम
सुमिरन में लग गया| कहा जाता है जब गोपीचंद गुरु की आज्ञा से फकीरी हालत में
भिक्षा माँगने के लिए एक बार अपनी माता के द्वार पर गए तो उन्हें देखकर माता के
दिल में बेटे का कुछ मोह जगा और आँख से एक आँसू भी गिरा| कहते हैं आँसू के कारण
भक्ति की पढाई में उसके आधे नम्बर कट गए| तब से गोपीचंद की माता आधी समझी गई?
गुरु लाग तब जनियेम,
मिटे मोह तन ताप
हर्ष शोक व्यापे
नहीं, तब गुरु आपे आप
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माँ
का उपदेश
राजा गोपीचंद को
उनकी माँ ने अपने सदोपदेश द्वारा संसार से विरक्त कर दिया| एक दिन गोपीचंद भिक्षा
मांगने के लिए राजमहल में आए तो माता जी ने उन्हें फिर उपदेश दिया की “
देखो बेटा! आप अच्छी नर्म राजसी सेज में सोया करो| साथ ही बढ़िया भोजन खाया करो और
किले में रहा करो |”
माता जी की यह बातें सुनकर गोपीचंद जी ने ठंडी स्वांस भरकर कहा –“
माँ ! आप मुझे उलाहना देती हैं| अब यह मुझे कहाँ मिलेंगी?”
माता जी ने जवाब दिया की “
बेटा! जब भजन सिमरण करते-करते नींद आ जाए तो चाहे आप नंगी धरती पे भी क्यों ना
सोये हुए होंगे, वहीं जमीन आपको सुंदर और कोमल शय्या का काम देगी| यदि खाट और
बिछौने का इन्तजार करोगे तो वृति फ़ैल जाने के कारण आप भजन नहीं कर सकोगे| भूख के
समय यदि आप स्वादिष्ट भोजन को याद करोगे तो आत्मरस से वंचित रह जाओगे और यह त्याग
निष्फल हो जायेगा| जब आपको तेज भूख लगेगी तब चाहे रूखा-सूखा जैसा भी भोजन मिले ,
उसे खाने से आपको बड़ा आनंद आयेगा| फिर आप छतीस प्रकार के व्यन्जन भूल जाओगे| गुरु आज्ञा
रूपी किले में रहने से काम, क्रोध आदि विकार जो मनुष्य के शत्रु हैं, वे कुछ नहीं
बिगाड़ पाते |”
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