Monday, May 11, 2020

श्री भगवान शिव जी कथा

गरीब परिवार को वरदान

एक गरीब परिवार था, जिसमे माता, पिता और पुत्र  रहते थे| उनके पास भरपेट भोजन भी नही होता था| दिव्य लोक से भगवान शिवजी  और पार्वती जी भी उन्हें देख रही थी| दयालुता -वश पार्वती जी ने भगवान शिवजी जी से प्रार्थना की - हे प्रभु!  आप इन तीनों को एक- एक वरदान दीजिये| शिव जी ने पार्वती को समझाया कि इनका भाग्य किसी भी तरह बदला नही जा सकता| लेकिन पार्वती उनकी सहायता करने के लिये बहुत ही उत्सुक थी| उन्होंने  सबसे पहले स्त्री को एक वरदान माँगने  लिए कहा| वह सोचने लगी कि यदि वह धन माँगती  है, तो उसका पति उससे अकेला छोड़ कर चला जायेगा|  इसलिये  उसने कहा कि मुझे सुंदर स्त्री बना दीजिये| मेरी सुन्दरता करोड़ों वर्षो तक कायम रहे| वैसा ही हुआ| अब जब वह अपने पति और पुत्र  के पास  वापिस पहुँचीं तो एक राजकुमार ने उसे देखा तो राजकुमार ने सोचा की यह दोनों अवश्य ही लुटेरे होंगे| जिन्होंने  एक सुन्दर स्त्री  को बलपूर्वक कैद कर रखा है| उसने पुरुष और पुत्र  दोनों को धमकाया और सुंदर स्त्री को घोड़े पर बिठाकर  चल दिया| अब पार्वती जी वहाँ पुरुष के पास आई और उसे वरदान माँगने  का अवसर  दिया उसने सोचा की वह धन का क्या करेगा| जब उसकी पत्नी ही चली गई है| यदि उस की स्त्री कुरूप बन जाये तो निश्चय ही राजकुमार उसे छोड़ देगा| इसी प्रकार उसने कहा कि मेरी पत्नी को कुरूप बना दो| तब राजकुमार  ने उसे वही  छोड़ कर चलता बना| तीसरा अवसर पुत्र को दिया गया| पुत्र ने सोचा की सभी उसकी माता से डरते है, क्योंकि वह बहुत ही कुरूप बन गई है इसलिये उसने यह वरदान माँगा की सब कुछ पहले जैसा ही हो जाये वह परिवार फिर अपनी पुरानीं दुखी अवस्था में लौट  आया| इससे यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य का भाग्य बदला नही जा सकता| इसलिये यह  अच्छा  है कि सभी परिस्थितियों को ख़ुशी से स्वीकार  करे|

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श्रुतायुध की गदा

श्रुतायुध के पास भगवान शंकर के वरदान से प्राप्त एक अमोघ गदा थी। इसके पीछे एक कथा यह थी कि श्रुतायुध के तप से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उपहार स्वरूप यह वरदान उसे इस शर्त पर दिया था कि वह कभी भी उस गदा का अनीतिपूर्वक उपयोग करे। यदि वह नीति के विरुद्ध आचरण करेगा तो लौटकर वह उसका ही विनाश कर देगी। महाभारत युद्ध में श्रुतायुध को अर्जुन से लड़ना पड़ा। युद्ध प्रबल वेग से होने लगा और दोनों ही योद्धा अपना रणकौशल दिखाने लगे। सारथी बने हुए श्री कृष्ण को श्रुतायुध की कुरूपता पर हँसी गई। श्री कृष्ण को अपने पर हँसता देख श्रुतायुध अत्यधिक क्रोधित हुआ। श्री कृष्ण की यह हँसी उसे तीर की भांति चुभी और आवेश में आकर उसने बिना कुछ विचार किए अमोघ गदा श्री कृष्ण पर फैंक दी। क्रोध के आवेश में उसे यह भी ध्यान नहीं रहा कि शंकरजी से वरदान में प्राप्त उस अमोघ गदा के इस्तेमाल के साथ क्या शर्त जुड़ी हुई है। गदा श्री कृष्ण तक पहुँची और बीच से ही वापस लौटकर श्रुतायुध पर आकर गिर पड़ी। गदा के तीव्र प्रहार से उसका शरीर क्षत-विक्षत होकर भूमि पर गिर पड़ा। इस कथा का सार यह है कि मनुष्य को भी अपने जीवन में समस्त शक्तियां श्रुतायुध की गदा की तरह सदुपयोग के लिए मिली हैं। जो उन्हें अनीतिपूर्वक उपयोग में लाते हैं, वे उसके दुष्परिणाम से आहत होकर श्रुतायुध की तरह विनाश को प्राप्त होते हैं। 

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भस्मासुर का अंत

कहते हैं नीच व्यक्तियों की आदत होती है कि जिससे वह बड़ाई पाते हैं उसी से इर्ष्या करते हैं| कथा इस प्रकार है- एक बार भस्मासुर राक्षस ने शिवजी का तप किया| शिवजी प्रसन्न हो कर बोले वर माँगों| तब भस्मासुर ने कहा- मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि जिसके सिर पर मैं हाथ रखूं वह भस्म हो जाए| शिवजी ने कहा- ऐसा ही होगा| भस्मासुर शिवजी से वरदान पाकर प्रसन्न हुआ| परन्तु उसका मन शिवजी महाराज जी की धर्मपत्नी पार्वती को देखकर मलिन हो गया| सोचने लगा कि क्यों न पहले शिवजी के सिर पर हाथ रख कर इसको भस्म कर के पार्वती को वश में करूँ| यह सोचकर उसने शिवजी के सिर की तरफ हाथ बढ़ाया| शिवजी जान गए कि इस पापी की नियत खराब हो गई है| यह मुझे भस्म करना चाहता है| मारे डर के वह वहाँ से भागे| आगे -2 शिवजी और पीछे-2 भस्मासुर| न जाने शिवजी महाराज जी उस दुष्ट से बचने के लिए कहाँ-2 गए| परन्तु कहीं से सहायता ना मिली अंत में दुखित होकर बैकुण्ठ में जाकर भगवान के चरणों में प्रार्थना की| विष्णु भगवान जान गए, उन्होंने अपनी माया को ईशारा किया| तब माया ने मोहिनी रूप धारण किया और भस्मासुर के निकट जा खड़ी हुई| भस्मासुर ने जब मोहिनी के रूप को देखा तो उस पर मोहित हो गया क्योंकि वह तो सचमुच मन को हर लेने वाली मोहिनी माया थी| भस्मासुर उसे देखकर आपे से बाहर हो रहा था| मन में सोचने लगा कि यदि यह लड़की मुझे मिल जाए तो मेरे बराबर संसार में दूसरा कोई न होगा| यह सोचकर उसने अपने विचार मोहिनी के आगे रखे| मोहिनी ने हँसते हुए उत्तर दिया- मैं नृत्य किया करती हूँ| यदि तू मेरे साथ नृत्य करे तो मैं तेरे साथ शादी करने को तैयार हूँ| भस्मासुर ने झट से मान लिया| मोहिनी ने कहा- नृत्य में मैं जैसे-जैसे करती चलूंगी, तुम मुझे देख कर वैसे ही करना| भस्मासुर बोला- बहुत अच्छे| उस मूर्ख राक्षस को क्या पता  था कि यह लड़की नहीं ठगनी माया है, जिस का कर्तव्य है लोगों के मन को ठगना| दोनों का नाच आरम्भ हो गया| जैसे -2 मोहिनी अपने शरीर को तथा हाथ और पैरों को हिलाती और ऊचाँ, नीचा व टेढ़ा करती थी, भस्मासुर भी उसे देखकर वैसे ही करता था| नृत्य करते-2 एक बार मोहिनी ने अपना हाथ सिर पर रखा| तब भस्मासुर ने भी उसको देखकर अपना हाथ सिर पर रखा और तत्काल भस्म हो गया| तब मोहिनी माया ने भगवान के चरणों में आ कर सिर नवाया| भगवान ने शिवजी को समझाया कि आगे से ऐसे वरदान सोच-समझ कर दिया करो| शिवजी ने भगवान के चरणों में सिर झुकाया और क्षमा माँग कर गुण गाते हुए, विदा होकर अपने निवास को चले आये|

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नाम की महिमा

एक बार भगवान शिवजी माता पार्वती कैलाश पर्वत पर बैठे हुए थे| माता ने देखा कि भगवान शंकर हर थोड़ी-थोड़ी देर बाद हाथ जोड़ कर किसी को प्रणाम कर रहे है, तो माता के मन में प्रश्न उठा कि प्रभु आप थोड़ी -2 देर के बाद हाथ जोड़ कर किसे प्रणाम कर रहे है| तब प्रभु ने फ़रमाया कि जो एक बार मेरे प्रभु श्री राम का दिल से नाम लेता है मैं उसे हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ तब माता ने पूछा कि आप शमशान में जाकर लोगो की राख को अपने शरीर पर क्यूँ लगाते हो तब प्रभु ने फ़रमाया कि जब जीव संसार से जाता है, तब उस जीवात्मा को लोग कंधे पर उठाकर ले कर जाते है| तो लोग राम नाम का उच्चारण अपने मुख से करते है उस मृतक शरीर के करण ही लोग राम नाम उच्चारण करते है जिस शरीर की वजह से लोगो ने मेरे ईष्ट श्री राम का नाम जपा है, वह शरीर मुझे प्रिय है और तभी मैं उसकी राख को अपने शरीर पर लगाता हूँ कहने का भाव यह है कि इस हरि नाम की कैसी अनोखी महिमा है जिसका वर्णन कर पाना बहुत ही कठिन है

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माता पार्वती के गुरु

माता पार्वती ने नारद मुनि को गुरु बनाकर शिव जी को पति रूप में पाने के लिए मंत्र लिया और जप करने लगी| उनके घोर तप से तीनों लोक डगमगाने लगे| ब्रह्मा, विष्णु और सारे ऋषि, मुनि, देवता भगवान शिव के पास गए| उन्हें सारी बात कह सुनाई और बताया की माता सती ने पार्वती रूप में अवतार लिया है और आपको पाने के लिए घोर तप कर रही हैं| भगवान शिव ने सप्तर्षियों को परीक्षा लेने के लिए भेजा| सप्तर्षियों ने जाकर उनके घोर तप की प्रशंसा की और कहा आप कहाँ शंकर भगवान को पाने के चक्कर में पड़ गयी| वो तो अड़भंगी हैं| उनके पास न तो घर है, न ही वो अच्छे कपड़े पहनते हैं| श्मशान की राख लपेटे रहते हैं| आपके लिए ब्रह्मा या विष्णु सही रहेंगे आदि| ऐसे भगवान शंकर की तमाम बुराईयाँ कह सुनाई| माता पार्वती ने आदर से कहा| आप ऋषियों ने भला किया जो यहाँ आकर दर्शन दिया| पर आप लोग बाद में आये| मेरे गुरु नारद जी ने मुझे जो मंत्र दिया और बात बतायी उसमे मुझे अडिग निष्ठा है| आप लोग पहले मिले होते तो बात अलग होती पर अब ये जीवन तो मैं अपने गुरु नारद के दिए हुए ज्ञान के साथ ही बताऊंगी और शिव जी को पाने के लिए तप करुँगी| सप्तर्षियों ने शिवजी को जाकर सब बात कह सुनाई और शिवजी पार्वती माता की गुरुनिष्ठा और शिव चरणो में प्रेम जानकर अत्यंत प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए| इस प्रकार शिव पार्वती विवाह सम्पन्न हुआ | पुराणों में उसके बाद के वर्णनों में जब भी नारद मुनि शिवजी से मिलने जाते हैं, वो शिव पार्वती को प्रणाम करते हैं तो माता पार्वती भी उनका गुरु कहकर सम्मान करती हैं| उन्हें ऊँचे स्थान पर आसान देकर उनका आदर सत्कार करती हैं| पुराणों में इसलिए कहा है "गुरु निष्ठा परम तपः अर्थात गुरु में एकनिष्ठ प्रीति होना परम तप करने के समान ही है"

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