रांका
बांका का प्रभु प्रेम
राका
– बांका पति पत्नी भगवान के प्रेमी थे| यद्यपि वे संसार की दृष्टि से निर्धन थे|
परन्तु प्रभु नाम के प्रताप से संतोषरूपी धन से मालो माल थे| दोनों वन से लकड़ियाँ
ले आते और उन्हें बेचकर जीवन का निर्वाह करते थे| कभी-2 वर्षा आदि के कारण उन्हें
भूखा भी रह जाना पड़ता, परन्तु उस स्थिति में भी प्रसन्नचित रहकर वे प्रभु
भजन-कीर्तन में मग्न रहते| उनकी ऐसी दशा देखकर संत नामदेव जी का हृदय द्रवित हो
उठा संत नामदेव जी ने भगवान के चरणों में प्रार्थना की- ‘इन भक्तों की ऐसी दशा
मुझसे देखी नहीं जाती, अतएंव आप धन से सहायता करके इनकी निर्धनता तथा कष्ट दूर
करे|’ भगवान ने फरमाया कि रांका बांका को धन की तनिक भी इच्छा नही है क्योंकि वे
संतोष के धन से मालोमाल है| यदि वे धन के लिए इच्छा प्रकट करेंगे तो फिर हम अवश्य
ही उनकी सहायता करेंगे| संत नामदेव जी ने पुन: विनती की- “भगवान,
इस प्रकार पूछने पर तो शायद वे धन लेना स्वीकार न करे| अत: आप उनकी सहायता करे|”
भगवान ने संत नामदेव जी की बात मान ली और उन्हें साथ लेकर उस वन की ओर चल दिए,
जहाँ रांका- बांका लकड़ियाँ लेने जाते थे| भगवान ने वन के उस मार्ग पर, जिधर से
रांका– बांका गुजरते थे, कुछ स्वर्ण – मुद्राये धरती पर डाल दी और फिर नामदेव जी
के साथ एक वृक्ष के पीछे छिप गए| कुछ देर बाद रांका- बांका प्रभुनाम का स्मरण करते
हुए उधर ही आते दिखाई दिए| भक्त रांका आगे-2 चल रहे थे और उनकी पत्नी बांका कुछ
पीछे रह गई| एकाएक भक्त रांका की दृष्टि स्वर्ण मुद्राओं पर जा पड़ी| भक्त जी यह
सोचकर कि स्वर्ण मुद्राओं को देखकर बांका का मन फिसल न जाये, उन मुद्राओं पर
मिट्टी डालने लगे| तब तक बांका उनके निकट पहुँच गई| भक्त जी को एक स्थान से मिट्टी
उठाकर दूसरे स्थान पर डालते देखकर बांका ने पूछा- “स्वामी| यह आप क्या कर रहे है?”
बांका के पूछने पर भक्त रांका ने सारी बात सत्य सत्य कह दी| सुनकर बांका ने उत्तर
दिया- “
स्वामी जैसी यह मिट्टी है वैसे ही वह भी मिट्टी है, फिर मिट्टी पर मिट्टी डालने की
क्या आवश्यकता है? यह कहकर वह वन की ओर बढ़ गई| रांका भी उसके पीछे-2 चल दिए| संत
नामदेव जी उन दोनों के उस उच्च कोटि के विचार पर नतमस्तक हो गए|
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