राजा जन्मेजय
राजा
जन्मेजय परीक्षित का पुत्र और अर्जुन के तनय अभिमन्यु का पोता था। उसने ब्राह्मणों
के कहने पर नागयज्ञ किया जिसमें अनेकों नाग मर गये। क्योंकि उसके पिता महाराज
परीक्षित तक्षक सर्प के डसने से मरे थे,और वह इस यज्ञ के द्वारा उसका बदला ले रहे थे। उस यज्ञ में
महर्षि वेदव्यास जी भी उपस्थित थे। राजा ने उनसे पूछा कि हमारे पूर्व पुरुषों ने
जुआ क्यों खेला था? संग्राम
करके इतने वीरों और विद्वानों का नाश क्यों कर दिया था? उन्हें क्यों किसी विद्वान ने न रोका? वेदव्यास जी ने उत्तर दिया कि भावी बड़ी प्रबल होती है।उसे बड़े
बड़े महापुरुषों ने भी सिर पर धारण किया है। यह सुनकर भी जन्मेजय राजा को विश्वास न
हुआ। वह बोला कि जब मनुष्य को ज्ञात भी हो कि यह काम बुरा है, फिर वह काम करे ही क्यों? वेदव्यास जी त्रिकालदर्शी थे। उन्होंने कहा कि आज हम तुम्हें
सावधान करते हैं कि तुम्हारे पास किसी देश के सौदागर अच्छे अच्छे घोड़े लेकर बेचने
को आएंगे। परन्तु तुम उनसे घोड़े न खरीदना। किन्तु होगा ऐसे कि तुम वे घोड़े खरीद
लोगे। यदि खरीद भी लो तो उनमें से सफेद रंग का घोड़ा जिसके कान काले हों उसे मत
खरीदना। परन्तु तुम उसे भी खरीद लोगे। यदि खरीद भी लो तो उस पर सवार न होना। परन्तु
तुम ऐसा ही करोगे। यदि सवारी करो भी तो दक्षिण दिशा की ओर न जाना। परन्तु तुम
अवश्य जाओगे। यदि उधर तुम्हारा जाना हो भी तो वहाँ से किसी स्त्री को अपने साथ न
लाना। अगर उसे तुम अपने घर में भी ले आओ तो उसे अपनी रानी न बनाना। परन्तु तुम उसे
अपनी पत्नी भी बनाओगे। अगर ऐसा भी कर लो तो उसके कहने में आकर ब्राह्मणों का नाश न
कराना। परन्तु तुम उसका कहना मानकर ब्राह्मणों का वध करा दोगे। इस घोर पातक के
कारण तुम्हें कुष्ठ रोग हो जायेगा। कुछ समय के बात उसने ऋषि की सभी बातें भुला
दीं। इससे जो ऋषि ने कहा था वैसा ही हुआ। ब्राह्मणों की हत्या के परिणाम-स्वरुप
उसे कोढ़ हो गया। तब उसने श्री वेदव्यास जी को स्मरण किया और उनके आने पर यह निवेदन
किया कि, सत्पुरुषों का वचन वस्तुतः ही अटल होता है। मैने विश्वास न करने
से बुरा फल पाया। अब आप कृपा कर मुझे इस दारुण रोग से छुटकारा दिला दो। वेदव्यास
जी ने कथन किया कि आप मुझसे महाभारत की कथा सुनो-उसे जितना तुम सत्य सत्य मानते
जाओगे उतना तुम्हारा कोढ़ भी मिटता जाएगा। जहाँ तुम कथा में कोई संशय करोगे कि ऐसा
तो नहीं हो सकता, तो
शेष कोढ़ शरीर में रह जाएगा। राजा जन्मेजय सत्य सत्य करके कथा सुनते गये। साथ ही
साथ कोढ़ भी मिटता गया। जब यह प्रसंग आया कि भीमसेन इतने बलवान थे कि हाथियों को
घुमा घुमाकर आकाश में उछाल देते थे,जो आज तक भी नीचे नहीं गिरे। जन्मेजय ने कहा कि यह असम्भव है।
उसी समय वेदव्यास जी ने मन्त्रोच्चारण करके जल की चुल्ली आकाश में फैंकी तो गगन मण्डल
में गजराज घूमते हुए दृष्टिगोचर हुए। परन्तु उसका कोढ़ वहीं का वहीं रह गया। वह अब
दूर होने से रह गया।
इन दृष्टान्तों से सिद्ध होता है कि जो भी प्राणी महापुरुषों की मौज के अनुसार उतरे हुए वचनों को सच सच कर मन में धारण नहीं करता, वह अति दुःख पाता है, और जो मनमति को एक ताक पर रख कर उनके वचनों को शिरोधार्य करता है उसके पास सुख संपदा की कोई कमी नहीं रहती।
इन दृष्टान्तों से सिद्ध होता है कि जो भी प्राणी महापुरुषों की मौज के अनुसार उतरे हुए वचनों को सच सच कर मन में धारण नहीं करता, वह अति दुःख पाता है, और जो मनमति को एक ताक पर रख कर उनके वचनों को शिरोधार्य करता है उसके पास सुख संपदा की कोई कमी नहीं रहती।
****
No comments:
Post a Comment