संत कन्नादी
जी
एक संत हुए कन्नादी
जी उनका नाम कन्नादी क्यों पड़ा क्योंकि वो खेतो में से गिरे हुए दाने चुन कर अपने
जीवन का निर्वाह करते थे| और भगवान की भक्ति में सदा लीन रहते थे| एक बार वहाँ के
राजा को जब संत जी के बारे में पता चला तो उन्हें ये महसूस हुआ कि हमारे राज्य में
तो किसी चीज की कमी नहीं है तो उन्होंने मंत्री को कहा कि संत जी के पास अनाज
भिजवा दो| कुछ लोग गए संत जी के पास लेकिन संत जी ने मन कर दिया| जब मंत्री को यह
बात पता चली तो वह खुद गए और कुछ दौलत भी ले गए तब भी सनत जी ने यही कहा कि मुझे
इसकी आवश्यकता नहीं है| जब राजा को यह बात पता चली तो राजा और भी धन और कीमती
सामान ले कर संत जी के पास गया लेकिन फिर भी संत जी ने लेने से मना कर दिया उन्होंने
कहा कि राजन आपको आने कि जरुरत नहीं थी अगर मुझे चाहिए होता तो मैं पहले ही ले
लेता| तब राजा ने पूछा कि आपको इसकी आवश्यकता क्यों नहीं है किसी को भी सामान व्
धन दो तो वह तो ले लेता है| तब संत जी ने फरमाया कि मेरे सतगुरु ने मुझे त्रिलोकी
के उस खजाने से जोड़ दिया जिसके सामने ये धन दौलत तो क्या तीनो लोकों की संपदा भी
तुच्छ है|
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