Monday, May 11, 2020

श्री कागभुसुंडि जी

कागभुसुंडि जी से सात प्रश्न पूछे

गरुड़ जी ने कागभुसुंडि जी से सात प्रश्न पूछे|

प्रथम- सृष्टि के अंदर जड़ तथा चेतन जितने भी जीव है, सब से दुर्लभ शरीर कौन-सा है?

उत्तर- मनुष्य देह के समान दूसरी कोई देह नहीं है| चर अथवा अचर अर्थात चलने फिरने और न चलने वाले, जड़ व चेतन सृष्टि के अंदर जितने भी जीव है, सब इस देह की याचना करते हैं|

दूसरा – इस संसार में सब से बड़ा दुःख क्या है?

उत्तर- संसार में दरिद्रता के समान दूसरा कोई दुःख नहीं है|

तीसरा– इस संसार में सबसे बड़ा सुख क्या है?

उत्तर- संतो के मिलने के समान दूसरा कोई सुख नहीं है|

यहाँ पर प्रश्न उठता है कि दरिद्रता कंगालपन को कहते हैं या धनहीन को|  यह धन की हीनता माया का धन है या भक्ति का धन? उत्तर साफ़ है यह भक्ति का धन है- जिसके बिना मनुष्य कंगाल और दुखी है| क्योंकि जब यह कहा गया कि संतो के मिलाप के समान दूसरा कोई सुख नहीं है तो फिर यह बात सिद्ध हो जाती है कि भक्ति से हीन होने के बराबर दूसरा कोई दुःख भी नहीं है| किन्तु जब संत मिलते है तो अपनी भक्ति का धन देकर सुखी कर देते है क्योंकि संतो के पास  भक्ति ही का धन होता है|

चौथा – संत सत्पुरुषों तथा दुष्ट पुरुषों का सहज स्वभाव वर्णन कीजिये|

उत्तर- मन वचन और कर्म से उपकार करना संतो का सहज स्वभाव है| यहाँ तक कि संत दूसरे के हित के निमित्त अपने ऊपर दुःख भी सहते है, जैसे भोज पत्र का वृक्ष दूसरों को सुख देने के निमित्त अपनी खाल खिंचवाता है (भोज परत के वृक्ष की खाल उतार कर ऋषि मुनि और तपस्वी लोग अपने शरीर को ढ़कते थे)| तात्पर्य यह है कि संत दूसरों की भलाई के लिए दुःख सहन करते हैं तथा खोटे पुरुष दूसरों की बुराई के निमित दुःख सहते हैं| दुष्ट पुरुष बिना प्रयोजन ही दूसरों की बुराई करते हैं, जैसे साँप काट लेता है, तो उसको कुछ लाभ नहीं होता पर दूसरों के प्राण चले जाते है| चूहा बहुमूल्य वस्त्रों को काट डालता है, दूसरों की हानि हो जाती है परन्तु उसका कुछ लाभ नहीं होता| फिर कहते हैं जैसे बर्फ के ओले खेती का नाश करके आप नष्ट हो जाते है, ऐसे ही दुष्ट जन दूसरो की सम्पदा का नाश करके आप भी नष्ट हो जाते है|

पांचवाँ – वेदों ने कौन-सा सबसे बड़ा पुण्य बताया है?

उत्तर- वेदों में सबसे बड़ा पुण्य अर्थात परम धर्म अहिंसा कहा गया है| अर्थात किसी की आत्मा ना दुखाना ही अहिंसा है|

छठा – सबसे घोर पाप कौन-सा है

उत्तर-परायी निंदा के समान कोई बड़ा पाप नहीं है| कागभुसुंडि जी का कथन है कि भगवान और गुरु की निंदा करने वाले मेंढ़क की योनि में जाते हैं और हजार जन्म तक मेंढ़क ही बनते रहते हैं तथा संतो की निंदा करने वाले उल्लू की योनि में जाते है| जिनको मोह रुपी रात्रि प्यारी है परन्तु ज्ञान रूपी सूर्य नहीं भाता अथवा जो मूर्ख सब की निंदा करते हैं, वे दूसरे जन्म में चमगादड़ बनते है

सांतवाँ – मानसिक रोग कौन-2 से है?

उत्तर- अब मन के रोग सुनिए, जिन से सब लोग दुःख पाते है| सम्पूर्ण व्याधियों अर्थात रोगों की मूल जड़ मोह है| इस मोह से फिर अनेक प्रकार के शूल उत्पन्न होते है यदि मोह की जड़ कट जाए तो फिर शांति ही शांति है |

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पिछले जन्मों की कथा

काकभुशुण्ड जी ने गरूड को अपनी पिछले जन्मों की कथा सुनाई कि एक बार मैं शिवजी के मन्दिर में बैठकर शिवजी की उपासना कर रहा था उसी अवसर में गुरु महाराज भी आ गये किन्तु मैंने अभिमान वश उठकर उनको प्रणाम न किया| विचार यह था कि इस समय तो मैं शिवजी के मंदिर में बैठकर तप करता हूँ| इस समय गुरु को प्रणाम करने की क्या आवश्यकता है| गुरु महाराज जी तो बड़े दयालु थे| उन्होंने तो कुछ न कहा और न ही उन के हृदय में क्रोध आया| परन्तु हे गरूड जी| गुरु का निरादर करना तो महाघोर पाप है उसको शिवजी महाराज सहन न कर सके| क्रोध से भरी हुई मंदिर से आकाश वाणी उतरी| सो मंदिर में से यह आकाशवाणी हुई- अरे हतभाग्य नीच अभिमानी| यद्यपि तेरे गुरु को कुछ भी क्रोध नहीं उपजा क्योंकि वे दयामय सन्त है और पूर्ण ज्ञानी हैं| हे मूर्ख| तदपि मैं तुझको श्राप देता हूँ| क्योंकि नीति के विरुद्ध चलने वाला मुझे अच्छा नहीं लगता| रे दुष्ट! जो मैं तुम को दण्ड नहीं दूंगा तो मेरा नीति का मार्ग भ्रष्ट हो जाएगा क्योंकि गुरु का अपमान करना वेद शास्त्रों की नीति के विरुद्ध बात है| इसलिए वेद की नीति की रक्षा के लिए मैं तुझे अवश्य श्राप दूंगा| उस आकाशवाणी में यह वचन भी हुआ कि जो मूर्ख गुरु के साथ ईर्ष्या करते हैं वे सौ कल्प तक रोख नामक आग में जलते है| तत्पश्चात हजार जन्म तक नीच योनियों के अन्दर जाकर महाकष्ट सहन करते हैं| रे पापी| तू गुरु को आते देखकर अजगर की भांति जमकर बैठा रहा| इस कारण मेरा श्राप है कि तू अजगर हो जा| अरे दुष्ट| तेरी बुद्धि में पाप समा गया है, इसलिए तू सर्प योनि की महान नीच गति को पाकर किसी बड़े पुराने पेड़ की जड़ के नीचे भयानक अँधेरी खोड में जाकर निवास कर| शिवजी का ऐसा कठिन श्राप सुनकर गुरु महाराज सहन न कर सके और मन में अति दुखित होकर शिवजी के मंदिर में जाकर उन्होंने प्रार्थना की कि हे देवो के देव! कलियुग के जीव मन माया के अधीन सदा भूलते हैं| इन पर दया होनी चाहिये और भूल चूक को क्षमा कर देना चाहिये और साथ ही गुरु महाराज ने शिवजी की स्तुति भी की| तब मंदिर से फिर आवाज आई- ऐ परोपकारी महात्मन! यद्यपि आपके शिष्य ने दारूण पाप किया है और मैंने भी क्रोध करके श्राप दिया है तदपि आपके दयामय, परोपकारी, साधु स्वभाव को देख कर इस पर विशेष कृपा करता हूँ| ऐ महात्मन, मेरा श्राप तो व्यर्थ जा नहीं सकता| हजार जन्म तो यह अवश्य पायेगा, किन्तु जन्मते और मरते समय जो जीव को अत्यंत दुःख होता है, वह दुःख इसको विचिन्तमात्र भी नहीं व्यापेगा| ऐ परोपकारी महापुरुष| दूसरी कृपा इस पर यह करता हूँ कि जिस जन्म में यह जायेगा किसी भी जन्म में इस का ज्ञान नहीं मिटेगा| अपने सारे जन्मों की इस को सुधि रहेगी| तीसरी कृपा में यह करता हूँ कि अन्त में इसे भगवान की भक्ति प्राप्त होगी|

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कौवे का शरीर

काकभुशुण्डि जी और गरुड़ जी का संवाद जो रामायण में आया है, उसमें गरुड़ जी प्रश्न करते हैं कि हे स्वामिन्! आपका शरी़र कौवे का है। कौवा वैसे भी नीच पक्षी माना गया है। जब आपकी कमाई इतनी है कि आप अपनी इच्छा अनुसार शरीर बदल सकते हैं तो आपने कौवे के शरीर को क्यों रखा हुआ है। गरुड़ जी ने इस प्रकार कई प्रश्न काकभुशुण्डि जी के सामने बड़ी श्रद्धा पूर्वक रखे। जिनका उत्तर काकभुशुण्डि जी ने बड़ी नीति के अनुसार दिया। सत्संग का आनन्द भी तभी आता है जब गरुड़ जैसे श्रोता और काकभुशुण्डि जैसे वक्ता हों। जब श्रोता वक्ता के समक्ष श्रद्धा के साथ कोई प्रश्न रखता है जिसको वह स्वयं नहीं जानता और समझने का इच्छुक है, तब वक्ता को भी यह पता चलता है कि श्रोता कितनी सावधानी वचन सुन रहा है और कितनी उसमें योग्यता है। काकभुशुण्डि जी उत्तर देते हैं-

राम भगति एहि तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी।।
तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु वेद भजन नहिं वरना।।    

अर्थः-चूंकि मुझे इसी शरीर से मेरे ह्रदय में मालिक की भक्ति उत्पन्न हुई, इसी से हे स्वामी! यह मुझे परम प्रिय है। मेरा मरण अपनी इच्छा पर है, परन्तु फिर भी मैं यह शरीर नहीं छोड़ता, क्योंकि वेदों ने वर्णन किया है कि शरीर के बिना भजन नहीं होता।

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