तुलसीदास
का वैराग्य
कहते
हैं कि इंसान का मन भजन में तभी लगता है, जब उसके दिल में वैराग्य की भावना आती
है| श्री गोस्वामी तुलसीदास जी, जिन्होंने रामायण की रचना की है, को भी वैराग्य
हुआ| संसार जानता है कि जब उनका विवाह हुआ तो उनका अपनी स्त्री के साथ कितना मोह,
प्यार और लगन थी| इतने वासना के अधीन और
स्त्री के वशीभूत जिस का प्रमाण संसार में बहुत कम मिलता है| लेकिन जब समय आ गया
और पूर्व जन्मों के शुभ कर्म फल देने को आये तो संसार की मोह माया से दिल उखड़ने का
कारण उसी स्त्री का एक वाक्य ही बना| स्त्री ने अपने प्रति उनके अत्यंत प्रेम को
देखकर ये वचन कहे| ऐसा समझो कि प्रेरणा करने वाला मालिक उस स्त्री के मुँह से
बोला-
दिग
दिग दिग तोही प्राण प्यारे
हाड
चाम अति नीरस हमारे
इतनी
प्रीटी जी लगत रामे
तो
सुधारे तेरे सब काम
नारी
वचन शर सम हिये लागे
पूर्व
सकल पुन्य तब जागे
तुलसीदास
कहे मान गिलानी
है
सत्य है सत्य तीय तव वाणी
शुकर
शेत्र ग्यु पुनि सौगुरु कियो
तह
अति मुद् मौरामायण अध्यातम पायो
स्त्री
के वचन तुलसीदास जी को तीर के समान लगे| छाती फट गई और अपने आप को धिक्कारते हुए
स्त्री से बोले- प्रिय|
तेरी वाणी सत्य है| मैं सचमुच मूर्ख हूँ, जो भगवान की भक्ति से विमुख होकर माया के
पीछे अंधा हो रहा हूँ| बस तेरा और मेरा यह अंतिम मिलाप था जो मेरे लिए शिक्षादायक
बना, अब मैं जाता हूँ| ठोकर लगते ही कुरुक्षेत्र को गए, वहाँ पर गुरु का मिलाप
हुआ| तब गुरु की अत्यंत श्रद्धा सहित सेवा कर के अध्यात्म रामायण अर्थात रूहानी
उपदेश प्राप्त किया और भजनाभ्यास कर के उच्चकोटि के संतो की श्रेणी पर जा पहुँचे|
जब अन्तर्मन की आँख खुली तो त्रेतायुग भगवान श्री राम जी की कथायें और लीलाये ज्यो
की त्यों कलियुग के अंदर श्री रामचरितमानस के रूप में लिख दी जिसके सामने आज लोग
श्रद्धा भक्ति से सिर झुकाते और प्यार करते हैं|
*****
तुलसीदास
जी को भगवान् के दर्शन
कहते हैं तुलसीदास
जी को जब से संसार से वैराग्य उत्पन्न हुआ था| तब से ही उनके दिल में भगवान श्री
रामचंद्र जी के दर्शनों की इच्छा पैदा हो गई थी| गुरु के मिलने पर और उनके मुखारविंद
से भगवान राम की कथा विस्तारपूर्वक सुनने से यह इच्छा बहुत तेज हो गई थी| काशी में
रहते हुए इनका यह नियम बन चुका था कि जहाँ भी श्री राम जी के चरित्र और लीला का
वर्णन होता, वहाँ वह अवश्य जाते और मन लगाकर सुनते थे| ऊपर लिखा जा चुका है कि सच्ची लगन
अपना काम किये बिना नहीं रहती|
मालिक की सहायता से किसी न किसी कारण द्वारा रास्ता अपने आप खुल जाता है| गोसांई तुलसीदास जी का स्वभाव था कि
शोच क्रिया के लिए वह बहुत दूर जाते थे और शोंच क्रिया से कमण्डल में जो जल बचता
था वह एक बेरी के वृक्ष की जड़ में डाल देते थे| वह प्रेत बहुत सुख मानता था| इसी प्रकार जब कुछ काल व्यतीत हुआ तब
एक दिन वह प्रेत यू बोला– ऐ गुसाईं अब मैं तुम्हारी सेवा से अति प्रसन्न हूँ| जो दिल में आये वह माँग लो, मैं तुम्हे
देने को तैयार हूँ| यह वाणी सुनकर
गोसांई जी चकित हो बोले– तुम कौन हो और कहाँ से बोलते हो? मैंने कौन सी तुम्हारी
सेवा की है| जिससे आप मुझ पर
प्रसन्न है| वह बोला– मैं
प्रेत हूँ, इस बेरी के पेड़ के नीचे मेरा स्थान है| इस पर जो तुम जल डालते रहे हो, उसे
मैंने अपनी सेवा समझा है, सो वर माँगो|
तुलसीदास जी बोले – मैं मनुष्य हूँ, तुम प्रेत हो| प्रेत मनुष्य को क्या दे सकते हैं?
हाँ अगर आप कुछ दे सकते हैं तो जो मैं माँगता हूँ, वह दीजिये| प्रेत बोला – कहिये| आप क्या चाहते है? गोस्वामी जी ने कहा
– मुझे केवल श्री रामचंद्र जी के दर्शन की इच्छा है| अगर आप की कृपा से दर्शन हो जावे तो
जीते जी आपके गुण गाता रहूँ|
मेरी और कुछ इच्छा नहीं है|
यह सुनकर प्रेत प्रसन्न होकर बोला – श्री रामचंद्र जी का दर्शन कराने की मुझ में
सामर्थ्य नहीं है| परन्तु सहायता के
रूप में एक मार्ग आप को बतलाता हूँ संभव है उस मार्ग पर चलने से आप की मनोकामना
पूर्ण हो जाये| जहाँ तुम रामायण
सुनने जाते हो, वहाँ सब से पीछे जाकर देखो एक मनुष्य बड़े निर्धन, दुखी, दीन वेश बनाये रोगी और नेत्र दुखित से किये, जो
कथा में सबसे पहले आते हैं और सब श्रोताओं से पीछे उठते हैं, कमर में फटा दुपट्टा
लपेटे बहुत धीरे धीरे लंगड़े से होकर चलते हैं| उन्हें रामायण के सुनने का बड़ा प्रेम
है| वास्तव में वह
भगवान राम के प्यारे भक्त हनुमान जी हैं|
उनकी शरण में जाओ| यदि वह तुम पर
प्रसन्न हो जाते तो वह आप को राम के दर्शन करा सकते हैं| याद रखना वह अपना आप छुपायेंगे,
मानेंगे नहीं| परन्तु उनका पीछा
मत छोड़ना| यह मेरी वाणी सत्य
समझो| प्रेत के वचन
सुनकर तुलसीदास जी के मन में बड़ा आनंद हुआ|
उसका अति आनन्द करते हुए घर आये और तुरंत ही कथा सुनने को चल पड़े| कथा सुनते हुए उन्होंने हनुमान जी को
महा मलीन टूटे फूटे वेष में महा कुरूप देखा, नेत्र विहीन भिखारी के समान दूर ही
बैठे थे| जैसे प्रेत ने
बतलाया था जब कथा समाप्त हो गई, तब श्रोतागण अपने अपने घरों को गए| तुलसीदास जी कुछ समय तक बैठे रहे| जब हनुमान जी वहाँ से उठकर चले,
तब एकान्त में अवसर पाकर तुलसीदास जी ने दौड़कर उनके चरण पकड़ लिए| तब उन्होंने आगे से यों कहा – अरे कौन
है? छोड़ छोड़| मुझे मत छुओ| मैं बूढ़ा रोगी हूँ| मुझे कुछ मत कहो| जब हनुमान जी ने तुलसीदास को इस प्रकार
कहा कि मुझे मत छुओ तब तुलसीदास जी बोले- अब तुम नहीं छूट सकते या तो दर्शन दो या
प्राण लो| महावीर ने छुड़ाने
के बहुत उपाय किये परन्तु तुलसीदास जी ने दृढ़ता से उनके चरणों को पकड़ लिया अर्थात
चरणों के साथ लिपट गए|
तब महावीर जी प्रसन्न हो बोले- जो इच्छा हो माँगो| तुलसीदास जी बोले- अपना रूप दिखाओ और
मेरे सिर पर हाथ धरो|
मुझे और कुछ नहीं चाहिए|
केवल भगवान का दास होना चाहता हूँ|
मुझे श्री राम चन्द्र जी के दर्शन करा दो क्योंकि आप हर प्रकार से समर्थ हो| जब तुलसीदास जी ने हनुमान जी के चरणों
को दृढ़ता से पकड़ लिया, तब हनुमान जी ने पना रूप दिखाया और तुलसीदास जी से कहा, ऐ
चतुर तुलसीदास जी| तुम चित्रकूट को
चलो, वहाँ तुम को सुखमय राम का दर्शन होगा|
यह कहकर हनुमान जी ने अपना रूप छुपा लिया|
तुलसीदास जी अपने आश्रम में आये और कुछ दिन बाद चित्रकूट को चल दिये| पत्थर की एक साफ़ और शुद्ध शिला पर
गोस्वामी जी, श्री राम और लक्ष्मण जी के दर्शन की प्रतीक्षा में बैठे थे कि एक तरफ
से घोड़ों पर चढ़े दो धनुषधारी आ प्रकट हुए|
बाण को धनुष पर चढ़ाये मृग के पीछे धावमान हो रहे थे| तुलसीदास जी ने उन दोनों को कोई शिकार
खेलने वाले किसी राजा के लड़के जानकर हरे राम हरे राम कहते हुए नेत्र मूंद लिये| जब दोनों राजकुमार चले गये तब पीछे से
हनुमान जी ने आकर कहा- प्रभु का दर्शन पाया के नहीं? वह दोनों राम लक्ष्मण ही थे| तुलसीदास जी बोले हाय| मैंने तो उन्हें शिकारी जानकर अपने
नेत्र ही मूंद लिये| ऐ महावीर जी मेरी
अभिलाषा पूरी नहीं हुई, जैसा आपने कहा था वह पूर्ण करो| तब हनुमान जी बोले| ऐ तुलसीदास जी| कल राम घाट को चलो| तब प्रात:काल होते ही तुलसीदास जी
आनंदपूर्वक राम घाट को गए, वहाँ स्नान करके चन्दन घिस रहे थे कि राम लक्ष्मण के
दर्शन पाकर उनके मस्तक पर लगावेंगे|
इतने में दोनों दशरथ कुमार बाल अवस्था बनाए साधुओं के रूप में आ गये और बोले- बाबा| हमें चन्दन दीजिये| तब तुलसीदास जी ने सहज स्वभाव से कहा-
चन्दन तो मैं तुम्हारे मस्तक पर लगाये देता हूँ, परन्तु यह तो बताओ कि तुम राम
लक्ष्मण हो कि नहीं? क्योंकि चन्दन में उनके लिए घिस रहा हूँ| तब वह बालक बोले- संसार में जितने भी
साधु सन्त है, वह सब राम लक्ष्मण की ही मूर्ति है| यह कहकर चन्दन ले, दोनों कुमार चले
गये| पीछे से महाबीर जी
आये और बोले- तुमने दर्शन पाया|
तब तुलसीदास जी ने यह दोहा उच्चारण किया-
चित्रकुट के घाट
में, भई साधुन की भीर|
तुलसीदास चन्दन
घिसे, तिलक करे रघुवीर||
फिर हाथ जोड़कर
प्रार्थना की, ऐ पवनकुमार|
सुनो, मैं राज समाज सहित चारों भाईयों के दर्शन करना चाहता हूँ हनुमान जी ने कहा,
कलयुग में ऐसे दर्शन किसी को नहीं होते|
तुलसीदास जी बोले- आपकी कृपा से मुझे इसमें कुछ आश्चर्य मालूम नहीं होता| तब महावीर जी बोले, कल कमाद्नाथ जाकर
श्री राम चन्द्र जी का ध्यान हृदय में धारण कर के बैठो| यह कहकर महाबीर जी अन्तर्ध्यान हो गए| प्रात:काल होते तुलसीदास जी वहाँ गए
और दोपहर तक बैठे रहे, तब सीतापति दर्शन देने आए उस समय उत्तर दिशा में पहले तो
धूल छा गई, फिर दशों दिशाओ में प्रकाश हो गया| अनगिनत मतवाले हाथी, घोड़े और विविध
भाँति के रथ उनके साथ थे, अनेक बन्दीगन स्तुति कर रहे थे, बड़ा शब्द हो रहा था कि
कौशलपति महाराज की जय हो|
रथ में चारों भाई सवार थे, जो महाराज के चरणों की सेवा करते थे| तब तुलसीदास जी ने नेत्रभर रघुकुल राज
(श्री रामचन्द्र जी) के दर्शन पाकर आरती सजाई| परिक्रमा करके प्रेम में विह्वल हो गए| इस प्रकार प्रकट दर्शन पाया||
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