बंधु महान्ति की
भक्ति
बन्धु महान्ति की कथा बड़ी ही शिक्षाप्रद
है भक्त बन्धु महान्ति यद्यपि निर्धन थे परन्तु थे बड़े ही संतोष प्रिय| बन्धु
महान्ति के पास थोड़ी सी खेती की भूमि थी,
उससे जो कुछ प्राप्त होता था| उसी से जैसे-तैसे परिवार का निर्वाह होता था| भक्त बन्धु महान्ति के दिन इसी प्रकार
बीत रहे थे कि उस क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा|
कुएँ तालाब आदि सूख गए| बन्धु महान्ति के घर की स्थिति भी ख़राब
थी, यहाँ तक कि उन्हें
निरंतर तीन दिनों तक कुछ भी खाने को न मिला|
माता से बच्चों का भूख से तड़पना एवं
बिलखना न देखा गया| उसने भक्त जी से
कहा-" स्वामी| आप तो जानते ही हैं कि मेरे माता-पिता और भाई स्वर्गवासी हो चुके हैं| अन्य कोई सम्बंधी भी मेरा नहीं है| जिससे इस विपदा की घड़ी में कुछ सहायता
माँगू| परन्तु क्या आपके
भी कोई बन्धु-बान्ध्व, सम्बंधी अथवा मित्र नहीं है? बन्धु महान्ति बोले- "इस संसार में केवल एक ही सम्बंधी, सुहृद एवं मित्र है, परन्तु उनके पास पहुँचने में तो पांच-छह दिन लग जायेंगे| हाँ| हम लोग यदि उनके पास पहुँच जाये तो वे
अवश्य ही हम दीनों की सहायता करेंगे| उनका
तो नाम ही दीनबन्धु है|"
स्त्री ने भक्त जी के कथन का तात्पर्य तो न समझा, परन्तु उनके कथन पर कुछ आश्वस्त होते
हुए बोली- यहाँ भूखे मरने से
तो चलना ही ठीक है| कुछ सहायता मिलेगी
तो बच्चों का पेट भरेगा| यह
कहकर वह तुरन्त तैयार हो गई| पाँचों
प्राणी मार्ग की कठिनाइयाँ सहते और पेड़ों के पत्ते आदि खाते हुए छठे दिन संध्या
समय जगन्नाथ पुरी जा पहुँचे और सीधे जगन्नाथ जी के मंदिर गये| सिध्द्वार पर बड़ी भीड़ थी, अत: बन्धु महान्ति अपने परिवार के साथ
मंदिर के बाहर दक्षिण की ओर एक जगह जा बैठे|
स्त्री ने कहा- "आप यहाँ आकर क्यों बैठ गए? आपके सम्बंधी कहाँ रहते हैं? आप उनके पास क्यों नहीं चलते?" भक्त जी ने कहा-"अब तो रात होने वाली है इस समय उनसे
भेंट होना मुश्किल है आज की रात तो पानी पीकर जैसे-तैसे गुजारा करो, कल उनसे भेंट करके सारी स्थिति बताऊंगा" स्त्री यह सुनकर चुप ही रही, इस आशा में कि सुबह जब भक्त जी अपने
सम्बंधी से मिलेंगे तो उनके सारे संकट दूर हो जायेंगे| परन्तु भक्त जी के हृदय की आस्था कुछ
और ही तरह की थी| वह भगवान से न तो
अन्न माँगने और न ही धन माँगने यहाँ आये थे|
वह तो यह सोचकर यहाँ आये थे कि भगवान
के दर्शन करके उनकी पावन नगरी में यदि शरीर छूट जाए तो इससे बढ़कर सौभाग्य क्या होगा? स्त्री और बच्चे सो गए, परन्तु बन्धु महान्ति बैठे-बैठे भगवान का सिमरन ध्यान करने लगे| उधर जगन्नाथ जी के मंदिर में रात की
सेवा के बाद द्वार बंद किये गए| सेवक
सो गए, परन्तु दीनबन्धु
भगवान को नींद कहाँ थी? उनका
एक परम भक्त, जिसे केवल उन्ही का
ओट-आसरा था, जो अपना सुहृद, सम्बंधी, मित्र- सब कुछ उन्ही को मानकर यहाँ आया था, जिसे उनकी दीन- बंधुता पर अटल विश्वास था, वह भक्त परिवार सहित भूखा हो तो
दीनबन्धु को नींद कैसे आती? सबके
सो जाने पर वे उठे, ब्राह्मण का वेश
धारण कर भण्डार गृह में गए और रत्न्थाल को व्यंजनों से सजाकर बन्धु जी को आवाज
लगाने लगे| महन्त जी उनकी आवाज
सुनकर हैरान हो गये कि यहाँ उनको कौन जानता है जो आवाज लगा रहा है| जब महन्त जी उनके पास गए तो ब्राह्मण
जी बोले, "तुम्हे
कितनी देर से आवाज दे रहा हूँ, थाल
पकड़े-पकड़े मेरे हाथ दर्द
करने लगे| लो यह थाल संभालो
और आज की रात इससे काम चलाओ| महन्त
जी को कुछ समझ नहीं आ रहा था वे ब्राह्मण को आश्चर्य से देखते रहे| जैसे उनपर किसी ने जादू कर दिया हो| उन्होंने बिना कुछ पूछे थाल पकड़ लिया
और स्त्री बच्चों के पास पहुँच गए और बोले-
कि मंदिर में कोई पुजारी था पता नहीं
वह मुझे कैसे जानता है| उस
रात सभी ने वह खाना खाया, रात
बीती, सुबह हुई| महन्त ने वो थाल अपने पास रख लिया था
क्योंकि जब वह थाल वापिस करने गया था तो मंदिर का द्वार बंद था| अब अगले दिन मंदिर के भण्डारी ने गृह
खोला तो सब वस्तुएं इधर-उधर
बिखरी पड़ी थी और भगवान के भोजन का रत्न थाल गायब था| अब वहाँ हल्ला मच गया जांच शुरू की गई
तो महन्त जी के पास वह थाल मिला| तो
महन्त जी ने उन्हें रात की सारी घटना बताई|
परन्तु लोगों को विश्वास न आया परिणाम
यह हुआ कि उन्हें कारागार में डाल दिया गया|
उसी शहर के राजा प्रतापरूद्र उस दिन उस
जगह से कुछ दूर "खरदा" नामक स्थान पर अपने महल में सो रहे थे
उन्होंने स्वप्न में देखा कि भगवान जगन्नाथ जी उनसे कह रहे है कि मेरे एक भक्त को
ऐसे ही कारागार में डाल दिया गया है भगवान ने विस्तारपूर्वक
सारी बात बताई| मंदिर के किसी
व्यक्ति ने उसकी बात न मानी| तुम्हारे
राज्य में बाहर से आने वाले भक्तों को कोई भोजन ही नहीं पूछता| बन्धु महन्त मेरा प्रिय भक्त है अत: मैं उसे रत्न थाल में प्रसाद दे आया था| परन्तु किसी ने उसकी बात न मानी| अब तुम तुरंत जाओ और उसे कारागार से
रिहा करवाओ| वह तुरंत ही उठा, अपनी आँखे खोली, अपने घोड़े पर सवार होकर सीधे कारागार
पहुँचा वहाँ महन्त जी व उसके परिवार को रिहा करवाया और हाथ जोड़कर बोले- "यहाँ के लोगों ने जो आपको कष्ट दिया है
उसके लिए मैं आपसे क्षमा चाहता हूँ| इसके
पश्चात राजा ने महन्त जी को महल में ले जाकर उनका आदर-सत्कार किया और उन्हें मंदिर का
प्रबंधक घोषित करवा दिया| महन्त
जी उस दिन से वही रहने लगे| अब
मनुष्य विचार करे कि सर्वसमर्थ प्रभु जोकि सभी जीवों को भोजन दे रहे और उनका पालन-पोषण कर रहे हैं, तो क्या वे उनकी संभाल नहीं करेंगे जो
उनके भजन सुमिरन में दिन-रात
लगे हुए हैं? अवश्य करेंगे और
करते हैं| यह बन्धु महान्ति
की उपरोक्त कथा से सिद्ध हो जाता है| अपने
भक्तों के तो वे हर पल साथ होते है|
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