पुत्र
का नाम नारायण
अजामिल
विनयी, सुशील, सदाचारी तथा शस्त्रों का ज्ञाता था| अपने ब्राह्मण पिता की
आज्ञानुसार वह धर्म- कर्म में लीन रह कर प्रतिदिन जंगल से फल- फूल आदि लेने जाता
था| एक दिन वन से लौटते हुए उसने एक पुरुष को, जो नशे में चूर था, एक वैश्या के
साथ देखा| अजामिल उस वैश्या के रूप पर मोहित हो गया| उसने अपने पूर्व संस्कारों के
अनुरूप कामवेद से विचलित मन को रोकने की बहुत चेष्टा की, परन्तु असफल रहा और काम
पिशाच ने उसे राहू की भाँति ग्रास बना लिया| मन तो पानी के वेग की भाँति नीचे की
ओर ही बह निकलता है, अत: उस वैश्या की आसक्ति से वह उसका मन-ही-मन चिंतन करने लगा
और अपने धर्म से विमुख हो गया| तब उसने वैश्या को प्रसन्न करने के लिए यथासंभव
साधन जुटाने आरम्भ कर दिए| वह प्रतिदिन सुंदर-2 वस्त्र, आभूषण तथा अन्य वस्तुँए,
जिससे वह प्रसन्न होती थी, ले जाता था| झूठ, चोरी, जुआ तथा अन्य साधनों से धन
कमाकर वह उसको प्रसन्न करने में संलगन हो गया, यहाँ तक कि उसने अपने पिता की सारी
सम्पति भी उस को सौपं दी| अपनी पतिव्रता पत्नी का त्याग कर उसने उस वैश्या से
विवाह कर लिया तथा उसी के घर में रहने लगा| इस प्रकार उसकी आयु का बहुत बड़ा भाग
पापचरण में व्यतीत हो गया| संयोगवश एक बार रमते साधुओं की मंडली अजामिल के घर आई|
उनके सत्संग तथा कुछ समय की संगति से अजामिल में सद्-भावना जागृत हुई| उसने साधुओं
से अपने उद्धार के लिए विनती की| उन्होंने कहा कि तुम अपने सबसे छोटे बच्चे का नाम
नारायण रख लो जिससे कि तुम्हे भगवान की याद हर समय बनी रहे| दूसरे दिन साधु चले
गए| उनके आदेशनुसार उसने सबसे छोटे लड़के का नाम नारायण रख लिया| उसे चूँकि अपने उस
बच्चे से अत्यधिक मोह था| अत: वह हर समय उसकी देख- रेख तथा लालन-पालन में लगा
रहता| जब अजामिल का अंतिम समय निकट आया| तो उसने मरण अवस्था में देखा कि अति भयंकर
आकृतियाँ फाँसी का फन्दा लिए उसके सामने खड़ी है| उसने भयभीत हो ‘नारायण बचाओ बचाओ
नारायण| नारायण| नारायण’ पुकारना
आरम्भ कर दिया| उसकी पुकार को सुनकर भगवान आये और उसे यमदूतों से छुड़ाकर साकेत धाम
में ले गए| यही है संगति का परिणाम| कुसंगति से वह दुराचारी बन, पुन: सज्जनों की
संगति से उसका उद्धार हो गया|
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