चक्रव्यूह
तोड़ना
अभिमन्यु
अर्जुन का पुत्र था| श्री
कृष्ण की बहन सुभद्रा इनकी माता थी| यह
बालक बड़ा होनहार था|
अपने पिता के सारे
गुण इसमें विद्यमान थे|
स्वभाव का बड़ा
क्रोधी था और डरना तो किसी से इसने जाना ही नहीं था| इसी
निर्भयता और क्रोधी स्वभाव के कारण इसका नाम अभि (निर्भय) मन्यु (क्रोधी) 'अभिमन्यु' पड़ा
था| अर्जुन ने धनुर्वेद का सारा ज्ञान इसको दिया था| अन्य
अस्त्र-शस्त्र चलाना भी इसने सीखा था| पराक्रम
में यह किसी वीर से भी कम नहीं था| सोलह
वर्ष की अवस्था में ही अच्छे-अच्छे सेनानियों को चुनौती देने की शक्ति और समार्थ्य
इसमें थी| इसकी मुखाकृति और शरीर का आकर भी असाधारण योद्धा का-सा था| वृषभ
के समान ऊंचे और भरे हुए कंधे थे| उभरा
वक्षस्थल था और आंखों में एक जोश सा था| महाभारत का
भीषण संग्राम छिड़ा हुआ था| पितामह
धराशायी हो चुके थे| उनके पश्चात गुरु द्रोणाचार्य ने कौरवों का सेनापतित्व संभाला
था| अर्जुन पूरे पराक्रम के साथ युद्ध कर रहा था| प्रचण्ड
अग्नि के समान वह बाणों की वर्षा करके कौरव सेना को विचलित कर रहा था| द्रोणाचार्य
कितना भी प्रयत्न करके अर्जुन के इस वेग को नहीं रोक पा रहे थे| कभी-कभी
तो ऐसा लगता था, मानो पाण्डव कौरवों को कुछ ही क्षणों में परास्त कर डालेंगे| प्रात:काल
युद्ध प्रारंभ हुआ| अर्जुन के बाणों से कौरव सेना में हाहाकार मचने लगा| संध्या
तक यही विनाश चलता रहता|
दुर्योधन ने
इससे चिंतित होकर गुरु द्रोणाचार्य से कहा, "हे
आचार्य ! यदि पांडवों की इस गति को नहीं रोका गया, तो
कौरव-सेना किसी भी क्षण विचलित होकर युद्धभूमि से भाग खड़ी होगी| अत:
कोई ऐसा उपाय करिए, जिससे पांडवों की इस बढ़ती शक्ति को रोका जाए और अर्जुन के सारे
प्रयत्नों को निष्फल किया जाए|" दुर्योधन
को इस प्रकार चिंतित देखकर गुरु द्रोणाचार्य ने किसी प्रकार अर्जुन को युद्धभूमि
से हटा देने का उपाय सोचा|
दुर्योधन के कहने से
संशप्तकों ने कुरुक्षेत्र से दूर अर्जुन को युद्ध के लिए चुनौती दी| अर्जुन
उनसे लड़ने को चला गया|
उसके पीछे से
द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह की रचना की और युधिष्ठिर के पास संवाद भिजवाया कि या तो
पांडव आकर कौरव-सेना के इस चक्रव्यूह को तोड़ें या अपनी पराजय स्वीकार करें| जब
संवाद युधिष्ठिर के पास पहुंचा तो वे बड़ी चिंता में पड़ गए, क्योंकि
अर्जुन के सिवा चक्रव्यूह को तोड़ना कोई पाण्डव नहीं जानता था| अर्जुन
बहुत दूर संशप्तकों से युद्ध कर रहा था| चक्रव्यूह
तोड़ने में अपने आपको असमर्थ देखकर पांडवों के शिविर में त्राहि-त्राहि मच उठी| युधिष्ठिर, भीम, धृष्टद्युम्न
आदि कितने ही पराक्रमी योद्धा थे, जो
बड़े-से-बड़े पराक्रमी कौरव सेनानी को चुनौती दे सकते थे, लेकिन
चक्रव्यूह तोड़ने का कौशल,
किसी को भी नहीं आता
था| वह ऐसा व्यूह था, जिसमें
पहले तो घुसना और उसको तोड़ना ही मुश्किल था और फिर सफलतापूर्वक उसमें से बाहर
निकलना तो और भी दुष्कर कार्य था| कौरव
सेना के सभी प्रमुख महारथी उस चक्रव्यूह के द्वारों की रक्षा कर रहे थे| पाण्डव सेना में जब सभी चुप चाप परेशान होकर सभा में बैठे हुए
थे और अर्जुन के बिना,
सिवाय इसके कि वे
अपनी पराजय स्वीकार कर लें, कोई
दूसरा उपाय उनको नहीं सूझ पड़ रहा था, अभिमन्यु
वहाँ आया और सभी को गहन चिंता में डूबा हुआ पाकर युधिष्ठिर से पूछने लगा कि चिंता
का क्या कारण है| युधिष्ठिर ने सारी बात बता दी| उसे
सुनकर वह वीर बालक अपूर्व साहस के साथ बोला, "आर्य
! आप इसके लिए चिंता न करें| दुष्ट
कौरवों का यह षड्यंत्र किसी प्रकार भी सफल नहीं हो सकेगा| यदि
अर्जुन नहीं हैं, तो उनका वीर पुत्र अभिमन्यु तो यहाँ है| आप
दुर्योधन की चुनौती स्वीकार कर लीजिए| मैं
चक्रव्यूह तोड़ने के लिए जाऊंगा|" अभिमन्यु
की बात सुनकर सभी को आश्चर्य होने लगा| एक
साथ सबकी नीचे झुकी हुई गरदनें ऊपर उठ गईं| फिर
भी युधिष्ठिर ने इसे अभिमन्यु की नादानी ही समझा| उन्होंने
पूछा, "बेटा ! तुम्हारे पिता अर्जुन के सिवा इनमें से कोई भी चक्रव्यूह
भेदना नहीं जानता, फिर तुम कैसे इसका भेदन कर सकते हो? उसी
क्षण अभिमन्यु ने सिंह की तरह गरजकर कहा, "आर्य!
आप मुझे बालक न समझें|
मेरे रहते पाण्डवों
का गौरव कभी नहीं मिट सकता| मैं
चक्रव्यूह को भेदना जानता हूं| पिता
ने मुझे चक्रव्यूह के भीतर घुसने का तरीका तो बतला दिया था, लेकिन
उससे बाहर निकलना नहीं बताया था| आप
किसी प्रकार चिंता न करें|
मैं अपने पराक्रम पर
विश्वास करके चक्रव्यूह को तोडूंगा और उससे बाहर भी निकल आऊंगा| आप
चुनौती स्वीकार कर लीजिए और युद्ध के लिए मुझे आज्ञा देकर शंख बजा दीजिए| उस
दुर्योधन को संदेश भिजवा दीजिए कि वीर धनंजय का पुत्र अभिमन्यु उनकी सारी चाल को
निष्फल करने के लिए आ रहा है|" कितनी
ही बार अभिमन्यु ने इसके लिए हठ किया| परिस्थिति
भी कुछ ऐसी थी| युधिष्ठिर ने उसको आज्ञा दे दी| अभिमन्यु
अपना धनुष लेकर युद्धभूमि की ओर चल दिया| उसकी
रक्षा के लिए भीमसेन,
धृष्टद्युम्न और
सात्यकि चले| चक्रव्यूह के पास पहुँचकर अभिमन्यु ने बाणों की वर्षा करना आरंभ
कर दिया और शीघ्र ही अपने पराक्रम से उसने पहले द्वार को तोड़ दिया और वह तीर की-सी
गति से व्यूह के अंदर घुस गया, लेकिन
भीमसेन, सात्यकि और धृष्टद्युम्न उसके पीछे व्यूह में नहीं घुस पाए| उन्होंने
कितना ही पराक्रम दिखाया,
लेकिन जयद्रथ ने उनको
रोक लिया और वहीं से अभिमन्यु अकेला रह गया| अर्जुन
का वह वीर पुत्र अद्भुत योद्धा था| व्यूह
के द्वार पर उसे अनेक योद्धाओं से भीषण युद्ध करना पड़ा था, लेकिन
उसका पराक्रम प्रचण्ड अग्नि के समान था| जो
कोई उसके सामने आता था,
या तो धराशायी हो
जाता या विचलित होकर भाग जाता था| इस
तरह व्यूह के प्रत्येक द्वार को वह तोड़ता चला जा रहा था| कौरवों
के महारथियों ने उस वीर बालक को दबाने का कितना ही प्रयत्न किया, लेकिन
वे किसी प्रकार भी उसे अपने वश में नहीं कर पाए| उसके
तीक्ष्ण बाणों की मार से व्याकुल होकर दुर्योधन ने गुरु द्रोणाचार्य से कहा, "हे
आचार्य! अर्जुन का यह वीर बालक चारों ओर विचर रहा है और हम कितना भी प्रयत्न करके
इसकी भीषण गति को नहीं रोक पाते हैं| एक
के बाद एक सभी द्वारों को इसने तोड़ दिया है| यह
तो अर्जुन के समान ही युद्ध-कुशल और पराक्रमी निकला| अब
तो पांडवों को किसी भी प्रकार पराजित नहीं किया जा सकता|" इसी
प्रकार कर्ण ने भी घबराकर द्रोणाचार्य से कहा, " हे
गुरुदेव ! इस पराक्रमी बालक की गति देखकर तो मुझको भी आश्चर्य हो रहा है| इसके
तीक्ष्ण बाण मेरे हृदय को व्याकुल कर रहे हैं| यह
ठीक अपने पिता अर्जुन के समान ही है| यदि
किसी प्रकार इसको न रोका गया तो हमारी यह चाल व्यर्थ चली जाएगी| अत:
किसी तरह से इसको चक्रव्यूह से जीवित नहीं निकलने देना चाहिए|" द्रोणाचार्य
अभिमन्यु की वीरता देखकर कुछ क्षणों के लिए चिंता में डूबे रहे| अर्जुन
के उस वीर पुत्र ने कर्ण,
दु:शासन आदि
महारथियों को पराजित कर दिया था और राक्षस अलंबुश को युद्धभूमि से खदेड़कर बृहद्बल
को तो जान से ही मार डाला था| दुर्योधन
के सामने ही उसके बेटे लक्ष्मण को भी उसने मार डाला था| बड़े-बड़े
शूरवीर खड़े देखते रह गए और वह प्रचण्ड अग्नि की लपट की तरह सबको भस्म करता हुआ
चक्रव्यूह को तोड़कर अंदर घुस गया| जब
कौरवों के सारे प्रयत्न निष्फल चले गए तो उन्होंने छल से काम लेने की बात सोची| अलग-अलग
लड़कर कोई भी महारथी अभिमन्यु से नहीं जीत सकता था, इसलिए
उन्होंने मिलकर उस पर आक्रमण करने का निश्चय किया| कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा
बृहद्बल (शकुनि का चचेरा भाई), कृतवर्मा
और दुर्योधन आदि छ: महारथियों ने उसे घेर लिया और उस पर भीषण आक्रमण कर दिया| कर्ण ने
अपने बाणों से उस बालक का धनुष काट डाला| भोज
ने उसके घोड़ों को मार डाला और कृपाचार्य ने उसके पाश्र्व रक्षकों के प्राण ले लिए| इस
तरह अभिमन्यु पूरी तरह निहत्था हो गया, लेकिन
फिर भी जो कुछ उसके हाथ में आया उससे ही वह शत्रुओं को विचलित करने लगा| थोड़ी
ही देर में उसके हाथ में एक गदा आ गई| उससे
उसने कितने ही योद्धाओं को मार गिराया| दु:शासन
का बेटा उसके सामने आया|
घोर संग्राम हुआ| अकेला
अभिमन्यु छ: के सामने क्या करता| महारथियों
ने अपने बाणों से उसके शरीर को छेद दिया| अब
वह लड़ते-लड़ते थक गया था|
इसी समय दु:शासन के
बेटे ने आकर उसके सिर पर गदा प्रहार किया, जिससे
अर्जुन का वह वीर पुत्र उसी क्षण पृथ्वी पर गिर पड़ा और सदा के लिए पृथ्वी से उठ
गया| उसके मरते ही कौरवों के दल में हर्षध्वनि उठने लगी| दुर्योधन
और उसके सभी साथी इस निहत्थे बालक की मृत्यु पर फूले नहीं समाए| किसी
को भी उसकी अन्याय से की गई हत्या पर तनिक भी खेद और पश्चाताप नहीं था| जब
अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार पाण्डव-दल में पहुंचा तो युधिष्ठिर शोक से व्याकुल
हो उठे| अर्जुन की अनुपस्थिति में उन्होंने उसके लाल को युद्धभूमि में
भेज दिया था, अब उनके आने पर वे उसको क्या उत्तर देंगे, इसका
संताप उनके हृदय को व्याकुल कर रहा था| भीम भी
अपने भतीजे की मृत्यु पर रोने लगा| वीर
अभिमन्यु की मृत्यु से पांडवों के पूरे शिविर में हाहाकार मच गया| संशप्तकों
से युद्ध समाप्त करके जब अर्जुन वापस आया तो वह दुखपूर्ण समाचार सुनकर मूर्च्छित
हो उठा और अभिमन्यु के लिए आर्त्त स्वर से रुदन करने लगा| श्री
कृष्ण ने उसे काफी धैर्य बंधाया, लेकिन
अर्जुन का संताप किसी प्रकार भी दूर नहीं हुआ| प्रतिशोध
की आग उसके अंतर में धधकने लगी और जब तक जयद्रथ को मारकर उसने अपने बेटे के खून का
बदला न ले लिया, तब तक उसको संतोष नहीं आया|
श्री कृष्ण को भी
अभिमन्यु की मृत्यु पर कम दुख नहीं हुआ था, लेकिन
वे तो योगी थी, बालकों की तरह रोना उन्हें नहीं आता था| प्रतिशोध
की आग उनके अंदर भी जल रही थी| उन्होंने
स्पष्ट कहा था कि अपने भांजे अभिमन्यु की मृत्यु का बदला लिए बिना वह नहीं मानेंगे| अभिमन्यु
की स्त्री का नाम उत्तरा था| वह
मत्स्य-नरेश विराट की पुत्री थी| अज्ञातवास
के समय अर्जुन विराट के यहाँ उत्तरा को नाचने-गाने की शिक्षा देते थे| बाद
में विराट को सारा हाल मालूम हो गया था, इसलिए
लोकापवाद के डर से वे अपनी पुत्री का विवाह अर्जुन के सिवा किसी अन्य पुरुष के साथ
नहीं करना चाहते थे| अर्जुन के स्वीकार न करने पर विराट ने उत्तरा का विवाह उसी के
पुत्र अभिमन्यु के साथ कर दिया| इन
दोनों का विवाह बाल्यावस्था में ही हो गया था| उस
युग में बाल-विवाह की प्रथा तो इतनी प्रचलित नहीं थी, लेकिन
विवाह के पीछे राजनीतिक कारण निहित था| पांडवों
को इसके पश्चात मत्स्य-नरेश से हर प्रकार की सहायता मिल सकती थी| अपने
पति की मृत्यु पर उत्तरा शोक से पागल हो उठी थी| श्री
कृष्ण ने उसे कितना ही समझाया था, लेकिन
फिर भी कितने ही दिनों तक उसका रुदन एक क्षण को भी नहीं रुका था| वह
उस समय गर्भवती थी| अश्वत्थामा ने पांडवों के वंश को नष्ट कर देने के लिए इस
गर्भस्थ बालक पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था, लेकिन
श्री कृष्ण ने उसे रोक लिया था और इस प्रकार श्री कृष्ण ने ही पांडवों के कुल की
रक्षा की| निश्चित अवधि के पश्चात उत्तरा के गर्भ से बालक का जन्म हुआ| चूंकि
सभी कुछ क्षय हो जाने के पश्चात इस बालक का जन्म हुआ था, इसलिए
इसका नाम परीक्षित रखा गया| यही
पांडवों की वंश-परंपरा को आगे बढ़ाने वाला हुआ|
*****
अभिमन्यु की मृत्यु
कहते
हैं महाभारत के युद्ध में अभिमन्यु जब मारा गया तो उस समय अभिमन्यु के अलावा वहाँ
उसका अपना कोई नहीं था जो उसकी मदद कर सके| जब अर्जुन वहाँ पहुँचा तो अभिमन्यु ने
प्राण त्याग दिए थे| अर्जुन यह देखकर रोने लगा और श्री कृष्ण जी से कहने लगा कि अब
मैं जी कर क्या करूँगा? श्री कृष्ण जी अर्जुन को गीता का उपदेश दे चुके थे जिसमे
श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को ज्ञान दिया था कि आत्मा अजर – अमर है वो शरीर बदलती
रहती है लेकिन अर्जुन का सारा ज्ञान खत्म हो गया था| वह कृष्ण जी से कहने लगा कि
मुझे एक बार अभिमन्यु से मिलवा दो| मैं अंत में उससे नहीं मिल पाया| तब श्री कृष्ण
जी ने अर्जुन को कहा कि मैं तुझे अभिमन्यु से तो मिलवा दूँ लेकिन उसका कोई फायदा
नहीं है| लेकिन अर्जुन ना माना| जब अर्जुन ने जिद की तो श्री कृष्ण जी ने अर्जुन
को ध्यान पर बैठने के लिए कहा| तब भगवान अर्जुन को ध्यान की गहराई में बहुत दूर ले
गए| एक ऐसी जगह पर ले गए जहाँ पर अभिमन्यु एक दीवार पर बैठा था| जब अर्जुन ने
अभिमन्यु को देखा तो वह उसे आवाज लगाने लगा| बेटा अभिमन्यु| लेकिन अभिमन्यु ने नहीं देखा| तब
अर्जुन अभिमन्यु के पास गया और उसे हाथ लगाकर कहने लगा बेटा अभिमन्यु देख तेरा
पिता तुझसे मिलने आया है| तो अभिमन्यु ने कहा कि कौन पिता? मैं तो आपको नहीं
जानता| मैं तो एक आत्मा हूँ जो शरीर बदलती रहती है| ये सब रिश्ते नाते मृत्यु लोक
में होते है, और सब शरीर के ही होते है| आत्मा ना कभी मरती है ना उसका किसी से
सम्बन्ध होता है| वह तो परमात्मा से बिछड़ी हुई है और उसी को पाने के लिए उसे मानव
का तन मिलता है| तब अर्जुन की आँखे खुल गई| तब जाकर उसे समझ आया कि श्री कृष्ण जी
ने किसलिए कहा था कि अर्जुन अभिमन्यु से मिलने का कोई फायदा नहीं है|
*****
अर्जुन
की प्रतिज्ञा
अभिमन्यु की मृत्यु
का समाचार सुनकर अर्जुन क्रोध से पागल हो उठा। उसने प्रतिज्ञा की कि यदि अगले दिन
सूर्यास्त से पहले उसने जयद्रथ का वध नहीं किया तो वह आत्मदाह कर लेगा। जयद्रथ
भयभीत होकर दुर्योधन के पास पहुँचा और अर्जुन की प्रतिज्ञा के बारे में बताया।
दुर्य़ोधन उसका भय दूर करते हुए बोला- 'चिंता
मत करो, मित्र! मैं और सारी कौरव सेना तुम्हारी रक्षा करेंगे। अर्जुन कल
तुम तक नहीं पहुँच पाएगा। उसे आत्मदाह करना पड़ेगा।' अगले दिन युद्ध शुरू हुआ। अर्जुन की
आँखें जयद्रथ को ढूँढ रही थीं, किंतु
वह कहीं नहीं मिला। दिन बीतने लगा। धीरे-धीरे अर्जुन की निराशा बढ़ती गई। यह देख श्री
कृष्ण बोले-'पार्थ! समय बीत रहा है और कौरव सेना ने
जयद्रथ को रक्षा कवच में घेर रखा है। अतः तुम शीघ्रता से कौरव सेना का संहार करते
हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ो।' यह
सुनकर अर्जुन का उत्साह बढ़ा और वह जोश से लड़ने लगे। लेकिन जयद्रथ तक पहुँचना
मुश्किल था।
सन्ध्या होने वाली थी। तब श्री कृष्ण ने अपनी माया फैला दी। इसके फलस्वरूप सूर्य
बादलों में छिप गया और सन्ध्या का भ्रम उत्पन्न हो गया। ‘सन्ध्या हो गई है और अब अर्जुन को
प्रतिज्ञावश आत्मदाह करना होगा।’-यह
सोचकर जयद्रथ और दुर्योधन ख़ुशी से उछल पड़े। अर्जुन को आत्मदाह करते देखने के लिए
जयद्रथ कौरव सेना के आगे आकर अट्टहास करने लगा। जयद्रथ को देखकर श्री कृष्ण बोले-'पार्थ! तुम्हारा शत्रु तुम्हारे सामने
खड़ा है। उठाओ अपना गांडीव और वध कर दो इसका। वह देखो अभी
सूर्यास्त नहीं हुआ है।' यह
कहकर उन्होंने अपनी माया समेट ली। देखते-ही-देखते सूर्य बादलों से निकल आया। सबकी
दृष्टि आसमान की ओर उठ गई। सूर्य अभी भी चमक रहा था। यह देख जयद्रथ और दुर्योधन के
पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जयद्रथ भागने को हुआ लेकिन तब तक अर्जुन ने अपना गांडीव
उठा लिया था। तभी
श्री कृष्ण चेतावनी देते हुए बोले-'हे
अर्जुन! जयद्रथ के पिता ने इसे वरदान दिया था कि जो इसका मस्तक ज़मीन पर गिराएगा, उसका मस्तक भी सौ टुकड़ों में विभक्त
हो जाएगा। इसलिए यदि इसका सिर ज़मीन पर गिरा तो तुम्हारे सिर के भी सौ टुकड़े हो
जाएँगे। हे पार्थ! उत्तर दिशा में यहाँ से सो योजन की दूरी पर जयद्रथ का पिता तप कर रहा
है। तुम इसका मस्तक ऐसे काटो कि वह इसके पिता की गोद में जाकर गिरे।'
अर्जुन
ने श्री कृष्ण की चेतावनी ध्यान से सुनी और अपने लक्ष्य की ओर ध्यान कर बाण छोड़
दिया। उस बाण ने जयद्रथ का सिर धड़ से अलग कर दिया और उसे लेकर सीधा जयद्रथ के पिता
की गोद में जाकर गिरा। जयद्रथ का पिता चौंककर उठा तो उसकी गोद में से सिर ज़मीन पर
गिर गया। सिर के ज़मीन पर गिरते ही उनके सिर के भी सौ टुकड़े हो गए। इस प्रकार
अर्जुन की प्रतिज्ञा पूरी हुई।
*****
भीष्म का पिछला
कर्म
बात
प्राचीन महाभारत काल की है। महाभारत के युद्ध में जो कुरुक्षेत्र के मैंदान में
हुआ, जिसमें अठारह अक्षौहणी सेना मारी गई, इस
युद्ध के समापन और सभी मृतकों को तिलांज्जलि देने के बाद पांडवों सहित श्री कृष्ण पितामह
भीष्म से आशीर्वाद लेकर हस्तिनापुर को वापिस हुए तब श्री कृष्ण को रोक कर पितामाह
ने श्री कृष्ण से पूछ ही लिया, "मधुसूदन, मेरे
कौन से कर्म का फल है जो मैं शरशय्या पर पड़ा हुआ हूँ?'' यह बात सुनकर मधुसूदन मुस्कराये और पितामह भीष्म से
पूछा, 'पितामह आपको कुछ पूर्व जन्मों का ज्ञान है?'' इस
पर पितामह ने कहा, 'हाँ''।
श्री कृष्ण मुझे
अपने सौ पूर्व जन्मों का ज्ञान है कि मैंने किसी व्यक्ति का कभी अहित नहीं किया? इस
पर श्री कृष्ण मुस्कराये और बोले पितामह आपने ठीक कहा कि आपने कभी किसी को कष्ट
नहीं दिया, लेकिन एक सौ एक वें पूर्वजन्म में आज की तरह तुमने तब भी राजवंश
में जन्म लिया था और अपने पुण्य कर्मों से बार-बार राजवंश में जन्म लेते रहे, लेकिन
उस जन्म में जब तुम युवराज थे, तब
एक बार आप शिकार खेलकर जंगल से निकल रहे थे, तभी
आपके घोड़े के अग्रभाग पर एक करकैंटा एक वृक्ष से नीचे गिरा। आपने अपने बाण से
उठाकर उसे पीठ के पीछे फेंक दिया, उस
समय वह बेरिया के पेड़ पर जा कर गिरा और बेरिया के कांटे उसकी पीठ में धंस गये
क्योंकि वह पीठ के बल ही जाकर गिरा था? करकेंटा
जितना निकलने की कोशिश करता उतना ही कांटे उसकी पीठ में चुभ जाते और इस प्रकार
करकेंटा अठारह दिन जीवित रहा और यही ईश्वर से प्रार्थना करता रहा, 'हे
युवराज! जिस तरह से मैं तड़प-तड़प कर मृत्यु को प्राप्त हो रहा हूँ, ठीक
इसी प्रकार तुम भी होना।''
तो, हे
पितामह भीष्म! तुम्हारे पुण्य कर्मों की वजह से आज तक तुम पर करकेंटा का श्राप
लागू नहीं हो पाया। लेकिन हस्तिनापुर की राज सभा में द्रोपदी का चीर-हरण होता रहा
और आप मूक दर्शक बनकर देखते रहे। जबकि आप सक्षम थे उस अबला पर अत्याचार रोकने में, लेकिन
आपने दुर्योधन और दुःशासन को नहीं रोका। इसी कारण पितामह आपके सारे पुण्यकर्म
क्षीण हो गये और करकेंटा का 'श्राप' आप
पर लागू हो गया। अतः पितामह प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्मों का फल कभी न कभी तो
भोगना ही पड़ेगा। प्रकृति सर्वोपरि है, इसका
न्याय सर्वोपरि और प्रिय है। इसलिए पृथ्वी पर निवास करने वाले प्रत्येक प्राणी व
जीव जन्तु को भी भोगना पड़ता है और कर्मों के ही अनुसार ही जन्म होता है।
*****
द्रौपदी की हंसी
महाभारत
युद्ध समाप्त हो गया था|
धर्मराज युधिष्ठिर
एकछत्र सम्राट हो गए थे|
श्री कृष्ण की सहमति
से रानी द्रौपदी तथा पांडव युद्धभूमि में शरशय्या पर पड़े परम धर्मज्ञ भीष्म
पितामह के समीप आए| युधिष्ठिर के पूछने पर भीष्म पितामह उन्हें वर्ण, आश्रम
तथा राजा-प्रजा आदि के विभिन्न धर्मों का उपदेश दे रहे थे| यह
धर्मोपदेश चल ही रहा था कि रानी द्रौपदी को हंसी आ गई| बेटी!
तू हंसी क्यों?" पितामह ने उपदेश बीच में ही रोककर पूछा| द्रौपदी ने संकुचित होकर कहा, "मुझसे
भूल हुई| पितामह मुझे क्षमा करें|"
पितामह को इससे संतोष होना नहीं था| वे
बोले, "बेटी ! कोई भी शीलवती कुलवधू गुरुजनों के सन्मुख अकारण नहीं
हंसती| तू गुणवती है, सुशीला
है| तेरी हंसी अकारण नहीं हो सकती| संकोच
छोड़कर तू अपने हंसने का कारण बता|"
हाथ जोड़कर द्रौपदी बोलीं,
"दादाजी ! यह बहुत ही
अभद्रता की बात है, किंतु आप आज्ञा देते हैं तो कहनी पड़ेगी| आपकी
आज्ञा मैं टाल नहीं सकती|
आप धर्मोपदेश कर रहे
थे तो मेरे मन में यह बात आई कि आज तो आप धर्म की ऐसी उत्तम व्याख्या कर रहे हैं, किंतु
कौरवों की सभा में जब दु:शासन मुझे नंगा करने लगा था, तब
आपका यह धर्मज्ञान कहां चला गया था| मन
में यह बात आते ही मुझे हंसी आ गई, आप
मुझे क्षमा करें|"
पितामह ने शांतिपूर्वक
समझाया, "बेटी ! इसमें क्षमा करने की कोई बात नहीं है| मुझे
धर्मज्ञान तो उस समय भी था, परंतु
दुर्योधन का अन्यायपूर्वक अन्न खाने से मेरी बुद्धि मलिन हो गई थी| इसी
से उस द्यूत सभा में धर्म का ठीक निर्णय करने में मैं असमर्थ हो गया था| परंतु
अब अर्जुन के बाणों के लगने से मेरे शरीर का सारा दूषित रक्त निकल गया है| दूषित
अन्न से बने रक्त के शरीर से बाहर निकल जाने के कारण अब मेरी बुद्धि शुद्ध हो गई
है, इससे इस समय मैं धर्म का तत्व ठीक समझता हूं और उसका विवेचन कर
रहा हूं|"
*****
पांडवों द्वारा
यज्ञ का आयोजन
एक बार पांडवों ने
श्री कृष्ण जी से विनती की कि प्रभु हमने महाभारत के युद्ध में अपने सगे-
सम्बन्धियों के साथ भी युद्ध किया है, हमें ऐसा लगता है हमे इसका दंड भुगतना
पड़ेगा| आप कोई राह बताये कि जिससे हमारे ये पाप कुछ कम हो जाये| तो श्री कृष्ण जी
ने कहा कि तुम एक सफल यज्ञ करो जिसमें सभी ऋषि मुनियों को बुलाओ| तो पांडवों ने
पूछा कि इसका पता कैसे चलेगा कि हमारा यज्ञ सफल हुआ है| तो श्री कृष्ण जी ने कहा
कि आकाश में एक घंटा टंगवाओ अगर यज्ञ सम्पूर्ण रूप से सफल हो जाता है तो ये घंटा
अपने आप बजेगा| पांडवों ने यज्ञ की तैयारी शुरू की| सभी ऋषि मुनियों को निमंत्रण
दिया| लेकिन एक ऋषि जो नीच कुल का था| पांडवों ने सोचा कि इसे कह कर क्या करेंगे?
तो उन्होंने उस ऋषि को आमंत्रण नहीं दिया| अब यज्ञ शुरू किया गया| सभी ऋषि मुनियों
का सत्कार किया गया| लेकिन जब यज्ञ सम्पूर्ण हुआ तो वह घंटा नहीं बजा| तब पांडव
बहुत चिंतित हो उठे| उन्होंने श्री कृष्ण जी से विनती कि प्रभु हमने तो सच्ची लगन
के साथ यज्ञ किया है लेकिन फिर भी घंटा नहीं बजा| तब श्री कृष्ण जी ने कहा कि कोई
ऋषि ऐसा है, जिसे तुमने निमंत्रण नहीं दिया यज्ञ का| उसे बुलाकर लाओ, तभी यज्ञ
सम्पूर्ण होगा| तब वह जाते है, तो उन्हें वही ऋषि मिलता है, जिसे उन्होंने नीच कुल
का समझकर छोड़ दिया था|
तब
पांडवों ने उस ऋषि से विनती कि आप हमारे साथ चले तभी हमारा यज्ञ संपन्न होगा|
लेकिन अब उस ऋषि ने चलने से मना कर दिया| उसने कहा कि मैं यज्ञ में तब चलूँगा जब
तुम मुझे सौ यज्ञों का फल दोगे| पांडव बड़े हैरान हुए कि हम इन्हें सौ यज्ञों का फल
कैसे दें? हम तो पहला यज्ञ कर रहे है| जब ऋषि न माना तो पांडव श्री कृष्ण जी के
पास आ गए और सारा वृतांत सुनाया| तब द्रोपदी ने विनती कि प्रभु आप आज्ञा दे तो मैं
कोशिश करूँ| तब पांडवों ने कहा कि जब हम असफल हो गए तो तुम कैसे करोगी? तब श्री
कृष्ण जी ने द्रोपदी को आज्ञा दी| द्रोपदी भी बड़ी श्रद्धा भाव के साथ संत जी के
पास गई और उनसे विनती की कि आप साथ में चलें, हमारा यज्ञ रुका हुआ है| लेकिन ऋषि
ने फिर कहा कि पहले मुझे सौ यज्ञों का फल दो| तब द्रोपदी ने कहा कि संतो के वचन है
कि “संत
मिलन को जाइये, तज माया अभिमान| जो जो पग आगे धरे, सो सो यज्ञ समान|”
तो मैं माया अभिमान को त्याग कर के आप के पास आई हूँ जिसमे एक-2 पग सौ सौ यज्ञों
के समान है| आप उनमे से सौ यज्ञ का फल रख लें, और मेरे साथ चलें| तब वह ऋषि
प्रसन्न हुआ और चलने को तैयार हुआ तब यज्ञ को पूरा करवाया गया|
*****
युधिष्ठिर के राज्य
में घंटा
महाभारत के युद्ध
के बाद धर्मराज युधिष्ठिर ने सारा राज्य सम्भाल रखा था| महाराज युधिष्ठिर ने
राजप्रसाद के मुख्य द्वार पर एक घंटा टंगवा रखा था, जो कि विशेष अवसरों पर ही
बजाया जाता था| एक दिन एक निर्धन ब्राह्मण दरबार में उपस्थित हुआ| उसने युधिष्ठिर
से विनती की कि उसकी पुत्री का विवाह है, कुछ धन की आवश्यकता है| युधिष्ठिर उस समय
किसी विशेष कार्य में व्यस्त था इसलिए उसने कहा कि आप कल आना कल आपकी आवश्यकता
जरुर पूरी करेंगे| जब ब्राह्मण वहाँ से चला गया तो भीम अपने स्थान से उठा और मुख्य
द्वार पर पहुँच गया और घंटा बजाने लगा| नकुल ने जब यह देखा तो भीम से पूछने लगा कि
आज कौन-सी विशेष बात है? तो भीम ने कहा कि इसका उत्तर मैं केवल युधिष्ठिर को दूँगा|
जब युधिष्ठिर भीम के पास पहुँचा तो उसने भीम से घंटा बजाने का कारण पूछा तो भीम ने
कहा कि मैं आज इसलिए प्रसन्न हूँ क्योंकिं आज आपने काल पर विजय प्राप्त कर ली है|
तो युधिष्ठिर हैरान हो गया और भीम से बोला कि ये कैसी बात कर रहे हो? काल से न कभी
कोई जीता है और न ही जीत सकता है| यह शरीर काल का ग्रास है अत: एक दिन इसे अवश्य
ही काल के मुख में जाना है, अपितु मैं तो ये कहूँगा कि काल हर समय हमारे निकट है न
जाने कब बाज की तरह झपट्टा मारकर अपने पंजों से दबोच ले| और तुम कहते हो मैंने काल
पर विजय प्राप्त कर ली| भीम ने कहा कि वास्तव में मनुष्य का जीवन क्षण भंगुर है|
इसका एक पल का भी विश्वास नहीं| युधिष्ठिर
ने कहा कि ये अटल सत्य है| भीम ने कहा कि जब जीवन के एक पल का भरोसा नहीं तो आपने
उस ब्राह्मण को क्यों मना किया?
मैंने तो यही अनुमान लगाया था कि
कम-से-कम कल तक तो आपने काल पर विजय प्राप्त कर ली है, तभी तो आपको यह विश्वास है
कि आप उस ब्राह्मण की सहायता कल कर सकते हो| धर्मराज ने अपनी भूल स्वीकार की तथा
तत्काल उस ब्राह्मण को बुलाकर धन व आवश्यक पदार्थ देने का आदेश दिया|
*****
भीम की श्री कृष्ण
जी से विनय
एक बार भीम ने श्री
कृष्ण जी से विनती की कि हे प्रभु मेरा शरीर तो बहुत शक्तिशाली है, लेकिन मेरी
आवाज अच्छी नहीं है| जब मैं भजन बोलता हूँ, तो सुर नहीं लगते| आप मेरी “आवाज
अच्छी कर दो| तब श्री कृष्ण जी ने वचन फरमाए आवाज तो मैं तेरी अच्छी कर दूँ, लेकिन
पहले ये बता-तूने भजन सुनाने किसे है| मुझे या दुनिया को?”
तब भीम ने कहा कि मुझे तो आपको सुनाने हैं, तब श्री कृष्ण जी ने कहा कि फिर जैसे
तू गाता है, मुझे वैसे ही पसंद है| कहने का मतलब यह है कि भगवान तो भक्त के भाव को
देखते है|
*****
भीम का अहंकार
पांडवों में भीमसेन
बहुत ही बलवान था| कहा जाता है कि उसमे कई हाथियों का बल था| एक बार वह द्रोपदी के
कहने पर कदली वन नामक स्थान पर जा रहे थे| वे गर्जना करते हुए आगे बढ़ रहे थे| इसी
कदली वन में श्री हनुमान जी का निवास था| गर्जना सुनकर वे समझ गए कि यह भीम की
आवाज है| वे यह भी जानते थे कि भीमसेन को अपने शारीरिक बल का बड़ा अभिमान है| अत:
भीमसेन का अभिमान तोड़ने के लिए हनुमान जी एक वृद्ध एवं दुर्बल वानर का भेष बनाकर
उसके मार्ग में लेट गये| भीमसेन जैसे ही वहाँ पहुँचा तो उसने भीषण आवाज निकाली|
उसका विचार था कि उसकी गर्जना को सुनकर यह बड़ा बंदर भयभीत होकर भाग जायेगा, परन्तु
हनुमान जी लेटे रहे| उन्होंने धीरे से आँखे खोली और भीमसेन को उपेक्षा की दृष्टि
से देखते हुए बोले-: मैं वृद्ध, दुर्बल और रोगी हूँ| यहाँ आराम से सो रहा था,
तुमने आकर मेरी नींद खराब कर दी और तुम यहाँ से आगे नहीं जा सकते यह क्षेत्र
मनुष्यों के लिए नहीं है, परन्तु भीम अहंकार से गरजने लगा तब हनुमान जी ने कहा तुम
बलशाली हो, यह ठीक है, परन्तु तुम्हें अपने बल पर अभिमान नहीं करना चाहिए, लेकिन
भीमसेन को अपने बल का अहंकार था| इसलिए वह
हनुमान जी की बात को न माना| तब हनुमान जी ने कहा कि वृद्धावस्था और रोग ने मुझे
इतना दुर्बल बना दिया है कि मुझमें उठने की शक्ति नहीं रही| इसलिए “यदि
तुम जाना ही चाहते हो तो मुझे लाँघ के चले जाओ|”
तब भीमसेन ने कहा कि परमात्मा हर प्राणी में है| मैं उनका अपमान नहीं करूँगा इसलिए
मैं लाँघ नहीं सकता तब हनुमान जी मुस्कराए और बोले- “यदि
तुम मुझे लाँघ कर जाना नहीं चाहते, तो फिर ऐसा करो कि मेरी पूँछ पकड़कर एक ओर कर दो
और चले जाओ|” भीमसेन उनके निकट
गए और बड़ी ही उपेक्षा से अपने बाँए हाथ से हनुमान जी की पूँछ पकड़कर उसे झटके से एक
ओर करना चाहा, परन्तु वह टस-से-मस नहीं हुई| यह देखकर भीमसेन क्रोध में भर गया|
उसने दोनों हाथों से पूँछ को पकड़ा और उसे मार्ग से हटाने की कोशिश की, यहाँ तक कि
अपना सारा बल लगा दिया, परन्तु पूँछ तो जैसे धरती से चिपकी पड़ी थी| जब पूरा बल
लगाकर भी भीमसेन पूंछ को हिला नहीं सका, तो उसका सारा अहंकार पानी की तरह बह गया|
वे समझ गया कि यह वानर कोई साधारण वानर नहीं है|
अत: उन्होंने
हनुमान जी के चरणों में गिरकर क्षमा माँगी और उनका परिचय जानना चाहा| तब हनुमान जी
ने अपना परिचय देते हुए अपना वास्तविक स्वरुप उनके सामने प्रकट किया| तत्पश्चात
उन्होंने भीमसेन को नीति का उपदेश देते हुए कभी भी अहंकार न करने के लिए विशेषरूप
से जोर दिया|
*****
हनुमान
जी ने तोड़ा अजुर्न का अहंकार
महाभारत काल के सर्वश्रेष्ठ
धर्नुधर अर्जुन रामसेतु के पास एक अपराध कर बैठे। इसी अपराध की आत्मग्लानि में
उन्होंने अग्नि प्रज्वलित की और आ'त्मदाह करने लगे। तभी भगवान बजरंगबली ने
उनकी मदद के लिए भगवान कृष्ण को पुकारा दरअसल, अर्जुन अपने रथ पर सवार होकर
रामेश्वरम से गुजर रहे थे, जहां उन्होंने एक कपि को रामसेतु पर
बैठकर तपस्या करते देखा। लेकिन अर्जुन ने यह जाने बिना कि वह कौन हैं, उन्हें जगाने के लिए वाण चला
दिया। फिर जोर से हंसने लगे। जब बजरंगबली ने अर्जुन से उनकी हंसी का कारण पूछा तो
वह बोले कि उन्हें पत्थरों का सेतु देखकर हंसी आ रही है। क्योंकि प्रभु राम तो एक धनुर्धर थे, उन्हें पत्थरों से नहीं अपने
वाणों से सेतु का निर्माण करना चाहिए था। तब कपि रूप भगवान हनुमान ने समझाया
कि रामजी की सेना में महावली वानर शामिल थे, जिनका वजन वाणों का सेतु झेल नहीं
पाता। इस पर अर्जुन ने घमंड दिखाते हुए कहा कि मैं वाणों का सेतु बनाकर, उस पर अपना रथ दौड़ाते हुए ही
यहां तक पहुंचा हूं। अर्जुन ने कहा कि अगर आप मेरा बनाया वाणों का सेतु तोड़ देंगे
तो मैं खुद को सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर नहीं मानूंगा। तब अर्जुन ने समुद्र पर अपने
वाणों का सेतु बना दिया और हनुमानजी के सामने उसे तौड़ने की चुनौती रखी। हनुमानजी
के एक बार खड़े होने पर ही सेतु टूट गया। इस पर अर्जुन निराश हो गए। तब हनुमानजी
ने उन्हें अहसास दिलाया कि अपने अहंकार में उन्होंने भगवान राम का अपमान किया है।
क्योंकि अपनी विद्या के घमंड में उन्होंने रामजी की धर्नुर विद्या पर संदेह जताया
है। अपनी
गलती का अहसास होते ही अर्जुन ने आत्मग्लानि के भाव के साथ एक वाण से भयानक अग्नि
प्रज्वलित की। हनुमानजी ने पूछा कि आप यह क्या कर रहे हैं? तब अर्जुन ने कहा कि भगवान के
अपमान का कारण मेरी विद्या ही है और अब मैं इस विद्या के साथ ही खुद भी आ'त्मदाह करने जा रहा हूं। भगवान
श्रीकृष्ण अपनी दिव्य दृष्टि से यह सब देख रहे थे और हनुमानजी के पुकारने पर तुरंत
प्रकट हुए। दरअसल, भगवान कृष्ण ने ही हनुमानजी को अर्जुन का घमंड चूर करने के लिए भेजा
था। ताकि घमंड के कारण अर्जुन पथभ्रष्ट ना हो जाएं। तब भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा, मित्र तुम आ'त्मदाह करना चाहते हो क्योंकि
तुमने मेरा अपमान किया है लेकिन ऐसा करके तुम मेरी बनाई प्रकृति के नियमों का
उलंघन करोगे। मैंने मनुष्य को यह अधिकार नहीं दिया है कि वह स्वयं को अपने कर्मों
का फल या पाप का दंड दे। ऐसा करके तुम ईश्वर की नीति में हस्तक्षेप करने जा रहे
हो। जो कि अक्षम्य अपराध होगा। यहां ही कृष्ण ने सबसे पहले अर्जुन को महाभारत के
युद्ध का संकेत दिया था। कान्हा ने अर्जुन को अहसास दिलाया कि आनेवाले समय में जो
भयानक युद्ध होगा, उसमें तुम ही केंद्र रहोगे और तुम ही धुरी भी। इसलिए तुम्हें अपनी
विद्या पर जो घमंड हुआ था, उसे तोड़ना आवश्यक था।
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अर्जुन
का अहंकार
एक
बार अर्जुन को अहंकार हो गया कि वही भगवान के सबसे बड़े भक्त हैं। उनकी इस भावना
को श्री कृष्ण ने समझ लिया। एक दिन वह अर्जुन को अपने साथ घुमाने ले गए। रास्ते
में उनकी मुलाकात एक गरीब ब्राह्मण से हुई। उसका व्यवहार थोड़ा विचित्र था। वह
सूखी घास खा रहा था और उसकी कमर से तलवार लटक रही थी। अर्जुन ने उससे पूछा, ‘आप
तो अहिंसा के पुजारी हैं। जीव हिंसा के भय से सूखी घास खाकर अपना गुजारा करते हैं।
लेकिन फिर हिंसा का यह उपकरण तलवार क्यों आपके साथ है?’ ब्राह्मण
ने जवाब दिया, ‘मैं कुछ लोगों को दंडित करना चाहता हूं।’ ‘आपके
शत्रु कौन हैं?’ अर्जुन ने जिज्ञासा जाहिर की। ब्राह्मण ने कहा, ‘मैं
चार लोगों को खोज रहा हूं,
ताकि उनसे अपना हिसाब
चुकता कर सकूं। सबसे पहले तो मुझे नारद की तलाश है। नारद मेरे प्रभु को आराम नहीं
करने देते| सदा भजन-कीर्तन कर उन्हें जागृत रखते हैं। फिर मैं द्रौपदी पर
भी बहुत क्रोधित हूं। उसने मेरे प्रभु को ठीक उसी समय पुकारा, जब
वह भोजन करने बैठे थे। उन्हें तत्काल खाना छोड़ पांडवों को दुर्वासा ऋषि के श्राप
से बचाने जाना पड़ा। उसकी धृष्टता तो देखिए। उसने मेरे भगवान को जूठा खाना खिलाया।’ ‘आपका
तीसरा शत्रु कौन है?’ अर्जुन ने पूछा। ‘वह
है हृदयहीन प्रह्लाद। उस निर्दयी ने मेरे प्रभु को गरम तेल के कड़ाह में प्रविष्ट
कराया, हाथी के पैरों तले कुचलवाया और अंत में खंभे से प्रकट होने के
लिए विवश किया। और चौथा शत्रु है अर्जुन। उसकी दुष्टता देखिए। उसने मेरे भगवान को
अपना सारथी बना डाला। उसे भगवान की असुविधा का तनिक भी ध्यान नहीं रहा। कितना कष्ट
हुआ होगा मेरे प्रभु को।’
यह कहते ही ब्राह्मण
की आंखों में आंसू आ गए। यह देख अर्जुन का घमंड चूर-चूर हो गया। उसने श्री कृष्ण
से क्षमा मांगते हुए कहा,
‘मान गया प्रभु, इस
संसार में न जाने आपके कितने तरह के भक्त हैं। मैं तो कुछ भी नहीं हूं।’
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हनुमान
जी से भीम का प्रश्न
एक
बार भीम ने हनुमान जी से पूछा कि भगवान श्री कृष्ण जी की अर्जुन पर बड़ी कृपा है,
लेकिन मुझ पर इतनी कृपा नहीं है,
न ही हम भाईयों में से किसी और पर इतनी कृपा है, जितनी अर्जुन पर है| तब हनुमान जी
ने कहा कि अर्जुन जब भी कोई काम करता है, तो काम को शुरू करने से पहले भगवान श्री
कृष्ण जी को याद करता है और उनसे प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! जो कुछ करना है,
आपने ही करना है, मैंने कुछ नहीं करना| लेकिन भीम तू जब कोई काम करता है, तो यह
सोचता है कि मेरे जैसा बलशाली दूसरा कोई नहीं है| क्या तूने कभी अर्जुन की तरह
सोचा है? तो भीम ने कहा मैंने तो कभी ऐसा नहीं सोचा, तो हनुमान जी ने कहा कि यही
तो फर्क है| कहते हैं कि जो इन्सान ये सोचता है कि सब कुछ भगवान आपने करना है, तो
भगवान उसके काम खुद करते है| जो ये सोचता है कि मैं करने वाला हूँ तो कहते हैं
जहाँ ‘मैं’ है वहाँ भगवान हो ही नहीं सकते|
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अर्जुन
की रक्षा
अर्जुन ने अपने-आपको श्री कृष्ण को समर्पित कर दिया था| अर्जुन होता हुआ भी,
नहीं था,
इसलिए कि उसने जो कुछ किया,
अर्जुन के रूप में नहीं, श्री
कृष्ण के सेवक के रूप में किया| सेवक की चिंता स्वामी की चिंता बन जाती है| अर्जुन का युद्ध अपने ही पुत्र बब्रुवाहन के साथ हो गया, जिसने अर्जुन का सिर धड़ से अलग कर दिया, और कृष्ण दौड़े चले आए| उनके प्रिय सखा और भक्त के प्राण जो संकट में पड़ गए थे| अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा बब्रुवाहन ने पकड़ लिया|
घोड़े की देखभाल की जिम्मेदारी अर्जुन पर थी|
बब्रुवाहन ने अपनी माँ चित्रांगदा को वचन दिया था कि मैं अर्जुन को युद्ध में परास्त करूंगा, क्योंकि अर्जुन चित्रांगदा से विवाह करने के बाद लौटकर नहीं आया था|
इसी बीच चित्रांगदा ने बब्रुवाहन को जन्म दिया था| चित्रांगदा अर्जुन से नाराज थी और उसने अपने पुत्र को यह तो कह दिया था कि तुमने अर्जुन को परास्त करना है लेकिन यह नहीं बताया था कि अर्जुन ही तुम्हारा पिता है,
और बब्रुवाहन मन में अर्जुन को परास्त करने का संकल्प लिए ही बड़ा हुआ|
शस्त्र विद्या सीखी, कामाख्या देवी से दिव्य बाण भी प्राप्त किया,
अर्जुन के वध के लिए| और अब बब्रुवाहन ने अश्वमेध के अश्व को पकड़ लिया तो अर्जुन से युद्ध अश्वयंभावी हो गया| भीम को बब्रुवाहन ने मूर्छित कर दिया| फिर अर्जुन और बब्रुवाहन का भीषण संग्राम हुआ|
अर्जुन को परास्त कर पाना जब असंभव लगा तो बब्रुवाहन ने कामाख्या देवी से प्राप्त हुए दिव्य बाण का उपयोग कर अर्जुन का सिर धड़ से अलग कर दिया| श्री
कृष्ण को पता था कि क्या होने वाला है, और जो कृष्ण को पता था,
वही हो गया| वे द्वारिका से भागे-भागे चले आए|
दाऊ को कह दिया,
"देर हो गई, तो बहुत देर हो जाएगी, जा रहा हूँ|" कुंती विलाप करने लगी, भाई विलाप करने लगे, अर्जुन पांडवों का बल था|
आधार था,
लेकिन जब अर्जुन ही न रहा तो जीने का क्या लाभ| माँ ने कहा, "बेटा, तुमने बीच मझदार में यह धोखा क्यों दिया?
माँ बच्चों के कंधों पर इस संसार से जाती है और तुम मुझसे पहले ही चले गए| यह हुआ कैसे? यह हुआ क्यों? जिसके सखा श्री
कृष्ण हों,
जिसके सारथी श्री
कृष्ण हो,
वह यों,
निष्प्राण धरती पर नहीं लेट सकता, पर यह हो कैसे गया?" देवी गंगा आई, कुंती को कहा, "रोने से क्या फायदा,
अर्जुन को उसके कर्म का फल मिला है|
जानती हो,
अर्जुन ने मेरे पुत्र भीष्म का वध किया था, धोखे से|
वह तो अर्जुन को अपना पुत्र मानता था,
पुत्र का ही प्यार देता था|
लेकिन अर्जुन ने शिखंडी की आड़ लेकर, मेरे पुत्र को बाणों की शैया पर सुला दिया था|
क्यों? भीष्म ने तो अपने हथियार नीचे रख दिए थे| वह शिखंडी पर बाण नहीं चला सकता था|
वह प्रतिज्ञाबद्ध था, लेकिन अर्जुन ने तब भी मेरे पुत्र की छाती को बाणों से छलनी किया|
तुम्हें शायद याद नहीं,
लेकिन मुझे अच्छी तरह याद है, तब मैं भी बहुत रोई थी|
अब अर्जुन का सिर धड़ से अलग है|
बब्रुवाहन ने जिस बाण से अर्जुन का सिर धड़ से अलग किया है, वह कामाख्या देवी के माध्यम से मैंने ही दिया था| अर्जुन को परास्त कर पाना बब्रुवाहन के लिए कठिन था,
आखिर उसने मेरे ही बाण का प्रयोग किया और मैंने अपना प्रतिशोध ले लिया|
अब क्यों रोती हो कुंती? अर्जुन ने मेरे पुत्र का वध किया था और अब उसी के पुत्र ने उसका वध किया है,
अब रोने से क्या लाभ? जैसा उसने किया वैसा ही पाया|
मैंने अपना प्रतिशोध ले लिया|" प्रतिशोध शब्द भगवान श्री कृष्ण ने सुन लिया,
वे हैरान हुए
कि अर्जुन का सिर धड़ से अलग था|
और गंगा मैया
(भीष्म की माँ) अर्जुन का सिर धड़ से अलग किए जाने को अपने प्रतिशोध की पूर्ति बता रही हैं| श्री कृष्ण सहन नहीं कर सके, एक नजर भर, अर्जुन के शरीर को,
बुआ कुंती को, पांडु पुत्रों को देखा, बब्रुवाहन और चित्रांगदा को भी देखा और कहा, "गंगा मैया,
आप किससे प्रतिशोध की बात कर रही हैं?
बुआ कुंती से, अर्जुन से, या फिर एक माँ से? माँ कभी माँ से प्रतिशोध नहीं ले सकती|
माँ का हृदय एक समान होता है, अर्जुन की माँ का हो या भीष्म की माँ का, आपने किस माँ से प्रतिशोध लिया है?"
गंगा ने कहा, "वासुदेव! अर्जुन ने मेरे पुत्र का उस समय वध किया था,
जब वह निहत्था था,
क्या यह उचित था?
मैंने भी अर्जुन का वध करा दिया उसी के पुत्र से, क्या मैंने गलत किया? मेरा प्रतिशोध पूरा हुआ, यह एक माँ का प्रतिशोध है|"
श्री कृष्ण ने समझाया, "अर्जुन ने जिस स्थिति में भीष्म का वध किया, वह स्थिति भी तो पितामह ने ही अर्जुन को बताई थी, क्योंकि पितामह युद्ध में होते, तो अर्जुन की जीत असंभव थी, और युद्ध से हटने का मार्ग स्वयं पितामह ने ही बताया था,
लेकिन यहाँ तो स्थिति ओर है|
अर्जु
न ने तो बब्रुवाहन के प्रहारों को रोका ही है,
स्वयं प्रहार तो नहीं किया, उसे काटा तो नहीं,
और यदि अर्जुन यह चाहता तो क्या ऐसा हो नहीं सकता था| अर्जुन ने तो आपका मान बढ़ाया है, कामाख्या देवी द्वारा दिए गए आपके ही बाण का
प्रतिशोध लेकर आपने पितामह का, अपने पुत्र का भी भला नहीं किया| "गंगा दुविधा में पड़ गई| श्री
कृष्ण के तर्कों का उसके पास जवाब नहीं था| पूछा, "क्या करना चाहिए, जो होना था सो हो गया|
आप ही मार्ग सुझाएं|"
श्री कृष्ण ने कहा, जो प्रतिज्ञा आपने ली थी,
वह पूरी हो गई है|
जो प्रतिज्ञा पूरी हो गई तो अब उसे वापस भी लिया जा सकता है,
यदि आप चाहें तो क्या नहीं हो सकता?
कोई रास्ता तो निकाला ही जा सकता है|" गंगा की समझ में बात आ गई और माँ गंगा ने अर्जुन का सिर धड़ से जोड़ने का मार्ग सुझा दिया| यह कृष्ण के तर्कों का ही कमाल था| जिस पर श्री
कृष्ण की कृपा हो,
जिसने अपने आपको श्री कृष्ण को सौंप रखा हो,
अपनी चिंताएँ सौंप दी हों, अपना जीवन सौंप दिया हो, अपना सर्वस्व सौंप दिया हो, उसकी रक्षा के लिए श्री
कृष्ण बिना बुलाए चले आते हैं|
द्वारिका से चलने पर दाऊ ने कहा था,
'कान्हा, अब अर्जुन और उसके पुत्र के बीच युद्ध है, कौरवों के साथ नहीं,
फिर क्यों जा रहे हो?' तो कृष्ण ने कहा था, 'दाऊ, अर्जुन को पता नहीं कि वह जिससे युद्ध कर रहा है, वह उसका पुत्र है|
इसलिए अनर्थ हो जाएगा|
और मैं अर्जुन को अकेला नहीं छोड़ सकता|'
भगवान और भक्त का नाता ही ऐसा है|
दोनों में दूरी नहीं होती और जब भक्त के प्राण संकट में हों, तो भगवान चुप नहीं बैठ सकते|
अर्जुन का सारा भाव हो, और कृष्ण दूर रहें,
यह हो ही नहीं सकता| याद रखें,
जिसे श्री कृष्ण मारना चाहें, कोई बचा नहीं सकता और जिसे वह बचाना चाहें, उसे कोई मार नहीं सकता|
*****
स्वर्ग की यात्रा
महाराज युधिष्ठिर ने जब सुना कि श्री कृष्ण
ने अपनी लीला का संवरण कर लिया है और यादव परस्पर युद्ध कर नष्ट हो चुके
हैं, तब उन्होंने अर्जुन
के पौत्र परीक्षित का राजतिलक कर दिया| स्वयं सब वस्त्र एवं आभूषण उतार दिए| मौन व्रत लेकर, केश खोले, संन्यास लेकर वे राजभवन से निकले और
उत्तर दिशा की ओर चल पडे| उनके शेष भाईयों तथा द्रौपदी ने भी उनका अनुगमन किया| धर्मराज युधिष्ठिर ने सब माया-मोह
त्याग दिया था| उन्होंने न भोजन
किया, न जल पिया और न
विश्राम ही किया| बिना किसी ओर देखे
या रुके वे निरंतर चलते ही गए और हिमालय में बद्रीनाथ की तरफ आगे बढ़ गए| उनके भाई तथा रानी द्रौपदी भी उनके
पीछे चलती रहीं| सत्पथ पार हुआ और
स्वर्गारोहण की दिव्य भूमि आई| द्रौपदी, नकुल, सहदेव, अर्जुन, ये क्रम-क्रम से गिरने लगे| जो गिरता था, वह वहीं रह जाता था| उस हिम प्रदेश में गिरकर पुनः उठने का
प्रश्न ही नहीं उठता है| शरीर तो तत्काल हिम-समाधि पा जाता है| उस पावन प्रदेश में प्राण त्यागने वाले
को स्वर्ग की प्राप्ति से भला कौन रोक सकता था| युधिष्ठिर न रुकते थे और न ही गिरते हुए भाईयों की ओर देख रहे थे| वे राग-द्वेष से
परे हो चुके थे| अंत में भीमसेन भी
गिर गए| युधिष्ठिर जब स्वर्गारोहण के उच्चतम
शिखरपर पहुँचे, तब भी अकेले नहीं थे| उनके भाई और रानी द्रौपदी मार्ग में
गिर चुकी थीं; किंतु एक कुत्ता
उनके साथ था| यह कुत्ता
हस्तिनापुर से ही उनके पीछे-पीछे आ रहा था|
उस शिखर पर पहुँचते ही स्वयं देवराज
इंद्र विमान में बैठकर आकाश से उतरे|
उन्होंने युधिष्ठिर का स्वागत करते हुए
कहा, “आपके
धर्माचरण से स्वर्ग अब आपका है| आईए विमान में बैठिए| ” युधिष्ठिर ने अब अपने भाईयों तथा द्रौपदी को भी स्वर्ग ले
जाने की प्रार्थना की| देवराज ने बताया – वे पहले ही वहाँ पहुँच गए हैं| युधिष्ठिर ने दूसरी प्रार्थना की, “इस कुत्ते को भी विमान में बैठा लें|” इंद्र बोले, “आप धर्मज्ञ होकर ऐसी बात क्यों करते हैं? स्वर्ग में कुत्ते का प्रवेश कैसे हो
सकता है? यह अपवित्र प्राणी
मुझे देख सका, यही बहुत है|”
युधिष्ठिर बोले, “यह मेरे आश्रित है| मेरे भक्ति के कारण ही नगर से इतनी दूर मेरे साथ आया है| आश्रित का त्याग अधर्म है| इसके बिना मैं अकेले स्वर्ग नहीं जाना
चाहता|” इंद्र
बोले, “राजन!
स्वर्ग की प्राप्ति पुण्यों के फल से होती है| यह पुण्यात्मा ही होता तो अधम योनि में
क्यों जन्म लेता?” युधिष्ठिर
बोले, “मैं
अपना आधा पुण्य इसे अर्पित करता हूँ|” “धन्य हो, धन्य हो, युधिष्ठिर! तुम! मैं तुम पर अत्यंत
प्रसन्न हूँ
|” युधिष्ठिर
ने देखा कि कुत्ते का रूप त्यागकर साक्षात धर्म देवता उनके सम्मुख खड़े होकर उन्हें
आशीर्वाद दे रहे हैं |
*****
धृतराष्ट्र की
नेत्रहीनता
कहते हैं कि राजा धृतराष्ट्र जन्म से
नेत्रहीन थे| एक बार उनसे पूछा
गया कि पिछले जन्म के कौन से कर्म के कारण उनके साथ ऐसा हुआ है| उनकी आन्तरिक दृष्टि खुली हुई थी और
वे जानते थे कि पिछले सौ जन्मों में उन्होंने ऐसा कोई भी कर्म नही किया था जो उनके
नेत्रहीन बनने का कारण हो|
तब उन्होंने भगवान श्री कृष्ण जी से पूछा- तो भगवान ने उनको पिछले सौ जन्मों से
पहले किये हुए कर्मो को देखने की शक्ति दी|
तब राजा ने देखा कि पिछले सौ जन्मों से भी पहले के जन्म में उन्होंने किसी कीड़े की
आँखों में कांटा चुभाया उसे नेत्रहीन किया था| कर्मो का चक्र निरन्तर चलता रहता है
और हमारे कर्मो के परिणाम आगे आते रहते हैं तथा सैकड़ों और सहस्त्रों जन्मों के बाद
भी चुकाने पड़ते हैं|
*****
राजा मोरध्वज की
वार्ता
एक बार धर्मराज
युधिष्ठीर ने अश्वमेघ यज्ञ किया और अर्जुन को घोड़े की रक्षा के लिए सेना सहित भेजा|
उसी समय राजा मोरध्वज ने भी यज्ञ शुरू किया था और राजकुमार ताम्रध्वज घोड़े के साथ
थे| मार्ग में अर्जुन और ताम्रध्वज का सामना हुआ ताम्रध्वज ने उस अर्जुन को जिसने
महाभारत में विजय पाई थी और उन श्री कृष्ण जी महाराज को जो कि शुद्ध सच्चिदानंद
पूर्णब्रह्म हैं और जिनके नाम की कृपा से ही विजय प्राप्त हुई, हराकर घोड़े को
जबरदस्ती छीन लिया| भक्त वत्सल भगवान श्री कृष्ण ने देखा कि यहाँ दोनों तरफ मेरे
भक्त हैं| यदि एक पक्ष को विजय दी जाए तो दूसरे भक्त का दिल टूटेगा | इसलिए अपने
प्रिय भक्त राजा मोरध्वज की भक्ति की परीक्षा के लिए भगवान् श्री कृष्ण जी स्वयं
एक वृद्ध ब्राहमण का रूप धारण करके और अर्जुन को अपने पुत्र के रूप में बनाकर राजा
मोरध्वज के द्वार पर गये| उस समय राजा मोरध्वज यज्ञ मंडप में था| उसने आकर बड़े आदर
सत्कार से ब्राह्मण देवता को दण्डवत प्रणाम किया और फिर उनके पधारने का कारण पूछा|
भगवान् श्री कृष्ण जी ने कहा कि “
जंगल में एक शेर है, उसने मेरे लड़के को खाने का निश्चय किया है| मैंने उसे बहुत कहा
कि उसके बदले मझे खा ले , परन्तु वह न माना और बोला – “
तू बूढ़ा है, तेरा मांस मेरे काम का नहीं|’ अन्त में बहुत प्रार्थना करने पर शेर ने
कहा कि ‘यदि तू राजा का आधा शरीर ले आये तो तुम्हारे लड़के को छोड़ दूंगा|’ इसलिए
तुम्हारे पास आया हूँ| यदि हो सके तो मेरे पुत्र की रक्षा करो|”
ब्राह्मण देवता की बात सुनकर राजा मोरध्वज के मन में दया भाव उमड़ आया और वह बोला
कि “यह
शरीर एक दिन जाने वाला है| यदि ब्राह्मण का दुःख इस शरीर से दूर हो जाए तो इससे और
क्या अच्छा है?” ब्राह्मण ने कहा कि
“शेर
का एक वचन यह भी है कि जिस ओर से राजा को चीरा जाए, वह आरा एक ओर से तो राजा का
लड़का पकड़े ओर एक ओर से वह आरा राजा की रानी के हाथ में हो और किसी को किसी प्रकार
का शोक ना हो|” राजा ने इस बात को
भी स्वीकार कर लिया| ताम्रध्वज ने ब्राह्मण से प्रार्थना की –“
शास्त्र की आज्ञानुसार पुत्र भी पिता का रूप है| यदि मेरा आधा शरीर लिया जाए तो
अच्छा है|”
ताम्रध्वज ने
ब्राह्मण से इस प्रकार प्रार्थना की-
धर्म की खातिर पिता
जी मेरा, यह टुकड़े-टुकड़े शरीर कर दो |
शेर मुलकत रहे ना
भूखा, यह राज़ी दोनों फ़कीर कर दो ||
उड़ा दो शमशीर से ये
खंजर, गले पर मेरे चलाओ फ़ौरन |
जिस तरह हो आज्ञा
इनकी, कीमियां कर दो या चीर कर दो ||
काम किस आएगी काया
कि जिसने आखिर है ख़ाक होना |
है पेट भरता अगर
किसी का, तो चाहे इसको अक्सीर कर दो ||
ऐ ईश! तुमसे भी
इल्तिजा है, धर्म का मेरे सहाई रहना |
शेर खावे आनंद हो
जावे, ऐसी मुझमें तासीर भर दो ||
ब्राह्मण ने उत्तर
दिया- “तू
राजा नहीं है, इसलिए तेरा मांस शेर नहीं खायेगा|”
फिर राजा की स्त्री ने कहा – “मैं
तो राजा कि अर्धांगिनी हूँ| यदि राजा के शरीर के आधे भाग की बजाय मुझको ले जाओ तो
शेर को लाभ होगा|” ब्राह्मण ने कहा –“तू
स्त्री है और राजा भी नहीं|”
ब्राह्मण ने राजा के सामने ताम्रध्वज को और पीठ पीछे राजा की स्त्री को इस विचार
से खड़ा किया कि राजा उनकी ममता के कारण दुखी हो जाए| वे दोनों मां-पुत्र राजा
मोरध्वज के सिर पर आरा रखकर बिना किसी दुःख के आरा चलाने लगे| इस प्रकार राजा का सिर
काटा जाने लगा| जिस समय आरा मस्तक पर पहुँचा तो राजा की एक आँख से आंसू बह निकले|
उसी समय ब्राह्मण ने कहा कि “बस
अब यह शरीर कदापि मेरे काम का नहीं क्योंकि राजा दुखी होकर शरीर देता है|”
राजा ने प्रार्थना की-“
महाराज! कृपा करके क्रोधित न हों| जिस ओर की आँख से पानी निकला है, शरीर के उस भाग
को यह दुःख है कि मैं बड़ा अयोग्य हूँ जो किसी काम में नहीं आया और दाहिनी ओर का
शरीर बड़ा भाग्यशाली है जो ब्राह्मण के कार्य में लग गया|”
करूणा सिन्धु भगवान् राजा के भक्ति और विशवास से पूर्ण वह वचन सुनकर प्रेम के
वशीभूत हो गए और उन्होंने राजा को आरे के नीचे से उठाकर अपने वक्षस्थल से लगा लिया
तथा अपने वास्तविक स्वरूप के राजा को दर्शन कराये| भगवान् श्री कृष्ण ने कहा-”
ऐ राजन! तुम्हारी धर्म निष्ठा और सच्ची श्रद्धा से मैं बहुत प्रसन्न हूँ| तुम्हारी
जो कुछ इच्छा हो सो मांग लो , मैं पूर्ण करूंगा|”
राजा ने कर बद्ध प्रार्थना की-“
कृपासिंधु महाराज! आपके जो दर्शन देने का अनुग्रह किया है तो और क्या बाकी रहा कि
जिसके लिए मैं प्रार्थना करूं? मैं केवल आपके चरण कमलों की भक्ति चाहता हूँ| मेरी
एक प्रार्थना यह है कि आने वाला समय अर्थात कलियुग में आप भक्तों से ऐसी परीक्षा न
लें|”
भगवान् ने अपने भक्त की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया| फिर उन्होंने अर्जुन और
राजा मोरध्वज में संधि करवा दी| राजा ने बड़ी प्रसन्नता पूर्वक यज्ञ का घोड़ा अर्जुन
को लौटा दिया| भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपने परम प्रिय भक्त मोरध्वज के इस
अपूर्व बलिदान को दिखाकर उसका अभिमान दूर किया| कई ग्रंथों में यह भी लिखा हुआ है
कि राजा मोरध्वज ने अपने पुत्र राजकुमार ताम्रध्वज का बलिदान दिया था और उसके सर
पर आरा चलाया गया था|
*****
श्री
ब्राह्मण मांडव्य जी
एक
धर्मात्मा ब्राह्मण थे,
उनका नाम मांडव्य था| वे
बड़े सदाचारी और तपोनिष्ठ थे| संसार
के सुखों और भोगों से दूर वन में आश्रम बनाकर रहते थे| अपने
आश्रम के द्वार पर बैठकर दोनों भुजाओं को ऊपर उठाकर तप करते थे| वन
के कंद-मूल-फल खाते और तपमय जीवन व्यतीत करते| तप
करने के कारण उनमें प्रचुर सहनशक्ति पैदा हो गई थी प्रभात
के पश्चात का समय था|
आकाश में पक्षी
चहचहाते हुए घूम रहे थे|
मांडव्य अपने आश्रम
के द्वार पर बैठकर भुजाओं को ऊपर उठाए हुए तप में संलग्न थे| सहसा
नगर की ओर से आकर कुछ चोर मांडव्य के पास खड़े हो गए| मांडव्य
आंखें बंद किए हुए बैठे थे| चोरों
के पास चोरी का धन भी था|
वे इधर-उधर देखने लगे, अपने
छिपने के लिए उचित स्थान ढूंढ़नें लगे| चारों
ओर मांडव्य का आश्रम सूना दिखाई पड़ा| उन्होंने
सोचा, क्यों न आश्रम के भीतर छिपकर बैठा जाए| बस, फिर
क्या था, चोर आश्रम में छिपकर बैठ गए| उन्होंने
चोरी का सारा धन भी आश्रम के भीतर ही छिपाकर रख दिया| चोरों
के पीछे-पीछे राजा के सैनिक भी मांडव्य के पास उपस्थित हुए| उन्होंने
मांडव्य से पूछा, "मुनिश्रेष्ठ, क्या
यहाँ कुछ चोर आए थे? वे किस ओर गए हैं?" किन्तु
मांडव्य मौन रहे| उन्होंने सैनिकों के प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं दिया| उनके
मौन से सैनिकों के मन में संदेह पैदा हो गया| उन्होंने
सोचा - हो न हो, यह तपस्वी भी चोरों से मिला हुआ है| सैनिक
आश्रम के अंदर घुस गए|
भीतर जाकर वे चोरों
और चोरी के माल को ढूंढ़ने लगे| आश्रम
के भीतर छिपकर बैठे हुए चोर तो मिल ही गए, चोरी
का माल भी मिल गया| अब सैनिकों के मन में बिल्कुल संदेह नहीं रहा| उन्होंने
निश्चित रूप से समझ लिया कि अवश्य तपस्वी भी चोरों से मिला हुआ है| अत:
चोरों के साथ मांडव्य को भी बंदी बनाकर राजा के सामने पेश किया| राजा
ने सब कुछ सुनकर चोरों के साथ-ही-साथ मांडव्य को भी सूली पर चढ़ाने की आज्ञा दे दी| राजा
की आज्ञा से चोरों के साथ मांडव्य को भी सुली पर चढ़ा दिया गया| चोर
तो सूली पर चढ़ाए जाने के तुरंत बाद ही मर गए, किंतु
मांडव्य सूली पर भी जीवित रहे और तप करते रहे| धीरे-धीरे
कई महीने बीत गए, किंतु मांडव्य बिना खाए-पिए ही सूली पर जीवित रहे| जब
यह समाचार राजा के कानों में पड़ा तो वे मांडव्य के पास उपस्थित हुए और श्रद्धा
प्रकट करते हुए बोले,
"मुनिश्रेष्ठ ! मैं
निरपराध हूं| मुझे आपके संबंध में कुछ भी पता नहीं था|" मांडव्य
ने उत्तर दिया, "हां,
राजन ! तुम्हारा कुछ
भी दोष नहीं है| मैंने पूर्वजन्म में कोई ऐसा पाप किया था जिसके कारण मुझे यह
दुख भोगना पड़ रहा है|" राजा ने मांडव्य को सूली से नीचे उतारा| उन्होंने
उनके शरीर में चुभे हुए शूलों को निकालने का प्रयत्न किया, पर
आधे शूल तो बाहर निकले,
आधे भीतर ही टूट कर
रह गए| फिर भी मांडव्य जीवित रहे| आधे
शूल भीतर रहने के कारण लोग उन्हें अणि मांडव्य कहने लगे| अणि
मांडव्य रात में सभी मुनियों को पक्षियों के रूप में बुलाते और उनसे पूछते कि
मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया है, जिसके
कारण मुझे यह कष्ट भोगना पड़ रहा है? पर
किसी भी मुनि या तपस्वी ने उनके प्रश्न का उत्तर नहीं दिया| उन्होंने
उसी अवस्था में शरीर का त्याग कर दिया| मांडव्य ने स्वर्ग में धर्मराज के पास जाकर उनसे पूछा, "मैंने
ऐसा कौन-सा पाप किया था,
जिसके कारण मुझे अपार
कष्ट झेलने पड़े?"
धर्मराज ने कहा, "तुमने
एक सींक से तीन पतिंगों की हत्या कर दी थी| उसी
के कारण तुम्हें यह कष्ट झेलना पड़ा है|" मांडव्य
ने पुन: दूसरा प्रश्न किया, "मैंने
सींकों से जिस समय पतिंगों की हत्या की थी, उस
समय मेरी क्या अवस्था थी? धर्मराज ने उत्तर
दिया, "उस समय तुम्हारी अवस्था आठ- नौ वर्ष की थी|" मांडव्य
ने पुन: कहा, "शास्त्रों में लिखा है कि बारह वर्ष की अवस्था तक बालक अबोध
होता है| उस समय तक जो भी पाप वह करता है, वह
क्षमा के योग्य होता है|
तुमने मुझे जो दण्ड
दिया था वह शास्त्र के विरुद्ध है| अत:
मैं भी तुम्हें श्राप देता हूं - तुम्हें मृत्युलोक में शुद्र के घर जन्म लेना
पड़ेगा|"
मांडव्य का श्राप सत्य सिद्ध हुआ| उनके
श्राप के ही कारण धर्मराज ने विदुर के रूप में दासी के गर्भ से जन्म धारण किया था| विदुर
भगवान के भक्त थे, ऊंचे विचारों के थे और पांडवों के बड़े हितैषी थे| किंतु
यह बात तो सत्य है ही कि वे नीच कुल के समझे जाते थे|
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very nice collection of stories
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