Monday, May 11, 2020

हजरत मुहम्मद साहिब जी


हजरत मुहम्मद का अनुभव
हजरत मुहम्मद साहिब ने इसी ईश्वरीय सत्ता को प्रणाम करते हुए अपना निज अनुभव दर्शाया है- चालीस साल तक मुझे बिल्कुल आम आदमी की तरह जिंदगी बिताते हो गया | तब कभी-कभी हम मक्का के नजदीक गारे हुरा में जाकर इबादत किया करते थे | एक दिन वहाँ मैंने एक ऐसा नजारा देखा जिससे डरकर मैं घर लौट आया | घर में पहुँचते ही अपनी बीवी से कहा – मुझे कम्बल ओढा दो, मैं बहुत परेशान हूँ| बीवी खतीजा ने मुझ पर चादर डाल दी | फिर मैंने उससे कहा – आज गारे हुरा में मैंने एक अजीब आदमी देखा | उसने मुझसे कहा –‘ मैं खुदा का भेजा फ़रिश्ता जब्रील हूँ| आपको खुदा ने नबी बनाया है|’ तब उसने मुझे कुछ पढ़ने के लिए कहा | मैंने जवाब दिया कि मैं तो अनपढ हूँ, कैसे पढ़ सकता हु ? तो जब्रील ने मुझे अपने सीने से लगा लिया और खूब भींचा| तब फिर उसने पढ़ने के लिए कहा | मैंने फिर उसे वही जवाब दे दिया| तो उसने फिर अपने सीने से लगाकर मुझे भींचा | तीसरी बार फिर सीने से लगाने के बाद उसने मुझे कहा -‘पढ़, अपने रब्ब के नाम से पढ़ जिसने हर चीज को बनाया है| इंसान को भी उसने जन्म दिया है | पढ़, तेरा रब्ब तेरा मान रखेगा| जिसने कलम द्वारा इल्म दिया और इंसान को वह सब कुछ सिखाया जो वह नहीं जानता था|’ जब्रील के कहने पर मैंने पढ़ा तो सारे जिस्म में कपकपी छिड़ गई और मुझे अपनी जान का खतरा पड़ गया | बीवी खतीजा जो पहले मेरी हालत देखकर परेशान हो गई थी, अब मुझे तसल्ली देते हुए बोली – आपको ड़रना नहीं चाहिए बल्कि खुश होना चाहिए | वही ठीक जानता है कि उसने आपसे क्या काम लेना है| जो काम उसने सोचा है, आपको उस काम में रुसवाई नहीं होगी| महाराष्ट्र के प्रसिद्ध संत श्री ज्ञानेश्वर जी ने भी एक ऐसा ही चमत्कार दिखाया था| उन्होंने भेंसे के मुख से वेद मन्त्र उचारण करवाकर सबको हैरान कर दिया था |
श्री गुरु ग्रन्थ साहिब में भी इन्हीं महापुरुषों कि महिमा का वर्णन की गई है| ये तो उस विद्या को जानते है जिससे दूसरी सभी सांसारिक विद्याये प्राप्त होती हैं | जब गुरु नानकदेव जी को पाँदे के पास पढ़ने के लिए भेजा गया तो उस समय उन्होंने पाँदे से कहा कि हमें तो तुम उस सतनाम का बोध कराओ| हमें इन कलमों , दवातों और कागजों से क्या सरोकार?
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वृद्धा की मदद
 हजरत मोहम्मद जब भी नमाज पढ़ने मस्जिद जाते तो उन्हें नित्य ही एक वृद्धा के घर के सामने से निकलना पड़ता था। वह वृद्धा अशिष्ट, कर्कश और क्रोधी स्वभाव की थी। जब भी मोहम्मद साहब उधर से निकलते, वह उन पर कूड़ा-करकट फैंक दिया करती थी। मोहम्मद साहब बगैर कुछ कहे अपने कपड़ों से कूड़ा झाड़कर आगे बढ़ जाते। प्रतिदिन की तरह जब वे एक दिन उधर से गुजरे तो उन पर कूड़ा आकर नहीं गिरा। उन्हें कुछ हैरानी हुई, किंतु वे आगे बढ़ गए। अगले दिन फिर ऐसा ही हुआ तो मोहम्मद साहब से रहा नहीं गया। उन्होंने दरवाजे पर दस्तक दी। वृद्धा ने दरवाजा खोला। दो ही दिन में बीमारी के कारण वह अत्यंत दुर्बल हो गई थी। मोहम्मद साहब उसकी बीमारी की बात सुनकर हकीम को बुलाकर लाए और उसकी दवा आदि की व्यवस्था की। उनकी सेवा और देखभाल से वृद्धा शीघ्र ही स्वस्थ हो गई। अंतिम दिन जब वह अपने बिस्तर से उठ बैठी तो मोहम्मद साहब ने कहा- अपनी दवाएँ लेती रहना और मेरी जरूरत हो तो मुझे बुला लेना। वृद्धा रोने लगी। मोहम्मद साहब ने उससे रोने का कारण पूछा, तो वह बोली, कि आप मेरे बुरे व्यवहार के लिए मुझे माफ कर दोगे? वे हँसते हुए कहने लगे- भूल जाओ सब कुछ और अपनी तबीयत सुधारो। वृद्धा बोली- मैं क्या सुधारूंगी तबीयत? तुमने तबीयत के साथ-साथ मुझे भी सुधार दिया है। तुमने अपने प्रेम और पवित्रता से मुझे सही मार्ग दिखाया है। मैं आजीवन तुम्हारी एहसानमंद रहूँगी। घटना का संदेश है कि जिसने स्वयं को प्रेम, क्षमा व सद्भावना में डुबोकर पवित्र कर लिया, उसने संत-महात्माओं से भी अधिक प्राप्त कर लिया। 
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