स्वामी विवेकानंद जी का जीवन
स्वामी
विवेकानंद जी का बचपन का नाम नरेंद्र था| पिता का नाम श्री विश्वनाथ जी व माता
भुवनेश्वरी देवी जी थी| इनका जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ| कहते हैं जब नरेंद्र
रामकृष्ण परमहंस जी के पास पहुँचे तो जो सवाल सबसे पूछते थे, वही उनके सामने रख
दिया “क्या
आपने ईश्वर को देखा है?”
रामकृष्ण परमहंस जी ने सिर से पाँव तक उन्हें देखा, देखकर विचार करने लगे कि यह जो
16-17 साल का नौजवान मेरे सामने खड़ा है, इस उम्र में दूसरे ख्यालों से फुरसत नहीं
होती| कहाँ -2 ध्यान भटकता रहता है और ये इतना गहरा प्रश्न कर रहा है| उन्होंने
मुस्करा कर जवाब दिया- हाँ बेटे, मैंने ईश्वर को देखा है और अगर तू चाहे तो मैं
तुझे भी ईश्वर दिखा सकता हूँ और मैं जैसे तुझे देख रहा हूँ, ऐसे हर समय ईश्वर को
देखता रहता हूँ| इस तरह का संतोषजनक उत्तर उन्हें आज तक नहीं मिला था| उनका वहाँ
आना-जाना हो गया| नरेंद्र ने अपनी शंकाओं का भी समाधान करवाया| बहुत से उल्टे सीधे
प्रश्न नरेंद्र ने किये| स्वामी रामकृष्ण परमहंस पैसे को हाथ नहीं लगाते थे| एक
बार उनकी परीक्षा लेने के लिए स्वामी विवेकंनंद जी ने उनकी चादर के नीचे सिक्के रख
दिए| वह मस्ती के आलम में उस चदर पर आकर के बैठे तो एक दम से उछल पड़े जैसे किसी को
बिजली का करंट लगता है| वह चिल्लाये और कहा – ‘नागिन माया ने डस लिया’ तो एकदम
स्वामी विवेकानंद जी डर गए और हाथ जोड़ कर प्रार्थना की कि- मैंने ही यह गुस्ताखी
की है| मैं यह जानना चाहता था कि आप केवल कहते ही है या आपके वास्विक जीवन का
अनुभव है| आप माया को नागिन समझते है तो इस तरह के उल्टे सीधे प्रश्न भी उन्होंने
किये और फिर इतने उनके भक्त बने कि अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया| स्वामी
विवेकानंद जी ने भी कई परीक्षाएं दी| एक बार जब उनके पिता की मृत्यु हो गई तो इनके
घर की हालत बहुत खस्ता हो गई| इनके घर वालों ने इन्हें मजबूर किया कि आप परमहंस जी
से जाकर कहे कि हमारे घर की हालत ठीक करे| नरेंद्र ने जवाब दिया कि मुझसे यह तुच्छ
पदार्थ नहीं माँगे जाते फिर भी मजबूर होकर गए| जाकर परमहंस जी से कहा महाराज मेरे
घर वाले ऐसा कहते हैं| रामकृष्ण परमहंस बोले कि
मैंने आज तक माँ से कभी दुनिया के पदार्थ नहीं माँगे,
परन्तु जाओ तुम जाकर माँग लो, माँ तुम्हारी फरियाद जरूर सुनेगी| जब विवेकानंद जी
मंदिर में गए तो उन्होंने माँ से माँगा- “माँ
मुझे विवेक दो, वैराग्य दो, ज्ञान दो|’ जो पदार्थ उन्होंने माँगने थे, वह माँग ही
नहीं पाए| तीन बार रामकृष्ण परमहंस जी ने उन्हें मंदिर में भेजा माँगने के लिए
परन्तु तीनों बार उन्होंने यही माँगा कि माँ मुझे विवेक दो, वैराग्य दो, ज्ञान दो|
तब रामकृष्ण परमहंस जी ने कहा – “बेटा
इन मायावी पदार्थो को माँगने के लिए तेरा जन्म नहीं हुआ| तेरा जन्म तो किसी विशेष
उद्देश्य के लिए हुआ है| परन्तु तेरे घर में धन के अभाव को माँ पूरा करेगी| एक दिन
रामकृष्ण परमहंस जी वे स्वामी विवेकानंद जी पर कृपा भरा हाथ रखा तो उन्हें सकल
ब्रह्माण्ड घूमता हुआ नजर आया| कहते हैं कि गुरु कृपा का वर्णन करते हुए, स्वामी
विवेकानंद जी रो पड़े और कहा करते थे कि “आप
भले ही मुझे गुरु कह लो, जगत विख्यात स्वामी कह लो लेकिन अभी कल की बात है कि मैं
नास्तिक था| निरंतर छ: वर्षों तक गुरुदेव से संघर्ष करता रहा, परन्तु उन्होंने उस
समय तक न छोड़ा, जब तक मैंने दीन और विनम्र बनकर उनकी महानता के सामने हथियार नहीं
डाल दिया|”
एक अन्य अवसर पर उन्होंने कहा था”
भूखे को पेट भर खाना खिलाना, नंगे को कपड़ा पहना देना, रोगी की सेवा करना सबसे बड़ा
दान और धर्म है परन्तु इस दान और धर्म का प्रभाव कुछ समय और कुछ दिन तक रहता है|
सब प्रकार के दान से उत्तम ज्ञान दान का प्रभाव न केवल जीवन बदल देता है बल्कि कई
जन्मों को सँवार देता है| एक जीवन को नहीं बल्कि एक के बहाने अनेको असंख्य जीवों
को|
*****
सम्पूर्ण समर्पण
एक बार नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद जी) अपने गुरु के चरणों
में आये और कुछ रुपये और मिठाइयाँ भेंट की| तब उनके गुरु ने पूछा नरेंद्र आज इतने
खुश कैसे हो और ये मिठाइयाँ और पैसे किस लिए लाये हो| नरेंद्र ने कहा कि गुरु देव
आज मेरी नौकरी लग गई है उस नौकरी में से कुछ पैसे मैं भेंटा कर रहा हूँ| उनके गुरु
जी ने फरमाया कि बहुत ख़ुशी की बात है अच्छा ये बताओ तुम्हे ये तो रुपये मिले कितने
दिन नौकरी के बाद तुम्हे मिले है| तो नरेंद्र ने कहा कि प्रभु 30 दिन 1 महिना काम
करना पड़ता है| तो गुरु जी ने कहा कि तीस दिन तुमने काम किया तब जाकर तुम्हे ये धन
मिला अगर तुम इस समय का 10 वां हिस्सा भी मुझे दोंगे तो मैं तुम्हे वो धन दूंगा
जिसके सामने त्रिलोकी की सम्पदा भी तुच्छ होगी|
सतगुरु मारा तां कर, सबद सुरंगी बान
मेरा मारा फिर जिये, तो हाथ ण गहुँ कमान
नरेंद्र
ने कहा कि मैं 10 वां हिस्सा क्यों मैं आज आपको सम्पूर्ण ही समर्पण करता हूँ|
उन्होंने अपना सम्पूर्ण समर्पण किया तो सतगुरु ने भी उन्हें नरेंद्र से स्वामी
विवेकानंद बना दिया|
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स्वामी विवेकानंद
जी की शिकायत
एक बार स्वामी
विवेकानन्द ने परमहंस जी से शिकायत की कि “आप
मेरा ध्यान नहीं रखते। मेरा अभी कुछ नहीं बना। अपने परम शिष्य के यह रोष भरे शब्द
सुनकर परमहंस रामकृष्ण बोले- “नरेन्द्र!
तुमसे किस समय और क्या काम लेना है, यह मै भली-भांति जानता हूँ।”
तब एक दिन परमहंस जी ने नरेंद्र को पास बुला लिया और सबको कमरे से बाहर जाने की
आज्ञा दी। परमहंस जी नरेन्द्र को पास बिठाकर उसे स्थिर दृष्टि से देखते हुए एकदम
समाधि-स्थित हो गये। इधर नरेन्द्र को ऐसा अनुभव हुआ कि कमरे की सारी दीवारें हिलने
लगीं, फिर सारा मकान घूमने लगा और सकल ब्रहमाण्ड चक्कर खाने लगा। नरेंद्र को ऐसा
महसूस हुआ कि एक अद्भुत शक्ति विघुत प्रवाहवत् अन्दर प्रवेश कर रही है। सारा शरीर
थर-थर कांप रहा था। नरेन्द्र इसे सहन न कर
सका और एकदम चिल्लाया- ‘आप यह क्या कर रहे हैं?”
परमहंस जी ने बहुत शांत स्वर में फरमाया- “मै
वही कुछ कर रहा हूं जो मुझे करना चाहिए।”
नरेन्द्र एकदम बेसुध हो गये। जब फिर सुधि आई तो क्या देखा कि परमहंस जी अश्रुपात
कर रहे हैं। थोड़ी देर बाद बोले- “आज
तुझे सब देकर मैं फ़कीर हो गया हूँ। अब जब तक मेरा काम पूरा नहीं होगा, तुझे छुट्टी
नहीं मिलेगी. शक्ति मेरी होगी, काम तू करेगा। तेरी हड्डियां भी मेरा काम करेंगी।
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प्रभु जी मोरे अवगुण चित ना धरो
स्वामी
विवेकानंद जी को एक बार किसी राज्य में (पुराने ज़माने के अंदर हमारे भारत में बहुत
सारे राज्य हुआ करते थे जैसे अब प्रान्त होते है, पहले राज्य होते थे, उनके राजा होते
थे) मुख्य अतिथि के रूप में निमंत्रण दिया गया, जैसे राष्ट्रीय पर्व
होते है, ऐसे उस राज्य का राष्ट्रीय पर्व था | क्योंकि वो अपने ज़माने में बड़े ही सम्मानित
संत थे, देश विदेश में उनका बड़ा नाम था | जिस दिन राष्ट्रीय पर्व का मुख्य आयोजन था,
उस दिन जब उन्होंने schedule देखा कि ये ये
प्रोग्राम है, तो उनके प्रवचन का प्रोग्राम भी था और उसके बाद लास्ट में जो समापन होता
है उसमे एक प्रोग्राम होता था जो हमेशा होता था, वहां की जो फेमस डांसर थी वो गीत गाते
हुए डांस करती थी | बाकी सारा तो उन्होंने पास कर दिया, जब उनकी निगाह इस लाइन पर पड़ी
तो उन्होंने कहा कि ये जो डांसर है उस चक्कर में हम नहीं पड़ते, हम संत महात्मा
है और हम तो इसमें सम्लित नहीं होंगे | अब असमंजस हो गया क्योंकि उनकी तो परम्परा सालों
से चलती आ रही थी| तो ये बात उस डांसर तक पहुंच गयी, कहते है जब किसी के उद्धार का
समय होता है, हम सत्संग में सुनते है कि जिस पर परमात्मा कृपा करता है, जब परमात्मा
किसी को अपने साथ मिलाना चाहता है तो उसका मिलन किस से हो जाता है? संतो से मिलन हो
जाता है, तो वो ऐसा संयोग बना देता है और जो पूर्ण संत होते है उनका प्रभाव ऐसा होता
है जैसे सूर्य
उगता
है तो चारों तरफ रोशनी हो जाती है जो बंद दरवाजे होते है उनके सुराखों से
भी रोशनी अंदर घुस जाती
है| अब उच्च कोटि के संत तो वहां आये हुए थे | उनकी ज्ञान की उनकी भक्ति की रोशनी उसके हृदय तक
पहुँच
गयी
| आज कल तो किसी के अंदर कोई कला हो तो बहुत अहंकार होता है| उसने बड़ी निम्रता से विनती
भिजवाई स्वामी विवेकानंद जी को कि इस राज्य की परंपरा भी न टूटे और स्वामी जी का भी
मान रह जाये तो उसके लिए एक रास्ता है कि स्टेज पर एक तरफ पर्दा लगा दिया जाये और मैं
उस पर्दे के पीछे से अपना प्रोग्राम दिखाउंगी तो उससे स्वामी जी की मर्यादा भी भंग
नहीं होगी और राज्य की परंपरा भी नहीं टूटेगी | ये बात सुन कर स्वामी जी का मन भी पिघल गया कि ठीक है, वो
मान गए | सारा कार्यक्रम हो गया | अब जब उसकी बारी आयी तो उसने बड़े ही भाव पूर्ण से (कहते है जब हृदय भाव से भर जाता है भगवन कि
दरबार में किसी कि रूप रंग कला का कोई महत्व नहीं रहता, महत्व है भाव का और वो भाव
किसी के अंदर भी प्रकट हो सकता है राजा के अंदर भी और रंक के अंदर भी हो सकता है, पापी
के अंदर भी हो सकता है और पुनित के अंदर भी) उस समय सूरदास जी का एक पद गाया:-
"प्रभुजी मोरे/मेरे अवगुण
चित्त
ना
धरो,
समदर्शी प्रभु नाम तिहारो, चाहो
तो पार करो ।
एक लोहा पूजा मे राखत, एक घर
बधिक परो ।
सो दुविधा पारस नहीं देखत, कंचन
करत खरो
समदर्शी प्रभु नाम तिहारो, चाहो
तो पार करो "
इतने
भाव पूर्ण से गा रही थी वो कि सब की आँखों में अश्रु की धारा बहने लगी और अंतिम जो
पद था
एक माया एक ब्रह्म कहावत, सुर
श्याम झगरो ।
अब की बेर मुझे पार उतारो, नही
पन जात तरो ॥
प्रभुजी मोरे अवगुण चित ना धरो..
जब ये पंक्ति पड़ी
तो स्वामी जी से भी नहीं रहा गया, उनकी आँखों से भी अश्रु बहे और वो खड़े होकर खुद वहां
पर पहुँचे
जहाँ पर्दा
लगा हुआ था और उन्होंने पर्दा हटा दिया| जैसे ही पर्दा हटाया वो उनके चरणों में गिरी
| स्वामी विवेकानंद जी ने उसे इस प्रकार अपने चरणों से लगा लिया
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ट्रेन में यात्रा
एक बार स्वामी
विवेकनद ट्रेन से यात्रा कर रहे थे और हमेशा की तरह भगवा कपड़े और पगड़ी पहनी हुई
थी| ट्रेन में यात्रा कर रहे एक अन्य यात्री को उनका ये रूप बहुत अजीब लगा और वो
स्वामी जी को कुछ अपशब्दं कहने लगा बोला– तुम सन्यासी बनकर रहते हो कुछ कमाते
धमाते क्यों नहीं हो, तुम लोग बहुत आलसी हो, लेकिन स्वामी जी दयावान थे उन्होंने
उसकी तरफ बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया और हमेशा की तरह चेहरे पर तेज लिए मुस्कराते
रहे| उस समय स्वामी जी को बहुत भूख लगी हुई थी क्योंकि उन्होंने सुबह से कुछ खाया
पिया नही था| स्वामी जी हमेशा दूसरों के कल्याण के बारे में सोचते थे अपने खाने का
उन्हें ध्यान ही कहाँ रहता था| एक तरफ स्वामी जी भूख से व्याकुल थे वही वे यात्री
उनको और बुरा भला कहने में कोई कमी नहीं छोड़ रहा था| इसी बीच स्टेशन आ गया और
स्वामी जी और वो यात्री दोनों उतर गये| उस यात्री ने अपने बैग से अपना खाना निकाला
और खाने लगा और स्वामी जी से बोला– अगर कुछ कमाते तो तुम भी खा रहे होते| स्वामी
जी बिना कुछ बोले थकेहारे एक पेड़ के नीचे बैठ गये और बोले मैं अपने ईश्वर पर
विश्वास करता हूँ, जो वो चाहेंगे वो ही होगा| अचानक ही से एक आदमी खाना लिए हुए
स्वामी जी के पास आया और बोला क्या आप ही स्वामी विवेकानंद है और इतना कहकर वो
स्वामी जी के कदमों में गिर पड़ा और बोला
की मैंने रात को एक सपना देखा था जिसमे खुद भगवान ने मुझसे कहा कि मेरा परम भक्त
विवेकानंद भूखा है तुम जल्दी जाओ और उसे भोजन देकर आओ| बस इतना सुनना था की वो
यात्री जो स्वामी जी की आलोचना कर रहा था भाग कर आया और स्वामी जी के कदमो में गिर
पड़ा, बोला – महाराज मुझे क्षमा कर दीजिये मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई है मैंने भगवान
को देखा नही है लेकिन आज जो चमत्कार मैंने देखा उसने मेरे भगवान में विश्वास को
बहुत बड़ा दिया है| स्वामी जी ने दया भाव से व्यक्ति को उठाया और गले से लगा लिया|
स्वामी जी के जीवन से जुड़ी ये सत्य घटना बहुत प्रभावित करती है और बताती है की है
किस तरह भगवान अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और पालन पोषण करते हैं |
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रुको उनका सामना करो
एक बार बनारस में स्वामी जी दुर्गा जी के मंदिर से निकल रहे थे की तभी वहाँ मौजूद
बहुत सारे बंदरों ने उन्हें घेर लिया| वे उनके नज़दीक आने लगे और डराने लगे| स्वामी जी भयभीत हो गए और खुद को बचाने के लिए दौड़ कर भागने लगे| पर बन्दर तो मानो पीछे ही पड़ गए, और वे उन्हें दौड़ाने लगे| पास खड़ा एक वृद्ध सन्यासी ये सब देख रहा था, उसने स्वामी जी को रोका और बोला,” रुको! उनका सामना करो!” स्वामी जी तुरन्त पलटे
और बंदरों के तरफ बढ़ने लगे , ऐसा करते ही सभी बन्दर भाग गए| इस घटना से स्वामी जी को एक गंभीर सीख मिली और कई सालों बाद उन्होंने एक संबोधन में कहा भी – ” यदि तुम कभी किसी चीज से भयभीत हो तो उससे भागो मत, पलटो और सामना करो|”
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अच्छे बुरे का पता
स्वामी विवेकानन्द ने एक शिष्य को पास
बुलाकर कहा- 'तुम शहर में
जाकर पता लगाओ कि ऐसे
कितने लोग हैं, जिन्हें
बुरे की श्रेणी में रखा जा सकता है।' शिष्य
ने कहा- 'जो आज्ञा गुरु जी।' इतना
कहकर शिष्य वहाँ से चला गया। थोड़ी ही देर में स्वामी
विवेकानन्द ने दूसरे शिष्य को आवाज लगाई| दूसरा शिष्य उपस्थित हुआ और हाथ जोड़कर
खड़ा हो गया और कहने लगा- 'गुरु
जी, आपने मुझे पुकारा
था, कहिए
क्या आदेश हैं?' स्वामी
विवेकानन्द ने कहा- 'तुम
शहर में जाकर मालूम करो कि अच्छे लोगों का
प्रतिशत कितना है?' दूसरा
शिष्य सिर झुकाकर बोला- 'जो
आज्ञा गुरु जी' और
आदेश का पालन करने निकल गया। दोनों
शिष्य स्वामी विवेकानन्द के बताए कार्य पर विस्तृत
अध्ययन करके एक के बाद एक लौटे। पहले
शिष्य ने आकर अपने आकलन का सार प्रस्तुत किया
और बोले- 'गुरु जी ! मुझे तो शहर में बहुत ढूँढने पर भी कोई बुरा व्यक्ति नहीं मिला।' स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा- 'अच्छा, तुम अब जाओ।' कुछ
देर के बाद दूसरा शिष्य उपस्थित हुआ और स्वामी
विवेकानन्द जी को प्रणाम करके बोला- 'गुरु
जी ! मैंने राजधानी में अच्छे लोगों की खोज-पड़ताल की, लेकिन
ऐसा लगा कि यहाँ
अच्छे लोगों
का अकाल पड़ गया है।' यह
सुन कर स्वामी विवेकानन्द जी मुस्कराए। फिर उन्होंने सभी
शिष्यों के साथ इन दोनों शिष्यों के निष्कर्षों की व्याख्या की। शिक्षा - स्वामी विवेकानन्द
ने कहा- 'चूंकि जो अच्छे हैं अतः उन्हें सभी
लोग अच्छे ही नजर आते हैं। यहाँ तक कि बुरे लोगों में भी अच्छे लोगों के गुण दिखाई देते हैं। उसी कारण
उन्हें कोई बुरे व्यक्ति नहीं मिलते। दूसरी ओर दूसरे शिष्य को
कोई अच्छे पुरुष नजर नहीं आया, क्योंकि
उनकी रुचि अच्छे लोगों
में जरा भी नहीं थी।'
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माँ की महिमा
स्वामी विवेकानंद जी से एक जिज्ञासु ने प्रश्न किया, माँ की महिमा संसार
में किस कारण से गाई जाती है? स्वामी जी मुस्कराए,
उस व्यक्ति से बोले, पांच सेर वजन का एक पत्थर ले आओ। जब
व्यक्ति पत्थर ले आया तो स्वामी जी ने उससे कहा, अब इस पत्थर को किसी कपड़े में लपेटकर
अपने पेट पर बाँध लो और चौबीस घंटे बाद मेरे पास आओ तो मैं तुम्हारे प्रश्न का
उत्तर दूंगा। स्वामी जी के आदेशानुसार उस व्यक्ति ने पत्थर को अपने पेट पर
बांध लिया और चला गया। पत्थर बंधे हुए दिनभर वो अपना कम करता रहा, किन्तु हर श्रण उसे परेशानी और
थकान महसूस हुई। शाम होते-होते पत्थर का बोझ संभाले हुए चलना फिरना उसके लिए कठिन हो गया। थका माँदा वह स्वामी जी के
पास पहुँचा और बोला मैं इस पत्थर को अब और अधिक देर तक बांधे नहीं रख
सकूंगा।
एक प्रश्न का उत्तर पाने के लिए मैं इतनी कड़ी सजा
नहीं भुगत सकता| स्वामी जी मुस्कुराते हुए बोले, पेट पर इस पत्थर का बोझ तुमसे कुछ घंटे
भी नहीं उठाया गया। माँ अपने गर्भ में पलने वाले शिशु को पूरे
नौ माह तक ढ़ोती है और ग्रहस्थी का सारा काम करती है। संसार में माँ के सिवा कोई इतना
धैर्यवान और सहनशील नहीं है। इसलिए माँ से बढ़ कर इस संसार में कोई और नहीं।
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शिष्य
बनने की विनय
स्वामी
विवेकानंद जी के पास एक बार एक व्यक्ति आया तो उसने स्वामी जी से विनय की कि कृपा
करके मुझे अपना शिष्य बना लो| तब स्वामी जी ने उसे कुछ बताना शुरू किया लेकिन जब
भी स्वामी जी कुछ बताने लगते तो वह बीच में बोल पड़ता कि हाँ हाँ मुझे तो इस बारे
में पता है| ऐसा कई बार हुआ आखिरकार स्वामी विवेकानंद जी चुप हो गए| वो समझ गए कि
ये व्यक्ति पहले से ही भरा हुआ है| अब स्वामी जी ने उसे चाय के लिए कहा| तब वे
दोनों चाय पीने बैठ गए| चाय जो है वो केतली में पड़ी थी| स्वामी जी केतली से चाय कप
में डालने लगे| अब कप भर गया है लेकिन फिर
भी स्वामी जी चाय डालते जा रहे हैं तब उस व्यक्ति ने कहा कि कप तो भर गया है आप
फिर भी चाय क्यों डाल रहे हो तब स्वामी जी ने कहा कि मैं तो केतली की सारी चाय इसी
कप में डालूँगा| तब उस व्यक्ति ने कहा ऐसा हो ही नहीं सकता कप में जितनी जगह थी वो
भर गई है अब उसमे और चाय नहीं आ सकती| तब स्वामी जी ने फरमाया कि तुम्हारी भी यही
हालत है तुम भी अपने विचारों से भरे हुए हो जब तक वो खाली नहीं होंगे, तब तक कुछ
और नहीं जा सकता| तब उस व्यक्ति को समझ आया कि अपने विचारों को तब तक बदला नहीं जा
सकता जब तक हम अपने आप को खाली नहीं करते और दूसरों की बातों को ध्यान से सुनते
नहीं है|
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मूर्ति
पूजा
स्वामी विवेकानंद को एक राजा ने अपने भवन में बुलाया और बोला, 'तुम
हिन्दू लोग मूर्ती की पूजा करते हो! पर मैं ये सब नही मानता। ये तो केवल एक पदार्थ
है।' उस राजा के सिंहासन के पीछे किसी आदमी की तस्वीर लगी थी।
विवेकानंद जी कि नजर उस तस्वीर पर पड़ी। विवेकानंद जी ने राजा से पूछा, 'राजा
जी, ये तस्वीर किसकी है?' राजा
बोला, 'मेरे पिताजी की।' स्वामी
जी बोले, 'उस तस्वीर को अपने हाथ में लीजिये।' राजा तस्वीर को हाथ मे ले लेता है। स्वामी जी राजा से: 'अब
आप उस तस्वीर पर थूकिए!' राजा: 'ये
आप क्या बोल रहे हैं स्वामी जी?' स्वामी
जी: 'मैंने कहा उस तस्वीर पर थूकिए!' राजा
(क्रोध से): 'स्वामी जी, आप
होश मे तो हैं ना? मैं ये काम नही कर सकता।' स्वामी
जी बोले, 'क्यों?
ये तस्वीर तो केवल एक
कागज का टुकड़ा है, और जिस पर कूछ रंग लगा है। इसमे ना तो जान है, ना
आवाज, ना तो ये सुन सकता है, और
ना ही कूछ बोल सकता है। इसमें ना ही हड्डीहै और ना प्राण। फिर भी आप इस पर कभी थूक
नही सकते। क्योंकि आप इसमे अपने पिता का स्वरूप देखते हो। और आप इस तस्वीर का
अनादर करना अपने पिता का अनादर करना ही समझते हो।
वैसे ही, हम
हिंदू भी उन पत्थर, मिट्टी,
या धातु की पूजा
भगवान का स्वरूप मान कर करते हैं। भगवान तो कण-कण मे है, पर
एकआधार मानने के लिए और मन को एकाग्र करने के लिए हम मूर्ती पूजा करते हैं।' तब
राजा ने स्वामी जी के चरणों में गिर कर क्षमा माँगी।
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