संत नाम देव जी
भक्त नामदेव जी का जन्म जिला सतार मुंबई गाँव नरसी ब्राह्मणी
में कार्तिक सुदी संवत 1327 विक्रमी को हुआ| आपकी माता का नाम गोनाबाई तथा पिता का नाम सेठी था| ये छींबा जाति से सम्बन्ध रखते थे|वे कपड़े धोते व छापते थे| सेठी बहुत ही नेक पुरुष था|वे सदा सच बोलते व कर्म करते रहते थे|
पिता की नेकी का असर पुत्र पर भी पड़ा| वहा भी साधू संतो के पास बैठता| वह उनसे उपदेश भरे वचन सुनता रहता| उनके गाँव में देवता का मन्दिर
था| जिसे विरोभा देव का
मन्दिर कहा जाता था| वहाँ जाकर लोग
बैठते व भजन करते थे| वह भी बच्चो को इकट्ठा करके भजन - कीर्तन करवाता| सभी उसको शुभ बालक कहते थे| वह बैरागी और साधू
स्वभाव का हो गया| कोई काम काज भी न
करता और कभी - कभी काम काज करता हुआ राम यश गाने लगता| एक दिन पिता ने उससे कहा - बेटा कोई
काम काज करो| अब काम के बिना
गुजारा नहीं हो सकता| कर्म करके ही परिवार को चलाना है| अब तुम्हारा विवाह भी हो चुका है|
नामदेव बोला!
"विवाह तो आपने कर दिया"
लेकिन मेरा मन तो भक्ति में ही लगा हुआ है|
क्या करूँ?
पिता जी ने कहा कि बेटा!
भक्ति भी करो| भक्ति करना कोई गलत
कार्य नहीं है लेकिन जीवन निर्वाह के लिए रोजी भी जरुरी है| वह भी कमाया करो| ईश्वर रोजी में बरकत डालेगा| नामदेव जी की शादी
छोटी उम्र में ही हो गई थी| उनकी पत्नी का नाम
राजाबाई था| नामदेव का कर्म -
धर्म भक्ति करने को ही लोचता था| पर उनकी पत्नी ने उन्हें व्यापार कार्य में लगा दिया| परन्तु वह असफल रहा| भक्त नामदेव जी जो
जाति से छीपा थे अपना ध्यान प्रभु भक्ति में लगाया हुआ था| एक दिन उच्च जाति के क्षत्रिय व
ब्राह्मण मन्दिर में बैठकर प्रभु यश गान कर रहे थे| जब उन्होंने देखा कि निम्न जाति का
नामदेव उनके पास बैठ कर प्रभु की भक्ति कर रहा है, तो उन्होंने उसे पकड़कर संगत से उठा
दिया| वह देहुरे मन्दिर
के पिछले भाग के पास जाकर प्रभु का नाम जपने लगा| भगवान ने ऐसी लीला रची कि देहुरे का
मुँह घुमा दिया| यह उस तरफ हो गया
जहाँ नामदेव जी बैठे थे| उच्च जाति के लोग यह देखकर हैरान रह गए| प्रभु के दर पर तो निमानो को भी मान
मिलता है| प्रभु का प्रेम भी
निम्न लोगों की ओर ही जाता है| जैसे नीर नीचे स्थान की ओर बहता है ऊँचाई की तरफ नहीं जाता|
एक दिन नामदेव जी के पिता किसी काम से बाहर जा रहे थे| उन्होंने नामदेव जी से कहा कि अब उनके
स्थान पर वह ठाकुर की सेवा करेंगे जैसे ठाकुर को स्नान कराना, मन्दिर को स्वच्छ रखना व ठाकुर को दूध
चढ़ाना| जैसे सारी मर्यादा
मैं पूर्ण करता हूँ वैसे तुम भी करना| देखना लापरवाही या आलस्य मत करना नहीं तो ठाकुर जी नाराज हो
जाएँगे| नामदेव जी ने वैसा
ही किया जैसे पिताजी समझाकर गए थे| जब उसने दूध का कटोरा भरकर ठाकुर जी के आगे रखा और हाथ जोड़कर
बैठा व देखता रहा कि ठाकुर जी किस तरह दूध पीते हैं? ठाकुर ने दूध कहाँ पीना था? वह तो पत्थर की मूर्ति थे| नामदेव को इस बात का पता नहीं था कि
ठाकुर को चम्मच भरकर दूध लगाया जाता व शेष दूध पंडित पी जाते थे| उन्होंने बिनती करनी शुरू की हे प्रभु!
मैं तो आपका छोटा सा सेवक हूँ, दूध लेकर आया हूँ कृपा करके इसे ग्रहण कीजिए| भक्त ने अपनी बेचैनी इस प्रकार प्रगट
की -
हे प्रभु! यह दूध मैं कपला गाय से दोह
कर लाया हूँ| हे मेरे गोबिंद!
यदि आप दूध पी लेंगे तो मेरा मन शांत हो जाएगा नहीं तो पिताजी नाराज़ होंगे| सोने की कटोरी मैंने आपके आगे रखी है| पीए! अवश्य पीए! मैंने कोई पाप नहीं
किया| यदि मेरे पिताजी से
प्रतिदिन दूध पीते हो तो मुझसे आप क्यों नहीं ले रहे? हे प्रभु! दया करें| पिताजी मुझे पहले ही बुरा व निकम्मा
समझते हैं| यदि आज आपने दूध न
पिया तो मेरी खैर नहीं| पिताजी मुझे घर से बाहर निकाल देंगे| जो कार्य नामदेव के पिता सारी उम्र न
कर सके वह कार्य नामदेव ने कर दिया| उस मासूम बच्चे को पंडितो की बईमानी का पता नहीं था| वह ठाकुर जी के आगे मिन्नतें करता रहा| अन्त में प्रभु भक्त की भक्ति पर खिंचे
हुए आ गए| पत्थर की मूर्ति
द्वारा हँसे| नामदेव ने इसका
जिक्र इस प्रकार किया है -
ऐकु भगतु मेरे हिरदे बसै||
नामे देखि नराइनु हसै||
एक भक्त प्रभु के ह्रदय में बस गया| नामदेव को देखकर प्रभु हँस पड़े| हँस कर उन्होंने दोनों हाथ आगे बढाएं
और दूध पी लिया| दूध पीकर मूर्ति
फिर वैसी ही हो गई|
दूधु पीआई भगतु घरि गइआ ||
नामे हरि का दरसनु भइआ||
दूध पिलाकर नामदेव जी घर चले गए| इस प्रकार प्रभु ने उनको साक्षात दर्शन
दिए| यह नामदेव की भक्ति
मार्ग पर प्रथम जीत थी| शुद्ध ह्रदय से की हुई प्रार्थना से उनके पास
शक्तियाँ आ गई| वह भक्ति भाव वाले हो गए और जो
वचन मुँह से निकालते वही सत्य होते| जब आपके पिताजी को यह ज्ञान हुआ कि
आपने ठाकुर में जान डाल दी व दूध पिलाया तो वह बहुत प्रसन्न हुए| उन्होंने समझा उनकी कुल सफल हो गई है|
*****
छिपी
का काम
संत
नामदेव जी छिपी का काम करते थे| छिपी उन्हें कहते हैं जो कपड़ो पर रंग-बिरंगी बूटी
छापने का काम करते हैं| जीवन निर्वाह के लिए संत नामदेव जी यह काम धंधा तो करते
थे, परन्तु यह काम करते हुए भी वे सदा सपने चित में प्रभु को बसाये रखते तथा सदा
स्मरण व ध्यान में लीन रहते थे| एक बार भक्त त्रिलोचन जी संत नामदेव जी के
दर्शनार्थ उनके घर गए| जब भक्त जी उनके घर पहुँचे, उस समय संत नामदेव जी कपड़े
छापने में व्यस्त थे| भक्त त्रिलोचन जी सोच में पड़ गए कि ये तो काम धंधे में लगे
हुए हैं, ये स्मरण दान क्या करते होंगे? उस समय उन्होंने संत नामदेव जी को
सम्बोधित करते हुए इन शब्दों का उच्चारण किया-
नाम
मैंया मोहिया कहे तिलोचाणु मं|
काहे चिपहू चिली राम न लावहु चितु|
भक्त
त्रिलोचन जी ने कहा – “हे
नामदेव जी, आपको माया ने मोह रखा है| आप कपड़ो पर यह छपाई किसलिए कर रहे हो? प्रभु
के साथ चित का सम्बन्ध क्यों नहीं जोड़ते?”
ये शब्द सुनकर संत नामदेव जी ने भक्त त्रिलोचन जी की ओर देखा और बोले-
नाम कहे तिलोचना मुख ते राम सम्हाली
हाथ
पौ करी कामू सभु निरंजन नाली
संत
नामदेव जी ने कहा- “हे
त्रिलोचन, मुख से हर समय प्रभु नाम की संभाल कर अर्थात प्रभु नाम का स्मरण कर| हाथ
पाँव आदि से सब काम कर, परन्तु चित सदा प्रभु से जुड़ा रहे| जीवन में सुख शांति
प्राप्त करने का और अपना परलोक सवाँरने का यह सुगम साधन है|”
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चोर को सच बोलने का
ज्ञान
एक बार की बात है सन्त नामदेव जी ने
किसी चोर को चोरी करते हुए देखा, तो
उससे पूछने लगे कि तू ये गलत काम क्यों करता है चोरी करना छोड़ दे| तो उस चोर ने कहा कि मुझे और तो कोई
काम आता नहीं है मेरे पिताजी भी यही काम करते थे और ना ही मैं पढ़ा- लिखा हूँ| तो सन्त जी ने कहा कि तू मुझे एक वायदा
कर कि तू कभी झूठ नहीं बोलेगा| तब
उस चोर ने सन्त जी से वायदा किया कि मैं कभी झूठ नहीं बोलूंगा| अब सन्त जी चले गये और वह चोर भी अपने
काम को जोकि चोरी करना था निकल पड़ा| रास्ते
में उसे देश का राजा मिला जोकि वेष बदलकर राज्य में जांच कर रहा था कि क्या चल रहा
है| उस राजा ने चोर से
पूछा- हाँ भाई| तू क्या करता है? तो चोर को सन्त जी को दिया हुआ वायदा
याद आया कि झूठ नहीं बोलना तो उसने सच- सच
बता दिया कि मैं चोरी करता हूँ| राजा
ने कहा कि मैं भी चोर हूँ| अब
हम दोनों मिलकर चोरी करेंगे| राजा
ने जोकि वेष बदले हुए था कहा कि क्यों न हम राजा के महल में चोरी करे| मैं पहले वही पर नौकर था और मुझे राजा
ने गुस्से से निकाल दिया था| मुझे
महल के सारे रास्ते पता है कि कहाँ-कहाँ
धन पड़ा है| अब वह दूसरा चोर
राजा की बातो में आकर महल में चोरी करने चला गया| जब वह खजाना कक्ष में पहुँचा तो वहाँ
उसने एक संदूक में तीन हीरे देखे| तो
उसके मन में विचार आया कि अगर तीन हीरे लूंगा तो हम दोनों के बीच बंटवारा नहीं हो
पायेगा इसलिए दो हीरे ही उठा लेता हूँ| बेहद
कीमती हीरे हैं जीवन भर गुजारा चल जाएगा|
वह दो हीरे ले आता है और राजा के पास आकर
बताता है कि मैं दो हीरे चोरी करके लाया हूँ एक तुम रख लो| अब राजा यह देखकर हैरान होता है कि
हीरे तो संदूक में तीन थे फिर ये दो कैसे लाया है कहीं ये झूठ तो नहीं बोल रहा| राजा अपने खजाना कक्ष में जाकर देखता
है तो वहाँ एक हीरा पड़ा होता है| राजा
समझ जाता है ये जो चोर है बड़ा ही ईमानदार है|
अगले दिन पूरे राज्य में हल्ला मच जाता
है कि राजा के यहाँ चोरी हो गई| राजा
मंत्री को बुलाता है कि खजाना कक्ष में जांच करके आये कि क्या-क्या चोरी हुआ है| अब मंत्री वहाँ जाता है तो देखता है कि
संदूक में तीन हीरे थे अब एक हीरा पड़ा है|
वह समझ जाता है कि चोर दो हीरे उठा के
ले गया है| मंत्री के मन में
विचार आता है क्यों ना ये हीरा मैं अपने पास ही रख लूँ नाम तो चोर का ही आयेगा| वह हीरा उठा कर राजा को सूचित करता है
कि खजाना कक्ष से तीन हीरे गायब हैं| राजा
सारा माँझला समझ गया| राजा
ने चोर को बुलवाया और उससे पूछा कि कितने हीरे उठाये थे तो चोर ने बता दिया कि दो
हीरे| मंत्री ने कहा कि
नहीं ये झूठ बोल रहा है| तब
राजा ने जवाब दिया ये चोर सच कह रहा है कि इसने दो हीरे उठाये थे और इसका साथी मैं
ही था| जिसे इसने दूसरा
हीरा दिया| तब मंत्री की हालत
खराब हो गई और उसने सब सच-सच
बता दिया| तब राजा ने उस
ईमानदार चोर को मंत्री के पद पर नियुक्त कर दिया तब उस चोर ने मन में विचारा कि
संतो की एक बात मानने पर ही मैं चोर से मंत्री बन गया अगर मैं सदा उनकी चरण-शरण में रहूँगा तो मुझे कितना लाभ होगा| वह तब से सन्त महापुरुषों की चरण-शरण ग्रहण कर लेता है||
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