राक्षस
बक का वध
पाण्डव अपनी माँ कुंती के साथ इधर से उधर भ्रमण कर रहे थे| वे
ब्राह्मणों का वेश धारण किए हुए थे| भिक्षा
माँगकर खाते थे और रात में वृक्ष के नीचे सो जाया करते थे| भाग्य
और समय की यह कैसी अद्भुत लीला है| जो
पांडव हस्तिनापुर राज्य के भागीदार हैं और जो सारे जगत को अपनी मुट्ठी में करने
में समर्थ हैं, उन्हीं को आज भिक्षा पर जीवन-यापन करना पड़ रहा है|
दोपहर के बाद का समय था|
पांडव अपनी माँ कुंती
के साथ वन के मार्ग से आगे बढ़ते जा रहे थे| सहसा
उन्हें वेदव्यास जी दिखाई पड़े| कुंती
दौड़कर वेदव्यास जी के चरणों में गिर पड़ी| उनके
चरणों को पकड़कर बिलख-बिलख कर रोने लगी| उसने
अपने आंसुओं से उनके चरणों को धोते हुए उन्हें अपनी पूरी कहानी सुना दी|
वेदव्यास जी ने कुंती को धैर्य बंधाते हुए कहा, "आँसू
बहाने से कुछ नहीं होगा|
जो ऊपर पड़ा हैं, उसे
धैर्य से सहन करो| जब अच्छे दिन आएंगे, फिर
सब कुछ ठीक हो जाएगा|
चलो, मेरे
साथ चलो| मैं तुम्हें एक स्थान बताए दे रहा हूँ| कुछ
दिनों तक वहीं रहकर समय काटो|" वेदव्यास
जी पांडवों को एक नगर में ले गए| उस
नगर का नाम एकचक्रा था|
आज के बिहार राज्य
में, शाहाबाद जिले में आरा नामक एक बड़ा नगर है| महाभारत
काल में आरा को ही एकचक्रा के नाम से पुकारा जाता था| उन
दिनों एकचक्रा में केवल ब्राह्मण ही निवास करते थे| वेदव्यास
जी पांडवों को एकचक्रा में पहुँचाकर चले गए| पांडव
एक ब्राह्मण के घर में निवास करने लगे| पाँचों
भाई प्रतिदिन भिक्षा माँगने के लिए जाया करते थे| भिक्षा
में जो अन्न मिलता था,
उसी से अपने जीवन का
निर्वाह करते थे| उन दिनों एकचक्रा में एक राक्षस के द्वारा बड़े जोरों का आतंक
फैला हुआ था| उस राक्षस का नाम बक था| वह
दिन में वन में छिपा रहता था| रात
में बाहर निकलता था और एकचक्रा में घुस जाता था| जिसे
भी पाता था, मार डालता था| खाता
तो एक या दो आदमी को था,
पर पंद्रह-बीस
आदमियों के प्राण रोज जाते थे| आखिर
एकचक्रा के निवासियों ने बक से एक समझौता किया - प्रतिदिन नगर का एक आदमी अपने आप
ही बक के पास पहुँच जाया करेगा और बक उसे मारकर खा लिया करेगा| एक
ही आदमी की जान जाएगी,
व्यर्थ में मारे जाने
वाले लोग बच जाया करेंगे| बक ने भी इस समझौते को स्वीकार कर लिया| उसे
जब बैठे-बिठाए ही भोजन मिल जाता था, तो
वह समझौते को स्वीकार न करता तो क्या करता? उसने
समझौते को स्वीकार करते हुए चेतावनी दे रखी थी कि अगर समझौते का उल्लंघन किया गया
तो वह एकचक्रा को उजाड़कर मिट्टी में मिला देगा| बस, उसी
दिन से क्रम-क्रम से एक घर का एक आदमी बक के पास जाने लगा, बक
उसे खाकर अपनी क्षुधाग्नि को शांत करने लगा| संयोग
की बात, एक दिन उस ब्राह्मण के घर की बारी आ गई, जिसके
घर में पांडव अपनी माँ के साथ निवास करते थे| दोपहर
के पूर्व का समय था| कुंती अपने कमरे में बैठी हुई थी| उस
दिन भीम किसी कारणवश भिक्षा माँगने नहीं गया था| वह
भी कमरे के भीतर, कुंती के पास ही मौजूद था|
सहसा कुंती के कानों में किसी के रोने की आवाज आई| रोने
और विलाप करने का वह स्वर उस ब्राह्मण के कमरे से आ रहा था, जिसके
घर में वह ठहरी हुई थी|
जब कुंती से विलाप का
यह सकरुण स्वर सुना नहीं गया, तो
वह ब्राह्मण के कमरे में जा पहुँची| उसने
वहाँ जो कुछ देखा उससे वह सन्नाटे में आ गई|
ब्राह्मण के कुटुंब में कुल तीन ही प्राणी थे - ब्राह्मण-ब्राह्मणी और उसका एक
युवा पुत्र| तीनों बिलख-बिलखकर रो रहे थे, "हाय, हाय, अब
क्या होगा? अब तो सब कुछ मिट्टी में मिलकर रहेगा|"
कुंती ने तीनों को रोता हुआ देखकर ब्राह्मण से पूछा, "विप्रवर, आप
तीनों इस प्रकार क्यों रो रहे हैं? क्या
मैं जान सकती हूँ कि किस दारुण कष्ट ने आप तीनों को अत्यंत दुखी बना रखा है?" ब्राह्मण
ने आँखों से आँसुओं की बूँदें गिराते हुए उत्तर दिया, "बहन, तुम
सुनकर क्या करोगी? हमारा कष्ट एक ऐसा कष्ट है, जिसे
कोई दूर नहीं कर सकता|" कुंती ने सहानुभूति भरे स्वर में कहा, "हम
तो गरीब ब्राह्मण हैं|
सच है, हम
आपके कष्ट को दूर नहीं कर सकते, किंतु
फिर भी सुनने में हर्ज ही क्या है? हो
सकता है, हम आपके कुछ काम आ जाएं|"
जब कुंती ने बहुत आग्रह किया तो ब्राह्मण ने बक राक्षस की पूरी कहानी उसे सुना दी| कहानी
सुनाकर उसने सिसकते हुए कहा, "बहन!
हम कुल तीन ही प्राणी हैं|
यदि कोई एक राक्षस के
पास जाता है, तो वह उसे मारकर खा जाएगा| हमारा
घर बरबाद हो जाएगा| इसलिए हम सोचते हैं कि हम तीनों ही राक्षस के पास चले जाएंगे| हम
इसलिए रो रहे हैं, आज हम तीनों के जीवन का अंत हो जाएगा|"
ब्राह्मण की करुण कथा सुनकर कुंती बड़ी दुखी हुई| वह
मन ही मन कुछ क्षणों तक सोचती रही, फिर
बोली, "विप्रवर! मैं एक बात कहती हूँ, उसे
ध्यान से सुनिए| मेरे पाँच पुत्र हैं| आज
मैं अपने एक पुत्र को आपके कुटुंब की ओर से राक्षस के पास भेज दूंगी| यदि
राक्षस मेरे पुत्र को खा जाएगा, तो
भी मेरे चार पुत्र शेष रहेंगे|"
कुंती की बात सुनकर ब्राह्मण स्तब्ध रह गया| उसने
परोपकार में धन देने वालों की कहानियाँ तो बहुत सुनी थीं, पर
पुत्र देने वाली बात आज उसने पहली बार सुनी| वह
कुंती की ओर देखता हुआ बोला, "बहन, तुम
तो कोई स्वर्ग की देवी ज्ञात हो रही हो| मुझे
इस बात पर गर्व है कि तुम्हारी जैसी देवी मेरे घर में अतिथि के रूप में है| तुम
मेरे लिए पूज्यनीय हो|
मैं अपने अतिथि से
प्रतिदान लूँ, यह अधर्म मुझसे नहीं हो सकेगा| मैं
मिट जाऊंगा, पर मैं अतिथि को कष्ट में नहीं पड़ने दूँगा|" ब्राह्मण की बात सुनकर कुंती बोली, "आपने
हमें आश्रय देकर हम पर बड़ा उपकार किया है| आप
हमारे उपकारी हैं| हमारा धर्म है कि आपको कष्ट में न पड़ने दें| आप
अपने धर्म का पालन तो करना चाहते हैं, पर
हमें अपने धर्मपालन से क्यों रोक रहे हैं?"
कुंती ने जब बहुत आग्रह किया तो ब्राह्मण ने उसकी बात मान ली| उसने
दबे स्वर में कहा, "अच्छी बात है बहन! ईश्वर तुम्हारा भला करे|"
कुंती ब्राह्मण के पास से उठकर भीम के पास गई| उसने
पूरी कहानी भीम को सुनाकर उससे कहा, "बेटा, परोपकार
से बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं होता| तुम
ब्राह्मण कुटुंब की ओर से बक के पास जाओ| यदि
बक तुम्हें मारकर खा जाएगा, तो
मुझे प्रसन्नता होगी कि मेरा बेटा परोपकार की वेदी पर बलिदान हो गया|" भीम
ने बड़े हर्ष के साथ अपनी माँ की आज्ञा को स्वीकार कर लिया| उसने
कहा, "माँ,
तुम्हारी आज्ञा
शिरोधार्य है| बक मुझे क्या मारकर खाएगा, तुम्हारे
आशीर्वाद से मैं उसे मिट्टी में मिला दूँगा|" संध्या
का समय था भीम एक गाड़ी के ऊपर खाने-पीने का सामान लादकर उसे खींचता हुआ बक के
निवास स्थान की ओर चल पड़ा| वह
बक के निवास पर पहुँचकर गाड़ी पर लदे हुए खाने के सामान को स्वयं खाने लगा| बक
कुपित हो उठा| वह गरजता हुआ बोला, "एक
तो तुम देर से आए हो और ऊपर से मेरा भोजन खा रहे हो?" इतना
कहकर वह भीम पर टूट पड़ा|
भीम तो पहले ही तैयार
था| दोनों में मल्लयुद्ध होने लगा| दोनों
की गर्जना और ताल ठोंकने के शब्दों से वायुमण्डल गूँज उठा| बक
ने बड़ा प्रयत्न किया कि वह भीम को मल्लयुद्ध में पछाड़ दे, पर
वह सफल नहीं हुआ| वह स्वयं भीम की पकड़ में आ गया| भीम
ने उसे धरती पर गिराकर,
उसके गले को इतने
जोरों से दबाया कि उसकी जीभ बाहर निकल आई| वह
प्राणशून्य हो गया| भीम ने उसे उठाकर नगर के फाटक के पास फैंक दिया|
उधर, संध्या समय चारों भाई भिक्षाटन से लौटे, तो
कुंती से सब कुछ सुनकर वे बड़े दुखी हुए| उन्होंने
अपनी माँ से कहा, "तुमने भीम को अकेले भेजकर अच्छा नहीं किया| हम
भाईयों में वही एक ऐसा है,
जो संकट के समय काम
आता है|" कुंती ने अपने पुत्रों को समझाते हुए कहा, "तुम
चिंता क्यों करते हो?
तुम देखोगे कि मेरा
भीम बक को मिट्टी में मिलाकर आएगा|" फिर चारों भाई भीम का पता लगाने के लिए चल पड़े| वे
अभी कुछ ही दूर गए थे कि भीम अपनी मस्ती में झूमता हुआ आता दिखाई पड़ा| चारों
भाई दौड़कर भीम से लिपट गए| भीम
ने उन्हें बताया कि उसने किस तरह अत्याचारी बक को नर्क में पहुँचा दिया है| भीम
ने घर पहुँचकर अपनी माँ के चरण स्पर्श किए| उसने
कहा, "माँ,
तुम्हारे आशीर्वाद से
मैंने बक का संहार कर दिया| अब
एकचक्रा के निवासी सदा-सदा के लिए भयमुक्त हो गए|"
कुंती ने भीम का मुख चूमते हुए कहा, "बेटा
भीम! मुझे तुमसे यही आशा थी| मैंने
इसीलिए तो तुम्हें बक के पास भेजा था|"
प्रभात होने पर एकचक्रा निवासियों ने नगर के फाटक पर बक को मृत अवस्था में पड़ा
हुआ देखा| उन्हें जहां प्रसन्नता हुई, वहाँ
आश्चर्य भी हुआ - बक का वध किसने किया? क्या
ब्राह्मण ने? एकचक्रा के निवासी दौड़े-दौड़े ब्राह्मण के घर पहुँचने लगे| थोड़ी
ही देर में ब्राह्मण के द्वार पर बहुत बड़ी भीड़ एकत्रित हो गई| ब्राह्मण
के जयनाद से धरती और आकाश गूँजने लगा|
ब्राह्मण ने भीड़ को शांत करते हुए कहा, "भाईयों!
बक का वध मैंने नहीं किया है| उसका
वध तो मेरे घर में ठहरी हुई ब्राह्मणी के बेटे ने किया है|" एकचक्रा
के निवासी इस बात को तो जान गए कि बक का वध ब्राह्मण के घर में टिकी हुई ब्राह्मणी
के एक बेटे ने किया है,
किंतु अधिक प्रयत्न
करने पर भी वे यह नहीं जान सके कि ब्राह्मणी कौन है? और उसके पांचों बेटे कौन हैं? लेकिन
अब एकचक्रा के निवासी ब्राह्मणी और उसके पुत्रों का बड़ा आदर करने लगे| स्वयं
ब्राह्मण भी गर्व का अनुभव करने लगा कि जिस ब्राह्मणी के पुत्र ने एकचक्रा के
निवासियों को सदा-सदा के लिए संकट मुक्त करा दिया है, वह
उसके घर में अतिथि के रूप में टिकी हुई है|
*****
द्रौपदी का विवाह
पांडवों ने अब पांचाल का रास्ता पकड़ा| वहाँ
के राजा द्रुपद (जिन्हें अर्जुन, द्रोण
के सामने बंदी बनाकर लाये थे) की कन्या, राजकुमारी
द्रौपदी का स्वयंवर होने वाला था|
द्रुपद द्वारा आयोजित इस स्वयंवर में अनेक राजा और राजकुमार उपस्थित थे क्योंकि
राजकुमारी द्रौपदी न केवल सुन्दर और विदुषी थी, बल्कि
एक विख्यात और शक्तिशाली राजा की पुत्री भी थी| राजा
द्रुपद ने विशाल सभामंडप में एक बहुत कठिन प्रतियोगिता आयोजित की थी जिसे जीतने वाले राजा से उनकी पुत्री का विवाह होना था| दूर-दूर
के राज्यों के राजा राजकुमारी द्रौपदी को पत्नी के रूप में पाने के इच्छुक थे| पांडवों ने इस आयोजन और स्वयंवर के विषय में सुना और इसमें
भाग लेने का निश्चय किया| गरीब ब्राह्मणों के वेश में पांडव राजदरबार पहुँचे, वहाँ उन्होंने अनेक
राजाओं तथा राजकुमारियों को देखा-द्वारिका से श्री कृष्ण, हस्तिनापुर से दुर्योधन,
अंग देश के कर्ण, चेदी से शिशुपाल और मगध से जरासंध भी
आए थे| द्रुपद अपने राज
सिंहासन पर विराजमान थे| प्रतियोगी को दरबार के बीचों बीच रखे हुए विशाल
धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ानी थी| फिर ऊपर लगे हुए चक्र में घूमती केवल मछली की
सुनहरी आँख में लक्ष्य साधना था|
लक्ष्य साधने के लिए वह केवल मछली के प्रतिबिंब
को नीचे रखे जल-कुण्ड में देख सकता था| प्रतियोगी अधिक से अधिक पाँच बाणों का प्रयोग
कर सकता था| अनेक पराक्रमी राजा राजकुमारों ने धनुष
पर प्रत्यंचा चढ़ाने का असफल प्रयास किया|
दुर्योधन की चेष्टा भी निष्फल रही| अंत में अंगराज कर्ण आगे आए| उन्होंने धनुष को उठाकर उस प्रत्यंचा
चढ़ा दी, परन्तु द्रौपदी ने
उनसे विवाह करने से मना कर दिया क्योंकि वे उच्च या क्षत्रिय जाति के न थे| कर्ण का मुँह क्रोध से लाल हो
गया| धनुष वापस रखकर वे
अपने स्थान पर जाकर बैठ गए| तदुपरान्त साधारण
लोगों के बीच बैठे हुए अर्जुन, जो कि ब्राह्मण जैसे प्रतीत हो रहे थे, आगे बढ़े और राजा से अपनी निपुणता का
प्रमाण देने की आज्ञा माँगी| राजा की स्वीकृति पाकर, चेहरे पर क्षत्रिय-आभा लिए, अर्जुन आगे बढ़े| उन्होंने सहज भाव से धनुष उठाकर उस पर
प्रत्यंचा चढ़ाई और लक्ष्य की ओर तीर चला दिया| उपस्थित राजा राज कुमार देखते रह गए| उनके लिए यह असहनीय था कि वे एक
सामान्य से दिखने वाले ब्राह्मण से परास्त हो गए| द्रौपदी ने अर्जुन के गले में वरमाला
पहना दी और पांडवों ने हर्षनाद किया| अपमानित राजा और राजकुमार अर्जुन को द्रौपदी के साथ दरबार से
जाने से रोकने लगे| भीम अर्जुन की
सहायता के लिए आगे आये| इस बीच कृष्ण और बलराम ने, जो वहाँ अतिथि के रूप में
उपस्थित थे, राजकुमारों को शांत
किया| भीम, अर्जुन और द्रौपदी को लेकर निकल गए| युधिष्ठिर नकुल और सहदेव पहले ही
चुपचाप वहाँ से जा चुके थे, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि कोई उन्हें पहचाने| द्रुपद ने अपने पुत्र धृष्टदयुम्न को एक तरफ बुलाकर कहा, "तुम इन सब का
चुपचाप पीछा करो| हमें पता लगाना होगा कि ये कौन
हैं? ये कोई साधारण ब्राह्मण नहीं
लगते, मुझे सन्देह है कि
वे पांडव हैं|" धृष्टदयुम्न ने
तुरन्त कुंती को पहचान लिया-अर्थात पांडव अभी जीवित थे| यह शुभ समाचार अपने पिता को देने की ओर
चल दिया| इधर जब द्वार खोलकर कुंती बाहर आई तो
भिक्षा की जगह द्रौपदी को देखकर बोलीं! "अरे, अरे, मैंने यह क्या कह दिया|"
चिंतित होकर भरे कंठ से कहने लगीं, "अब हमें क्या करना
चाहिए?" राजा द्रुपद ने जब यह सुना तो
विरोध प्रकट करते हुए बोले,
"मेरी पुत्री पांच भाईयों से विवाह कैसे कर
सकती है?" परन्तु
पांडव सदैव अपनी माता श्री की आज्ञा का पालन करते थे, और इस बार भी उन्होंने माँ की आज्ञा
मानी| इस तरह द्रौपदी का
विवाह पाँच पांडवों से हुआ| पांडवों के जीवित होने का समाचार आग की तरह चारों ओर फैल गया
था| हस्तिनापुर लौटने पर कर्ण ने दुर्योधन
से कहा, "प्रिय
मित्र, तुम्हें पांडवों को
कुचल देना चाहिए|" कर्ण
अब भी अर्जुन से घृणा करते थे| परन्तु द्रोण ने दुर्योधन से कहा, " तुम इस तरह का नीच काम कभी न
करना| द्रुपद उनके साथ
हैं| वे तुमसे कहीं अधिक
प्रबल हैं| तुम सदा उनके साथ
कलह क्यों करना चाहते हो?" विदुर ने भी सलाह दी,
"हाँ, उन्हें हस्तिनापुर बुलाकर मित्रता का
हाथ बढ़ाओ|" भीष्म ने
धृतराष्ट्र की ओर देखते हुए कहा,
"महाराज, अतीत के विवाद और कलह को भूल जाइये| आखिरकार वे आपके भतीजे हैं, उनके साथ संबंध सुधारने का यह अच्छा
अवसर है|"
*****
अक्षयपात्र
की महिमा
पांडवों
के पास एक अक्षयपात्र था, जोकि उन्हें धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा सूर्य देव की कृपा
से उनकी उपासना करने पर मिला था| इसमे विशेषता यह थी कि उसमे तैयार की गई भोजन
सामग्री तब तक समाप्त नहीं होती था, जब तक द्रोपदी स्वयं भोजन न करके अन्यों को
परोसती रहती थी| किन्तु द्रोपदी जब स्वयं भोजन करके उस अक्षयपात्र को साफ़ कर देती
थी, तब उस दिन दोबारा उस पात्र से भोजन प्राप्त नहीं होता था| पांडव अक्षयपात्र को
पाकर अति प्रसन्न हुए| स्वयं भोजन करने से पूर्व वे अनेकों ऋषियों, मुनियों को
आमन्त्रित कर प्रेमपूर्वक उन्हें भोजन कराते, तत्पश्चात स्वयं भोजन करते| इससे
उनकी कीर्ति चारों ओर फैल गई| उनका यश सुनकर दुर्योधन और उसके साथी जल- भुन गए और
उनका बुरा करने की युक्ति सोचने लगे| एक दिन महर्षि दुर्वासा अपने दस हजार शिष्यों
के साथ दुर्योधन के अतिथि हुए| दुर्योधन ने कई दिन तक उनकी बड़ी सेवा की| उनकी सेवा
से प्रसन्न होकर महर्षि दुर्वासा ने उसे वर माँगने को कहा| दुष्ट व्यक्ति का हमेशा
यह स्वभाव होता है कि वह सदा दूसरों के अहित के बारे में ही सोचता है| उसने भी ऐसा
ही किया पांडवों के द्वेष के कारण उसने वर माँगा कि जिस प्रकार आप मेरे अतिथि हुए
है, उसी प्रकार अपने शिष्यों सहित आप पांडवों के भी अतिथि होइए| किन्तु मेरी यह प्रार्थना
है कि आप उस समय उनके पास जाए जब द्रोपदी भोजन कर चुकी हो| महर्षि दुर्वासा ने
कहा- “तुम
जैसा चाहते हो, वैसा ही होगा|”
यह कहकर वह चले गए| दुर्योधन मन-ही-मन यह सोचकर अत्यंत हर्षित हुआ कि जब महर्षि
दुर्वासा दस हजार शिष्यों के साथ पांडवों के पास जायेंगे, तब पांडव उचित रूचि से
उनका सत्कार न कर पाएंगे, जिससे उन्हें महर्षि दुर्वासा का कोप – सहन करना पड़ेगा|
महर्षि दुर्वासा ने दुर्योधन से कहा ‘ऐसा ही होगा’ और इसी बात को पूरा करने के लिए
एक दिन वे पांडवों के पास अपने दस हजार शिष्यों के साथ चले गए| पांडवों ने उन्हें
प्रणाम किया और आसन पर बैठने के लिए कहा| तब महर्षि दुर्वासा ऋषि जानते थे कि
द्रोपदी भोजन कर चुकी है| इसलिए उन्होंने पांडवों से कहा कि हम अभी नदी पर स्नान
करने जा रहे है आप हम सबके लिए भोजन की व्यवस्था करे हम आकर भोजन करेंगे| यह कहकर
वे वह चले गए| अब पांडव परेशान कि द्रोपदी तो भोजन कर चुकी है और द्रोपदी वह
अक्षयपात्र भी माँझ चुकी है| अगर उनको भोजन ना करवा पाये तो महर्षि दुर्वासा जी
कही क्रोध में आकर हमें श्राप ना दे दे| इसी सोच में पांडव चिंतित होने लगे| तब
द्रोपदी ने अपने प्रियतम भगवान श्री कृष्ण जी के चरण कमलों में प्रार्थना की कि
प्रभु हमारी रक्षा करे| तभी भगवान श्री कृष्ण जी वहाँ आ पहुँचे और द्रोपदी से कहने
लगे कि द्रोपदी हमें बहुत जोरों से भूख लगी है हमारे लिए कुछ खाने के लिए ले आओ|
तब द्रोपदी ने कहा कि प्रभु आप तो सब जानते है अक्षयपात्र में से सारा भोजन समाप्त
हो चुका है| तब श्री कृष्ण जी ने कहा कोई बात नहीं तुम एक बार अक्षयपात्र लेकर तो
आओ| तब द्रोपदी जब अक्षयपात्र लेकर आई तो उसमे थोड़ा सा साग लगा था| भगवान श्री
कृष्ण जी ने वह साग खाया और फरमाया कि इस साग से सम्पूर्ण सृष्टि की भूख मिट जाए|
और वैसा ही हुआ| जब महर्षि दुर्वासा के शिष्य स्नान करके बाहर निकले तो उनकी भूख
मिट चुकी थी उन्होंने महर्षि दुर्वासा से विनती की कि अब उनके कंठ में भोजन भरा
पड़ा है और तनिक भी भूख नहीं थी| तो ऐसा कहने पर महर्षि दुर्वासा ने अपने शिष्यों
को वापिस चलने के लिए कहा और वे बिना पांडवों के पास गए लौट आये| इस प्रकार भगवान
अपने भक्तों की रक्षा करते है| जिनको अपने प्रभु पर विश्वास होता है तो उनके सारे
काम प्रभु अपने आप ही कर देते है| जिस तरह उन्होंने द्रोपदी की प्रार्थना सुनकर
उनकी लाज बचा ली|
*****
पानी में से यक्ष
का निकलना
एक बार पांडव जब
बनवास पर थे| तो रास्ते में उन्हें बहुत जोर से प्यास लगी तो वे नदी के किनारे गए
जो रास्ते में उन्हें नजर आई थी| जब पांडव पानी पीने लगे तो नदी में से यक्ष निकला
और कहने लगा कि इस नदी पर मेरा हक है, अगर इसका पानी पीना चाहते हो तो मेरे सवालों
का जवाब देना पड़ेगा नहीं तो जो भी पानी पीएगा उसको अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा| जब
पांडवों ने उसकी बात नहीं सुनी और पानी पीने लगे तो अर्जुन, नकुल, सहदेव, भीम चारों
पानी पीते ही प्राण खो बैठे फिर युधिष्ठिर ने कहा- ‘मैं तुम्हारे सवालों का जवाब
दूँगा’ यक्ष ने पूछा कि बताओ संसार में सबसे अनोखा सच क्या है? तो युधिष्ठिर ने
कहा कि संसार का सबसे अनोखा सच यह है कि इंसान रोज कितने लोगों को मरते देखता है
कितने लोगो के मरने के बारे में सुनता है, लेकिन फिर भी उसके मन में मरने का डर
नहीं आता, वो यही सोचता है कि हमने सदा यही रहना है| यही जीवन का सबसे अनोखा सच
है| यक्ष युधिष्ठिर के जवाब से बहुत प्रसन्न हुआ उसने युधिष्ठिर से कहा कि तुम अब
नदी का जल पी सकते हो और मैं तुमसे बहुत खुश हूँ, तुम अपने एक भाई को जीवित करवा
सकते हो| तो युधिष्ठिर ने कहा अर्जुन और भीम मेरे सगे भाई है तथा नकुल और सहदेव
मेरे सौतेले भाई है तो अगर मैं अपने सगे भाई को जीवित करवाऊँ तो यह धर्म न होगा
इसलिए मेरे सौतेले भाई नकुल को जीवित कर दो| वह यक्ष युधिष्ठिर का यह निर्णय सुनकर
बहुत प्रसन्न हुआ| उसने चारों को जीवित कर दिया|
*****
विदुर और विदुरानी
का प्रेम
कहते हैं जब श्री
कृष्ण जी पांडवों कें दूत बन कर युद्ध संधि करवाने के लिए हस्तिनापुर गए|
हस्तिनापुर में दुर्योधन ने उन्हें राजमहल में ठहरने तथा भोजन करने का निमंत्रण
दिया, परन्तु भगवान ने उसके अतिथ्य को अस्वीकार कर प्रेमी- भक्त विदुर जी के घर का
रुखा सूखा भोजन करना अधिक उचित समझा| दुर्योधन में लेशमात्र भी प्रेम और भक्ति नही
थी, इसलिए भगवान उसके छत्तीस प्रकार के व्यंजनों से युक्त स्वादिष्ट भोजन तथा
राजसी सुख सुविधाओं को ठुकरा कर, बिना बुलाये विदुर जी के घर चले गए| उस समय विदुर
जी घर पर नहीं थे, केवल विदुरानी ही घर में मौजूद थी| श्री कृष्ण जी को अपने घर
में देखकर उसकी प्रसन्नता का कोई ठिकाना न रहा| इष्टदेव के दर्शन कर वह अपनी सुध
बुध भूल गई| कुछ देर बाद भगवान ने कहा- “मुझे
बड़ी जोर से भूख लगी है, कुछ खाने को दो|”
उस समय घर में केवल केले पड़े थे, विदुरानी वह केले उठाकर ले आई और भगवान के सम्मुख
बैठकर उन्हें केले खिलाने लगी| प्रेम में वह इतनी लीन हो गई कि केले छीलकर गुदा तो
फैकंने लगी और छिलका भगवान को देने लगी| उसका ऐसा अनन्य प्रेम देखकर भगवान भी
अत्यंत प्रेम से छिलको का भोग लगाने लगे, इतने में विदुर जी भी आ गए| वे प्रेम का
यह अदभुत दृश्य देखकर चौकं गए| कुछ पल तो प्रेम मग्न होकर वह नजारा देखते रहे| पर
कुछ चेत होने पर विदुरानी के हाथ से केला छीनकर बोले| “पगली
यह क्या कर रही हो? गुदे के स्थान पर भगवान को छिलके खिला रही है”
यह सुनकर भगवान मुस्करा दिए और विदुर जी से बोले-“विदुर
जी इस छिलको को खाकर मुझे जो सुख मिल रहा है, वह वर्णन से परे है| ऐसे प्रेम युक्त
भोजन के लिए तो मैं सदा लालायित रहता हूँ| रात्रि को भोजन बनाते समय भी प्रेम में
मग्न होने के कारण विदुरानी नमक साग में डालना भूल गई| किन्तु भगवान ने उस साग का
अत्यंत प्रेमपूर्वक भोग लगाया| विदुर और विदुरानी की प्रशंसा की| दूसरे दिन
दुर्योधन ने भगवान श्री कृष्ण जी को ताना मारते हुए कहा- “आपने
हमारा अतिथ्य स्वीकार न करके विदुर के घर रहना क्यों स्वीकार किया? तब श्री कृष्ण
जी ने फरमाया कि मैंने विदुर और विदुरानी में ऐसा अनोखा प्रेम और श्रद्धा भाव देखा
है, किसी कारण चाहे वे निर्धन है तो भी मुझे प्रिय लगते है| तुम राजमद में चूर
होकर भ्रम में पड़े हुए हो और भूल का शिकार होकर भगवान को नहीं पहचानते| इसलिए
तुम्हारे महल के दूध की तुलना में विदुर के घर का पानी भी मुझे अमृत के समान
प्रतीत होता है| उसके घर का बिना नमक का साग भी मुझे खीर जैसे स्वादिष्ट लगा,
क्योंकि वहाँ परमात्मा का गुणगान करते हुए सारी रात व्यतीत हुई| इस कथा से हमें यह
शिक्षा मिलती है कि नास्तिक के घर की सुख सुविधाएँ तथा स्वादिष्ट पकवान विषतुल्य
है जबकि भक्ति वान पुरुष के घर का रुखा सूखा भोजन भी अमूल्य होता है
*****
सहायता माँगने श्री
कृष्ण जी के पास
महाभारत युद्ध के
पूर्व भक्त अर्जुन तथा दुर्योधन दोनों ही भगवान श्री कृष्ण जी के पास सहायता माँगने
के लिए गए| दुर्योधन पहले पहुँचा| उसने देखा कि भगवान विश्राम में है, अत: वह उनके
उठने की प्रतीक्षा में उनके सिरहाने की ओर रखी कुर्सी पर बैठ गया| कुछ देर बाद
अर्जुन भी वहाँ पहुँचा| जब उसने भगवान श्री कृष्ण जी को विश्राम में देखा, तो उनके
श्री चरणों में प्रणाम कर वही नीचे बैठ गया| दुर्योधन के अंदर राज्य का अभिमान था,
अत: वह सिरहाने की ओर कुर्सी पर बैठा रहा| अर्जुन के अंदर भक्ति थी और जहाँ भक्ति
है, वहाँ नम्रता है, अत: वह भगवान के चरणों की ओर नीचे धरती पर बैठा| जब भगवान
विश्राम से उठे तो स्वभाविक उनकी दृष्टि सीधे अर्जुन पर पड़ी| भगवान ने फरमाया “अर्जुन| कब आये? इससे पहले कि अर्जुन कुछ
उत्तर दे, दुर्योधन बोल उठा “पहले
मैं आया हूँ, इसलिए पहला अधिकार मेरा है, आप युद्ध में मेरी सहायता कीजिये|’
अर्जुन ने भगवान के चरणों में विनती की – ‘प्रभो| मैं भी आपसे युद्ध की सहायता माँगने
आया हूँ|’ दुर्योधन बोल उठा- “पहले
मैं आया हूँ, अत: पहला अधिकार मेरा है|’ भगवान श्री कृष्ण जी ने फरमाया- “दुर्योधन|
हो सकता है कि तुम पहले आये हो, परन्तु
मैंने चूंकि पहले अर्जुन को देखा है, अत: पहला अधिकार अर्जुन का ही है| मैं तुम
दोनों की युद्ध में सहायता करूँगा| एक ओर मैं अकेला बिना अस्त्र- शस्त्र के
रहूँगा| और दूसरी ओर मेरी चतुर सेना होगी| दोनों में से एक की ही प्राप्ति होगी|
अर्जुन, चूँकि पहला अधिकार तुम्हारा है, अत: तुम दोनों में से एक का चयन कर लो|
भगवान श्री कृष्ण जी के वचन सुनकर दुर्योधन का चेहरा फक हो गया| उसने मन में सोचा
कि सेना तो अर्जुन माँग लेगा, मैं अकेले और वह भी निहत्थे कृष्ण को लेकर क्या
करूँगा? अभी वह यह बात सोच ही रहा था कि अर्जुन के शब्द उसके कानों से टकराए,
जिन्हें सुनकर वह प्रसन्न होने के साथ-2 आश्चर्य चकित भी हुआ| वह अर्जुन को
अज्ञानी समझकर मन ही मन खूब हँसा| क्या थे अर्जुन के वे शब्द और उसने क्या माँगा
भगवान से? उसने भगवान के श्री चरणों में विनय की कि प्रभो, मुझे आपकी नारायणी सेना
नहीं चाहिए, मुझे तो केवल आप की आवश्यकता है| इस प्रकार दुर्योधन को नारायणी सेना
मिल गई और अर्जुन को भगवान मिल गए| अपने -2 दिल में दोनों ही प्रसन्न हो गये|
क्योंकि दोनों को उनकी मनचाही वस्तु मिल गई| दुर्योधन मन ही मन अर्जुन के विषय में
सोच रहा है कि वह कितना अज्ञानी है कि चयन का पहला अधिकार मिलने पर भी इतनी विशाल
सेना को छोड़कर उसने निहत्थे कृष्ण को माँग लिया| क्या करेगा वह निहत्थे कृष्ण को
लेकर? यह सोचते हुए वह वहाँ से चला गया| दुर्योधन के चले जाने पर श्री कृष्ण ने
अर्जुन से कहा- ‘पार्थ, मैं तो युद्ध करूँगा नहीं, फिर तुमने क्या सोचकर मुझे चुना
है? तब अर्जुन ने हाथ जोड़कर कहा ‘भगवान मेरे मन में बहुत दिनों से यह अभिलाषा थी
कि मैं आपको अपना सारथी बनाऊँ| अपने जीवनरथ की बागडोर आपके हाथों में सौप दूँ|
मेरी इस अभिलाषा को आप पूर्ण करे|”
और सबको विदित है कि कुरक्षेत्र के युद्ध में जीत अर्जुन की ही हुई, विशाल सेना
पाने वाले दुर्योधन की नहीं| इस कथा में जो विचारणीय बात है वह यह है कि जो वस्तु
अर्जुन की दृष्टि में अधिक महत्वपूर्ण थी दुर्योधन की दृष्टि में उसका कोई महत्व
नहीं था| इसके विपरीत जो वस्तु भक्त अर्जुन ने तुच्छ एवं महत्वहीन समझ कर त्याग
दी, दुर्योधन की दृष्टि में वही सर्वोतम एवं महत्वपूर्ण थी| अर्थात जिस चतुरगनी
सेना को भक्त अर्जुन ने भगवान की तुलना में तुच्छ समझकर ठुकरा दिया, उसे प्राप्त
करके दुर्योधन ने स्वयं को अत्यंत सौभाग्यशाली समझा|
*****
अर्जुन
की परीक्षा
कहते
है जब अर्जुन और दुर्योधन दोनों श्री कृष्ण जी से मदद मांगने गए तो दुर्योधन ने तो
भगवान की सेना मांगी और अर्जुन ने भगवान् श्री कृष्ण को माँगा तब श्री कृष्ण जी ने
अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए ये वचन किए कि
अब
जीत तू सकता नहीं, हर हम रहेगा उदास |
माखन
दुर्योधन ले गया, छाछ रही तेरे पास ||
तब
अर्जुन ने बड़े ही विश्वास के साथ ये वचन कहे कि
अब
जीत निश्चित है मेरी, अब मैं नहीं रहूँगा उदास |
माखन
लेकर मैं क्या करूँ , अब माखन चोर है मेरे पास ||
अर्थात
जिसे पार ब्रह्म परमेश्वर का साथ मिल जाए फिर उस भक्त को चिंता कैसी|
*****
गीता
का उपदेश
कुरुक्षेत्र में युद्ध के प्रथम ही दिन जब
कुंतीपुत्र अर्जुन ने सामने खड़ी सेना में अपने बंधु
और बांधवों को देखा तो अत्यन्त करुणा से युक्त होकर शोक वचन कहने लगा। अर्जुन बोले- हे कृष्ण! युद्ध
क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजन-समुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल
हुए जा रहे हैं और मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूं तथा युद्ध में
स्वजन-समुदाय को मारकर कल्याण भी नहीं देखता। हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूं
और न राज्य तथा सुखों को ही। हे गोविंद! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा
ऐसे भोगों से और जीवन से भी क्या लाभ है? हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के
राज्य के लिए भी मैं इन सबको मारना नहीं चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो
कहना ही क्या है? ऐसी
बहुत सी बातें अर्जुन बोलकर रणभूमि में शोक से उद्विग्न होकर बाणसहित धनुष को
त्यागकर रथ के पिछले भाग में बैठ गए। सोचीए सामने युद्ध खड़ा है। सभी बंधु-बांधव
आपको मारने के लिए तैयार ही बैठे हैं और वे शोक नहीं कर रहे हैं लेकिन अर्जुन शोक
कर रहा है। यदि अर्जुन ऐसे समय युद्ध नहीं करता है तो क्या होगा? कृष्ण यही अर्जुन को समझाते हैं।
श्रीभगवान बोले- हे
अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह
श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति को करने वाला
ही है। इसलिए हे अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं
जान पड़ती। हे परंतप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा।
ऐसा कहने पर भी अर्जुन श्री गोविंद भगवान् से 'युद्ध
नहीं करूंगा' यह स्पष्ट कहकर चुप हो गए। उन्होंने धनुष और बाण एक
तरफ रख दिए। तब
श्रीकृष्ण ने शोक
करते हुए उस अर्जुन को हंसते हुए से यह वचन बोले- हे अर्जुन! तू न शोक करने योग्य
मनुष्यों के लिए शोक करता है और पण्डितों के से वचनों को कहता है, परन्तु
जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं उनके लिए भी
पण्डितजन शोक नहीं करते। न तो ऐसा
ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं
थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे। जो इस आत्मा को मारने वाला
समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते क्योंकि
यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी द्वारा मारा जाता है। कृष्ण
बोले, तथा अपने
धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात् तुझे भय नहीं करना चाहिए
क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य
नहीं है। हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस
प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं। किन्तु यदि तू इस
धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा।
तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष
के लिए अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है। और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित
होकर अब लघुता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण
युद्ध से हटा हुआ मानेंगे। तेरे वैरी लोग तेरे सामर्थ्य की निंदा करते हुए तुझे
बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे, उससे अधिक दुःख और क्या होगा?। या तो
तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का
राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा। जय-पराजय, लाभ-हानि
और सुख-दुख को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा, इस प्रकार
युद्ध करने से तू पाप को नहीं प्राप्त होगा। तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके
फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी
आसक्ति न हो। अर्थात कृष्ण यह कह
रहे हैं कि युद्ध के मैदान में जाने के बाद यदि तू युद्ध नहीं करता है तो इतिहास
में सदियों तक तेरी अपकीर्ति होगी और अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है। अत: तू जय
पराजय, परिणाम
आदि की चिंता न करते हुए अब केवल युद्ध ही कर। यही छत्रियों का धर्म है। ऐसा कहते भी हैं कि जो योद्धा या राजा युद्ध के
परिणाम की चिंता करता है वह अपने जीवन और राज्य को खतरे में डाल देता है। परिणाम
की चिंता करने वाला कभी भी साहसपूर्वक न तो निर्णय ले पाता है और न ही युद्ध कर
पाता है। जीवन के किसी पर मोड़ पर हमारे निर्णय ही हमारा भविष्य तय करते हैं। एक
बार निर्णय ले लेने के बाद फिर बदलने का अर्थ यह है कि आपने अच्छे से सोचकर निर्णय
नहीं लिया या आपमें निर्णय लेने की क्षमता नहीं है। लेकिन जब निर्णय ले ही लिया है
कि अब युद्ध करना है तो फिर पीछे मुड़कर मत देख। तब श्री कृष्ण ने अर्जुन को सम्पूर्ण गीता का उपदेश
दिया, जिसे सुनकर अर्जुन युद्ध के लिए तैयार हो गए|
अर्जुन
से पहले गीता का उपदेश
भगवान ने
सूर्यदेव को
जब श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता का
उपदेश दे रहे थे तब उन्होंने ये भी बोला था कि ये उपदेश पहले वे सूर्यदेव को दे
चुके हैं। तब अर्जुन ने आश्चर्य से कहा कि सूर्यदेव तो प्राचीन देवता हैं, आप उनको
ये उपदेश पहले कैसे दे सकते हैं। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि तुम्हारे और
मेरे पहले बहुत से जन्म हो चुके हैं। तुम उन जन्मों के बारे में नहीं जानते, लेकिन
मैं जानता हूं। इस तरह गीता का ज्ञान सर्वप्रथम अर्जुन को नहीं बल्कि सूर्यदेव को
प्राप्त हुआ था।
संजय ने
धृतराष्ट्र को
जब भगवान श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र
के मैदान में अर्जुन को गीता का उपदेश दे रहे थे, उस समय
संजय (धृतराष्ट्र के सारथी, जिन्हें महर्षि वेदव्यास ने दिव्य
दृष्टि दी थी) अपनी दिव्य दृष्टि से वह सब देख रहे थे और उन्होंने गीता का उपदेश
धृतराष्ट्र को सुनाया था।
महर्षि
वेदव्यास ने भगवान श्रीगणेश को
जब महर्षि वेदव्यास ने मन ही मन
महाभारत की रचना की तो बाद में उन्होंने सोच की इसे मैं अपने शिष्यों को कैसे
पढ़ाऊं? महर्षि
वेदव्यास के मन की बात जानकर स्वयं ब्रह्मा उनके पास आए। महर्षि वेदव्यास ने
उन्हें महाभारत ग्रंथ की रचना के बारे में बताया और कहा कि इस पृथ्वी पर इसे लिखने
वाले कोई नहीं है। तब ब्रह्मदेव ने कहा कि आप इसके काम के लिए श्रीगणेश का आवाहन
कीजिए। महर्षि वेदव्यास के कहने पर श्रीगणेश ने ही महाभारत ग्रंथ का लेखन किया।
महर्षि वेदव्यास बोलते जाते थे और श्रीगणेश लिखते जाते थे। इसी समय महर्षि
वेदव्यास ने श्रीगणेश को गीता का उपदेश दिया था।
महर्षि
वेदव्यास ने वैशम्पायन और अन्य शिष्यों को
जब भगवान श्रीगणेश ने महाभारत
ग्रंथ का लेखन किया। उसके बाद महर्षि वेदव्यास ने अपने शिष्यों वैशम्पायन, जैमिनी, पैल आदि
को महाभारत के गूढ़ रहस्य समझाए। इसी के अंतर्गत महर्षि वेदव्यास ने गीता का ज्ञान
भी अपने शिष्यों को दिया।
वैशम्पायन
ने राजा जनमेजय और सभासदों को
पांडवों के वंशज राजा जनमेजय ने
अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्प यज्ञ किया था। इस यज्ञ के
पूरे होने पर महर्षि वेदव्यास अपने शिष्यों के साथ राजा जनमेजय की सभा में गए।
वहां राजा जनमेजय ने अपने पूर्वजों (पांडव व कौरवों) के बारे में महर्षि वेदव्यास
से पूछा। तब महर्षि वेदव्यास के कहने पर उनके शिष्य वैशम्पायन ने राजा जनमेजय की
सभा में संपूर्ण महाभारत सुनाई थी। इसी दौरान उन्होंने गीता का उपदेश भी वहां
उपस्थित लोगों को दिया था।
ऋषि
उग्रश्रवा ने शौनक को
लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा
सूतवंश के श्रेष्ठ पौराणिक थे। एक बार जब वे नैमिषारण्य पहुंचे तो वहां कुलपति
शौनक 12 वर्ष का
सत्संग कर रहे थे। जब नैमिषारण्य के ऋषियों व शौनकजी ने उन्हें देखा तो उनसे कथाएं
सुनाने का आग्रह किया। तब उग्रश्रवा ने कहा कि मैंने राजा जनमेजय के दरबार में ऋषि
वैशम्पायन के मुख से महाभारत की विचित्र कथा सुनी है, वही मैं
आप लोगों को सुनाता हूं। इस तरह ऋषि उग्रश्रवा ने शौनकजी के साथ-साथ नैमिषारण्य
में उपस्थित तपस्वियों को महाभारत की कथा सुनाई। इसी दौरान उन्होंने गीता का उपदेश
भी दिया था।
*****
बरबरिक युद्ध में
महाभारत का युद्ध
प्राम्भ होने से पूर्व जब अर्जुन श्री कृष्ण भगवान जी के साथ रथ पर बैठ कर समर
भूमि में आया तो विपक्षी दल अपने सगे संबंधियों एवं गुरुजनों को देखकर कर भगवान श्री
कृष्ण जी से कहने लगा,- ‘हे मधुसूदन, जिन पूज्य गुरुवरों ने मुझे इतने प्यार से
शिक्षा दी है तो क्या आज उस शिक्षा का बदला उन्हें तीखे बाणों द्वारा मृत्यु पर
सुला कर दूँ| जिन पूर्वजों ने मुझे अपने रक्त से पाल-पोस कर इस योग्य बनाया तो
क्या मैं उनका इन बाणों से सत्कार करूँ? यह मुझसे तो न होगा| ऐसे वीर कहलाने से
मेरा कायर कहलाना ही अच्छा है| ‘मोह भ्रम में अर्जुन को गिरता देख भगवान श्री
कृष्ण जी ने दोनों सेनाओं के मध्य में उसे जागृत करने के लिए यह उपदेश दिया कि ‘हे
अर्जुन, यह सब तो पहले से ही मरे हुए हैं तू तो केवल निमित बन कर कर्तव्य कर| इसी
पर एक प्रमाण है| जब महाभारत का युद्ध शुरू होने वाला था तब कौरव और पांडवों ने
दूसरे देशो में अपने-2 सन्देश वाहक भेजे कि हमारे पक्ष में युद्ध करने को आओ, क्योंकि
वह धर्म युद्ध था| इसलिए जो कुरुक्षेत्र की भूमि में आता उससे यह पूछ लिया जाता कि
तुम किस पक्ष में भाग लोगे? वह प्रसन्नता से जिस दल की ओर से लड़ना चाहता, दोनों
पक्ष वाले उसे सहर्ष स्वीकार कर लेते थे| एक बार ऐसा हुआ कि रण – भूमि में एक
शूरवीर योद्धा भगवान श्री कृष्ण जी के आगे से निकला| भगवान श्री कृष्ण जी ने उससे
पूछा कि ‘तुम्हें युद्ध में किस पक्ष की ओर से लड़ना है? बतलाओ| उस योद्धा ने उत्तर
दिया- ‘महाराज! जो दल पराजित होगा
मैं उसी दल का पक्ष लूँगा|’ भगवान उसके अनोखे उत्तर को सुनकर बड़े हैरान हुए| वे
जानते थे कि पराजित तो कौरव दल ने होना है| श्री कृष्ण जी ने उस वीर को कहा, ‘क्या
तुम अपनी वीरता की कोई परीक्षा दे सकते हो? तब योद्धा ने कहा कि ‘आप मेरी परीक्षा
लीजिये| वहीँ पास में एक पेड़ था उस योद्धा ने कहा कि मैं अपना बाण इस पेड़ पर चलाता
हूँ, मेरा तीर इस पेड़ के सब पत्तो में छेद कर मेरे पास वापिस लौट आएगा|’ इतना कहकर
उस योद्धा ने तरकश से तीर निकला और कमान पर चढ़ाया| इतने में भगवान श्री कृष्ण जी
ने उस योद्धा की नजर बचाकर पेड़ का एक पत्ता तोड़ कर अपने चरण के नीचे छिपा दिया|
योद्धा ने अपना निशाना साध कर बाण छोड़ दिया| वह बाण पेड़ के सब पत्तों को बेधता हुआ
भगवान कृष्ण जी के चरण पर आ खड़ा हुआ| उस वीर ने भगवान श्री कृष्ण जी से कहा-
‘भगवान, आप चरण दूर कर लीजिये कदाचित कोई पत्ता आपके चरणों के नीचे है| इसलिए आप
अगर चरण दूर न करोगे तो मेरा बाण आपके चरणों को छेदता हुआ पत्ते के पास पहुँच
जायेगा| भगवान श्री कृष्ण
ने उस योद्धा का कहा मान कर अपना चरण दूर कर लिया| तब वह बाण उस पत्ते को बेध कर
वापिस योद्धा के पास पहुँच गया| तब भगवान ने वृक्ष की तरफ देखा तो सब पत्ते छिदे
हुए थे| यह देख कर भगवान चकित हो दिल में सोचने लगे कि यदि ऐसा शूरवीर योद्धा कौरव
दल में सम्मिलित हो गया| तो पांडव दल का विजयी होना कठिन ही नहीं, असंभव है और
हमारी सारी योजना पर पानी फिर जायेगा| कुछ देर सोचने के बाद भगवान श्री कृष्ण जी
ने उस वीर से पूछा कि ‘जहाँ तुम इतने शूरवीर हो वहाँ दानी भी अवश्य होंगें? वीर ने कहा ‘हाँ
महाराज, मैं दानी भी हूँ| भगवान श्री कृष्ण ने कहा- हम तुमसे दान में जो चीज माँगे
तुम दे सकोगे? तब उस योद्धा ने कहा’ अवश्य दे दूँगा’ उसकी स्वीकृति पर श्री कृष्ण
चन्द्र जी ने कहा ‘हमें तुम्हारे सिर की आवश्यकता है| तब योद्धा कहने लगा, ‘अपनी
प्रतिज्ञा के अनुसार वैसे तो मुझे अपना सिर दे देना चहिए परन्तु मैं तो इस युद्ध का
कौतुक देखने को आया था| उसकी
यह बात सुनकर भगवान ने उसे सांत्वना दी कि”
हम आपके विचार को पूरा कर देंगे| यह हम पर छोड़ दो, तुम युद्ध का पूरा कौतुक देख
सकोगे| ‘ऐसा सुन योद्धा ने सिर देना स्वीकार किया| तब भगवान ने सुदर्शन चक्र से
उसका सिर काट कर धड़ से अलग कर कुरुक्षेत्र के एक कोने में बाँस की एक लकड़ी गाड़ कर
उस पर रख दिया| तत्पश्चात युद्ध आरम्भ हो
गया| जब अठारह दिन में बड़े -2 शूरवीर वीरगति को प्राप्त हो गए तथा युद्ध समाप्त हो
गया तब भगवान कृष्ण जी ने उस योद्धा का सिर जो बाँस पर टंगा था नीचे उतरवाया और उस
सिर से पूछा कि ‘क्या तुमने युद्ध का कौतुक देख लिया है? तब उस सिर ने उत्तर दिया
कि ‘भगवान मैंने सब दृश्य देख लिया है| तब भगवान ने पुन: उससे पूछा- ‘तुम्हें इस
युद्ध में सबसे बड़ा शूरवीर योद्धा कौन दृष्टिगोचर हुआ?”
तब उस योद्धा ने उत्तर दिया कि भगवान मुझे तो इस विशाल सेना में एक भी शूरवीर
दिखाई नहीं दिया| यहाँ तो आपका सुदर्शन चक्र ही चलता हुआ दोनों पक्षों के वीरों को
काटे जा रहा था| और सब शूरवीर तो केवल नाममात्र ही युद्ध कौशल का अभिनय कर रहे थे|
यह कहकर वह सिर शांत हो गया|
*****
श्री कृष्ण जी
द्वारा पक्षियों की रक्षा
कहते हैं कि जब
महाभारत का युद्ध शुरू होना था तो उसी युद्ध भूमि पर टटीरी नाम के पक्षियों का
जोड़ा था उनके बच्चे अन्डों में थे जोकि उसी भूमि के पास एक वृक्ष पर घोंसले में
पड़े थे| अब उन पक्षियों को बड़ी चिंता हुई कि युद्ध शुरू होने वाला है इतना घमासान
युद्ध होना है| हमारे बच्चे तो संसार में आने से पहले ही मारे जायेंगे| उन
पक्षियों ने भगवान के चरणों में विनती की- ‘हे भगवान हमारे बच्चो की रक्षा करना| कहते
हैं कि अगर कोई दिल से भगवान से कुछ पुकार करता है तो भगवान उसकी पुकार जरुर सुनते
है| ऐसा ही हुआ जैसे ही युद्ध शुरू हुआ तो पहले ही दिन युद्ध भूमि में एक हाथी के
गले में बड़ा सा घंटा टंगा था उसी घंटे पे जाकर तीर लगा और वह घंटा जाकर घोंसले के
ऊपर, जहाँ अंडे पड़े थे, टिक गया| अब कई दिन तक युद्ध चलता रहा परन्तु अन्डो के ऊपर
घंटा पड़ा होने के कारण अण्डों को कोई हानि नहीं हुई| जब युद्ध ख़त्म हुआ तो भगवान
श्री कृष्ण जी ने अपनी पत्नी रुकमणि से कहा कि चलो रुकमणि आज तुम्हें लीला दिखाता
हूँ| वह रुकमणि को लेकर उसी वृक्ष के पास गए| उन्होंने वहाँ जाकर उस घंटे को हटाया
तो देखते है कि छोटे-छोटे पक्षी खेल रहे है और अंडे टूटे पड़े थे| तो यह देखकर
रुकमणि ने भगवान से पूछा कि प्रभु ये कैसी लीला है तो प्रभु ने बताया कि युद्ध
शुरू होने से पहले इनके माता पिता ने मुझसे प्रार्थना की थी कि प्रभु हमारे बच्चों
की रक्षा करना तो मैंने इनकी पुकार सुनी तब कृष्ण जी ने फरमाया जब ये पक्षी होकर
मुझसे प्रार्थना करते है तो मैं इनकी पुकार सुन सकता हूँ तो क्या जो जीव आत्मा है
जो मेरा ही अंश मुझसे पुकार करेगी या मुझे याद करेगी तो क्या मैं उसकी पुकार को
नहीं सुनूँगा? मैं अवश्य ही उनकी पुकार सुनूँगा|
*****
अर्जुन का रथ एक-
दो कदम पीछे
कहा जाता है कि महाभारत के युद्ध में
जब वीर कर्ण अर्जुन के मुकाबले में लड़ रहा था तो दोनों ओर से एक दूसरे पर बाणों की
वर्षा हो रही थी| जब अर्जुन कर्ण पर
बाण छोड़ता था तब कर्ण का रथ अर्जुन का बाण लगते ही बहुत दूर पीछे हट जाता था| लेकिन जब कर्ण अर्जुन पर बाण चलाता था
तब अर्जुन का रथ केवल एक पग ही पीछे जाता|
उस समय श्री कृष्ण भगवान जी अर्जुन की रथवाही कर रहे थे बोल उठते थे, “शाबाश
कर्ण शाबाश”| तब अर्जुन को सन्देह हो गया पूछता है-
“भगवान| जब मैं बाण छोड़ता हूँ तब कर्ण का रथ बहुत पीछे जा हटता है
उस समय आप कुछ नहीं कहते|
परन्तु जब कर्ण बाण छोड़ता है तो मेरा रथ केवल एक पग पीछे को हटता है, तो उस समय आप
कर्ण को शाबाश देने लग जाते है|
इसका कारण मुझे समझाकर कहिये|
भगवान बोले- ऐ अर्जुन|
तेरे रथ पर एक तो मैं बैठा हूँ और दूसरे तेरे रथ की ध्वजा पर हनुमान जी विराजमान
है| इस भांति तेरे रथ
पर दोनों अवतारों की शक्तिया मौजूद है|
फिर ऐसी दशा में भी जब वीर कर्ण तेरे रथ को हिला देता है तो तुम स्वयं ही समझ लो
कि उसके अन्दर कितनी शक्ति है|
“श्री
भगवान जी के ऐसे वचन सुनकर अर्जुन का सन्देह दूर हुआ और चरणों में गिरकर क्षमा माँगने
लगा| चूँकि रथवान स्वयं
भगवान थे| इसलिए जीत अर्जुन
की ही होनी थी| किसी कवि का कथन
है कि जब अर्जुन के हाथों वीर कर्ण बाणों से घायल होकर अपने रथ से गिर पड़ा तो उस
समय श्री कृष्ण भगवान से ना रहा गया|
शीघ्र बोल उठे- “ऐ अर्जुन| आज केवल एक कर्ण ही नहीं, बल्कि इसके
साथ लाखों घर और भी उजड़ गए|
यह कथा इस प्रकार है –
जब कर्ण महारथी अर्जुन ने|
यूँ रण के बीच पछाड़ दिये|
तब श्री कृष्ण जी बोल उठे|
लाखों घर आज उजाड़ दिये||
यह
बात सुनी जब अर्जुन ने|
अपने दिल में हैरान हुआ|
हे तात कर्ण के मरने से|
लाखो का नुक्सान हुआ||
सुन सखा जगत में कर्ण एक|
यह दानी इक लासानी था|
बेशुमार खलकत को इस से|
मिलता दाना पानी था||
गर यकीन न हो तुमको मेरा|
तो चलकर कर ली जाँच अभी|
जाहिर तुम पर हो जाएगा|
यह मेरा झूठ और साँच सभी||
तब श्री भगवान और भक्त अर्जुन, दोनों साधु
के रूप में जहाँ कर्ण युद्ध-भूमि में घायल पड़ा था, गए और जाकर भिक्षा माँगी, “ऐ
वीर कर्ण| हम दोनों साधु
भूखे हैं| तेरा नाम तथा शोभा
सुनकर द्वार पर आए है|
हम को भोजन चाहिए|”
तब कर्ण बोला-
महाराज रण-भूमि में क्या है मेरे पास|
घर पर मेरे जाइये पूर्ण हो जाये आस||
साधु रूप भगवान बोले- मैं तो कहीं जा
नहीं सकता क्योंकि बूढ़ा आदमी हूँ|
यहाँ तक आने में ही शरीर में पीड़ा होने लगी है| ऐ राजा कर्ण| मैं कोई ठगिया फ़क़ीर नहीं हूँ जोकि
आपसे दौलत माँगने आया हूँ|
मेरी दृष्टि में यह दुनिया तथा दुनिया की दौलत ख़ाक के बराबर है| मुझे तो केवल भोजन चाहिए| यदि दे सकते हो तो भूख मिटाने के लिए
इस वक्त जो तुम्हारे पास है दे दो, अगर नहीं दे सकते तो इन्कार कर दो| इसके सिवाय मैं और कुछ जानता नहीं| भला आगे से इन्कार कौन करे| जिसकी दान देने की आदत हो और जिसके
द्वार से आज तक कोई खाली न गया हो तथा जिसके तन, मन, धन से दूसरों की सेवा करना
अपना धर्म समझ रखा हो व सेवा करना जिस का आहार बन चुका हो, वह भला इन्कार कैसे करे
और कष्ट के समय भी अपना धर्म क्यों छोड़े|
साधु की बात सुनकर कर्ण का मुख मण्डल कुछ देर के लिए तो कुम्हला गया| सोचने लगा, अब क्या किया जाए? इतने
में उसे एक बात याद आई जिससे मुरझाए हुए चेहरे पर प्रसन्ता छा गई| विनयपूर्वक बोला, “ऐ
महात्मन| मेरे दाँतों में
सोने की कीलें जड़ी हुई है|
कृपा करके एक पत्थर से मेरे दाँतों को तोड़ लो और कीलें निकाल कर अपने काम में लाओ|”
महात्मा बोले, हम किसी का दाँत तोड़ने नहीं आए| यदि आपके पास कुछ नहीं है तो साफ़ कह
दो कि मैं कुछ नहीं दे सकता, ताकि हम चले जाएँ| तब वीर कर्ण ने स्वयं ही बड़ी कठिनाई
से एक पत्थर प्राप्त किया और उससे अपने दाँतों को तोड़कर महात्माओं के आगे रख दिया| महात्मा बोले, “ऐ
वीर कर्ण| ये दाँत तेरे लहु
से भरे हुए हैं| यदि देने की सलाह
है तो इनको धोकर दो| हम लहु से भरे हुए
दाँतों को हाथ नहीं लगाते|”
तब कर्ण ने जो रण भूमि में घायल पड़ा हुआ अन्तिम स्वांस गिन रहा था बड़ी मुश्किल से
अपने हाथों तथा मुँह की सहायता से अपने धनुष पर बाण चढ़ाकर धरती पर छोड़ा, जिससे
धरती से जल की धारा बह निकली|
जल से दाँतों को धोकर सन्तो के हवाले कर दिया| इतने में दोनों साधु आँखो से ओझल हो
गये| यह ऊपर की कथा
यहाँ इसलिए दी गई है कि दानवीर कर्ण कितना महान शक्तिशाली था, वह कौरवों के पक्ष
में वीर अर्जुन के साथ लड़ रहा था|
इसके अतिरिक्त भीष्म पितामह तथा द्रौणाचार्य आदि जैसे धनुषधारी शूरवीर योद्धा भी कौरवों
के पक्ष में थे और कौरवों की सेना भी पाण्डवों की सेना से कहीं अधिक थी परन्तु जीत
फिर भी अर्जुन की हुई|
कौरव हार गये| ऐसा क्यों हुआ?
स्पष्ट है कि अर्जुन की रथवाही करने वाले उसके भगवान थे तथा कौरव अपनी राहनुमाई आप
कर रहे थे| वह अपनी बल -
बुद्धि के आसरे चल रहे थे और अर्जुन भगवान के भरोसे लड़ रहा था| यदि अर्जुन भी अपनी बुद्धि – बल के
आसरे चलता तो कर्ण जैसे वीरों पर विजय प्राप्त करना अर्जुन के बस की बात नहीं है| अर्जुन तो केवल निमित मात्र था| करने कराने वाले मालिक आप थे|
*****
भीष्म
की प्रतिज्ञा
"अर्जुन
है मेरों प्राण, मैं अर्जुन को प्राण !!
शस्त्र न उठाऊं , तो
जाय भक्त को प्राण !!
भीष्म
पितामह ने , कृष्ण से शस्त्र उठवाने की प्रतिज्ञा की थी, कि या तो कृष्ण को शस्त्र उठाना पड़ेगा या मैं पांडवो को
मार डालूँगा| पितामह अपने मन में तो प्रसन्न है की भले ही मुझे अधर्मो
के साथ खड़ा रहने का कलंक लगे पर कृष्ण के
सुन्दर रूप का दर्शन एक दम सामने होगा इनके
सुन्दर रुप को निहारने के लिए भले ही
अधर्मी का कलंक लगे परवाह नही, पर कृष्ण ने
कहा कि मैं युद्ध में तो रहूँगा पर शस्त्र नही
उठाऊंगा तो इस बात पर भीष्म पितामह को क्रोध आ गया, की ये कृष्ण अपने आप को समझते क्या है, बिना
शस्त्र उठाये ही पांडवो विजय दिलाने की बात कर रहे, वो
कृष्ण हम को
समझते क्या है,
हम कोई कद्दू है जो
काट देंगे, हम भी तो वीर है भले ही कृष्ण ने प्रतिज्ञा की हो, कि
मैं शस्त्र नही
उठाऊंगा, पर हे राजाओं मैं इस सभा में प्रतिज्ञा करता हूँ
कि मैं कृष्ण से शस्त्र उठवा कर रहूँगा ! पितामह कहने लगे कि..
वसु देव कर चक्र न धरे तो तुम को मुँह
न दिखाऊ
लाजत है मेरी गंगा , जननी
सांतनु सूत न कहाऊँ
हे
राजाओं अगर कृष्ण से शस्त्र न उठाया तो में अपना मुँह
नहीं दिखाऊंगा युद्ध में लड़ते लड़ते मेरा शव भी
गिरेगा तो भी उधे मुँह गिरूंगा, मैं
गंगा का पुत्र नही मैं सांतनु का सूत नही,
यहाँ भक्त और भगवान की प्रतिज्ञा टकराई है जब भीष्म पितामह ने अर्जुन पर आक्रमण करने लगे अर्जुन
को मारने के लिए बाण उठाया तो कृष्ण क्रोध से भर
गए देखा की अर्जुन को बाण न लग जाये सोचा
कि
"अर्जुन
है मेरो प्राण मैं अर्जुन को प्राण !!
शस्त्र न उठाऊं तो जाय भक्त को
प्राण !!
अगर
अर्जुन नही रह सकता तो मैं भी नही रह सकता, रथ
से उठे कृष्ण
अर्जुन को अपने पीछे धकेला और कृष्ण कूदे और टूटे हुए एक रथ पहिये को देखा रथ चक्र को हाथ में लेकर भगवान
श्री कृष्ण जब पितामह की और दोड़े तो वो सफ़ेद दाढ़ी
वाले महात्मा हंस पड़े| भीष्म पितामह अपने रथ में खड़े जोर से हंस दिए "ऐ
शान्ताकारम, वाह! वाह! आओ आओ ऋषि मुनियों! देखो देखो देवताओ! शान्ताकारम की स्तुति करने वालो! शान्ताकारम कहने वाले देवताओं! इन क्रोधाकार्म को देख लो! आओ आओ ऋषि मुनियों तनिक इनके दर्शन करो देखो देखो
शरीर से सावले है तो! गोरे मुख पर तो क्रोध के
कारण तुरंत लालीमा दिखयी पड़ने लगती है|
देखो -देखो देवताओं ऋषि मुनियों इन्होने
अपने सत्य को कैसे छोड़ दिया! पितामह ने कहा, कि
हे देवकी नंदन मेरा यही पर तुमसे विरोध
था, कि
"आप
कयो में शस्त्र बिन भूमि हरहु सब भार|
हमको
क्षत्रिया ही गिने बोलहु वचन विचार||
पितामह
"हे वासुदेव बिना शस्त्र के भूमि का भार हरने की बात
कर रहे हो , तो
क्या हम क्षत्रिय नही है ?
अब आपने शस्त्र उठाया है तो सोच समझ कर जवाब देना!
तो कृष्ण तुरंत अपने स्वरुप में आ गये , हाथ
से रथ चक्र नीचे
फेंक दिया और पितामह
की और देखकर मुस्कुरा उठे !
"डार
चक्र हरी हंस परियो ,
दियो तरब ब्रज राज !!
तजि
प्रतिज्ञा मोरी , मैं तोरी प्रतिज्ञा काज !!
श्री
कृष्ण "आज मैंने अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ दिया , आप
की प्रतिज्ञा की रक्षा करने के लिए सत्य बचना
चाहिए पितामह! जब तक शस्त्र नही उठाने से
सत्य बच रहा था तो हमने शस्त्र नही उठाया ,और
अब नोबत ऐसी आ गयी
की शस्त्र उठाने से ही सत्य की रक्षा होगी तो हमने शस्त्र उठा लिया !
श्री कृष्ण कहते है
की पितामह आप की
प्रतिज्ञा थी की या तो कृष्ण को शस्त्र
उठाना पड़ेगा या पांडवों
को मार डालूँगा मेरी
प्रतिज्ञा भले ही टूट जाये पर मेरे भक्त का संकल्प कभी निष्फल नही होने देता!
*****
घटोत्कच की शूरवीरता
भीमसेन का विवाह हिडिंबा नाम की एक राक्षसी के साथ भी हुआ था| वह
भीमसेन पर आसक्त हो गई थी और उसने स्वयं आकर माता कुंती से प्रार्थना की थी कि वे
उसका विवाह भीमसेन के साथ करा दें| कुंती
ने उसे विवाह की अनुमति दे दी, लेकिन
भीमसेन ने विवाह करते समय यह कवच उससे ले लिया कि एक संतान पैदा होने के पश्चात वह
संबंध तोड़ लेगा| भीमसेन ने कुछ दिन तक हिडिंबा के साथ सहवास किया, इससे
वह गर्भवती हो गई और उसके गर्भ से एक बड़ा विचित्र बालक पैदा हुआ, जिसका
मस्तक हाथी के मस्तक जैसा और सिर केश-शून्य था| इसी
कारण उसका नाम घटोत्कच (घट=हाथी का मस्तक और उत्कच=केशहीन) पड़ा|
चूंकि घटोत्कच की माता एक राक्षसी थी, पिता
एक वीर क्षत्रिय था, इसलिए इसमें मनुष्य और राक्षस दोनों के मिश्रित गुण विद्यमान थे| वह
बड़ा क्रूर और निर्दयी था|
पाण्डवों का बड़ा
आत्मीय था| पांचों भाई इसको अपना पुत्र समझकर प्यार करते थे, इसलिए
यह उनके लिए मर-मिटने को सदैव तत्पर रहता था| महाभारत
युद्ध के बीच इसने अपना पूर्ण पौरुष दिखाया था| देखा
जाए तो इसने वह काम किया,
जो एक अच्छे से अच्छा
महारथी नहीं कर पाता|
कर्ण सेनापति बनकर
कौरवों के पक्ष से युद्ध कर रहा था| वह
बड़ा अद्भुत योद्धा था|
उसके पास इंद्र की दी
हुई ऐसी शक्ति थी जिससे वह किसी भी पराक्रमी से पराक्रमी योद्धा को मार सकता था, वह
शक्ति कभी खाली जा ही नहीं सकती थी| वैसे
कर्ण की निगाह अर्जुन पर लगी हुई थी| वह
उस शक्ति के द्वारा अर्जुन का वध करना चाहता था| श्री
कृष्ण जी इस बात को जानते थे, इसी
कारण उन्होंने घटोत्कच को रण-भूमि में उतारा| इस
राक्षस ने आकाश से अग्नि और अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र बरसाना, आरंभ
किया, उससे कौरव-सेना में हाहाकर मच उठा| सभी
त्राहि-त्राहि करके भागने लगे| कर्ण
भी इसकी मार से घबरा गया|
उसने अपनी आँखों से
देखा कि इस तरह तो कुछ ही देर में सारी कौरव सेना नष्ट हो जाएगी, तब
लाचार होकर उसने घटोत्कच पर उस अमोघ शक्ति का प्रयोग किया| उससे
तो कैसा भी वीर नहीं बच सकता था| अत:
घटोत्कच क्षण-भर में ही निर्जीव होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा| श्री
कृष्ण को इससे बड़ी प्रसन्नता हुई| पाण्डवों
को उसकी मृत्यु से दुख हुआ था, लेकिन
श्री कृष्ण ने सारी चाल उनको समझाकर उन्हें संतुष्ट कर दिया|
*****
No comments:
Post a Comment