महमूद गजनवी का
सेवक अयाज
महमूद गजनवी के पास
एक सेवक था जिसका नाम अयाज था, वह बड़ा स्वामी भक्त था| अपने बादशाह के हर हुक्म की
तालिम करता था और वह भी स्वामी को बड़ा प्यारा लगता था| हम कहते तो है तेरे फूल से
भी प्यार तेरे काँटो से भी प्यार, लेकिन फूलों को हम चाहते हैं, काँटो को स्वीकार
नहीं करते| काँटे मिल जाए तो हम दुखी और परेशान होते हैं| गुरु महाराज हमें
मनोवांछित फल देते चले आये तो वे बहुत अच्छे लगते हैं और अगर कोई हमारे संकल्प के
विरुद्ध बात हो जायेगी तो एक दम हम शंका खड़ी कर देते हैं| लेकिन अयाज ऐसा नहीं था,
वो बहुत प्रिय और आज्ञाकारी था| एक दिन की बात है ज्येष्ठ का महीना था| खरबूजो का
सीजन था| खरबूजे आये महमूद गजनवी ने कहा कि अयाज आज मेरा दिल कर रहा है कि मैं खुद
अपने हाथ से खरबूजा काट कर तुझे खिलाँऊ और उन्होंने एक-2 फाँक काटकर अयाज को दी,
अयाज ने बहुत स्वाद से खाया| आखरी फाँक रह गई तो महमूद गजनवी ने कहा कि इतना स्वाद
है तो तू सारा ही खा जायेगा, मैं भी देखू कि कैसा है? तो वह आखरी फाँक जैसे ही
महमूद ने अपने मुँह में डाली तो इतनी जहरीली, कड़वी थी कि हलक से नीचे न उतर सके,
उसने बाहर फैंक दी| हैरान होकर कहने लगे- “अयाज,
इतना कड़वा खरबूजा और तूने सहज में खा लिया| तुझे कड़वा क्यों नहीं लगा? अयाज ने
जवाब दिया कि हुजूर| आपके इस मुबारिक
हाथ से जीवन में मैंने क्या कुछ नहीं पाया, कितने तोहफे, पुरस्कार आपने मुझे दिए,
अनमोल वस्तुए मुझे भेंट की, आज उन्ही मुबारिक हाथ से कड़वा खरबूजा मिलता है तो मेरा
ये धर्म, फर्ज नहीं कि मैं लेने से इंकार कँरू| महमूद गजनवी ने उसी समय अयाज को
गले से लगा लिया| ये है सेवक का कर्तव्य| हमेशा अपने मालिक की मौज में प्रसन्न
रहना|
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