हंस ने चूहे की रक्षा की
मूसा डूबत देख कर, दादू हंस दयाल|
मानसरोवर ले चला, पंखा काटे काल||
कहते हैं कि एक जगह पर चूहा किसी नदी
में डूब रहा था उसको डूबता देखकर हंस के मन में दया की भावना जागृत हो गई उसके मन
में विचार आया कि क्यों न मैं इस चूहे को बचा लूँ| तो हंस ने क्या किया उड़ता हुआ
पानी में गया और चूहे को अपनी पीठ पर रख कर उसे बचा लिया| अब हंस के मन में ख्याल
आया कि क्यों न मैं इस चूहे को अपने साथ मानसरोवर ले चलू| अब हंस तो चूहे का भला
सोच रहा है लेकिन चूहा जोकि हंस की पीठ पर बैठा है उसने हंस के पंख को कुतरना शुरू
कर दिया जब हंस का पंख कट गया तो वह दोनों ही धरती पर जा गिरे| तो कहने का मतलब
यही है कि कई बार अच्छा व्यक्ति किसी बुरे को भी अच्छा बनाने की कोशिश करता है और
बुरे व्यक्ति की संगति में अपना ही नुकसान करवा बैठता है|
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भवरे और भूंड की मित्रता
एक बार भँवरे और भूंड की दोस्ती हो गई|
भवँरा फूलों में रहता है और भूंड जो है वो गन्दगी में रहता है एक दिन भूंड ने
भँवरे को अपने घर पर बुलाया| भवँरा वहाँ पर गया भँवरे ने देखा की वहाँ तो चारों
तरफ गन्दगी है वह उस जगह पर रुक नहीं पाया
और वहाँ से वापिस चला गया| अगले दिन भवँरा भूंड से मिला तो भँवरे ने भूंड से कहा
कि आज तुम मेरे घर आना| अब भूंड भँवरे के पास पहुँचा| भवँरा फूलों में रहता है|
भूंड ने जब भँवरे का घर देखा तो फूलों को देखकर वह मोहित हो गया और फूल पर ही बैठा
रह गया| कहते हैं सूरज की रोशनी में फूल खुला रहता है और शाम को फूल बंद हो जाता
है भूंड उसी फूल में बंद हो गया| अब माली आया उसने फूलों को तोड़ा| अब पंडित जी आकर
फूलों को मंदिर में चढ़ाने के लिए ले गए| वह फूल मंदिर में ठाकुर जी के चरणों में
पहुँचा जब सुबह सूरज की रोशनी में फूल खिला तो भूंड ने अपने आप को ठाकुर जी के
चरणों में पाया| तब वह बहुत खुश हुआ और मन ही मन भँवरे का शुक्रिया अदा किया| अब
पंडित जी ने सारे फूल इकट्ठे किये और उन्हें गंगा नदी में डाल दिया| अब भूंड गंगा
नदी मैं तैरता हुआ जा रहा है तो भवँरा उसे मिला तो उसने भूंड से पूछा कि तू कहाँ
जा रहा है तो भूंड ने बताया की मैं तेरी संगति से तर गया और अब मैं बैकुण्ठ धाम को
जा रहा हूँ|
नीच जात नीचो गति, नीच गृह में वास|
भाल्यो की सांगत मिली, पायो बॉस सुबास ||
पुनि भाल्यो के संग से , पहुँचा ठाकुर
द्वार|
दर्शन पाकर प्रेम से, बड़ो सुख अपार||
अब तो गंगा नदी दिखे, करके मैं स्नान |
चला
जाता बैकुण्ठ को, साचे मिट सुजान||
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जुलाहों की मण्डली
एक बार जुलाहों की मण्डली का किसी
बारात में जाना हुआ| मार्ग में उन्हें एक नदी पार करनी पड़ी| मण्डली में दस व्यक्ति
थे और ग्यारहवा था उन का सरदार| वे पैदल ही चलकर नदी के उस पार पहुँचे| नदी पार
होकर सरदार ने सोचा – अपने सदस्यों की गणना करनी चाहिए| कही हम में से नदी में कोई
डूब न गया हो| यह सोचकर उसने गिनती करनी प्रारम्भ कर दी| अपने दस साथियों को तो वह
गिन गया परन्तु स्वयं को नहीं गिना| गिनती करने पर जब कुल दस व्यक्ति हुए तो सरदार
अत्यंत चिंतातुर होने लगा| ओह हमारा एक व्यक्ति तो लापता है| आखिर मेरा संदेह सत्य
ही घटित हुआ| अवश्य ही हमारा एक व्यक्ति नदी की भेंट हो गया है| उसने पुन: गिनना
आरम्भ किया और इस बार भी अपने को छोड़ कर दस ही गिने| उसकी चिंता बढ़ने लगी| कई बार
सरदार के गिनती करने पर भी ग्यारह सदस्य पूरे ना हुए| तब सभी सदस्यों ने बारी-2
गणना की, सभी ने स्वयं को न गिन कर दूसरे दस व्यक्तियों की गणना की| अब तो उन्हें
सोलह आने विश्वास हो गया की हमारा एक व्यक्ति नदी में डूब चुका है| यह सोच कर सभी
रोने, पीटने लगे, हाय|
हमारा एक आदमी नदी में डूब गया, अफसोस |
हमारा बड़ा नुकसान हो गया है इस प्रकार उन्होंने रो -2 कर आसमान सिर पर उठा लिया था
अकस्मात् एक विचारवान आदमी उधर आ निकला और उनको इस प्रकार क्रूर क्रंदन करते हुए
देख कर उनसे कारण पूछा – सब वृतांत ज्ञात कर लेने पर उस बुद्धिमान व्यक्ति ने उन
सब पर विहंगम दृष्टी डाली| देखा की यह है तो ग्यारह| फिर रोने पीटने का क्या कारण?
उसे समझने में देर न लगी| उसने सरदार को अपने पास बुलाकर गिनती करने को कहा | उसको
गिनती करते देख चतुर मनुष्य को पता चल गया की ये हर बार गिनती में अपने आप को भूल
जाते हैं| इसी कारण ही वे दुखी और परेशान हो रहे हैं| उसने समझाया की भाई| तुम हर बार अपने दसों साथियों को
गिनकर अपनी गिनती करना तो भूल ही जाते हो| यही भ्रम ही तुम्हें दुखी व बेचैन कर
रहा है| जुलाहों के सरदार ने उस व्यक्ति के कथन अनुसार ही गिनना आरम्भ किया जब
उसने अपने दस आदमियों की गिनती की तब उस विचारशील मनुष्य ने उसका हाथ पकड़ कर उसकी
ओर किया कि भाई| अपने आप को भी तो
गिनो| जब उसने अपने आप को गिना तब अपने आप को गिनने से ग्यारह सदस्य पूरे हुए तब
कही जाकर उन्होंने सुख का श्वास लिया| यह है विचारवानों की संगति की गरिमा की बात
की निमिषमात्र उस विचारवान पुरुष की संगति से उनके समस्त दुःख व भ्रम का नाश हो
गया और वे मारे प्रसन्न्ता के उछलने लगे| इस दृष्टांत का भाव यह है कि जीव संसार
में इसलिए दुखी है की दस इन्द्रियों व ग्यारहवां
जीवात्मा ईश्वर की तरफ से सबको मिले हुए है| परन्तु हर एक जीव आत्मा की ओर
ध्यान न देकर दस इन्द्रियों के सुखों में नहीं रहता, यही इसके दुःख का मूल है| समय
के संत सतगुरु ही इस जीव को आत्मा का बोध कराते हैं|
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इनाम में चन्दन के पेड़
एक बार की बात है एक राजा जंगल में
शिकार करने निकला| उसके सैनिक भी उसके साथ थे| लेकिन शिकार करते -2 वह अपने
सैनिकों से काफी दूर हो गया| वही थोड़ी दूर एक झोपड़ी नजर आई वह उस झोपड़ी में चला
गया| उसमें से एक व्यक्ति निकला उसने राजा जी को बैठने का स्थान दिया, उन्हें भोजन
भी खिलाया वह यह नहीं जानता था की जिनको मैं भोजन खिला रहा हूँ वह राजा है| राजा
ने उससे सही मार्ग पूछा जिस पर चल कर वह अपने राज्य में वापिस जा सके| तब उस
व्यक्ति ने सही मार्ग बताया| तब राजा जी ने अपना परिचय दिया और प्रसन्नता से उस
व्यक्ति को कहा कि हम देश के राजा है उसे एक पत्र दिया और फरमाया कि इस पत्र को
लेकर हमारे राज्य में आना हम तुम्हारी हर इच्छा पूरी करेंगे| अगले दिन वह राजा के
राज्य में पहुँच गया| वहाँ उसने पत्र दिखाया तो सैनिकों ने उसे राजा से मिलने
दिया| जब वह राजा से मिला तो राजा ने उसका आदर सत्कार किया और उससे पूछा कि तुम
क्या काम करते हो तब उस व्यक्ति ने बताया की वह लकड़ी बेच कर अपना खर्च पूरा करता
है| तब राजा ने अपने मंत्री से कहा कि इसे चन्दन की लड़की वाला बाग़ दे दो| अब इसे
लकड़ी काटने के लिए भटकना नहीं पड़ेगा| मंत्री ने उस व्यक्ति को वह बाग़ दे दिया| वह
व्यक्ति खुश हो गया की अब मुझे लकड़ी काटने के लिए कही जाना नहीं पडेगा यही से मैं
लकड़ी काट लिया करूँगा| तब वह रोज उस बाग़ से लकड़ी काटता उसे कोयला बनाता और कोयले
को बाजार में बेच आता| इस तरह वह अपना निर्वाह करने लगा| काफी समय बीत गया एक बार
राजा का उसकी झोपड़ी वाली जगह पर जाना हुआ तो राजा उस व्यक्ति की हालत को देखकर
हैरान कि अभी भी उस व्यक्ति की हालत पहले जैसी ही है| मैंने तो इसे चन्दन की कीमती
लड़की का बाग़ दिया| तब वह इस व्यक्ति को लेकर उस बाग़ में गया और उसने देखा की केवल
कुछ ही पेड़ शेष रह गए बाकी सारे पेड़ों की लकड़ी को वह व्यक्ति कोयला बना चुका है|
तब राजा समझ गया की इस व्यक्ति को यह नहीं मालूम की यह चन्दन की कीमती लकड़ी है| तब
राजा ने उसे वृक्ष की थोड़ी सी लकड़ी कटवा कर दी और फरमाया कि जाओ बाजार में इस बेच
कर आओ| जब वह बाजार में बेचने गया तो वह लकड़ी का टुकड़ा 25 रुपये का बिका| तब वह
बड़ा हैरान की इतनी कीमती लकड़ी को मैं कौड़ी के मूल्य गवां दिया और उसे अपनी गलती का
अहसास हुआ| इसी तरह प्रभु ने हमें चन्दन रूपी शरीर दिया है लेकिन हम उसकी कीमत
नहीं जानते और इसे कौड़ी के रूप में बदल देते हैं|
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धन का लालच
एक बार किसी शिष्य के साथ उसके गुरुदेव
कही देश भ्रमण को जा रहे थे| गुरुदेव बड़े ही त्यागी और तपस्वी थे परन्तु चेला अभी
मायासक्त ही था| उसके मन में हर समय
माया का लोभ ही छाया रहता था| वह अपनी फकीरी से संतुष्ट न होकर धन –माल के ही सदैव
स्वप्न देखता रहता था| राह चलते -2 एक जगह जंगल में उन्होंने दोपहर को एक वृक्ष के
नीचे बसेरा किया| निकट ही कोई गाँव था| चेला वहाँ से जाकर मधुकरी ले आया| तब उन
संत जी और चेले दोनों ने भोजन किया तथा झरने का शीतल पानी पीकर लगे विश्राम करने
लगे| संध्या समय गुरु जी घूमने लगे और चेला अकेले ही वृक्ष के नीचे बैठा रहा| बैठा
-2 स्वाभाविक ही वह अपने हाथ की लकड़ी से जमीन कुदेरने लगा| मिट्टी नरम होने के
कारण लकड़ी उसमें धस गई; चेले को यह देख अति आश्चर्य हुआ जिससे उसने वह जगह और भी
खोदनी आरम्भ कर दी| हाथ भर गद्दा खोदने पर उसमें से पीतल की गागर निकली जो की सोने
चांदी के मोहरों से भरी हुई थी| यह देख चेला प्रसन्नता से उछल पड़ा| वह उसे अभी देख
रहा था कि सामने से गुरु जी आते दिखाई दिए| चेले ने गागर ढाप दी और बड़ी प्रसन्नता
से धन मिलने की वार्ता गुरुदेव से कह सुनाई| यह सुनकर गुरु जी ने चेले को समझाया
और कहा कि बेटा! यह धन लेकर तू क्या करेगा? यह तो विपत्ति और दुःख की खान है| तूने
व्यर्थ में ही इसे पा कर विपत्ति मोल ली है| फिर भी जो कुछ होना था सो हो चुका| अब
ऐसा कर इसे जल्दी से धरती में गाड़ दे और हमें यहाँ से तत्काल ही चल देना चाहिए|
परन्तु चेला हठ करने लगा कि महाराज! हाथ में आया हुआ धन कैसे छोड़ा जा सकता है|
गुरु जी कहने लगे- अरे भोले|
यह धन दुखों का घर है| यदि तू नहीं मानता तो इसका कुपरिणाम हम तुझे कल ही
प्रत्यक्ष दिखा देंगे| अब तो तू इसे जल्दी से गाड़ दे और हमारे साथ चल| तब दोनों ने
मिलकर उस गागर को दबा दिया और वहाँ से आगे प्रस्थान कर गए| रात्रि को दूसरे स्थान
पर बसेरा करके जब प्रात: काल वहाँ से जाने लगे कि एकाएक गुरुदेव ने अपने शिष्य से
कहा ओहो| उस वृक्ष के नीचे
तो हमारी अधारी छूट गई है चलो ले आये| तब वे दोनों उसी वृक्ष के पास वापस पहुँचे
तो क्या देखते है कि वृक्ष के नीचे आठ व्यक्तियों के मृतक शरीर पड़े हैं तथा साथ ही
धन से भरी वह गागर भी पड़ी है जिसे ले जाने वाला कोई नहीं है| यह सब देखकर चेला
आश्चर्य चकित हुआ और गुरु जी से पूछने लगा| संत महात्मा भूत, भविष्य व वर्तमान काल
के ज्ञाता होते हैं, परन्तु आम तौर पर वे प्रत्यक्ष में साधारण मनुष्यों की भांति
अधिकतर मौन ही रहते हैं| लेकिन जब कभी उनकी मौज हो तो वह दूसरे का हित सोच कर सब
कुछ बता देते हैं| इसी प्रकार उत्तर में गुरु देव ने कहा – वैरागन का छूट जाना तो
केवल एक बहाना था| वास्तव में धन के लोभ का दुष्ट परिणाम दिखाने के लिए हम तुम्हें
यहाँ लाये हैं| बात ये हुई कि हमारे यहाँ से चले जाने के बाद ये आठों मनुष्य यहाँ
इसी वृक्ष के निकट से कही जा रहे थे| संयोग वश धरती के कुछ नरम होने के कारण एक
व्यक्ति का पैर उसमें धस गया जिससे उन्हें इस जगह गड्ढा सा प्रतीत हुआ| तब सबके
खोदने पर उन्हें यह गागर प्राप्त हुई| अब आठो में संपत्ति को सामान भागों में
बाँटना निश्चित हुआ| जब उन्हें भूख ने सताया तो चार मनुष्य तो गागर के पास रहे और
अन्य चार गाँव में से भोजन लेने के लिए चल दिए| गाव में पहुँचकर चारों व्यक्तियों
के मन में यह कुटिल विचार आया कि क्यों न हम ही चारों इस धन के अधिकारी बने| यह
सोचकर उन्होंने पहले स्वय भोजन खाया और बाद में उन चारों के लिए जो भोजन बनवाया
उसमें जहर मिला दिया| अब वे चारों व्यक्ति भोजन लेकर प्रसन्नतापूर्वक वृक्ष की ओर चले कि उन चारों को मार कर सम्पूर्ण
धन को अपने अधिकार में कर लेंगे| अब उधर की बात सुनो- वृक्ष के नीचे बैठे हुए इस
चारों व्यक्तियों के मन भी मैंले हो गए| उन्होंने यह योजना बनाई कि ये लोग तो खाना
खा कर आये है इसलिए ये जब चारों सो जायेंगे तब इनके सोते ही इनका कत्ल करके हम यह
धन प्राप्त करेंगे| तत्पश्चात निश्चिंत
होकर खाना लेंगे| जब ये चारों व्यक्ति उधर गाँव से भोजन लेकर पहुँचे तो इन्हें
कहने लगे कि हम लोग तो खाना खा कर आये हैं अत: आप लोग खाना खा ले, तब धन का
बटँवारा किया जाए| परन्तु अभी भूख नहीं है बहाना बनाकर उन चारों ने खाना खाने से
इनकार कर दिया| जब उनके कहने पर खाना लाने वाले व्यक्ति सो गए तो इन चारों ने तेज
कटार से उनके गले काट दिए| उसके बाद जब उन्होंने विष मिश्रित भोजन किया तो ये
चारों भी सदैव के लिए सो गए और यह धन की गागर वैसी की वैसी पड़ी रही| इतनी कथा
सुनाकर गुरुदेव जी ने पुन: शिष्य से कहा कि ले| अब आँखे खोल कर देख ले| यह धन लोभ का प्रत्यक्ष दुःख दाई परिणाम| जैसा हम ने कल कहा था वह आके स्वयं तू
देख ले| वे सभी इस धन को हड़पने की इच्छा से ही मर गए हैं| अब इस धन को ले जाने
वाला कोई नहीं है| बोल| अब क्या कहता है? यदि चाहे तो इस गागर
को उठा कर ले चल| यह सब सुनकर चेले ने कान पकड़े और वह स्वयं को धिक्कारता हुआ
गुरुदेव के चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगा| तब गुरुदेव जी ने उसे वास्तविक
प्रेम भक्ति का उपदेश दिया तथा क्षमा प्रदान की| तत्पश्चात गुरु जी के साथ शिष्य
आगे यात्रा के लिए चल दिया| तातपर्य यह है कि धन का लोभ ही समस्त दुखों और
विपत्तियों का मूल है|
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अहंकारी राजा
कहते हैं कि एक जगह पर संतों के आश्रम
के पास से रोज एक अहंकारी राजा अपने घोड़े से गुजरता था| जब वह घोड़े पर जाता तो
संतों के आश्रम के पास जानकार घोड़े द्वारा मिट्टी उड़ाता| एक दिन किसी संत जी ने
श्राप दिया की जा तेरा घोड़ा मर जाए| थोड़ी दूर चलने पर उसका घोड़ा मर गया| अगले दिन
वह दूसरे घोड़े पर आ गया और फिर मिट्टी उड़ाई| फिर संत जी ने श्राप दिया की तेरा
घोड़ा मर जाए कई दिन ऐसा चलता रहा रोज वह नए घोड़े पर आता रोज संत जी उसे श्राप देते
एक दिन संत जी ने श्राप दिया तो घोड़ा नहीं मरा| तब संत जी ने जाना की रोज -2 जो वे
श्राप देते थे उससे उनकी भक्ति का फल भी धीरे -2 ख़त्म हो जाता, था उनके मन में अहंकार आ गया की मुझमें कितनी ताकत
है| अहंकार के आते ही धीरे-2 सारी भक्ति ख़त्म हो गई |
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परमात्मा की कृपा
एक समय की बात है
किसी व्यक्ति ने किसी संत जी से विनय की आप हमेंशा मुझ पर अपनी कृपा बनाये रखना
हमेंशा मेरे अंग संग रहना| संत जी ने उसे आशीर्वाद दिया और फरमाया कि हम सदा
तुम्हारे अंग संग रहेंगे | अब जब कभी भी वह व्यक्ति चलता तो उसे अपने साथ दो चरण
और नजर आते जो की उसके गुरुदेव के थे| कुछ समय बाद उसके घर में बहुत दुःख आ गए और
उसे दो चरण दिखने बंद हो गए| तब वह व्यक्ति मन में सोचने लगा की जब मेरे पास सुख
था तब तो गुरु जी मेरे साथ -2 चलते थे अब दुःख के समय में वो मेरा साथ छोड़ गए है
वह अपने गुरु महाराज के पास जाता है और उनसे विनय करता है कि महाराज आप ने मेरा
साथ क्यों छोड़ दिया| तब गुरु महाराज जी ने फरमाया कि हमने तुम्हारा साथ नहीं छोड़ा
है जो पैर तुम्हें नजर आते हैं वो तुम्हारे नहीं हमारे है और तुम्हें तो दुःख के
समय हमने अपनी गोद में उठा लिया था| तभी तुम दो ही पैर देख पा रहे थे|
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चार मोमबत्तियां
कहते हैं एक बार एक व्यक्ति ने संतों
की बहुत सेवा की| संत जी ने प्रसन्न होकर उस व्यक्ति को कहा कि माँगो क्या चाहिए|
तब उस व्यक्ति ने कहा कि मैं बहुत गरीब हूँ मेरी गरीबी दूर करो| संत जी ने उसे चार
मोमबत्तीयां दी और कहा कि इनमें से एक
मोमबत्ती जला कर दक्षिण की तरफ जाना जहाँ
मोमबत्ती बुझेगी वहा धन दबा होंगा वो ले आना| अगर तब भी पूर्ति ना हो तो
दूसरी मोमबत्ती जला कर उत्तर की तरफ जाना| अगर तब भी पूर्ति ना हो तो पूर्व की तरफ
जाना| लेकिन चौथी मोमबत्ती ले कर पश्चिम की तरफ कभी मत जाना| इंसान की इच्छा कभी
पूर्ण नहीं होती उसके मन में कुछ न कुछ कामना तो रहती ही है| वह तीनों दिशा में
गया और वहाँ से खूब धन प्राप्त कर लिया लेकिन अब भी उसका पेट नहीं भरा मन में और
पाने की तृष्णा थी| उस व्यक्ति ने सोचा की पश्चिम की तरफ जरुर कोई खजाना होंगा| जो
महापुरुष मुझे मना कर रहे हैं| वह पश्चिम की तरफ मोमबत्ती ले कर गया जहा पर
मोमबत्ती बुझी उस जगह को खोदा मन में सोचा की जरुर यहाँ पर बहुत सा धन होगा| जब
जगह को खोदा तो वहा एक दरवाजा था| दरवाजा खोल कर कर अंदर गया तो अंदर एक और दरवाजा
था| उसे खोला तो एक व्यक्ति अंदर बैठा
चक्की पीस रहा था| उस व्यक्ति ने कहा आ भाई बैठ के चक्की पीस| मैं भी तृष्णा में
फस कर यहाँ आया था और तू मुझ से भी बड़ा तृष्णालू है| अब जब तेरे से भी बड़ा
त्रिश्नालू यहाँ आयेगा तभी तेरी मुक्ति होगी| मैं तो चला| ये है तृष्णा का परिणाम|
****
समुन्द्र के जल से छेद भरना
एक व्यक्ति के मन में यह विचार उत्पन्न
हुआ कि ईश्वर ने संसार में पाप क्यों बनाया? वह सर्वशक्तिमान है, उसने शैतान को
क्यों नहीं रोका? यदि वह चाहता तो शैतान को नष्ट ही कर देता| ऐसे विचारों में खोया
और उलझा हुआ घर से बाहर निकल गया और चलते -2 नदी के किनारे जा पहुँचा| वहाँ पहुँच
कर क्या देखता है कि एक लड़का नदी तट पर बैठा हुआ है, और हाथों में जल भर -2 कर नदी
के किनारे एक छिद्र में डाल रहा है| यह देखकर उस व्यक्ति ने लड़के से पूछा- ऐ लड़के!
यह क्या कर रहा है? लड़के ने उत्तर दिया– मैं इस नदी को एक छिद्र में भरूँगा| वह
व्यक्ति हँसते हुए बोला- तू बड़ा मूर्ख है भला इस छोटे से छिद्र में इस नदी का जल
कैसे समा सकता है? लड़के ने उत्तर दिया – वाह श्रीमान! यदि नदी का जल इस छिद्र में
नहीं समा सकता, तो फिर ईश्वरीय रहस्य आपके इस छोटे से सिर में कैसे समा सकते है?
जिस प्रकार आप शैतान आदि के विषय में सोच रहे हो , उसी प्रकार मैं भी नदी को छिद्र
में भरने की सोच रहा हूँ| यह सुनकर वह व्यक्ति अत्यन्त लज्जित हुआ और मन ही मन
ईश्वर से क्षमा माँगी|
****
तोते की संगत
एक राजा अपने
साथियों सहित शिकार के वन में गया| एक स्थान पर एक हिरन देखकर राजा ने घोड़ा उसके
पीछे छोड़ दिया| हिरन भी सरपट भागा| दोपहर हो गई, परन्तु हिरन हाथ ना आया और एक जगह
घनी-2 झाड़ियों में आँखों से ओझल हो गया| साथियों का दूर-2 तक कही पता ना था| राजा
ने एक तालाब के किनारे वृक्ष की छाया में घोड़ा रोका और कुछ देर वहाँ सुस्ता कर
राजधानी वापस जाने के लिए तैयार हुआ| मार्ग जब समझ ना आया तो उसने अनुमान से एक ओर
घोड़ा बढाया| कुछ दूर जाने पर उसे एक बस्ती नजर आई जिसमें तीस चालीस झोपड़ियाँ थी|
वह भीलों की बस्ती थी| जो लूटमार का धंधा करते थे| राजा अभी एक झोपड़ी के पास पहुँचा
ही था कि झोपड़ी के द्वार पर टंगे हुए पिंजरे में बंद तोता चिल्ला उठा शिकार आ गया|
पकड़ लो! मार डालो इसे! सब कुछ छीन लो
इसका| राजा समझ गया कि यह लुटेरों की बस्ती है और तोता वही कुछ बोल रहा है
जो भाषा लुटेरे प्रयोग करते हैं| उसने घोड़े को तेजी से दौड़ाया| लुटेरों ने घोड़ों
पर उसका पीछा किया, परन्तु वे राजा तक न पहुँच सके| अन्तत: हताश होकर वे वापस लौट
गए| कुछ देर बाद राजा मुनियों के आश्रम में जा पहुँचा|
वहाँ भी एक वृक्ष की टहनी पर एक पिंजरा टंगा हुआ
था और उस पिंजरे में भी एक तोता था| राजा को देखते ही वह बोल उठा- आइये| आपका
स्वागत है| मुनि जनों! आसन लाओ, अतिथि द्वार पर आये हैं| तोते के शब्द सुनकर
मुनिजन कुटियाओं से बाहर आ गए और उन्होंने राजा का समुचित आदर सत्कार किया| अब
विचार करने की बात है कि संगति का प्रभाव जब पशुओं पर भी चढ़ता है तो इन्सान पर
क्यों नहीं चढ़ेगा| सुसंगति में मनुष्य गुणग्राही बनता है और कुसंगति में
अवगुणग्राही|
****
संत जी को भिक्षा देना
एक संत ने एक द्वार पर दस्तक दी और
आवाज लगाई “भिक्षा
देहि”,
एक छोटी बच्ची बाहर आई और बोली, “बाबा,
हम गरीब है, हमारे पास देने को कुछ नहीं है”
संत बोले, “बेटी,
मना मत कर अपने आँगन की धूल ही दे दे| लड़की ने एक मुट्ठी धूल उठाई और भिक्षा पात्र
में डाल दी| शिष्य ने पूछा, “गुरु
जी, धूल भी कोई भिक्षा है? आपने धूल देने को क्यों कहा?”
संत बोले, “बेटे,
अगर वह आज ना कह देती तो फिर कभी भी ना दे पाती| आज धूल दी तो क्या हुआ, देने का संस्कार
तो पड़ गया| आज धूल दी है, उसमें देने की भावना तो जागी, कल समर्थवान होगी तो फल-
फूल भी देगी|” जीतनी छोटी कथा है
निहितार्थ उतना ही विशाल, साथ में आग्रह भी, दान करते समय दान हमेशा अपने परिवार
के छोटे बच्चों के हाथों से दिलवाए जिससे उनमें देने की भावना बचपन से बने|
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अब्द मुबारक की हज
अब्द मुबारक हज करने के लिए मक्का की यात्रा पर था। मार्ग
में एक स्थान पर वह थककर सो गया और उसने स्वप्न देखा कि वह स्वर्ग में था। उसने
वहाँ दो फरिश्तों को बातचीत करते सुना| पहले फ़रिश्ते ने दूसरे से पूछा – “इस साल कितने हज
यात्री मक्का आ रहे हैं?” “छः लाख” – दूसरे फ़रिश्ते ने जवाब दिया। “और इनमें से
कितनों को हजयात्रा का पुण्य मिलेगा?” “किसी को भी नहीं, लेकिन बग़दाद में अली मुफीक़ नामक एक मोची है जो हज नहीं कर
रहा है फ़िर भी उसे हज का पुण्य दिया जा रहा है और उसकी करुणा के कारण यात्रा करने
वाले छः लाख लोग भी थोड़ा पुण्य कमा लेंगे| नींद खुलने पर अब्द मुबारक सपने के बारे
में सोचकर अचंभित था। वह अली मुफीक़ की दुकान पर गया और उसने उसे अपना स्वप्न कह
सुनाया। “आपके स्वप्न के बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता। मैंने तो बड़ी मुश्किल से हजयात्रा
के लिए 350 दीनार जमा किए थे। लेकिन जब मैं यात्रा के लिए निकल रहा था तभी मैंने
देखा कि मेरे पड़ोसी दाने दाने को तरस रहे है इसलिए मैंने वह सारा धन उनमे बाँट
दिया| अब मैं शायद कभी हज करने नहीं जा सकूँगा”– अली मुफीक़ ने
कहा।
****
खोटे सिक्के
यह एक सूफी कथा है| किसी गाँव में एक
बहुत सरल स्वभाव का आदमी रहता था| वह लोगों को छोटी-मोटी चीज़ें बेचता
था. उस गाँव के सभी निवासी यह समझते थे कि उसमें निर्णय करने, परखने और आंकने की क्षमता नहीं थी| इसीलिए बहुत से लोग उससे चीज़ें खरीदकर
उसे खोटे सिक्के दे दिया करते थे| वह उन सिक्कों को ख़ुशी-ख़ुशी ले लेता
था| किसी ने उसे कभी भी यह कहते नहीं सुना कि ‘यह सही है और यह गलत है’| कभी-कभी तो उससे
सामान लेने वाले लोग उसे कह देते थे कि उन्होंने दाम चुका दिया है, और वह उनसे पलटकर कभी नहीं कहता था कि ‘नहीं, तुमने पैसे नहीं दिए हैं’| वह सिर्फ इतना ही कहता ‘ठीक है’, और उन्हें धन्यवाद देता| दूसरे गाँवों से भी
लोग आते और बिना कुछ दाम चुकाए उससे सामान ले जाते या उसे खोटे पैसे दे देते. वह
किसी से कोई शिकायत नहीं करता| समय गुज़रते वह आदमी बूढ़ा हो गया और
एक दिन उसकी मौत की घड़ी भी आ गयी.| कहते हैं कि मरते हुए ये उसके अंतिम शब्द थे: – “मेरे खुदा, मैंने हमेंशा ही सब तरह के सिक्के लिए, खोटे सिक्के भी लिए. मैं भी एक खोटा
सिक्का ही हूँ, मुझे मत परखना.
मैंने तुम्हारे लोगों का फैसला नहीं किया,
तुम भी मेरा फैसला मत करना.” ऐसे आदमी को खुदा कैसे परखता?
****
पत्थर को हटाना
बहुत
पुरानी बात है की किसी राज्य में एक राजा हुआ करता था| राजा
ने एक बार अपने राज्य के लोगों की परीक्षा लेनी चाही| एक
दिन उसने क्या किया कि सुबह सुबह जाकर रास्ते में एक बड़ा सा पत्थर रखवा दिया| अब
तो सड़क से जो कोई भी निकलता उसे बड़ी परेशानी हो रही थी लेकिन कोई भी पत्थर हटाने
की कोशिश नहीं कर रहा था|
राजा यह सब छुपकर देख रहा था, कुछ देर बाद उसके राज्य के
मंत्री और अन्य बड़े बड़े और धनी लोग भी वहाँ आए लेकिन किसी ने भी पत्थर हटाने की
कोशिश नहीं की बल्कि सभी राजा को ही गालियाँ दे रहे थे कि रास्ते में इतना बड़ा
पत्थर पड़ा है और राजा इसे हटवा क्यूँ नहीं रहा है| कुछ देर बाद वहाँ एक ग़रीब किसान
आया जिसके सर पे बड़ा सा सब्जी का गट्ठर रखा हुआ था जब वह पत्थर से गुज़रा तो उसे
वजन की वजह से काफ़ी परेशानी हो रही थी|
उसने अपने सर से सब्जी की गठरी उतारी और पत्थर को पूरी ताक़त से हटाने में जुट गया| वो पत्थर बहुत बड़ा था लेकिन
किसान ने हार नहीं मानी और कुछ ही देर में रास्ते से पत्थर हटा दिया| जैसे ही वो वहाँ से चला उसने
देखा की पत्थर वाली जगह पर एक थैला पड़ा हुआ था जोकि राजा ने पत्थर के नीचे छुपा
दिया था| किसान ने थैला खोला तो देखा
उसमें सोने के 1000 सिक्के थे और एक पत्र था जिसमें
लिखा था-“पत्थर हटाने वाले को राजा की ओर
से इनाम” अब तो किसान फूला नहीं समा रहा
था| तो मित्रों इसी तरह से जीवन में
आने वाली हर परेशानी भी एक अच्छा अवसर लेकर आती है जो लोग नकारात्मक सोचते हैं वो
इसे समझ नहीं पाते और अवसर खो देते हैं वहीं अच्छी सोच के व्यक्ति चुनौती स्वीकार
करते हैं और अवसर का लाभ उठाते हैं|
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जैसा मैं चाहूँ वैसा मौसम
एक
बार एक किसान
परमात्मा से बड़ा नाराज हो गया! कभी बाढ़ आ जाये, कभी सूखा पड़ जाए, कभी धूप बहुत तेज हो जाए तो कभी ओले
पड़ जाये! हर बार कुछ ना कुछ कारण से उसकी फसल थोड़ी ख़राब हो जाये! एक दिन बड़ा तंग आ कर उसने परमात्मा से
कहा, देखिये प्रभु,आप परमात्मा हैं , लेकिन लगता है आपको खेती बाड़ी की
ज्यादा जानकारी नहीं है,
एक प्रार्थना है कि एक साल मुझे मौका दीजिये,
जैसा मैं चाहूँ वैसा मौसम हो, फिर आप देखना मैं कैसे अन्न के भण्डार
भर दूंगा! परमात्मा मुस्कुराये और कहा ठीक है, जैसा तुम कहोगे वैसा ही मौसम दूंगा, मैं दखल नहीं करूँगा! किसान ने गेहूं
की फ़सल बोई, जब धूप चाही, तब धूप मिली, जब पानी तब पानी! तेज धूप, ओले, बाढ़, आंधी तो उसने आने ही नहीं दी, समय के साथ फसल बढ़ी और किसान की ख़ुशी
भी, क्योंकि ऐसी फसल
तो आज तक नहीं हुई थी! किसान ने मन ही मन सोचा अब पता चलेगा
परमात्मा को, कि फ़सल कैसे करते
हैं, बेकार ही इतने बरस
हम किसानों को परेशान करते रहे| फ़सल काटने का समय भी आया, किसान बड़े गर्व से फ़सल काटने गया, लेकिन जैसे ही फसल काटने लगा, एकदम से छाती पर हाथ रख कर बैठ गया! गेहूं की एक भी बाली के अन्दर गेहूं
नहीं था, सारी बालियाँ
अन्दर से खाली थी, बड़ा
दुखी होकर उसने परमात्मा से कहा,
प्रभु ये क्या हुआ? तब परमात्मा बोले,” ये तो होना ही था, तुमने पौधों को संघर्ष का ज़रा सा भी मौका नहीं दिया. ना तेज धूप में उनको तपने दिया , ना आंधी ओलों से जूझने दिया, उनको किसी प्रकार की चुनौती का अहसास जरा भी नहीं होने दिया, इसीलिए सब पौधे खोखले रह गए, जब आंधी आती है, तेज बारिश होती है ओले गिरते हैं तब पौधा
अपने बल से ही खड़ा रहता है, वो
अपना अस्तित्व बचाने का संघर्ष करता है और इस संघर्ष से जो बल पैदा होता है वोही
उसे शक्ति देता है, ऊर्जा देता है, उसकी जीवटता को उभारता है| सोने को भी
कुंदन बनने के लिए आग में तपने , हथौड़ी से पिटने, गलने जैसी चुनौतियों से गुजरना पड़ता
है तभी उसकी स्वर्णिम आभा उभरती है,
उसे अनमोल बनाती है !”
उसी तरह जिंदगी में भी अगर संघर्ष ना हो ,
चुनौती ना
हो तो आदमी खोखला ही
रह जाता है, उसके अन्दर कोई गुण
नहीं आ पाता! ये चुनौतियाँ
ही हैं जो आदमी रूपी तलवार को धार देती
हैं, उसे सशक्त और
प्रखर बनाती हैं, अगर प्रतिभाशाली
बनना है चुनौतियाँ तो
स्वीकार करनी ही पड़ेंगी, अन्यथा
हम खोखले ही रह जायेंगे|
अगर
जिंदगी में प्रखर बनना है,
प्रतिभाशाली बनना है,
तो संघर्ष और चुनौतियों का सामना करना ही पड़ेगा!
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खुश रहने का राज
एक समय की बात है, एक गाँव में महान ऋषि रहते थे| लोग उनके पास अपनी कठिनाईयाँ लेकर आते थे और
ऋषि उनका मार्गदर्शन करते थे| एक दिन एक व्यक्ति, ऋषि के पास आया और ऋषि से एक प्रश्न पूछा| उसने ऋषि से पूछा कि “गुरुदेव मैं यह जानना चाहता हूँ कि
हमेंशा खुश रहने का राज़ क्या है ऋषि
ने उससे कहा कि तुम मेरे साथ जंगल में चलो, मैं तुम्हें खुश रहने का राज़
बताता हूँ| ऐसा कहकर ऋषि और वह व्यक्ति जंगल की
तरफ चलने लगे| रास्ते में ऋषि ने
एक बड़ा सा पत्थर उठाया और उस व्यक्ति को कह दिया कि इसे पकड़ो और चलो| उस व्यक्ति ने पत्थर को उठाया और वह
ऋषि के साथ साथ जंगल की तरफ चलने लगा| कुछ समय बाद उस
व्यक्ति के हाथ में दर्द होने लगा लेकिन वह चुप रहा और चलता रहा| लेकिन जब चलते हुए बहुत समय बीत गया और
उस व्यक्ति से दर्द सहा नहीं गया उसने ऋषि से कहा कि उसे दर्द हो रहा है| तो ऋषि ने कहा कि इस पत्थर को नीचे रख
दो| पत्थर को नीचे रखने
पर उस व्यक्ति को बड़ी राहत महसूस हुयी| तभी ऋषि ने कहा – “यही है खुश रहने का राज़| व्यक्ति ने कहा – गुरुवर मैं समझा नहीं| तो ऋषि ने कहा- जिस तरह इस
पत्थर को एक मिनट तक हाथ में रखने पर थोड़ा सा दर्द होता है और अगर इसे एक घंटे तक हाथ में
रखें तो थोड़ा ज्यादा दर्द
होता है और अगर इसे और ज्यादा समय तक उठाये रखेंगे तो दर्द बढ़ता जायेगा उसी तरह
दुखों के बोझ को जितने ज्यादा समय तक उठाये रखेंगे उतने ही ज्यादा हम दु:खी और
निराश रहेंगे| यह हम पर निर्भर करता है कि हम दुखों के बोझ को एक
मिनट तक उठाये रखते हैं या उसे जिंदगी
भर| अगर तुम खुश रहना चाहते हो तो दु:ख रुपी पत्थर को जल्दी से
जल्दी नीचे रखना सीख लो और हो सके तो उसे उठाओ ही नहीं
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नींद न आने की बिमारी
एक व्यापारी को नींद न आने की बीमारी थी। उसका नौकर मालिक की बीमारी से दुखी रहता था। एक दिन व्यापारी अपने नौकर को सारी संपत्ति देकर चल बसा।
सम्पत्ति का मालिक बनने के बाद नौकर रात को सोने की कोशिश कर रहा था, किन्तु अब उसे नींद नहीं आ रही थी। एक रात जब वह सोने की कोशिश कर रहा था,
उसने कुछ आहट सुनी। देखा, एक चोर घर का सारा सामान समेंट कर उसे बांधने की कोशिश कर रहा था, परन्तु चादर छोटी होने के कारण गठरी बंध नहीं रही थी। नौकर ने अपनी ओढ़ी हुई चादर चोर को दे दी और बोला,
इसमें बांध लो। उसे जगा देखकर चोर सामान छोड़कर भागने लगा। किन्तु नौकर ने उसे रोककर हाथ जोड़कर कहा, भागो मत,
इस सामान को ले जाओ ताकि मैं चैन से सो सकूँ। इसी ने मेरे मालिक की नींद उड़ा रखी थी और अब मेरी। उसकी बातें सुन चोर की भी आँखें खुल गईं।
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स्त्री की आँखें चली गई
एक स्त्री थी|
उसकी आँखें चली गईं|
पहले एक गई, फिर दूसरी|
वह बहुत परेशान रहने लगी| पति अपनी अंधी पत्नी का बोझ कब तक उठाता! वह उससे अलग रहने लगा| उसकी छोटी लड़की ने भी उससे मुँह मोड़ लिया|
स्त्री हर काम के लिए पराधीन थी, पर उसे कौन सहारा देता! ऐसी हालत में उसकी एक पुरानी सहेली उसके पास आकर रहने लगी,
लेकिन उसका व्यवहार बड़ा अजीब था|
वह स्त्री जब पानी माँगे तो एक बार पिला देती| कई बार माँगने पर कह देती - "मैं तुम्हारी नौकर नहीं हूं| उठो घड़े से लेकर अपने आप पी लो|"
वह कपड़े माँगती तो एक बार दे देती,
दूसरी बार माँगने पर कह देती
- "अलमारी में रखे हैं|
जाओ अपने आप ले आओ|" कभी उसका मन घूमने का होता तो एक बार साथ चली जाती|
दूसरी बार जाने की बात आती तो कह देती - "मुझे काम है| तुम अकेली घूम आओ|"
अंधी स्त्री मन मसोसकर उठती और काम करती|
असल में बात यह थी कि सहेली उसे कम प्यार नहीं करती थी और न ही काम से बचना चाहती थी| वह बार-बार दया दिखाकर उसको सदा के लिए अपाहिज नहीं बनाना चाहती थी| धीरे-धीरे वह स्त्री सब काम अपने-आप करने लगी|
उसे किसी के सहारे की जरूरत न रही|
तब उसने समझा कि उसकी सहेली ने उसके ऊपर बहुत बड़ा उपकार किया|
फिर वह अंधों की एक संस्था में चली गई और वहाँ उसने जाने कितने असहाय भाई-बहनों को अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाया|
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यमराज का दण्ड
मृत्यु के बाद एक साधु और एक डाकू साथ-साथ यमराज के दरबार में पहुँचे। यमराज ने अपने बहीखातों में देखा और दोनों से कहा-यदि तुम दोनों अपने बारे में कुछ कहना चाहते हो तो कह सकते हो। डाकू अत्यंत विनम्र शब्दों में बोला-
महाराज! मैंने जीवनभर पाप कर्म किए हैं। मैं बहुत बड़ा अपराधी हूं। अत: आप जो दंड मेरे लिए तय करेंगे, मुझे स्वीकार होगा। डाकू के चुप होते ही साधु बोला-
महाराज! मैंने आजीवन तपस्या और भक्ति की है। मैं कभी असत्य के मार्ग पर नहीं चला। मैंने सदैव सत्कर्म ही किए हैं इसलिए आप कृपा कर मेरे लिए स्वर्ग के सुख-साधनों का प्रबंध करें। यमराज ने दोनों की इच्छा सुनी और डाकू से कहा- तुम्हें दंड दिया जाता है कि तुम आज से इस साधु की सेवा करो। डाकू ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार कर ली। यमराज की यह आज्ञा सुनकर साधु ने आपत्ति करते हुए कहा- महाराज! इस पापी के स्पर्श से मैं अपवित्र हो जाऊंगा। मेरी तपस्या तथा भक्ति का पुण्य नरर्थक हो जाएगा। यह सुनकर यमराज क्रोधित होते हुए बोले-
निरपराध और भोले व्यक्तियों को लूटने और हत्या करने वाला तो इतना विनम्र हो गया कि तुम्हारी सेवा करने को तैयार है और एक तुम हो कि वर्षो की तपस्या के बाद भी अहंकारग्रस्त ही रहे और यह न जान सके कि सबमें एक ही आत्मतत्व समाया हुआ है। तुम्हारी तपस्या अधूरी है। अत:
आज से तुम इस डाकू की सेवा करो। कथा का संदेश यह है कि वही तपस्या प्रतिफलित होती है, जो निरहंकार होकर की जाए। वस्तुत: अहंकार का त्याग ही तपस्या का मूलमंत्र है और यही भविष्य में उपलब्धि का आधार बनता है।
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मेरे खाने से
तुम्हारा पेट
किसी नगर में एक सेठ रहता था| उसके पास लाखों की संपत्ति थी,
बहुत बड़ी हवेली थी,
नौकर-चाकर थे|
फिर भी सेठ को शांति नहीं थी| एक दिन किसी ने उसे बताया कि अमुक नगर में एक साधु रहता है| वह लोगों को ऐसी सिद्धि प्राप्त करा देता है कि उससे मनचाही चीज मिल जाती है| सेठ उस साधु के पास गया और उसे प्रणाम करके कोई निवेदन किया - "महाराज, मेरे पास पैसे की कमी नहीं है, पर फिर भी मेरा मन बहुत अशांत रहता है| आप कुछ ऐसा उपाय बता दीजिए कि मेरी अशांति दूर हो जाए|" सेठ ने सोचा कि साधु बाबा उसे कोई तावीज दे देंगे,
या और कुछ कर देंगे जिससे उसकी इच्छा पूरी हो जाएगी, लेकिन साधु ने ऐसा कुछ भी नहीं किया| अगले दिन उसने सेठ को धूप में बिठाए रखा और स्वयं अपनी कुटिया के अंदर छाया में जाकर चैन से बैठा रह गया| गर्मी के दिन थे|
सेठ का बुरा हाल हो गया|
उसको बहुत गुस्सा आया,
पर वह उसे चुपचाप पी गया|
दूसरे दिन साधु ने कहा - "आज तुम्हें दिन-भर खाना नहीं मिलेगा|"
भूख के मारे दिन-भर सेठ के पेट में चूहे कूदते रहे, अन्न का एक दाना भी उसके मुँह में नहीं गया,
लेकिन उसने देखा कि साधु ने तरह-तरह के पकवान उसी के सामने बैठकर बड़े आनंद से खाए| सेठ सारी रात परेशान रहा| उसे एक क्षण को भी नींद नहीं आई|
वह सोचता रहा कि साधु तो बड़ा स्वार्थी है| तीसरे दिन सवेरे ही उठकर उसने अपना बिस्तर बांधा और चलने को तैयार हो गया| तभी साधु बाबा उसके सामने आकर खड़े हो गए और बोले - "सेठ क्या हुआ?" सेठ ने कहा - "मैं यहाँ बड़ी आशा लेकर आपके पास आया था, लेकिन मुझे यहाँ कुछ नहीं मिला उल्टे ऐसी मुसीबतें उठानी पड़ीं, जो मैंने जीवन में कभी नहीं उठाईं| मैं
जा रहा हूँ|" साधु हँसकर बोले - "मैंने तुझे इतना कुछ दिया, पर तुने कुछ भी नहीं लिया|"
सेठ ने विस्मय भाव से साधु की ओर देखा और बोला - "आपने तो मुझे कुछ भी नहीं दिया|" साधु ने कहा
- "सेठ पहले दिन जब मैंने तुझे धूप में बिठाया और स्वयं छाया में बैठा रहा तो इसके जरिए मैंने तुझे बताया कि मेरी छाया तेरे काम नहीं आ सकती| जब मेरी बात तेरी समझ में नहीं आई तो दूसरे दिन मैंने तूझे भूखा रखा और स्वयं खूब अच्छी तरह खाना खाया|
उससे मैंने तुझे समझाया कि मेरे खा लेने से तेरा पेट नहीं भर सकता|
सेठ, याद
रखों मेरी साधना से तुझे सिद्धि नहीं मिलेगी|
धन तूने खुद अपने पुरुषार्थ से कमाया है और शांति भी तुझे अपने ही पुरुषार्थ से मिलेगी|" सेठ की आंखें खुल गईं और उसे अपनी मंजिल पर पहुँचने का रास्ता मिल गया| साधु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हुआ वह घर लौट आया|
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मेरे पास आनंद है
एक समय की बात है एक राजा जंगल के रास्ते से कही जा रहा था तो
रास्ते में उसने देखा कि एक संत जी एक पेड़ के नीचे समाधि लगा कर बैठे है और उनके
चहरे पर एक अलग सा ही तेज है राजा उन संत जी को देखता ही रह गया राजा ने देखा कि
संत जी खुले आसमान के नीचे जमीन पर बैठे है| तन पर पूरे कपड़े भी नहीं है फिर भी
उनके चहरे पर बड़ा ही सब्र संतोंष है| वे निश्चिंत होकर बैठे है कोई गम चिंता नहीं
है, अलग सा आकर्षण उनके मुख मंडल पर नजर आ रहा था| राजा अपने आप को रोक नहीं पाया
और उन संत जी के पास जाकर उन्हें प्रणाम किया और पूछने लगा महाराज आप यहाँ जगंल
में बैठे हैं आपके पास कुछ भी नहीं है उसके बावजूद भी ऐसा लगता है आप बहुत खुश है
कोई गम चिंता नहीं है| ऐसा कैसे है तब संत जी ने कहा कि राजन देखो जैसे चंद्रमा
आपके लिए निकलता है वैसे मेरे लिए भी निकलता है| सूर्य देव जैसे आप के लिए निकलता
है वैसे ही मेरे लिए भी निकलता है फूल जैसे आपको खुशबू देता है, वैसे ही मुझे भी
देता है फिर ऐसा क्या है जो आपके पास है वो मेरे पास नहीं है और जो मेरे पास है वो
आपके पास नहीं है| तब राजा ने पूछा कि हे संत जी ऐसा क्या है आपके पास जो मेरे पास
नहीं है|
तब संत जी ने कहा हे राजन आपके पास
दुःख है चिंताए हैं आपके राज्य की माया ने आपके मन को वश में कर रखा है आप चाह कर
भी इनसे आजाद नहीं हो सकते| आपके पास वो धन है वो सामान है जिसको आपने एक दिन छोड़
देना है, लेकिन उसी सामान की चिंता में तुम पूरा जीवन व्यतीत कर रहे हो| इसके
आलावा मेरे पास सुख है, शांति है, सब्र है, संतोंष है और मेरे पास वो ‘धन है प्रभु
नाम का’ जिसे कोई चुरा नहीं सकता, कोई छीन नहीं सकता| मेरे पास आनंद है,
आनंदस्वरूप भगवान है जो की इस सृष्टी के मालिक है| संत जी की बाते सुन कर राजा की
आँखे खुल गई| उसने संत जी के आगे हाथ जोड़ कर प्रणाम किया और उन से शिक्षा लेकर
कृतज्ञ हो गया|
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राम नाम करे भाव से पार
एक दूध बेचने वाली रोज सुबह घर घर जाकर
दूध देकर आती थी उसी रास्ते एक जगह पर नदी पड़ती थी जिसे उसे नाव पर बैठ कर पार
करना पड़ता था| रास्ते में एक जगह पर मंदिर पड़ता था जहाँ पर रोज भजन में बुला करता
था कि ‘राम नाम करे भव से पार’ ये बात उसने भी कई बार सुनी थी| एक दिन क्या हुआ कि
वह सुबह घरो में दूध देने के लिए वह देर से निकली जब नदी के पास पहुँची तो उसने देखा कि नाव
तो जा चुकी है अब वह बड़ी परेशान हुई कि वह आज कैसे दूध पहुँचाएगी| तब उसे बात याद
आई कि ‘राम नाम करे भव सागर से पार’| उसके मन में आया कि मंदिर में रोज बुलता है
कि राम नाम भव सागर से पार कर देता है तो ये तो छोटी सी नदी ही इससे पार क्यूँ
नहीं लगा जा सकता| वह राम का नाम लेकर उस नदी में चली गई और नदी को पार कर लिया|
अब वह रोज आते जाते ऐसे ही करने लगी| अब उसके पैसे जो नाव वाले को देने पड़ते थे
बचने लगे| वह भी खुश हो गई कि मेरी तो बड़ी बचत हो रही है तो उसके मन में आया कि
क्यूँ न उस मंदिर में जाकर पंडित जी को शुक्रिया अदा करना चाहिए जिनकी बात से ही
मेरे काम आसान हो गए| वह यह सोच कर उस मंदिर में गई और उन पंडित जी को कहा कि आप
की वजह से मुझे बहुत लाभ मिला| मैं आपको अपने घर पर भोजन पर बुलाना चाहती हूँ| तब
पंडित जी उसके साथ उसके घर की ओर चल दिए रास्ते में जब वह नदी आई तो पंडित जी नाव
का इन्तजार करने लगे| तब उस औरत ने कहा कि आप क्या सोच रहे हैं नदी में चल कर रास्ता
पार कर लो| तब पंडित जी हैरान कि नदी में से जाकर रास्ता कैसे पार होगा| तब उस औरत
ने कहा कि पंडित जी मैं तो रोज इस नदी में से जाती हूँ| तब पंडित जी को विश्वास
नहीं हुआ| उस औरत ने बाताया कि आप ही तो
कहते हो राम नाम करे भव सागर से पार तो मैं वही राम नाम लेकर इस नदी को पार करती
हूँ और यह कह कर वह औरत नदी में उतर गई और रास्ते को पार कर लिया| पंडित जी हैरान
कि यह कैसे कर सकती है तब पंडित जी भी ऐसा करने लगे तो वह तो डूबने लगे| तब उन्हें
पता चला कि यह उस परम पिता के ऊपर उस औरत का विश्वास है जिस वजह से वह नदी को राम
नाम से पार कर लेती है|
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दो दोस्तों की सोच
यह दृष्टांत दो दोस्तों के बारे में है
जिनमे से एक तो बड़े गरीब परिवार का था और दूसरा बहुत पैसे वाला था, फिर भी उन
दोनों में काफी गहरी मित्रता थी| वो अकसर एक दूसरे से मिला करते थे| एक दिन दोनों
दोस्त किसी पार्क में मिले| कुछ देर उन्होंने ने बातचीत कि उसके बाद जब वहाँ से
जाने लगे तो उस गरीब मित्र को कुछ कान में
आवाज सुनाई पड़ी| उसने अपने मित्र से पूछा कि क्या तुमने भी कोई आवाज सुनी है| तब
उसके मित्र ने कहा कि नहीं मैंने तो नहीं सुनी| लेकिन गरीब मित्र ने कहा कि मुझे
तो सुनाई दी है,| तब उस समय उसके मित्र ने इधर उधर देखा तो वहीँ जमींन पर एक
सिक्का गिरा पड़ा था तो उसने कहा हाँ मुझे सिक्के की आवाज सुनाई दी है| तुमने भी
यही आवाज सुनी होगी| तब गरीब मित्र ने कहा नहीं और वो यह कह कर उस तरफ बढ़ा जहाँ से
आवाज आई थी| जब वह उस तरफ थोड़ा आगे बढ़ा तो उसने देखा की एक तितली जो है किसी पौधे
के पत्तो में अटकी पड़ी है और निकलना चाह रही है पर निकल नहीं पा रही तब उस व्यक्ति
ने उस तितली को उस में से निकाला और उसे
दुःख से मुक्त कर दिया| उसका दूसरा मित्र भी उसके साथ था, तब उसने अपने गरीब मित्र
से पूछा कि तुम्हें यह कैसे पता चला कि तितली मुसीबत में है| तब उस गरीब मित्र ने
जवाब दिया कि तुम्हारे और मुझमे यही फर्क है कि तुम्हें हमेशा पैसे कि आवाज सुनाई
देती है किसी के दुःख को, या किसी कि आत्मा कि आवाज को तुम नहीं सुन सकते जबकि मैं
उसे सुन सकता हूँ|
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समय जब निकल गया
एक गिलहरी रोज अपने
काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी! गिलहरी जरुरत से
ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी
क्योंकि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट
देने का वादा कर रखा था। गिलहरी
काम करते करते थक जाती तो सोचती थी, कि
थोडा आराम कर लूँ, परन्तु जैसे ही
उसे याद आता कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा गिलहरी फिर काम पर लग जाती! गिलहरी जब
दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी, तो
उसकी भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं, पर
उसे अखरोट याद आ जाता,
और वो फिर काम पर लग जाती ! ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था! ऐसे ही समय बीतता
रहा.... एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर
आज़ाद कर दिया ! गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब अखरोट मेरे किस काम के
? पूरी जिन्दगी काम
करते - करते दाँत तो घिस गये, इन्हें
खाऊँगी कैसे! यह कहानी आज जीवन की हकीकत बन चुकी है इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग
करता है, पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है! 60 वर्ष
की उम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है,
तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है, या बैंक बैलेंस होता है, तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता
हैl तब तक जनरेशन बदल
चुकी होती है, परिवार को चलाने
वाले बच्चे आ जाते है। क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये कितनी इच्छायें
मरी होंगी? कितनी तकलीफें
मिली होंगी? कितनें सपनें
अधूरे रहे होंगे? क्या फायदा ऐसे
फन्ड का, बैंक बैलेंस का, जिसे पाने के लिये पूरी ज़िन्दगी लग जाये
और मानव उसका भोग खुद न कर सके! इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो
बीते हुए समय को खरीद सके। इसलिए हर पल को खुश होकर जियो व्यस्त रहो, पर साथ में मस्त रहो सदा स्वस्थ रहो।
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शिष्य की अरदास
एक गुरू का दास रोज
गुरू के द्वार पर जा कर रोज गुरू को पुकारा करता था लेकिन गुरू के दर्शन नहीं कर
पाता था इसलिए वह हमेशा यही सोच कर चला जाता था कि शायद मेरी भक्ति भाव में कुछ
कमी है इसलिए वो हर रोज बहुत ही प्रेम भाव से प्रभु के नाम का जाप करता और गुरू के
दीदार किये बिना ही चला जाता था| बहुत दिनों तक यह चलता रहा ,,, एक दिन गुरू के दास से रहा नहीं गया
उसने गुरू जी से पूछा कि गुरू जी ये आपके दर्शनों के लिए रोज सच्चे मन से आता है
और आपको पता भी होता है फिर भी इसको अपने दर्शनों से निहाल क्यों नहीं करते| गुरू
महाराज कहते हैं कि उससे ज्यादा तड़फ मुझे है मिलने की लेकिन जिस प्रेम भाव से वो
प्रभु का नाम लेता है मैं छुप कर उसकी अरदास को सुनता रहता हूँ सिर्फ इसी डर से
कहीं मेरे दर्शनों के बाद वो नहीं आया तो ऐसी प्रेम भरी अरदास कौन सुनाएगा| मुझे
इसकी अरदास बहुत अच्छी लगती है इसलिए मैं छुप कर सुनता रहता हूँ| ये जरूरी नहीं कि
हम रोज गुरू के चरणों में अरदास करते हैं तो गुरू हमारी सुनते नहीं हो सकता है कि
गुरू को हमारी अरदास पसंद हो इसलिए बार बार सुनना चाहते हैं सतगुरू जी हमारी हर
मोड़ पर संभाल करते हैं इसलिए हर हाल में जैसा भी वक्त हो हमें हर पल शुकराना करना
चाहिए और हमेशा खुश रहना चाहिए|
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