Monday, May 11, 2020

परम संत रैदास जी


रैदास का जीवन
रैदास का जन्म काशी में चर्मकार (चमार) कुल में हुआ था। उनके पिता का नाम संतो़ख दास (रग्घु) और माता का नाम कर्मा देवी बताया जाता है। रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया था। जूते बनाने का काम उनका पैतृक व्यवसाय था और उन्होंने इसे सहर्ष अपनाया। वे अपना काम पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे और समय से काम को पूरा करने पर बहुत ध्यान देते थे। उनकी समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे। प्रारम्भ से ही रैदास बहुत परोपकारी तथा दयालु थे और दूसरों की सहायता करना उनका स्वभाव बन गया था। साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष आनन्द मिलता था। वे उन्हें प्राय: मूल्य लिये बिना जूते भेंट कर दिया करते थे। उनके स्वभाव के कारण उनके माता-पिता उनसे अप्रसन्न रहते थे। कुछ समय बाद उन्होंने रैदास तथा उनकी पत्नी को अपने घर से अलग कर दिया। रैदास पड़ोस में ही अपने लिए एक अलग झोपड़ी बनाकर तत्परता से अपने व्यवसाय का काम करते थे और शेष समय ईश्वर-भजन तथा साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे। उनके जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं से समय तथा वचन के पालन सम्बन्धी उनके गुणों का पता चलता है। एक बार एक पर्व के अवसर पर पड़ोस के लोग गंगा-स्नान के लिए जा रहे थे। रैदास के शिष्यों में से एक ने उनसे भी चलने का आग्रह किया तो वे बोलेगंगा-स्नान के लिए मैं अवश्य चलता किन्तु एक व्यक्ति को जूते बनाकर आज ही देने का मैंने वचन दे रखा है। यदि मैं उसे आज जूते नहीं दे सका तो वचन भंग होगा। गंगा स्नान के लिए जाने पर मन यहाँ लगा रहेगा तो पुण्य कैसे प्राप्त होगा ? मन जो काम करने के लिए अन्त:करण से तैयार हो वही काम करना उचित है। मन सही है तो इसे कठौते के जल में ही गंगास्नान का पुण्य प्राप्त हो सकता है। कहा जाता है कि इस प्रकार के व्यवहार के बाद से ही कहावत प्रचलित हो गयी कि - मन चंगा तो कठौती में गंगा। उनका विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित-भावना तथा सद्व्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है। अभिमान त्याग कर दूसरों के साथ व्यवहार करने और विनम्रता तथा शिष्टता के गुणों का विकास करने पर उन्होंने बहुत बल दिया। अपने एक भजन में उन्होंने कहा है-
कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।
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साधू द्वारा पारस देना
रैदास नाम के एक बड़े भगवद्भक्त थे| वे काशी में रहते थे| गंगा के घाट के पास ही उनकी झोंपड़ी थी, जिसमें वे अपनी पत्नी के साथ रहते थे और झोंपड़ी के बाहर बैठकर जूते गांठते रहते थेअपनी मेहनत-मजदूरी से उन्हें जो मिल जाता वे उसी में संतोष करते और मस्ती का जीवन बिताते| काम से समय मिलता तो सत्संग में चले जाते| कमाई बड़ी कम थी, पर उसकी उन्हें चिंता न थी| उनकी स्त्री बड़ी भली थी| पति को जो भी मिलता, उसी में खुशी-खुशी गुजर-बसर कर लेती थी|  एक दिन एक साधु रैदास के पास आया| उनकी दीनदशा देखकर उसने अपनी झोली में से एक पत्थर निकालकर बोला - "रैदास लो, यह पारस पत्थर है| लोहे को सोना बना देता है|"=
इतना कहकर साधु ने लोहे का एक टुकड़ा लिया और सोना बनाकर दिखा दिया|
रैदास ने कहा - "महाराज, आप अपनी इस नियामत को अपने पास ही रहने दीजिए| मुझे नहीं चाहिए| मैं किसी की दी हुई मदद नहीं लेता| अपनी मेहनत से जितना काम लेता हूं, उसी में अपनी घर-गृहस्थी चला लेता हूं|"
साधु ने बड़ी ममता से कहा - "रैदास, आदमी को अच्छी तरह से रहना चाहिए| देखो तो तुम्हारी कुटिया की क्या हालत हो रही है!"
रैदास बोले - "स्वामी जी हमें अपनी इस जिंदगी से बड़ा सुख-संतोष है| पसीने की कमाई का अपना ही आनंद होता है| वही असली बात है|"
साधु ने बहुत आग्रह किया, पर रैदास नहीं माने| उन्होंने कहा - "स्वामी जी आपको यह पारस किसी को देना ही हो तो राजा को दीजिए| वह बड़ा गरीब है| उसे हर घड़ी रुपए की जरूरत रहती है या फिर दीजिए गरीब मन वाले उस धनी को, जो रात-दिन पैसे के पीछे पड़ा रहता है|"
रैदास ने आगे और बात नहीं की| वह जूते गांठने में लग गए| बेचारा साधु अपना-सा मुंह लेकर चला गया
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मन चंगा तो कठौती में गंगा
संत रविदास जूते बनाने का काम करते थे। जिस रास्ते पर वे बैठते थे, वहां से कई ब्राह्मण गंगा स्नान के लिए जाते थे। एक बार एक एक पंडित ने संत रविदास से गंगा स्नान को चलने के लिए कहा तब उन्होंने कि पंडित जी मेरे पास समय नहीं है पर मेरा एक काम कर दीजिए, फिर अपनी जेब में से चार सुपारी निकालते हुए कहा कि ये सुपारियां मेरी ओर से गंगा मईया को दे देना। पंडितजी ने गंगा स्नान के बाद गंगा में सुपारी डालते हुए कहा कि रविदास ने आपके लिए भेजी हैं। तभी गंगा मां प्रकट हुईं और पंडितजी को एक कंगन देते हुए कहा कि यह कंगन मेरी ओर से रविदास को दे देना। हीरे जड़े कंगन को देख कर पंडित के मन में लालच आ गया और उसने कंगन को अपने पास ही रख लिया। कुछ समय बाद पंडित ने वह कंगन राजा को भेंट में दे दिया। रानी ने जब उस कंगन को देखा तो प्रसन्न होकर दूसरे कंगन की मांग करने लगीं। राजा ने पंडित को बुलाकर दूसरा कंगन लाने को कहा। पंडित घबरा गया क्योंकि उसने संत रविदास के लिए दिया गया कंगन खुद रख लिया था और उपहार के लालच में राजा को भेंट कर दिया था। वह संत रविदास के पास पहुंचा और पूरी बात बताई।  तब संत रविदास ने अपनी कठौती (पत्थर का बर्तन जिसमें पानी भरा जाता है) में जल भर कर भक्ति के साथ मां गंगा का आवाह्न किया। गंगा मईया प्रसन्न होकर कठौती में प्रकट हुईं और रविदास की विनती पर दूसरा कंगन भी भेंट किया। इसीलिए कहा जाता है कि मन चंगा तो कठौती में गंगा।
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