श्री
कृष्ण लीला पण्डित जी के साथ
एक बार नन्द जी के
घर में एक ब्राह्मण देवता आये उनको प्रणाम सत्कार करने के बाद यशोदा माता ने भोजन
के लिए उनसे विनय की| इस पर पंडित जी ने कहा कि भोजन तो करना ही है| नंद रानी ने
कच्चा सीदा- आटा, घी, दूध, चावल, मीठा आदि सब दे दिया| पंडित जी ने चौका लीपा,
बर्तन साफ़ किये और लगे भोजन बनाने उन्होंने बड़े परिश्रम से भोजन तैयार किया| उस
समय भगवान श्री कृष्ण जी की आयु लगभग तीन वर्ष की होगी| जब भोजन तैयार हो गया तो
थाली में भोजन रखकर दिल में प्रार्थना करने लगे – ‘ऐ दीन दयाल, यह भोजन आपके लिए
ही बनाया गया है| आप इसे स्वीकार करे- आपका दिया हुआ प्रसाद मुझे मिले- यही मेरे
मन की एकमात्र अभिलाषा है| आप मेरी इच्छा को पूर्ण करे| मैं आपका प्रसाद पाकर
कृतार्थ हो जाँऊ|’ ब्राह्मण देवता नेत्र मूँदे प्रार्थना कर ही रहे थे कि इतने में
बाल रूप भगवान श्री कृष्ण जी आ पहुँचे और उस ब्राह्मण की सच्ची श्रद्धा देख कर
नन्हे-2 हाथों से खीर पूड़ी का भोग लगाने लगे| जब पंडित जी ने आँखे खोली तो देखते
है कि बाल ‘मोहन’ दोनों हाथों से खीर खा रहे है| यह देखते ही पंडित जी उच्च स्वर
में शोर मचाने लगे- ‘नंदरानी, ओ नंदरानी, तेरे इस चंचल बालक ने तो मेरा बना
बनाया भोजन खराब और झूठा कर दिया है|’
पंडित जी की यह बात सुनकर यशोदा बोली-पंडित जी अबोध बालक है- आप दुखी न होवे| यहाँ
किसी चीज की कमी नहीं, आपकी कृपा से सब कुछ बहुत है जितना भी आटा, घी, माखन, दूध,
चावल आदि चाहिए तो और ले लीजिए और कन्हैया की झूठी रोटी हमें दे दीजिए, हम खा
लेंगे| आप अपने लिए और शुद्ध भोजन बना लेवे|’ ब्राह्मण ने दोबारा कच्चा सीदा लेकर
चौका इत्यादि पुन: लीपा, कृष्ण के झूठे बर्तन साफ़ किये और तब लगे भोजन बनाने| लगभग
एक घंटे में पुन भोजन तैयार हो गया तथा पंडित जी फिर से नेत्र बंद कर उसी प्रकार
भोग लगाने के लिए भगवान से विनय करने करने लगे| इतने में लीलाधारी, श्याम सुन्दर
फिर आ धमके और लगे खीर खाने| जैसे ही पंडितजी ने नेत्र खोले तो फिर भगवान बाल
कृष्ण को खीर खाते देखा और घबरा कर बोले – ‘अरी यशोदे, यह तेरा बालक बड़ा नटखट है
फिर खाना झूठा कर गया| इस ने सब गुड गोबर कर दिया|’ यह सुनकर माता यशोदा गुस्से
में आ गई, आते ही एक तमाचा कृष्ण के कोमल मुख पर लगाती हुई बोली- ‘अरे निगोड़े, तू
बड़ा चंचल है| चल तुझे अंदर बंद करती हूँ| इतना कहते हुए बालक को बाँह से पकड़कर
कमरे में ले गई| उसे अंदर कमरे में बंद कर बाहर से दरवाजे पर कुण्डी चढ़ा दी|
ब्राह्मण देवता को अब तीसरी बार फिर भोजन बनाना पड़ा| यशोदा जी ने सब समान फिर से
पंडित जी को दिया और दीनता से हाथ जोड़कर कहने लगी– ‘महाराज| अबोध बालक है| आप
बच्चे के उत्पात को न देखे| फिर से भोजन बनाने का कष्ट कर लेवे|’ पंडित जी ने फिर
से सब काम किया- चौका लीपा, बर्तन साफ़ किये, चूल्हा जलाया और भोजन तैयार किया|
तीसरी बार जब भोजन बनाने लगे तब इधर-उधर फटे नेत्रों से देखने लगे कि कही फिर से
वह बालक मेरे भोजन को न लेवे इतने में यशोदा जी ने आकर पंडित जी को सांत्वना दी कि
आप चिंता न करे| मैंने उसे कमरे में बंद कर दिया है| पंडित जी उसकी बात से
निश्चिंत हो गए| देवयोग से माता यशोदा किसी काम के लिए उस कमरे में गई जहाँ कृष्ण
को बंद किया था| बाहर निकलते समय कुण्डी लगाना भूल गई, एवं कृष्ण जी दिखाई भी नहीं
दिये| क्योंकि बाल कृष्ण तो कोने में दुबका बैठा था| अब तीसरी बार भोजन बनाकर पंडित जी
नेत्र बंद कर श्रद्धा से भगवान की स्तुति करने लगे- ‘प्रभो| आप तो कृपानिधान है| यह तीसरी बार
मैंने भोजन बनाया है, आप कृपा करे| आपके भोग लगाने से से ही मेरी मेहनत सफल हो
सकती है| आ जाइये भगवान| पंडित जी आँखे बंद किये प्रार्थना कर ही रहे थे कि कृष्ण
कन्हाई फिर आ पहुँचे और लगे तीसरी बार भोग लगाने| थोड़ी देर बाद पंडित जी ने जब
आँखे खोली तो बहुत जोर से चिल्लाये – हाय|
अनर्थ अरी यशोदे| ले अब भी तेरा
बालक किये कराये पर पानी फेर गया| पंडित जी के दुःख भरे वचनों को सुनकर यशोदा
गुस्से से लाल- पीली होने लगी और लाठी हाथ में लेकर दौड़ी हुई आई| बालक कृष्ण को
लाल आँखे और लाठी दिखाकर बोली अरे, ओ नटखट कन्हैया| तू कितना हठी हुआ जा रहा है,
जो तूने तीसरी बार भी पंडित जी के भोजन को छू लिया| जब माता यशोदा ने बालक मोहन से
इस प्रकार कहा तब उस समय कृष्ण मुरारी रोती सूरत बनाकर तोतली वाणी से यह मधुर शब्द
बोलने लगे-
मैंया मोहि जनि दोष
लगावे, बार -2 यह मोहि बुलावे|
हाथ जोड़ कहे प्रभु
आइयो, खीर खाँड का भोजन पियो||
तब मैं रह न सकूँ,
उठ धाऊँ, या को राँधा भोजन खाऊ|
सुनत ही गढ़ मृदु
हरी के बैना, खुल गये विप्र रोय के नैना||
हे मैंया, अब आप ही
पंडित जी से पूछ लीजिए कि वे स्वयं तो
मुझे हाथ जोड़कर बुलाते है तथा जब मैं नहीं आता तो मेरी मिन्नतें करने लगते
है और बड़ी श्रद्धा से बुलाते हैं| बार-2 खीर खाने का आग्रह करते है| आपके भय से
मैं इनके पास जब नहीं आता तो फिर ब्राह्मण देवता पुन: मुझे भोग लगाने के लिए विवश
करते है| इस पर जब मैं इनकी प्रार्थना स्वीकार कर खीर पूड़ी इत्यादि खाने लगता हूँ
और ये प्रत्यक्ष में मुझे खाते देखते हैं तब आपको बुलाते हैं और चिल्लाने लगते
हैं| भगवान श्री कृष्ण जी के मुख से यह वचन सुनकर ब्राह्मण देवता की आँखे खुल गई
और अब वे मन-ही-मन अपनी करनी पर अति लज्जित हुए| उन्हें पूर्ण रूप से विश्वास हो गया
कि यह निश्चित रूप से बाल रूप में साक्षात् परब्रह्म है|
*****
दिल
चुराने आता हूँ
एक
बार ब्रिज की गोप बालाओं ने श्री कृष्ण जी से पूछा कि आपके बाबा के घर में हजारों
गाय है आपके घर में किसी दूध, दही, माखन किसी चीज की कमी नहीं है, आप फिर भी हमारे घरों में ही माखन
चुराने क्यों आते है तब
श्री कृष्ण जी ने भोले भाव से कहा कि मैं तुम्हारे घर माखन चोरी करने नहीं बल्कि
तुम्हारा दिल चुराने आता हूँ|
*****
श्री कृष्ण जी के मुख में पूरा ब्रह्माण्ड
एक बार बलराम सहित ग्वाल-बाल खेलते-खेलते यशोदा के पास पहुँचे और यशोदाजी से कहा-
माँ! कृष्ण ने तो आज मिट्टी खाई है। यशोदा ने कृष्ण के हाथों को पकड़ लिया और धमकाने लगी कि तुमने मिट्टी क्यों खाई है। यशोदा को यह भय था कि मिट्टी खाने से इसको कोई रोग न लग जाए। कृष्ण तो इतने भयभीत हो गए थे कि वे माँ की ओर आँख भी नहीं उठा पा रहे थे। तब यशोदा ने कहा- नटखट तूने एकान्त में मिट्टी क्यों खाई। बलराम सहित और भी ग्वाल इस बात को कह रहे हैं। कृष्ण ने कहा- मिट्टी मैंने नहीं खाई है। ये सभी लोग मिथ्या कह रहे हैं। यदि आप उन्हें सच्चा मान रही हैं तो स्वयं मेरा मुख देख ले। माँ ने कहा यदि ऐसा है तो तू अपना मुख खोल। लीला करने के लिए उस छोटे बालरूप धारी सर्वेश्वर सम्पन्न श्री
कृष्ण ने अपना मुख माँ के समक्ष खोल दिया। यशोदा ने जब मुख के अंदर झाँका तब उन्हें उसमें चर-अचर संपूर्ण विश्व दिखाई पड़ने लगा। अंतरिक्ष, दिशाएँ, द्वीप, पर्वत, समुद्र सहित सारी पृथ्वी प्रवह नामक वायु, विद्युत, तारा सहित स्वर्गलोक, जल, अग्नि, वायु, आकाश, अपने अधिष्ठाताओं एवं शब्द आदि विषयों के साथ दसों इंद्रियाँ सत्व, रज, तम इन तीनों तथा मन, जीव, काल, स्वभाव, कर्म, वासना आदि से लिंग शरीरों का अर्थात चराचर शरीरों का जिससे विचित्र विश्व एक ही काल में दिख पड़ा। इतना ही नहीं,
यशोदा ने उनके मुख में ब्रज के साथ स्वयं अपने आपको भी देखा। इन बातों से उन्हें तरह-तरह के तर्क-वितर्क होने लगे। यह क्या मैं स्वप्न देख रही हूँ या देवताओं की कोई माया है अथवा मेरी बुद्धि ही व्यामोह है अथवा इस मेरे बच्चे का ही कोई स्वाभाविक अपना प्रभावपूर्ण चमत्कार है। अन्त में उन्होंने यही दृढ़ निश्चय किया कि अवश्य ही इसी का चमत्कार है और निश्चय ही ईश्वर इसके रूप में आए हैं। तब उन्होंने कृष्ण की स्तुति की जो चित्त,
मन, कर्म, वचन तथा तर्क की पहुँच से परे इस सारे ब्रह्मांड का आश्रय है। जिसके द्वारा बुद्धि वृत्ति में अभिव्यक्त प्रकाश से इसकी प्रतीति होती है। उस अचिन्त्य शक्ति परब्रह्म को मैं नमस्कार करती हूँ। कृष्ण ने जब देखा कि माता यशोदा ने मेरा तत्व पूर्णतः समझ लिया है तब उन्होंने तुरंत पुत्र स्नेहमयी अपनी शक्ति रूप माया विस्तृत कर दी जिससे यशोदा क्षण में ही सबकुछ भूल गई। उन्होंने कृष्ण को उठाकर अपनी गोद में बैठा लिया। उनके हृदय में पूर्व की भाँति पुनः अपार वात्सल्य का रस उमड़ गया।
*****
पूतना की कथा
पूतना एक महिला दैत्य थी जिसका प्रसंग पुराण में आता है। कंस
ने मथुरा के राजा वसुदेव से उनका राज्य छीनकर अपने अधीन कर लिया तथा स्वयं शासक
बनकर आत्याचार करने लगा। एक भविष्यवाणी द्वारा उसे पता चला कि वसुदेव और देवकी का
आठवाँ पुत्र उसके विनाश का कारण होगा। यह जानकर कंस व्याकुल हो उठा और उसने
वासुदेव तथा देवकी को कारागार में डाल दिया। कारागार में जन्म लेने वाले देवकी के
छः पुत्रों को कंस ने मौत के घाट उतार दिया। आठवें पुत्र के रूप में कृष्ण का जन्म
हुआ और उनके प्रताप से कारागार के द्वार खुल गए। वसुदेव रातों रात कृष्ण को गोकुल
में नंद और यशोदा के घर पर रखकर उनकी नवजात कन्या को अपने साथ लेते आए। कंस ने जब
इस कन्या को मारना चाहा तो वह अदृश्य हो गई और आकाशवाणी हुई कि कंस को मारने वाले
तो गोकुल में जन्म ले चुका है। कंस यह सुनकर डर गया और उसने उसदिन गोकुल में जन्म
लेने वाले हर शिशु की हत्या कर देने की योजना बनाई। इसके लिए उसने अपने आधीन काम करने
वाली पूतना नामक राक्षसी का सहारा लिया। वह सुंदर रूप बना सकती थी और महिलाओं में
आसानी से घुलमिल जाती थी। उसका कार्य स्तनपान के बहाने शिशुओं को विषपान कराना था।
अनेक शिशु उसका शिकार हुए लेकिन कृष्ण उसकी सच्चाई को समझ गए और उन्होंने पूतना का
वध कर दिया।
पूतना कौन थी ? पूतना कोई साधारण स्त्री नहीं थी।
पूर्वकाल में वह राजा बलि की बेटी थी, राजकन्या थी। भगवान वामन आए तो उनका रूप सौन्दर्य देखकर उस राजकन्या
को हुआ कि 'मेरी सगाई हो गई है। काश, मुझे ऐसा ही बेटा हो तो मैं गले
लगाऊं और उसको अपना खूब दूध पिलाऊं।' परंतु जब नन्हा मुन्ना वामन विराट
हो गया और उसने बलि राजा का सर्वस्व छीन लिया तो वह क्रोधित हो गई "मैं इसको
दूध पिलाऊं? नहीं इसको तो मैं जहर पिलाऊं, जहर!'
कालांतर
में वही राजकन्या पूतना हुई। संयोग ऐसा बैठा कि विष्णु अवतार कान्हा को दूध भी
पिलाया और जहर भी। उसे भगवान ने अपने स्वधाम भेज दिया।
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कान्हा
का भाव
एक
बार यशोदा माँ यमुना मे दीप दान कर रही थी, वो
पत्ते मे दीप रखकर प्रवाह कर रही थी वो देख रही थी कोई दीप आगे नही जा रहा|
ध्यान से देखा तो
कान्हा जी एक लकडी लेकर जल से सारे दीप बाहर निकाल रहे थे, तो
माँ कहती है लला तू ये का कर रहो है| कान्हा कहते है| माँ ये सब डूब रहे थे तो मै
इन्हे बचा रहा हूँ| माँ ये सब सुनकर हँसने लगी और बोली लला
तू केको केको (किसको -2) बचायेगा| ये सुनकर कान्हा
जी ने बहुत सुन्दर जवाब दिया| माँ मैंने सब को ठेको थोड़ी ना ले रखों है। जो मेरे धोरे
आएंगे उनको बचाऊंगा|
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सुदामा की
निर्धनता
सुदामा गोकुल नगरी का एक ब्राह्मण था| वह बड़ा निर्धन था| वह श्री कृष्ण जी के
साथ एक ही पाठशाला में पढ़ा करता था| उस समय वह बच्चे थे|
बचपन में कई बच्चों का आपस में बहुत
प्यार हो जाता है, वे बच्चे चाहे गरीब
हो या अमीर, अमीरी और गरीबी का
फासला बचपन में कम होता है| सभी बच्चे या विद्यार्थी शुद्ध हृदय के साथ मित्र और भाई बने
रहते हैं| सुदामा और कृष्ण जी का
आपस में अत्यन्त प्रेम था, वह सदा ही इकट्ठे रहते|
जिस समय उनके गुरु उनको किसी
कार्य के लिए भेजते तो वे इकट्ठे चले जाते,
बेशक नगर में जाना हो या किसी जंगल में
लकड़ी लेने| दोनों के प्रेम की
बहुत चर्चा थी| सुदामा जब पढ़ने के लिए जाता था तो
उनकी माता उनके वस्त्र के पलड़े में थोड़े-से भुने हुए चने बांध दिया करती थी| सुदामा उनको खा लेता था, ऐसा ही होता रहा| एक दिन गुरु जी ने श्री कृष्ण और
सुदामा दोनों को जंगल की तरफ लकड़ियां लेने भेजा| जंगल में गए तो वर्षा शुरू हो गई| वे एक वृक्ष के नीचे बैठ गए| बैठे-बैठे सुदामा को याद आया कि उसके
पास तो भुने हुए चने हैं, वह ही खा लिए जाए| वह श्री कृष्ण से
छिपा कर चने खाने लगा| उसे इस तरह देख कर श्री कृष्ण जी ने
पूछा-मित्र! क्या खा रहे हो? सुदामा से उस समय झूठ बोला गया| उसने कहा-सर्दी के कारण दांत बज रहे
हैं, खा तो कुछ नहीं रहा, मित्र! उस समय सहज स्वभाव ही श्री कृष्ण जी के
मुख से यह शब्द निकल गया -'सुदामा! तुम तो बड़े कंगाल हो, चनों के लिए अपने मित्र से झूठ बोल
दिया|' यह
कहने की देर थी कि सुदामा के गले दरिद्र और कंगाली पड़ गई, कंगाल तो वह पहले ही था| मगर अब तो श्री कृष्ण ने
वचन कर दिया था| यह वचन जानबूझ कर
नहीं सहज स्वभाव ही श्री कृष्ण के
मुख से निकल गया, पर सत्य हुआ| सुदामा और अधिक कंगाल हो गया|
*****
सुदामा का प्रेम
सुदामा एक गरीब ब्राह्मण
था। वह और उसका परिवार अत्यंत गरीबी तथा दुर्दशा का जीवन व्यतीत कर रहा था। कई-कई दिनों तक उसे बहुत थोड़ा खा कर ही गुजारा करना पड़ता था। कई बार तो उसे भूखे पेट भी सोना पड़ता था। सुदामा अपने तथा अपने परिवार की दुर्दशा के लिए स्वयं को दोषी मानता था। उसके मन में कई बार आत्महत्या
करने का भी विचार आया। दुखी मन से वह कई बार अपनी पत्नी से भी अपने विचार व्यक्त किया करता था। उसकी पत्नी उसे दिलासा देती रहती थी। उसने सुदामा को एक बार अपने परम मित्र श्री कृष्ण, जो उस समय द्वारिका के राजा हुआ करते थे, की याद दिलाई। बचपन में सुदामा तथा श्री कृष्ण
जी एक साथ रहते थे तथा संदीपन मुनि के आश्रम में दोनों ने एक साथ शिक्षा ग्रहण की थी। सुदामा की पत्नी ने सुदामा को उनके पास जाने का आग्रह किया और कहा, “श्री कृष्ण जी बहुत दयावान हैं, इसलिए वे हमारी सहायता अवश्य करेंगे।’ सुदामा ने संकोच-भरे स्वर में कहा, “श्री कृष्ण जी एक पराक्रमी राजा हैं और मैं एक गरीब ब्राह्मण हूँ। मैं कैसे उनके पास जाकर सहायता माँग सकता हूँ?’ उसकी पत्नी ने तुरंत उत्तर दिया, “तो क्या हुआ? मित्रता में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं होता। आप उनसे अवश्य सहायता माँगें। मुझसे बच्चों की भूख-प्यास नहीं देखी जाती।’ अंततः सुदामा श्री कृष्ण जी के पास जाने को राजी हो गया। उसकी पत्नी पड़ोसियों से थोड़े-से चावल माँगकर ले आई तथा सुदामा को वे चावल अपने मित्र को भेंट करने के लिए दे दिए। सुदामा द्वारिका
के लिए रवाना हो गया। महल के द्वार पर पहुँचने पर वहाँ के पहरेदार ने सुदामा को महल के अंदर जाने से रोक दिया। सुदामा ने कहा कि वह यहाँ के राजा श्री कृष्ण
जी का बचपन का मित्र है तथा वह उनके दर्शन किए बिना वहाँ से नहीं जाएगा। श्री कृष्ण जी के कानों तक भी यह बात पहुंची। उन्होंने
जैसे ही सुदामा का नाम सुना, उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। वे नंगे पाँव ही सुदामा से भेंट करने के लिए दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया तथा दोनों के नेत्रों से खुशी के आँसू निकल पड़े। श्री कृष्ण
सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल के अंदर ले गए। उन्होंने स्वयं सुदामा के मैंले पैरों को धोया। उन्हें अपने ही सिंहासन पर बैठाया। श्री कृष्ण
की पत्नियाँ भी उन दोनों के आदर-सत्कार में लगी रहीं। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। भोजन करते समय जब श्री कृष्ण
ने सुदामा से अपने लिए लाए गए उपहार के बारे में पूछा तो सुदामा लज्जित हो गया तथा अपनी मैंली-सी पोटली में रखे चावलों को निकालने में संकोच करने लगा। परंतु श्री कृष्ण
ने वह पोटली सुदामा के हाथों से छीन ली तथा उन चावलों को बड़े चाव से खाने लगे। भोजन के उपरांत श्री कृष्ण ने सुदामा को अपने ही मुलायम बिस्तर पर सुलाया तथा खुद वहाँ बैठकर सुदामा के पैर तब तक दबाते रहे जब तक कि उसे नींद नहीं आ गई। कुछ दिन वहीं ठहर कर सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। श्री कृष्ण
ने अपने परिवारजनों के साथ सुदामा को प्रेममय विदाई दी। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारिका
आने का सही कारण न बता सका तथा वह बिना अपनी समस्या निवारण के ही वापस अपने घर को लौट गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपनी पत्नी तथा बच्चों को क्या जवाब देगा, जो उसका बड़ी ही बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। सुदामा के सामने अपने परिवारजनों
के उदास चेहरे बार-बार आ रहे थे। परंतु इस बीच श्री कृष्ण अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे। सुदामा की टूटी झोंपड़ी एक सुंदर एवं विशाल महल में बदल गई थी। उसकी पत्नी तथा बच्चे सुंदर वस्त्र तथा आभूषण धारण किए हुए उसके स्वागत के लिए खड़े थे। श्री कृष्ण
की कृपा से ही वे धनवान बन गए थे। सुदामा को श्री कृष्ण से किसी प्रकार की सहायता न ले पाने का मलाल भी नहीं रहा। वास्तव में श्री कृष्ण
सुदामा के एक सच्चे मित्र साबित हुए थे, जिन्होंने गरीब सुदामा की बुरे वक्त में सहायता की।
*****
गोवर्धन पर्वत
जब
नन्द गांव में इंद्र यज्ञ की तैयारी
हो रही थी तब श्री कृष्ण जी नन्द गांव में पहुँचे तो कृष्ण जी ने देखा की सारे नन्द गाँव
में इंद्र यज्ञ की तैयारी हो रही हैं। 56 तरह
के भोग बनाये जा रहे हैं,
36 तरह के व्यंजन बन रहे
हैं। कृष्ण ने नन्द बाबा से पूछा- बाबा आज ऐसा कौन सा उत्सव होने जा रहा हैं जिसकी
सब तैयारी हो रही हैं। भगवान बोले की इस यज्ञ का फल क्या हैं? और
यह किस तरह सम्पन होगा?
आप मुझे बताइये।
नन्द बाबा थोड़ी देर चुप रहे फिर बोले कि बेटा! यह
उत्सव भगवान इंद्र के लिए हो रहा हैं। चूँकि वर्षा के राजा इंद्र हैं। और जब बारिश
होती हैं तो हमारी फसलों को पानी मिलता हैं। जिससे हम सब ब्रजवासी फलते फूलते हैं।
क्योंकि जल के बिना जीवन संभव नही। और वर्षा बिना किसी का फलना फूलना सम्भव नही
हैं। इंद्र हमारे सुख-दुःख का दाता हैं। इसलिए हम यह यज्ञ इंद्र भगवान के लिए कर
रहे हैं। भगवान ने सोचा की घर में भगवान बैठा हैं और कर रहे हैं इंद्र की
पूजा। भगवान बोले की इंद्र हमारे सुख दुःख का दाता नहीं हैं। सुख दुःख के दाता हैं
हमारे कर्म।
कर्मणा
जायते जन्तुः कर्मणौव प्रलीयते ।
सुखं
दुः खं भयं क्षेमं कर्मणैवाभिपद्यते ।।
भगवान
कहते हैं आप इंद्र यज्ञ बंद कर दो। भगवान
कहते हैं जो व्यक्ति जैसा कर्म करता हैं वैसा उसको फल मिल जाता हैं। इसमें इंद्र
कुछ नही करता हैं। इंद्र का कोई लेना देना नही हैं। क्योंकि इंद्र को
अभिमान हो गया था और भगवान को अभिमान पसंद नही हैं। भगवान चाहते हैं की मैं इंद्र
को पाठ सिखाऊं। नन्द बाबा बोले कि फिर हम किसकी पूजा करें? हमने
जो 56 भोग बनाये हैं उनको कहाँ प्रयोग में लाएं? भगवान बोले की हमारे देवता हैं ये वन, वृन्दावन, गोवर्धन
पर्वत, हमारी गऊ माता।
आप ऐसा यज्ञ करें जिससे स्थानीय ब्राह्मण और
गोवर्धन पर्वत संतुष्ट हो सके। कृष्ण की बात सुनकर नन्द बाबा बोले की बेटा-
तुम कह रहे हो तो मैं स्थानीय ब्राह्मणों और गोवर्धन पर्वत के लिए एक यज्ञ और करवा
देता हुँ। एक आयोजन और रख देता हुँ। पर तुम मुझे यह इंद्र यज्ञ करने दो। नही तो
इंद्र भगवान नाराज हो जायेंगे। भगवान बोले की-पिताजी, विलम्ब
ना कीजिये। शुभ काम में देरी कैसी। जैसा मैं कहता हुँ आप वैसा कीजिये। आप गोवर्धन
पर्वत और स्थानीय ब्राह्मण को संतुष्ट कर दीजिये। आपने
जो कुछ बनाया हैं- चावल,
दाल, हलवा
, पूरी ,
पकोड़ी , खीर, रसगुल्ला
और लड्डू सभी ब्राह्मणो और गोवर्धन पर्वत को भोग लगाइये। सभी गोवों को सजाकर अच्छा
चारा दीजिये। ब्राह्मणों को दान दीजिये। कुत्तों और चाण्डालों को भी प्रशाद
दीजिये। और
तुरंत ही गोवर्धन की पूजा प्रारम्भ कीजिये। इस
प्रकार भगवान ने इन्द्र की पूजा बंद करवा कर गोवर्धन की पूजा करवाई हैं। सभी ने
गोवर्धन पर्वत को भोग लगाया हैं। गोवर्धन पर्वत भी सभी व्यंजनों का और 56 भोग
का बड़ा आनंद ले रहे हैं। सभी ने गोवर्धन को प्रणाम किया हैं। सभी यह देख कर कि
गोवर्धन पर्वत भोग लगा रहे हैं बड़े खुश हैं। क्योंकि इंद्र ने आज तक भोग नही लगाया
था। गोवर्धन पर्वत में स्वयं भगवान श्री कृष्ण जाकर बैठ गए। एक रूप से खुद पूजा कर
रहे हैं। दूसरे रूप में उनकी ही पूजा हो रही हैं। जब इंद्र को पता चला की कृष्ण ने
मेरी पूजा बंद करवा दी हैं तो नन्द बाबा आदि गोपों पर बहुत क्रोधित हुए। इंद्र को
अपने पद का बड़ा घमंड था। उसने सोचा कि मैं ही इस त्रिलोकी का ईश्वर हुँ। इंद्र ने
क्रोध से तिलमिलाकर अपने मेघों को ब्रज में वर्षा करने को कहा। इंद्र की आज्ञा
मानकर प्रलयकारी मेघों ने मूसलाधार पानी बरसाकर सारे ब्रज को पीड़ित कर दिया। चारों
और बिजली चमक रही हैं। बादल आपस में टकरा रहे हैं। तेज आंधी के साथ साथ बड़े बड़े
ओले भी गिर रहे हैं। खम्बे के समान मोटी-मोटी बुँदे गिर रही हैं। ग्वाल बाल , गोप, पशु
पक्षी और बचे सभी ठण्ड से ठिठुरने लगे। सभी भगवान कृष्ण के पास आये हैं और बोले कि
भगवान हमारी रक्षा करो। भगवान मन में सोचते हैं कि मैं इस ब्रज का रक्षक हुँ और यह
सारा व्रज मेरे आश्रित है। मैं अपनी योगमाया से इसकी रक्षा करूँगा। आज ब्रजवासी कह रहे हैं हे गोपाल जबसे हम आपके चरणों में आये
हैं तबसे हमारा भाग्य खुल गया हैं।
(गुरुदेव कहते है यदि जीव का दुर्भाग्य हैं और हम उसे सद्भाग्य
में बदलना चाहे तो केवल भगवान ही बदल सकते हैं। प्रभु की शरण में जाइये।)
आज ब्रजवासी जब भगवान
के चरणों में आये तो सभी ने कहा की लाला हमारी रक्षा करो। आगे- आगे भगवान हैं और पीछे-पीछे ब्रजवासी हैं। सभी अपने गऊ धन को
लेकर जा रहे हैं। अपने ही स्वरूप गिरिराज महाराज के पास पहुँचे तो भगवान ने
गिरिराज महाराज को प्रणाम किया और अपने बांय हाथ की कनिष्ठा ऊँगली के ऊपर गिरिराज
महाराज को धारण कर लिया।
*****
तपस्वी
को दर्शन
द्वापर युग की बात
है एक तपस्वी साधु जी यमुना नदी के तट पर योग साधना में लीन तपस्या कर रहा था| जब
वह समाधि पर बैठा था तब श्री भगवान का अवतरण नही हुआ था| उन्होंने सुन रखा था कि
भगवान कृष्ण रूप में अवतार लेंगे तथा अनेकों लीलाये करेंगे| वे समाधिस्थ हो गए
उन्हें जगत का कुछ ज्ञान न रहा| लम्बी अवधि के बाद वे समाधि से उठे, तब कृष्ण
भगवान का अवतरण हो चुका था| संयोगवश तपस्वी साधु ने कुछ गोपियों को प्रेममयी कृष्ण
भगवान की लीलाओं का गुणगान करते सुना| तपस्वी ने प्रश्न किया- क्या सचमुच कृष्ण भगवान
गोकुल में अवतार ले चुके हैं? गोपियों ने उन्हें भगवान श्री कृष्ण की लीलायें
सुनाई| तपस्वी ने गोपियों से कहा, ‘क्या आप मेरा काम करेंगी? मैं जीवन भर
तुम्हारा एहसान मानूँगा|’ गोपियों ने कहा – ‘निश्चय ही, क्या कार्य है?’ तपस्वी ने
कहा ‘मुझे दर्शन की अभिलाषा है| अत: आप श्री कृष्ण जी से कहना कि मुझे दर्शन का
सौभाग्य कब मिलेगा| मैं
कई वर्षो से तपस्या कर रहा हूँ|’ गोपियाँ जब भगवान के पास पहुँची तो उन्होंने
भगवान कृष्ण को तपस्वी का सन्देश दिया- भगवान कृष्ण ने उत्तर दिया ‘उसे कह दो कुछ
समय और तपस्या करे तब दर्शन होंगे|’ दूसरे दिन गोपियों ने तपस्वी को भगवान का
उत्तर सुना दिया| तपस्वी को जब उत्तर मिला तो वह प्रेम मग्न हो हर्ष में नाचने लगा
कि भगवान कितने दयालु हैं, जो उसे दर्शन देंगे| उसी समय भगवान श्री कृष्ण जी प्रकट
हो गए, गोपियाँ चकित हो गई कि अभी तो भगवान कह रहे थे कि तपस्वी कुछ वर्ष योग
साधना और करे तो दर्शन होंगे| प्रभु गोपियों की आतंरिक दशा समझ गए| उनका संशय दूर
करने के लिए उन्होंने फरमाया, “अगर
तपस्वी उसी तरह योग साधना करता तो निश्चय ही इतना समय लगता परन्तु उसकी प्रेम दशा
के कारण मुझे शीघ्र आना पड़ा| कहने का मतलब-प्रेम में इतनी शक्ति है कि भगवान को भी
तुरंत आना पड़ता है |
*****
राधे -2 का गायन
एक
बार नारद जी ने देखा कि सारे संसार मे राधे-राधे का गान हो रहा है| कोई कृष्ण का
तो नाम ही नहीं ले रहा, तो वह इसी का जवाब पाने के लिए भगवान श्री कृष्ण जी के पास
जाते है| अब भगवान तो सब कुछ जानते हैं| वह भी लीला करते हैं| नारद जी को आता
देखकर अपने पेट पर हाथ रखकर चिल्लाने लगते हैं, कि मेरे पेट मे दर्द हो रहा है| तो
नारद जी जब यह देखते है कि भगवान श्री कृष्ण के पेट में दर्द हो रहा है और वे दर्द
के कारण चिल्ला रहे हैं तो उन्होंने प्रभु से विनती की कि प्रभु ये दर्द कैसे सही
होगा? मुझे बताये मैं जरुर आपकी मदद करूँगा| तो कृष्ण जी ने फरमाया कि नारद जी
मेरे पेट का दर्द तभी ठीक हो सकता है, जब तुम मेरी किसी रानी के चरणों की धूल ला
दो, उसे खाते ही मेरे पेट का दर्द ठीक हो जायेगा| यही सुनकर नारद जी श्री कृष्ण जी
की रानियों के पास जाते हैं और उन्हें बताते हैं कि श्री कृष्ण जी के पेट में दर्द
हो रहा है तथा वो तभी सही होगा, जब कोई रानी अपने चरणों की धूल देंगी | तो रानियाँ
सोचती है कि अगर हम अपने पति को चरणों की धूल खिलायेगे तो हमें नरक में जगह मिलेगी
और इतना बड़ा कष्ट हम सहन नहीं कर सकते| सभी रानियों ने मना कर दिया| तभी नारद जी
वापिस श्री कृष्ण जी के पास जाते है अब कृष्ण जी और तेज से पेट पर हाथ रखकर
चिल्लाने लगते है| नारद जी बड़ी दुखी अवस्था में बताते है कि प्रभु रानियों ने धूल देने से मना कर
दिया| तब श्री कृष्ण जी नारद जी को राधा के चरणों की धूल लेने को भेजते है| जब
राधा को पता चलता है कि श्री कृष्ण जी के पेट में दर्द हो रहा है| तब वह नारद जी
से पूछती है कि यह ठीक कैसे होगा? तब नारद जी ने बताया कि श्री कृष्ण जी ने उनकी
रानियों की चरण धूलि लेने को कहा था जिसे खाकर वे ठीक हो जाते लेकिन सभी रानियों
ने कहा है कि अगर वे अपने पति को चरण धूलि खिलायेगी तो नरक में जायेंगी इसलिए
उन्होंने मना कर दिया| लेकिन अब श्री कृष्ण जी ने तुम्हारे चरणों की धूल माँगी है,
उससे उनके पेट का दर्द ठीक हो जायेगा| राधा कहती है श्री कृष्ण जी के लिए मुझे नरक
में भी जाना पड़े तो भी कोई चिंता नहीं है| मैं अभी चरणों की धूल देती हूँ| तब नारद
जी वह धूल लेकर श्री कृष्ण जी के पास जाते हैं| श्री कृष्ण जी बताते है कि नारद जी
इसलिए संसार में राधा-राधा हो रही है क्योंकि उसका प्रेम ही निराला है|
*****
राधे
का सच्चा प्रेम
एक
दिन राधा जी सखियों के साथ कहीं बैठी थीं| अचानक
एक सखी की नजर उनके पैर पर चली गई,
उनके पैर में एक घाव से
खून बह रहा था। सबने पूछा कि यह चोट कैसे लगी है? राधा जी ने टालना चाहा अब यह तो इंसान की प्रवृति है, जिस बात को आप जितना
भूलना चाहते हैं, लोग उतना ही उसे जानना चाहते हैं। राधा जी ने कहा कि पुराना घाव
है| एक सखी बोली पुराना कैसे यह खून बह रहा है? पुराना है, तो अब तक सूखा क्यों नहीं? कैसे लगा? क्या इलाज चल रहा है? घाव नहीं भर रहा है कहीं कोई दूसरा रोग न हो! राधा जी से सखियों ने
प्रश्नों की झंडी लगा दी। अब उन्हें पता है कि जिस पर भगवान की कृपा हो उन्हें भयंकर रोग
भला कहां होने वाला है! राधा जी समझ गई कि
अगर उत्तर नहीं दिया तो यह प्रश्न प्रतिदिन होगा। वह बोली एक दिन खेल -२ में मैंने
कन्हैया की बासुंरी छीन ली|
वह अपनी बांसुरी लेने मेरे पीछे दौड़े, बांसुरी की छिना झपटी में अचानक उनके पैर का नाख़ून मेरे पैर पर
लग गया| यह घाव उसी चोट से बना है| परन्तु गोपियों को यकीन नहीं
हुआ। तब उन्होंने राधा जी से पूछा
यह घावं कान्हा के पैर के लगने से हुआ है तो अभी तक सूखा क्यों नहीं? कान्हा को गये तो कई बरस हो गए हैं। राधा जी बोली सूखता
तो तब न, जब मैं इसे सूखने देती| मैं रोज इसे कुरेदकर हरा कर देती हूं। कान्हा रोज़ सपने में
आकर इस घावं का इलाज कर के जाते है| घाव के उपचार के लिए ही सही, कन्हैया मेरे सपने
में आते हैं तो हैं | यदि यह सूख गया तो क्या पता है कि वह भी स्वप्न में आना छोड़
दें।
*****
कृष्ण
अर्पण का भाव
कहते हैं एक औरत श्री
कृष्ण की बहुत बड़ी भक्तानी थी|
वह कुछ भी काम करती तो उसके होने के बाद हमेशा यही बोला करती कि कृष्ण अर्पण| यह बोलने का उसका नियम बन चुका था| कहते हैं प्रेम में कोई नित नियम नहीं
होता| एक समय की बात है
वह भक्तानी कूड़ा फैंक रही थी और कूड़ा फैकने के बाद उसने कहा कि कृष्ण अर्पण| तो नारद जी वहाँ से जा रहे थे तो
उन्होंने जब यह देखा कि यह औरत कूड़ा फैंक कर बोल रही है कृष्ण अर्पण तो उन्होंने
गुस्से में आकर उस भक्तानी को थप्पड़ लगा दिया| अब उस भक्तानी ने थप्पड़ खाया, उसके
बाद फिर उसने यही बात कही कि कृष्ण अरपन|
अब नारद जी वहाँ से चले आये|
जब नारद जी कृष्ण भगवान जी के पास पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि श्री कृष्ण जी के
मुख पर थप्पड़ का निशान पड़ा हुआ है| नारद जी यह देखकर बड़े हैरान हुए उन्होंने श्री
कृष्ण जी से इसका कारण पूछा, तो श्री कृष्ण जी ने बताया कि नारद जी यह थप्पड़ आपने
ही मारा है| तब श्री कृष्ण जी
ने बताया कि वह भक्तानी मेरे प्रेम में इतनी मतवाली है कि हर चीज को मेरे अरपन
करती है प्रेम का कोई नित नियम नहीं होता|
*****
भक्ति
का वर
एक
बार भगवान श्री कृष्ण जी ने नारद जी से कहा कि नारद आज मेरे मन है कि तुम मुझसे
कुछ मांगो| तब नारद जी ने कहा कि प्रभु मैं आपसे क्या मांगू मुझे तो कुछ भी नहीं
चाहिए मैं तो धोती पहनता हूँ हाथ मेरे वीणा है और क्या चाहिए मुझे| तब भगवान ने
कहा कि नहीं नारद कुछ तो मांगना पड़ेगा हमारे कहने से मांग लो तब नारद जी बोले कि
हे प्रभु अगर कुछ देना ही चाहते हो तो जिस भक्ति से प्रसन्न होकर आप मुझे मांगने
के लिए कह रहे हो वो भक्ति ही मुझे प्रदान करो|
*****
गरू दीक्षा
गुरू की महिमा अगम है,
अपार है। भगवान स्वयं
भी लोक कल्याणार्थ जब मानवरूप में अवतरित होते हैं तो गुरूद्वार पर जाते हैं।
राम कृष्ण से कौन
बड़ा, तिन्ह तो
भी गुरू कीन्ह।
तीन लोक के हैं धनी, गुरू
आगे आधीन।।
द्वापर युग में जब भगवान श्री कृष्ण अवतरित हुए और कंस का विनाश हो चुका, तब
श्री कृष्ण शास्त्रोक्त
विधि से हाथ में समिधा लेकर और इन्द्रियों को वश में रखकर गुरूवर सन्दीपनी के आश्रम में गये। वहाँ वे भक्तिपूर्वक गुरू की सेवा करने लगे।
गुरू आश्रम में सेवा करते हुए, गुरू
सन्दीपनी से भगवान श्री कृष्ण ने वेद-वेदांग, उपनिषद, मीमांसादि
षड्दर्शन, अस्त्र-शस्त्र विद्या, धर्मशास्त्र
और राजनीति आदि की शिक्षा प्राप्त की। प्रखर बुद्धि के कारण उन्होंने गुरू के एक
बार कहने मात्र से ही सब सीख लिया। विष्णुपुराण के मत से 64 दिन
में ही श्री कृष्ण
ने सभी 64 कलाएँ सीख लीं। जब अध्ययन पूर्ण हुआ, तब
श्री कृष्ण
ने गुरू से दक्षिणा के लिए प्रार्थना की। “गुरूदेव
! आज्ञा कीजिए, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?”
गुरूः “कोई
आवश्यकता नहीं है।”
श्री कृष्णः
“आपको तो कुछ नहीं चाहिए, किंतु
हमें दिये बिना चैन नहीं पड़ेगा। कुछ तो आज्ञा करें !”
गुरूः “अच्छा जाओ,
अपनी माता से पूछ लो।”
श्री कृष्ण
गुरूपत्नी के पास गये और बोलेः “माँ
! कोई सेवा हो तो बताइये।”
गुरूपत्नी जानती थीं
कि श्री कृष्ण
कोई साधारण मानव नहीं बल्कि स्वयं भगवान हैं, अतः
वे बोलीः “मेरा पुत्र प्रभास क्षेत्र में मर गया है। उसे लाकर दे दो ताकि
मैं उसे पयः पान करा सकूँ।”
श्री कृष्णः
“जो आज्ञा।”
श्री कृष्ण
रथ पर सवार होकर प्रभास क्षेत्र पहुँचे और वहाँ समुद्र तट पर कुछ देर ठहरे। समुद्र
ने उन्हें परमेश्वर जानकर उनकी यथायोग्य पूजा की। श्री कृष्ण बोलेः “तुमने
अपनी बड़ी बड़ी लहरों से हमारे गुरू पुत्र
को हर लिया था। अब उसे शीघ्र लौटा दो।”
समुद्रः “मैंने
बालक को नहीं हरा है,
मेरे भीतर पंचजन नामक
एक बड़ा दैत्य शंखरूप से रहता है, निसंदेह
उसी ने आपके गुरूपुत्र का हरण किया है।”
श्री कृष्ण
ने तत्काल जल के भीतर घुसकर उस दैत्य को मार डाला, पर
उसके पेट में गुरूपुत्र नहीं मिला। तब उसके शरीर का पांचजन्य शंख लेकर श्री कृष्ण जल
से बाहर आये और यमराज की संयमनी पुरी में गये। वहाँ भगवान ने उस शंख को बजाया।
कहते हैं कि उस ध्वनि को सुनकर नरक के
जीवों के पाप नष्ट हो जाने से वे सब वैकुंठ पहुँच गये। यमराज ने बड़ी भक्ति के साथ
श्री कृष्ण
की पूजा की और प्रार्थना करते हुए कहाः “हे
लीलापुरूषोत्तम ! मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?”
श्रीकृष्णः “तुम
तो नहीं, पर तुम्हारे दूत कर्मबंधन के अनुसार हमारे गुरूपुत्र को यहाँ ले
आये हैं। उसे मेरी आज्ञा से वापस दे दो।” ‘जो आज्ञा’ कहकर
यमराज उस बालक को ले आये। श्री कृष्ण ने गुरूपुत्र को, जैसा
वह मरा था वैसा ही उसका शरीर बनाकर, समुद्र
से लाये हुए रत्नादि के साथ गुरूचरणों में अर्पित करके कहा, “गुरूदेव
! और जो कुछ भी आप चाहें,
आज्ञा करें।”
गुरूदेवः “वत्स
! तुमने गुरूदक्षिणा भली प्रकार से संपन्न कर दी। तुम्हारे जैसे शिष्य से गुरू की
कौन-सी कामना अवशेष रह सकती है ? वीर
! अब तुम अपने घर जाओ। तुम्हारी कीर्ति श्रोताओं को पवित्र करे और तुम्हारी पढ़ी
हुई विद्या नित्य उपस्थित और नित्य नवीन बनी रहकर इस लोक तथा परलोक में तुम्हारे
अभीष्ट फल को देने में समर्थ हों।”
गुरूसेवा का कैसा सुंदर आदर्श प्रस्तुत किया
है श्री कृष्ण ने! थे तो भगवान, फिर
भी गुरू की सेवा उन्होंने स्वयं की है। सत्शिष्यों को पता होता है कि गुरू की एक छोटी सी सेवा करने से
सकामता निष्कामता में बदलने लगती है, खिन्न
हृदय आनंदित हो उठता है,
सूखा हृदय भक्तिरस से
सराबोर हो उठता है। गुरूसेवा में क्या आनंद आता है, यह
तो किसी सत्शिष्य से ही पूछकर देखें।
*****
श्री
कृष्ण जी की परीक्षा
एक बार श्री कृष्ण
जी के गुरु दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों के साथ कही जा रहे थे| रास्ते में किसी जंगल
में रूककर उन्होंने आराम किया| उसी के पास ही द्वारका नगरी थी| दुर्वासा ऋषि ने
अपने शिष्यों को भेजा कि श्री कृष्ण को बुला कर लाओ| तब उनके शिष्य द्वारका गये और
द्वारकाधीश को उनके गुरुदेव का सन्देश दिया| सन्देश सुनते ही श्री कृष्ण जी दौड़े
-2 अपने गुरु के पास गए| और उन्हें दण्डवत प्रणाम किया| उनसे द्वारका चलने के लिए
विनती की लेकिन दुर्वासा ऋषि जी ने चलने के लिए मना कर दिया, और फरमाया कि हम फिर
कभी आपके पास आयेंगे| श्री कृष्ण जी ने पुन: दुर्वासा ऋषि जी से विनती की तब
दुर्वासा ऋषि जी ने फरमाया कि ठीक है कृष्ण हम तुम्हारे साथ चलेंगे लेकिन हम जिस
रथ पर जायेंगे, उसे घोड़े नहीं खीचेंगें एक तरफ से तुम और एक तरफ से तुम्हारी
पटरानी रुकमणि खीचेंगी| श्री कृष्ण उसी समय दौड़ते हुए रुकमणि के पास गए और उन्हें
बताया कि मुझे तुम्हारी सेवा की जरुरत है| तब रुकमणि को उन्होंने सारी बात बताई तब
वह दोनों अपने गुरुदेव के पास आये, और उन्हें रथ पर बैठने के लिए विनती की| जब
उनके गुरुदेव रथ पर बैठे तो उन्होंने अपने शिष्यों को भी रथ पर बैठने के लिए कहा
लेकिन श्री कृष्ण जी ने परवाह ना की क्योंकि वे जानते थे कि गुरुदेव उनकी परीक्षा
ले रहे है| रुकमणि और श्री कृष्ण जी ने रथ को खींचना आरम्भ किया और उस रथ को
खींचते - खींचते द्वारका ले पहुँचे| जब गुरुदेव द्वारका पहुँचे तो श्री कृष्ण जी
ने उन्हें राज सिंघासन पर बिठाया| उनका आदर सत्कार किया फिर श्री कृष्ण जी ने 56
तरह के व्यंजन बनवाये अपने गुरुदेव के लिए| लेकिन जैसे ही वह व्यंजन गुरुदेव के
पास पहुँचे उन्होंने सारे व्यंजनों का तिरस्कार कर दिया|
श्री
कृष्ण जी ने पुन: अपने गुरुदेव से पूछा कि गुरुदेव आप क्या लेंगे? तब दुर्वासा ऋषि
जी ने खीर बनवाने के लिए कहा| श्री कृष्ण जी ने आज्ञा मानकर खीर बनवाई| खीर बनकर
आई| वो खीर से भरा पतीला दुर्वासा ऋषि जी के पास पहुँचा| उन्होंने खीर का भोग
लगाया| थोड़ी-सी खीर का भोग लगा कर उन्होंने श्री कृष्ण जी को खाने के लिए कहा| उस
पतीले में से श्री कृष्ण जी ने थोड़ी सी खीर को खाया| तब उनके गुरुदेव ने श्री
कृष्ण को बाकी खीर अपने शरीर पर लगाने की आज्ञा दी| श्री कृष्ण जी ने आज्ञा पाकर
खीर को अपने शरीर पर लगाना शुरू कर दिया| उन्होंने पूरे शरीर पर खीर लगा ली| लेकिन
जब पैर पर लगाने की बारी आई तो श्री कृष्ण जी ने अपने गुरुदेव को अपने पैरों पर
खीर लगाने के लिए मना कर दिया| श्री कृष्ण जी ने कहा ‘हे गुरुदेव| यह खीर आपका भोग-प्रसाद है, मैं इस
भोग को अपने पैरों पर नहीं लगाऊंगा|’ उनके गुरुदेव श्री कृष्ण जी से बहुत खुश हुए| उन्होंने फरमाया
‘हे कृष्ण| मैं तुमसे बहुत
खुश हूँ तुम हर परीक्षा में सफल रहे, मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि पूरे शरीर
में तुमने जहाँ -2 खीर लगाईं है वह अंग आपका वज्र के समान हो गया है, और इतिहास
साक्षी है कि महाभारत के युद्ध में श्री कृष्ण जी का कोई भी अस्त्र-शास्त्र बाल भी
बाँका नहीं कर पाया| जो अपने गुरुदेव की आज्ञा में तत्पर रहता है उन भक्तों को ही
गुरुदेव का सच्चा प्यार और आशीर्वाद नसीब होता है|
*****
कुबिजा पर कृपा
कुबिजा एक दासी थी| वह राजा कंस के राजमहल के बगीचे में मालिन का कार्य करती थी| सारे लोग उसको कुबिजा मालिन कह कर
बुलाते थे| उसकी आयु अभी अल्प थी और वह
अल्पायु से ही अत्यन्त सुन्दर थी| लेकिन ईश्वर की ऐसी लीला कि वह कमर से कुबड़ी थी| वह कुबड़ी होकर चलती थी, तभी उसका नाम कुबिजा पड़ गया| उसकी बुद्धिमानी और सुन्दरता की हर कोई
प्रशंसा करता था लेकिन जब उसके कुबड़ेपन को देखता तो ईश्वर को कोसता कि ऐसी
सुन्दरता देकर कुब क्यों प्रदान किया| लेकिन ईश्वर की लीला को कोई भी नहीं जानता| वह खेल था जो समय के साथ होना था| युवा होकर जब भगवान कृष्ण जी मथुरा
पधारे तो एक दिन श्री कृष्ण जी और
कुबिजा का मेल हो गया| वह फूल और घिसा हुआ चंदन लेकर राजा कंस की ओर जा रही थी, उसने जैसे ही कृष्ण जी के
दर्शन किए तो मानो उसके पैरों में जंजीर पड़ गई हो| उसके हृदय में मीठी-सी कंपकंपी हुई| उसके मोटे नर्गिस नयन मोहित होकर
चुंधिया गए| वह उनको देखती रही| उसने एक फूल माला श्री कृष्ण जी के
गले में डाल दी और साथ ही चन्दन का तिलक लगा दिया| तिलक लगाते समय यह याद न रहा कि तिलक
राजा कंस को लगाना था| यदि राजा कंस को इस बारे में पता चला तो वह मौत के घाट उतरवा
देगा| कंस बड़ा दुष्ट एवं अत्याचारी राजा था| परन्तु कुबिजा ने प्रभु को चन्दन और
तिलक लगा ही दिया| भगवान श्री कृष्ण ने
जब उसका यह अनुराग देखा तो आप दयालु-कृपालु हो गए| उन्होंने कुबिजा मालिन की ओर निगाह भर
कर देखा| प्रभु ने दया में
आकर उसके कुबड़ापन को दूर करने के लिए विचार किया| आप विष्णु अवतार महाकाल शक्तियों के
स्वामी थे| मालिन के एक पैर पर
अंगूठा अपने चरण का रखकर कंधे से पकड़कर ऐसा खींचा कि वह एकदम सीधी हो गई| उसका कुबड़ापन उसी पल दूर हो गया| वह तो मानो मूर्छित-सी हो गई| भगवान कृष्ण की इस कृपा का यश
करती हुई गीत गाने लगी और श्री कृष्ण जी के
चरणों पर गिरकर उनको चूमने लगी| उसने श्रद्धा से हाथ जोड़कर श्री कृष्ण जी से
विनती की-हे प्रभु! दासी को अपने चरणों में रखें| आप तो परमात्मा हैं, आप सृष्टि के पालक हैं| श्री कृष्ण जी ने
प्रसन्न होकर कहा - 'हे मालिन! धैर्य रखो|
समय आएगा तो तुम्हारा प्रेम प्रवान
होगा| अभी शीघ्र जाओ और
कंस को तिलक लगाने तुम जा रही थी, सामग्री लेकर उसे तिलक लगाओ| यह कहकर भगवान आगे चले गए| मालिन कंस के दरबार में पहुंची लेकिन
उसका मन प्रभु के चरणों में ही लिवलीन था|
उसको सीधी सुन्दर खड़ी देखकर हर एक ने
इस बारे पूछना चाहा लेकिन उसने कुबड़ेपन को ईश्वर द्वारा दूर करने के बारे में
किसी को कुछ न बताया| जब कंस के अत्याचारों तथा पापों का अंत करके भगवान श्री कृष्ण मथुरा, गोकुल और वृंदावन के राजा बन गए तो
उन्होंने कुबिजा को दर्शन देकर कृतार्थ किया| यह है मालिन और भगवान श्री कृष्ण जी की
कथा, जो श्रद्धा प्रेम
से सुनेगा वह भवसागर से पार हो जाएगा|
*****
उद्धव
को ज्ञान
उद्धव जी भगवान्
श्री कृष्ण के चचेरे भाई और परम बुद्धिमान थे| वे भगवान् के परम सखा थे| भगवान् ने देखा कि उद्धव जी को अपने ज्ञान – योग
पर अहंकार हो गया है तो उन्होंने विचार किया कि उद्धव जी को प्रेम ओर भक्ति अगर
कोई सिखा सकता है तो वे हैं गोपियाँ| इसलिए
भगवान् ने उद्धव जी को ब्रज भेजा | उद्धव
जी बड़े आदर से अपने स्वामी का सन्देश ले कर ब्रज पहुँच गए| प्रेम विरह की मारी हुई गोपियों को
उन्होंने ज्ञान सिखाना चाहा – उद्धव जी ने कहा – “
भगवान् ही सबके उपादान कारण होने से सब की आत्मा हैं| सबमें अनुगत हैं, आत्मा है,
जो माया और माया के कार्यों से पृथक है| कोई
भी गुण उसका स्पर्श नहीं कर पाते|
माया की तीन वृतियां हैं – सुषुप्ति, स्वपन और जाग्रत| मनुष्य को चाहिए कि वह समझे कि स्वप्न में दिखने
वाले पदार्थों के समान ही जाग्रत अवस्था में, इन्द्रियों के विषय का चिंतन करने
वाले मन और इन्द्रियों को रोक लें और विषयों को त्याग कर भगवान् का साक्षात्कार
करें| गोपियों ने
कहा - “उद्धवजी
ये जो आप ज्ञान और साधना की बात कर रहें हैं आप को पहले ही बता दें कि प्रेम की
प्रतिमा पर कोई भी रंग नहीं चढ़ने वाला| हमारे मन पर, एक सावरें का रंग चढ़ गया सो चढ़ गया,
अब उस रंग के आगे सारे रंग फीके हैं| हम नीति – अनीति नहीं जानती हैं, हम तो बस एक
प्रीत की रीत को जानती हैं |
“श्याम
तन, श्याम मन, श्याम ही हमारो धन|
आठों याम उद्धो
हमें श्याम ही सो काम है||
श्याम हिये श्याम
जिए, श्याम बिना ना ही जिए|
आंधे की सी लाकडी आधार
नाम श्याम है||
श्याम गती श्याम
मती, श्याम ही है प्राण पति|
श्याम सुख धाम सो
भलाई आठो याम है||
उद्धो तुम भये बौरे
पाती लेकर आये दोड़े||
योग कहाँ रखे, यहाँ
रोम रोम श्याम है||”
ज्ञानी साधना करके
अपने आप को खाली करता जाता है और प्रेमी, अनुराग ओर प्रेम से अपने आप को भर लेता
है| ज्ञानी धीरज के साथ आगे बढ़ता जाता है लेकिन प्रेमी के अन्दर धीरज कहाँ होता
है| बस अपने प्रीतम की एक झलक मिल जाए इतना ही बहुत है|”
हे कृष्ण प्यारे! सुबह से दोपहर हो गई, दोपहर से शाम हो गई, आपके दर्शन कब होंगे|
ये अधीरता ही उसका आभूषण होता है| साधना में ध्यान लगाना पड़ता है, पर इस दिल में
जब कृष्ण कि याद होती है तो कभी वेदना रूपी बिजली भी चमकती है, तो कभी गम की घनघोर
घटा भी गरजती है और इन आँखों से बरसात भी होती है| उस बरसात में भीगने का मज़ा
हमारे सिवा ओर कौन जान सकता है! कृष्ण
प्रेम में एक बूँद आंसू भी यदि आँख से गिर जाए तो वह ध्यान, साधना से कहीं बढ़ कर
है | उद्धव जी! तुम्हे ऐसा लगता है कि
हमारा कृष्ण से विरह है, पर हमारे लिए तो विरह का मतलब ‘विशेष योग’ है| जब कृष्ण
ब्रज में है तो हम हर पल उनका दर्शन नहीं कर पाती थी, पर अब तो पल – पल हम जब
चाहें उनका दर्शन कर सकती हैं| हमें किसी
भी प्रकार का बंधन नहीं है| इस ब्रज में
तो सब गोपाल के ही उपासी हैं, यहाँ कोई धूनी नहीं लगाता|
हम प्रेमी भक्तानिगर की बंजारिन , जप तप साधन क्या जाने||
हम श्याम के नाम की दीवानी, व्रत, नेम के बंधन क्या जाने
||
हम ब्रज की भोरी ग्वारनिया , हम ज्ञान की उलझन क्या जाने
||
ये प्रेम की बातें हैं उद्धो , कोई क्या समझे, कोई क्या
जाने ||
मेरे और मोहन की बातें , या मैं जानूं, या वो जाने ||
हमारे प्यारे श्याम
सुंदर, जिन की कीर्ति का गान बड़े –बड़े महात्मा करते रहतें हैं, हम से एकांत में जो
मीठी मीठी प्रेम की बातें की हैं, उन्हें छोड़ने या भुलाने का उत्साह भी हम कैसे कर
सकती हैं ? उद्धव जी यह वहीँ नदी है
जिसमें वे विहार करते थे , ये वही वन है
जिसमें वे रात्री के समय रास लीला करते थे, यह वही पर्वत है जिसके शिखर पर चढ़ कर
वे बांसुरी बजाते थे, और ये वही गौएँ हैं जिनको चराने के लिए वे सुबह – शाम हम
लोगों को देखते हुए आते – जाते थे| यहाँ
का एक – एक प्रदेश, एक – एक धूलि कण उनके परम सुंदर चरण कमलों से चिन्हित है| जब -जब हम इन्हें देखती हैं, तब – तब वे हमारे
श्याम सुन्दर नंदन को हमारे नेत्रों के सामने ला कर रख देते हैं| उद्धव जी! हम किसी भी प्रकार मर कर भी उन्हें भूल नहीं
सकती,हमारा मन तो हमारे वश मे नहीं है, अब हम उन्हें भूलें तो किस तरह?
घर तजू, वन तजू, नागर – नगर तजू, वंशीवट तट तजू |
काहू पे ना लज हो, ये देह तजू, गेह तजू पर नेह कैसे तजू
||
आज सारे राज बीच ऐसे साज सज हो, ये बाबरो भयो है लोक |
बाबरी कहे मोको, ऐरी! बाबरी कहेते पे मैं, काहू ना बरज
हो ||
कहैया – सुनैया तजू, बाप और भैया तजू |
द़ईया तजू, मईया, पे कन्हैया न ही तज हो ||
उद्धव जी ने जब
गोपियों का श्री कृष्ण से ऐसा प्रेम देखा तो उनकी ज्ञान की पोठ्ली यमुना जी के तट
पर ही खो गई| वे भी श्री कृष्ण के प्रेम और आनंद से भर गये और वे इस प्रकार कहने
लगे-“
इस पृथ्वी पर केवल इन गोपियों का ही शरीर धारण करना श्रेष्ठ और सफल है क्योंकि ये
भगवान श्री कृष्ण के परम प्रेममय दिव्या महाभाव में स्थित हो गई हैं| गोपियों!
तुमने ये सिद्ध किया है कि कोई भगवान के स्वरुप और रहस्य को न जान कर भी उनसे
प्रेम करे, तो वे स्वयं अपनी शक्ति से, अपनी कृपा से, उसका परम कल्याण कर देते
हैं| मेरे लिए तो सबसे अच्छी बात यही होगी कि मैं इस वृन्दावन धाम में कोई झाड़ी,
लता या औषधि- जड़ी- बूटी ही बन जांऊ| धन्य हैं ये गोपियाँ! धन्य है इनका प्रेम!
धन्य वे ठाकुर हैं! मैं नन्द बाबा के ब्रज में रहने वाली गोपियों की चरणधूलि को बारम
बार प्रणाम करता हूँ, उसे मस्तक पर धारण करता हूँ| इस प्रकार उद्धव जी ब्रज में कई महीनों
तक रहे, फिर मथुरा लौट कर आये और कृष्ण जी से कहने लगे- “आप
बहुत निष्ठुर हो| गोपियाँ आपसे कितना प्रेम करती हैं और आपने उन्हें क्या दिया? उन्हें
आप छोड़ कर आ गये|” ये शब्द उद्धव जी
के मुँह से भगवान ने सुने| भगवन समझ गये उद्धव की भक्ति की चादर में प्रेम का रंग
चढ़ गया है|
भगवान
ने कहा-“उद्धव!
मेरे खजाने में जो सबसे अनमोल रतन था वही मैंने गोपियों को दिया, वह है ‘विरह’ जो
मुझसे भी बड़ा है| गोपियों के प्रेम का ऋण इतना बढ़ गया था, मैं जान ही नहीं पा रहा
था कि उस क़र्ज़ को कैसे चुकाऊँ| गोपियों के प्रेम के आगे यदि मैं अपने त्रिभुवन को
गिरवी भी रख दूँ और खुद को भी बेच दूँ , तो भी मैं उनके प्रेम का मूलधन तो क्या
ब्याज भी नहीं दे सकता| सच बात तो यह है कि इस क़र्ज़ के कारण ही मैं अपना मुँह छिपा
कर मथुरा भाग आया हूँ| यह कृष्ण तो गोपियों का गुलाम सदा रहेगा|” प्रेम का तो स्वभाव
यही है कि प्रेम केवल देना चाहता है, कुर्बान होना जानता है, लेना तो प्रेम का
स्वभाव ही नहीं है| यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि गोपी किसी स्त्री विशेष का
नाम नहीं है, अपितु प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव रखने वाला हर भक्त गोपी है|
गोपियों का अपना सारा संसार सिर्फ प्रभु के चरणों में नज़र आता है | ऐसे भक्तों के
जीवन का एकमात्र लक्ष्य हरि-रस पीना और पालना होता है| हम भी अपने प्रीतम से सच्चा
प्रेम करके अपने जीवन को सफल करें|
*****
ब्रह्मणों की पत्नियों पर कृपा
एक बार ग्वाल बालों ने कन्हैया और बलराम से
कहा कि तुमने बहुत बड़े-बड़े
दुष्टों का संहार किया हैं। उन्ही दुष्टों की तरह हमें भूख सता रही हैं। आप दोनों
इसे भी बुझाने का उपाय करो। तब
भगवान कृष्ण बोले की ग्वाल बालों! यहाँ से थोड़ी दूरी पर वेद वादी
ब्राह्मण अंगिरारस नामक
यज्ञ कर रहे हैं। तुम वहाँ
जाओ और बलराम जी का और मेरा नाम लेकर कुछ खाने की वस्तु ले आओ। ग्वाल बाल गए और ब्राह्मणों को प्रणाम किया। ग्वाल बाल बोले की
थोड़ी दूरी पर भगवान बलराम और
कृष्ण आये हैं। उन्हें भूख लगी हैं आप कृपा करके कुछ खाने को दीजिये। लेकिन उन
ब्राहम्णो ने कुछ भी खाने के लिए नही दिया और इनकी बात को अनसुना कर दिया। शुकदेव जी महाराज कहते हैं परीक्षित! ये ब्राह्मण खुद को ज्ञान
वृद्ध मानते हैं पर वास्तव में बालक ही हैं। जब
ग्वाल बालों को कोई उत्तर नही मिला तो
निराश होकर लौट आये। और सब बात
भगवान को बताई। कृष्ण
ने जब सुना तो हँसने लगे और ग्वाल बालों को समझाया की ‘संसार
में असफलता तो बार-बार होती ही हैं, उससे
निराश नही होना चाहिए;
बार बार प्रयत्न करते
रहने से सफलता मिल जाती हैं।’ मेरे
प्यारे ग्वाल बालों अबकी बार तुम उनकी पत्नियों के पास जाओ और तुम जाकर कहना की
कृष्ण बलराम आये हैं। तुम जितना चाहोगे उतना भोजन वे तुम्हे दे देंगी। क्योंकि
उनका मन मुझमे लगा हैं और वो मुझसे प्रेम करती हैं। अबकी
बार ग्वाल बाल ब्राह्मणों की पत्नियों के पास गए और बोले- आपको हम प्रणाम करते
हैं। भगवान श्री कृष्ण और हम गौए चराते हुए यहाँ से थोड़ी दूरी पर आये हैं और इस समय उनको और हमे भूख लगी हैं। आप कृपा करके
कुछ भोजन दे दीजिये। जैसे
ही उन्होंने सुना तो सुंदर भोजन की थाली तैयार की और उसमे अलग- अलग प्रकार की भोजन सामग्री ली। और श्री कृष्ण की ओर
दौड़ पड़ी। उनके पति , भाई-बंधुओं और सगे सम्बन्धियों ने रोकने का बहुत प्रयास किया
लेकिन जिस तरह नदी समुद्र के लिए निकल पड़ती हैं वैसी ही आज ये निकल पड़ी हैं। जब ब्राह्मणपत्नियों ने
देखा उस सांवरे सलोने कृष्ण को
तो बस देखती ही रह गई हैं। आज तक उन्होंने भगवान के बारे में केवल सुना था लेकिन
आज देखने का भी अवसर प्राप्त
हुआ हैं। एकटक भगवान को देख रही हैं। उनके रूप माधुर्य का पान कर रही हैं। भगवान
बैठे बैठे मंद मंद मुस्कुरा रहे हैं। भगवान
ने उनसे कहा की देवीयों! तुम्हारा स्वागत
हैं। आओ, बैठो। हम तुम्हारा स्वागत कैसे करें? भगवान
कहते हैं, मैं जानता हुँ कि तुम सभी मुझसे प्रेम करती हो। तुम्हारा यहाँ आना उचित हैं। मैं
तुम्हारे प्रेम का अभिवादन करता हुँ। परन्तु अब तुम मेरा दर्शन कर चुकी हो। अब
अपनी यज्ञशाला में लौट जाओ। तुम्हारे पति ब्राह्मण गृहस्थ हैं। वे तुम्हारे साथ
मिलकर ही अपना यज्ञ पूर्ण कर सकेंगे। ब्राह्मण
पत्नियों ने कहा हे अंतर्यामी श्यामसुन्दर! आपको ऐसी बात नही कहनी चाहिए। हम अपने सभी सगे
सम्बन्धियों को छोड़कर आपके पास आई हैं। स्वामी! अब हमारे पति-पुत्र, माता-पिता, भाई-बंधू
और स्वजन-सम्बन्धी हमे स्वीकार नहीं करेंगे; फिर
दूसरों की तो बात ही क्या? अब
हम आपके चरणों में आ गई हैं और किसी का सहारा नही हैं। कुछ ऐसा कीजिये की हमे
दूसरों की शरण में जाना ना पड़े। भगवान
बोले की देवीयों! तुम्हारे
सगे-सम्बन्धी तुम्हारा तिरस्कार नही करेंगे। उनकी तो बात ही क्या, सारा
संसार तुम्हारा सम्मान करेगा। इसका कारण ये हैं की तुम अब मेरी हो गई हो। इसलिए अब
तुम जाओ, और अपना मन मुझमे लगा दो। तुम्हे शीघ्र ही मेरी प्राप्ति हो
जाएगी, और फिर भगवान ने
ग्वाल बालों के साथ सुंदर भोजन किया है| शुकदेव
जी कहते हैं इस प्रकार भगवान के कहने पर सभी ब्राह्मणपत्नियां यज्ञशाला में आई हैं, उन ब्राह्मणों ने अपनी स्त्रियों में तनिक भी दोष दृष्टि नही की। और सबके साथ मिलकर यज्ञ पूरा
किया हैं एक स्त्री ने भगवान की याद में अपने शरीर को छोड़ दिया। इधर जब ब्राह्मणों
को पता चला कि श्री कृष्ण जी तो स्वयं भगवान हैं। तो उन्हें बड़ा पछतावा हुआ हैं।
अपने आप को कोसने लगे कि हमने
अपराध किया भगवान की आज्ञा ना मानकर। हमने ऊँचे कुल में जन्म लिया
और वेदाध्ययन करके बड़े बड़े यज्ञ किये लेकिन वह सब किस काम का? हमारी
विद्या व्यर्थ गई । हमारी इस बहुज्ञता को धिक्कार हैं। हमारा भगवान के चरणों में
प्रेम नहीं हैं। हमसे अच्छी तो हमारी पत्नियां हैं जिन्होंने भगवान के साक्षात
दर्शन कर लिए हैं और जिनका भगवान श्री कृष्ण में अगाध प्रेम हैं। हे श्री कृष्ण! हमारा ज्ञान अबाध हैं। हमारी बुद्धि माया से
मोहित हैं। हम कर्म काण्ड में पड़े हुए हैं। हम आपको नमस्कार करते हैं। हे
पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण,
आप हमारे अपराध को क्षमा करें। शुकदेव
जी महाराज परीक्षित से कहते हैं,
राजन! इन ब्राह्मणों को अपने किये पर बहुत पछतावा हुआ हैं। लेकिन कंस के डर के
कारण ये भगवान का दर्शन करने नहीं जा सकते।
*****
गरुड़,
चक्र तथा सत्यभामा का अभिमान
संसार
में किसी का कुछ नहीं|
ख्वाहमख्वाह अपना
समझना मूर्खता है, क्योंकि अपना होता हुआ भी, कुछ
भी अपना नहीं होता| इसलिए हैरानी होती है, घमण्ड
क्यों? किसलिए?
किसका? कुछ
रुपये दान करने वाला यदि यह कहे कि उसने ऐसा किया है, तो
उससे बड़ा मूर्ख और कोई नहीं और ऐसे भी हैं, जो
हर महीने लाखों का दान करते हैं, लेकिन
उसका जिक्र तक नहीं करते,
न करने देते हैं| वास्तव
में जरूरतमंद और पीड़ित की सहायता ही दान है, पुण्य
है| ऐसे व्यक्ति पर लक्ष्मी की सदा कृपा होती है|
पर क्या किया जाए, देवताओं तक को अभिमान हो जाता है और उनके अभिमान को दूर करने के
लिए परमात्मा को ही कोई उपाय करना पड़ता है| गरुड़, सुदर्शन
चक्र तथा सत्यभामा को भी अभिमान हो गया था और भगवान श्री कृष्ण ने उनके अभिमान को
दूर करने के लिए श्री हनुमान जी की सहायता ली थी|
श्री कृष्ण ने अपनी पत्नी सत्यभामा को स्वर्ग से पारिजात लाकर दिया था इसीलिए वह
अपने आपको श्री कृष्ण की अत्यंत प्रिया और अति सुंदरी मानने लगी थी| सुदर्शन
चक्र को यह अभिमान हो गया था कि उसने इंद्र के वज्र को निष्क्रिय किया था| वह
लोका लोक के अंधकार को दूर कर सकता है| भगवान
श्री कृष्ण अतंत: उसकी ही सहायता लेते हैं| गरुड़
भगवान कृष्ण का वाहन था,
वह समझता था, भगवान
मेरे बिना कहीं जा ही नहीं सकते| क्योंकि
मेरी गति का कोई मुकाबला नहीं कर सकता| भगवान अपने भक्तों का सदा कल्याण करते हैं| इसलिए
उन्होंने हनुमान जी का स्मरण किया| तत्काल
हनुमान जी द्वारिका आ गए|
जान गए कि श्री कृष्ण
ने क्यों बुलाया है| श्री कृष्ण और श्री राम दोनों एक ही हैं, वह
यह भी जानते थे| इसीलिए सीधे राजदरबार नहीं गए कुछ कौतुक करने के लिए उद्यान में
चले गए| वृक्षों पर लगे फल तोड़ने लगे, कुछ
खाए, कुछ फैंक दिए, वृक्षों
को उखाड़ फैंका, बाग वीरान बना दिया| फल तोड़ना हनुमान जी का मकसद नहीं था वह तो
श्री कृष्ण जी के संकेत से कौतुक कर रहे थे| बात श्री कृष्ण जी तक पहुँची| किसी
वानर ने राज उद्यान को उजाड़ दिया है कुछ किया जाए| श्री कृष्ण ने गरुड़ को बुलाया| "कहा, "जाओ, सेना
ले जाओ| उस वानर को पकड़कर लाओ|"
गरुड़ ने कहा, "प्रभु,
एक मामूली वानर को
पकड़ने के लिए सेना की क्या जरूरत है? मैं
अकेला ही उसे मजा चखा दूँगा|" कृष्ण
मन ही मन मुस्करा दिए जैसा तुम चाहो”, लेकिन
उसे रोको|" गरुड़जी वहाँ गए और हनुमान जी को ललकारा"बाग
क्यों उजाड़ रहे हो? फल क्यों तोड़ रहे हो? चलो, तुम्हें
श्री कृष्ण बुला रहे हैं|" हनुमान जी ने कहा, "मैं
किसी कृष्ण को नहीं जानता|
मैं तो श्री राम का
सेवक हूँ| जाओ,
कह दो, मैं
नहीं आऊँगा|" गरुड़ क्रोधित होकर बोला, "तुम
नहीं चलोगे तो मैं तुम्हें पकड़कर ले जाऊंगा|" हनुमान
जी ने कोई उत्तर नहीं दिया अनदेखी कर वे फल तोड़ते रहे| गरुड़ को समझाया भी, "वानर
का काम फल तोड़ना और फैंकना है, मैं
अपने स्वभाव के अनुसार ही कर रहा हूँ| मेरे
काम में दखल न दो| क्यों झगड़ा मोल लेते हो,
जाओ मुझे आराम से फल खाने दो|” गरुड़ नहीं माना तब हनुमान जी ने अपनी पूँछ बढ़ाई और गरुड़ को
दबोच लिया उसका घमंड दूर करने के लिए कभी पूँछ को ढीला कर देते, गरुड़
कुछ सांस लेता, और जब कसते तो गरुड़ के मानो प्राण ही निकल रहे हो| हनुमान जी ने
सोचा भगवान का वाहन है प्रहार भी नहीं कर सकता लेकिन इसे सबक तो सिखाना ही होगा| पूँछ
को एक झटका दिया और गरुड़ को दूर समुद्र में फैंक दिया| बड़ी
मुश्किल से वह गरुड़ दरबार में पहुँचा और भगवान को बताया कि वह कोई साधारण वानर
नहीं है| मैं उसे पकड़कर नहीं ला सकता| भगवान
मुस्करा दिए- सोचा गरुड़ का घमंड तो दूर हो गया| लेकिन अभी इसके वेग के घमंड को
चूर करना है| श्री कृष्ण जी ने कहा, "गरुड़, हनुमान
श्री राम जी का भक्त है,
इसीलिए नहीं आया| यदि
तुम कहते कि श्री राम जी ने बुलाया है, तो
फौरन भागे चले आते| हनुमान अब मलय पर्वत पर चले गए हैं| तुम
तेजी से जाओ और उससे कहना,
श्री राम ने उन्हें
बुलाया है| तुम तेज उड़ सकते हो, तुम्हारी गति बहुत है, उसे
साथ ही ले आना|" गरुड़ वेग से उड़े, मलय
पर्वत पर पहुँचे| हनुमान जी से क्षमा माँगी| फिर
कहा कि श्री राम जी ने आपको याद किया है, अभी
आओ मेरे साथ, मैं तुम्हें अपनी पीठ पर बिठाकर मिनटों में द्वारिका ले जाऊंगा| तुम
खुद चलोगे तो देर हो जाएगी| मेरी
गति बहुत तेज है, तुम मुकाबला नहीं कर सकते| हनुमान
जी मुस्कराए, भगवान की लीला समझ गए| कहा, "तुम
जाओ, मैं तुम्हारे पीछे ही आ रहा हूँ|"
द्वारिका में श्री कृष्ण राम रूप धारण कर सत्यभामा को सीता बना सिंहासन पर बैठ गए|
सुदर्शन चक्र को आदेश दिया| द्वार पर रहना कोई बिना आज्ञा अंदर न आने पाए| श्री
कृष्ण समझते थे कि श्री राम का संदेश सुनकर तो हनुमान जी एक पल भी रुक नहीं सकते,
अभी आते ही होंगे| गरुड़ को तो हुनमान जी ने विदा कर दिया और स्वयं उससे भी तीव्र
गति से उड़कर गरुड़ से पहले ही द्वारका पहुँच गए| दरबार
के द्वार पर सुदर्शन ने उन्हें रोक कर कहा, "बिना
आज्ञा अंदर जाने की मनाही है|" जब
श्री राम बुला रहे हों तो हनुमान जी विलंब सहन नहीं कर सकते| सुदर्शन को पकड़ा और
मुँह में दबा लिया| अंदर गए, सिंहासन
पर श्री राम और सीता जी बैठे थे| हुनमान जी समझ गए, श्री राम को प्रणाम किया और
कहा, "प्रभु,
आने में देर तो नहीं
हुई?" साथ ही कहा, "प्रभु
माँ कहाँ है? आपके पास आज यह कौन दासी बैठी है? सत्यभामा
ने सुना तो लज्जित हुई,
क्योंकि वह समझती थी
कि कृष्ण द्वारा पारिजात लाकर दिए जाने से वह सबसे सुंदर स्त्री बन गई है|
सत्यभामा का घमंड भी चूर हो गया|
*****