छीतू चोबे से छीतू
स्वामी बनना
छीतू चोबे नामक एक व्यक्ति था जोकि
मथुरा का रहने वाला था और बाल्यकाल से ही कुसंगति में पड़कर दुष्ट प्रवृति के हो गए
थे| युवा होते-होते उन्होंने अपने जैसे दुष्ट लड़को की
एक टोली बना ली, जिसमे वे छीतू भैया
के नाम से विख्यात हो गए| अपनी
टोली के साथ प्रत्येक मनुष्य को परेशान करना तो उनका ध्येय ही था, विशेषकर मथुरा में रहने वाले तथा यहाँ
दर्शनार्थ आने वाले साधु-महात्माओं
तथा भक्तों को तो वे बहुत ही परेशान किया करते थे| जब छीतू भैया की आयु लगभग बीस वर्ष की
हुई, उन दिनों की घटना
है| गोसाईं विट्ठलदास
जी, जोकि उच्च कोटि के
सन्त थे और गौकुल में निवास करते थे, उनकी
महिमा चारों ओर फ़ैल रही थी| छीतू
भैया ने भी उनकी महिमा सुनी और उन्हें परेशान करने के लिए वे अपनी टोली सहित गौकुल
जा धमके| छीतू भैया दूसरों
को परेशान करने के लिए नई-नई
युक्तियां निकाला करते थे| इस
बार भी उन्होंने एक अनोखा ढंग अपनाया| वे
एक अनन्य श्रद्धालु की तरह गौसाई विट्ठलदास जी के चरणों में उपस्थित हुए उन्हें
श्रद्धासाहित प्रणाम किया और कुछ खोटे सिक्के और सड़ा हुआ दुर्गन्धयुक्त नारियल
भेंट किया| गौसाई विट्ठलदास जी
ने पहले उन खोटे सिक्कों तथा सड़े हुए नारियल की तरफ तथा फिर छीतू भैया की ओर देखा| फिर मुस्कुराते हुए बोले- "तुम्हारे इस उत्तम उपदेश के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद्|" छीतू भैया तो यह आस लगाये बैठे थे कि
खोटे सिक्के और सड़ा हुआ नारियल देखकर गौसाई जी क्रुद्ध हो उठेंगे और जब क्रुद्ध
होकर वे अंटसंट बोलेंगे, तब
वे अपनी मण्डली सहित गौसाई जी का खूब मजाक उड़ायेंगे और उन्हें परेशान करेंगे| परन्तु गौसाई के उपरोक्त अप्रत्याशित
वचन सुनकर वे हतप्रभ रह गए| कुछ
पल तो वे गौसाई जी के मुख की ओर देखते रहे,
फिर बोले- "उपदेश, कैसा उपदेश?" गौसाई विट्ठलदास जी तो पूर्ण महापुरुष
थे और महापुरुषों का तो इस धरा पर अवतार ही दूसरों के हित एवं कल्याण के लिए होता
है| अत: गौसाई जी ने उसकी धृष्टता की ओर तनिक
भी ध्यान न देते हुए मुस्कुराते हुए फ़रमाया-
"अरे भैया| इन खोटे सिक्को के द्वारा तुम हमे यही
उपदेश करना चाहते हो न कि इन खोटे सिक्कों की तरह ही संसार की प्रत्येक वस्तु
खोंटी है| खरा तो केवल प्रभु
का नाम और प्रभु की भक्ति है और सड़े हुए नारियल द्वारा तुम हमे यह जतलाना चाहते हो
कि जितने भी खाध पदार्थ हैं इस नारियल की तरह अन्तत: सभी सड़ जाते हैं फिर इनके द्वारा पोषित
हुआ शरीर सदा स्वस्थ कैसे रह सकता है? उसका
भी तो एक दिन यही परिणाम होना है| वह
दिन आए उससे पहले ही भजन सुमिरण करके मनुष्य को अपना परलोक संवार लेना चाहिए|" छीतू भैया का इन वचनों का ऐसा गहरा
प्रभाव पड़ा कि वे रोते हुए गौसाई जी के चरणों में लिपट गए और अपने अनुचित व्यवहार
के लिए बार-बार क्षमा याचना
करने लगे| क्षमा तो उन्हें
मिली ही, साथ ही नाम-दान भी मिला| इस प्रकार गौसाई विट्ठलदास जी की कुछ
देर की संगति ने उनकी कायापलट कर दी| उनके
सारे अध्-अवगुण और पाप पल भर
में विनष्ट हो गए और दृष्ट प्रवृति तजकर वे प्रभु भक्त बन गए, उसी प्रकार जैसे पारस को स्पर्श करके लोहा
भी सोना बन जाता है| गौसाई विट्ठलदास की
शरण ग्रहण कर तथा उनके मार्गदर्शन में नाम-भक्ति
की कमाई कर वे छीतू भैया से छीतू स्वामी बन गए| अपना लोक परलोक तो उन्होंने सँवारा ही, अन्य अनेकों को भी उन्होंने भक्ति पथ
पर लगाया| उन्होंने संस्कृत
में भक्ति- परमार्थ विषयक
अनेको ग्रन्थ लिखे जो आज भी जिज्ञासुओं का पथ-प्रदर्शन कर रहे हैं|
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