Monday, May 11, 2020

प्रेरक प्रसंग - III


फकीर ने गाय की तरफ उंगली की
एक जंगल में एक वृक्ष के नीचे एक फ़क़ीर बैठा था| वह गहन मौन मुद्रा में था| एक बार ऐसा हुआ कि जब वह योगाभ्यास में लीन था| तब एक गाय दौड़ती हुई वहाँ आई| उसके पीछे एक व्यक्ति आया| उस व्यक्ति ने फ़क़ीर से पूछा क्या आपने यहाँ से गुजरती एक गाय देखी है? परिस्थिति से अनभिज्ञ फ़क़ीर ने ऊँगली से गाय के जाने का संकेत किया| वह व्यक्ति कसाई था| चूँकि फ़क़ीर ने गाय का पता बताया था, वह गाय को मारने काटने में सफल हुआ| अगले जन्म में गाय रानी बनी और कसाई राजा बना| एक रात्रि में राजा सोया हुआ था, रानी दीवार पर लटकी हुई चमकती तलवार को निहार रही थी| वह अन्दर ही अन्दर तलवार उठाने के लिए प्रेरित हुई| अचानक उसने तलवार उठा ली और राजा की गर्दन काट दी| भय से रानी चीख उठी| आवाज सुनकर सारे मन्त्री तथा सभासद इकट्ठे हो गए| यह देखकर सब सन्न रह गये| रानी वहाँ गूँगी मूक से होकर बैठी थी| मंत्रियो ने इसके विषय में काफी पूछा परन्तु रानी चुप रही| उसने अपने हाथ से उस तख्ते की ओर संकेत किया| वहाँ एक खिड़की थी, तुरन्त ही सब खिड़की से नीचे देखने लगे| उन्होंने एक फ़क़ीर साधु को नीचे जाते हुए देखा| राजा के नौकरों ने उसे पकड़ लिया| दण्ड की घोषणा होने वाली थी| यह निर्णय किया गया कि उसे मृत्यु दण्ड न दिया जाए, क्योंकि वह एक फ़क़ीर  साधु है लेकिन उसके हाथ अवश्य काट दिए जाये  जिससे वह अपने हाथों से दुष्कर्म न कर सके| फलत: उसके हाथ काट दिए गये| यही कुदरत का अटल विधान है| अब वह साधु अत्यन्त दुखी मन से जंगल की और गया और बार -बार  यह सोचने  लगा की भाग्य  ने कैसे विडम्बना उसे  दिखाई है| उसने एक दिव्य सन्त के बारे में सुना था| जो की भूतकाल  तथा भविष्य का ज्ञाता था| उसने उससे मिलने का निश्चय किया| उनके पास  पहुँचकर  फकीर ने पूछा -ऐ सन्त जी आप तो भूतकाल और भविष्य के बारे में सब जानते है| यह बतलाइये की मेरे हाथ क्यों काटे गये जबकि सारी जिन्दगी मैं मालिक की बन्दगी नाम सुमिरण ही करता रहा | सन्त जी ने याद दिलवाया की पिछले  जन्म में वह एक गाय की हत्या का कारण बना था| उसने इन  हाथों से वह दिशा दिखाई थी, जहाँ गाय भागी थी| इसी कारण से उसके हाथ काट दिए है|
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गुलाम का समर्पण
एक फ़क़ीर ईरान में यात्रा कर रहा था| यह उस युग की बात है जब गुलाम प्रथा प्रचलित थे तथा गुलाम बेचे जाते थे| उन्होंने एक गुलाम बिक्री होते देखा| एक ग्राहक ने उसकी कीमत पूछी तो कीमत 3000 दीनार बताई गई| ग्राहक को आश्चर्य हुआ क्योंकि कीमत बहुत ज्यादा थी| उसने गुलाम से पूछा," तुम क्या काम करोगे?" जो भी मेरा मालिक मुझे कहेगा" गुलाम ने उत्तर दिया| ग्राहक ने फिर पूछा," तुम क्या खाओगे" जो कुछ मालिक देगा , उसका उत्तर था| फिर उसने पूछा तुम क्या पहनोगे? उसने उत्तर दिया ,जो मेरे मालिक की इच्छा होगी| ग्राहक ने पूछा तुम्हारा यह दृष्टीकोण ऐसा कैसे बन गया? गुलाम ने कहा -मैं एक गुलाम हूँ| और यह मेरा निजी कर्तव्य है कि मालिक की आज्ञानुसार कार्य करू और  अपनी कोई इच्छा प्रकट न करूं| जब फकीर ने ये बात सुनी तो वह अत्यधिक लज्जित हुआ, और  पश्चाताप के आँसू  बहाने लगा| उसने कहा  मैं स्वयं को एक भक्त मानता हूँ| और प्रभु का दास मानता हूँ लेकिन यह एक गुलाम निष्ठा  आज्ञापालन और आत्मा - समर्पण सभी गुणों में मुझ से आगे है| मैंने  जीवन के इतने वर्ष गवां दिए और अभी तक प्रभु की मौज में राजी रहना नही सीखा तथा पूरण आत्म समर्पण नही कर पाया| तत्पश्चात वह अपने मालिक को पूर्णतया आत्मा सम्प्रण कर परमात्मा के ध्यान में लीन रहने  लगा अन्तत: परमात्मा प्राप्ति के मार्ग पर चलते हुए उसने अपने चरम लक्ष्य की प्राप्ति की|
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फकीर का संतोष
सर्दी का मौसम था, शाम हो चुकी थी| एक महात्मा जी कही से फिरते -फिरते किसी राजा के शहर में आ निकले| राजमहल के निकट एक भटियारी की भट्ठी थी| उससे गर्म-गर्म राख निकालकर धरती पर बिछा ली और उस पर आसन लगाकर सो गये| प्रात : होते ही जब राजा ने अपनी खिड़की खोली तो उसे एक मनुष्य राख के ऊपर बेसुधी की नींद सोया हुआ नजर आया| राजा को देखकर आश्चर्य हुआ| यह क्या बात है कि इस मनुष्य के शरीर के नीचे न बिस्तर है न ऊपर चादर है| और ऐसी सुख की नींद सो रहा  है कि इसे तन की भी सुध नही है| और मैं जिसके नीचे मखमली गददे बिछे हुए है| और सम्पूर्ण सुख सम्पति के सामान जो राज और धन से प्राप्त किए जा सकते है| पास मौजूद हैं| इतना कुछ होते हुए भी मुझे नींद नही आई| सारी रात करवट बदलता रहा| राजा कुछ देर सोचता रहा, अन्त उसे रहा न गया| नौकर को बुलाकर  आज्ञा दी, शीघ्र जाओ  और मनुष्य को जगाकर  मेरे पास ले आओ| नौकर ने तुरंत आज्ञा का पालन किया| वह मनुष्य जो एक महात्मा जी थे , राजमहल में नौकर के साथ राजा के पास पहुँच गए| राजा ने आदर के साथ महात्मा जी को बिठाया तथा कहा -महात्मन्| मैंने किसी कारण से आपको कष्ट दिया है | क्षमा करे| आपसे एक प्रश्न है| कृप्या इसका उत्तर दीजिये| मैंने खिड़की से बाहर झुक कर देखा आप राख के ऊपर पड़े हुए थे| यह देखकर मेरे मन में संशय उत्पन्न हुआ की मुझे मखमली गद्दों पर भी आराम नही है| तो  आपकी राख पर लेटे हुए रात कैसी रही होगी| महात्मा जी ने उनकी आन्तरिक दशा समझते हुए कहा –राजन मेरी रात तो कुछ आप जैसी गुजरी और कुछ आप से अच्छी राजा को आश्चर्य हुआ और पूछा मेरी जैसी कैसी और मुझे से अच्छी कैसे महात्मा जी ने कहा जब मैं नींद में गया और आप भी नींद में गये वह समय दोनों का एक समान गुजरा क्योंकी नींद में न तो मुझे अपने बिस्तर और न ही मुझे अपने शरीर की सुधि रही और न तुम्हें उनका कुछ ज्ञान रहा| वह अवस्था दोनों की एक समान रही| किन्तु जगत अवस्था में आप से बेहतर रहा| कारण यह कि जब आप जागे होंगे तो आपका मन तथा विचार सांसारिक उलझनों की ओर गया होगा और मैंने जगत अवस्था में भगवान का स्मरण किया है| मेरी विचारधारा कुल मालिक के नाम में एकाग्र थी| इसलिए वह समय मेरा आपसे अच्छा है| तुम्हें हर समय चिन्ता है| और मैं हर समय बेफिक्र हूँ| इसी कारण मेरा जीवन आपसे अलग है| राजा ने कहा – ऐ महात्मन्| मैं सचमुच दुखों के जाल में बन्ध रहा हूँ| किसी समय शांति और सुख का स्वांस नही आता और आप राख में पड़े हुए भी सुखी हो, अपने पास कुछ भी न रखते हुए मुझे शांत दिखाई देते हो| ख़ुशी आपके चेहरे से ही झलकती है| ऐ परोपकारी महात्मा जी मुझे भी सुख की राह दिखाइये| महात्मा जी ने कहा – राजन! सब फ़िकरे छोड़ कर प्रभु का ध्यान कर जो सच्चा सहायक है| अपनी विचारधारा को मालिक के नाम में स्थिर कर| दुनिया को दिल मत दे, चित्त की वृतियों को, सुर्तियों को नाम से जोड़ दे| अपना कुछ भी न समझ|
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गुरु के द्वारा शिष्य की रक्षा
एक गुरु और शिष्य कही जाने के लिए यात्रा कर रहे थे | रात के समय उन्हें एक घने जंगल में रुकना पड़ा जो की जंगली जानवरों से भरा हुआ था| गुरु और शिष्य ने बारी –बारी से सोने का निश्चय किया| ताकि उनमे से एक जंगली जानवरों के लिए सतर्क रहे| ऐसा निश्चित हुआ की गुरु जी पहले आधी रात तक सोयेंगे और फिर शिष्य बाकि रात उनके बाद सोयेगा| इसी प्रकार दूसरे पहर शिष्य सो गया| जब वह गहरी नींद में सोया हुआ था तो गुरु जी जो शिष्य के निकट ही बैठे थे क्या देखा की एक सर्प तेजी से शिष्य की ओर आ रहा है उन्होंने सर्प को दूर हटाने की कोशिश की लेकिन जब प्रयत्न निष्फल रहा| सर्प ने कहा कि मैं और यह आपका शिष्य एक दूसरे से बदला लेने के लिए जन्मों से एक दूसरे को मारते आये हैं| अब इसका खून लेने की मेरी बारी है| तब गुरु ने पूछा कि क्या तुम्हें इसका खून चाहिए? यदि मैं तुम्हें इसका खून दे दूँ तो क्या तुम्हारी बदले की प्यास बुझ जायेगी और तुम मुझे ये वचन दोगे की फिर कभी भी इसको दुःख न दोगे| सर्प ने सहमति प्रकट की| उसी समय गुरु जी ने चाकू निकाला और शिष्य के गले को जरा सा चीर लगाकर थोड़ा सा खून निकाल लिया| शिष्य ने आँखे खोली लेकिन जब उसने अपने गुरु जी को अपनी छाती के ऊपर बैठा हुआ देखा तो उसने फिर से आँखे मूंद ली| थोड़ा सा खून निकाल लेने के बाद गुरु जी ने वह खून सर्प को दे दिया और कहा कि अब तुम्हारी प्यास बुझ गई होगी| इसलिए तुम बदले की सब भावनाओं को भूल जाओ| इसी प्रकार गुरु जी ने अपने शिष्य की सर्प के जहरीले और प्राणघातक डंक से रक्षा की| उन्होंने सर्प और शिष्य दोनों को कर्म बन्धन से मुक्त कर दिया दूसरे दिन प्रात: काल उठने पर शिष्य ने गुरु जी से कुछ भी नही पूछा| गुरु जी बहुत ही आश्चर्य चकित हुए कि शिष्य ने कुछ भी नहीं पूछा| इसलिए उन्होंने स्वयं शिष्य से पूछा कि उसने रात वाली घटना के बारे में कुछ भी क्यों नहीं पूछा? तब शिष्य ने कहा , हे प्रभु! आप मेरे सच्चे मार्ग दर्शक हैं, तीन लोक के स्वामी हैं, सर्वज्ञ हैं, आप जो कुछ करेंगें उसमे मेरी भलाई ही होगी| गुरु जी ने कहा, मैं  तुम्हारे इस अटल विश्वास से बहुत ही प्रसन्न हूँ| वास्तव मैं कई जन्मों से तुम और वह सर्प एक दूसरे को जान से मारते आ रहे हो| इससे तुम पुन: जन्म के चक्र में बंधे हुए थे| अगर मैं तुम्हारे गले का खून सर्प को न देता तो ये चक्र कभी खत्म न होता| अब पुन: जन्म के विधान से मुक्त हो गये हो| सतगुरु हमारी तरह मनुष्य शरीर धारण कर हमे वापिस निजधाम ले जाने के लिए इस संसार में आते हैं| सामान्य दृष्टि में वे हमारी तरह ही शरीर धारण किये दिखाई देते हैं| लेकिन वास्तव में वे तीन लोकों के स्वामी होते हैं| बाहरी दृष्टि से देखने में वे बन्धन में बन्धे दिखाई देते हैं, यथार्थ में सब बन्धनों से रहित, मुक्ति के दाता हैं| वे हमारे बन्धनों को काट कर हमे सब कर्मों से छुड़ाने के लिए आते हैं|
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दूसरों के लिए गड्ढा खोदो तो
किसी गाँव में दो पड़ोसी रहा करते थे उसमे से एक गाँव के मुखिया का घर था और दूसरा घर अत्यन्त निर्धन का| लेकिन दोनों के बच्चे आपस में खूब खेला करते थे जिसमे से मुखिया के लड़के का नाम मनमोहन था| तथा निर्धन के लड़के का नाम बिहारी था| मनमोहन प्राय: बिहारी को अपने घर से कुछ न कुछ सामान लाकर देता था उसके खाने के लिए, पहनने के लिए कपड़े, मुखिया इस निर्धन के लड़के को अपने बच्चे के साथ देखकर खुश नही होता था| अब मनमोहन कुछ बड़ा हुआ तो उसके पिता ने उसे विद्यालय में डाल दिया| अब बिहारी घर में रहता तो मनमोहन को याद करता रहता,  बिहारी ने अपने पिता से उसे विद्यालय में पढ़ने की जिद की| उसकी जिद पर बिहारी के पिता ने स्कूल के अध्यापकों से अपनी निर्धनता के बारे में बताया तो अध्यापकों ने उन्हें बिना किसी शुल्क के पढ़ाना आरम्भ कर दिया| अब बिहारी और मनमोहन एक ही स्कूल में पढ़ने लगे| बिहारी पढाई में बहुत ही आगे निकल गया और परीक्षा में प्रथम आया जबकि  मनमोहन पढाई में  रूचि न लेने के कारण फेल हो गया| अब मनमोहन के पिता के मन में ईर्ष्या और बढ़ गई| उसने बिहारी को खत्म करवाने के लिए जल्लाद को पैसे दिये और बताया कि मेरे लड़के के साथ उसका मित्र होगा जिसने फटे पुराने कपड़े डाल रखे हैं| उसे खत्म करके उसका सिर तलवार से काट कर मेरे पास ले आओ| अब कुदरत की रचना अजब ही है| उस दोनों मित्रों ने आपस में कपड़े बदल रखे थे मनमोहन के कहने पर बिहारी ने नये कपड़े डाल लिए और मनमोहन ने बिहारी के पुराने कपड़े| जब जल्लाद ने मनमोहन को पुराने कपड़ो में देखा| तो उसे बिहारी समझा और उसका सिर काट कर उसके पिता के पास ले गया| जब उसके पिता ने उसके अपने लड़के कटा हुआ सिर देखा तो वह बेसुध हो गया और गिर पड़ा| जब होश आया तो जल्लाद को कहा कि ये तूने क्या कर दिया ये तो मेरा ही लड़का था| तो कहने का मतलब यही है जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है वो खुद ही उसमे गिर पड़ता है|
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ऊंट को कुएँ में डाल दिया
एक समय का वृतांत है किसी काफिले में से एक ऊँट काफिले से अलग हो गया प्यास लगने के कारण वह किसी कुएँ के नजदीक गया और कुआँ गहरा होने के कारण उसी में गिर गया और उसकी मृत्यु हो गई| अब उस कुएँ में से दुर्गन्ध आने लगी| वहाँ आस – पास में गाँव के लोग परेशान कि कुए में से कैसी दुर्गन्ध आ रही है तो उन्होंने विचार किया और उस कुएँ से पाँच सौ घड़े पानी निकाला गया लेकिन दुर्गन्ध  न गई| फिर किसी ने गंगा जल डालने का सुझाव दिया लेकिन दुर्गन्ध फिर भी न गई | तब किसी सन्त ने उन्हें जताया की आप कुएँ में जाकर देखे, तब उनमे में से किसी ने कुएँ में जाकर देखा तो पता चला की अन्दर ऊँट मरा हुआ है| तब उन्होंने ऊँट को निकाल कर कुएँ को साफ किया फिर उसमें शुद्ध पानी डाला गया| इसी तरह इन्सान का मन भी विषय विकारो से जब तक भरा है इसमें कोई भी परिवर्तन नही होता सन्त महापुरुषों के वचनों का लाभ नही उठा पाते| महापुरुष यही फरमाते हैं कि काम, क्रोध, लोभ, मोह अहंकार आदि विकारों को ह्रदय से निकाल कर नाम का सुमिरण करो अथवा सुरति को सतगुरु के शब्द के साथ जोड़ कर मन को स्वच्छ व निर्मल बना कर ही लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती  है| अत: मालिक को प्राप्त करने के लिए मन की सफाई होना अवश्यक है|
                  निर्मल मन जन सोयी मोहि पावा |
                   मोहे कपट छल छिद्र न भावा ||
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राजा की पत्नी को ज्ञान
किसी देश में एक राजा रहता था जोकि बड़ा भक्तिवान था लेकिन उसकी पत्नी नास्तिक थी| वह हमेंशा राजा से यही कहती- अभी कोई उम्र है भक्ति करने की| भक्ति तो बुढ़ापे में करनी चाहिए| राजा भी इस बात से चिंतित था| उसने अपने गुरुदेव से इस समस्या के बारे में कहा| उसके गुरुदेव ने राजा को कहा कि वह रानी को कल सुबह लेकर आये| राजा ने इसमें कुछ रहस्य जानकर ऐसा ही किया| अगले दिन जब राजा रानी को लाया तो गुरुदेव ने उन दोनों को अपने साथ सैर पर चलने के लिए कहा| जब राजा-रानी व उनके गुरुदेव सैर पे जा रहे थे, तो रास्ते में कुछ खेत आये| गुरुदेव ने रानी से कहा कि राजा और मैं किनारे-किनारे इन खेतों को पार कर उस तरफ पहुँचते है और रानी को फ़रमाया- कि तुम खेतों के बीचो-बीच जाओ और रास्ते में हमारे लिए कुछ बालियाँ तोड़ लाओ| रानी ने ऐसा ही किया अब जब वह खेतों में गई तो उसे शुरू में गेहूँ की बालियाँ मिली लेकिन वह सोचने लगी अगर इन बालियों को तोड़ लूँ तो काफी आगे तक इन्हें साथ लेकर चलना पडेगा| क्यूँ ना थोड़ी आगे से बालियाँ तोड़ लूंगी| क्या पता और अच्छी बालियाँ मिल जाये| आगे चली तो ख़राब बालियाँ नजर आई मन में विचार किया कि क्या पता आगे अच्छी बालियाँ मिल जाये| लेकिन आगे बालियाँ और खराब थी| ऐसे करते-करते वह आगे तक आ गई कहीं उसे सही बालियाँ ना मिली| जब वह खेत पार करके पहुँची तो राजा व गुरुदेव उसका इंतजार कर रहे थे| गुरुदेव ने गेहूँ की बालियों के बारे में पूछा तो उसने बताया- शुरू में अच्छी बालियाँ मिली लेकिन मैंने यह सोचकर नहीं तोड़ी कि आगे बालियाँ और भी अच्छी मिल जायेंगी| लेकिन आगे तो अच्छी बालियाँ न मिल पाई वह तो पीछे ही रहती गई| तब उसके गुरुदेव ने फ़रमाया- कि जब तुम्हें बालियों को तोड़ने का मौका मिला तो तुमने यही सोचकर उसे छोड़ दिया कि आगे मुझे यह अवसर प्राप्त हो जायेगा लेकिन ऐसा न हुआ| तो तुम यह कैसे कह सकते हो कि बुढ़ापे में तुम्हें मालिक की भक्ति करने का समय मिल जायेगा| जो समय एक बार हाथ से निकल जाये वह कभी लौट कर वापिस नहीं आता| आज और कल का नाम लेते-लेते ही मनुष्य की आयु बितती जा रही है| बचपन खेलने में, जवानी धन व संतान के झूठे मोह में फँसकर नष्ट कर देता है, वृद्धावस्था में उनको छोड़ने की अपेक्षा पहले से भी अधिक मोह कर लेता है| इसलिए हे मनुष्य! जो समय बीत गया उसका अफ़सोस ना कर बाकी बचे समय को मालिक की भक्ति में लगा नहीं तो यह समय भी बीत गया तो व्यर्थ पछताने के कुछ ना रह जायेगा| 
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जौहरी का ज्ञान
एक बार किसी राजा के दरबार में एक सौदागर एक मूल्यवान लाल लेकर आया| जिसको देखकर राजा ने जौहरियों को उसका मूल्यांकन करने के लिए बुलाया| जौहरियों ने लाल को देखा लेकिन कोई उसका उचित मूल्य न बता पाया| तब एक वृद्ध जौहरी राजा के दरबार में आया और उसने लाल की कीमत 99000 बताई| जब उससे राजा ने इसको प्रमाण करने के लिए कहा तो जौहरी ने बताया- कि मैंने अपने जीवन का समय इसी काम में व्यतीत किया है मुझे लाल की परख करते-करते बड़ा ही समय हो गया| इस लाल के ऊपर 99 लकीर बनी हुई है इसलिये इसकी कीमत 99000 है तो राजा उसके जवाब से खुश हो गया और उसने उसकी कीमत यही मान कर सौदागर से खरीद लिया| अब राजा ने जौहरी से खुश होकर उसे पुरस्कार देने का विचार किया उसके लिए उसने अपने ख़ास मन्त्री को बुलाया जोकि बड़ा भक्तिवान था| उससे राजा ने पूछा कि इस जौहरी ने हमें लाल की उचित कीमत बताई है तो हमें इसे क्या पुरस्कार देना चाहिये| तब मंत्री ने कहा- राजा जी इसे पुरस्कार की जगह मुँह पर सौ थप्पड़ लगाये जाये| तब मंत्री ने बताया कि इस व्यक्ति ने अपना पूरा जीवन पत्थरों की परख में लगा दिया| अगर यह अपनी बुद्धि को विचारे व समय को सांसारिक कार्य- व्यवहार के साथ-साथ ईश्वर की ओर लगाकर आत्मा का साक्षात्कार करता, जीव व ब्रह्म के मन्द को समझने की कोशिश करता तो आज यह जौहरी की जगह कुछ और बन जाता| यह ज्ञान भक्ति के उच्च शिखर तक पहुँच जाता|
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राजा की छड़ी
एक देश में किसी राजा के पास एक छड़ी थी उसने सोच रखा था कि वह इस छड़ी को अपने राज्य में सबसे मूर्ख बन्दे को देगा| उसी के राज्य में एक व्यक्ति कुछ कार्य किया करता था| वह स्वभाव से बड़ा भोला-भाला था| पर था भक्तिवान| तो राजा व अन्य मंत्री महोदय सभा में कई बार उसका मजाक उड़ाया करते थे| तो राजा ने छड़ी उसी व्यक्ति को दे दी| उस व्यक्ति ने भी आज्ञा मानकर वह छड़ी रख ली और राजा ने उसे फ़रमाया कि, जो तुम्हें तुमसे भी अधिक मूर्ख व्यक्ति मिलेगा उसे यह छड़ी दे देना| उस व्यक्ति ने राजा की बात मान ली| अब वह व्यक्ति छड़ी अपने पास रखता और किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश करने लगा जिसको वह छड़ी देगा| कुछ समय बाद राजा की तबीयत बिगड़ गई और वह बिस्तर पर आ गया| राजा का अन्त समय अब निकट आ चुका था| दूर -2 से लोग जोकि राजा के जान पहचान के थे राजा को देखने आने लगे| एक दिन वह व्यक्ति जिसके पास छड़ी थी वह भी राजा का हाल- चाल पूछने गया| जब वह राजा के पास गया तो पूछा कि राजा जी क्या हाल- चाल है| तब राजा ने फ़रमाया कि अब तो मेरा अन्त समय नजदीक आ गया है| मैं कुछ ही समय का मेंहमान हूँ | तब उसे व्यक्ति ने कहा राजा  जी जब आप राज्य से बाहर जाते हैं तो बहुत तैयारी होती है| अब तो आप बहुत ही दूर जा रहे हैं  अब  तो और भी ज्यादा तैयारी करनी पड़ेगी| तब राजा ने कहा अरे मूर्ख ऊपर जाने के लिए कोई तैयारी नही करनी पड़ती वहाँ तो यम के दूत पकड़ कर ले जाते हैं| तब व्यक्ति  ने कहा कि वहाँ तो आपका ख़ूब स्वागत होगा| तब  राजा ने कहा  मेरा वहाँ स्वागत नही होगा वहाँ तो केवल उसी का  स्वागत होता है| जिसने मालिक की भक्ति की हो| अपने समय को परमार्थ में लगाया हो| तब व्यक्ति ने कहा आप अपनी सारी धन  दौलत ले कर जाओगे| तब राजा ने कहा- अरे मूर्ख वहाँ कोई धन दौलत साथ नहीं जाती ना ही वह किसी काम आती  है| वहाँ तो केवल मालिक के नाम के सच्चे  धन की कीमत है| तब उस व्यक्ति ने कहा कि राजा जी जब आप को सब सच पता है कि समय कितना अनमोल है| मालिक की भक्ति ही इंसान के लोक परलोक में काम आती है| कुछ भी साथ नही जाता फिर भी आपने अपना पूरा जीवन सांसारिक कामों में लगा दिया है| कभी मालिक की भक्ति भी नही की आप तो मुझसे भी बड़े मूर्ख हो| ये लो आप ही इस छड़ी के अधिकारी हो| राजा को उसकी बातों में सच्चाई नजर आई| उसकी आँखों में आँसू आ गये अफ़सोस करते करते उसने प्राण त्याग दिये| तो कहने का मतलब यही है की इन्सान सब कुछ जानता भी है कि हमारे साथ कुछ भी नही जाना मालिक की ही भक्ति ही हमारा लोक परलोक सवारनें वाली है| फिर भी वह अपने समय को सांसारिक व्यवहार में ही लगाये रखता है|
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सेठ की तृष्णालुता
कहते हैं एक जौहरी सेठ बड़ा तृष्णालु था| वह कभी-कभी संतों के सत्संग में भी जाया करता था| एक दिन जब वह सत्संग में गया तो वहाँ तृष्णा का प्रसंग चला हुआ था| सत्संग की समाप्ति पर उसने महात्मा जी से प्रश्न किया- भगवान| तृष्णा का नाम तो अनेक बार सुना है किन्तु उसका रूप नहीं देखा, आप कृपा कर के तृष्णा का रूप दिखाये ताकि समझ में आ जाए कि वास्तव में तृष्णा क्या होती है| महात्मा जी बोले अच्छा भाई, कभी दिखायेंगे| समय बीतता गया| प्रश्न करने वाला तो बात को भूल गया लेकिन महात्मा जी को वह बात याद थी| उन का एक और जौहरी सेठ श्रद्धालु था| उससे उन्होंने एक लाल कुछ दिनों के लिए माँग लिया और अपने पालतू कुत्ते के गले में डाल कर सत्संग स्थान के निकट ही खूंटे से कुत्ते को बांध दिया| सत्संग हो रहा था| जिस जौहरी सेठ ने तृष्णा के रूप के विषय में प्रश्न किया था, वह भी सत्संग में बैठा था| सत्संग में बैठे हुए स्वाभाविक ही उसकी दृष्टि कुत्ते के गले पर पड़ी| देखा तो उसके गले में लाखों की कीमत का लाल महात्मा जी ने बांध रखा है| सोचने लगा कि ऐसा लगता है कि महात्मा जी को इस लाल की कीमत का ज्ञान नहीं है न जाने इनको कहाँ से हाथ आ गया और इन्होने एक सुन्दर पत्थर समझकर कुत्ते के गले में बांध दिया| अगर इन्हें पता होता कि यह बड़ी भारी कीमत का लाल है तो ये कुत्ते के गले में न बांधते| मन में लालसा उपजी कि किसी न किसी युक्ति से इस लाल को अपने हाथ में करना चाहिये| दूसरे श्रोतागण तो सत्संग सुन रहे थे परन्तु यह अपने मन में उस लाल को प्राप्त करने की गिनतियाँ गिन रहा था| सत्संग की समाप्ति पर सब लोग तो चले गए परन्तु वह बैठा रहा| महात्मा जी उसके मन की अवस्था जानते थे कि यह क्यों बैठा हुआ है| लोग सन्त महापुरुषों को भोले भाले समझते हैं परन्तु वे भोले भाले होते हुए भी सब के दिलों की जान रहे होते हैं| ऊपर से चाहे किसी को कुछ कहे या न कहे| परन्तु वे जानते सब कुछ है कि किस के मन में किस प्रकार की तार हिलती है| यदि सत्य कहा जाए तो महापुरुष के पास तो शिष्य के मन की अवस्था का एक्सरे लेने की मशीन होती है जिस के द्वारा वे अपने शिष्य के मन की अवस्था को देखते और परखते रहते हैं कि इसमें कोई रोग है या इसका मन शुद्ध है| ऐसा जांचकर वे उस के साथ वैसा ही बरताव करते हैं| महात्मा जी उस सेठ के मन के विचारों को तोल रहे थे कि यह क्या सोच रहा है| इतने में उस सेठ ने संतों के निकट जाकर प्रार्थना की- भगवान| यह आपके कुत्ते के गले में जो चीज बंधी हुई है, यदि यह मुझे मिल जाए तो मैं इस के बदले में बड़ी सुंदर वस्तु कुत्ते के गले में बांधने के लिए लाकर दे सकता हूँ| उसकी बात को सुनकर महात्मा बोले- नहीं भाई| ऐसा हम नहीं करेंगे, हमारे कुत्ते के लिए यही अच्छी चीज है| आप घर जाईए और इस बात की ओर ध्यान न दीजिए| महात्मा जी का इस प्रकार का उत्तर पाकर सेठ निराश हुआ और उसी निराशा की हालत में घर तो चला आया मगर घर में उसको चैन कहाँ? क्योंकि तृष्णा ने अपना मुँह खोल दिया था| वह उसे चैन कहाँ लेने देती थी| थोड़ी देर बाद वह भेंट प्रसाद लेकर ऊपर से श्रद्धा दिखाता हुआ फिर महात्मा जी के पास पहुँचा और अपनी वही इच्छा फिर प्रकट की लेकिन महात्मा जी ने फिर इन्कार कर दिया| बेचारा दु:खी होकर घर वापिस लौट आया लेकिन फिर मन कहता है, चलो पुरुषार्थ करो, शायद सन्त मान जाएँ| यह सोचकर फिर गया, तब भी संतों ने नहीं माना| इसी प्रकार बेचारे ने संतों के पास अनेक चक्कर काटे परन्तु सफलता नहीं हुई|
इधर तृष्णा ने बढ़ते-बढ़ते उसे बावला बना दिया था| उसे खाते- पीते, सोते- जागते हर घड़ी यह चिन्ता सता रही थी कि किसी न किसी ढंग से लाल हाथ आए| अन्त में एक बार जब वह संतों के पास गया तो उन्होंने देखा कि अब यह आपे से बाहर हो चुका है| इस समय यह अपने मान- अपमान और हानि- लाभ को सोचने के योग्य नहीं रहा| लाल की तृष्णा ने इसको अन्धा बनाकर रख दिया है| जब अन्त में सेठ ने संतों के पास जाकर विनय की- भगवन| किसी कीमत पर आप यह वस्तु मुझे दे भी सकते हैं? तब आगे से मुस्कराकर महात्मा जी ने उत्तर दिया- भाई| एक शर्त है, अगर तू उसे मान जाए तो फिर यह वस्तु तुम को मिल सकती है| सेठ प्रसन्न हो गया| कहने लगा- महाराज| जो आपकी आज्ञा हो मुझे स्वीकार है| महात्मा जी बोले- बात यह है अगर इस कुत्ते के साथ मिलकर तू एक थाल में खाना खा ले तो फिर यह कुत्ता भी तेरा और यह वस्तु भी तेरी| दोनों को ले जा, हमने क्या करना है| संतों की वाणी सुनकर वह माया का लोभी सेठ कुत्ते के साथ मिलकर खाना खाने को तैयार हो गया| कहने लगा- महाराज| जो आपकी आज्ञा हो| तब संतों ने अपने एक प्रेमी को आज्ञा दी कि वह भोजन तैयार करे| गुरु के इशारे को समझकर उस प्रेमी ने बहुत ही पतली सी खीर तैयार की जिसमें चावल कम और दूध अधिक था और एक बड़े थाल में भर कर ऊँची जगह पर रखकर ऊपर कुत्ते को छोड दिया| कुत्ता खीर खाने लगा| महात्मा जी बोले- सेठ जी| तुम भी खाओ| देखकर यह दिल में सोचने लगा, बड़ी मुश्किल बनी, अब क्या किया जाए| लेकिन लाल के लोभ ने उसकी आँखों पर पट्टी बांध रखी थी| वह सब कुछ देखता हुआ भी अन्धा हो रहा था| तृष्णा की मलीनता ने उसके मन और बुद्धि को भ्रष्ट कर दिया था| धर्म, कर्म तथा अपना हानि लाभ विचारने की शक्ति तृष्णा रुपी मैंल के ढेर में दब चुकी थी| काफी देर चुप रहने के पश्चात वह इस नतीजे पर पहुँचा कि जो कुछ भी हो, लाल को नहीं छोडना चाहिए| अगर इसमें कोई दोष भी लगेगा तो भी कोई बड़ी बात नहीं, गंगा जी में स्नान करके पवित्र हो आवेंगे| यह सोचकर थाल में से खीर उठाकर मुँह में डालने को ही था कि महात्मा जी ने जो पास ही तैयार खड़े थे, झट से सेठ के हाथ को पकड़ लिया और नीचे की ओर खींचा जिससे खीर हाथ से गिर गई| महात्मा जी बोले- आप ने क्या समझ रखा है, क्या हम जानते नहीं कि यह कुत्ते के गले में बंधा हुआ लाखों की कीमत का सच्चा लाल है| हम सब कुछ जानते हैं और अपनी मर्जी से कुत्ते के गले में यह लाल बांधा हुआ है| आपने समझा होगा कि महात्मा भोले भाले हैं, इन से छल बल करके लाल प्राप्त कर लूँगा| मगर तुम भूल में थे और इसी भूल से ही अपने धर्म से पतित होने लगे थे| सन्तों के वचन सुनकर वह सेठ बहुत लज्जित हुआ और कहने लगा- महाराज| अगर यही बात थी तो आप मुझे पहले ही बतला देते, तो आज मुझे इतना खार तो न होना पड़ता| महात्मा ने कहा- भाई| इसमें कोई बुरा मानने की बात नहीं है| यह तो आपके प्रश्न का उत्तर है जो असली रूप में आप को दिया गया है| आपको याद होगा कि जब आप ने तृष्णा का रूप हम से पूछा था सो वह रूप आपको दरशाया गया है| आप महसूस न कीजिये, सन्तों का प्रयोजन केवल दूसरों को शिक्षा देना होता है, किसी के साथ वैर उनका नहीं होता| महापुरुष के वचन सुनकर उस सेठ की आँखे खुली और चरणों में सिर निवाय क्षमा माँग अपने घर को चला आया|  
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तीनो लड़कों को मुट्ठी भर धान
कहते हैं एक व्यक्ति के तीन लड़के थे एक बार उसने अपने तीनों लड़को की परीक्षा लेनी चाही| उसने अपने तीनों लड़को को मुट्ठी भर धान दी और कहा कि इस धान की तुमने सही सलामत संभाल करनी है तो पहले लड़के ने उस धान को लिया और कहीं पर फैंक दिया| दूसरे लड़के ने उस धान को लिया और उस धान को अलमारी में जाकर रख दिया और तीसरे लड़का जो कि बड़ा समझदार था उसने धान को सही ढंग से उपयोग किया उसके पिता जी की बहुत जमीन थी उसने उस धान को जमीन में डलवा दिया| कुछ समय बाद वहाँ धान की फसल उग गई फिर और धान इकठ्ठा कर और जमीन पर डलवा दिया| इस तरह उसने अपने पिता की सारी जमीन को उपजाऊ बना दिया| कुछ समय बाद पिता ने तीनों लड़को को बुलाया और उनसे वो धान वापिस लाने को कहा| तो पहले लड़के ने तो साफ़ कह दिया कि मैंने धान को फैंक दिया है| दूसरे लड़के से पूछा तो उसने अलमारी में से वह धान निकल कर पिता को दी तो वह काली पड़ चुकी थी| फिर तीसरे लड़के की बारी आई तो उसने पिता को कहा कि पिता जी उस धान को देखने के लिए आपको मेरे साथ चलना पडेगा| तब वह अपने पिता को लेकर उसी जमीन पर गया जहाँ उसने धान डाली थी| अब वहाँ सारी धान फसल में बदल गई थी| तो पिता जी बड़े खुश हुए कि तूने धान का सद्उपयोग किया| कहते हैं इसी तरह सत्संग में भी तीन तरह के लोग आते हैं| एक वो जो सत्संग सुनते है वह उसे वही छोड देते हैं| दूसरे सत्संग सुनते हैं उसे दिल में भी बसाते हैं पर अमल नहीं करते| तीसरे वे जो सत्संग सुनते है दिल में भी बसाते है और अमल भी करते हैं| वे उसी तीसरे लड़के की भांति अपने जीवन को सफल बनाते हैं|
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निन्यानवे का चक्कर
बहुत पहले की बात है- एक नगर में एक साहूकार रहता था जिसकी प्रतिदिन की आमदनी तो अच्छी खासी थी, परन्तु था वह बड़ा जमाखोर और कंजूस| तृष्णा ने उसके दिल में डेरा जमा रखा था और अधिक से अधिक धन जमा करने का उसके दिल में सदा ख्याल बना रहता था| इसलिये घर के खर्च में सदा कंजूसी से काम लेता था| खाने – पीने में कंजूसी, कपड़े लेने में कंजूसी, अन्य खर्चों में भी कंजूसी| परिणाम स्वरुप उसकी पत्नी और बच्चे उसके इस प्रकार के व्यवहार से सदा दुखी रहते| जब पत्नी और बच्चे ही दुखी रहते तो फिर घर में सुख, आनन्द और शान्ति का सवाल ही नहीं था| किन्तु साहूकार को इस बात की तनिक भी चिंता नहीं थी| उस साहूकार के पड़ोस में एक निर्धन व्यक्ति रहता था जो मजदूरी करके निर्वाह करता था| वह मजदूर उसकी पत्नी और एक बच्चा, परिवार में कुल तीन ही सदस्य थे| पुरुष दिन भर मजदूरी करता था और जो कुछ उससे मिलता उसी में परिवार का निर्वाह होता था चूँकि कल की चिंता नहीं थी| अतएव सदा प्रसन्न रहते थे| उनको इस प्रकार प्रसन्नतापूर्वक जीवन व्यतीत करते देखकर साहूकार की पत्नी को आश्चर्य भी होता था और मन में डाह भी होती थी| एक दिन जब साहूकार रात्रि को घर आया तो उसकी पत्नी ने उसे मजदूर की चर्चा करते हुए अपने पति से कहा- देखो| उनकी कमाई यद्यपि हम लोगों से बहुत कम है और वे सदा भोजन खाकर ही गुजारा करते हैं, फिर भी मैं देखती हूँ कि वे सदा खुश रहते हैं| शाम को मजदूर जब घर आता है, तो बच्चे के साथ मिलकर माता- पिता कैसे हँसते खेलते हैं| वे शाम को कभी मंदिर जाते हैं तो कभी मेंला देखने जाते हैं| यानि हर प्रकार से सुख, आनन्द और ख़ुशी से जीवन व्यतीत कर रहे हैं| इधर हमारा परिवार है कि इतनी कमाई होते हुए भी घर में हर समय मायूसी छाई रहती है| न कभी आप बच्चों के लिये कुछ लाते है और न ही उन्हें लेकर कहीं घूमने जाते हो| उसकी बात बीच में ही काटते हुए साहूकार बोला- भाग्यवान| मैं क्या करूँ, मैं अपने स्वभाव के वश में हूँ| मुझे परिवार से अधिक इस बात की चिन्ता रहती है कि जितना धन इस समय मेरे पास है, उससे कई गुणा अधिक धन संचित कर लूँ| इसलिये मेरा सारा ध्यान इसी ओर रहता है| बाकी रही उस मजदूर परिवार की बात, तो वे तुम्हें इसलिये प्रसन्न दिखाई देते हैं, क्योंकि वे अभी निन्यानवे के चक्कर में नहीं आये| एक बार वे निन्यानवे के चक्कर में आ जाये तो फिर उनकी दशा भी देख लेना कि उनकी हँसी – ख़ुशी कैसे काफूर हो जाती है| साहूकार की पत्नी बोली- यह निन्यानवे का चक्कर क्या होता है? मैं समझी नहीं, जरा समझाकर कहिये| साहूकार ने कहा निन्यानवे का चक्कर क्या होता है यह जानना चाहती है तो लो, आज तुम्हें उसका तमाशा दिखाते हैं| यह कहकर साहूकार ने एक थैली ली, उसमें एक रुपये के निन्यानवे सिक्के डाले और जब वह मजदूर लालटेन बुझाकर सोने के लिए लेट गया तो वह थैली उसके घर के आँगन में फैंक दी| थैली की आवाज सुनकर वह मजदूर उठा और आँगन में देखने लगा कि यह आवाज कैसी है| थैली पर नजर पड़ी| उठाकर देखा तो उसमें सिक्के थे| थैली लेकर जल्दी से कमरे में चला गया और पत्नी से कहने लगा- लगता है कि आज भगवान हम पर कृपालु हो गया है जिसने यह धन की थैली हमारे आँगन में फैंकी है, वरना संसारी व्यक्ति ऐसे धन कहाँ फैंकता है? धन देखकर उसकी पत्नी भी बड़ी प्रसन्न हुई किन्तु जब उस मजदूर ने सिक्के गिने तो वे निन्यानवे निकले| यह देखकर वह उदास हो गया और पत्नी से कहने लगा ये तो निन्यानवे है, यदि सौ होते तो कितना अच्छा होता| चलो, कोई बात नहीं| थोड़ी-थोड़ी बचत करके सौ रुपये पूरे कर लेंगे| किन्तु अब यह बताओ कि इन्हें छिपाये कहाँ? इनको खुली जगह पर रखना तो ठीक नहीं है और आपस में परामर्श करके उन्होंने थैली एक स्थान पर छिपा दी| अब रोज थोड़ी-थोड़ी बचत करके उन्होंने सौ रुपये पूरे किये| किन्तु जब सौ हो गए तो तृष्णा ने सुरसा की तरह अपना मुहँ फैलाना शुरू किया और फिर वही हुआ जो तृष्णा के परिणाम स्वरूप होता है अर्थात वह मजदूर – दम्पत्ति और अधिक धन जोड़ने के चक्कर में ऐसे फँसे कि उनका सारा सुख – चैन छिन गया, सारी ख़ुशी जाती रही| कुछ दिन के पश्चात साहूकार ने अपनी पत्नी से कहा- देख लिए निन्यानवे का चक्कर| अब बताओ कि उनकी वह ख़ुशी कहाँ गई? कथा का अभिप्राय यह कि मनुष्य के मन में जब एक बार तृष्णा का निवास हो जाता है, तो फिर वह इसके चक्कर में ऐसा फँस जाता है कि सदा और-और की रट लगाये रखता है| ऐसा मनुष्य कभी सुखी नहीं रह सकता, वह सदैव दुखी एवं परेशान ही रहता है| परमसन्त श्री कबीर साहिब जी के वचन है कि
की त्रिसना है डाकिनी, की जीवन का काल|
और और निसिदित चहै, जीवन करे बेहाल||
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नामरूपी पारस
एक नगर में एक सेठ रहता था| जिसके पास अपार धन-संपत्ति थी और संसार के हर प्रकार के सुख – सुविधा के सामान उसे उपलब्ध थे, परन्तु इतने पर भी उसके मन को तृप्ति न थी और भी अधिक धनवान बनने की कामना भूत की तरह उस पर सवार थी| उस सेठ का एक मित्र सत्संगी और प्रभु का भक्त था| उसका भी नगर में अच्छा व्यापार चलता था, परन्तु वह सांसारिक धन- सम्पदा तथा माया के पदार्थों को बिल्कुल भी महत्व नहीं देता था, अपितु हर प्रकार से संतुष्ट रहते हुए चित्त में परमात्मा के नाम को बसाये रखता था| उसने एक बार घर में सत्संग करवाया| जिसमें उस सेठ को भी आमंत्रित किया| सेठ की सत्संग आदि में यद्यपि कोई रुचि नहीं थी, परन्तु मित्र के निमंत्रण पर उसे सत्संग में सम्मिलित होना पड़ा| सत्संग के प्रसंग में जब पारस का वर्णन आया कि पारस के स्पर्श से लोहा कंचन बन जाता है तो वह चौंक उठा| वह मन में विचार करने लगा कि यदि कहीं से पारस प्राप्त हो जाये तो लोहे को सोने में परिवर्तित करके वह संसार का सब से अधिक धनवान व्यक्ति बन सकता है| फिर क्या था? उसी दिन से वह पारस की खोज में लग गया| पारस की प्राप्ति के लिये वह बड़े-बड़े जौहरियों के पास गया, परन्तु सब जगह निराशा ही उसके हाथ लगी| जिसके पास भी वह पारस का पता करने जाता, उसे यही उत्तर मिलता कि हमने केवल पारस का नाम ही सुना है, उसे देखने का आज तक सुअवसर प्राप्त नहीं हुआ| यदि वह हमारे हाथ आ जाता, तो आज हम संसार में सबसे अधिक धनाढ़य होते, हमारी समानता करने वाला संसार में कोई भी न होता| जौहरियों से जब उसकी इच्छा – पूर्ति न हुई तो उसने मन में यह विचार आया कि पारस की चर्चा तो सत्संग में हुई थी, साधु- महात्माओं से पारस की जानकारी प्राप्त करने का निर्णय किया| उस दिन से उसने यह नियम बना लिया कि जिस किसी साधु – महात्मा को देखता उसे अपने घर ले जाता, बड़े प्रेम से उनकी सेवा करता और जब वे प्रसन्न हो जाते, तो उनके सामने पारस – प्राप्ति की अपनी इच्छा प्रकट कर देता, परन्तु जब वह उसकी इच्छा – पूर्ति करने में अपनी असमर्थता प्रकट करते, तो उसे बड़ी निराशा होती| इसी प्रकार बहुत दिन बीत गए| एक दिन वह निराश और दुखी होकर अकेला बैठा हुआ था कि एक महात्मा जी का आगमन हुआ| उसे दुखी एवं चिंताग्रस्त देखकर महात्मा जी बोले- भगवान की असीम कृपा से सब सुख तुम्हें प्राप्त है, फिर भी तुम दुखी, अशान्त एवं परेशान दिखाई देते हो| ऐसा क्यों? सेठ ने महात्मा जी के चरण पकड़ लिये और सम्पूर्ण वृतान्त सुनाते हुए कहा- मेरे मन में पारस प्राप्त करने की तीव्र इच्छा है कृपा करके बतलाईये कि पारस की प्राप्ति कहाँ से होती है| मैं किसी भी मूल्य पर उसे प्राप्त करना चाहता हूँ| महात्मा जी ने उसे खूब समझाया कि पारस से अगर तुम लोहा सोना बना भी लोगे तो क्या बड़ी बात है| क्या कभी दौलत भी इंसान के साथ जाती है? नाम का सच्चा धन प्राप्त करो जो सदा इंसान के साथ रहता है और सच्चा सुख प्रदान करता है| कबीर साहिब जी के वचन है कि
कबीर सो धन संचिये, जो आगे को होय|
सीस उठाये गाठरी, जाते न देखे कोय||
किन्तु उनके उपदेश का उस सेठ पर तनिक भी प्रभाव न पड़ा| महात्मा जी ने विचार किया कि इसके मन में असत माया की कामना ने पूरी तरह आसन जमा रखा है, इस पर इतनी शीघ्र उपदेश का असर नहीं होगा, इसको काफी समय तक सत्संगति की आवश्यकता है| मन में यह विचार करके महात्मा जी ने सेठ से कहा- यदि पारस प्राप्त करने के लिये तुम इतने अधिक लालायित हो, तो फिर हम तुम्हें एक युक्ति बतलाते हैं| अमुक स्थान पर जो उच्च कोटि के महापुरुष रहते हैं, उनके पास पारस मौजूद हैं| किन्तु वहाँ से धन के बदले तुम पारस प्राप्त नहीं कर सकते| सेठ ने विनय की- तब पारस कैसे प्राप्त होगा? मैं उसे प्राप्त करने के लिए कुछ भी करने को तैयार हूँ| महात्मा जी ने कहा – तो फिर ऐसा करो कि तुम नित्यप्रति उनके आश्रम में जाया करो और तन मन से उनकी सेवा किया करो| तुम्हारी सेवा से प्रसन्न होकर जब वे तुम्हें कुछ माँगने को कहे तो तुरंत पारस माँग लेना| महात्मा जी के कथानुसार सेठ नित्यप्रति महापुरुषों के आश्रम पर जाने लगा और तन-मन से सेवा करने लगा| सेवा के साथ-साथ उसे नित्यप्रति सत्संग सुनने का भी अवसर प्राप्त होता| जब उसे वहाँ जाते और सेवा करते हुए कई दिन हो गए, तो महापुरुषों ने उसे सच्चे नाम की दात बख्शी और सुमिरण ध्यान की विधि बतलाई| कुछ दिन के अभ्यास के बाद जब उसे भजन अभ्यास में रस आने लगा, तो संसार के सब भोग उसे फींके लगने लगे| निरंतर भजनाभ्यास और नाम-सुमिरण करने का फल यह हुआ कि संसार की सब आशाएँ तथा कामनाएँ टिक ही कैसे सकती है? धीरे- धीरे वह नाम के रंग में ऐसा रंग गया कि हर समय नाम की मस्ती में लीन रहने लगा| पारस की बात उसे याद तक न रही| उसकी यह दशा देखकर महापुरुषों ने एक दिन उसे निकट बुलाकर फ़रमाया- हम तुम्हारी सेवा-भक्ति से अति प्रसन्न है| आज जो कुछ माँगना चाहो, माँग लो| हम तुम्हें सब कुछ देने को तैयार है| सेठ ने हाथ जोड़कर विनय की- प्रभो| मुझे केवल आपका आशीर्वाद चाहिये| महापुरुषों ने फ़रमाया- तुम तो हमारे पास पारस प्राप्त करने की इच्छा से आये थे, क्या अब तुम्हें उसकी आवश्यकता नहीं है| सेठ ने विनय की- प्रभो| आपने कृपा करके मुझे जो नामरूपी पारसमणि प्रदान की है, उससे मेरा तन- मन स्वर्णमय अर्थात मूल्यवान बन गया है| असत एवं अनित्य सोने की अब मुझे कोई आवश्यकता नहीं रही, क्योंकि सच्चे नाम की दात बक्श कर आपने मुझे राजाओं का भी राजा बना दिया है|
चाह गई चिंता मिट्टी, मनवा बेपरवाह|
जा को कछु ना चाहिये, सोई बादशाह||
यह उत्तर सुनकर महापुरुष अति प्रसन्न हुए और अपनी कृपा दृष्टि से उसे मालोमाल कर दिया|
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बचपन से ही सत संगत
कथा है – एक सन्त भ्रमण करते हुए एक नगर के बाहर एक मंदिर में ठहरे| उनके आगमन का समाचार सुनकर प्रेमी भक्तों का वहाँ उनके दर्शनार्थ आना-जाना शुरू हो गया, फलस्वरूप वहाँ नित्यप्रति सत्संग होने लगा और श्रद्धालु प्रेमी सत्संग का लाभ उठाने लगे| उन प्रेमियों में एक 10-11 वर्ष का लड़का भी था, जो नियमपूर्वक सत्संग में आता था| वह सबसे पहले आता और साफ़- सफाई और दरियां बिछाने की सेवा करता था| सत्संग समाप्त हो जाने पर वह सबसे बाद में घर जाता था| एक दिन महात्मा जी ने उसे अपने निकट बुलाया और अत्यंत स्नेहपूर्वक उसके शीश पर हाथ फेरते हुए पूछा- बेटा| इस छोटी अवस्था में ही तेरा सत्संग तथा सेवा भक्ति में अनुराग कैसे हो गया? लड़के ने हाथ जोड़कर विनय की- महाराज जी| मेरे माता-पिता सत्संगी है, अत: उनके साथ मुझे भी सत्संग श्रवण करने का सुअवसर जन्म से ही मिलता आ रहा है| पहले मेरा मन इस ओर नहीं लगता था, परन्तु एक दिन एक ऐसी घटना हुई जिसने मेरे विचारों में परिवर्तन ला दिया| उस दिन मेरी माता की तबियत ठीक नहीं थी| उन्होंने मुझे पानी गर्म करने के लिए कहा| मैंने चूल्हे में बड़ी-बड़ी लकड़ियाँ रखकर जलाने की कोशिश की, परन्तु वह आग नहीं पकड़ती थी| यह देखकर मेरी माता जी ने कहा- बेटा| पहले छोटी-छोटी लकड़ियाँ रखकर ऊपर बड़ी लकड़ियाँ जोड़ो और फिर छोटी लकड़ियाँ को सुलगाओ, छोटी लकड़ियाँ जल्दी आग पकड़ती हैं| मैंने वैसा ही किया| सचमुच ही छोटी लकडियों ने आग जल्दी पकड ली| यह देखकर मेरे दिल में विचार उठा कि छोटी आयु में जो कार्य हो सकता है, वह बड़ी आयु में करना कठिन हो जाता है, इसलिए मुझे भी छोटी आयु से ही भजन- सुमिरण में तत्पर हो जाना चाहिए जिससे कि अभी से मेरे दिल में भजन भक्ति के विचार परिपक्व हो जाएँ| यदि एक बार संसार के विचार दिल में प्रविष्ट हो गए, तो फिर उन्हें निकालना कठिन हो जायेगा| इसके अतिरिक्त सत्संग में तो मैं जाता ही रहता था| अत: मेरे मन में यह विचार भी उठा कि मृत्यु का कोई समय निश्चित नहीं है कि कब आ जाए| काल तो यह नहीं देखता कि अमुक व्यक्ति बालक है, युवक है अथवा वृद्ध| वह तो समय आने पर हर एक को ले जाता है| इसलिए ऐसे क्षण भंगुर जीवन पर विश्वास करके अपना समय नष्ट क्यों किया जाए? उस लड़के के ऐसे उत्तम विचार सुनकर सन्त अति प्रसन्न हुए और उसे सच्चे नाम की दात बक्श कर निहाल कर दिया| 
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जाली आयेगा जाल बिच्छायेगा
एक बार बहुत से तोते इकट्ठे बैठे हुए थे| उन्होंने सलाह की कि रोज बहेलिया आता है और कुछ दाने डालकर हमें अपने जाल में फंसा कर ले जाता है, परन्तु अब हमने उसके जाल में फंसना नहीं है| वे तोते जोर-जोर से रट लगाने लगे-
जाली आएगा, जाल बिछाएगा,
दाना डालेगा, मगर हम फसेंगे नहीं|
जब बहेलिया आया तो उसने देखा कि सारे तोते यही रट लगा रहे हैं उसने कुछ समय सोचा कि अब तो ये तोते मेरे जाल में फसेंगे नहीं| फिर उसने मन में विचार किया कि दाना डालकर तो देखें| जैसे ही उसने दाना डाला, वह सारे तोते दाने के लालच में नीचे आ गए और जाल में फंस गए| अब बहेलिया उन्हें पकड़ कर ले जा रहा है और वह तोते यही रट लगाए हुए है –
जाली आएगा, जाल बिछाएगा,
दाना डालेगा, मगर हम फसेंगे नहीं|
रास्ते में एक संत मिले, उन्होंने तोतों की बात सुनी तो अपने मन में विचार करने लगे कि इन्होनें इस बात को केवल जुबान से ही रट लगाई है इसे व्यावहारिक जीवन में अपनाया नहीं|
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लोहे का जंग
एक महापुरुष के पास पारस पत्थर था| एक शिष्य उनके पास आए| सन्त जी ने कहा कि मेरे पास पारस पत्थर है तुम इसे ले जाओ| आज रात तक यह तुम्हारे पास रहेगा| इससे तुम जिस लोहे को स्पर्श करोगे वह सोना बन जाएगा| वह भक्त लालच में आ गया| उसने सोचा कि सवेरे इसको मैंने गुरु जी को वापिस देना है रात ही रात में ज्यादा से ज्यादा लोहे को सोना बना लूँ| उसके घर में एक लोहे का गाडर पड़ा हुआ था| उसने पारस पत्थर को गाडर के साथ स्पर्श किया लेकिन वह लोहे का लोहा ही रहा| अब वह बड़ा हैरान परेशान| जितने समय के लिए उसने महापुरुषों से पारस लिया था उसके बाद उसने वह पारस वापिस लौटाना था लेकिन वह लोहे को सोना न बना सका| लोहा-लोहा ही रहा|  निश्चित समय पर वह महापुरुष आये और उस भक्त से कहा कि क्यों भाई अब तो आपकी दरिद्रता दूर हो गई होगी| उसने कहा गुरु जी नहीं मैंने तो इस गाडर को सोने का बनाना चाहा लेकिन यह तो लोहे का लोहा ही रहा| वह महापुरुष मुस्कुराने लगे और कहा कि देखो तो इस गाडर की हालत क्या है? इसको पहले साफ़ करो| तब उन्होंने छुरी को मँगवाया और उस मैल के आवरण को हटाया तब उस पत्थर का स्पर्श करवाया तो वह लोहा सोना बन गया| अर्थात जब तक हम मन से विकारों को नहीं हटाते तब तक हमे वास्तविक सुख नहीं मिलता जोकि हमारे अंदर ही विद्यमान है
है घट में सूझे नहीं लानत ऐसी जिंद|
तुलसी या संसार को भया मोतियाबिन्द||
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राजा को एक पैसा देना
एक बार एक फ़क़ीर को एक पैसा मिला उसे वह ले गया कि मुझे तो इसकी जरुरत नहीं है इसे किसी गरीब को दे दूंगा| ऐसा उसने सोचा| राजा की सवारी निकल रही थी| फ़क़ीर को राजा ने प्रणाम किया तो फ़क़ीर ने पूछा राजा साहब कहाँ जा रहे हो| उसने कहा महाराज दूसरे देश पर चढ़ाई करने जा रहा हूँ| इससे मेरे देश की सीमाएँ बढेगी और मुझे और धन सम्पदा मिलेगी| तब फ़क़ीर ने सोचा कि इससे बड़ा गरीब और कोई नहीं क्योंकि इसकी वासनाएँ अभी समाप्त नहीं हुई| उसने वह पैसा उसकी हथेली पर रख दिया तो उस राजा को गुस्सा आ गया| वह बोला यह क्या? तो फ़क़ीर ने कहा कि मैंने यह सोचा था कि यह पैसा मैं किसी गरीब को दे दूंगा| परन्तु ऐसा लगता है कि तुमसे बड़ा गरीब और कोई नहीं| जिसकी इच्छाएँ समाप्त नहीं हुई उससे बड़ा गरीब कोई नहीं| तो भाई अपनी इच्छाओं का दमन करो और सत्य नाम उस असली धन की कमाई करो यही जीवन का सार है|   
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पिता द्वारा पुत्र को ज्ञान
एक सेठ जी थे| अधेड़ उम्र में उनके यहाँ एक लड़का हुआ| घर में ज्यादा लाड प्यार मिलने से व धन अधिक होने से उस लड़के को कई व्यसन लग गए| वह जुआ, शराब और वैश्या गमन इत्यादि करने लगा| सेठ जी को जब पता चला तो उन्हें बहुत दुःख हुआ| इधर सेठ जी का अंतिम समय भी आ गया| उन्होंने उस लड़के को बुलाया और उसको कहा कि बेटा मुझे सब पता है कि तुम जुआ, शराब और वैश्या गमन यह सब बुरे व्यसन करते हो| मैं तुम्हें इनमें से किसी भी बात के लिए मना नहीं करता| तुम शराब पीने जाते हो, जरुर जाओ, परन्तु जब तुम्हारे मित्र इत्यादि जाये, उनसे एक घंटा बाद में जाना| तुम जुआ भी खेलो लेकिन जितना धन तुम्हारे मित्र लगाते हैं, उतना ही धन तुम भी जुए में लगाना| और वैश्यओ के पास रात में नहीं, दिन में जाना| अब लड़का जब शराब पीने गया तो अपने मित्रों से एक घंटा बाद में गया| शराब-खाने में जाकर उसने क्या देखा कि सब नशे में धुत है, किसी को कोई होश नहीं, एक दूसरे को गालियाँ दे रहे हैं| उनकी यह दशा देखकर उसने कहा कि ओ हो| मेरी भी यही दशा होती होगी? उसने उस दिन से शराब-खाने में जाना छोड़ दिया| अब वह जुआ खेलने गया तो उतना ही धन लेकर गया जितना उसके मित्र लेकर गए| तब उसे पता चला कि उसके मित्र उसके साथ कितना बड़ा धोखा करते रहे| वह स्वयं तो थोड़ा धन लगाते थे और मेरा सब धन लूट लेते थे| उस दिन से उसने जुआ खेलना भी छोड़ दिया| अब वैश्या गमन के लिए जाने लगा तो उसे अपने पिता की चेतावनी याद आ गई| वह दिन के उजाले में वैश्या के पास गया तो क्या देखा की रात्रि में बिजली की रोशनी में श्रृंगार किये हुए जो वैश्या रूपवान दिखाई देती थी, दिन के उजाले में एक दम बदसूरत| उसने सोचा कि ओ हो मैं आज तक कहाँ भटकता रहा| उस दिन से उसने सारे व्यसन छोड़ दिए|
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बुढ़िया की अठन्नी
सेवक सेव्यभाव बिन, भाव न तरे उरगारि |
भाव के बगैर सेवा हो ही नहीं सकती| जिसका भाव नहीं वह तो एक प्रकार से मजदूरी कर रहा है| भावयुक्त की हुई सेवा ही कल्याणकारी है| तो सदा भाव के साथ सेवा करनी चाहिए| एक मंदिर में निर्माण का कार्य चल रहा था| सभी सेवा – पात्र में अपनी-अपनी सेवा डाल रहे थे| इतने में एक बुढ़िया लाठी टेकती हुई आई और उसने केवल एक अठन्नी उस सेवा पात्र में डाली| तब उसे देखकर हजरत ईसा ने यह वचन फरमाए कि – मैं सच कहता हूँ कि सर्वश्रेष्ठ दान इस बुढ़िया ने दिया है| जिसके पास करोड़ों थे, उन्होंने लाखों दिए, लाखों वालो ने हजारों दिए, हजारों वालो ने सैकड़ों दिए, लेकिन जिसके पास केवल एक अठन्नी थी इसने वह भी अर्पण कर दी अर्थात इसने सर्वस्व अर्पण कर दिया| इसलिए इस मंदिर के निर्माण कार्य में महान दान इस बुढ़िया ने दिया है| तो यह है भाव सहित की हुई सेवा|
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गुस्से में पोचा देना
एक सन्त गाँव में भिक्षा माँगने जाते| एक समय मधुकड़ी माँग कर वह लेते थे| वह प्रत्येक के दरवाजे पर जाते| एक माता उन्हें बहुत गलियाँ देती परन्तु सन्त कहते कि ‘माँ तेरा भला हो’| एक दिन वह माता पोचा लगा रही थी, सन्त ने आवाज दी- भिक्षाम देहि| उस माता को गुस्सा आया तो जो पोचा वह लगा रही थी उसने वही उनके भिक्षा पात्र में डाल दिया जिससे उनका सारा भोजन ख़राब हो गया, परन्तु सन्त ने फिर भी बुरा नहीं माना और यही कहा- ‘माँ तेरा भला हो’| वह सन्त अपनी कुटिया में गये उस मैंले कपड़े को धोया और उसको सुखाकर उसकी छोटी-छोटी बत्तिया बनाई और प्रभु के आगे ज्योत जगाई, जैसे ही वह बत्तिया जली माँ के दिल में पश्चाताप की अग्नि पैदा हो गई और वो कहने लगी ओ हो| मैंने तो उनका सारा भोजन ख़राब कर दिया| दूसरे दिन वह दरवाजे पर खड़ी होकर उस सन्त जी की प्रतीक्षा करने लगी कि कब वह आये और मैं उनसे माफ़ी माँगू| जब वह सन्त पहुँचे तो वह उनके चरणों पर गिरकर उनसे माफ़ी माँगने लगी| तब सन्त ने उसे उठाया और आशीर्वाद दिया| तो ऐसे होते हैं सन्त| संतों का जीवन ही दूसरों के कल्याण के लिए होता है|
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सात दिन के लिए पारस
एक बार एक सन्त जी ने किसी व्यक्ति को पारस  दिया 7 दिन के लिए और फ़रमाया की इन सात दिनों में वो जितने लोहा पारस छुआ कर सोना बनाना चाहता है, बना ले और अपनी गरीबी को दूर कर ले| मैं सात दिन बाद आकर इस पारस को ले जाऊँगा| अब वह व्यक्ति बड़ा ही खुश हुआ| अब वह व्यक्ति बाज़ार में लोहा खरीदने गया| जब लोहे की कीमत पूछी तो उसको कीमत ज्यादा लगी तो उसने मन में यही विचारा की क्या पता कल सस्ता हो जाये लोहा| तो उसने लोहा नहीं लिया| ऐसे करते करते सात दिन बीत गए| यही सोचता रहा की कल सस्ता होगा| पर लोहा सस्ता न हुआ और सात दिन भी बीत गए| जब सन्त जी वापिस आये तो उन्होंने उस व्यक्ति से कहा कि अब तो तुम्हारी गरीबी दूर हो गई होगी| पर उसने दुखी होकर सारी घटना बताई कि कैसे मैंने लोहा लेने का अवसर हाथ से गवाँ दिया| तब सन्त जी ने फ़रमाया कि इसमें तेरी कोई गलती नहीं है| संसार की हालत ही ऐसी है | लोगों को भी पारस रुपी शरीर की कदर नहीं है|
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व्यक्ति की उम्र
एक बार एक सन्त जी किसी व्यक्ति के घर पर गये वहाँ पर जिस व्यक्ति के घर सन्त जी गये थे सन्त जी ने बातों बातों में उस व्यक्ति से उसकी उम्र पूछी| तो उस व्यक्ति ने अपनी उम्र 20 साल बताई जबकि वह दिखने में 40-45 साल का लगता था| लेकिन जब उसने 20 साल बताई तो सन्त जी बड़े हैरान हुए| तब सन्त जी ने उस व्यक्ति से पूछा कि आपके लड़के कितने तो उसने बताया कि मेरा एक ही लड़का है जबकि उसके चार लड़के थे| अब सन्त जी ने उस व्यक्ति से पूछा कि आपके पास धन कितना है तो व्यक्ति ने बताया कि मेरा धन 20000 है तो सन्त फिर हैरान कि लगता तो बहुत पैसे वाला है लेकिन अपनी कमाई बड़ी कम बता रहा है| तब सन्त जी ने कहा कि हम ये तो मान सकते हैं कि तेरा एक लड़का है और तेरा धन 20000 है लेकिन उम्र तो हम 20 साल नहीं मान सकते| तब उस व्यक्ति ने कहा कि मुझे 20 साल ही हुए है नाम की दीक्षा लिए, तो मेरी असली उम्र वही है और मेरे चार लड़के है चार में से एक ही भक्ति करता है तो वही मेरा असली लड़का है और रही धन की बात तो मैंने अभी तक अपने जीवन में 20000 ही मालिक के चरणों में सेवा कार्य में लगाये है तो वही मेरा असली धन है||
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पेड़ की पूजा
कहते हैं कि सेवक कहलाना तो बड़ा ही आसान है लेकिन सेवक धर्म निभाना बड़ा ही मुश्किल है| सेवक वो जो आज्ञा में चले| ऐसे ही एक कथा है कि एक व्यक्ति अपने सतगुरु कि शरण में गया|  उसने श्री चरणों में विनती की कि प्रभु मुझे भक्ति का दान बख्शो| तब सन्त जी ने कहा कि अगर तुम भक्ति चाहते हो तो तुम्हें आज्ञा माननी पड़ेगी और वो आज्ञा यह है कि तुम्हें पेड़ की पूजा करनी है जो कि तुम्हारे सामने लगा हुआ है यही तुम्हारी भक्ति है| सतगुरु जी तो उसकी परीक्षा ले रहे थे| लेकिन वह सेवक भी अपनी आज्ञा में पूर्ण था| सतगुरु की आज्ञा पाते ही पेड़ की पूजा में लग गया| दिन-रात वही बैठा रहता, हर समय उस पेड़ की पूजा में लगा रहता| एक दिन क्या हुआ ठण्डी हवायें चल रही थी उन्ही तेज हवाओं में वह पेड़ भी उड़ने लगा| अब वह व्यक्ति भी उसके पीछे-पीछे भागे| क्योंकि पेड़ में तो उसके सतगुरु की आज्ञा छिपी थी| पेड़ आगे-आगे वह पीछे-पीछे लोग भी देखकर हैरान| लेकिन उसको दुनिया की कोई परवाह नहीं थी क्योंकि जिन्हें मालिक से सच्चा सुख मिलता हो वो दुनिया की परवाह नहीं करते| अन्त में वह पेड़ किसी दरिया में जाकर गिर गया| तो उस व्यक्ति ने भी दरिया में छलांग लगा दी| जैसे ही उसने छलांग लगाई तो भगवान ने नीचे आकर उसे गोद में पकड़ लिया| जब वह भगवान की गोद में पहुँचा तो उसने विनय की कि मुझे छोड दो मुझे पेड़ के पास जाना है| तब भगवान ने बताया कि तुझे मुझ तक ही पहुँचना था मैं ही तेरी असली मंजिल हूँ| तेरी आज्ञा पालना को देखकर मैं बड़ा ही खुश हुआ हूँ| कहने का मतलब यही है कि सतगुरु की आज्ञा ही हमारे जीवन का असली रास्ता है|
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मायादास दूधहारा
एक नगर में मायादास नाम का एक व्यक्ति रहता है जिसके पास बहुत सी गाय –भैंस थी| वह दूध बेच कर अपने घर का निर्वाह करता था| उसकी एक लड़की थी| जिसकी आयु 14 वर्ष थी| वह अपने पिता जी की आज्ञा अनुसार दूध बेचने में अपने पिता की मदद करती थी| उसके पिता ने उसे कह रखा था कि  रोज़ वह दूध  के बर्तन धोकर उसमें पानी डाल दे ताकि पानी दूध में मिल जाये और किसी को इस बारे में पता तक न चले| वही नगर में एक आश्रम में एक सन्त जी रहते थे जोकि सत्संग की गंगा बहाया करते थे और श्रद्धालु आकर उनसे शिक्षा ग्रहण करते थे| मायादास ने अपनी लड़की को समझा रखा था कि वह दूध बेचने नगर के तीनों कोनों में जाये लेकिन चौथे कोने में कभी नहीं जायेगी क्योंकि वहाँ पर घर उजाड़ने वाले महात्मा जी रहते हैं| लेकिन वह यह जानने के लिए कि चौथे कोने पर क्या है, एक दिन वहाँ चली ही गई| वहाँ पर जाकर देखा कि वहाँ महात्मा जी सत्संग कर रहे हैं और काफी मात्रा में लोग उनके सत्संग को सुन कर लाभ उठा रहे हैं| वह भी सत्संग में बैठ गई| सत्संग में महात्मा जी बता रहे थे कि सच्चाई के व्यवहार से जीव उत्तम गति को प्राप्त करता है और असत्य व्यवहार से जीव दुख कलेश पाकर नीच योनियों का शिकार बनता है| महात्मा जी के वचन बड़े मनोहर थे अंत: कन्या के दिल पर गहरे उतर गये| महात्मा जी के वचनों को सुन उसने प्रतिज्ञा कर ली कि आज से वह पिता जी के बर्तनों में पानी नही डालेगी| अब अगला दिन जब आया सौभाग्यवती ने बर्तन में पानी नही डाला तो पिता जी ने उसे पुनः पानी डालने के लिये कहा लेकिन बेटी ने पानी न डाला| पिता समझ गया की यह उन्ही भांडभट्टे की तरफ गई होगी| जहाँ से उलटी पट्टी पढ़कर आई है| तब बेटी ने पिता से कहा यह गलत कार्य है| इससे इंसान नीच योनियों में पड़ जाता है इसलिए आज के बाद में दूध में पानी नही डालूंगी तब पिता ने कहा कि बेटी मैं यह सब तेरे लिए ही करता हूँ| जीवन के निर्वाह के लिए यह जरूरी है| तब बेटी ने कहा पिता जी जो हमारी किस्मत में है वह हमेंशा हमें मिलेगा फिर यह गलत काम क्यों तब पिता ने उस पर क्रोध करना शुरू कर दिया कि तू मेरी बात नही मानेगी तो में तेरी शादी किसी अपंग से कर दूंगा| तब लड़की ने कहा कि पिता जी मेरे नसीब में परमत्मा ने जैसा इन्सान लिखा होगा मैं उसी में खुश हूँ| प्रीतम नगर का राजा लीलाधर रूप बदल कर घूम रहा था| उनकी सारी बाते वह खड़ा होकर सुन रहा था| लड़की  के ऐसे पवित्र  विचार व ईश्वर पर विश्वास देख कर उसने मन में विचार किया कि वह इसी लड़की से शादी करेगा|
 उसने मायादास व उसकी लड़की को अपने राज्ये में बुला उससे विवाह करने की इच्छा जताई| अब मायादास राजा को कैसे मना करता अत: उसने अपनी लडकी की शादी राजा से कर दी| अब वह महारानी बन गई| मायादास यह सब देखकर चकित रह गया| उसको विश्वास हो गया की यह सब महात्मा जी की संगति का असर है| उसने महात्मा जी के पास जाकर अपनी भूलों की क्षमा याचना की तथा उनका सेवक बन गया एवम दूध में पानी मिलाना बन्द कर दिया| अब लीलाधर भी उन्ही महात्मा जी का शिष्य बन गया|
सतगुरु के परसाद से, काग हंस हो जाय |
मलिन विषय रस त्याग कर गुरु के शब्द समाया ||
अर्थात सतपुरुषों के विमल सत्संग को पाकर जीव अपनी कांक वृतियों को छोड़कर हंस वृति ग्रहण कर लेता है | जिस प्रकार एक घड़ी के सत्संग ने सौभाग्यवती व उसके पिता को भी बुराई से बचा लिया|
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सामान के बदले सत्संग
एक बार की बात है  एक लड़का किसी महात्मा जी के पास सत्संग के लिए जाया करता था| एक दिन उस लड़के की माता जी ने उसे बाजार से कुछ सामान लाने के लिए भेजा| जब वह सामान लाने के लिए दुकानदार के पास गया तो दुकानदार ने उस लड़के से सामान के पैसे माँगे लड़के ने कहा कि पैसे तो मेरे पास नहीं है अगर आप चाहे तो मैं आपको महात्मा जनों के सुनाये वचन सुना देता हूँ| तब उस व्यक्ति ने कहा कि सत्संग का मुझे क्या करना मुझे तो पैसों से मतलब है| उनके वचनों से मुझे रोटी कपड़ा तो नहीं मिलेगा| वह लड़का उत्तर सुनकर सीधा महात्मा जी के पास गया और विनय की महाराज आप तो फरमाते है कि सत्पुरुषों के वचनों की प्राप्ति लाखों रुपये खर्च करने पर भी नहीं होती| उस लड़के ने संत जी को सारी बात बताई| संत जी लड़के की दशा को समझ गए उन्होंने एक युक्ति अपनाई संत जी ने लड़के को एक लाल दिया और कहा कि जाओ इस पत्थर की जगह बाजार से सब्जी ले आओ| जब वह बाजार से सब्जी लेने गया तो किसी ने भी उस लाल के बदले सब्जी न दी| सबने यही कहा कि कभी पत्थर की जगह सब्जी मिलती है वह निराश होकर महात्मा जी के पास गया और उन्हें सारी बात बताई | महात्मा जी ने अब उसे जौहरी की दुकान पर पत्थर को बेचने के लिए भेजा| जब जौहरी ने उस लाल को देखा तो पाँच सौ रुपये दिए और कहा कि यह तो इसकी दिखाई है इसकी असली कीमत तो करोड़ो की है| वह लड़का लाल और पैसे लेकर तुरंत वापिस आ गया| महात्मा जी ने कहा कि जिसको इस लाल की पहचान थी उसी ने सही मूल्य बताया बाकी सभी ने इसे पत्थर समझ फैंक दिया| इसी प्रकार महापुरुषों के वचनों की कदर आम जीव नहीं कर सकते| उनके वचनों की कदर तो गुरुमुख पुरुषों के पास होती है|
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