पूर्णा की शिष्य
भक्ति
भगवान बुद्ध के एक
पूर्णा नामक शिष्य थे| यह भक्त अमली कार्यवाही कर रूहानी प्रचारक बने| उन्होंने
भगवान बुद्ध से ‘स्वर्न्प्रनता द्वीप’ में धर्म प्रचार के लिए जाने की आज्ञा
माँगी| तो भगवान बुद्ध जी ने कहा कि- “उस
प्रान्त के लोग जो अत्यंत कठोर तथा क्रूर है तुम्हारी निंदा करेंगे| तुम्हे कैसा
लगेगा?”
भक्त पूर्ण- प्रभु| मैं आपके आशीर्वाद
से आपके द्वारा मिली अध्यात्म विद्या तथा शांति द्वारा उनकी उदंडता पर विजय
प्राप्त कर लूँगा| मैं खुद को भी सांत्वना दूँगा कि वे भले लोग है क्योंकि वे मुझे
मार तो नहीं रहे|
भगवान बुद्ध - यदि
वे पत्थर तथा डंडे मारे तो क्या करोगे?
भक्त पूर्ण –तो भी
मैं समझूंगा कि वे दयालू है, शस्त्र तो नहीं उठा रहे|
भगवान बुद्ध - यदि
वे शस्त्र प्रहार करे तो क्या करोगे?
भक्त पूर्ण- इसमें
भी मुझे आपकी कृपा दिखेगी| मैं सोचूंगा कि उन्होंने दया कर मेरा वध तो नहीं किया
भगवान बुद्ध - ऐसा
नहीं कहा जा सकता कि वे तुम्हारा वध नहीं करेंगे|
भक्त पूर्ण- भगवान,
तब मैं सोचूंगा कि संसार दुःख रूपी है और शरीर नाशवान है| उन्होंने मुझे शरीर से
छुटकारा दिलाकर मुझ पर उपकार किया है| वे लोग बहुत अच्छे सिद्ध होंगे|
भगवान बुद्ध –
शाबाश| तुझ में सहनशीलता
, धैर्य तथा साहस के गुण चरम सीमा तक पहुँच चुके है| तुम निश्चय ही सफलता प्राप्त
करोगे| तुम्हें आज्ञा है तुम जा सकते हो| उनकी भक्ति प्रचार से, तथा सहनशीलता और
धैर्य से तथा आदर्शमयी जीवन से वहाँ के पुरुषों का पावन हृदय भी कोमलता और भक्ति
भावना से भर गया, उन लोगों का जीवन भी सुधर गया|
*****
बुद्ध
जी ने पानी लेने शिष्य को भेजा
एक दिन भगवान बुद्ध कहीं जा रहे थे| उनका
शिष्य आनंद भी साथ था|
वे पैदल चलते -2 बहुत
दूर निकल गए| ज्यादा चलने के कारण वे बहुत थक गए और रास्ते
में आराम करने के लिए वे एक पेड़ के नीचे रुक गए| भगवान
बुद्ध को बहुत जोर की प्यास लगी| उन्होंने
अपने शिष्य आनंद को पानी लाने के लिए कहा| पास
में ही एक झरना बहता था शिष्य आनंद वहाँ गया और थोड़ी देर में खाली हाथ लौट आया और
बोला - "उस झरने के पानी में से अभी-अभी बैलगाड़ियाँ निकली हैं जिसके के कारण पानी गंदा हो गया है और वह पानी पीने योग्य नहीं है| मैं
अभी जाकर नदी से पानी लेकर आता हूँ|" नदी
वहाँ से कुछ दूर थी|
बुद्ध ने कहा - "नहीं, पानी
वहीं झरने से ही लाओ|" आनंद दोबारा गया, पर पानी अब भी
गन्दा था| वह लौट आया और महात्मा बुद्ध जी से बोला कि पानी अभी भी गन्दा है "नदी दूर है तो क्या, मैं अभी दौड़कर पानी लेकर आता हूँ|"
बुद्ध
ने कहा - "नहीं - नहीं पानी उस झरने से ही लाओ|"
बेचारा
आनंद लाचार होकर तीसरी बार नाले पर गया तो देखता क्या है, कीचड़ नीचे जम गई है, पत्तियां इधर-उधर हो गई हैं| पानी एकदम निर्मल है वह खुशी-खुशी पानी
लेकर बुद्ध के पास आ गया|
बुद्ध
ने कहा - "आनंद आदमी के लिए धीरज और शांति बहुत आवश्यक
हैं बिना उसके निर्मलता प्राप्त नहीं होती|"
*****
महात्मा
बुद्ध की तपस्या
एक बार भगवान महावीर जंगल में तपस्या कर रहे थे। वे एकाग्रचित्त
हो प्रभु के ध्यान में रमे थे। उस जंगल में चरवाहे भी गाय, भेड़, बकरियां
चराने आते थे। चूंकि चरवाहे अशिक्षित व अज्ञानी थे इसलिए वे तपस्या के महत्व को
नहीं जानते थे। जब भी वे भगवान महावीर को तपस्यामग्न देखते, उनका
उपहास करते और ध्यान भंग करने की चेष्टा करते, किंतु
महावीर कभी भी इन सबसे विचलित नहीं होते और अपनी तपस्या में अटल भाव से लगे रहते।
धीरे-धीरे यह बात आसपास के गांवों के निवासियों तक भी पहुँची। तब कुछ संपन्न
ग्रामीण जंगल में भगवान महावीर के पास गए। जब उन्होंने आंखें खोलीं, तब
उन ग्रामीणों ने उनसे विनम्र प्रार्थना की। स्वामी जी! नासमझ चरवाहे आपको निरर्थक
ही परेशान कर रहे हैं। हम उनकी ओर से आपसे क्षमा चाहते हैं। हमने यह सोचा है कि हम सभी
मिलकर आपके लिए एक कमरे का निर्माण करवा दें तथा वहाँ आपकी सुरक्षा का भी प्रबंध
कर दें। जिससे आपकी साधना विघ्नरहित चल सके। भगवान महावीर ने उनकी बात शांति से
सुनी और बोले- ये चरवाहे भी मेरे अपने ही हैं। यदि बच्चे प्यार से माता-पिता का
मुँह अपने छोटे-छोटे हाथों से नोचते हैं तो क्या माता-पिता उन्हें गोद में लेने से
इंकार कर देते हैं? नहीं न। आपका धन मेरे लिए कमरा बनवाने की अपेक्षा निराश्रितों
के काम आने पर अधिक उपयोगी रहेगा। ग्रामीणों के साथ वे अज्ञानी चरवाहे भी महावीर
के हृदय की विशालता देखकर उनके चरणों में नतमस्तक हो गए। वस्तुत: जो व्यक्ति ईश्वर से लौ लगाकर उसके ध्यान में रम जाता
है,
उसे कोई भी बाहरी
विघ्न-बाधाएं प्रभावित नहीं कर पातीं।
*****
स्त्री
की रक्षा
एक बार भगवान बुद्ध के दो शिष्य उनसे मिलने जा रहे थे| पूरे
दिन का सफर था| चलते-चलते रास्ते में एक नदी पड़ी| उन्होंने
देखा कि उस नदी में एक स्त्री डूब रही है|
बौद्ध भिक्षुओं के लिए स्त्री का स्पर्श वर्जित माना जाता है| ऐसी
दशा में क्या हो? उन दोनों भिक्षुओं में से एक ने कहा - "हमें धर्म की
मर्यादा का पालन करना चाहिए| स्त्री
डूब रही है तो डूबे! हमें क्या!" लेकिन दूसरा भिक्षु अत्यंत दयावान था|
उसने कहा - "हमारे रहते कोई इस तरह मरे, यह
तो मैं सहन नहीं कर सकता|" इतना कहकर वह पानी में कूद पड़ा डूबती स्त्री को पकड़ लिया और
कंधे का सहारा देकर किनारे पर ले आया|
दूसरे भिक्षु ने उसकी बड़ी भर्त्सना की, रास्ते
भर वह कहता रहा कि- “मैं जाकर तथागत से कहूँगा कि आज तुमने मर्यादा का उल्लंघन करके
कितना बड़ा पाप किया है|” दोनों बुद्ध के सामने पहुँचे तो दूसरे भिक्षु ने एक सांस में
सारी बातें कह सुनाईं - "भिक्षु ने बताया कि मैंने इसको बहुत रोका, पर
यह माना ही नहीं| बड़ा भयंकर पाप किया है इसने|"
बुद्ध ने उसकी बात बड़े ध्यान से सुनी, फिर
पूछा - "इस भिक्षु को उस स्त्री को कंधे पर बाहर लाने में कितना समय लगा होगा?"
"कम-से-कम
पंद्रह मिनट तो लग ही गए होंगे|"
"अच्छा!"
बुद्ध ने पूछा - "इस घटना के बाद यहाँ आने में तुम लोगों को कितना समय लगा?"
भिक्षु ने हिसाब लगाकर उत्तर दिया - "यही कोई छ:
घंटे!"
बुद्ध ने कहा - "भले आदमी! इस बेचारे ने तो उस स्त्री को
पंद्रह मिनट ही अपने कंधे पर रखा, लेकिन
तू तो उसे छ: घंटे से अपने मन में बिठाए हुए है| बोल
दोनों में बड़ा पापी कौन है?
*****
महात्मा
बुद्ध जी को भला बुरा कहना
एक बार गौतम बुद्ध किसी गाँव से गुजर रहे थे| उस गाँव के लोगों को गौतम बुद्ध के बारे
में गलत धारणा थी जिस कारण वे बुद्ध को अपना दुश्मन मानते थे| जब गौतम बुद्ध गाँव में आये तो गाँव
वालों ने बुद्ध को भला बुरा कहा और बदुआएं देने लगे| गौतम बुद्ध गाँव वालों की बातें शांति से सुनते रहे और जब गाँव वाले बोलते
बोलते थक गए तो बुद्ध ने कहा – “अगर आप सभी की बातें समाप्त हो गयी हो तो मैं प्रस्थान करूँ” बुद्ध की बात सुनकर गाँव वालों को
आश्चर्य हुआ| उनमें से एक व्यक्ति ने कहा – “हमने तुम्हारी तारीफ नहीं की है| हम तुम्हे बदुआएं दे रहे है| क्या तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता?”
बुद्ध ने कहा – जाओ मैं आपकी गालियाँ नहीं लेता| आपके द्वारा गालियाँ देने से क्या होता
है, जब तक मैं गालियाँ स्वीकार नहीं करता
इसका कोई परिणाम नहीं होगा| कुछ दिन पहले एक व्यक्ति ने मुझे कुछ उपहार दिया था लेकिन मैंने उस उपहार
को लेने से मना कर दिया तो वह व्यक्ति उपहार को वापस ले गया| जब मैं लूंगा ही नहीं तो कोई मुझे कैसे
दे पाएगा|
बुद्ध ने बड़ी विनम्रता से पूछा – अगर मैंने उपहार नहीं लिया तो उपहार देने
वाले व्यक्ति ने क्या किया होगा|
भीड़ में से किसी ने कहा – उस उपहार को व्यक्ति ने अपने पास रख दिया होगा|
बुद्ध ने कहा – मुझे आप सब पर बड़ी दया आती है क्योंकि मैं आपकी इन गालियों को लेने में
असमर्थ हूँ और इसलिए आपकी यह गालियाँ आपके पास ही रह गयी है| दोस्तों भगवान गौतम बुद्ध के जीवन की यह छोटी सी कहानी
हमारे जीवन में एक बड़ा बदलाव ला सकती है क्योंकि हम में से ज्यादात्तर लोग यही
समझते है कि हमारे दुखों का कारण दूसरे व्यक्ति है| हमारी परेशानियों
या दुखों की वजह कोई अन्य व्यक्ति नहीं हो सकता और अगर हम ऐसा मानते है कि हमारी
परेशानियों की वजह कोई अन्य व्यक्ति है तो हम अपनी स्वंय पर नियंत्रण की कमी एंव
भावनात्मक अक्षमता को अनदेखा करते हैं|
यह हम पर निर्भर
करता है कि हम दूसरों के द्वारा प्रदान की गयी नकारात्मकता को स्वीकार करते हैं या
नहीं| अगर हम नकारात्मकता को स्वीकार करते हैं तो हम स्वंय के पैर पर कुल्हाड़ी मारते
हैं|
*****
बुद्ध
जी को उपहार
भगवान बुद्ध का जब पाटलिपुत्र में शुभागमन हुआ, तो हर व्यक्ति अपनी-अपनी सांपत्तिक
स्थिति के अनुसार उन्हें उपहार देने की योजना बनाने लगा। राजा बिंबिसार ने भी
कीमती हीरे, मोती और रत्न
उन्हें पेश किए। बुद्धदेव ने सबको एक हाथ से
सहर्ष स्वीकार किया। इसके बाद मंत्रियों, सेठों, साहूकारों ने अपने-अपने उपहार उन्हें
अर्पित किए और बुद्धदेव ने उन सबको एक हाथ से स्वीकार कर लिया। इतने
में एक बुढ़िया लाठी टेकते वहाँ आई। बुद्धदेव
को प्रणाम कर वह बोली,
'भगवन्, जिस
समय आपके आने का समाचार मुझे मिला, उस
समय मैं यह अनार खा रही थी। मेरे पास कोई दूसरी चीज न होने के कारण मैं इस अधखाए
फल को ही ले आई हूँ। यदि आप मेरी इस तुच्छ भेंट स्वीकार करें, तो
मैं अहोभाग्य समझूंगी।' भगवान बुद्ध ने दोनों हाथ सामने कर वह फल ग्रहण किया। राजा
बिंबिसार ने जब यह देखा तो उन्होंने बुद्धदेव से कहा, 'भगवन्, क्षमा
करें! एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ। हम सबने आपको कीमती और बड़े-बड़े उपहार दिए
जिन्हें आपने एक हाथ से ग्रहण किया लेकिन इस बुढ़िया द्वारा दिए गए छोटे एवं जूठे
फल को आपने दोनों हाथों से ग्रहण किया, ऐसा
क्यों?' यह सुन बुद्धदेव मुस्कराए और बोले, राजन्!
आप सबने अवश्य बहुमूल्य उपहार दिए हैं किंतु यह सब आपकी संपत्ति का दसवां हिस्सा
भी नहीं है। आपने यह दान दीनों और गरीबों की भलाई के लिए नहीं किया है इसलिए आपका
यह दान 'सात्विक दान' की
श्रेणी में नहीं आ सकता। इसके विपरीत इस बुढ़िया ने अपने मुँह का कौर ही मुझे दे डाला है।
भले ही यह बुढ़िया निर्धन है लेकिन इसे संपत्ति की कोई लालसा नहीं है। यही कारण है
कि इसका दान मैंने खुले हृदय से, दोनों
हाथों से स्वीकार किया है।
*****
पेड़ की शाखा पर बैठकर ध्यान
पो चीन के तांग
राजवंश में उच्चाधिकारी और कवि था| एक दिन उसने एक पेड़ की शाखा पर बैठे बौद्ध
महात्मा को ध्यान करते देखा| उनके मध्य यह वार्तालाप हुआ|
पो: “महात्मा, आप इस पेड़ की शाखा पर बैठकर ध्यान
क्यों कर रहे हैं? ज़रा सी भी गड़बड़
होगी और आप नीचे गिरकर घायल हो जायेंगे!”
महात्मा: “मेरी चिंता करने के लिए आपका धन्यवाद, महामहिम. लेकिन आपकी स्थिति इससे भी
अधिक गंभीर है| यदि मैं कोई गलती करूंगा तो मेरी ही मृत्यु होगी, लेकिन शासन के इतने ऊंचे पद पर बैठकर
आप कोई गलती कर बैठेंगे तो सैंकड़ों-हजारों मनुष्यों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा”|
पो: “शायद आप ठीक कहते हैं| अब मैं कुछ कहूँ? यदि आप मुझे बुद्ध के धर्म का सार एक
वाक्य में बता देंगे तो मैं आपका शिष्य बन जाऊँगा, अन्यथा, मैं आपसे कभी मिलना नहीं चाहूँगा”|
महात्मा: “यह तो बहुत सरल है! सुनिए बुद्ध के
धर्म का सार यह है, ‘बुरा न करो, अच्छा करो, और अपने मन को शुद्ध रखो’|”
पो: “बस इतना ही!? यह तो एक तीन साल का बच्चा भी जानता
है!”
महात्मा: “आपने सही कहा| एक तीन साल के बच्चे को
भी इसका ज्ञान होता है, लेकिन
अस्सी साल के व्यक्ति के लिए भी इसे कर सकना कठिन है.”
*****
डाकू अंगुलिमाल को सही राह दिखाना
बहुत पुरानी बात है मगध राज्य में एक
सोनापुर नाम का गाँव था। उस गाँव के लोग शाम होते ही अपने घरों में आ जाते थे। और
सुबह होने से पहले कोई कोई भी घर के बाहर कदम भी नहीं रखता था।इसका कारण डाकू
अंगुलीमाल था। डाकू अंगुलीमाल मगध
के जंगलों की गुफा में रहता था। वह लोगों को लूटता था और जान से भी मार देता था।
लोगों को डराने के लिए वह जिसे भी मारता उसकी एक ऊँगली काट लेता और उन उँगलियों की
माला बनाकर पहनता। इसलिए उसका नाम अंगुलिमाल पड़ा। गाँव के सभी लोग परेशान थे कैसे
इस डाकू के आतंक से छुटकारा मिले। एक दिन गौतम बुद्ध
उस गाँव में आये। गाँव के लोग उनकी आवभगत करने लगे। गौतम बुद्ध ने देखा कि गाँव के
लोगों में किसी बात को लेकर दहशत फैली है!तब गौतम बुद्ध ने गाँव वालों से इसका
कारण पूछा- ये सुनते ही गाँव वालों ने अंगुलिमाल के आतंक का पूरा किस्सा उन्हें
सुनाया। अगले ही दिन गौतम बुद्ध जंगल की तरफ निकल गये, गाँव वालों ने उन्हें बहुत रोका पर वो
नहीं माने। बुद्ध को आते देख अंगुलिमाल हाथों में तलवार लेकर खड़ा हो गया, पर बुद्ध उसकी गुफा के सामने से निकल
गए उन्होंने पलटकर भी नहीं देखा। अंगुलिमाल उनके पीछे दौड़ा, पर दिव्य प्रभाव के कारण वो बुद्ध को
पकड़ नहीं
पा रहा था। थक हार कर उसने कहा- “रुको” बुद्ध रुक गए और मुस्कुराकर बोले-
मैं तो कब का रुक गया पर तुम कब ये हिंसा रोकोगे। अंगुलिमाल
ने कहा- सन्यासी तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता। सारा मगध मुझसे डरता है। तुम्हारे पास जो भी
माल है निकाल दो वरना, जान से हाथ धो बैठोगे। मैं इस राज्य का सबसे शक्तिशाली
व्यक्ति हूँ। बुद्ध जरा भी नहीं घबराये और बोले- मैं ये कैसे मान लूँ कि
तुम ही इस राज्य के सबसे शक्तिशाली
इन्सान हो। तुम्हें ये साबित करके दिखाना होगा।
अंगुलिमाल बोला बताओ- “कैसे साबित करना होगा?”।
बुद्ध ने कहा- “तुम उस पेड़ से दस पत्तियां तोड़ कर लाओ”।
अंगुलिमाल ने कहा- बस इतनी सी बात, “मैं तो पूरा पेड़ उखाड़ सकता हूँ”।
अंगुलिमाल ने दस पत्तियां तोड़कर ला दीं। बुद्ध
ने कहा- अब इन पत्तियों को वापस पेड़ पर जाकर लगा दो।
अंगुलिमाल ने हैरान होकर कहा- टूटे हुए पत्ते कहीं वापस लगते
हैं क्या ?
तो बुद्ध बोले – जब तुम इतनी छोटी सी चीज़ को वापस नहीं जोड़ सकते तो तुम सबसे
शक्तिशाली कैसे हुए? यदि तुम किसी चीज़ को जोड़ नहीं सकते तो
कम से कम उसे तोड़ो मत, यदि किसी को जीवन नहीं दे सकते तो उसे म्रत्यु देने का भी
तुम्हे कोई अधिकार नहीं है। ये सुनकर अंगुलीमाल को अपनी गलती का
एहसास हो गया। वह बुद्ध का शिष्य बन गया। और उसी गाँव में रहकर लोगों की सेवा करने
लगा। आगे चलकर यही अंगुलिमाल बहुत बड़ा सन्यासी बना और अहिंसका के
नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस कहानी से हमें यह
शिक्षा मिलती है कि कोई भी इन्सान कितना ही बुरा क्यों न हो, वह
बदल सकता है। दोस्तों,
अंगुलिमाल बुराई का
एक प्रतीक है, और हम सबमें छोटे-बड़े रूप में कोई न कोई बुराई है। ज़रूरत इस बात
की है कि हम अपने अन्दर की बुराइयों को पहचाने और उन्हें ख़त्म करें।
*****
बुद्ध जी के पैरों की रेखा
एक
गर्म दोपहरी थी। भगवान बुद्ध नदी किनारे चले जा रहे थे। आस-पास कहीं कोई वृक्ष
नहीं था। चारों ओर बालू का विस्तार फैला हुआ था। भगवान के पैरों की चित्रवत छाप
से बने निशान अति सुंदर लग रहे थे। दूर तक कोई बड़ा पेड़ न होने के कारण बुद्ध पास
ही एक झाड़ी की छांव तले विश्राम करने लगे। उधर से काशी से ज्योतिष पढ़कर एक
महापंडित अपने घर लौट रहा था। गर्मी के कारण वह बैलगाड़ी से उतर कर पानी पीने नदी
के किनारे आया। बालू पर बुद्ध के पैरों की छाप देखकर वह हैरत में पड़ गया। वह
सोचने लगा कि इस दोपहरी में ये पदचिह्न इस जंगल में कैसे हो सकते हैं। अगर लक्षणों
को देखें, तो बारह वर्ष तक
मैंने जो सीखा है, वह बेकार है। क्योंकि
चरणचिह्न पर जो रेखाएं थीं, वे
उन शास्त्रों के अनुसार चक्रवर्ती सम्राट की होनी चाहिए। लेकिन जिस व्यक्ति को
वह सामने लेटा देख रहा था, वह
तो भिखारी था। उसके कपड़े फटे हुए, नंगे
पैर धूप में चलने से लहूलुहान हो गए थे। पर उसके चेहरे पर तेज था। एक आभा थी। वह
उनके जगने का इंतजार करने लगा। उसके मन में विचारों का झंझावात चल रहा था। अचानक
भगवान ने आंखें खोलीं, सामने
एक ज्योतिषी को बैठे देखा और मुस्कराए। ज्योतिषी ने दोनों हाथ जोड़कर निवेदन
किया कि आपके पैरों में जो पद्म है, वह
अति दुर्लभ है, हजारों साल में कभी
किसी भाग्यशाली में देखने को मिलता है। हमारी ज्योतिष विद्या कहती है कि आपको
चक्रवर्ती सम्राट होना चाहिए, परंतु
आप तो...। भगवान बुद्ध हंसे और कहा, जब
तक मैं बंधा था इस प्रकृति की पकड़ में, तब
तक आपका यह ज्योतिष काम करता था। अब मैं सब बंधनों से मुक्त हो गया हूँ। आपका
ज्योतिष मुझ पर काम नहीं कर सकता।
*****
गिलहरी का प्रयास
भगवान बुद्ध ज्ञान प्राप्ति के लिए घोर तप में लगे थे। उन्होंने शरीर को काफी कष्ट दिया, यात्राएं कीं,
घने जंगलों में कड़ी साधना की,
पर आत्मज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। एक दिन निराश हो बुद्ध सोचने लगे- मैंने अभी तक कुछ भी प्राप्त नहीं किया। अब आगे क्या कर पाऊंगा?
निराशा,
और अविश्वास के इन नकारात्मक भावों ने उन्हें क्षुब्ध कर दिया। कुछ ही क्षणों बाद उन्हें प्यास लगी। वे थोड़ी दूर स्थित एक झील तक पहुँचे। वहाँ उन्होंने एक दृश्य देखा कि एक नन्ही-सी गिलहरी के दो बच्चे झील में डूब गए। पहले तो वह गिलहरी जड़वत बैठी रही, फिर कुछ देर बाद उठकर झील के पास गई, अपना सारा शरीर झील के पानी में भिगोया और फिर बाहर आकर पानी झाड़ने लगी। ऐसा वह बार-बार करने लगी। बुद्ध सोचने लगे: इस गिलहरी का प्रयास कितना मूर्खतापूर्ण है। क्या कभी यह इस झील को सुखा सकेगी? किंतु गिलहरी यह क्रम लगातार जारी था। बुद्ध को लगा मानो गिलहरी कह रही हो कि यह झील कभी खाली होगी या नहीं, यह मैं नहीं जानती,
किंतु मैं अपना प्रयास नहीं छोड़ूंगी। अंतत: उस छोटी-सी गिलहरी ने भगवान बुद्ध को अपने लक्ष्य-मार्ग से विचलित होने से बचा लिया।
वे सोचने लगे कि जब यह नन्ही गिलहरी अपने प्रयास
से झील को सुखा देने के लिए दृढ़ संकल्पित है तो मुझमें क्या कमी है? मैं तो इससे हजार गुना अधिक क्षमता रखता हूँ। यह सोचकर गौतम बुद्ध पुन:
अपनी साधना में लग गए और एक दिन बोधि
वृक्ष तले उन्हें ज्ञान का आलोक प्राप्त हुआ।
*****
सकल्पशक्ति का विकास
एक बार गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ किसी पर्वतीय स्थल पर ठहरे थे। शाम के समय वह अपने एक शिष्य के साथ भ्रमण के लिए निकले। दोनों प्रकृति के मोहक दृश्य का आनंद ले रहे थे। विशाल और मजबूत चट्टानों को देख शिष्य के भीतर उत्सुकता जागी। उसने पूछा,
‘इन चट्टानों पर तो किसी का शासन नहीं होगा क्योंकि ये अटल,
अविचल और कठोर हैं।’
शिष्य की बात सुनकर बुद्ध बोले,
‘नहीं, इन शक्तिशाली चट्टानों पर भी किसी का शासन है।
लोहे के प्रहार से इन चट्टानों के भी टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं।’
इस पर शिष्य बोला,
‘तब तो लोहा सर्वशक्तिशाली हुआ?’ बुद्ध मुस्कराए और बोले,
‘नहीं। अग्नि अपने ताप से लोहे का रूप परिवर्तित कर सकती है।’
उन्हें धैर्यपूर्वक सुन रहे शिष्य ने कहा, ‘मतलब अग्नि सबसे ज्यादा शक्तिवान है।’ नहीं।’
बुद्ध ने फिर उसी भाव से उत्तर दिया,
‘जल, अग्नि की उष्णता को शीतलता में बदलता देता है तथा अग्नि को शांत कर देता है।’
शिष्य कुछ सोचने लग गया। बुद्ध समझ गए कि उसकी जिज्ञासा अब भी पूरी तरह शांत नहीं हुई है। शिष्य ने फिर सवाल किया,
‘आखिर जल पर किसका शासन है?’
बुद्ध ने उत्तर दिया,
‘वायु का। वायु का वेग जल की दिशा भी बदल देता है।’
शिष्य कुछ कहता उससे पहले ही बुद्ध ने कहा, ‘अब तुम कहोगे कि पवन सबसे शक्तिशाली हुआ। नहीं, पवन सबसे शक्तिशाली नहीं है। सबसे शक्तिशाली है मनुष्य की संकल्पशक्ति, क्योंकि इसी से पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि को नियंत्रित किया जा सकता है। अपनी संकल्पशक्ति से ही अपने भीतर व्याप्त कठोरता, ऊष्णता और शीतलता के आगमन को नियंत्रित किया जा सकता है, इसलिए संकल्पशक्ति ही सर्वशक्तिशाली है। जीवन में कुछ भी महत्वपूर्ण कार्य संकल्पशक्ति के बगैर असंभव है। इसलिए अपने भीतर संकल्पशक्ति का विकास करो।’ यह सुनकर शिष्य की जिज्ञासा शांत हो गई।
*****
किसान
के घर प्रवचन का आयोजन
एक बार बुद्ध एक गांव में अपने किसान भक्त के यहाँ गए। शाम को किसान ने उनके प्रवचन का आयोजन किया। बुद्ध का प्रवचन सुनने के लिए गाँव के सभी लोग उपस्थित थे,
लेकिन वह भक्त ही कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। गाँव के लोगों में कानाफूसी होने लगी कि कैसा भक्त है कि प्रवचन का आयोजन करके स्वयं गायब हो गया। प्रवचन खत्म होने के बाद सब लोग घर चले गए। रात में किसान घर लौटा। बुद्ध ने पूछा,
कहाँ चले गए थे?
गाँव के सभी लोग तुम्हें पूछ रहे थे। किसान ने कहा, दरअसल प्रवचन की सारी व्यवस्था हो गई थी, पर तभी अचानक मेरा बैल बीमार हो गया। पहले तो मैंने घरेलू उपचार करके उसे ठीक करने की कोशिश की, लेकिन जब उसकी तबीयत ज्यादा खराब होने लगी तो मुझे उसे लेकर पशु चिकित्सक के पास जाना पड़ा। अगर नहीं ले जाता तो वह नहीं बचता। आपका प्रवचन तो मैं बाद में भी सुन लूंगा। अगले दिन सुबह जब गाँव वाले पुन: बुद्ध के पास आए तो उन्होंने किसान की शिकायत करते हुए कहा, यह तो आपका भक्त होने का दिखावा करता है। प्रवचन का आयोजन कर स्वयं ही गायब हो जाता है। बुद्ध ने उन्हें पूरी घटना सुनाई और फिर समझाया, उसने प्रवचन सुनने की जगह कर्म को महत्व देकर यह सिद्ध कर दिया कि मेरी शिक्षा को उसने बिल्कुल ठीक ढंग से समझा है। उसे अब मेरे प्रवचन की आवश्यकता नहीं है। मैं यही तो समझाता हूँ कि अपने विवेक और बुद्धि से सोचो कि कौन सा काम पहले किया जाना जरूरी है। यदि किसान बीमार बैल को छोड़ कर मेरा प्रवचन सुनने को प्राथमिकता देता तो दवा के बगैर बैल के प्राण निकल जाते। उसके बाद तो मेरा प्रवचन देना ही व्यर्थ हो जाता। मेरे प्रवचन का सार यही है कि सब कुछ त्यागकर प्राणी मात्र की रक्षा करो। इस घटना के माध्यम से गांव वालों ने भी उनके प्रवचन का भाव समझ लिया।
*****
अपने
आप को गिराना
एक
बार कि बात है एक बहुत बड़ा राजा था| उसके पास किसी चीज की कमी नहीं थी अपार धन था|
लेकिन एक दिन उसने अपनी महारानी से कहा कि मेरे पास सब कुछ है लेकिन मेरे पास
शांति नहीं है| महारानी ने कहा अगर आपको सच्चे मन से शांति की तलाश है तो हमारे
नगर एक बाहर महात्मा बुद्ध रहते है जिनके दर्शन मात्र से सारे दुःख दूर हो जाते
है| और अलौकिक शांति का अनुभव होता है| अब राजा जाने के लिए तैयार हो हया अब सोचने
लगा कि मैं संतो के पास जा रहा हूँ तो वहाँ और लोग भी होंगे तो कुछ उपहार ले कर
जाऊं| उसने अपने खजाने से एक अनमोल मोती निकाला तब महारानी ने कहा कि ये आप ये क्या लेकर जा रहे हो| जिनके पास आप जा रहे हो वो
स्वंय सम्राट है वो चक्रवती सम्राट है उन्होंने तो धन सम्पदा सब त्याग कर वो फकीर
हुए है और उनके पास तो वो धन है जो त्रिलोकी में किसी के पास नहीं है| अब राजा ने
रानी के कहने पर एक पुष्प मंगवाया पुष्प भी कोई साधारण पुष्प नहीं था बहुत अनमोल
पुष्प था| क्योंकि वो राजा था तो छोटी मोटी चीज कैसे ले जा सकता है| अब एक हाथ में
उसके मोती था और एक हाथ में कमल था| अब उसके मन में ये भाव था कि मैं जब भेंट
करूँगा तो हजारों आदमियों के बीच में सबसे अनमोल भेंट करूँगा| अब राजा धीरे -2 बढ़ा भगवान बुद्ध तक पहुंचा भगवान बुद्ध
ने पूछा कि राजन कैसे आना हुआ तब राजा ने कहा कि महाराज सब कुछ है लेकिन शांति
नहीं है| तब महात्मा बुद्ध जी राजा से पूछा कि मुट्ठी में क्या है तब राजा ने कहा
कि अनमोल मोती है तब महात्मा जी ने कहा कि गिरा दे इसे तब राजा को महारानी ने कहा
जैसा कहते है भगवान बुद्ध वैसे करते जाओ राजा ने मोती गिरा दिया फिर भगवान बुद्ध
ने कहा कि दूसरी मुट्ठी में क्या है तब राजा ने कहा कि अंमल पुष्प है तब भगवान
बुद्ध ने कहा कि राजा गिरा दे इसे तब राजा ने उस पुष्प को भी गिरा दी फिर भगवान
बुद्ध ने कहा कि राजा अब खुद भी गिर जा अब राजा सोच में पड़ गया कि इतने लोग बैठे
है यहाँ मैं कैसे गिरूँ तब सोच में पड़ गया तब महारानी ने कहा कि जैसा कहते है वैसा
करों तब राजा खुद भी गिर गया जो जब राजा गिरा तो राजा नहीं गिरा उसका अहंकार भी
गिर गया| जब अहंकार गिरा तो उसे परम सुख, परम आनंद की प्राप्ति हुई|
****
सेठ के लड़के को
ज्ञान
एक शहर में एक बड़ा
सेठ था उसका एक लड़का था जोकि बड़ा आलसी था| ऐसा अक्सर देखने में आता है कि जिस
बच्चे को माता पिता का ज्यादा लाड प्यार मिलता है वह अकसर बिगड़ जाते है| एक बार उस
शहर में महात्मा बुद्ध जी ने कृपा फरमाई तो वह सेठ महात्मा बुद्ध जी के दर्शन करने
गया और वहाँ से जब वापिस आया तो उसने अपने बेटे को कहा कि तुम भी महात्मा बुद्ध जी
के सत्संग में जाओ मैं तुम्हे 100 सोने के सिक्के दूंगा| अब इसी लालच में वह लड़का
सत्संग में चला गया जब वापिस आया तो पिता जी ने उससे पूछा कि मुझे सत्संग सुनाओ कि
महात्मा बुद्ध जी ने क्या वचन किए तब उसने कहा कि पिता जी अपने मुझे सत्संग में
जाने को कहा था सत्संग सुनने के लिए नहीं कहा था तब वह सेठ अपने बेटे से कहने लगा
ठीक है मैं तुम्हे 10000 सोने के सिक्के देता हूँ तुम कल सत्संग में जाना और
सत्संग सुन कर आना तब वह लड़का अग ले दिन सत्संग में गया| अब शाम हो गई लेकिन सेठ
का लड़का सत्संग से वापिस ही नहीं आया तब सेठ चिंतित हो उठा जब वह सेठ वहाँ पहुँचा तो उसने देखा कि
उसका बेटा ध्यान में बैठा है जब उसने अपने बेटे से पूछा कि तुम घर वापिस क्यों
नहीं आये तो तो बेटे ने कहा पिता जी आपने मुझे सत्संग सुनने की आज्ञा की थी अब जब
मैंने सत्संग सुन लिया है तो अब यही मेरा घर है यही मेरा सब कुछ है|
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शिष्य का संशय
एक बार महात्मा
बुद्ध जी के एक शिष्य के मन में संशय पैदा हो गया कि गुरुदेव बदल गए है उनका
व्यवहार बदल गया है| उसके मन में द्वन्द उठने लगे| तब महात्मा बुद्ध ने एक रथकार
को रथ के दो पहिए लेकर बुलवाया| रथकार जब पहिए लेकर आया तो जब रथकार ने पहला पहिया
चलाया तो वह बिना गिरे डगमगाए सीधा चलता रहा और एक जगह जाकर रुक गया जब रथकार ने
दूसरा पहिया चलाया तो वह पहिया डगमगाता हुआ थोड़ी ही देर में जाकर दिर गया| तो
महात्मा बुद्ध ने उससे पूछा कि पहिए तो दोनों तुमने बनाए है लेकिन पहला पहिया तो
बिलकुल सीधा खड़ा है और दूसरा पहिया न सीधा चला पाया और न ही खड़ा है तब रथकार ने
कहा कि इसका एक बड़ा कारण है वो कारण क्या है कि जो पहला पहिया जब उसकी गोलाई कि गई
तब लकड़ी को अनेको यातनाये सहन करनी पड़ी तभी पूरी तरह से गोला पण और ठोसपन आया तभी
वह पहिया बिना डगमगाए अपनी मंजिल तक पहँच गया | लेकिन दूसरा पहिया है वो मेरी इतनी
यातनाए नहीं सहन कर पाया लकड़ी में टेढ़ापन रह गया यही कारण है वो अपनी मंजिल तक
नहीं पहँच पाया और दूसरा पहिया जल्दी गिर गया| तब महात्मा बुद्ध जी ने अपने शिष्य
को समझाया कि जिसके मन में गांठे भरी है, जिसके मन में संशय भरे होते है उसके मन
में शांति की प्राप्ति नहीं हो सकती और जो जीव बना संशय के महापुरुषों के चरणों
में अपने जीवन को न्यौछावर कर देता है वो सदा शांत रहता है सदा आनंद में रहता है |
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