Monday, May 11, 2020

प्रेरक प्रसंग- VI

बंधन

एक आदमी कहीं से गुजर रहा था, तभी उसने सड़क के किनारे बंधे हाथियों को देखा, और अचानक रुक गया. उसने देखा कि हाथियों के अगले पैर में एक रस्सी बंधी हुई है, उसे इस बात का बड़ा अचरज हुआ की हाथी जैसे विशालकाय जीव लोहे की जंजीरों की जगह बस एक छोटी सी रस्सी से बंधे हुए हैं! ये स्पष्ट था कि हाथी जब चाहते तब अपने बंधन तोड़ कर कहीं भी जा सकते थे, पर किसी वजह से वो ऐसा नहीं कर रहे थे| उसने पास खड़े महावत से पूछा कि भला ये हाथी किस प्रकार इतनी शांति से खड़े हैं और भागने का प्रयास नही कर रहे हैं? तब महावत ने कहा, ” इन हाथियों को छोटे पर से ही इन रस्सियों से बाँधा जाता है, उस समय इनके पास इतनी शक्ति नहीं होती की इस बंधन को तोड़ सकें|. बार-बार प्रयास करने पर भी रस्सी ना तोड़ पाने के कारण उन्हें धीरे-धीरे यकीन होता जाता है कि वो इन रस्सियों को नहीं तोड़ सकते,और बड़े होने पर भी उनका ये यकीन बना रहता है, इसलिए वो कभी इसे तोड़ने का प्रयास ही नहीं करते.”| आदमी आश्चर्य में पड़ गया कि ये ताकतवर जानवर सिर्फ इसलिए अपना बंधन नहीं तोड़ सकते क्योंकि वो इस बात में यकीन करते हैं| इन हाथियों की तरह ही हममें से कितने लोग सिर्फ पहले मिली असफलता के कारण ये मान बैठते हैं कि अब हमसे ये काम हो ही नहीं सकता और अपनी ही बनाई हुई मानसिक जंजीरों में जकड़े-जकड़े पूरा जीवन गुजार देते हैं|

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आखिरी उपदेश

गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों  में आज काफी उत्साह था, उनकी बारह वर्षों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही थी| और अब वो अपने घरों को लौट सकते थे| गुरु जी भी अपने शिष्यों की शिक्षा-दीक्षा से प्रसन्न थे और गुरुकुल की परंपरा के अनुसार शिष्यों को आखिरी उपदेश देने की तैयारी कर रहे थे। उन्होंने ऊँची आवाज़ में कहा,” आप सभी एक जगह एकत्रित हो जाएं, मुझे आपको आखिरी उपदेश देना है|गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए सभी शिष्य एक जगह एकत्रित हो गए| गुरु जी ने अपने हाथ में कुछ लकड़ी के खिलौने पकडे हुए थे, उन्होंने शिष्यों को खिलौने दिखाते हुए कहा, ” आप को इन तीनो खिलौनों में अंतर ढूँढने हैं।सभी शिष्य ध्यानपूर्वक खिलौनों को देखने लगे, तीनो लकड़ी से बने बिल्कुल एक समान दिखने वाले गुड्डे थे| सभी चकित थे की भला इनमे क्या अंतर हो सकता है? तभी किसी ने कहा,” अरे, ये देखो इस गुड्डे में एक छेद है| यह संकेत काफी था, जल्द ही शिष्यों ने पता लगा लिया और गुरु जी से बोलेगुरु जी इन गुड्डों में बस इतना ही अंतर है कि

एक के दोनों कान में छेद है|

दूसरे के एक कान और एक मुंह में छेद है|

और तीसरे के सिर्फ एक कान में छेद है

गुरु जी बोले, ”बिल्कुल सही, और उन्होंने धातु का एक पतला तार देते हुए उसे कान के छेद में डालने के लिए कहा|” शिष्यों  ने वैसा ही किया| तार पहले गुड्डे के एक कान से होता हुआ दूसरे कान से निकल गया , दूसरे गुड्डे के कान से होते हुए मुंह से निकल गया और तीसरे के कान में घुसा पर कहीं से निकल नहीं पाया| तब  गुरु जी ने शिष्यों से गुड्डे अपने हाथ में लेते हुए कहा, ”प्रिय शिष्यों, इन तीन गुड्डों की तरह ही आपके जीवन में तीन तरह के व्यक्ति आयेंगे| पहला गुड्डा ऐसे व्यक्तियों को दर्शाता है जो आपकी बात एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देंगे, आप ऐसे लोगों से कभी अपनी समस्या साझा ना करें| दूसरा गुड्डा ऐसे लोगों को दर्शाता है जो आपकी बात सुनते हैं और उसे दूसरों के सामने जा कर बोलते हैं, इनसे बचें, और कभी अपनी महत्त्वपूर्ण बातें इन्हें ना बताएँ। और  तीसरा गुड्डा ऐसे लोगों का प्रतीक है जिनपर आप भरोसा कर सकते हैं, और उनसे किसी भी तरह का विचार विमर्श कर सकते हैं, सलाह ले सकते हैं, यही वो लोग हैं जो आपकी ताकत है और इन्हें आपको कभी नहीं खोना चाहिए|

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वश में करना

बहुत समय पहले की बात है, एक वृद्ध सन्यासी हिमालय की पहाड़ियों में कहीं रहता था| वह बड़ा ज्ञानी था और उसकी बुद्धिमत्ता की ख्याति दूर -दूर तक फैली थी| एक दिन एक औरत उसके पास पहुंची और अपना दुखड़ा रोने लगीबाबा, मेरा पति मुझसे बहुत प्रेम करता था, लेकिन वह जबसे युद्ध से लौटा है ठीक से बात तक नहीं करता|  युद्ध लोगों के साथ ऐसा ही करता है| सन्यासी बोला|  लोग कहते हैं कि आपकी दी हुई जड़ी-बूटी इंसान में फिर से प्रेम उत्पन्न कर सकती है, कृप्या आप मुझे वो जड़ी-बूटी दे दें|”, महिला ने विनती की|  सन्यासी ने कुछ सोचा और फिर बोला,” देवी मैं तुम्हे वह जड़ी-बूटी ज़रूर दे देता लेकिन उसे बनाने के लिए एक ऐसी चीज चाहिए जो मेरे पास नहीं है|

आपको क्या चाहिए मुझे बताइए मैं लेकर आउंगी|, महिला बोली| मुझे बाघ की मूंछ का एक बाल चाहिए|”, सन्यासी बोला| अगले ही दिन महिला बाघ की तलाश में जंगल में निकल पड़ी, बहुत खोजने के बाद उसे नदी के किनारे एक बाघ दिखा, बाघ उसे देखते ही दहाड़ा, महिला सहम गयी और तेजी से वापस चली गयी|

अगले कुछ दिनों तक यही हुआ, महिला हिम्मत कर के उस बाघ के पास पहुँचती और डर कर वापस चली जाती| महीना बीतते-बीतते बाघ को महिला की मौजूदगी की आदत पड़ गयी, और अब वह उसे देख कर सामान्य ही रहता| अब तो महिला बाघ के लिए मांस भी लाने लगी, और बाघ बड़े चाव से उसे खाता| उनकी दोस्ती बढ़ने लगी और अब महिला बाघ को थपथपाने भी लगी. और देखते ही देखते एक दिन वो भी आ गया जब उसने हिम्मत दिखाते हुए बाघ की मूंछ का एक बाल भी निकाल लिया|
फिर क्या था, वह बिना देरी किये सन्यासी के पास पहुंची, और बोली
मैं बाल ले आई बाबा,” “बहुत अच्छे!और ऐसा कहते हुए सन्यासी ने बाल को जलती हुई आग में फ़ेंक दियाअरे ये क्या बाबा, आप नहीं जानते इस बाल को लाने के लिए मैंने कितने प्रयत्न किये और आपने इसे जला दिया अब मेरी जड़ी-बूटी कैसे बनेगी?” महिला घबराते हुए बोली|अब तुम्हे किसी जड़ी-बूटी की ज़रुरत नहीं है|सन्यासी बोला! जरा सोचो, तुमने बाघ को किस तरह अपने वश में किया जब एक हिंसक पशु को धैर्य और प्रेम से जीता जा सकता है तो क्या एक इंसान को नहीं? जाओ जिस तरह तुमने बाघ को अपना मित्र बना लिया उसी तरह अपने पति के अन्दर प्रेम भाव जागृत करो| महिला सन्यासी की बात समझ गयी, अब उसे उसकी जड़ी-बूटी मिल चुकी थी|

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स्वर्ग या नरक

किसी गाँव मेँ एक साधु रहता था जो दिन भर लोगोँ को उपदेश दिया करता था। उसी गाँव मेँ एक नर्तकी थी, जो लोगो के सामने नाचकर उनका मन बहलाया करती थी। एक दिन गाँव मेँ बाढ़ आ गयी और दोनोँ एक साथ ही मर गये। मरनेँ के बाद जब ये दोनोँ यमलोक पहूँचे तो इनके कर्मोँ और उनके पीछे छिपी भावनाओँ के आधार पर इन्हेँ स्वर्ग या नरक दिये जानेँ की बात कही गई। साधु खुद को स्वर्ग मिलनेँ को लेकर पुरा आश्वस्त था। वहीँ नर्तकी अपने मन मेँ ऐसा कुछ भी विचार नहीँ कर रही थी। नर्तकी को सिर्फ फैसले का इंतजार था।

तभी घोषणा हूई कि साधु को नरक और नर्तकी को स्वर्ग दिया जाता है। इस फैसले को सुनकर साधु गुस्से से यमराज पर चिल्लाया और क्रोधित होकर पूछा , “यह कैसा न्याय है महाराज?, मैँ जीवन भर लोगोँ को उपदेश देता रहा और मुझे नरक नसीब हुआ! जबकि यह स्त्री जीवन भर लोगोँ को रिझानेँ के लिये नाचती रही और इसे स्वर्ग दिया जा रहा है। ऐसा क्योँ?”
यमराज नेँ शांत भाव से उत्तर दिया,” यह नर्तकी अपना पेट भरनेँ के लिये नाचती थी लेकिन इसके मन मेँ यही भावना थी कि मैँ अपनी कला को ईश्वर के चरणोँ मेँ समर्पित कर रही हूँ। जबकि तुम उपदेश देते हुये भी यह सोँचते थे कि कि काश तुम्हे भी नर्तकी का नाच देखने को मिल जाता! हे साधु! लगता है तुम इस ईश्वर के इस महत्त्वपूर्ण सन्देश को भूल गए कि इंसान के कर्म से अधिक कर्म करने के पीछे की भावनाएं मायने रखती है। अतः तुम्हे नरक और नर्तकी को स्वर्ग दिया जाता है।

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अहंकारी राजा

एक राज्य में एक राजा रहता था जो बहुत घमंडी था । उसके घमंड के चलते आस पास के राज्य के राजाओं से भी उसके संबंध अच्छे नहीं थे । उसके घमंड की वजह से सारे राज्य के लोग उसकी बुराई करते थे । एक बार उस गाँव से एक साधु महात्मा गुजर रहे थे उन्होंने ने भी राजा के बारे में सुना और राजा को सबक सिखाने की सोची। साधु तेजी से राजमहल की ओर गए और बिना प्रहरियों से पूछे सीधे अंदर चले गए। राजा ने देखा तो वो गुस्से में भर गया । राजा बोलाये क्या उदण्डता है महात्मा जी, आप बिना किसी की आज्ञा के अंदर कैसे आ गए? साधु ने विनम्रता से उत्तर दियामैं आज रात इस सराय में रुकना चाहता हूँ। राजा को ये बात बहुत बुरी लगी वो बोला -महात्मा जी ये मेरा राज महल है कोई सराय नहीं, कहीं और जाइये।

साधु ने कहा हे राजा , तुमसे पहले ये राजमहल किसका था?

राजामेरे पिताजी का,

साधुतुम्हारे पिताजी से पहले ये किसका था?

राजा मेरे दादाजी का।

साधु ने मुस्करा कर कहा हे राजा, जिस तरह लोग सराय में कुछ देर रहने के लिए आते है वैसे ही ये तुम्हारा राज महल भी है जो कुछ समय के लिए तुम्हारे दादाजी का था , फिर कुछ समय के लिए तुम्हारे पिताजी का था, अब कुछ समय के लिए तुम्हारा है ,कल किसी और का होगा, ये राजमहल जिस पर तुम्हें इतना घमंड है ये एक सराय ही है जहाँ एक व्यक्ति कुछ समय के लिए आता है और फिर चला जाता है। साधु की बातों से राजा इतना प्रभावित हुआ कि सारा राजपाट, मान सम्मान छोड़कर साधु के चरणों में गिर पड़ा और महात्मा जी से क्षमा मांगी और फिर कभी घमंड ना करने की शपथ ली। मित्रों, ये कहानी मात्र नहीं है बल्कि इस कहानी में एक बहुत बड़ी सीख छुपी हुई है। ये दुनिया एक सराय के समान है जहाँ कुछ लोग रोज आते हैं और कुछ लोग रोज जाते हैं। अच्छी सोच रखिये, अच्छे काम करिये क्यूंकि इस सराय से एक दिन सबको जाना है|

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गुरु का स्थान

एक राजा था. उसे पढने लिखने का बहुत शौक था| एक बार उसने मंत्री-परिषद् के माध्यम से अपने लिए एक शिक्षक की व्यवस्था की| शिक्षक राजा को पढ़ाने के लिए आने लगा. राजा को शिक्षा ग्रहण करते हुए कई महीने बीत गए, मगर राजा को कोई लाभ नहीं हुआ| गुरु तो रोज खूब मेहनत करता थे परन्तु राजा को उस शिक्षा का कोई फ़ायदा नहीं हो रहा था| राजा बड़ा परेशान, गुरु की प्रतिभा और योग्यता पर सवाल उठाना भी गलत था क्योंकि वो एक बहुत ही प्रसिद्ध और योग्य गुरु थे. आखिर में एक दिन रानी ने राजा को सलाह दी कि राजन आप इस सवाल का जवाब गुरु जी से ही पूछ कर देखिये.| राजा ने एक दिन हिम्मत करके गुरूजी के सामने अपनी जिज्ञासा रखी, ” हे गुरुवर , क्षमा कीजियेगा , मैं कई महीनो से आपसे शिक्षा ग्रहण कर रहा हूँ पर मुझे इसका कोई लाभ नहीं हो रहा है. ऐसा क्यों है ?”  गुरु जी ने बड़े ही शांत स्वर में जवाब दिया, ” राजन इसका कारण बहुत ही सीधा सा है…” गुरुवर कृपा कर के आप शीघ्र इस प्रश्न का उत्तर दीजिये “, राजा ने विनती की| गुरूजी ने कहा, “राजन बात बहुत छोटी है परन्तु आप अपने बड़ेहोने के अहंकार के कारण इसे समझ नहीं पा रहे हैं और परेशान और दुखी हैं| माना कि आप एक बहुत बड़े राजा हैं.| आप हर दृष्टि से मुझ से पद और प्रतिष्ठा में बड़े हैं परन्तु यहाँ पर आप का और मेरा रिश्ता एक गुरु और शिष्य का है| गुरु होने के नाते मेरा स्थान आपसे उच्च होना चाहिए| परन्तु आप स्वंय ऊँचे सिंहासन पर बैठते हैं और मुझे अपने से नीचे के आसन पर बैठाते हैं| बस यही एक कारण है जिससे आपको न तो कोई शिक्षा प्राप्त हो रही है और न ही कोई ज्ञान मिल रहा है| आपके राजा होने के कारण मैं आप से यह बात नहीं कह पा रहा था| कल से अगर आप मुझे ऊँचे आसन पर बैठाएं और स्वंय नीचे बैठें तो कोई कारण नहीं कि आप शिक्षा प्राप्त न कर पायें. राजा की समझ में सारी बात आ गई और उसने तुरंत अपनी गलती को स्वीकारा और गुरुवर से उच्च शिक्षा प्राप्त की| इसका सही अर्थ है कि हम अपने मन में गुरु को क्या स्थान दे रहे हैं।  क्या हम सही मायने में उनको सम्मान दे रहे हैं या स्वयं के ही श्रेष्ठ होने का घमंड कर रहे हैं अगर हम अपने गुरु या शिक्षक के प्रति हेय भावना रखेंगे तो हमें उनकी योग्यताओं एवं अच्छाइयों का कोई लाभ नहीं मिलने वाला और अगर हम उनका आदर करेंगे, उन्हें महत्व देंगे तो उनका आशीर्वाद हमें सहज ही प्राप्त होगा|

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किसान की सीख

बहुत ठण्ड पड़ रही थी। एक किसान रविवार के दिन मीलों चलकर पहाड़ी पर स्थित एक चर्च पर पहुंचा। चर्च का दरवाज़ा बंद था। किसान ऊँची आवाज़ में बोला,” अरे कोई है?” पादरी बाहर आया, वह किसान को देखकर कुछ हैरान था, ”आज ठण्ड बहुत है, मुझे तो उम्मीद ही नहीं थी कि आज की प्रार्थना में कोई आएगा, इसीलिए मैंने भी कोई तैयारी नहीं की, अब सिर्फ एक आदमी के लिए इतना सबकुछ करना ठीक रहेगा क्या, क्यों ना हम आज पूजा रहने दें और अपने घरों में जाकर आराम करें?”, पादरी बोला। साहब, मैं तो एक साधारण सा किसान हूँ, मैं रोज सुबह कबूतरों को दाना डालने जाता हूँ, और अगर एक कबूतर भी होता है तो मैं उसे दाना ज़रूर खिलाता हूँ। “,किसान बोला। पादरी यह सुनकर थोड़ा शर्मिंदा हुआ, और उसने मन ही मन ईश्वर से क्षमा मांगी और प्रार्थना में जुट गयापहले  उसने सारी टेबल-कुर्सियां साफ़ कीं , हर एक टेबल पर ले जाकर बाइबिल रखी, मोमबत्तियां जलाईं और पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। 3-4 घंटे बाद प्रार्थना खत्म हुई, पादरी ने किसान को धन्यवाद दिया कि उसने उसे अपना कर्तव्य याद दिलाया। किसान कुछ नहीं बोला और उठ कर जाने लगा। इस पर पादरी ने पूछा, ” क्या हुआ , प्रार्थना में कोई कमी रह गयी क्या?” किसान बोला, “मैं क्या बताऊँ पादरी साहब; मैं तो एक साधारण किसान हूँ, लेकिन जब मैं कबूतरों को दाना डालने जाता हूँ, और अगर एक ही कबूतर आता है तो मैं सारे दाने उसी को नहीं खिला देता। पादरी को एक बार फिर एहसास हुआ कि सिर्फ अपना कर्तव्य निभाना ही ज़रूरी नहीं है, बल्कि परिस्थिति के हिसाब से खुद को ढालना भी आवश्यक है, उसे चाहिए था कि सिर्फ एक आदमी के हिसाब से तैयारी करके प्रार्थना शुरू कर देता, जबकि वो तमाम लोगों के हिसाब से तैयारी में जुट गया।

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सबसे बड़ा पुण्य

एक राजा बहुत बड़ा प्रजापालक था| हमेशा प्रजा के हित में प्रयत्नशील रहता था. वह इतना कर्मठ था कि अपना सुख, ऐशो-आराम सब छोड़कर सारा समय जन-कल्याण में ही लगा देता था| यहाँ तक कि जो मोक्ष का साधन है अर्थात भगवत-भजन, उसके लिए भी वह समय नहीं निकाल पाता था| एक सुबह राजा वन की तरफ भ्रमण करने के लिए जा रहा था कि उसे एक देव के दर्शन हुए| राजा ने देव को प्रणाम करते हुए उनका अभिनन्दन किया और देव के हाथों में एक लम्बी-चौड़ी पुस्तक देखकर उनसे पूछा- महाराज, आपके हाथ में यह क्या है देव बोले- राजन! यह हमारा बहीखाता है, जिसमे सभी भजन करने वालों के नाम हैं|राजा ने निराशायुक्त भाव से कहा- कृप्या देखिये तो इस किताब में कहीं मेरा नाम भी है या नहीं?” देव महाराज किताब का एक-एक पृष्ठ उलटने लगे, परन्तु राजा का नाम कहीं भी नजर नहीं आया.राजा ने देव को चिंतित देखकर कहा- महाराज! आप चिंतित ना हों, आपके ढूंढने में कोई भी कमी नहीं है| वास्तव में ये मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भजन-कीर्तन के लिए समय नहीं निकाल पाता, और इसीलिए राजा ने आश्चर्यचकित होकर पूछा- महाराज, मेरा नाम इसमें कैसे लिखा हुआ है, मैं तो मंदिर भी कभी-कभार ही जाता हूँ? देव ने कहा- राजन! इसमें आश्चर्य की क्या बात है? जो लोग निष्काम होकर संसार की सेवा करते हैं, जो लोग संसार के उपकार में अपना जीवन अर्पण करते हैं| जो लोग मुक्ति का लोभ भी त्यागकर प्रभु के निर्बल संतानो की सेवा-सहायता में अपना योगदान देते हैं उन त्यागी महापुरुषों का भजन स्वयं ईश्वर करता है| ऐ राजन! तू मत पछता कि तू पूजा-पाठ नहीं करता, लोगों की सेवा कर तू असल में भगवान की ही पूजा करता है| परोपकार और निःस्वार्थ लोकसेवा किसी भी उपासना से बढ़कर हैं| देव ने वेदों का उदाहरण देते हुए कहा- कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छनं समाः एवान्त्वाप नान्यतोअस्ति व कर्म लिप्यते नरे अर्थात कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की ईच्छा करो तो कर्मबंधन में लिप्त हो जाओगे|राजन! भगवान दीनदयालु हैं| उन्हें खुशामद नहीं भाती बल्कि आचरण भाता है.. सच्ची भक्ति तो यही है कि परोपकार करो. दीन-दुखियों का हित-साधन करो. अनाथ, विधवा, किसान व निर्धन आज अत्याचारियों से सताए जाते हैं इनकी यथाशक्ति सहायता और सेवा करो और यही परम भक्ति है मेरा नाम यहाँ नहीं है|राजा को आज देव के माध्यम से बहुत बड़ा ज्ञान मिल चुका था और अब राजा भी समझ गया कि परोपकार से बड़ा कुछ भी नहीं और जो परोपकार करते हैं वही भगवान के सबसे प्रिय होते हैं। जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करने के लिए आगे आते हैं, परमात्मा हर समय उनके कल्याण के लिए यत्न करता है| हमारे पूर्वजों ने कहा भी है- परोपकाराय पुण्याय भवतिअर्थात दूसरों के लिए जीना, दूसरों की सेवा को ही पूजा समझकर कर्म करना, परोपकार के लिए अपने जीवन को सार्थक बनाना ही सबसे बड़ा पुण्य है| और जब आप भी ऐसा करेंगे तो स्वतः ही आप वह ईश्वर के प्रिय भक्तों में शामिल हो जाएंगे|

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ईश्वर बड़ा दयालु है

एक राजा का एक विशाल फलों का बगीचा था. उसमे तरह-तरह के फल होते थे और उस बगीचे की सारी देख रेख एक किसान अपने परिवार के साथ करता था| वह किसान हर दिन बगीचे में के ताज़े फल लेकर राजा के राजमहल में जाता था| एक दिन किसान बगीचे में से अमरुद की एक टोकरी और मीठे बेर की एक टोकरी लेकर राजमहल में जा रहा था, अब रस्ते में सोचने लगा की राजा को आज कौन सी टोकरी दूं? आखिर उसने मीठे बेर की टोकरी राजा को देने की सोची| किसान जब राजमहल में पहुंचा, राजा किसी दूसरे ख्याल में खोया हुआ था, किसान ने मीठे बेर की टोकरी राजा के सामने रख दी और थोडी  दूरी पर बैठ गया| अब राजा उसी खयालो-खयालों में टोकरी में से बेर उठाता था और किसान के माथे पे निशाना साधकर फेंक रहा था| राजा का बेर जब भी किसान के माथे पर लगता था किसान कहता था, ‘ईश्वर बड़ा दयालु हैराजा फिर बेर फेकता था किसान फिर वही कहता था ईश्वर बड़ा दयालु है अब राजा को आश्चर्य हुआ, उसने किसान से कहा, मै तुझे बार-बार बेर मार रहा हु, और बेर जोर से तुम्हारे सिर पर लग रहे हैं, फिर भी तुम यह बार-बार क्यों कह रहे हो की ईश्वर बड़ा दयालु है किसान ने नम्रता से बोला, महाराज, मैं तो आज आपको बड़े-बड़े अमरुद की टोकरी दे रहा था, लेकिन अचानक मेरा विचार बदल गया और आपके सामने मैंने अमरूद के बजाय बेर की टोकरी रख दी, यदि बेर की जगह अमरुद रखे होते तो आज मेरा हाल क्या होता ? इसीलिए मैं कह रहा हूँ कि ईश्वर बड़ा दयालु है’!

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चिड़िया का सत्संग

कोई महात्मा किसी सेवक के घर बैठे थे, सत्संग हो रहा था| दो चिड़ियाँ उस कमरे की छत में अपना घोंसला बनाकर रहती थीं| अकस्मात् एक और चिड़िया आई तथा उनका झगड़ा शुरू हो गया| उन्होंने एक दूसरे को चोंचें मार कर घायल कर दिया| महात्मा जी सत्संग छोड़कर चिड़ियों की ओर देखने लगे| कुछ देर बाद संगत ने हैरान होकर पूछा – महाराज! किस विचार में पड़े हो? चिड़ियाँ देखकर क्या करोगे, कोई ज्ञान-ध्यान की बात सुनाओ? महात्मा जी ठंडी स्वांस लेकर बोले– असली सत्संग तो चिड़ियाँ सूना रही हैं| घर के मालिक तो आप हो| आपके घर में ही इन्होने अपना घोंसला बनाया हुआ है| एक कहती है –घर मेरा है, दूसरी कहती है-घर मेरा है, परन्तु असली बात का तो इन दोनों मूर्खों को पता नहीं| ठीक इसी तरह इंसान-इंसानों के साथ अपनी मतलब परस्ती के लिए लड़ते हैं| उन्हें मालिक का नाम तक याद नहीं| शरीर के सभी सम्बन्ध किसी की अमानत है| हम उसके रक्षक हैं| हमारा समय ख़त्म होते ही वह मालिक आ जाएगा|

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मन भूत समान

एक धनी सांसारिक पदार्थों से संपन्न हुआ था| उसका कई तरह का व्यापार था, नौकर चाकर थे, परन्तु हर समय वह सांसारिक माया में लगा था| एक बार किसी संत महात्मा से उसकी भेंट हुई| महात्मा ने कहा– तुम माया से सम्पन्न हो, भगवान् की कुछ भक्ति भी किया करो ताकि तुम्हारा जन्म सफल हो| उत्तर में वह कहने लगा – महात्मा जी! आप की बात तो ठीक है, परन्तु मुझे काम से समय नहीं मिलता| महाराज जी! कोई ऐसा नौकर चाहिये जो सब काम करे और थकने का नाम न ले| मैं तब ही भजन कर सकता हूँ| महात्मा जी ने ‘हाँ’ कह दी| दूसरे दिन एक भूत नौकर के रूप में उस सेठ के पास आया और कहने लगा – मैं नौकरी करूंगा और सब काम करूंगा, परन्तु मेरी एक शर्त है कि जब आप काम ना देंगे तो मैं आपको खा जाऊंगा, वेतन कुछ नहीं लूँगा | सेठ ने उसकी शर्त मान ली| सेठ जी ने भूत को अपने घर नौकर रख लिया | उसने एक ही दिन में सारा काम ख़त्म कर लिया| तब सेठ जी को चिंता हुई और वह महात्मा जी के पास जाकर अपना रोना-रोने लगे| महात्मा जी ने उसे कहा की एक बांस अपने घर में गाड दो और जब भूत काम से खाली हो जाये तो उसको कहो की इस बांस पर चढो और उतरो| सेठ ने ऐसा ही किया और भूत वशीभूत हो गया| सो यह मन भी एक प्रकार का भूत है| खाली होने पर मनुष्य को खा जाता है इसे स्वांसों के सिमरण रुपी बांस पर चढ़ाओ और उतारो| तब यह स्वयम ही एकाग्र हो जाएगा| मन को वश में करने का सबसे अच्छा उपाय ध्यान है| अपने अभीष्ट इष्टदेव में ध्यान लगाने से मन की स्थिरता सुगम रूप से होती है| यद्यपि ज्ञान विचार द्वारा भी इसकी चंचलता को रोका जा सकता है तथापि इष्टदेव का ध्यान और भी श्रेष्ठ है, क्योंकि इससे पूर्व जन्मों के कर्मों के संस्कार भी नष्ट हो जाते हैं| इसलिए ज्ञान की अपेक्षा ध्यान श्रेष्ठ हैं| ध्यान योग परायण जिज्ञासु अडोल तथा निश्चिन्त होकर परम पद की प्राप्ति का सहज ही भागी हो जाता है| देहधारियों के लिए इससे बढ़कर और कोई सुगम उपाय नहीं |

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नेत्र हीन सेठ

एक सेठ जो की नेत्र हीन था| वह हर जगह अकेले ही जाया करता था| उसके घर पे नौकर भी थे लेकिन वह उनकी मदद के बिना ही कही आने जाने का कार्य कर लेता था| उसको भगवान के प्रति बड़ी आस्था थी कि भगवान  हमेशा मेरे संग है| एक दिन उस भक्त के नौकर ने उनसे प्रश्न पूछा कि आप को कहीं आने जाने में डर क्यों नहीं लगता| तो उसका जवाब देने के लिए वह उस नौकर को किसी पहाड़ी’ पर ले गए जब वे पहाड़ी की उच्चाई पर पहुँचे तो सेठ जी ने नौकर से कहा कि एक अब एक काम कर तू मुझे इस पहाड़ी से धक्का दे दे| तब उस नौकर ने कहा कि मैं आपको धक्का नहीं दे सकता मैं तो आपके यहाँ काम करता हूँ आप के साथ मेरा स्नेह भी है मैं यह कैसे कर सकता हूँ| तब सेठ ने कहा कि जब तू मुझे धक्का नहीं दे सकता क्योंकि तेरा मुझसे प्रेम है तो फिर परम पिता परमात्मा जो मुझसे बहुत अधिक प्रेम करते है तो वो मुझे कैसे गिरने देंगे| शिक्षा: कि अगर हम मालिक से प्रेम करते है तो वो भी हमसे बहुत प्रेम करते है और पल पल हमारी रक्षा करते है|

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बीती को चितवै नहिं

एक महात्मा जी एक स्थान पर प्रतिदिन सत्संग किया करते थे। काफी संगत वहाँ सत्संग श्रवण करने के लिये एकत्र हो जाया करती थी। एक दिन कोई नया व्यक्ति सत्संग श्रवण करने आया और उसने महात्मा जी से प्रश्न किया कि इन सत्संगियों में से कौन सा मनुष्य सुखमय जीवन व्यतीत कर रहा है? महात्मा जी ने सामने बैठे हुये एक सत्संगी की ओर संकेत करके फरमाया कि यह सत्संगी सदैव आनन्द में रहता है। उसने पुनः प्रश्न किया कि कौन से गुण के आधार पर यह भाग्यशाली व्यक्ति सदैव प्रसन्न रहता है? महात्मा जी ने उत्तर दियाः-

बीती को चितवै नहिं, आगे करे न शोक।

वर्तमान में वरत रहे, सत्संगी निर्दोष।।

इसमें यही गुण है कि बीती को स्मरण नहीं करता और भविष्य की चिंता नहीं करता। वर्तमान को ध्यान में रखकर निरंतर भक्तिमार्ग पर आगे पग बढ़ाता हुआ यह सत्संगी सदैव सुखी और प्रसन्न जीवन व्यतीत करता है। अन्य और भी जितने सत्संगी यहाँ आया करते हैं अथवा इस समय बैठे हैं, सब में शनैः शनै, उन्नति हो रही है और इस उपर्लिखित बात को ध्यान में रखकर उस पर आचरण करने का सब प्रयत्न कर रहे हैं। जितना जितना इनका आचरण है, उतना-उतना इनको सुख भी प्राप्त है। दुःख तो उनकी दशा पर है जो वर्तमान को भुला कर भूत एवं भविष्य की चिंताओं में खोये रहते हैं, जैसे कथन हैः-

किनी माज़ी मन में किनी मुस्तकबाल।

हैफ़ तिनां दे हाल पर जिन भुलाया हाल।।

प्रश्न करने वाले ने हाथ जोड़ कर विनय की-महाराज! एक प्रार्थना मेरी भी सुन लीजिये कि मुझे ईष्र्या का रोग अत्यन्त व्याकुल करता है किसी को अपने से अच्छा खाता-पीता अथवा प्रसन्न जीवन व्यतीत करता देखूं तो मेरे मन में बड़ी जलन उत्पन्न होती है। मुझे भी कोई ऐसा हितकर उपदेश देने की कृपा करें जिससे मेरा जीवन सुधर जाये। महात्मा जी ने फरमाया-भैया! ये वस्तुयें तो प्रत्येक को अपने-अपने प्रारब्ध के अनुसार ही मिलती हैं। सत्य पूछो तो इन वस्तुओं में रखा ही क्या है? सत्पुरुषों ने सत्य ही फरमाया हैः-

जग रचना सभ झूठ है जानि लेहु रे मीत।

कहि नानक थिरु न रहै जिउ बालू की भीत।।

आत्मिक उन्नति का सम्बन्ध इन वस्तुओं से कदापि नहीं है। प्रारब्ध अनुसार जैसी भी प्राप्त हो उसी में ही प्रसन्न रहना चाहिये। किसी ने क्या ही सुन्दर बात कितने साधारण शब्दों में कही हैः-

किसी की किस्मत में हैं लड्डू पेड़े खाने को।

तेरी किस्मत में गर छोले खुशी से तू चबाता जा।।

हैं किस्मत में किसी की मोटर गाड़ियां चढ़ने को।

तुम्हारी किस्मत में पैदल खुशी से पांव बढ़ाता जा।।

चला चल चला चल का चक्र चल रहा दिन रात।

चलते को तू चलाता जा गुज़रते को भूलाता जा।।

इस उपदेश को सुन कर उस नये सत्संगी भक्त ने महात्मा जी को बहुत धन्यवाद दिया। अपने जीवन को इस उपदेश के सांचे में ढालने से उसने भी कुछ ही दिनों में सच्चा सुख प्राप्त कर लिया। सचमुच ही उसका जीवन संवरने और सुधरने लगा। सन्तों का उपदेश है कि ""तुम्हारा यह कर्तव्य नहीं है कि कल की चिंता में आज की शक्ति को भी व्यय कर दो। कल भी जब आज का रुप धारण कर लेगा। तब उसका सत्कार करना।'' सत्पुरुषों के एक-एक वचन में लोक-परलोक का सम्मान और सच्चा सुख समाया हुआ है। जो भी उनके श्री वचनों पर आचरण करता है, वही सच्चे सुख को प्राप्त करता है। इसमें किसी देश अथवा जाति का कोई प्रश्न नहीं है; भारतीय हो अथवा विदेशी, हिन्दू हो अथवा मुसलमान, अंग्रेज़ हो अथवा पारसी, इससे प्रत्येक को एक समान लाभ पहुंचता है। इसलिये हम भी यदि उपर्लिखित श्री वचन के मार्गदर्शन में उस पर आचरण करते हुये अपने जीवन की यात्रा तय करेंगे तो निश्चय ही हम यह जीवन-यात्रा भी आनन्दपूर्वक तय करेंगे और अपना परलोक भी संवार लेंगे। ऐसा ही वरदान श्री सद्गुरुदेव जी ने अपने श्री पवित्र वचन में फरमा दिया है।

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रोग का ईलाज

एक मछली बेचने वाला किसी गन्धी की दुकान के पास से गुज़र रहा था। दो चार दुकानें और भी इत्र फुले बेचने वालों की थीं। ज्यों ही उसे उनकी उग्र गन्ध आई उसका सिर लगा चकराने क्योंकि उसका दिमाग तो मछली का दुर्गन्ध का आदी था और वह बाज़ार में ही गिर पड़ा। किसी ने कहा कि यह कमज़ोरी के कारण गिर गया है। दूसरा बोला इसे मिरगी का दौरा पड़ गया है। उसे सचेत करने के लिये बढ़िया बढ़िया इत्र और सुगन्धित द्रव्य सुँघाये गये किन्तु उस पर कोई प्रभाव न हुआ। उसकी दशा और बिगड़ती गई-सच है ""मर्ज़ बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की'' इस पर एक मनुष्य उसकी बिरादरी वालों के पास गया और उन्हें सारा हाल कह सुनाया। वहाँ एक वयोवृद्ध बैठा हुआ था। उसने पूछा कि वह कौन सी जगह गिर गया है? उस व्यक्ति ने कहा कि गन्धी बाज़ार में। वह वृद्ध मनुष्य एक ही क्षण में सारी बात को समझ गया। वह बोला कि उसके मस्तिष्क को उग्र सुगन्ध ने ही बिगाड़ दिया है। वह उठा और एक अत्यन्त दुर्गन्ध से भरी मछली अपनी कमीज़ में छुपा कर उस व्यक्ति के साथ वहाँ पहुँचा। उसने वह मरी हुई मछली उसकी नाक पर रख दी। दो मिनट में वह व्यक्ति उठ खड़ा हुआ। इसी तरह जो पुरुष रोग के निदान को समझ लेता है वही रोग का सफल इलाज कर सकता है। सन्त सतगुरुदेव जी इसी प्रकार जीवों के दुःख की जड़ को ही काट देते हैं।

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आगे बढ़ो

एक गरीब लकड़हारा था। रोजाना वन से लकड़ियां काटकर लाता उन्हें बाज़ार में बेचकर जीवन निर्वाह करता था। उसी वन में एक महात्मा जी रहते थे। झोंपड़ी बनाकर भजन सुमरिण किया करते थे। लकड़हारा रोज़ महात्मा जी को श्रद्धा से प्रणाम करता, यथायोग्य जितना उससे बन पड़ता उनकी सेवा करता था। महात्मा जी उसकी सेवा और श्रद्धा भावना से अति प्रसन्न थे। एक दिन महात्मा जी ने उसकी दीन अवस्था को देखकर उस पर दया करते हुये कहा, तुम वन में ओर आगे चले जाओ वहाँ तुम्हें हीरों की खदान मिलेगी, जिसे पाकर तुम मालामाल हो जाओगे और सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सकोगे।
    
महात्मा जी के कहे अनुसार वह लकड़हारा वन में आगे गया। वहाँ जाकर उसे पहले तांबे की खदान मिली। वह ताँबा बेचकर निर्वाह करने लगा। महात्मा जी ने कहा, तुम और आगे क्यों नहीं जाते? लकड़हारा और आगे गया वहाँ उसे चाँदी की खदान मिली। वह चाँदी बेचकर निर्वाह करने लगा। थोड़ा सम्पन्न होने लगा। महात्मा जी ने कहा, तुझे समझ नहीं है? और आगे जा। वह और आगे गया तो उसे सोने की खदान मिल गयी। और वह सोने में ही उलझ गया। कुछ दिन बाद महात्मा जी ने कहा, तू जड़ बुद्धि ही रहा और आगे क्यों नहीं जाता? वह और आगे गया तो उसे हीरों की खदान मिल गयी जिसे पाकर वह बहुत धनवान हो गया। फिर कई वर्षों के बाद महात्मा जी नगर में गये तो देखा। उसने बड़े महल खड़े कर लिए थे। उसके पास बड़ा धन था, धन के अंबार थे। नगर का सबसे अमीर व्यक्ति कहलाता था। महात्मा जी को आये देखकर उसने उनके चरणों में प्रणाम किया। और कहा, आपकी बड़ी कृपा है। आपकी कृपा से मेरे पास किसी चीज़ की कमी नहीं है। सुख वैभव के सब सामान मुझे उपलब्ध हैं। महात्मा जी तो उसे सच्चे धन से मालामाल करना चाहते थे। महात्मा जी ने कहा, "तू अभी भी दया का पात्र ही बना हुआ है। तू भीतर गरीब का गरीब है। जैसा तू लकड़हारा था, वैसा ही अब है। क्योंकि जिस सोना, चाँदी, हीरे जवाहरात को पाकर तुम अपने आप को धनवान समझ रहे हो, जिसे सम्पत्ति समझ रहे हो यह वास्तविक सम्पत्ति नहीं है। ये असली हीरे नहीं है। सब नकली हैं। हम तुझे असली और अनमोल हीरों की खदान पर पहुँचाना चाहते थे। तू और आगे क्यों नहीं जाता जहां तुझे असली हीरों की खदान मिलेगी। उस लकड़हारे ने कहा, मैं आपकी बात नहीं समझा, आप कहना क्या चाहते हैं? महात्मा जी ने कहा, सोना, चाँदी, हीरे जवाहरात जिन्हें तुम पाकर अपने आपको धनवान समझ रहे हो। इनको पाकर कोई धनवान नहीं हो जाता। क्योंकि ये सब नाशवान हैं, ये सब या तो जीते जी छूट जाते हैं या संसार से विदा होते समय इन्हें छोड़ देना पड़ता है। इनमें से एक सुई भी जीव के साथ नहीं जाती।

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घृणा का भाव

 एक व्यक्ति चलती ट्रेन से गिर पड़ा और उसके पाँव का थोड़ा सा भाग कट गया। उसे डॉक्टर के पास ले जाने में जितनी देर लगी उतने में उसका विष घुटने तक चढ़ गया। डॉक्टर ने कहा कि इसकी आधी टाँग काटनी पड़ेगी। अन्यथा इसका जीवन भयसंकुल है। इसका निश्चय भी जल्दी करो नहीं तो जितनी देर करोगे उतना विष अधिक ऊपर चढ़ता जाएगा और उससे टाँग का बहुत सा भाग काटना पड़ेगा। उसके सम्बन्धी इस सोच विचार में बहुत से एकत्र हो गये। उनके परस्पर विचार-विमर्श करते करते कुछ देर लग गई। डॉक्टर साहिब ने कहा कि क्योंकि निर्णय करने में समय लगा दिया अब इसकी पूरी टांग काटनी पड़ेगी। अन्त में उसकी टांग पूरी ही काटनी पड़ी और उसको छुटकारा मिला। यदि वह कुछ घण्टे और भी देर करते तो उसके प्राणों तक से भी हाथ धो बैठते। ऐसे ही घृणा करने से जिसके मन पर एक बार चोट लग गई यदि उसकी चिकित्सा तुरन्त कर ली गई तो ठीक नहीं तो वह घृणा का भाव पनपते हुए कलह-कल्पना का रूप धारण कर लेता है। वही कलह अनेक वर्षों तक चलता रहता है और जिसके कारण देशों के देश विनष्ट हो जाते हैं।

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राजकन्या की जन्म कुण्डली

एक पण्डित जो ज्योतिष-विद्या में निपुण था एक रजवाड़ा में रहता था। उसका निवास-स्थान राज-प्रासाद से आठ-दस मील दूर एक नदी के तट पर था। राजा कर्मकाण्डी था परन्तु उसका इकलौता पुत्र गुरु भक्त था। संयोगवश उसका विवाह भी एक गुरुभक्त राजकुमारी से हो गया। उसके पिता राजा साहिब का विचार था कि कन्या की जन्मपत्री और उसका हाथ किसी ज्योतिषी को दिखा दें जिससे कुँवरी के भाग्यों का ज्ञान हो जाय किन्तु राजकुमार कहता था कि पूर्ण सतगुरु सेवक के रक्षक होते हैं यदि उसके भाग्य में सूली भी हो तो वे उसे काँटा बना देते हैं। उनका ध्यान, उनके शब्द का अभ्यास आने वाले समस्त दुःखों की औषध है। राजकन्या की जन्म कुण्डली दिखाने या न दिखाने का निर्णय नहीं हुआ था कि राजकुमार अपने साथियों को साथ लेकर शिकार खेलने चला गया। शिकारगाह भी वह नदी के किनारे नगर से चार मील की दूरी पर थी। दैववश वह ज्योतिषी जो आठ दस मील दूर रहता था राजमहल में आ पहुँचा। राजा ने उस कन्या की कुण्डली और उसका हाथ उसे दिखाया-ज्योतिषी ने जब उस कुमारी के लावण्य को देखा तो उसका मन विचलित हो गया।        

           काम क्रोध मद लोभ की, जब लगि घट में खान।

                      क्या  मूर्ख  क्या  पण्डिता , दोनों एक समान ।।

वह ज्योतिषी पढ़ा लिखा तो बहुत था परन्तु शब्दाभ्यासी न होने के कारण मन के अधीन हो गया। वह महाराजा से बोला कि,""यदि यह कन्या आपके राज्य में रहेगी तो तुम्हारा राज्य नष्ट हो जाएगा।'' राजा ने इसका प्रतिकार पूछा-तो ज्योतिषी ने कहा, कि लकड़ी का बड़ा सन्दूक बनवाओ जिसमें वायु का भी संचार हो, उसमें इस लड़की को बन्द करके कुछ हीरे-जवाहरात भी साथ में रखकर उस सन्दूक को आज रात के पहले पहर में इस नदी में बहा दो। इस तरह तुम्हारे राज्य पर आने वाला संकट कट जाएगा।
राजा कर्मकाण्डी तो था ही। ज्योतिषी की बात सुनकर काँप उठा और बोला कि हम आज ही ऐसा करेंगे। यह रहस्य तुम और किसी से न कहना। ज्योतिषी अपने घर चला गया और रात को नदी किनारे बैठकर उस सन्दूक की लगा प्रतीक्षा करने। उसे प्राप्त करने की पूरी पूरी व्यवस्था भी कर दी। उधर राजा ने दवाई देकर कन्या को मूर्छित करके सन्दूक में बन्द करके बहा दिया। भाग्यवश वह राजकुमार उस समय साथियों के साथ नदी के तीर पर भ्रमण कर रहा था। उन्होने जब दूर से आते हुए सन्दूक को देखा तो अपने राजपुरुषों को भेजकर वह सन्दूक बाहर निकलवा लिया। सन्दूक के खुलते ही राजकुमार चकित रह गया। राजकुमारी को पाकर कुँवर ने प्रभु को धन्यवाद दिया। भाग्य से शिकार खेलते हुए एक जीवित रीछ उनके हाथ लग गया था। राजकुमार ने उसे ही सन्दूक में बन्द करके आगे प्रवाहित कर दिया। पंडित जी उस सन्दूक की प्रतीक्षा में बैठे ही थे। उसे देखते ही गद्गद हो गये। सन्दूक को निकाला और घर में ले आये। सब को विदा किया और एक कोठी में एकान्त देखकर बड़े हर्ष से वह सन्दूक खोला परन्तु हुआ क्या-कि सन्दूक के खुलते ही एक मस्त रीछ उसमें से निकला और झपट कर पंडित जी को समाप्त कर दिया। बात फैलते फैलते राजा के कानों तक भी जा पहुँची। एक दो दिन में राजकुमार भी अपनी पत्नी के साथ राज्य में लौट आया। पंडित जी का सारा पोल खुल गया। राजपुत्र ने अपने पिता जी से कहा कि यह सब सद्गुरुदेव जी की कृपा है कि उनका अदृश्य हाथ सदा हमारे साथ है। इस घटना से राजा भी अत्यन्त प्रभावित हुआ और वह भी सद्गुरुदेव जी की शरण में गया और उनसे नामोपदेश लेकर उसकी कमाई की जिससे उसके दोनों लोक सँवर गये।

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मालिक की तलवार

एक सन्त महात्मा अपने सेवक के साथ कहीं से गुज़र रहे थे तो देखते क्या हैं कि आकाश से एक तलवार तेज़ी से आ रही है किन्तु पल भर में वह आकाश में वापस चली गई। सेवक ने पूछा कि श्री गुरुमहाराज! यह क्या माजरा है? श्री गुरुमहाराज जी ने उत्तर दिया कि बेटा! एक मालिक के भक्त को कोई दुष्ट व्यर्थ में सता रहा था। उसकी सहायता के लिए और दुष्ट का वध करने के लिए यह तलवार अदृश्य से आ रही थी। परन्तु भक्त को दुःख सहन करते करते एकदम जोश आ गया-उसने भी दुष्ट को दो चार सुना दीं। यह देखकर मालिक ने अपनी तलवार को लौटवा लिया और कहा कि ""अब आपस में आप ही निपट लो।'' परिणाम यह हुआ कि उस दुष्ट ने भक्त को बड़ा मारा और वह मार खाकर पीछे पछताता रहा। लोगों ने भी उसे कहा कि तुम पूर्ण भक्त नहीं हो क्योंकि अन्त में तुम भी आपे से बाहर हो ही गये भक्त जन तो जीतने का प्रयत्न करते ही नहीं क्योकिः-

हर जन तो हारा भला, जीतन दे  संसार।

हारा तो हरि सों मिले, जीता जम के द्वार।।

इसी प्रकार जो वचन का उल्लंघन करते हैं वे यहाँ भी मारे जाते हैं-परलोक में भी लज्जित होते हैं। यदि हम इस लोक में भी विजयश्री का मुख देखना चाहते हैं और परलोक में सम्मान पूर्वक जाना चाहते हैं तो ऊपर लिखित वचन को कार्य रुप में परिणत करते हुए मालिक की कृपा प्राप्त करने का प्रयत्न करें।

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सर्पवाली फुँकार

एक बार एक महात्मा का एक सर्प से मिलाप हुआ। महात्मा ने सर्प से कहा कि तू किसी को डंक न मारा कर। इससे क्योंकि दूसरों को कष्ट पहुंचता है। सर्प ने महात्मा की आज्ञा मानकर डसना छोड़ दिया। वह चुपचाप सड़क के किनारे पर पड़ा रहता। परिणाम यह हुआ कि जो कोई वहाँ से गुज़रे वह उसे देखकर रोड़ा या पत्थर मार दे किन्तु वह बेचारा किसी को कुछ न कहे।उसकी दशा यह हो गई कि बच्चे उसे खेल खेल में घसीटने लग पड़े और वह घायल हो गया। वह महात्मा फिर कभी उधर आ निकले और सर्प की ऐसी दुर्दशा देखकर वे बड़े दुःखी हुए। सर्प ने महात्मा जी से कहा कि महाराज! आपकी आज्ञा पालन करने से मेरी यह दुर्दशा हो गई है। इस पर महात्मा जी बोले- "ऐ नादान! हमने तो तुम्हें यह कहा था कि तूने किसी को डसना नहीं' परन्तु यह तो नहीं कहा था कि तू अपनी फुंकार करना भी छोड़ दे। उसी दिन से उसने फुंकार मारना शुरु किया जिससे लोग उसे छेड़ते न थे और वह सुख पूर्वक रहने लगा। इसी तरह संसार में रहते हुए भक्तों को भी अपनी सर्पवाली फुँकार नहीं छोड़नी।

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खीर तो खा ली

एक व्यक्ति जो संतों के पास  जाया करता था लेकिन वहाँ सेवा भक्ति  के लिए रुकता नहीं था फटा फट जा कर वापिस आ जाता था| कई बार संत उससे पूछते तो वह यही कहता कि मेरे पास समय नहीं है मुझे अपने परिवार की भी देखना होता है संत जी समझ गए कि इसे अपने परिवार के साथ बहुत ही ज्यादा लगाव है संत जी ने उसे एक समझाने की कोशिश की लेकिन वह बात को मानता ही नहीं था| तब एक दिन संत जी उसे कहा कि ठीक है तुम्हारे पास समय नहीं तो कोई बात नहीं लेकिन थोड़े समय के लिए जैसा हम आपको बोले वैसा करों उस व्यक्ति ने कहा ठीक है| संत जी के कहे अनुसार अब उस व्यक्ति ने वही किया जो संत जी ने कहा था उस व्यक्ति ने घर में जाकर अपनी पत्नी को कहा कि आज घर में खीर और लड्डू बनाओं बड़ा ही मन कर रहा है और खीर बहुत ही गाढ़ी बनाना| उस व्यक्ति की पत्नी ने खीर बनानी शुरू की जब खीर और लड्डू तैयार हो गए तब उसकी पत्नी ने जैसे ही अपने पति को बताया| थोड़ी ही देर में उसका पति जमीन पर लेट गया और स्वांस भी रोक लिए उसकी पत्नी हैरान कि ये क्या हो गया उसने देखा कि उसके पति के स्वांस ही बंद हो गए है तब वह समझ गई कि उसका पति उसे छोड़ कर चला गया उसने बार यही कहना शुरू कर दिया साईं स्वर्ग सिधारया साईं स्वर्ग सिधारया तब उसके मन में विचार आया कि अब थोड़ी देर में लोग आने शुरू होंगे इतनी मेहनत से खीर बनाई है उसे तो खा लूँ तब उसने और उसके बच्चों ने खीर खाना शुरू किया और फटा फट उस खीर को खत्म कर दिया| उसका पति भी यह सब सुन रहा था कि उसकी पत्नी को मेरे मरने की चिंता नहीं है वो तो खीर खाने में लगी है| जब खीर खा के उसकी पत्नी दोबारा अपने पति के पास जहाँ वह लेटा था आई तो वही कहना शुरू कर दिया साईं स्वर्ग सिधारया हमें छोड़ के मत जाओं तभी उसी समय उसका पति उठा और कहने लगा कि खीर तो खा ली अब लड्डू भी खायों| तब से उस व्यक्ति को एहसास हो गया कि संसार के अंदर सब स्वार्थ का रिश्ता है तब उसने संत शरण में जाकर माफ़ी मांगी और सेवा नाम भक्ति की कमाई करना शुरू कर दिया|

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प्रेम समर्पण

एक भक्त जिस का भगवान् के साथ अटूट प्रेम था रोज भगवान के लिए मंदिर में फूलों की टोकरी लेकर जाता था उसका यह बहुत पुराना नियम था| एक दिन वह भक्त फूलों कि टोकरी लेने के लिए फूलों कि दूकान पर गया उस समय फूल वाले के पास एक ही टोकरी पड़ी थी उसी समय राजा का एक बंदा भी वहाँ पर आया और कहने लगा कि राजा ने फूलों की टोकरी मंगवाई है यह टोकरी मुझे चाहिए लेकिन वह भक्त अपना नियम नहीं तोड़ना चाहता था उसने उस व्यक्ति से कहा कि नहीं यह टोकरी मुझे अपने भगवान् के लिए चाहिए उसने फूल वाले को कहा कि मैं तुम्हे 1 रूपए कि जगह 10 रूपए देता हूँ उस व्यक्ति ने कहा कि मैं इसके 100 रूपए देता हूँ भक्त ने कहा कि मैं 1 हजार देता हूँ इस तरह बात हजारों में चली गई अब उस व्यक्ति ने कहा कि मैं 50 हजार देता हूँ उस भक्त ने कहा कि मैं 1 लाख देता हूँ यह सुनकर वह व्यक्ति चला गया तब उस फूल वाले ने उस भक्त से कहा कि तूने मेरा सौदा खराब कर दिया क्या तेरे पास इतना धन है तब उस भक्त ने कहा कि मेरे पास जो भी वह 1 लाख से अधिक है वो सब तुम्हारा है और ये टोकरी मेरी| अब जब वह भक्त उस टोकरी को लेकर जब श्री मंदिर में गया तब वहाँ भगवान् कि मूर्ति की जगह साक्षात् भगवान खड़े वह देख कर हैरान हो गया और भगवान् के दर्शन कर बहुत प्रसन्न हुआ तब उसने भगवान् से प्रश्न पूछा कि मैं कितने समय से आपको फूल अर्पित कर रहा हूँ आज तक आप नहीं आए लेकिन आज आप कैसे आ गए| तब भगवान् ने कहा कि जब तुमने अपना सर्वस्त अर्पण कर दिया तो मैं यह देख कर कैसे अपने आपको तुम्हारे अर्पण किए बिना रोक सकता हूँ| अर्थात जब भक्त अपना सब कुछ भगवान् को अर्पित कर देता है भगवान् भी अपना सब कुछ भक्त पर लुटा देते है|

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सेवा का भाव

जापान में एक बहुत बड़े संत हुए है उन्होंने ने अपने जीवन की एक बड़ी सुंदर घटना को अपनी किताब में लिखा है एक दिन उन्होंने देखा कि उनके घर में किसी लकड़ी के अंदर किल ठुकी पड़ी और उसी किल में एक छिपकली की पूंछ फँसी पड़ी| जब उन्होंने यह देखा तो उन्हें याद आया कि यह किल तो उन्होंने ने बहुत समय पहले ठोकी थी इसका मतलब कि इस छिपकली की पूंछ तब से ही किल में फँसी पड़ी है तब वह यह सोचने लगे कि इतना समय बीत गया  इस छिपकली को भोजन कहा से मिल रहा है यह जीवित कैसे है वह इतना सोच ही रहे थे कि उन्होंने क्या देखा कि एक और छिपकली वहाँ आई उसने अपने मुख में कुछ रखा हुआ था और वह उस दूसरी छिपकली (जिसकी पूंछ फँसी थी) को दे दिया और उस छिपकली ने उसे खा लिया वह यह देख कर दंग रह गए कि किस तरह से एक छिपकली ने दूसरी छिपकली की मदद की उन्होंने मन में विचार किया कि जब एक छिपकली दूसरी छिपकली की मदद कर रही है परमार्थ कर रही उसी तरह इंसान को भी दूसरों के लिए अपना जीवन व्यतीत करना चाहिए| उसको तो भगवान ने इतना सुंदर शरीर दिया है|

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राजा ने खुश किया

एक राजा के दरबार में कोई कवि आया जब उसने एक कविता सुनाई तो राजा ने खुश हो कर कहा कि एक लाख ईनाम जब कवि ने दूसरी कविता सुनाई तो राजा ने कहा कि 2 लाख ईनाम जब तीसरी कविता सुनाई तो राजा ने कहा कि एक गावं ईनाम तब चौथी कविता सुनाई तो राजा ने कहा कि पांच गाँव ईनाम जब सभा ख़त्म हुई तो कवि अपने घर आया अपनी पत्नी को बात ईनाम की बात बताई पत्नी ने कहा कि ईनाम तो ठीक है लेकिन वो है कहा तब उस कवि ने अगले दिन राजा के दरबार में जाकर राजा से प्राथना की कि आपने ईनाम तो सुना दिया लेकिन वो ईनाम है कहा तब राजा ने कहा कि लेने देने कि कहा बात आ गई तुमने हमने कविता सुना कर खुश किया हमने तुम्हे ईनाम सुना कर खुश किया|

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बच्ची का विश्वास

एक बार कि बात है एक बच्ची एयरप्लेन में सफ़र कर रही थी| और लोग भी उस प्लेन में थे| अचानक वह प्लेन आसमान में चलते -2 डगमगाने लगा| प्लेन में बैठे सभी लोग घबरा गए कि अब क्या होगा| सभी भगवान को याद करने लगे लेकिन वह बच्ची निश्चिंत बैठे प्लेन पहले की तरह खेलती रही उसे कोई डर ना लगा कुछ समय के बाद जब प्लेन control में आ गया तब सबकी जान में जान आई| तब उन लोगो में से कुछ ने उस बच्ची से पूछा कि जब प्लेन डगमगाने लगा तुम तब भी निश्चिन्त हो कर खेल रही थी और अब भी खेल रही हो क्या तुम्हे प्लेन डगमगाने पर डर नहीं लगा तब उस बच्ची ने जवाब दिया कि इस प्लेन के पायलेट मेरे पापा है और मुझे उनपर पूरा विश्वास था कि जब तक वो मेरे साथ है वो मुझे कुछ नहीं होने  देंगे| उस बच्ची का यह विश्वास देख कर सभी लोग हैरान हो गए| कहते है ऐसे ही एक भक्त को अपने सतगुरु पर भरोसा होना चाहिए कि सतगुरु का मेरे सिर पर हाथ है तो मुझे कुछ नहीं हो सकता|

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बेहिसाब प्यार

एक सेठ ने अपने घर पर मजदूर बुलाए पहले सुबह 8 बजे कुछ मजदूर आये उन्हें काम पर लगा दिया| फिर कुछ और मजदूर 10 बजे आये उन्हें भी काम पर लगा दिया फिर 12 बजे मजदूर आये, उसके बाद 2 बजे मजदूर आये, उसके बाद 4 बजे मजदूर शाम को जब 6 बजे तो सेठ ने सब को बराबर मजदूरी दे दी| तो कुछ मजदूर सेठ से कहने लगे कि जो लोग सुबह आये आपने उन्हें भी उतनी मजदूरी दी जितनी शाम को 4 बजे आये मजदूरो को मिली| तब सेठ ने सबसे पूछा कि आप में से किसी को कम मजदूरी तो नहीं मिली तब सब नहे कहा कि नहीं मजदूरी तो हमें अपने काम से भी चार गुना ज्यादा मिली है| तब सेठ ने कहा कि फिर तुम क्यों फिक्र करते हो भगवान् ने मुझे बेहिसाब दिया है मैं बेहिसाब लुटा रहा हूँ| ऐसे ही सतगुरु भी अपने भक्तो पर बेहिसाब बे मोल तोल कृपा लुटाते है|

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जग की भेड़ चाल

एक स्कूल में एक अध्यापक ने प्रशन पूछा कि एक खेत में 40 भेड़े है उनमे 15 भेड़े दूसरे खेत में चली गई तो बताओ कितनी बची| सब ने कहा कि 25| तब एक बच्चे ने जवाब दिया कि एक भी नही| तब अध्यापक ने पूछा वो कैसे| तब बच्चे ने कहा कि वैसे तो गणित के हिसाब से उत्तर कुछ और है लेकिन भेड़ो का हिसाब कुछ और है जहाँ एक भेड़े जाती दूसरी भेड़ उसके पीछे भागती है| तो यही जग कीहालत है परम संत कबीर साहिब जी के भी वचन है कि

जग की भेड़ा चाल, चलते के पाछे चले |

परमार्थ ना सम्भाल, देखों जग की मूरत ||

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माया या भक्ति

एक बार किसी भक्त की तपस्या पर प्रसन्न होकर भगवान् प्रकट हुए उस समय भगवान के पास दो स्त्रियाँ खड़ी एक स्त्री ने तो बहुत सुंदर वस्त्र पहने थे बहुत सारे आभूषण पहने थे और दूसरी स्त्री ने बड़े साधारण से वस्त्र पहने थे| भगवान ने उस भक्त से कहा कि हम आप से बहुत प्रसन्न है आप इन दोनों में किसी एक स्त्री को अपने साथ ले जा सकते| तो भक्त ने भगवन से पूछा कि प्रभु इनके गुण तो बताओ| तो भगवान् ने कहा कि जो स्त्री बहुत सुसज्जित है बहुत सारे आभूषण जिसने डाले है अगर इसे आप लेते हो ये सारी जिन्दगी अपने पीछे आपको भगाएगी| ये माया है और दूसरी स्त्री जो साधारण वस्त्रों में है वह भक्ति है अगर आप उसे ले जाते है तो हम स्वयं आपके पीछे -2 भागेंगे|

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माया के सपने

एक व्यक्ति ने एक दिन रात को सपना देखा कि बादल गरज रहे है थोड़ी देर बाद बादलों से चांदी के सिक्कों की वर्षों होने लगी लेकिन जैसे ही सिक्के नीचे गिरे तो उसी समय हवा चली और सारे सिक्के उड़ गए| इतने में उस व्यक्ति की आखँ खुल गई अब उसे रोज यही सपना आने लगा| एक दिन बड़ा परेशान होकर वह किसी पंडित जी के पास गया पंडित जी ने को उसने सारी बात बताई तब पंडित जी ने उसे कहा कि आपको परेशान होने की कोई जरुरत नहीं है आप रोज हनुमान चालीसा पढ़ा करों आपको सपना नहीं आएगा तब वह व्यक्ति कहने लगा कि मैं सपना नहीं बंद करवाना चाहता मुझे ये उपाय बताओं कि जब चांदी के सिक्के के जब गिरे तो  हवा न चले | कहने का मतलब है कि माया से प्यार करने वाले लोग दिन में तो माया से प्यार करते ही है और रात में भी वो माया के सपने लेते है|

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MBBS KKR LONDON JJR

एक डॉक्टर की दूकान पर एक कम्पाउण्डर काम करता था| किसी बात की वजह से कम्पाउण्डर कि डॉक्टर के साथ अन बन हो गई| तो कम्पाउण्डर ने उसी डॉक्टर की दूकान के सामने ही अपनी दूकान खोल ली| अब उसके मन में विचार आया कि मेरे पास डिग्री तो कोई है नहीं तो लोग आएँगे कैसे तब उसने अपनी दूकान के बोर्ड पर लिख दिया कि MBBS KKR LONDON JJR| अब इस नाम को पढ़ कर बहुत से लोग उसकी दूकान पर आने लगे एक दिन उसके दोस्त ने पूछा कि भई इस डिग्री का मतलब क्या है तब उसने कहा कि लोगो को इसके मतलब से क्या लेना है लोग तो बड़ा नाम देखता है| इसका मतलब है MBBS करते करते रह गया और LANDON जाते जाते रह गया|

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विश्वास पैसे पे या परमात्मा पे

कहते है किसी स्थान पर दो शिष्य रहते थे उन दोनों का आपस में सदा यह विवाद चलता रहता था एक कहता था कि इन्सां के पास थोड़ा बहुत पैसा जरुर होना कहिये ताकि मुशकिल समय में वह धना उसके काम आ सके दूसरा कहता था कि नहीं शिष्य का तो ये फर्ज है उसे जो भी मिले वह सब कुछ गुरु को अर्पण कर दे| अब उनका ये विवाद कभी ख़त्म नहीं हुआ एक दिन उन्हें अपने गुरु का संदेशा मिले कि गुरु ने दोनों को तुरंत बुलाया है| अब दोनों चल पड़े रास्ते में नदी पड़ती थी शाम का समय था रात होने वाली थी और तभी उन्हें वहाँ एक नाविक दिखाई दिया तो उन्होंने जाकर नाविक से बात की कि हमारे गुरु देव ने हमें बुलाया है हमारा जाना बहुत जरुरी है तभी एक शिष्य कहने लगा आप जितने पैसे लेते हो हम उससे दोगुने आपको दे देंगे तब नाविक ने कहा कि रात का समय है रास्ता भी ठीक नहीं है जान को जोखिम में डाल कर जाऊँगा तो चार गुना पैसे देने पड़ेंगे तब उस शिष्य ने कहा कि ठीक है हम देने को तैयार है| अब दोनों शिष्य नावं में बैठ गए अब रास्ते में फिर यही विवाद शुरू कि देखों बिना पैसे के कोई काम नहीं होता आज पैसे न होते तो हम गुरुदेव के पास न पहुँच पाते तब दुसरे शिष्य ने कहा कि हम अगर अपने सतगुरु पर विश्वास रखते तो भी नदी से पार हो जाते| यही विवाद करते -2 वह अपने गुरुदेव के चरणों में पहुँचे और वहाँ सारा वृतांत सुनाया और अपना विवाद सुनाया| जब गुरुदेव ने उन दोनों का विवाद सुना तो फरमाने लगे कि प्रश्न ये नहीं कि पैसा होना चाहिए या नहीं होना चाहिए प्रश्न तो ये है कि इंसान का विश्वास किस पे है पैसे पे या परमात्मा पे है अगर हमारा विश्वास पैसे पे है तो हम गलत रास्ते जा रहे है और अगर परमात्मा पर विश्वास है तो सही रास्ते जा रहे है| महाभारत में भी हमने सुना है कि दुर्योधन जो था उसे पैसों पर विश्वास था और अर्जुन को अपने भगवान पर विश्वास था|

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नाम का नशा

एक गुरुदेव के दो सेवक थे| एक सदा दुखी रहता था और दूसरा सदा सुख में आनंद में रहता था| एक दिन उस दुखी रहने वाले शिष्य ने अपने गुरुदेव से कहा कि प्रभु इस भक्ति का कोई लाभ नहीं है मुझे तो इससे कोई आनंद नहीं मिलता तब गुरुदेव ने अपने दूसरे शिष्य से भांग का कटोरा मंगवाया और अपने शिष्य को कहने लगे कि एक काम करो इस भांग के कटोरे से कुल्ले करना शुरू करों और तब तक करों जब तक यह ख़त्म न हो जाए| अब उस शिष्य ने ऐसा ही किया| जब वह कटोरा ख़त्म हुआ तब गुरुदेव ने उससे पूछा बताओ कितना नशा चढ़ा है तब उस शिष्य ने कहा कि नशा तो तब चढ़ता जब मैं भांग को अंदर लेता खाली कुल्ला करने से नशा तो नहीं चढ़ सकता|

गुरुदेव ने फरमाया कि आनंद भी ऐसा ही जब तक तुम सतगुरु के नाम को अपने अंदर नहीं ले जाओंगे आपनो आनंद नहीं मिल सकता|

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मटकों में जल

एक बार किसी जगह पर दो मटके पड़े थे उसी समय बारिश शुरू हो गई अब बारिश के पानी से एक मटका तो भर गया दूसरा मटका खाली रह गया| जब बारिश रुकी तो खाली मटके ने भगवान से कहा कि वा भगवान् दुनिया तो पक्ष पात करती है आप भी पक्ष पात करते हो| आपने मेरे भाई को तो भर दिया  पर मुझे क्यों खाली छोड़ दिया तब भगवान ने फरमाया कि मैंने तुम दोनों पर सामान रूप से जल बरसाया लेकिन तेरे ऊपर अहंकार का ढक्कन जो चढ़ा है इसलिए तू भर नहीं पाया| कहने का भाव भगवान् सब पर सामान रूप से कृपा करते है लेकिन हमारी झोली में ही अहंकार रूपी छेद होते है जिससे हम भगवान् की कृपा से वंचित रह जाते है|

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सेठ का अंतिम समय

एक सेठ का अंतिम समय जब आया तब डॉक्टर ने सेठ से कहा कि सेठ जी अब आपके पास जीवन के 2 3 घंटे शेष रह गए आप जो भी अंतिम काम करना चाहते है तब सेठ ने अकाउंटेंट को बुलवाया और उससे पूरा हिसाब लिया कि मेरे पास कितनी दौलत है कितने मकान, कितनी फैक्ट्री है| तब अकाउंटेंट ने सब चीजों का ब्यौरा दिया| तब सेठ ने एक ज्योतिषी को बुलवाया| उससे पूछा कि मेरा अगला जन्म कहा पर होना है तब ज्योतिषी ने कहा कि यही पास में एक गाँव है वहाँ रामचंद के लड़के के रूप में ही आपका अगला जन्म होगा| तब सेठ ने अपने अकाउंटेंट से कहा कि मेरी सारी दौलत उसी के नाम कर दो| कहने का भाव माया से  जिन लोगो को प्रेम है वो जीते जी तो माया के पीछे भागते ही है संसार से जाते वक्त भी माया का ही ध्यान होता है|

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भगवान से माँगना

एक बार की बात है एक पंडित जी रोज मंदिर में सुबह उठ कर प्राथना करते थे| भगवान से अपने लिए सुख-शांति व अन्य इच्छाएँ माँगा करते थे| लेकिन कुछ समय के बाद उनके साथ के लोगों ने देखा की कि पंडित जी ने प्राथना करना बंद कर दिया है तब उन लोगो ने पंडित से पूछा की कि आपने प्राथना करना बंद क्यों कर दिया| तब पंडित जी ने उन्हें एक दृष्टान्त सुनाया कि एक बार वो कही से गुजर थे तो रास्ते में उन्होंने देखा कि एक फकीर जिसके आखों में गड्डे हो रखे है बड़ा ही दुर्लभ शरीर है फटे पुराने कपड़े है, वह  सम्राट के द्वार पर खड़ा है और सम्राट से मिलना चाहता है जब सम्राट उस फकीर से मिलने आये तो उन्होंने फकीर की तरफ बड़े ध्यान से देखा और सम्राट ने फकीर से कहा कि तुम्हे क्या चाहिए तब फकीर यह सुनते ही कहने लगा कि वो सम्राट ही किसी बात का जो किसी को देख कर भी ना समझ पाए कि उसे क्या चाहिए ऐसा कह कर फकीर चला गया| तब पंडित जी को यह सुनकर बड़ा झटका लगा कि भगवान से मैं रोज मैं मांगता हूँ तो भगवान् तो अन्तर्यामी है और सबके दिलों की जानते है उन्हें तो हमसे ज्यादा पता है कि हमें क्या चाहिए| इसलिए उस दिन से मैं भगवान् से मांगना छोड़ दिया|

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जिस बात में कोई फायदा नहीं

एक बड़ा दार्शनिक हुआ है एक बार उसके पास एक व्यक्ति आया और कहने लगा कि मुझे तुम्हारे मित्र के बारे में एक बात पता चली है| तब दार्शनिक ने उसे कहा कि जो बात तुम बताना चाहते हो उससे मेरे मित्र का कोई भला होगा, मेरा भला होगा या और लोगो का भला होगा तब उस व्यक्ति ने कहा नहीं| तब दार्शनिक ने कहा कि जिस बात से किसी का भला नहीं हो रहा तो फिर ऐसी बात करने का फायदा ही क्या है|

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गुरु की महिमा

एक राजा ने अपने महामंत्री को किसी कारण वश सजा सुनाई कि आज से 7 दिन बाद तुम्हे मृत्यु दण्ड दिया जाएगा| राजा का यह उपदेश सुनकर महामंत्री घबरा गया और तुरंत अपने गुरु महाराज जी के पास गया तब उसने जाकर अपने गुरु महाराज जी को साड़ी बात बताई| गुरु महाराज जी ने फरमाया कि इसमें घबराने की कोई बात नहीं है आप अगले सात दिन तक घर में सत्संग की व्यवस्था करों और सातवे दिन सबको भोजन के लिए निमंत्रण देना| मंत्री ने जाकर ऐसा ही किया घर पर सत्संग की व्यवस्था कि सुबह शाम कीर्तन होने लगा दूर -2 लोग पहुँच कर सत्संग व भजन कीर्तन का लाभ उठाने लगे रात दिन आनंद की गंगा बहने लगी| सातवे दिन मंत्री ने सबको भोजन के लिए निमंत्रण दिया उसमे राजा भी भोजन पर आया जब राजा वहाँ पहुँचा तो क्या देखता है कि मंत्री आनंद में मगन है और मस्ती में झूम झूम कर नाच रहा है राजा ने मंत्री से पूछा कि क्या तुम्हे पता नहीं है कि तुम्हे कल फांसी लगने वाली है तो मंत्री ने कहा राजन मैं जानता हूँ मुझे कल फाँसी लगने वाली है लेकिन मेरे गुरु देव ने मुझे समझाया है कि मृत्यु एक अटल सत्य है इसे चाहे रो कर स्वीकार कर लो या उत्सव मना कर| इसलिए जब मृत्यु आनी ही है तो मैं उत्सव मना कर ही क्यों ना इस मृत्यु को स्वीकार करूँ| मंत्री की के मुख से ऐसी बाते सुनकर राजा हैरान हो गया| राजा ने मंत्री से कहा कि धन्य है तुम्हारे गुरुदेव जिन्होंने तुम्हे ऐसी उच्चतम शिक्षा प्रदान की है मैं तुम्हे तुम्हारे दंड से मुक्त करता हूँ अब मुझे तुरंत अपने गुरुदेव के पास ले चलो मैं उनके दर्शन करके अपना जीवन धन्य करना चाहता हूँ| तो ये है पूर्ण गुरुदेव की महिमा|

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जीवन संघर्ष, खेल या उत्सव

एक शिष्य ने अपने गुरुदेव से पूछा कि कोई कहता है कि जीवन एक संघर्ष है, कोई कहता है जीवन एक खेल है और कोई कहता है जीवन एक उत्सव है| तो सत्य क्या है तब गुरुदेव ने कहा कि जीवन एक संघर्ष भी है, एक खेल भी है और जीवन एक उत्सव भी है| अब जीवन संघर्ष किस के लिए है जिन्हें पूर्ण सतगुरु की प्राप्ति नहीं हुई उन्हें सच्चे सुख को पाने के लिए जीवन में संघर्ष करना पड़ता है| जीवन खेल उनके लिए है जिन्हें जीवन में सतगुरु की शरण तो प्राप्त हो गई है लेकिन वे सतगुरु की आज्ञा में कभी तो चलते है लेकिन कभी नहीं चल पाते जिस प्रकार  खेल में कभी हार भी होती है तो कभी जीत होती है इसी तरह जब जीव सतगुरु की आज्ञा में चलता है तो उसे सच्चे आनंद का अनुभव होता है उसे  जीत प्राप्त होती है| जब जीव सतगुरु की आज्ञा को भूल कर सांसारिक मोह में फंस जाता है तब उसे दुखों का और हार कर सामना करना पड़ता है| अब जीवन उत्सव उनके लिए है जो पूर्णता सतगुरु की आज्ञा मौज में चलते है अपने सतगुरु के हुकम को ही सर्वोपरि रखते हुए अपना जीवन व्यतीत करते है ऐसे लोगो का जीवन ही सहीं मायनों में उत्सव के समान है|

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गुरु से नाम दीक्षा

एक बार की बात है एक राजा संतों के सत्संग में गया वहां उसने नाम की बड़ी महिमा सुनी नाम की महिमा सुनकर उसके मन में नाम लेने की उत्कंठा जागृत हुई उसने संत जी से विनय की मुझे नाम दो तब संतों ने फरमाया कि अभी आप कुछ दिन और सत्संग में आओ फिर आपको नाम देंगे| व राजन बड़ा ही उत्सुकता के साथ सत्संग में जाता की उसे एक दिन नाम मिलेगा| एक दिन संत जी ने राजा को अपने पास बुला कर फरमाया कि आज हम तुम्हे नाम देते है संत जी ने कहाँ कि आप राम नाम का सुमिरन रोज किया करो| यही तुम्हारा गुरु मन्त्र है| अब राजा सोचने लगा की यह नाम तो ग्रंथों में भी लिखा है यह नाम तो मुझे पता है मैं तो सोच रहा था की मुझे कुछ और नाम मिलेगा राजा ने सोचा की संतो ने मुझे बहला तो नहीं दिया| अब जब राजा के मन में यह संशय चल रहा था तो संत जी (सब जानी जान है) ने राजा से कहा कि आप मन में किसी प्रकार का संशय मत रखो तब राजा ने अपना संशय संत जी के सामने रखा| संत जी ने फरमाया की ग्रंथों में लिखे राम नाम में और गुरु द्वारा दिए गए राम नाम में फर्क है| संत जी ने कहा कि हम आपको इस बात का उत्तर जल्दी है देंगे| एक संत जी राजा के दरबार में पहुँच गए| जैसे ही राजा ने संत जी को देखा तो वह संत जी के स्वागत के लिए खड़ा हो गया| राजा ने संत जी को झुक कर नमस्कार किया| राजा के आस पास कई सुरक्षा गार्ड खड़े हुए थे| संत जी जोर से चिल्ला कर कहने लगे कि राजा को गिरफ्तार कर लो| संत जी ने एक बार कहा दो बार कहा लेकिन सिपाहियों ने कुछ न सुना जब एक दो चार बार और कहा तो राजा को गुस्सा आ गया| राजा ने सिपाहियों कहा कि इन्हें गिरफ्तार कर लो| उसी समय सिपाहियों ने संत जी को पकड़ लिया| तभी संत जी ने राजा से कहा कि ये तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है| मेरे और तुम्हारे दोनों के शब्द एक थे कि गिरफ्तार कर लो| लेकिन जब तुमने कहा तो उसके पीछे हकुमत की ताकत थी और जब मैंने कहा तो उसके पीछे कोई ताकत नहीं थी| इसी तरह से जो नाम संत देते है उसके पीछे परमात्मा की ताकत जुड़ी होती है | संत परमात्मा से जुड़े होते है जो नाम वो अपने मुख से देते है उसमे ही शिष्य का कल्याण छिपा होता है|

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                                                         हीरे से भरी थैली

एक बार की बात है एक व्यक्ति मरने से पहले एक हीरे से भरी थैली अपनी पत्नी को दे गया और कह गया की मेरे मरने के बाद ये थैली मेरे पुत्र को देना ओर उसे कहना की इस थैली को ले जाकर मेरे मित्र से मिलेगा और नया व्यपार शुरू करेगा| अब उसकी पत्नी ने अपने पुत्र को बुला कर वह थैली दी और कहा की तेरे पिता के जो मित्र है उनके पास ये थैली ले जाओ और व्यपार शुरू करो| वो हीरे लेकर गया तो जो उसके पिता के मित्र थे उन्होंने कहा की इन हीरों को अपनी माता जी को वापिस दे आ और फरमाया कि तू रोज मेरे पास आया कर पहले तू हीरों की पहचान सीख ले तभी तू वह व्यपार कर पायेगा| तब वो रोज उसे सिखाता| जब वो पूरी तरह सिख गया| तब उसने कहा कि अब अपनी माँ के पास जा वो हीरे ले कर व्यपार शुरू करो| तब वह अपनी माता के पास गया और वह हीरों की थैली मांगी| अब वह उस थैली में से एक- एक करके हीरे निकलता और फैकता जाता उसने एक -२ करके सारे हीरे फैक दिए लेकिन एक ही हीरा अपने पास रखा तब उसकी माता ने पूछा ते तुमने क्या किया तब उसने कहा कि माँ इसमें सभी कांच के टुकड़े थे केवल एक ही हीरा था| तब वह अपने पिता के मित्र के पास गया और कहने लगा की आपने मुझे पहले ही दिन क्यों नहीं बताया कि हीरे नकली थे तब उन्होंने कहा कि अगर मैं पहले दिन तुम्हे ये बताता तो शायद तुम्हे यह विश्वास न होता तुम्हे लगता मैं तुम्हारे साथ धोखा कर रहा हूँ| लेकिन अब तुम पता लग गया है की उस पूरी थैली में एक ही हीरा था| इसी तरह संत महापुरुषों जीवों को अपनी सत संगति सच और झूठ की पहचान करवाते है|

 

भिखारी से व्यपारी

किसी स्टेशन पर एक भिखारी रहता था और जब स्टेशन पर ट्रैन रूकती थी तो वो भिक्षा मांगता था, कोई देता था कोई मना कर देता था | एक दिन उसने स्टेशन पर देखा कि कोई सूट बूट पहने अमीर आदमी बैठा है, ये देख कर उसकी आँखों में चमक आ गयी | आज तो पूरे दिन की भिक्षा एक ही पल में मिल जाएगी | अब वो उस आदमी के पास पहुंचा और अपना कटोरा आगे किया | उस आदमी ने भिखारी को देखा और कहा कि अच्छा, भिक्षा तो मैं दूंगा लेकिन तुम बदले में मुझे क्या दोगे ? वो हैरान कि आज तक तो किसी ने ये प्रश्न किया ही नहीं | भिक्षा लेने वाला तो भिक्षा लेता है, बदले में कुछ देने के लिए तो आज तक किसी ने बोला ही नहीं | उसने कहा कि मैं तो भिखारी हूँ, मैं भला तुम्हे क्या दे सकता हूँ? वो आदमी बोला कि नहीं, अगर तुम देने के हक़दार नहीं हो, तो मांगने के भी हक़दार नहीं हो | अब उसे बात तो बुरी लगी कि ये तो मुझे उलटी बात कह रहा है | लेकिन कभी-कभी कोई ऐसा वचन निकलता है जो साधारण वचन नहीं होता, परमात्मा का वचन होता है, किसी के भी मुख से निकल जाये|  उसके दिल को लग गया| अब पूरी रात उसे नींद नहीं आयी | लेकिन कहते है कि इंसान का ऐसे कोई समय होता है जिसे टर्निंग पॉइंट कहते है अब वो सुबह उठा और फिर अपने काम पे निकल गया | स्टेशन के बाहर उसने क्या देखा कि छोटे- छोटे फूल लगे हुए थे | जैसे घास पर लाल-लाल फूल लगे होते है | उसने वो फूल तोड़ लिए और कटोरे में रख लिए | वो ट्रैन पे चढ़ गया और जो उसे भिक्षा दे वो उसे फूल दे दे | अब फूल पाके हर एक आदमी के चेहरे पे मुस्कान आ जाये कि आज तक ऐसा भिखारी नहीं देखा जिसको भिक्षा दो और फूल दे दे | अब वो जिसके पास नहीं जा रहा था लोग उसको बुला बुला के भिक्षा दे रहे थे| आज उसका कटोरा भर गया | उसने कहा कि ये तो बड़ा अच्छा नुक्ता मिल गया मुझे| उसने फिर जो खाली जगह पड़ी होती है गावोँ में,  बाजार से बीज़ लेके बो दिए और फूल उग गए | अब उसने यही काम शुरू कर दिया | फिर एक दिन ट्रैन में उस को वही आदमी मिल गया जिसने भिक्षा के बदले कुछ माँगा था| उसने आज जब कोटरा आगे किया तो पहले उसको फूल दिया | वो खुश हो गया | उसने कहा अब तुम भिखारी नहीं रहे व्यापारी बन गए हो | एक वचन से वो भिखारी से व्यापारी बन गया | अब बदले में फूल दे रहा है वो फ्री में कुछ नहीं ले रहा | ऐसे करते -करते उसने ज़मीन खरीद ली और फूलों का व्यापार शुरू कर दिया और वो लाखों करोड़ोंपति बन गया | तो कहने का भाव इंसान को सब कुछ तब  प्राप्त होता है जब बदले में वो कुछ देना शुरू करता है| जब जीव गुरु के चरणों में अपने मन को अर्पित करता है तो पूरे के पूरे पारब्रह्म परमेश्वर उसके हो जाते है|

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