भगवान
विष्णु के दस अवतार
1. मत्स्य अवतार:
पुराणों के अनुसार
भगवान विष्णु ने सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए मत्स्यावतार लिया था। इसकी कथा
इस प्रकार है- कृतयुग के आदि में राजा सत्यव्रत हुए। राजा सत्यव्रत एक दिन नदी में
स्नान कर जलांजलि दे रहे थे। अचानक उनकी अंजलि में एक छोटी सी मछली आई। उन्होंने
देखा तो सोचा वापस सागर में डाल दूं, लेकिन
उस मछली ने बोला- आप मुझे सागर में मत डालिए अन्यथा बड़ी मछलियां मुझे खा जाएंगी।
तब राजा सत्यव्रत ने मछली को अपने कमंडल में रख लिया। मछली और बड़ी हो गई तो राजा
ने उसे अपने सरोवर में रखा, तब
देखते ही देखते मछली और बड़ी हो गई। राजा
को समझ आ गया कि यह कोई साधारण जीव नहीं है। राजा ने मछली से वास्तविक स्वरूप में
आने की प्रार्थना की। राजा की प्रार्थना सुन साक्षात चारभुजाधारी भगवान विष्णु
प्रकट हो गए और उन्होंने कहा कि ये मेरा मत्स्यावतार है। भगवान ने सत्यव्रत से
कहा- सुनो राजा सत्यव्रत! आज से सात दिन बाद प्रलय होगी। तब मेरी प्रेरणा से एक
विशाल नाव तुम्हारे पास आएगी। तुम सप्त ऋषियों, औषधियों, बीजों व प्राणियों के सूक्ष्म शरीर को
लेकर उसमें बैठ जाना, जब
तुम्हारी नाव डगमगाने लगेगी, तब
मैं मत्स्य के रूप में तुम्हारे पास आऊंगा। उस समय तुम वासुकि नाग के द्वारा उस नाव
को मेरे सींग से बांध देना। उस समय प्रश्न पूछने पर मैं तुम्हें उत्तर दूंगा, जिससे मेरी महिमा जो परब्रह्म नाम से
विख्यात है, तुम्हारे ह्रदय में
प्रकट हो जाएगी। तब समय आने पर मत्स्यरूपधारी भगवान विष्णु ने राजा सत्यव्रत को
तत्वज्ञान का उपदेश दिया, जो
मत्स्यपुराण नाम से प्रसिद्ध है।
2. कूर्म अवतार:
धर्म ग्रंथों के
अनुसार भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का अवतार लेकर समुद्र मंथन में सहायता की थी।
भगवान विष्णु के कूर्म अवतार को कच्छप अवतार भी कहते हैं। इसकी कथा इस प्रकार है-
एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवताओं के राजा इन्द्र को श्राप देकर श्रीहीन कर दिया।
इन्द्र जब भगवान विष्णु के पास गए तो उन्होंने समुद्र मंथन करने के लिए कहा।
तब इन्द्र भगवान विष्णु के कहे अनुसार दैत्यों व देवताओं के साथ मिलकर समुद्र मंथन
करने के लिए तैयार हो गए। समुद्र
मंथन करने के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी एवं नागराज वासुकि को नेती बनाया गया।
देवताओं और दैत्यों ने अपना मतभेद भुलाकर मंदराचल को उखाड़ा और उसे समुद्र की ओर
ले चले, लेकिन वे उसे अधिक
दूर तक नहीं ले जा सके। तब भगवान विष्णु ने मंदराचल को समुद्र तट पर रख दिया।
देवता और दैत्यों ने मंदराचल को समुद्र में डालकर नागराज वासुकि को नेती बनाया।
किंतु मंदराचल के नीचे कोई आधार नहीं होने के कारण वह समुद्र में डूबने लगा। यह
देखकर भगवान विष्णु विशाल कूर्म (कछुए) का रूप धारण कर समुद्र में मंदराचल के आधार
बन गए। भगवान कूर्म की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घुमने लगा और इस प्रकार
समुद्र मंथन संपन्न हुआ।
3. वराह
अवतार:
धर्म ग्रंथों के
अनुसार भगवान विष्णु ने दूसरा अवतार वराह रूप में लिया था। वराह अवतार से जुड़ी
कथा इस प्रकार है- पुरातन समय में दैत्य हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को ले जाकर
समुद्र में छिपा दिया तब ब्रह्मा की नाक से भगवान विष्णु वराह रूप में प्रकट हुए।
भगवान विष्णु के इस रूप को देखकर सभी देवताओं व ऋषि-मुनियों ने उनकी स्तुति की।
सबके आग्रह पर भगवान वराह ने पृथ्वी को ढूंढना प्रारंभ किया। अपनी थूथनी की सहायता
से उन्होंने पृथ्वी का पता लगा लिया और समुद्र के अंदर जाकर अपने दांतों पर रखकर
वे पृथ्वी को बाहर ले आए। जब
हिरण्याक्ष दैत्य ने यह देखा तो उसने भगवान विष्णु के वराह रूप को युद्ध के लिए
ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। अंत में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर
दिया। इसके बाद भगवान वराह ने अपने खुरों से जल को स्तंभित कर उस पर पृथ्वी को
स्थापित कर दिया।
4. भगवान
नृसिंह:
भगवान विष्णु ने
नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। इस अवतार की कथा इस
प्रकार है- धर्म ग्रंथों के अनुसार दैत्यों का राजा हिरण्यकशिपु स्वयं को भगवान से
भी अधिक बलवान मानता था। उसे मनुष्य, देवता, पक्षी, पशु, न दिन में, न रात में, न धरती पर, न आकाश में, न अस्त्र से, न शस्त्र से मरने का वरदान प्राप्त था।
उसके राज में जो भी भगवान विष्णु की पूजा करता था उसको दंड दिया जाता था। उसके
पुत्र का नाम प्रह्लाद था। प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। यह
बात जब हिरण्यकशिपु का पता चली तो वह बहुत क्रोधित हुआ और प्रह्लाद को समझाने का
प्रयास किया, लेकिन फिर भी जब
प्रह्लाद नहीं माना तो हिरण्यकशिपु ने उसे मृत्युदंड दे दिया। हर बार भगवान
विष्णु के चमत्कार से वह बच गया। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त
था, वह प्रह्लाद को
लेकर धधकती हुई अग्नि में बैठ गई। तब भी भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गया
और होलिका जल गई। जब हिरण्यकशिपु स्वयं प्रह्लाद को मारने ही वाला था तब भगवान
विष्णु नृसिंह का अवतार लेकर खंबे से प्रकट हुए और उन्होंने अपने नाखूनों से
हिरण्यकशिपु का वध कर दिया।
5. वामन अवतार:
सत्ययुग में
प्रह्लाद के पौत्र दैत्यराज बलि ने स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया। सभी देवता इस
विपत्ति से बचने के लिए भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने कहा कि मैं
स्वयं देवमाता अदिति के गर्भ से उत्पन्न होकर तुम्हें स्वर्ग का राज्य दिलाऊंगा।
कुछ समय पश्चात भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया। एक बार जब बलि महान यज्ञ कर रहा था तब
भगवान वामन बलि की यज्ञशाला में गए और राजा बलि से तीन पग धरती दान में मांगी।
राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य भगवान की लीला समझ गए और उन्होंने बलि को दान देने
से मना कर दिया। लेकिन बलि ने फिर भी भगवान वामन को तीन पग धरती दान देने का
संकल्प ले लिया। भगवान वामन ने विशाल रूप धारण कर एक पग में धरती और दूसरे पग में
स्वर्ग लोक नाप लिया। जब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा तो बलि ने भगवान
वामन को अपने सिर पर पग रखने को कहा। बलि के सिर पर पग रखने से वह सुतललोक पहुंच
गया। बलि की दानवीरता देखकर भगवान ने उसे सुतललोक का स्वामी भी बना दिया। इस तरह
भगवान वामन ने देवताओं की सहायता कर उन्हें स्वर्ग पुन: लौटाया।
6. श्री
राम अवतार:
त्रेतायुग में
राक्षसराज रावण का बहुत आतंक था। उससे देवता भी डरते थे। उसके वध के लिए भगवान
विष्णु ने राजा दशरथ के यहाँ माता कौशल्या के गर्भ से पुत्र रूप में जन्म लिया। इस
अवतार में भगवान विष्णु ने अनेक राक्षसों का वध किया और मर्यादा का पालन करते हुए
अपना जीवन यापन किया। पिता
के कहने पर वनवास गए। वनवास भोगते समय राक्षसराज रावण उनकी पत्नी सीता का हरण कर
ले गया। सीता की खोज में भगवान लंका पहुंचे,
वहाँ भगवान श्री राम और रावण का घोर
युद्ध जिसमें रावण मारा गया। इस प्रकार भगवान विष्णु ने राम अवतार लेकर देवताओं को
भय मुक्त किया।
7. श्री कृष्ण अवतार:
द्वापरयुग में
भगवान विष्णु ने श्री कृष्ण अवतार लेकर अधर्मियों का नाश किया। भगवान श्री
कृष्ण का जन्म कारागार में हुआ था। इनके पिता का नाम वसुदेव और माता का नाम देवकी
था। भगवान श्री कृष्ण ने इस अवतार में अनेक चमत्कार किए और दुष्टों का सर्वनाश
किया। कंस का वध भी भगवान
श्री कृष्ण ने ही किया। महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सारथि बने और दुनिया को
गीता का ज्ञान दिया। धर्मराज युधिष्ठिर को राजा बना कर धर्म की स्थापना की। भगवान
विष्णु का ये अवतार सभी अवतारों में सबसे श्रेष्ठ माना जाता है।
8. परशुराम अवतार:
हिन्दू धर्म
ग्रंथों के अनुसार परशुराम भगवान विष्णु के प्रमुख अवतारों में से एक थे। भगवान
परशुराम के जन्म के संबंध में दो कथाएं प्रचलित हैं। हरिवंशपुराण के अनुसार उन्हीं
में से एक कथा इस प्रकार है-
प्राचीन
समय में महिष्मती नगरी पर शक्तिशाली हैययवंशी क्षत्रिय कार्तवीर्य
अर्जुन(सहस्त्रबाहु) का शासन था। वह बहुत अभिमानी था और अत्याचारी भी। एक बार
अग्निदेव ने उससे भोजन कराने का आग्रह किया। तब सहस्त्रबाहु ने घमंड में आकर कहा
कि आप जहां से चाहें, भोजन
प्राप्त कर सकते हैं, सभी
ओर मेरा ही राज है। तब अग्निदेव ने वनों को जलाना शुरु किया। एक वन में ऋषि आपव
तपस्या कर रहे थे। अग्नि ने उनके आश्रम को भी जला डाला। इससे क्रोधित होकर ऋषि ने
सहस्त्रबाहु को श्राप दिया कि भगवान विष्णु,
परशुराम के रूप में जन्म लेंगे और न
सिर्फ सहस्त्रबाहु का नहीं बल्कि समस्त क्षत्रियों का सर्वनाश करेंगे। इस प्रकार
भगवान विष्णु ने भार्गव कुल में महर्षि जमदग्रि के पांचवें पुत्र के रूप में जन्म
लिया।
9. बुद्ध अवतार:
धर्म ग्रंथों के
अनुसार बौद्धधर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध भी भगवान विष्णु के ही अवतार थे परंतु
पुराणों में वर्णित भगवान बुद्धदेव का जन्म गया के समीप कीकट में हुआ बताया गया है
और उनके पिता का नाम अजन बताया गया है। यह प्रसंग पुराण वर्णित बुद्धावतार का ही
है।
एक
समय दैत्यों की शक्ति बहुत बढ़ गई। देवता भी उनके भय से भागने लगे। राज्य की कामना
से दैत्यों ने देवराज इन्द्र से पूछा कि हमारा साम्राज्य स्थिर रहे, इसका उपाय क्या है। तब इन्द्र ने शुद्ध
भाव से बताया कि सुस्थिर शासन के लिए यज्ञ एवं वेदविहित आचरण आवश्यक है। तब दैत्य
वैदिक आचरण एवं महायज्ञ करने लगे, जिससे
उनकी शक्ति और बढऩे लगी। तब सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने
देवताओं के हित के लिए बुद्ध का रूप धारण किया। उनके हाथ में मार्जनी थी और वे
मार्ग को बुहारते हुए चलते थे। इस
प्रकार भगवान बुद्ध दैत्यों के पास पहुंचे और उन्हें उपदेश दिया कि यज्ञ करना पाप
है। यज्ञ से जीव हिंसा होती है। यज्ञ की अग्नि से कितने ही प्राणी भस्म हो जाते
हैं। भगवान बुद्ध के उपदेश से दैत्य प्रभावित हुए। उन्होंने यज्ञ व वैदिक आचरण
करना छोड़ दिया। इसके कारण उनकी शक्ति कम हो गई और देवताओं ने उन पर हमला कर अपना
राज्य पुन: प्राप्त कर लिया।
10. कल्कि अवतार:
धर्म ग्रंथों के
अनुसार भगवान विष्णु कलयुग में कल्कि रूप में अवतार लेंगे। कल्कि अवतार कलियुग व
सतयुग के संधिकाल में होगा। यह अवतार 64 कलाओं
से युक्त होगा। पुराणों के अनुसार उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले के शंभल नामक
स्थान पर विष्णुयशा नामक तपस्वी ब्राह्मण के घर भगवान कल्कि पुत्र रूप में जन्म
लेंगे। कल्कि देवदत्त नामक घोड़े पर सवार होकर संसार से पापियों का विनाश करेंगे
और धर्म की पुन:स्थापना करेंगे, तभी
सतयुग का प्रारंभ होगा।
*****
क्षमा
बड़न को चाहिए
क्षमा
बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात |
कहा
‘रहीम’ हरी को घट्यो, जो भृगु मारी लात||
जब
परम पिता परमात्मा ने सृष्टि की रचना की तब सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के कार्य संचालन
हेतु तीन देवताओं का निर्धारण किया| ब्रह्मा जी को उत्पति करने का काम सौंपा गया,
भगवान विष्णु जी को पालन पोषण तथा शिवजी को संहार का कार्य सौंपा गया| उस समय यह कहना
कठिन था कि तीनों में से कौन बड़ा है? एक बार ऋषि-मुनियो की सभा में यह चर्चा हो गई
कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश में से कौन बड़ा है? तब हर कोई अपना-2 अनुमान लगा रहा था|
अत्यधिक विचार- विमर्श करने के उपरांत महा
ऋषि ‘भृगु’ जी को इस कार्य के लिए नियुक्त किया गया| तब भृगु ऋषि ने अपने मन में
इन तीनों देवताओं के शील स्वभाव की परीक्षा लेने का विचार किया| ऐसा विचार कर
महर्षि भृगु जी सर्व प्रथम ब्रह्मलोक में गए|
वहाँ पहुँचते ही शोर मचाने लगे- “अरे
बड़े| मालूम होता है
तुम्हारा मस्तिष्क संतुलन विकृत हो गया जो कही साँप पैदा करते हो तो कही विशाल
बिच्छु तथा कही शेर, व्याघ आदि हिंसक पशु भला ऐसे जान लेवा जानवर पैदा करके
तुम्हारे हाथ में क्या आता है?”
ब्रह्मा जी यह सुनकर रोष से भर गए और बोले – “देखो,
भृगु| तुम ब्राह्मण हो
इसी नाते मैं चुप हूँ, अन्यथा तुम्हारे द्वारा कहे जाने वाले इतने कटु वचनों के
प्रतिरूप मैं तुम्हें इसी समय अभिश्राप देकर भस्म कर देता| अत: तुम्हारी यही
कुशलता है कि अपनी वाणी पर नियंत्रण करो और इसी समय यहाँ से चले जाओ|”
वहाँ से चलकर भृगु जी कैलाश पर्वत पर गए और जाते ही कहने लगे- “वाह
रे| भोलेनाथ तुम तो
सचमुच ही बगुले भगत हो, कोई अच्छा हो या बुरा तुम तो हर समय सब के प्राण लेने पर
ही तुले रहते हो| जीव मात्र के प्राण हर लेने के बाद भी नेत्र मूँद कर इस प्रकार
बैठ जाते हो मानो प्रत्यक्ष ही देख लिया है|”
भृगु जी की यह बात सुनकर शिवपुरारी (शिवजी) आग बबूला हो गए और त्रिशूल संभालते हुए
बोले- “महर्षि
भृगु| तुम्हें क्या हो
गया है जो बोलने तक की भी सभ्यता नहीं रही? यहाँ से शीघ्र ही भाग जाओ, नहीं तो मैं
अपने त्रिशूल से अभी तुम्हें मार दूँगा|”
शिवजी के इस प्रकार के वचन सुन कर भृगु जी वहाँ से चल दिए और अब भगवान विष्णु जी
के पास गए भगवान विष्णु जी शेषनाग की शैय्या पर विश्राम कर रहे थे और लक्ष्मी जी
उनकी चरण सेवा कर रही थी| भृगु जी ने वहाँ जाकर द्वारपालों से पूछा- विष्णु जी
कहाँ है? द्वारपालों ने उत्तर दिया कि “वे
इस समय आराम कर रहे हैं इसलिए आप अंदर नहीं जा सकते”
परन्तु भृगु जी ने उनके कथन की कुछ परवाह न की और भीतर चले गए| अंदर प्रवेश करते
ही ‘आव देखा न ताव’ भगवान विष्णु जी के वक्ष स्थल पर लात से प्रहार कर क्रोध
बरसाते हुए कहने लगे- “तुम्हारे
घर पर एक ब्राह्मण आया है और तुम निश्चिन्त होकर यहाँ सोये पड़े हो तुम्हें तो
अतिथि सत्कार करना भी नहीं आता|”
यह सुनते ही भगवान विष्णु जी शैय्या पर से उठ खड़े हुए और महर्षि जी के चरण दबाते
हुए कहने लगे- “महर्षि जी| मेरे
अहोभाग्य कि आपने कृपा करके दर्शन दिए| मैं अपने इस अपराध की आपसे क्षमा चाहता हूँ
कि जब आप इस भवन में आये तो उस समय मैं सो रहा था|”
पुन: नम्रता से कहने लगे- “मेरी
छाती वज्र के समान कठोर है और आपके चरण अति कोमल है, कहीं मेरी छाती पर प्रहार
करने से आपके चरण में चोट तो नहीं आई? महर्षि जी| मुझे क्षमा कर दीजिए|”
भगवान विष्णु की इस प्रकार की नम्रता, दीनता व सहनशीलता को देखकर महर्षि भृगु जी
अति प्रसन्न हुए और भगवान से कहने लगे- “हे
लक्ष्मीपति| यदि आप चाहते तो मुझे कड़े-से-कड़ा दंड भी दे सकते थे| परन्तु उसकी
अपेक्षा आपने मेरे साथ नम्रता से सुंदर व्यव्हार किया| धन्य है आपकी महानता और
दीनता| आपकी तुलना में त्रिलोक में और कोई नहीं|”
इसके पश्चात प्रसन्नचित हो महर्षि भृगु जी वहाँ से विदा होकर ऋषि मुनियों की उस
महासभा में पहुँचे और भगवान विष्णु की महानता की भूरी- भूरी प्रसन्नता करने लगे|
तब सबने एक स्वर में पूछा कि आपने उनमे ऐसा कौन सा महान गुण देखा है? तब भृगु जी
ने समस्त वृतांत कह सुनाया जिसे सुन कर सबने मुक्त हृदय से यह स्वीकार किया कि इन
तीनों देवताओं में विष्णु जी का पद ही सबसे ऊँचा है |
*****
लक्ष्मी
जी की उत्पत्ति
समुद्र
मंथन के समय क्षीर सागर से लक्ष्मी जी प्रकट हुई थीं और भगवान विष्णु को अपना पति
स्वीकार किया था। कथा इस प्रकार है
एक बार भगवान शंकर के
अंशभूत महर्षि दुर्वासा पृथ्वी पर विचर रहे थे। घूमते-घूमते वे एक मनोहर वन में
गए। वहाँ एक विद्याधर सुंदरी हाथ में पारिजात पुष्पों की माला लिए खड़ी थी, वह
माला दिव्य पुष्पों की बनी थी। उसकी दिव्य गंध से समस्त वन-प्रांत सुवासित हो रहा
था। दुर्वासा ने विद्याधरी से वह मनोहर माला माँगी। विद्याधरी ने उन्हें आदरपूर्वक
प्रणाम करके वह माला दे दी। माला लेकर उन्मत्त वेषधारी मुनि ने अपने मस्तक पर डाल
ली और पुनः पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे इसी
समय मुनि को देवराज इंद्र दिखाई दिए, जो
मतवाले ऐरावत पर चढ़कर आ रहे थे। उनके साथ बहुत-से देवता भी थे। मुनि ने अपने
मस्तक पर पड़ी माला उतार कर हाथ में ले ली। उसके ऊपर भौरे गुंजार कर रहे थे। जब
देवराज समीप आए तो दुर्वासा ने पागलों की तरह वह माला उनके ऊपर फेंक दी। देवराज ने
उसे ऐरावत के मस्तक पर डाल दिया। ऐरावत ने उसकी तीव्र गंध से आकर्षित हो सूँड से
माला उतार ली और सूँघकर पृथ्वी पर फेंक दी। यह देख दुर्वासा क्रोध से जल उठे और
देवराज इंद्र से इस प्रकार बोले, ''अरे
ओ इंद्र! ऐश्वर्य के घमंड से तेरा ह्रदय दूषित हो गया है। तुझ पर जड़ता छा रही है, तभी
तो मेरी दी हुई माला का तूने आदर नहीं किया है। वह माला नहीं, श्री
लक्ष्मी जी का धाम थी। माला लेकर तूने प्रणाम तक नहीं किया। इसलिए तेरे अधिकार में
स्थित तीनों लोकों की लक्ष्मी शीघ्र ही अदृश्य हो जाएगी।'' यह
श्राप सुनकर देवराज इंद्र घबरा गए और तुरंत ही ऐरावत से उतर कर मुनि के चरणों में
पड़ गए। उन्होंने दुर्वासा को प्रसन्न करने की लाख चेष्टाएँ कीं, किंतु
महर्षि टस-से-मस न हुए। उल्टे इंद्र को फटकार कर वहाँ से चल दिए। इंद्र भी ऐरावत
पर सवार हो अमरावती को लौट गए। तबसे तीनों लोकों की लक्ष्मी नष्ट हो गई। इस प्रकार
त्रिलोकी के श्रीहीन एवं सत्वरहित हो जाने पर दानवों ने देवताओं पर चढ़ाई कर दी।
देवताओं में अब उत्साह कहाँ रह गया था? सबने
हार मान ली। फिर सभी देवता ब्रह्माजी की शरण में गए। ब्रह्माजी ने उन्हें भगवान
विष्णु की शरण में जाने की सलाह दी तथा सबके साथ वे स्वयं भी क्षीरसागर के उत्तर
तट पर गए। वहाँ पहुँच कर ब्रह्मा आदि देवताओं ने बड़ी भक्ति से भगवान विष्णु का
स्तवन किया। भगवान प्रसन्न होकर देवताओं के सम्मुख प्रकट हुए। उनका अनुपम तेजस्वी
मंगलमय विग्रह देखकर देवताओं ने पुनः स्तवन किया, तत्पश्चात
भगवान ने उन्हें क्षीरसागर को मथने की सलाह दी और कहा, ''इससे
अमृत प्रकट होगा। उसके पान करने से तुम सब लोग अजर-अमर हो जाओगे, किंतु
यह कार्य है बहुत दुष्कर अतः तुम्हें दैत्यों को भी अपना साथी बना लेना चाहिए। मैं
तो तुम्हारी सहायता करूँगा ही...।'' भगवान की आज्ञा पाकर देवगण दैत्यों से संधि करके अमृत-प्राप्ति
के लिए प्रयास करने लगे। वे भाँति-भाँति की औषधियाँ लाए और उन्हें क्षीरसागर में
छोड़ दिया, फिर मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नागराज को नेती (रस्सी)
बनाकर बड़े वेग से समुद्र मंथन का कार्य आरंभ किया। भगवान ने वासुकि की पूँछ की ओऱ
देवताओं को और मुख की ओर दैत्यों को लगाया। मंथन करते समय वासुकि की निःश्वासाग्नि
से झुलसकर सभी दैत्य निस्तेज हो गए और उसी निःश्वास वायु से विक्षिप्त होकर बादल
वासुकि की पूँछ की ओर बरसते थे, जिससे
देवताओं की शक्ति बढ़ती गई। भक्त वत्सल भगवान विष्णु स्वयं कच्छप रूप धारण कर
क्षीरसागर में घूमते हुए मंदराचल के आधार बने हुए थे। वे ही एक रूप से देवताओं में
और एक रूप से दैत्यों में मिलकर नागराज को खींचने में भी सहायता देते थे तथा एक
अन्य विशाल रूप से, जो देवताओं और दैत्यों को दिखाई नहीं देता था, उन्होंने
मंदराचल को ऊपर से दबा रखा था। इसके साथ ही वे नागराज वासुकि में भी बल का संचार
करते थे और देवताओं की भी शक्ति बढ़ा रहे थे। इस
प्रकार मंथन करने पर क्षीरसागर से क्रमशः कामधेनु, वारुणी
देवी, कल्पवृक्ष, और
अप्सराएँ प्रकट हुईं। इसके बाद चंद्रमा निकले, जिन्हें
महादेव जी ने मस्तक पर धारण किया। फिर विष प्रकट हुआ जिसे नागों ने चाट लिया।
तदनंतर अमृत का कलश हाथ में लिए धन्वंतरि का प्रादुर्भाव हुआ। इससे देवताओं और
दानवों को भी बड़ी प्रसन्नता हुई। सबके अंत में क्षीर समुद्र से भगवती लक्ष्मी
देवी प्रकट हुईं। वे खिले हुए कमल के आसन पर विराजमान थीं। उनके अंगों की दिव्य कांति
सब ओर प्रकाशित हो रही थी। उनके हाथ में कमल शोभा पा रहा था। उनका दर्शन कर देवता
और महर्षिगण प्रसन्न हो गए। उन्होंने वैदिक श्री सूक्त का पाठ करके लक्ष्मी देवी
का स्तवन करके दिव्य वस्त्रा भूषण अर्पित किए। वे उन दिव्य वस्त्रा भूषणों से
विभूषित होकर सबके देखते-देखते अपने सनातन स्वामी श्री विष्णु भगवान के वक्ष स्थल
में चली गई। भगवान को लक्ष्मी जी के साथ देखकर देवता प्रसन्न हो गए। दैत्यों को
बड़ी निराशा हुई। उन्होंने धन्वंतरि के हाथ से अमृत का कलश छीन लिया, किंतु
भगवान ने मोहिनी स्त्री के रूप से उन्हें अपनी माया द्वारा मोहित करके सारा अमृत
देवताओं को ही पिला दिया। तदनंतर इंद्र ने बड़ी विनय और भक्ति के साथ श्री लक्ष्मी
जी ने देवताओं को मनोवांछित वरदान दिया।
*****
भगवान् विष्णु जी
की परीक्षा
एक बार लक्ष्मी जी
के मन में प्रश्न उठा कि भगवान विष्णु सब का पालन-पोषण करने वाले कहलाते हैं| इस
बात को आजमाना चहिए| उन्होंने एक कीड़े को एक डिब्बी में बंद करके एक ट्रंक में रख
दिया और मन-ही-मन विचारने लगी कि देखे, इस
कीड़े को भगवान कैसे भोजन पहुँचाते हैं? कुछ देर बाद लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु जी
के चरणों में विनती की- “प्रभु
आप सबका पालन पोषण करने वाले कहलाते हो और सबके आहार का ध्यान रखते है तो क्या आज
सबको भोजन प्राप्त हो चुका है?”
भगवान विष्णु जी ने लक्ष्मी जी को उत्तर दिया- “हाँ
लक्ष्मी प्रारब्ध के अनुसार सबको भोजन पहुँच चुका है|”
लक्ष्मी जी ने फिर कहा कि आप भली-भाँति सोच लीजिए| कही ऐसा तो नहीं कि कोई भोजन से
वंचित रह गया हो| भगवान जी ने कहा कि संसार में ऐसा कोई नहीं जिसे अपने प्रारब्ध
के अनुसार भोजन ना पहुँचा हो| यह सुनकर लक्ष्मी जी तुरंत ट्रंक में से वह डिबिया
निकाल कर ले आई| जैसे ही उन्होंने डिब्बी खोली तो यह देखकर हैरान हो गई कि डिबिया
के अंदर चावल का एक दाना पड़ा हुआ है और कीड़ा चावल खाने में व्यस्त है| लक्ष्मी जी
मन में सोचने लगी कि डिब्बी में चावल का दाना कैसे पहुँच गया? वास्तव में हुआ यह
कि लक्ष्मी जी के माथे पर जो केसर और चावल का तिलक लगा हुआ था, डिबिया को बंद करते
समय वह चावल का दाना उस डिब्बी में गिर गया| तब उन्हें विश्वास हुआ कि भगवान सबका
पालन पोषण करते है और सबको ही उनके प्रारब्ध के अनुसार भोजन मिल जाता है|
*****
यमराज देव को श्राप
एक बार यमराज और
उसके दूत यमलोक में इस बात को लेकर परेशान हो गए कि पहले पृथ्वी लोक पर लोग पाप
करते थे, तो उनकी मृत्यु भी जल्दी आ जाती थी| लेकिन अब तो हर कोई भगवान का भक्त
बनता जा रहा है| हम किस के प्राण हरे, इसी परेशानी को लेकर वह ब्रह्मा जी के पास
गए| ब्रह्मा जी ने यमराज से इसका कारण पूछा तो यमराज ने बताया कि धरती पर एक राजा
है, जो विष्णु भगवान जी का भक्त है और अपने राज्य में सभी से भगवान की पूजा करवाता
है| तो ब्रह्मा जी ने कहा कि हो सकता है उसकी मृत्यु के बाद शायद भगवान की भक्ति
लोग कम करने लगे| तो चित्रगुप्त ने एक युक्ति अपनाई उन्होंने एक सुंदर स्त्री को
उत्पन्न किया जोकि बहुत सुंदर थी और उसका नाम मोहिनी रखा| ब्रह्मा जी ने उसे कहा
कि तूने धरती पर जाकर राजा के मन को ऐसा मोह लेना है कि जैसा तू कहे वैसा ही वो
करे| उसने ऐसा ही किया पृथ्वी लोक पर जाकर सबसे पहले राजा का मन ऐसा मोह लिया कि
वह उस मोहिनी से विवाह करने के लिए तैयार हो गया| उसने मोहिनी से विवाह के लिए कहा
तो मोहिनी ने कहा कि “शादी
के बाद मैं आप से एक वस्तु माँगूगी जिसे देने का पहले मुझे वचन दो| तभी मैं शादी
के लिए तैयार होउँगी| तब राजा ने उसे वचन दिया| अब शादी को काफी समय हो गया तो एक
दिन मोहिनी ने कहा कि मैं आपका दिया गया वचन पूरा करवाना चाहती हूँ| तब उस समय
राजा पूजा के लिए अपने गुरु महाराज जी के पास जा रहे थे| तब राजा ने कहा कि बोलो
तुम क्या चाहती हो? तब मोहिनी ने कहा कि मैं चाहती हूँ की आप भगवान विष्णु जी की
पूजा करने के लिए सबको मना कर दे| तब राजा ने कहा कि ये कैसी इच्छा है? तुम कुछ और
माँग लो| तब मोहिनी ने कहा कि मेरी तो यही इच्छा है, जो आपको पूरी करनी पड़ेगी|
राजा ने कहा कि ये मैं नहीं कर सकता| तो मोहिनी ने कहा कि ठीक है| ऐसा नहीं कर सकते, तो अपनी दूसरी रानी
के लड़के का सिर काट कर दे दो| तब राजा को क्रोध आ गया कि ये क्या इच्छा है? तब
राजा का लड़का भी वहाँ आ गया उसने अपने पिता जी को कहा कि पिता जी, ये लो तलवार और
मेरा सिर काटकर अपना वचन पूरा करो| तब राजा को मजबूरन अपने लड़के का सिर काटना पड़ा|
जब यह बात राजा के गुरु महाराज जी को पता चली| उन्हें बहुत क्रोध आया और उन्होंने
मोहिनी को भस्म कर दिया| अब यमराज भी डर गया कि कही श्री गुरु महाराज जी मुझे भी
भस्म ना कर दे तो वह बचने के लिए ब्रह्मा जी के पास गया| तो ब्रह्मा जी ने कहा कि
तुम विष्णु जी के पास जाओ वही तुम्हें बचायेंगे| अब यमराज घबराया| वह भागता हुआ
विष्णु भगवान जी के पास गया| भगवान विष्णु जी ने कहा कि तुमने गलत काम किया है
हमारे भक्त के साथ| तुम्हें इसका दंड अवश्य मिलेगा आज से तुम्हारें शरीर का रंग
काला हो जायेगा और तुम्हारा वाहन भैंसा होगा| उसके बाद वैसा ही हुआ| तब से यमराज
भगवान के भक्तों को बिना भगवान की आज्ञा के कुछ भी नहीं कहते|
*****
बैकुण्ठ में कोई
जाना नहीं चाहता
एक बार नारद जी ने
देखा कि भगवान विष्णु जी गहरी सोच में बैठे है, तो नारद जी ने भगवान से पूछा कि
भगवान आप इतनी गहरी सोच में क्यों बैठे हो? तो भगवान ने बताया कि मेरे बैकुण्ठ में
कोई आना नहीं चाहता धरती से| तो नारद जी बोले ऐसा कैसे हो सकता है कि इस बैकुण्ठ
में कोई आना नहीं चाहता? तो नारद जी ने कहा- “मैं
अभी जाता हूँ, अभी धरती से बैकुण्ठ के लिए किसी को लेकर आता हूँ|”
तो नारद जी धरती पर आये, सबसे पहले उन्होंने किसी गरीब व्यक्ति को ढूढाँ ताकि वो
अपनी गरीबी से परेशान हो और बैकुण्ठ जाने के लिए तुरंत तैयार हो जाये| यही सोचकर
नारद जी ने किसी गरीब व्यकि को बैकुण्ठ चलने को कहा और बताया कि बैकुण्ठ में सब
कुछ मिलता है| वहाँ पर किसी वस्तु की कमी नहीं है, लेकिन उस व्यक्ति ने जाने से
मना कर दिया और कहने लगा कि मैं जैसा भी हूँ यहाँ अपने बीवी-बच्चों के साथ खुश
हूँ, मैं बैकुण्ठ नहीं जाना चाहता | नारद जी ने सोचा कि ये तो अपने बीवी बच्चों को
छोड़ना नहीं चाहता चलो किसी और से पूछता हूँ, तो नारद जी किसी और के पास गए तो उसने
भी यही कहा कि मैं जैसा हूँ खुश हूँ अपने बीवी बच्चों के साथ| ऐसे ही कई लोगो के
पास गए पर कोई संसार त्याग कर बैकुण्ठ जाने को तैयार न हुआ| अंत में वह किसी
सेठ के पास गए| जो था तो सेठ, पर बहुत परेशान था तो नारद जी ने उस व्यक्ति से कहा
कि तुम बहुत परेशान हो, तुम मेरे साथ बैकुण्ठ चलो वहाँ तो सुख ही सुख है| उस सेठ
ने नारद जी से विनती की- “मेरे
घर कोई औलाद नहीं, यदि कोई औलाद हो जाये तो मैं जरुर बैकुण्ठ जाने को तैयार हो
जाऊंगा|”
तो नारद जी के मन को राहत मिली चलो कोई तो बैकुण्ठ जाने के लिए तैयार हुआ| नारद जी
ने उस व्यक्ति को आशीर्वाद दिया और फरमाया- “कुछ
समय बाद तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी तब मैं
तुम्हें लेने आऊंगा, बैकुण्ठ के लिए, उस व्यक्ति ने हाँ कर दी| अब कुछ समय
बाद उस व्यक्ति के घर पुत्र हुआ, तब नारद जी आये और बैकुण्ठ चलने को कहा, उस
व्यक्ति ने कहा- “अभी मेरे बच्चा छोटा
है , इसकी शादी हो जाये, काम धंधा शुरू हो जाये फिर मैं चलूँगा|”
तो नारद जी ने कहा- “कोई
बात नहीं मैं तब आऊंगा|”
कुछ वर्ष बाद जब नारद जी उस व्यक्ति के पास गए तो उन्होंने कहा कि अब तुम्हारे बेटा
भी बड़ा हो गया है, इसका काम धंधा भी है और शादी भी हो गई, अब तो चलो, तो उस
व्यक्ति ने कहा कि अभी मैं अपने पोता- पोती को खिलाना चाहता हूँ, उन्हें खिला लूँ
फिर चलूँगा| नारद जी फिर चले गए और कुछ समय बाद जब नारद जी उस के घर फिर से गए तो
देखा कि अब तो सेठ शरीर छोड़ कर गाय की योनि में चला गया है तो नारद जी ने उससे
पूछा कि सेठ जी अब तो आप गाय की योनि में आ गए अब तो मेरे साथ चलो तो सेठ ने उत्तर
दिया कि मैं यहाँ जैसा भी हूँ खुश हूँ| मैं अपने बच्चो के घर में हूँ मैं इन्हें
छोड़ के नहीं जाना चाहता, फिर कभी आना तो चलूँगा| नारद जी ये सोच कर चले गए कि इस
जन्म में नहीं तो अगले जन्म में चलेगा| काफी वर्ष बीतने के बाद जब नारद जी वापिस
आते है तो वह कुत्ते की योनि में पहुँच जाता है| नारद जी कहते हैं अब तो तेरा अगला
जन्म भी हो गया अब तो चलो, सेठ कहता है, “मैं
इस योनि में खुश हूँ क्योंकि मुझे अपने घर में जन्म मिला| यहाँ अपने घर की रखवाली
करता हूँ, मैं नहीं जाना चाहता| तुम फिर कभी आना मैं तुम्हारे साथ चलूँगा|”
नारद जी चले जाते है| कुछ वर्ष बाद जब वो आते है, तब सेठ कीड़े की योनि में जा चुका
होता है| अब नारद जी उस सेठ से कहते हैं, “हाँ
भाई अब चलना है?” तो सेठ कहता है कि,
“मैं
यहाँ बहुत खुश हूँ अपने घर में ही जन्म मिला है| यहाँ नाली के पास भटकता हूँ और
अपने घर का पानी जो नालियों में जाता है, उसी को पीकर गुजारा करता हूँ| तो कहने का
मतलब यह है कि संसार में रह कर हर कोई एक-दूसरे के मोह में फँसा हुआ है| इस संसार
के मोह को त्याग कर कोई भगवान के चरणों में जाना ही नहीं चाहता|
*****
भगवान को किसान
प्रिय है
एक बार नारद जी ने
भगवान विष्णु जी से पूछा कि भगवान आपको संसार में सबसे प्रिय कौन है? भगवान ने
जवाब दिया, “किसान”|
नारद जी बड़े हैरान हुए और पूछने लगे “भगवान
ऐसा क्यों|”
तो विष्णु भगवान जी ने उत्तर दिया कि तुम्ही जाकर देख लो, तो नारद जी ने देखा कि
किसान जो है सुबह उठ कर आधा घंटा भगवान को याद करता है| बाकि सारा दिन अपने काम –
धंधे में बिताता है| नारद जी वापिस भगवान के पास आये और उनसे कहा कि प्रभु किसान
तो थोड़ी देर सुबह और थोड़ी देर शाम को आपको याद करता है फिर भी आपको प्रिय क्यों
है? तो विष्णु भगवान जी ने नारद को एक सरसों से भरा मटका दिया और फरमाया कि पूरे
संसार का चक्कर लगा कर आओ और ध्यान रखना कि सरसों मटके में से गिरे ना | नारद जी
ने ऐसा ही किया जब वे वापिस पहुँचे तो प्रभु जी ने नारद से पूछा नारद जी आप जब
चक्कर लगा रहे थे तो कितनी बार हमें याद किया तो नारद जी ने कहा कि मैंने तो आपको
एक बार भी याद नहीं किया| मेरा ध्यान तो मटके पर था कि कही सरसों न गिर जाये| तो
भगवान ने कहा कि तुम्हें संसारी काम दिया तो तुमने एक बार भी हमें याद नहीं किया
लेकिन किसान तो संसारी काम भी करता है और हमें याद भी करता है इसलिए किसान हमें
प्रिय है| कहने का मतलब यही है- “जो
संसार के काम करते -2 मालिक के लिए समय निकालते है भगवान उनसे हमेशा प्रसन्न रहते
है|”
*****
भगवान दुविधा में
एक बार भगवान
दुविधा में पड़ गए, लोगों की बढ़ती
साधना वृत्ति से
वह प्रसन्न तो थे पर इससे उन्हें व्यवहारिक मुश्किलें आ रही थीं । कोई भी मनुष्य जब
मुसीबत में पड़ता, तो भगवान के पास
भागा- भागा आता और उन्हें
अपनी परेशानियां बताता। उनसे कुछ न कुछ मांगने लगता। भगवान इससे दु:खी हो गए
थे। अंतत: उन्होंने इस
समस्या के निवारण के लिए देवताओं की बैठक बुलाई और बोले - “देवताओं, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूं। कोई न कोई मनुष्य हर समय शिकायत ही करता रहता
हैं, जिससे न तो मैं
कहीं शांति पूर्वक रह सकता हूं, न ही
तपस्या कर सकता हूं । आप लोग मुझे
कृप्या ऐसा स्थान बताएँ जहाँ मनुष्य नाम का
प्राणी कदापि न पहुँच सके। “प्रभू
के
विचारों का आदर करते हुए देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट किए। गणेश जी बोले - “आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएं ।“
भगवान ने कहा - “यह स्थान तो मनुष्य की पहुँच में हैं ।
उसे वहाँ पहुँचने में अधिक
समय नहीं लगेगा।“ इंद्रदेव ने सलाह
दी कि “वह किसी महासागर
में चले जाएं। वरुण देव बोले "आप अंतरिक्ष में चले जाइए।“ भगवान ने कहा - “एक दिन मनुष्य वहाँ भी अवश्य पहुँच
जाएगा।“ भगवान निराश होने लगे
थे । वह मन ही मन सोचने लगे कि “क्या
मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं हैं,
जहां मैं शांतिपूर्वक रह सकूं।“ अंत में सूर्य देव बोले- “ प्रभू! आप ऐसा करें कि मनुष्य के हृदय
में बैठ जाएं। मनुष्य
अनेक स्थान पर आपको ढूंढने
में सदा उलझा रहेगा, पर वह यहाँ आपको कदापि न तलाश करेगा। “ईश्वर को सूर्य देव की बात पसंद आ गई।
उन्होंने ऐसा ही किया और
वह मनुष्य के हृदय में जाकर बैठ गए।
उस दिन से मनुष्य अपना दुख व्यक्त करने
के लिए ईश्वर को ऊपर, नीचे, दाएं, बाएं, आकाश, पाताल में ढूंढ रहा है, पर वह मिल नहीं रहें। मनुष्य
अपने भीतर बैठे हुए ईश्वर को नहीं देख पा रहा हैं|
*****
सबकी इच्छा पूरी का
वरदान
एक बार माता लक्ष्मी जी ने भगवान
विष्णु जी से विनय की स्वामी संसार में लोग इतने दुखी है आप इनकी इच्छाएँ पूरी
क्यों नहीं कर देते| तब उनकी विनय पर
भगवान ने फ़रमाया कि इनकी इच्छाएँ ही इनके दुःख का कारण है लेकिन फिर लक्ष्मी जी ने
कहा कि आप इनकी इच्छाएँ पूरी कर दो सब सुखी हो जायेंगे| तब भगवान विष्णु जी ने नारद जी को
बुलाकर एक कमंडल दिया और कहा कि संसार में जाओ जो भी व्यक्ति की कोई इच्छा हो उससे
इस कमंडल में से निकाल कर पूरा कर देना|
जब नारद जी जा रहे थे, तो रास्ते में शिव जी मिले उन्होंने कमंडल में से कुछ निकाल
लिया| तब नारद जी संसार
में आये और लोगों की इच्छाएँ पूरी करने लगे|
जब वे वापिस लौटे| तब उन्होंने भगवान
विष्णु जी को कहा कि मैं सबकी इच्छाएँ पूरी कर आया| लेकिन अभी भी लोग खुश नहीं है|
तब लक्ष्मी जी ने भी देखा कि लोग अभी भी खुश नहीं है तब
भगवान विष्णु जी ने लक्ष्मी जी को कहा कि देखों मैंने तुम्हें कहा था कि लोगो की
इच्छाँए ही उनके दुःख का कारण है|
असली सुख तो केवल भगवान की भक्ति में है|
वो किसी ने माँगी नहीं|
तब नारद जी ने कहा कि रास्ते में भगवान शिव जी ने कमंडल में से कुछ निकाला था| तो भगवान विष्णु जी ने कहा कि
उन्होंने भक्ति निकाली थी क्योंकि वे जानते थे कि इस भक्ति को कोई नहीं माँगेगा|
*****
धीमर को गुरु बनाना
नारद जी के बारे में यह प्रसिद्ध है कि
वे अपने तप के प्रभाव से कहीं भी आ जा सकते है| एक बार नारद जी जब बैकुण्ठ गए तो भगवान
विष्णु ने उन्हें बैठने के लिए कहा| कुछ
देर वार्तालाप करने के बाद जब नारद जी चले गए तो विष्णु जी ने अपने सेवादारों से
उस आसन को साफ़ करने के लिए कहा जहाँ नारद जी बैठे थे| सेवादार आज्ञा पालन में लग गए| इधर नारद जी को कोई बात याद आ गई वह
अभी दूर नहीं गए थे, अत: पुन: वापिस लौट आए| जब उन्होंने सेवादारो को वह स्थान साफ़
करते देखा जहाँ वे पहले बैठे थे तो वह हैरान हो गए| नारद जी ने भगवान विष्णु जी से पूछा
कि भगवन यहाँ तो कुछ देर पहले मैं ही बैठा
था फिर इसे साफ़ क्यों कराया जा रहा है?
"क्या मैं अपवित्र हूँ| भगवान बोले "नारद जी| यह ठीक है कि आप ज्ञानी, ध्यानी और वेदों-शास्त्रों के ज्ञाता है| परन्तु आपने अभी गुरु की शरण ग्रहण
नहीं की| इसलिए हम आपको
पवित्र नहीं मानते| यही कारण है कि जब
आप यहाँ आकर बैठते हैं तो आपके जाने के बाद हम वह स्थान अपवित्र समझकर स्वच्छ एवं
पवित्र करवाते है| भगवान विष्णु जी के
वचन सुनकर नारद जी ने कहा- "भगवन| यह सत्य है कि मैंने किसी को गुरु धारण
नहीं किया, परन्तु तप साधना तो की है और उस तप साधना द्वारा आपको प्राप्त करने में
भी सफल हुआ हूँ| आपको प्राप्त करके
क्या मैं पवित्र नहीं हो गया?"
भगवान विष्णु बोले- "नारद जी| यह ठीक है कि आप अपनी तप साधना के
द्वारा बैकुण्ठ में आने के अधिकारी हो गए हैं, परन्तु आपका यह कहना सरासर गलत है कि
आप मुझे प्राप्त कर चुके हैं| आपकी
साधना मनमति की साधना है| इसलिए
आपके अन्दर अभी अहंता एवं अहंकार के आसन जमा है| इस अहंता अहंकार के परदे ने अभी भी
आपको मुझसे अलग रखा है| अहंता-अहंकार के इस परदे को दूर करने के लिए
ही गुरु की शरण में जाना जरुरी है| नारद
जी ने कहा- "यदि
गुरु की शरण में जाना इतना आवश्यक है तो फिर मैं आपको ही गुरु धारण कर लेता हूँ| भगवान बोले- "मैं किसी भी प्रकार से आपका गुरु नहीं
हो सकता, क्योंकि मैं
निराकार हूँ और आप साकार है| मनुष्य
का गुरु जब भी होगा, साकार ही होगा| साकार रूप गुरु से ही मनुष्य को भक्ति
परमार्थ का लाभ प्राप्त हो सकता है| गुरु
ही ब्रह्मा, गुरु ही विष्णु और
गुरु ही महेश है और गुरु ही पारब्रहम परमेश्वर है| नारद जी ने निवेदन किया- "भगवान| ज्ञानदृष्टि तो मुझे पहले से ही
प्राप्त है, फिर इसके लिए गुरु
धारण करने की क्या आवश्यकता है| भगवान
बोले जिसे आप ज्ञान कहते और समझते है, वह तो वास्तव में अज्ञान है जिसने आपके
अन्दर अहंता और अहंकार भर दिया है| आप
इस समय जो कुछ भी कह रहे है, अज्ञान
के वश होकर कह रहे हैं| यदि
आपके ज्ञान चक्षु वास्तव में ही खुले होते तो फिर आप वाद-विवाद में कदापि ना पड़ते| प्रत्युत मेरी, जिसकी आप उपासना करते हैं, उसकी बात
तत्काल मान लेते, भगवान
विष्णु के ये वचन सुनकर नारद जी की आँखे खुल गई| उन्होंने निवेदन किया- मैं किसको अपना गुरु बनाऊँ? भगवान बोले- "आप कल प्रात: काल गंगा जी के किनारे चले जाना और जो
मनुष्य सबसे पहले मिले, उसे
ही अपना गुरु मानकर उससे दीक्षा ले लेन| इसी
में आपकी भलाई है|" भगवान
से आज्ञा लेकर नारद जी विदा हुए और मृत्यु लोक में आये| उनके मन मस्तिक में सारी रात भगवान
विष्णु की बातें ही गूँजती रही| प्रात: होते ही वे गंगा जी की ओर चल पड़े| गंगा जी के निकट पहुँचकर क्या देखते है
कि एक धीवर (मछुआ) कंधे पर जाल रखे सामने से आ रहा है| उसे देखते ही नारद जी ने अपने माथे पर
हाथ मारा और मुँह से बड़बड़ाते हुए कहा- यह
कैसा अपशगुन हुआ| यह अनपढ़, गवांर मछुआरा मुझ जैसे ज्ञानी का गुरु
कैसे हो सकता है| यह सोचकर नारद जी
वापिस जाने लगे| तब पीछे से आवाज आई
कि यह नारद भी कैसा अज्ञानी है| भगवान
के समझाने पर आया था गुरु धारण करने, परन्तु
इसमें तो अहंता अहंकार कूट-कूट
कर भरा हुआ है| कानों में ये शब्द
सुनते ही नारद जी रूक गए और कुछ समय उन शब्दों पर विचार किया फिर लौटकर उसके चरणों
में गिर पड़े और अपनी गलती की क्षमा माँगी और बोले कि आपको कैसे पता चला कि भगवान
के कहने पर मैं यहाँ गुरु धारण के लिए आया हूँ| मछुए ने हँसते हुए कहा- "तुम्हें इस बात से क्या लेना-देना है| तुम गुरु धारण करने आये हो या मुझसे
सवाल जवाब करने? "नारद
जी ने क्षमा माँगी और निवेदन किया कि गुरुदेव मुझे अपना शिष्य बना लीजिये| धीवर ने गुरु-दीक्षा देकर नारद जी को विदा किया| नारद जी वहाँ से सीधे बैकुण्ठधाम
पहुँचे| उन्हें देखकर भगवान
विष्णु बोले- "नारद
जी, गुरु मिले?" नारद जी ने उत्तर दिया- "भगवन| गुरु मिले तो सही पर...........|" भगवान ने उनकी बात
बीच में ही काटते हुए कहा- "नारद
जी| 'पर' शब्द कहने का अर्थ है कि आपने मेरे
कहने से गुरु धारण तो किया, परन्तु
आपकी अपने गुरु पर श्रद्धा एवं निष्ठा नहीं है| श्रद्धारहित व संशय युक्त मनुष्य के लिए
न यह लोक है, न परलोक है और न
सुख ही है| इसलिए भक्ति-परमार्थ की दृष्टि से आपका सब किया
कराया व्यर्थ हो गया| अब
तो आपको चौरासी अवश्य भुगतनी पड़ेगी| भगवान
विष्णु के ये वचन सुनकर नारद जी के होश उड़ गए| उन्होंने निवेदन किया- "प्रभु| गुरु के प्रति अश्रद्धा प्रकट कर मैंने
बहुत बड़ी भूल की है जिसका दण्ड मुझे चौरासी भुगतनी पड़ेगी| कृपा करके मुझे इससे बचने का उपाय
बताइये| भगवान बोले कि
चौरासी से बचाने वाले तो संसार में केवल-केवल
गुरुदेव ही होते है इसलिए यदि चौरासी से बचना चाहते हो तो फिर गुरु की शरण में जाओ|
नारद जी फिर मृत्युलोक में आये और गंगा जी के किनारे गुरुदेव को देखने लगे| कुछ देर बाद उन्हें गुरुदेव के दर्शन
हुए| नारद जी तुरंत उनके
चरणों में जा गिरे और अपनी भूल के लिए क्षमा माँगी और विष्णु जी के वचन दोहरा दिए| गुरुदेव ने हँसते हुए फ़रमाया- "नारद तुम फिर विष्णु लोक में जाओ और
भगवान विष्णु से कहो कि जो चौरासी मैंने भोगनी है उसका नक्शा बना कर दिखा दो और जब
वह नक्शा दिखाए तो तुम उस पर लोट-पोट
हो जाना| जब भगवान ऐसा करने
का कारण पूछे तो उत्तर देना कि मैं चौरासी भोग रहा हूँ| क्योंकि वह चौरासी भी आपकी बनाई हुई है
और यह भी आप ने ही बनाई है|"
नारद जी ने वैसा ही किया| तब भगवान बोले- "नारद जी| आपने देखा कि गुरु ने कितनी सुगमता से
आपको चौरासी भोगने से बचा लिया|"
अब की बार जब नारद जी गुरुदेव के चरणों
में उपस्थित हुए तो उनके दिल की अवस्था बदल चुकी थी| अब उनके दिल में गुरुदेव के प्रति
पूर्ण श्रद्धा थी| तब गुरुदेव ने नारद
जी को भक्ति के गहन रहस्य विस्तार से समझाये|
अभिप्राय यह है कि भक्तिमार्ग पर चलने
वाले जिज्ञासु पुरुष के लिए गुरु की शरण ग्रहण करना परमावश्यक है| श्रद्धा, निष्ठा एवं विश्वास के साथ गुरु के
वचनों पर आचरण करके ही मनुष्य इस मार्ग पर सफलता प्राप्त कर सकता है और अपना जीवन
धन्य बना सकता है|
*****
भगवान् भक्त के
ध्यान में
एक बार नारद जी
बैकुण्ठ लोक में पधारे| लक्ष्मी जी तो वहाँ थी किन्तु भगवान विष्णु नजर न आये|
इधर-उधर ढूँढने पर उन्होंने देखा कि भगवान ध्यान लगाकर बैठे हैं| नारद जी ने उनसे
प्रश्न किया- “हे प्रभु| आप किसका
ध्यान लगाकर बैठे है|”
भगवान ने उत्तर दिया कि मैं अपने भक्तों का ध्यान कर रहा हूँ| नारद जी ने पूछा- “भगवान
क्या भक्त आपसे श्रेष्ठ हैं, जो आप उनका ध्यान लगा रहे है?”
भगवान विष्णु जी ने कहा – “हाँ
नारद जी, वे मुझसे भी श्रेष्ठ है|”
तब नारद जी ने कहा- “सिद्ध
करके दिखाइए|” भगवान विष्णु ने
पूछा- “नारद,
जगत में सबसे बड़ा कौन हैं?
नारद – भगवान
पृथ्वी बड़ी है
भगवान विष्णु जी ने
कहा- “पृथ्वी
तो शेषनाग के सिर पर आधारित है, फिर वह बड़ी कैसे मानी जाये?
नारद – प्रभु फिर
तो शेषनाग जी बड़े हुए|
भगवान विष्णु- `वह
बड़े कैसे हुए, वह तो शंकर जी के हाथ का कंगन है| अत: शेषनाग जी कैसे बड़े हुए?
नारद- प्रभु फिर तो
शंकर जी बड़े हुए|
भगवान विष्णु –
रावण ने तो कैलाश पर्वत, शंकर जी के निवास को ही उठा लिया|
नारद – प्रभु फिर
तो रावण बड़ा हुआ|
भगवान विष्णु-
नारद, तुम उनको कैसे बड़ा कह सकते हो क्योंकि बालि तो रावण को बगल में दबाकर संध्या
करता था?
नारद – प्रभु फिर
तो बालि बड़ा हुआ|
भगवान विष्णु-
नारद, तुम भूल कर रहे हो, बाली को तो भगवान राम जी ने मारा था|
नारद – प्रभु तब तो
आप ही श्रेष्ठ हुए|
भगवान विष्णु- नारद
जी, मेरी अपेक्षा मेरे जिज्ञासु भक्तजन अधिक श्रेष्ठ है| चूँकि मैं तो भक्त के
हृदय में वास करता हूँ| निष्काम सेवा तथा भक्ति प्रभु को प्रेम में बाँध लेती है|
फिर तो प्रभु स्वयं भक्त के हृदय में व्याप्त हो जाते हैं| भक्त आनंद विभोर होकर
स्थाई शांति को प्राप्त करते हैं|
*****
गजेन्द्र
हाथी की रक्षा
गजेन्द्र
नाम का हाथियों का एक राजा था| वह नित्य प्रतिदिन की भाँति हाथियों के साथ विशाल
झील में स्नान कर रहा था| ग्रीष्म ऋतु थी| सूंड में पानी भर-2 कर एक-दूसरे पर उछाल
कर खूब मस्ती में खेल का आनंद ले रहे थे| इस झील में एक बलवान ग्राह रहता था| उसने
अपनी झील में अत्यधिक हलचल होते देखकर उन पर वार किया| अचानक गजेन्द्र का पाँव ही
उसके मुँह में पकड़ा गया| उस ग्राह ने अपने बल से गजेन्द्र को पानी में नीचे की ओर
खींच लिया| वह भी अत्यंत बलशाली था| उसने अपनी शक्ति से ग्राह से छूटने का भरपूर
प्रयत्न किया| कभी ग्राह उसको खींच कर पानी में ले जाता तो कभी गजेन्द्र उसे
किनारे तक खींच ले आता| इसी तरह युद्ध होता रहा| ग्राह अत्यंत बलशाली निकला|
गजेन्द्र ने जब सारा जोर लगा लिया और उसने पाया कि अब शक्ति बिल्कुल खत्म हो रही
है| उसने अपने सारे प्रयत्न को व्यर्थ समझा| उसे कोई सहायता की आशा भी न दिखाई दी|
पूर्व जन्म में वह विष्णु भक्त था| किसी संत के श्राप वश हाथी की योनि मिली थी| अब
उसके पूर्व संस्कार जागृत हुए| उसने इस झील के पानी के ऊपर तैरते हुए एक कमल के
फूल को उठा लिया और प्रभु को समर्पित करते हुए श्रद्धा से फूल को अपनी सूंड द्वारा
आकाश की तरफ उठाते हुए प्रभु के पवित्र नाम ‘राम ‘ का उच्चारण किया| ग्रंथो में
लिखा है कि जिस क्षण उसने सम्पूर्ण आत्म समर्पण से ‘राम’ नाम का उच्चारण किया,
भगवान उसी क्षण वहाँ पहुँच गए| उन्होंने ग्राह को परलोक पहुँचा कर हाथी की रक्षा
की, यह एक अत्यधिक सांकेतिक कथा है| हाथी एक अहंकारी जीव है| जब तक हम युवावस्था
में होते हैं, लोग हमें बहुत चाहते हैं| अहंकार इससे और भी बढ़ जाता है और जैसे ही
मृत्यु नजदीक आती है, वही प्यार करने वाले लोग “भाग्य
में ऐसा होगा’ कह कर किनारा कर जाते है| मित्र त्याग देते हैं, सम्बन्धी दूर हो
जाते हैं| जैसे इस कहानी में हुआ कि जब हाथी ने हृदय से प्रभु की शरण ली तो भगवान
उसे ग्राह से मुक्त करने के लिए तुरंत पहुँच गये| वैसे ही अगर हम भी सम्पूर्ण
समर्पण कर हृदय से उनके बन जायेंगे तो भगवान उसी क्षण हमारी आत्मा को काल रूपी
ग्राह से आजाद कर देंगे| यह मुक्ति या मोक्ष उनकी कृपा से मिलता है| उसका एक मात्र
उपाय है “दिल
से सम्पूर्ण समर्पण|”
*****
सत्संग का फल
एक समय का वृतांत है एक सेठ जी काफी
सामान के साथ कही जा रहे थे तो रास्ते में उन्हें एक व्यक्ति मिला, उसने सेठ जी से
विनय की क्या मैं आपका सामान छुड़वा दूँ जहाँ आपको जाना है| सेठ जी ने समझा कोई
मजदूर है, सामान भी भारी है, क्यों ना इससे सामान छुडवा लूँ| तब सेठ जी ने व्यक्ति
से कहा कि चलो| तब उस व्यक्ति ने विनय की मेरी एक शर्त है जो आपको माननी पड़ेगी या
तो पूरे रास्ते आप मुझे सत्संग सुनायेंगे या फिर पूरे रास्ते मैं आपको सत्संग
सुनाऊंगा| तब उस सेठ ने कहा कि मुझे तो सत्संग आता नहीं, तुम ही सुना देना| अब वे
दोनों चल पड़े| वह व्यक्ति पूरे रास्ते सेठ जी को सत्संग सुनाता गया| जब सेठ जी का
घर आ गया, तो उन्होंने उस व्यक्ति का धन्यवाद किया| वह व्यक्ति बहुत ही पहुँचा हुआ
था जोकि भविष्य की भी जानता था| उस व्यक्ति को पता था कि सेठ की उम्र थोड़ी है, तो
उस व्यक्ति ने सेठ जी को कहा, सेठ जी आपसे एक बात कहनी है कि आप जब कभी भी इस
संसार से शरीर छोड़ कर जाए तो धर्मराज की दरगाह में आपके अच्छे बुरे कर्मो का हिसाब
होगा उसी के हिसाब से आपको स्वर्ग, नरक मिलेगा| तब आप धर्मराज से ये कहना कि मैं
अपने अच्छे कर्मो का फल पाना नहीं चाहता सिर्फ देखना चाहता हूँ| इतना कहकर वह
व्यक्ति चला गया| कुछ समय बाद वह सेठ संसार त्याग कर धर्मराज के पास पहुँचा तो वहाँ
उसने वही बात कही जो सेठ को उस व्यक्ति ने बताई थी कि मैं अच्छे कर्मो का फल देखना
चाहता हूँ| तब धर्मराज भी सोच में पड़ गया कि यह कैसा व्यक्ति है, जो अपने कर्मो का
फल देखना चाहता है तो धर्मराज जी उसे ब्रह्मा जी के पास ले गए| वहाँ जाकर सारी बात
बताई कि यह अपने अच्छे कर्मो का फल देखना चाहता है| ब्रह्मा जी को भी कुछ समझ ना
आया| तब ब्रह्मा जी और धर्मराज मिलकर उस सेठ को विष्णु जी के पास ले गए और सारी
बात बताई| उन्हें भी कुछ समझ ना आया तो फिर सब शंकर जी के पास गए और जाकर सब बताया
तब शंकर भगवान जी ने फरमाया कि तू अपने अच्छे कर्मो का फल देखना चाहता है तो देख
ब्रह्मा, विष्णु, महेश हम तीनों के दर्शन तुझे हो रहे है, यह तेरे अच्छे कर्मो का
फल है, जो तुझे देखने को मिल रहा है| यह सब सत्संग में सुनी बातों का व उन पर अमल
करने का फल है|
*****
गंगा
स्नान का फल
एक बार एक व्यक्ति ने स्वप्न में देखा कि वह
गंगा में स्न्नान कर रहा है स्न्नान करने के बाद उसके मन में प्रश्न उठा कि मैंने
सुना है और ग्रंथों में भी लिखा है कि गंगा के स्न्नान से बैकुण्ठ की प्राप्ति
होती है लेकिन मुझे तो प्राप्ति नहीं हुई तो मन में यह प्रश्न ही चल ही रहा था कि
सामने से नारद जी आ गए उसने प्रश्न नारद जी से पूछा तो नारद जी ने कहा कि बात तो
तुमने सही कही चलों ब्रह्मा जी के पास चलते है उनसे पूछते है जब ब्रह्मा जी के पास
गए तो यही प्रश्न पूछा ब्रह्मा जी ने कहा कि बात तो सही है गंगा स्न्नान करने से बैकुंठ मिलता है लेकिन तुम्हे बैकुंठ नहीं मिला, अब
चलों महादेव के पास चलते है वो ही इस प्रश्न का उत्तर देंगे वे भी उस व्यक्ति को
लेकर महादेव के पास गए तब उस व्यक्ति ने वहा प्रश्न पूछा कि मैंने सुना है गंगा
स्न्नान से बैकुंठ की प्राप्ति होती है लेकिन मुझे तो प्राप्ति नहीं हुई | तब
महादेव ने कहा कि इधर उधर पता करने से सबसे अच्छा है विष्णु भगवान जी पास चलते है जब सभी विष्णु भगवान् जी के पास गए तो विष्णु
भगवान जी से पूछा कि इस व्यक्ति ने गंगा स्न्नान किया परन्तु बैकुंठ कि प्राप्ति
नहीं हुई तो विष्णु भगवान् जी ने फरमाया कि आप सभी बैकुंठ में तो खड़े हो| इसी तरह
संत कहते है गंगा के स्नान से किसी को बैकुंठ मिले न मिले लेकिन जो सतगुरु के
सत्संग रूपी गंगा में स्नान करता है उसे बैकुंठ जरुर मिलता है|
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चिड़िया का अंत
भगवान विष्णु गरुड़
पर बैठ कर कैलाश पर्वत पर गए। द्वार पर गरुड़ को छोड़ कर खुद शिव से मिलने अंदर चले
गए। तब कैलाश की अपूर्व
प्राकृतिक शोभा को देख कर गरुड़ मंत्रमुग्ध थे कि तभी उनकी नजर एक खूबसूरत छोटी सी
चिड़िया पर पड़ी। चिड़िया
कुछ इतनी सुंदर थी कि गरुड़ के सारे विचार उसकी तरफ आकर्षित होने लगे। उसी समय कैलाश पर
यम देव पधारे और अंदर जाने से पहले उन्होंने उस छोटे से पक्षी को आश्चर्य की
दृष्टि से देखा। गरुड़
समझ गए उस चिड़िया का अंत निकट है और यमदेव कैलाश से निकलते ही उसे अपने साथ यमलोक
ले जाएँगे। गरूड़ को दया आ गई।
इतनी छोटी और सुंदर चिड़िया को मरता हुआ नहीं देख सकते थे। उसे अपने पंजों में
दबाया और कैलाश से हजारों कोस दूर एक जंगल में एक चट्टान के ऊपर छोड़ दिया, और खुद वापिस कैलाश पर आ गए। आखिर जब यम बाहर आए
तो गरुड़ ने पूछ ही लिया कि उन्होंने उस चिड़िया को इतनी आश्चर्य भरी नजर से क्यों
देखा था। यम देव बोले
"गरुड़ जब मैंने उस चिड़िया को देखा तो मुझे ज्ञात हुआ कि वो चिड़िया कुछ ही पल
बाद यहाँ से हजारों कोस दूर एक नाग द्वारा खा ली जाएगी। मैं सोच रहा था कि
वो इतनी जल्दी इतनी दूर कैसे जाएगी, पर
अब जब वो यहाँ नहीं है तो निश्चित ही वो मर चुकी होगी।" गरुड़ समझ गये
"मृत्यु टाले नहीं टलती चाहे कितनी भी चतुराई की जाए।" इस लिए कृष्ण कहते
है।
करता तू वह है जो
तू चाहता है
परन्तु होता वह है
जो में चाहता हूँ
कर तू वह जो मैं
चाहता हूँ
फिर होगा वो जो तू
चाहेगा ।
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जय तथा विजय
द्वारपाल
जय तथा विजय नाम के बैकुण्ठ के दो
द्वारपाल थे| एक बार ब्रह्माजी
के ऋषि पुत्र सनक, सनन्दन, सनातन तथा सनत कुमार भगवान विष्णु जी
के दर्शन हेतु बैकुण्ठ गए|
जय-विजय, दोनों द्वारपालों
ने उन्हें केवल रोका ही नहीं अपितु ब्रह्म ऋषि पुत्रों के साथ अशिष्टता का व्यवहार
किया एवं उनका निरादर किया|
इस बुरे कर्म के लिए ऋषि पुत्रों के श्राप से उन्हें भूलोक पर तीन जन्म लेने पड़े| पहला जन्म था- हिरणयाक्ष तथा हिरण्यकशियु| दूसरा जन्म था- कुम्भकरण तथा रावण और तीसरा जन्म था- शिशुपाल तथा दन्तवक्त्र| उनके प्रायश्चित करने के कारण प्रभु
ने उनका उद्धार किया तथा तीनों जन्मों में भगवान विष्णु ने वाराह, नरसिंह, राम तथा कृष्ण अवतार के रूप में
उन्हें मारा| इसके पश्चात ही वे
बैकुण्ठ में लौट सके
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श्री
नारयण व शिव जी का प्रेम
एक
बार भगवान नारायण वैकुण्ठलोक में सोये हुए थे। उन्होंने स्वप्न में देखा कि
करोड़ों चन्द्रमाओं की कांतिवाले, त्रिशूल-डमरू-धारी, स्वर्णाभरण-भूषित, सुरेन्द्र-वन्दित, सिद्धिसेवित
त्रिलोचन भगवान शिव प्रेम और आनन्दातिरेक से उन्मत्त होकर उनके सामने नृत्य कर रहे
हैं| उन्हें देखकर भगवान विष्णु हर्ष से गद्गद् हो उठे और अचानक उठकर
बैठ गये, कुछ देर तक ध्यानस्थ बैठे रहे। उन्हें इस प्रकार बैठे देखकर
श्रीलक्ष्मी जी पूछने लगीं, ``भगवन!
आपके इस प्रकार अचानक निद्रा से उठकर बैठने का क्या कारण है?'' भगवान
ने कुछ देर तक उनके इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया और आनंद में निमग्न हुए
चुपचाप बैठे रहे, कुछ देर बाद हर्षित होते हुए बोले, “देवी, मैंने
अभी स्वप्न में भगवान श्रीमहेश्वर का दर्शन किया है। उनकी छवि ऐसी अपूर्व आनंदमय
एवं मनोहर थी कि देखते ही बनती थी। मालूम होता है, शंकर
ने मुझे स्मरण किया है। अहोभाग्य, चलो, कैलाश
में चलकर हम लोग महादेव के दर्शन करें।“ ऐसा
विचार कर दोनों कैलाश की ओर चल दिये। भगवान शिव के दर्शन के लिए कैलाश मार्ग पर
आधी दूर गये होंगे कि देखते हैं भगवान शंकर स्वयं गिरिजा के साथ उनकी ओर चले आ रहे
हैं। अब भगवान के आनंद का तो ठिकाना ही नहीं रहा। मानों घर बैठे निधि मिल गयी। पास
आते ही दोनों परस्पर बड़े प्रेम से मिले। ऐसा लगा, मानों
प्रेम और आनंद का समुद्र उमड़ पड़ा। एक-दूसरे को देखकर दोनों के नेत्रों से
आनन्दाश्रु बहने लगे और शरीर पुलकायमान हो गया। दोनों ही एक-दूसरे से लिपटे हुए
कुछ देर मूकवत् खड़े रहे। प्रशनोत्तर होने पर मालूम हुआ कि शंकर जी को भी रात्रि
में इसी प्रकार का स्वप्न हुआ कि मानों विष्णु भगवान को वे उसी रूप में देख रहे
हैं, जिस रूप में अब उनके सामने खड़े थे। दोनों के स्वप्न के वृत्तान्त से अवगत होने के बाद दोनों
एक-दूसरे को अपने निवास ले जाने का आग्रह करने लगे। नारायण ने कहा कि वैकुण्ठ चलो
और भोलेनाथ कहने लगे कि कैलाश की ओर प्रस्थान किया जाये। दोनों के आग्रह में इतना
अलौकिक प्रेम था कि यह निर्णय करना कठिन हो गया कि कहां चला जाय? इतने
में ही क्या देखते हैं कि वीणा बजाते, हरिगुण
गाते नारद जी कहीं से आ निकले। बस, फिर
क्या था? लगे दोनों उनसे निर्णय कराने कि कहां चला जाय? बेचारे
नारद जी तो स्वयं परेशान थे, उस
अलौकिक-मिलन को देखकर। वे तो स्वयं अपनी सुध-बुध भूल गये और लगे मस्त होकर दोनों
का गुणगान करने। अब निर्णय कौन करे? अंत
में यह तय हुआ कि भगवती उमा जो कह दें, वही
ठीक है। भगवती उमा पहले तो कुछ देर चुप रहीं। अंत में वे दोनों की ओर मुख करते हुए
बोलीं, ``हे नाथ,
हे नारायण, आप
लोगों के निश्चल, अनन्य एवं अलौकिक प्रेम को देखकर तो यही समझ में आता है कि आपके
निवास अलग-अलग नहीं हैं,
जो कैलाश है, वही
वैकुण्ठ है और जो वैकुण्ठ है, वही
कैलाश है, केवल नाम में ही भेद है। यहीं नहीं, मुझे
तो ऐसा प्रतीत होता है कि आपकी आत्मा भी एक ही है, केवल
शरीर देखने में दो हैं। और तो और, मुझे
तो स्पष्ट लग रहा है कि आपकी भार्याएँ भी एक ही हैं। जो मैं हूं, वही
लक्ष्मी हैं और जो लक्ष्मी हैं, वही
मैं हूँ। केवल इतना ही नहीं, मेरी
तो अब यह दृढ़ धारणा हो गयी है कि आप लोगों में से एक के प्रति जो द्वेष करता है, वह
मानों दूसरे के प्रति ही करता है। एक की जो पूजा करता है, वह
मानों दूसरे की भी पूजा करता है। मैं तो यह समझती हूं कि आप दोनों में जो भेद
मानता है, उसका चिरकाल तक घोर पतन होता है। मैं देखती हूं कि आप मुझे इस
प्रसंग में अपना मध्यस्थ बनाकर मानो मेरी प्रवंचना कर रहे हैं, मुझे
असमंजस में डाल रहे हैं,
मुझे भुला रहे हैं।
अब मेरी यह प्रार्थना है कि आप लोग दोनों ही अपने-अपने लोक को पधारिये। श्री विष्णु
यह समझें कि हम शिव रूप में वैकुण्ठ जा रहे हैं और महेश्वर यह मानें कि हम विष्णु
रूप में कैलाश-गमन कर रहे हैं। इस
उत्तर को सुनकर दोनों परम प्रसन्न हुए और भगवती उमा की प्रशंसा करते हुए, दोनों
ने एक-दूसरे को प्रणाम किया और अत्यंत हर्षित होकर अपने-अपने लोक को प्रस्थान
किया। लौटकर जब श्री विष्णु वैकुण्ठ पहुँचे तो श्री लक्ष्मी जी ने उनसे प्रश्न
किया, ``हे प्रभु, आपको
सबसे अधिक प्रिय कौन है?''
भगवान बोले, ``प्रिय, मेरे
प्रियतम केवल श्री शंकर हैं। देहधारियों को अपने देह की भांति वे मुझे अकारण ही
प्रिय हैं। एक बार मैं और श्री शंकर दोनों पृथ्वी पर घूमने निकले। मैं अपने
प्रियतम की खोज में इस आशा से निकला कि मेरी ही तरह जो अपने प्रियतम की खोज में
देश-देशान्तर में भटक रहा होगा, वही
मुझे अकारण प्रिय होगा। थोड़ी देर के बाद मेरी श्री शंकर जी से भेंट हो गयी।
वास्तव में मैं ही जनार्दन हूं और मैं ही महादेव हूं। अलग-अलग दो घड़ों में रखे हुए
जल की भांति मुझमें और उनमें कोई अंतर नहीं है। शंकरजी के अतिरिक्त शिव की चर्चा
करने वाला शिव भक्त भी मुझे अत्यंत प्रिय है। इसके विपरीत जो शिव की पूजा नहीं
करते, वे मुझे कदापि प्रिय नहीं हो सकते।'' इस
तरह जो शिव की पूजा करता है वह वैकुंठवासी विष्णु को भी स्वीकार है और जो श्री
विष्णु की वंदना करता है,
वह त्रिपुरारी को भी
मना लेता है।
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