सिकंदर की तृष्णा
एक बार सिकन्दर महान एक उच्चकोटि के
सन्त के पास गया और पूर्ण श्रद्धा से उनकी सेवा करने लगा| कुछ समय के बाद जब महात्मा जी उसकी
सेवा से प्रसन्न हुए तो उन्होंने सिकन्दर से एक वरदान माँगने को कहा| राजा ने बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़कर
प्रार्थना की कि सारे विश्व का राज्य उसे मिल जाये| उसकी विनम्रता से अभिभूत होकर महात्मा
जी ने कहा- "ओ
सिकन्दर| तुमने ऐसा वर क्यों
माँगा? क्या तुम्हे
अनंतकाल तक यहीं रहना है? तुम्हे
तो इस संसार के आवागमन के चक्र से छुटकारा तथा मुक्ति पाने का वरदान माँगना चाहिए
था जोकि मानव-जीवन का वास्तविक
लक्ष्य है"| परन्तु
सिकन्दर के मन में तो सम्पूर्ण संसार का शासक बनने की इच्छा बहुत प्रबल थी, इसलिए सिकन्दर ने यही वरदान पाने का
आग्रह किया| महाराज जी ने उसे
समझाने का प्रयत्न किया किन्तु सब व्यर्थ रहा| सिकन्दर को अपनी इच्छा पर दृढ़ देखकर
महात्मा जी ने उसके सामने मनुष्य की एक खोपड़ी रखी और उस खोपड़ी को अनाज के दानों से
भरने के लिए कहा तथा राजा द्वारा उस खोपड़ी को भरने में सफल होने पर उसके इच्छित
वरदान को पूर्ण करने का वचन दिया| सिकन्दर
इस सच्चे सौदे पर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सोचा कि इतने विशाल प्राप्ति के लिए
खोपड़ी को अनाज के दानों से भरना उसके लिए शान के विरुद्ध है अत: उसने शीघ्र ही अपने कोषाध्यक्ष को उस
खोपड़ी को अत्यधिक मूल्यवान हीरो से भरने की आज्ञा दी| सिकन्दर की आज्ञा का पालन उसी समय किया
गया और उस खोपड़ी में बहुमूल्य हीरे डाले जाने लगे| परन्तु राजा के आश्चर्य का उस समय
ठिकाना ना रहा| जब सारे कोष के
हीरे जेवहरात, स्वर्णमुद्राएँ आदि
भी उस खोपड़ी को भरने में अपर्याप्त रही| तब सेवकों ने जो कुछ महल में था लाना प्रारम्भ कर
दिया| यहाँ तक की रानियों
के शरीर के आभूषण भी लेकर उसमे डाल दिए गए परन्तु वह खोपड़ी फिर भी ना भर सकी| ज्यों-ज्यों समय गुजरता गया, सिकन्दर की परेशानी बढ़ती गई| अन्त में स्वयं को साधु की एक साधारण
सी माँग को भी पूर्ण करने में असमर्थ जानकर सिकन्दर अपने मिथ्या अभिमान पर बहुत
लज्जित हुआ और साधु के चरणों में गिर पड़ा|
महात्मा जी ने सिकन्दर को बताया कि इस
खोपड़ी में कोई रहस्य नहीं है|
यह तो मानव खोपड़ी है जो कभी भी संतुष्ट नहीं होती अपितु सदा अधिक से अधिक माँग
करती रहती है यदि समस्त विश्व की दौलत भी इसमें डाल दी जाये तो भी इसका लोभ शांत
नहीं हो सकता| यह सदा और अधिक की
माँग करेगी| इस सामान्य सत्य को
जानकार सिकन्दर होश में आया और अपनी मूर्खता पर बहुत पछताया||
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हाथ कफ़न से बाहर
कहते हैं कि जब
सिकंदर प्राण छोड़ने वाला था तो उसने हुक्म दिया कि लूट की सारी सम्पति उसके सामने
लायी जाये| उसने अपनी सेना को भी अपने सामने तैनात होने के लिए कहा| तब उसने अपने
मंत्रियो, चिकित्सकों, महान सेनापतियों तथा
शूरवीर योद्धाओं को संबोधित करते हुए पूछा कि क्या तुम में से ऐसा कोई है
जो मुझे केवल तब तक जीवित रख सके, जब तक मेरी माँ यहाँ पहुँच जाये? पुरस्कार
स्वरुप लूट की सारी सम्पति, सेनाएँ और यहाँ तक कि यह सारा राज्य भी दे दिया
जायेगा| परन्तु कोई भी इस कार्य को करना स्वीकार न कर सका| सभी मूर्ति बनकर सिर
झुकाकर खड़े थे| राजा की आँखो में आँसू बहने लगे और गहरी साँस लेकर वह बोला- ‘आह| यदि मुझे ज्ञात होता कि एक-2 श्वास
इतना अमूल्य है तो मैं उन्हें लूटपाट के व्यर्थ कामों में कभी न गँवाता| तब उसने
अपने मंत्रियों को निर्देश दिया कि जब मेरी शव यात्रा हो तो मेरे हाथ कफ़न से बाहर
और हथेलियाँ आकाश की ओर खुली हो| ताकि संसार देखे कि सिकंदर जैसा महान राजा भी
जिसने सारे विश्व को जीतने की योजना बनाई थी, इस संसार से खाली हाथ जा रहा है|
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