Monday, May 11, 2020

सम्राट कारू


सम्राट कारू की तृष्णा
सम्राट कारू ने इतनी अतुल्य धन- सम्पदा एकत्र कर रखी थी कि उस संम्पति से बड़े- 2 चालीस भंडार उसने भर लिए थे| इस धन सम्पति को एकत्र करने के लिए उसने प्रजा पर अत्यधिक अत्याचार किये और उनसे सब धन–दौलत ले ली| यहाँ तक कि किसी के पास एक स्वर्ण मुद्रा तक न छोड़ी| किन्तु तृष्णा ने उसके मन में इतना जोर पकड़ रखा था, कि इतनी अधिक धन सम्पदा संचित कर लेने पर भी उसे संतोष न हुआ| एक दिन उसने राज्य में यह घोषणा करवा दी कि जो कोई मनुष्य एक स्वर्ण मुद्रा लेकर दरबार में उपस्थित होगा, उसके साथ राजकुमारी का विवाह कर दिया जायेगा| वास्तव में इस घोषणा से उसका अभिप्राय केवल यह पता लगाना था कि किसी ने अपने पास कोई मुद्रा छिपाकर तो नहीं रखी हुई है| एक विधवा स्त्री के लड़के ने भी यह घोषणा सुनी| वह अपनी माँ के पास जाकर तथा घोषणा के विषय में बतलाकर एक स्वर्ण मुद्रा माँगने लगा| माँ ने प्यार से समझाते हुए कहा- ‘बेटा, मेरे पास स्वर्ण मुद्रा कहाँ से आई? कारू ने किसी के पास कुछ नहीं छोड़ा फिर कहाँ तू निर्धन और कंगाल और कहाँ वह राज कुमारी? ऐसे सपने देखना छोड़ दे | मुझे तो इस घोषणा में भी दाल में काला नजर आता है|’ किन्तु लड़के का हठ देखकर माँ ने कहा – ‘स्वर्ण मुद्रा मेरे पास तो नहीं है| परन्तु तू इतने हठ पर अड़ा है तो एक काम कर| तुम्हारे पिता ने जब शरीर छोड़ा था तब शव को कब्र में दफनाते समय इस देश की प्रथानुसार उनके मुख में एक स्वर्ण मुद्रा रखी गई थी| तू रात में उनकी कब्र खोदकर वह स्वर्ण मुद्रा निकाल ला|’ लड़के ने ऐसा ही किया और सुबह होते ही स्वर्ण मुद्रा लेकर कारू के सामने जा उपस्थित हुआ| स्वर्ण मुद्रा देखते ही कारू के चेहरे का रंग बदल गया| उसने लड़के को डाटँते हुए पूछा- ‘यह स्वर्ण मुद्रा तेरे पास कहा से आई? शीघ्र बता, अन्यथा फाँसी पर लटकवा दूँगा|’ कारू की बात सुनकर लड़का डर गया और उसने सब कुछ सच -2 बतला दिया| बस फिर क्या था? लड़के को तो डाँट कर भगा दिया और स्वर्ण मुद्राओ की प्राप्ति हेतु सारे देश की कबरे खुदवा दी| किन्तु उसकी तृष्णा न मिटनी थी न मिटी| तृष्णा भी इस प्रकार कभी किसी की मिटी है, जो उसकी मिट जाती| कारू इस संसार से चला गया, परन्तु तृष्णा के वशीभूत होकर जिस  धन सम्पदा को एकत्र करने के लिए उसने इतने अत्याचार किये थे,वह धन सम्पदा यही की यही धरी रह गई| जीवन भर तो वह तृष्णा की ज्वाला में झुलसता रहा, मरणोपरांत भी संसार में अपना अपयश छोड़ गया|
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