भक्त
नरसी जी
इतिहास साक्षी है कि जब भक्त नरसी जी केदार राग में भगवान् की
महिमा का गायन करते थे, तो
भगवान के गले की माला नरसी जी के गले में आ पड़ती थी। भक्त जी का ऐसा पवित्र प्रेम
देखकर कई व्यक्ति उनके अनुयायी बन गये और उनकी महिमा का बखान करने लगे। भक्त नरसी
जी का ऐसा सम्मान देखकर ईष्र्यालु दुष्टों से सहन न हो सका, जैसे फरमान हैः-
निंदक दुसट वडिआई वेखि न सकनि ओन्हा पराइआ भला न सुखाई।।
निंदक दुसट वडिआई वेखि न सकनि ओन्हा पराइआ भला न सुखाई।।
किआ होवै किस ही की झख मारी जा सचे सिउ बणि आई ।।
उन निंदकों ने राजा के पास जाकर उनकी चुगली की कि यह सब आडम्बर
है। राजा ने भक्त नरसी जी को बुलवाया और उनसे भजन गाने की प्रार्थना की। भजन गाने
पर भगवान के गले की माला नरसी जी के गले में आ पड़ी। राजा ने जब इस सच्चाई को अपनी
आंखों से देख लिया, तो
निंदकों को राजा के सम्मुख बहुत लज्जित होना पड़ा। सच्चाई देखकर राजा भी भक्त जी का
शिष्य हो गया और इस प्रकार उनकी महिमा पहले से भी अधिक हो गई। इसी पर सत्पुरुषों
ने फरमाया हैः-
तिन्ह की बखीली कोई किआ करे जिनका अंगु करे मेरा हरि करतारा।।
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