राजा जैमिनी
जैमिनी नाम का एक राजा सतगुरु की
सुसंगति पाकर यही सोचने लगा कि पिछले जन्मों के शुभ कर्मो से मुझे राज्य वैभव तो
मिल गया है| परन्तु भगवान की
प्राप्ति नहीं हुई| गुरुदेव के वचन है
कि राजमहल में रहकर ही हृदय को नाम से जोड़ो|
गुरुदेव के वचनों को मानकर उसने नाम सुमिरन की ओर ध्यान दिया| नाम का आनन्द मिलने लगा| उसने घोषणा करा दी कि दोपहर तक चाहे
कुछ भी हो जाये मुझे पूजा- कक्ष से कोई ना उठाये| इस समय में जो भी मेरे पास आयेगा उसका
सिर काट दूँगा| पडोसी राजा को इस
नियम का पता चला तो वह प्रात: काल राज्य की सीमा पर आ डटा और सन्देश भिजवाया कि
शीघ्र आओ और युद्ध करो या फिर मेरे अधीन हो जाओ| सेनापति, कर्मचारी यह सुनकर घबराये कि अब जो भी
राजा को बुलायेगा, राजा उसका सिर काट
देगा| उन्होंने सोच
विचार कर राजा की माता को राजा के पास भेजा|
माता ने कहा- "बेटा| शत्रु दरवाजे पर हैं; उठो| राज्य की रक्षा करो|"
राजा ने कहा- "माता| मैं आपका सिर नहीं काट सकता| झूठा राज्य जाता है तो जाने दो, मैं सच्चे धन को नहीं छोड़ सकता|
दोपहर के बाद राजा घुड़साल में गया| घोड़ा पसीने से तर-बतर था| सैनिकों से पूछा-"आज इस पर कौन सवार हुआ था" उसने उत्तर दिया- " महाराज| आप अभी युद्ध जीतकर आये हैं और आप ही
पूछ रहे हैं| राजा के अन्तहृदय
ने भगवान के नाम की महिमा का दृश्य प्रकट कर दिया| राजा उस दिन से अत्यधिक समय नाम
सुमिरन में देने लगा||
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