मन का अंहकार
सेवक के मन का अहंकार सेवक की करी कराई जन्मों
की मेहनत ख़राब कर देता है | अहंकार दीमक के समान है जो जो धीरे करके सेवक की सारी
भक्ति की कमाई को ख़त्म कर देता है | जब हम अपने धन का, अपनी बुद्धि का , अपने रूप
का अहंकार करते है या अहंकार स्वरुप अपनी जीभा से किसी को भी भला बुरा कह देते है
तो सेवक का यह कर्म उसे अपने सतगुरु से दूर कर देता है |
श्री गुरु गोबिंद सिंह जी
महाराज के समय की बात श्री गुरु महाराज जी के दरबार में एक मदारी अपने रीछ के साथ
प्रस्तुत हुआ| मदारी के द्वारा
सिखाए गए करतब रीछ ने संगत के सामने प्रस्तुत करने शुरू किए| कुछ खेल इतने हास्य से भरपूर थे कि संगत की हसी रोके से ना
रुक रही थी| करतब देख गुरु
जी भी मुस्कुरा रहे थे| एक सिख के ठहाकों से सारा दरबार गुंजायमान था वो सिख था गुरु गोबिंद सिंह जी
महाराज पर चवर झुलाने की सेवा करने वाला भाई किरतिया! भाई किरतिया! आप इन करतबों
को देख, बड़े आनंदित हो| गुरु साहब जी ने कहा! महाराज इस रीछ के करतब हैं ही इतने
हास्यपूर्ण| सारी संगत ठहाके
लगा रही है| मुस्कुरा तो आप
भी रहें हैं दातार| भाई किरतिया ने कहा! हम तो कुदरत के करतब देख कर मुस्कुरा रहे हैं| भाई किरतिया कुदरत के करतब? कैसे महाराज! भाई
किरतिया क्या आप जानते हो इस रीछ के रूप में ये जीवात्मा कौन है? नही दाता! ये बाते मुझ जैसे साधारण जीव के बस में कहाँ? भाई किरतिया! रीछ के रूप में संगत का मनोरंजन करने वाला और
कोई नही| आप का पिता भाई सोभा राम है, भाई किरतिया जी को जैसे एक आघात सा लगा, सर से लेकर पाँव तक सारा शरीर कांप गया, कुछ संभला तो हाथ में पकड़े चवर साहब को गुरु पिता के चरनों
में रख दिया और बोलें- सारा संसार जानता है, मेरे पिता भाई सोभाराम ने गुरु दरबार की ताउम्र सेवा की| उन्होंने एक दिन भी गुरु सेवा के बिना व्यतीत नही किया, अगर उन जैसे सेवक की गति ऐसी है तो गुरु जी! सेवा करने का
कोई लाभ नही| भाई किरतिया! आपके पिता भाई सोभाराम ने गुरु घर में सेवा तो खूब की
लेकिन सेवा के साथ स्वयं की हस्ती को नही मिटाया| अपनी समझ को गुरु विचार से उच्च समझा| एक दिन हमारा एक सिख अपनी फसल बैलगाड़ी पर लाद कर मण्डी में
बेचने जा रहा था| राह में गुरुद्वारा देख मन में गुरुदर्शन करके कार्य पर जाने की प्रेरणा हुई| बैलगाड़ी को चलता छोड़| वो सिख गुरुघर में अंदर आ गया| गुरबानी का पावन हुक्मनामा चल रहा था| हुक्म सम्पूर्ण हुआ, भाई सोभाराम ने प्रसाद बाँटना शुरू किया| भाई सोभाराम जी, मुझे प्रसाद जरा जल्दी दे दीजिये, मेरे बैल चलते चलते कहीं दूर ना निकल जाएं सिख ने विनती की!
मेरे सेवक के मैले कपड़ो से अपने सफेद कपड़े बचाते हुए तेरे पिता भाई सोभाराम ने कहा
अच्छा, अच्छा, थोड़ा परे हो कर बैठ, बारी आने पर देता हूँ| बैलगाड़ी की चिंता, सिख को अधीर कर रही थी, सिख ने दो तीन बार फिर बिनती की तो तेरे पिता भाई सोभाराम
ने प्रसाद तो क्या देना था मुख से दुर्वचन दे दिए कहा ना, अपनी जगह पर बैठ, समझ नही आती क्या, क्यों रीछ के जैसे उछल उछल कर आगे आ रहा है तेरे पिता के ये
कहे अपशब्द मेरे सिख के साथ साथ, मेरा हृदय भी वेधन कर गए| सिख की नजर जमीन पर गिरे प्रसाद के एक कण पर पड़ी, उसी कण को गुरुकृपा मान अपने मुख लगा सिख तो अपने गन्तव्य
को चला गया| तेरे पिता की
सर्व चर्चित सेवा को गुरु नानक साहब ने स्वीकार नही किया| उसी कर्म की परिणिति तेरा पिता भाई सोभाराम आज रीछ बन कर
संसार में लोगो का मनोरंजन करता फिरता है| इसका उछलना, कूदना, लिपटना, आंसू, सब के लिए मनोरंजन है| भाई किरतिया! ने विनय की कि गुरु पिता, मेंरे पिता को इस शरीर से मुक्त कर के अपने चरणों में निवास
दीजिये कृपा करें, मेरे पिता की आत्मा को इस रीछ के शरीर से मुक्त करें| गुरु जी ने अपने हाथों से रीछ बने भाई सोभाराम को प्रसाद दिया, भाई सोभाराम ने रीछ का शरीर त्याग, गुरु चरणों में स्थान पाया| गुरु जी से क्षमा मांग, चवर को उठा भाई किरतिया फिर से चवर की सेवा करने लगें।
प्रसंग से हमे कितनी बड़ी शिक्षा मिलती है हम अहम् वश कई बार किसी को कुछ भी कह
देते है लेकिन हम ये नहीं जानते उस कर्म को हमें कैसे भुगतना पड़ेगा | समय के पूर्ण
सतगुरु ही जीव इस अहंकार रूपी रोग से बचा सकते है इसलिए सेवक को चाहिए कि वह अपने
सतगुरु से रात दिन यही प्राथना करे कि हे सतगुरु हमारे मन में सेवा का भक्ति का
कभी अहंकार न आये|
श्री गुरु महाराज जी श्री
दृतीय पादशाही जी के समय की बात है, उनके एक भक्त मलिक घनश्यामदास जी के मन में
सूक्ष्म अहंकार आया कि यदि मैं यहाँ न होता तो श्री महाराज जी और सारी संगत का
खर्च कौन उठाता | श्री महाराज जी अन्तर्यामी थे, उन्होंने मलिक जी के मन में सुक्ष्म अहंकार को समझ लिया | सद्गुरु को शिष्य का अभिमान अच्छा नहीं लगता | एक दिन श्री महाराज जी नियमानुसार शाम को शहर के बाहर सैर
करने के लिए गए| उस समय पंद्रह बीस भक्त और छः सात महात्मा भी साथ थे | दास भी श्री महाराज जी की सेवा में था | लगभग तीन मील बाहर जाकर महाप्रभु ने सबको आज्ञा दी कि यहीं
ठहरो और खुद आगे बढ़ गए | थोड़ी दूरी पर कुछ मुसलमान किसान खेतों में हल चला रहे थे | श्री महाराज जी धीरे-धीरे टहलते हुए उनके पास पहुँचे और
उनसे मुखातिब हुए –“ अल्लाह के प्यारो सलामालेकम !” उन्होंने जवाब में वाह्लेकम
सलाम कहा और सब काम-काज छोड़कर के पास आ गए | श्री महाराज जी ने अपनी मौजवश उनसे सत्संग शुरू कर दिया| महाप्रभु ने उनसे कहा –“ आप घर खेतों और दूसरी चीजों के
प्यारे तो नहीं हो | अगर आप अल्लाह के प्यारे बनना चाहते हो तो पाँच समय नमाज पढ़ने के बाद शेष वक्त
कलबी जिक्र अजपा-जाप किया करो | अल्लाह का नूर तुम्हारे अन्दर है, उसे पहचानो | हजरत मुहम्मद ने अपने चार यारों को अपना फकीरी भेद दिया था | रब्ब उल आलमीन हा न कि मुसलमीन|” इस प्रकार हुजूर काफी समय तक सत्संग करते रहे | वे भक्त और साधु जिनको श्री महाराज जी पीछे छोड़ आये थे, ढूंढते-ढूंढते वहाँ आ पहुँचे | दाता दीन दयाल जी ने फिर से सत्संग शुरू कर दिया और उन
मुसलमानों से बोले – “मुझे यह काफिर नहीं छोड़ते, मैं तो आपका पीर हूँ ?” वे सब मुसलमान किसान भी मान गए और कहने लगे – “हम आपको अपने
घर और मस्जिद ले जायेंगे | आप हमारे भाइयों के पीर हैं तो हमारे भी पीर-मुर्शिद हैं |” तब श्री महाराज जी ने अपने सेवादार भक्तों को बताया कि अब
ये मुसलमान हमे नहीं छोड़ते | फिर खुद ही बोले – “फ़कीर का कोई मजहब नहीं होता | फ़कीर सबका सांझा है | मैं जहाँ भी चला जाऊ, मुझे सेवकों की क्या कमी ? मुझे सब अपना समझते हैं और मैं सबका हूँ | ये मुझे प्यार करते हैं, मैं इन्हें प्यार करता हूँ | यदि किसी के मन में ये विचार हो कि हम यदि न हों तो ये सेवा
कौन करे तो उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि ये उनकी भूल है |” इस प्रकार बड़ी मुश्किल से उन किसानों से रुखसत लेकर श्री
महाराज जी घर लौटे | तो गुरु दरबार में कोई यह अहंकार न करे की मैं सेवा कर रहा हूँ तो गुरु घर की
सेवा चल रही है| हमारे श्री गुरु महाराज जी श्री पंचम पादशाही जी के पावन वचन है
कि गुरु दरबार दी सेवा करों ता मुकदी नहीं ना करों ता रुकदी नहीं | अर्थात गुरु
दरबार में तो सभी सेवा करने वाले खुद श्री गुरु महाराज जी उनकी शक्ति से कोई सेवा
कर पाता है | सेवक अहम् से सदा बच कर रहे और अपने मन में भी यह विचार जरुर रखे कि मेरे मुख से निकले किसी वचन से किसी का दिल न
दुःख जाए| अहंकार ऐसा बुरा विकार है जो जन्मों की भक्ति को पल में ख़त्म कर देता
है|
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