सेवक के लिए सच्चा आराम अपने सतगुरु की सेवा में ही है, जो सेवक अपने आराम
से ज़्यादा सतगुरु की सेवा को प्राथमिकता देता
है वही सेवक ही अपने
स्वामी की प्रसन्ता को प्राप्त करता है। एक बड़ा ही सुन्दर उदाहरण श्री रामचरित मानस जी में आता है, कहते हैं कि जब श्री हनुमान जी माता सीता की खोज में
समुद्र लांघ कर लंका जा रहे थे तो रास्ते में समुन्द्र में से एक पर्वत निकला, जिसका नाम मैनाक था। श्री
हनुमान जी की परीक्षा लेने हेतु व
श्री हनुमान जी से कहने लगा कि हे हनुमान जी ! आप इतनी दूर से आ रहे है, आप थक गए होंगे,
थोड़ी देर मुझ पर बैठ कर आराम कर लेवे। तब
हनुमान जी ने वचन किये कि –
हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रणाम।
राम काजु किन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम।।
अर्थात जब तक
मैं अपने प्रभु श्री राम का कारज नहीं कर लेता तब तक मैं विश्राम कैसे कर सकता हूँ| यहाँ श्री हनुमान जी का भाव देखें देखे कि कितना सुन्दर है, अपने
आराम से ज़्यादा उनके मन में अपने प्रभु के कारज की चिंता है। ऐसा
ही भाव हर सेवक के मन में होना चाहिए कि जब तक
मैं अपने सतगुरु की सेवा
का कार्य पूरा
नहीं कर लेता तब तक मैं आराम नहीं करूँगा। कहते हैं आराम, अगर इस शब्द का विभाजन दो अलग -२ शब्दों में करें तो क्या बनता है : "आ - राम" । जो सेवक
आराम चाहता है तो जब वह प्रेम से बुलाएगा "आ- राम" तो ही सेवक को सच्चा
आराम मिलेगा| भगवान
की याद में ही, उनकी सेवा में ही सेवक का सच्चा आराम है।
कहते हैं कि जब श्री आनंदपुर दरबार
की रचना हो रही थी तो उस समय श्री तृतीए पादशाही
जी श्री गुरु महाराज खुद सारी सेवाए सेवकों से करवाते थे| जैसे ही सेवकजन श्री आनंदपुर दरबार में पहुँचते थे, अभी बस
से उतरते ही थे कि श्री
गुरु महाराज जी उन्हें
सेवा पर ले जाते
थे। एक दिन एक सेवक
ने श्री चरणों में विनती की कि, स्वामी जी जब हम किसी के घर जाते हैं मेहमान बन कर, तो जो उनके घर में सबसे अच्छी वस्तु खाने की होती है , वो हमे दी जाती है।
हमे आराम करने के लिए बोला जाता
है। पर जब हम यहाँ श्री
दरबार में आते हैं तो हमसे
कुछ नहीं पूछा जाता ना आराम
के लिए ना खाने पीने के लिए, सीधा ही सेवा में ले जाते हैं ऐसा क्यों ? तो श्री गुरु महाराज जी ने अपने वचनो में फ़रमाया कि देखो, संसार में जब तुम किसी के घर जाते हो, तो तुम्हे वो चीज़ दी जाती है जो संसारी लोगो की नज़र में सर्वोतम है। लेकिन श्री आनंदपुर दरबार में तुम्हें
वो चीज़ दी जाती है जो हमारी
नज़र में सर्वोतम है श्री गुरु दरबार की सेवा ! वही हम आपको देते
हैं। श्री वचन हुए कि सेवा
में सेवक का आराम है और सेवा
से ही सेवक की अन्तर आत्मा की भूख मिटती है। श्री वचन हुए कि श्री आनंदपुर दरबार की सेवा के लिए तो देवी
देवता भी ललायित रहते है | श्री गुरुमहाराज जी ने थोड़े से ही शब्दों
में कितनी बड़ी शिक्षा दे दी। सेवक के लिए सेवा
ही सबसे बड़ा आराम है, इसलिए हर सेवक को चाहिए कि वो आराम को त्याग
कर अपने सतगुरु की सेवा में हर समय तत्पर रहे और अपने जीवन का सच्चा लाभ प्राप्त करे।
श्री चतुर्थ पादशाही जी
श्री गुरु महाराज जी के समय कि बात है उस समय आप श्री आनंदपुर की सेवा कार्य में
रात दिन व्यस्थ रहते थे| एक बार की बात है आप श्री आनंदपुर से बैलगाड़ी द्वारा
अशोकनगर जा रहे थे | आप अधिकतर पैदल चलना ही पसंद करते थे | अतः कुछ यात्रा
बैलगाड़ी पर करके पुनः आप तथा एक अन्य महात्मा जी बैलगाड़ी के साथ-2 सड़क पर पैदल
चलने लगे | अभी अशोकनगर डेढ़ मील की दूरी पर था कि सूर्यास्त हो गया | सड़क पर चलते हुए
अचानक एक सांप आपके दायें श्री चरण पर लिपट गया | आपने अपने श्री चरणों को झटका दिया तो सांप दूर
जा पड़ा, परन्तु सांप श्री चरण पर डंक मार ही गया | महात्मा शांत आत्मानंद जी पहले तो कुछ घबरा गए, फिर सांप को
मारने के लिए इधर- उधर से पत्थर बटोरने लगे, लेकिन आपने महात्मा जी को सांप को मारने के लिए
मना कर दिया | महात्मा जी श्री चरण को पकड़कर टांग पर कपड़ा बाँधने लगे तथा
विनय की कि आप बैलगाड़ी में विराजमान हो जाये | आपने न तो कपड़ा बाँधने दिया और न बैलगाड़ी में
विराजमान हुए | बड़े साहस और धैर्य से पैदल चलते गए और महात्मा जी को धैर्य
बंधाया कि हमें कुछ भी नहीं हुआ है घबराओ मत | अशोकनगर पहुंचकर कुछ थोड़ी बहुत औषधि लगवा ली और
थोड़ी देर बाद आगे चल दिए | अगले दिन जब आपने महात्मा जी के विनय पर सर्प का विष उतारने
वाले को दिखाया तो वह व्यक्ति यह देखकर हैरान हो गया कि जितने विषैले सर्प ने आपको
डसा था, उससे तो बचना भी कठिन था | परन्तु आपको सर्प के विष ने तनिक भी हानि नहीं पहुंचाई | सांप के काटने
के बाद भी आपने सेवा के कार्य को प्राथमिकता दी और तनिक भी में आराम नहीं किया|
यह दृशांत सेवक के लिए कितना प्रेरणा दायक है | सेवक का यही भाव होना चाहिए कि वह
अपने स्वामी की सेवा में अपना तन-मन-धन
सर्वस्व अर्पण कर देवे|
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