Thursday, March 5, 2020

निंदा से बचो

 

निंदा से बचो

निंदा सबसे भयंकर रोग है, जिस इंसान को किसी दूसरे की निंदा करने का रोग लग गया है वह दिन रात बस इसी काम में लगा रहता है।  जैसे जीभा को तरह तरह के पकवान , मसाले दार चीज़ें खाने का स्वाद लग जाता है तो इंसान फिर चाह कर भी उन् चीज़ों का त्याग नहीं कर पाता।  ऐसे ही निंदा का चस्का जिसे लग गया, ऐसा व्यक्ति रात दिन बस इसी काम में लगा रहता है कि कहीं कोई व्यक्ति मिल जाये जिससे मैं दूसरों की निंदा करूँ। श्री राम चरित मानस में वचन आता है :

"सब की निंदा जे जड़ करदी,

ते चमगादड़ होये अवतरदी। "

अर्थार्त जो मुर्ख मनुष्य सब की निंदा करते हैं वे चमगादड़ होकर जनम लेते हैं।

इसके अलावा संसार के अंदर कितने तरीके कि बीमारियां है कैंसर , शुगर, पैरालिसिस , सर्वाइकल , स्टोन, सर दर्द , इत्यादि।  किसी के सामने इन् बिमारियों के नाम लिए जाएं एक एक करके तो क्या किसी को अच्छा लगेगा ? संसार में कोई ऐसा नहीं है जो बीमारी चाहता हो, हर कोई चाहता है कि भगवान् हमें स्वस्थ रखे, कोई शारीरिक दुःख न आये।  फिर जब दुःख नहीं चाहते तो फिर किसी की निंदा क्यों करते हो क्यूंकि ये जितने भी दुःख बीमारियां हैं ये सब जीव को निंदा करके ही मिलती हैं।  जैसे जैसे जीव निंदा करता जाएगा उसके पापों का घड़ा भरता जाएगा।  जिस जीव की वो निंदा कर रहा है उसके पाप तो काम होते जाएंगे लेकिन निंदा करने वाले के पाप बढ़ते जाएंगे।  अपने द्वारा किये एक एक कर्म का हिसाब देना पड़ेगा।  निंदा तो दीमक के सामान है, जो धीरे धीरे हमारी सारी भक्ति को ख़तम कर देती है।  जो सच्चा सेवक है अपने सतगुरु के वह प्रायः निंदा से बच कर रहते हैं।  यह ऐसा विकार है, अगर किसी जीव में आ गया तो ऐसे मनुष्य के हरियड्या में भगवान् कभी वास नहीं करते।  सुबह से शाम तक हमने सेवा की, भजन किया, शाम को किसी के साथ बैठ कर या फ़ोन पर निंदा की तो किया कराया अच्छा कर्म सब नाश हो जाता है।  सेवक निंदा के इस रोग से सतर्क रहें।  सतर्क मन से ये प्रन करें कि मैं किसी की निंदा नहीं करूँगा।

श्री राम चरित मानस में श्री राम जी के वचन हैं कि : " निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भाव।। "

अर्थात भगवान कहते हैं कि मुझे निर्मल व्यक्ति ही प्राप्त कर सकता है, जिसके अंदर छल कपट है, जो दूसरों की निंदा करता है ऐसा व्यक्ति तो मेरे स्वपन में भी नहीं आता।  अब विचार करें कि निंदा करने का कितना बड़ा नुक्सान है, जो सेवक वाकई में ही अपने सतगुरु की प्रसन्नता को प्राप्त करना चाहते हैं , जिनके जीवन का यह लक्ष्य है कि मेरे सतगुरु मेरे हर कर्म से प्रसन्न हो जाएं।  सबसे पहले तो वह सेवक निंदा का त्याग करे क्यूंकि जब तक मन में दूसरों कि बुराई रहेगी, न तो सेवा का लाभ मिलेगा, न ही भजन सुमिरन का, क्यूंकि निंदा आपको विकारों में ही लगाए रखेगी।

सेवक को चाहिए कि यह निंदक व्यक्ति की नज़रों से भी बचे।  क्यूंकि निंदक व्यक्ति अपनी तो भक्ति खराब करता ही है , दूसरों की भक्ति भी ख़राब कर देता है।  परम संत कबीर साहिब जी अपनी वाणी में फरमाते हैं कि : " कबीर मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर।  पाछे- पाछे हरी फिरे कहत कबीर कबीर।। "

अर्थात जिसका मन निर्मल है , जिसके मन में छल कपट, निंदा नहीं है, ऐसे व्यक्ति को कहीं मंदिर गुरूद्वारे में जाने कि ज़रूरत नहीं है।  ऐसे व्यक्ति के तो पीछे भगवन खुद जाते हैं।  और अपने चरणों का प्यार बक्शते हैं, सेवक की यदि कोई निंदा कर रहा हो तो सेवक उससे कभी भी न घबराये क्यूंकि निंदक तो सेवक की मंज़िल को आसान करता है। " निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाये। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए ।। "

अर्थात जो हमारी निंदा करता है उसे अपने अधिक से अधिक पास ही रखना चाहिए।  वह तो बिना साबुन बिना पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है। एक समय की बात है, परम्संत कबीर साहिब जी बड़े उदास बैठे हुए थे तो किसी व्यक्ति ने उनसे पुछा कि आप उदास क्यों बैठे हो तो उन्होंने उत्तर दिया कि आज मेरा निंदक मर गया है।  तो उस व्यक्ति ने कहा कि ये तो बहुत अच्छी बात है, जो आपकी निंदा करता था वो अब नहीं रहा, आपकी निंदा करने वाला कोई नहीं है।  कबीर साहिब जी ने कहा कि वो मेरे पाप काटता था, निंदा करके, अब वो काम कौन करेगा? कहने का भाव कि जीव जो अपने सतगुरु की सेवा में लगे हैं, निंदा से कभी न घबरा, अपना काम करते रहे।  निंदक को अपना काम करने दें।  वो अपने पाप बड़ा रहा है और आपके कर्म काट रहा ह।  सेवक को भजन पर ध्यान देना चाहिए।  अगर किसी की निंदा से सेवक को फरक पढ़ रहा है तो इसका मतलब है अभी भजन में कमी है जो किसी की बातों से मन परेशान हो रहा ह।  जिसकी बातों ने आपके मन में अशांति मचा दी ,इसका मतलब की वो आपसे ज़्यादा प्रभावशाली है।  सेवक अपना भजन करेगा तो उसे किसी बात की चिंता नहीं रहेगी।

एक हमारे श्री गुरुमहाराज जी श्री पंचम पादशाही जी के पास एक भक्तानी आयी, श्री चरणों में विनती करी कि स्वामीजी मेरे लड़के की लोग बड़ी निंदा करते हैं, ये इतना सेवा भक्ति में लगा रहता है फिर भी लोग पीछे बुरा- बुरा बोलते है।  तब श्री गुरु महाराज जी ने मौज वश ये वचन उच्चारण किये कि :

"निंदक हमारा न मरे, जीते आड़ जुगाड़।

निंदक के प्रताप से , पाया मोक्ष द्वार।। "

श्री गुरु महाराज जी ने फ़रमाया कि जो लड़के की निंदा करते हैं वही तेरे लड़के को मोक्ष भी दिलवाएंगे।  भाव ये कि निंदक कितना बड़ा काम करता है, जिसकी निंदा कर रहा होता है उसके तो सारे कर्म काट देता है और अपने अपर पाप की गठरी उठा लेता ह।  इसकिये निंदा से सदैव बच कर रहें।  निंदक व्यक्ति के संग से बच कर रहें।  जिनका लक्ष्य अपने सतगुरु की पूर्ण प्रसन्ता प्राप्त करना है वह तो प्रण ले लें कि हम जीवन में कभी किसी की निंदा नहीं करेंगे।

जब किसी माचिस कि तिल्ली से किसी चीज़ को जलाया जाता है तो आधी तो पहले वो खुद ही जल जाती है, वैसे ही जब निंदक किसी कि निंदा करता है या किसी के बारे में गलत बोलता है तो आधा तो पहले वो खुद जल जाता है, क्यूंकि उसके मन में अशांति होती है तो वह दुसरो को अशांत कर देता है।  इसलिए निंदा से सदैव बच कर रहें।

 

 

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