सेवक का विश्वास अपने स्वामी के चरणों में अटूट
होना चाहिए| कहते है की सेवक का अपने सतगुरु पर विश्वास ऐसा हो की पाताल से भी गहरा और ऊँचा हो आसमान से भी ऊँचा| एक
बड़ा ही सुन्दर प्रसंग श्री रामचरित मानस जी में आता है, कहते हैं जब हनुमान जी
संजीवनी बूटी लेकर राम जी के पास जा रहे थे, तो रास्ते में भरत जी ने देखा कि कोई व्यक्ति पूरा पहाड़ उठा कर ले जा रहा है तो उन्होंने समझा कि कोई
गलत काम हो रहा है और अपने तीर कमान से तीर चला दिया| वो तीर हनुमान
जी को लगा और वह नीचे आ गए और नीचे आकर बोलने लगे जय श्री राम| भरत जी को पता
चला कि ये तो श्री राम जी के भक्त लगते है| तब उन्होंने उनका परिचय पूछा, तब हनुमान जी ने
सारा हाल सुनाया कि लक्ष्मण जी कैसे मूर्छित हो गए है? उनके प्राण संकट
में है| यह सुनकर भरत जी रोने लगे और पूरे अयोध्या में यह खबर फैल
गई| चारों ओर शोक का माहौल उत्पन्न हो गया इस बात का लक्ष्मण जी
की पत्नी उर्मिला को भी पता चला लेकिन उसने जरा सा भी शोक नही जताया| तब भरत जी ने
उनसे पूछा कि उर्मिला तुम्हें पता है कि लक्ष्मण के प्राण संकट में है फिर भी
तुम्हें इस बात का दुःख नहीं है| तो उर्मिला ने हनुमान जी से पूछा कि लक्ष्मण जी
को क्या हुआ है और अब वे कहाँ है? तो हनुमान जी ने बताया कि उन्हें तीर लगा है और
अब वे राम जी की गोद में लेटे हुए है और श्री राम जी उन्हें देख-देख कर रो रहे हैं| तब उर्मिला ने कहा कि हनुमान जी एक बात बताओ जिसको तीर लगता है वह रोता है या
सोता है तो हनुमान जी ने कहा जिसको तीर लगता है वो तो रोता है दर्द से, तो उर्मिला ने
कहा तो बताओ कि रो कौन रहा है और सो कौन रहा है? हनुमान जी ने कहा कि राम जी रो रहे है लक्ष्मण जी सो रहे है| तो उर्मिला ने
कहा कि इसका मतलब दर्द श्री राम जी को हो रहा है| जो वो रो रहे है| उर्मिला ने कहा
कि जिसके सिर पर तीनों लोकों के मालिक श्री राम जी का हाथ हो उसको भला कुछ हो सकता
है? लक्ष्मण तो श्री राम प्रभु की गोद में थोड़ी देर के लिए
विश्राम कर रहे हैं| उर्मिला का ऐसा विश्वास देखकर सब हैरान रह गये| कहते भी है कि-
प्रभु को पाना सहज है
कठिन काम विश्वास |
विश्वास अगर कोई कर सके
तो प्रभु है उनके पास ||
एक बार श्री गुरु महाराज जी
श्री दूसरी पाद्शाही जी टेरी में विराजमान थे, और श्री चौथी पाद्शाही जी जो कि भक्त वेष में घर
पर रहते थे उनके मन में श्री दर्शनों की तीव्र इच्छा हुई, उसी समय ही श्री
दर्शनों के लिए घर से निकल पड़े | रास्ते में भक्त साहिबराम जी मिल गए जब उन्हें पता चला कि
आप श्री दर्शनों के लिए जा रहे है तो वो भी तैयार हो गए | साहिबराम जी ने
कहा कि मेरा एक दोस्त भी काफी बार दर्शनों के लिए कह चुका है उसे भी ले चलते है | फिर आप जी व
भक्त जी उसके घर गए | उन्हें कहा कि जल्दी करो गाड़ी छूट जाएगी | वे भी साथ जाने
के लिए तैयार हो गए | स्टेशन पर अभी पहुँचे ही नही थे कि पता चला गाड़ी निकल गई है
| प्रेम के दीवानों को क्या प्रवाह गाड़ी छूटने की? स्टेशन से वापिस
पहुँचे और टेरी के लिए पैदल ही चल पड़े | 3,4 घंटे तक लगातार चलते रहे साथ में जो एक भक्त था
वह थक गया था | आप दोनों को तो थकान की खबर ही नहीं थी | परन्तु जब भक्त
जी बहुत थक गए तो उन्होंने विनय की थोड़ी देर आराम कर लिया जाये | आप उनको बार-2 दिलासा देते रहे
कि प्रभु जी अभी कार भेज देंगे | इस प्रकार आप चलते ही रहे | रास्ते में उन्हें थका हुआ देखकर आप सड़क पर
छायादार वृक्ष के नीचे रुके ही थे कि इतने में एक व्यक्ति सचमुच ही कार लेकर आ पहुँचा
| उसी पेड़ के नीचे वह भी 2 मिनट रुका और पूछने लगा कि आपने कहां जाना है? आपने कहा कि हमे
टेरी जाना है | तो उसने बताया कि मैंने भी कोहाट जोकि टेरी के आगे आता है
वहाँ जाना है मैं आपको वहाँ छोड़कर चला जाऊंगा | आप तीनो कार में बैठ गए | आपका और भक्त
साहिबराम जी का विश्वास देखकर वह चकित रह गया | उस कार वाले ने आप लोगो को तोई नदी तक छोड़ दिया | अब टेरी सिर्फ
आधा मील दूर था | आपने शीघ्रता से पैदल चलना आरम्भ किया | टेरी पहुँच कर
श्री चरणों में दंडवत प्रणाम की | उस समय आपकी आँखों से आँसू बहने लगे | श्री प्रभु के
नेत्रों में भी आपका प्रेम देखकर जल भर आया | आपने दंडवत प्रणाम की तो प्रभु जी ने आपको उठाकर
गले से लगा लिया|
एक बार 2 जून के त्यौहार पर श्री प्रयाग धाम आया
उसने श्री हुजुर श्री गुरु महाराज जी के चरणों में विनय की कि स्वामी जी मुझे जिस
कॉलेज में एडमिशन चाहिए, मुझे पूना में तो मिल रहा है लेकिन मैं दिल्ली में चाहता
हूँ | श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया कि जैसा तुम चाहोंगे वैसा ही
होगा | जब वह बच्चा प्रेमी महात्मा जी के पास गया तब कहने लगा
महात्मा जी मेरी तो 128 वेटिंग लिस्ट है मुझे एडमिशन कैसे मिलेगा | तब पूजनीय
प्रेमी महात्मा जी ने कहा कि हमारे श्री गुरु महाराज जी श्री चतुर्थ पादशाही जी के
वचन है कि
अटल राज महाराज का, ता में अटक बहाय |
जाके मन में अटक है, सोहि अटक जाय | |
अर्थात अगर तुम्हे सतगुरु के वचनों पर विश्वास
है तो जो वेटिंग लिस्ट है तो वो उसे उल्टा भी तो सकते है क्या पता उसे एक नम्बर पर
करदे | जब वो अपने घर पहुँचा तो जब लिस्ट देखने गया तो सबसे पहले
नम्बर पर उसका नाम लिखा था | कहने का भाव कि जब सेवक अपने सतगुरु पर पूर्ण विशवास रखता है
तो सतगुरु अपने सेवक के हर कार्य को सरलता से कर देते है |
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