संत सतगुरु
जब राम राज्य में
सब लोग सुखपूर्वक रहने लगे, तब एक दिन श्री भगवान ने सोचा कि जिस उद्देश्य के निमित
संसार में हमारा आना हुआ था, वह उद्देश्य पूरा हुआ। पृथ्वी से राक्षसों का बोझ उतर
गया है, गौ, ब्राहमण की रक्षा हुई और देवता व मुनिजन सुखी हो गए, परन्तु एक आवश्यक
कार्य अभी करना बाकि रहता है। वह यह कि अयोध्या के लोग यह समझ रहे हैं कि उनकी नगरी
में श्री राम जी का अवतार है, इसलिए उन को भजन बंदगी की आवश्यकता नहीं है, वे आप से
आप ही भवसागर से पार उतर जाएँगे। लेकिन यह उनकी भूल है। इस भूल को दूर करके उन को ठीक
मार्ग पर लाना ही हमारा कर्तव्य है। ऐसा सोच कर एक दिन सब नगरवासियों को बुलाया। आज्ञा
मिलते ही सब अयोध्या वासी आ गए। उनके कुल के गुरू, पुरोहित, ब्राहमण, मुनि तथा जनता
के सब लोग थे। भगवान ने अपने शब्दों में फरमाया कि इंसान का तन उसे भवसागर से पार लगाने
के लिए उत्तम अवसर है लेकिन ये तभी संभव है जब उसे गुरू की शरण मिल जाये। बिना गुरू
के इंसान भव से कभी पार नहीं हो सकता। कुदरत ने भवसागर से पार करने की जिम्मेदारी,
संत-सतगुरू को सौंपी है। कहते हैं कि ईश्वर की जो कृपा है वो अनुकूल वायु है और संत
सत्गुरू को मल्लाह कहा गया है। इंसान का जो शरीर है वो नौका है अब खाली अनुकूल वायु
से इस नौका को पार नहीं लगाया जा सकता इसके लिए मल्लाह की जरूरत होती है। इसका अर्थ
हुआ कि केवल सतगुरू ही जीव को भव से पार लगा सकते है। कहते हैं जब चार प्रकार की कृपा
जीव पर होती है तब इसका कल्याण होता है। पहली ईश्वर कृपा, दूसरी - संत कृपा, तीसरी
- गुरु कृपा और चौथी जीव की अपनी कृपा अपने ऊपर। 1. मानव शरीर का मिल जाना ईश्वर कृपा
से 2. सत्संग का मिलना संत कृपा 3. गुरू के नाम की प्राप्ति हो जाना गुरु कृपा 4. चौथी
अपने आप पर मनुष्य की अपनी कृपा है। ईश्वर कृपा, संत कृपा, गुरु कृपा यदि ये तीनों
हो भी जाये परन्तु जब तक मनुष्य अपने ऊपर आप कृपा नहीं करता अर्थात संत सतगुरू के वचन
अनुसार भक्ति और परमार्थ में रूचि नहीं लेता, तब तक काम बनना कठिन है। भगवान ने बताया
कि स्वर्ग का सुख भी वास्तविक सुख नहीं हैं। इन्सान की मंजिल इससे भी ऊपर है। श्री
राम जी ने अयोध्यावासियों को उपदेश करते हुए साफ-साफ कह दिया कि ऐ अयोध्यावासियों,
किसी गलतफहमी में आपको नहीं रहना चाहिए। अगर आप अपने जीवन का कल्याण चाहते हो, आपको
गुरू की शरण में जाना होगा क्योंकि गुरू ही भव सागर के मल्लाह है। उनके बिना मनुष्य
शरीर की नईया भवसागर से पार नहीं हो सकती और साथ ही साथ भगवान ने ये भी फरमाया कि जो
मेरी बात मानेगा, वही मेरा सेवक है और वही मेरा प्यारा है। सो हमारी आज्ञा यह है कि
आपको रूहानी तरक्की या आत्मिक उन्नति के लिए गुरू शरण में जाना चाहिये।
तन संतन का धनु संतन
का
मन संतन का किआ
संत प्रसादि हरि
नामु धिआइया
सरब कुसल तब थीआ
संतन बिनु अवरू न
दाता बीआ
जो जो सरणि परै साधु
की
सो पारगरामी किआ
भक्ति का कैसा सुगम
और सरल मार्ग है कि मेरा-मेरा त्याग कर तेरा - तेरा को धारण कर लो, फिर काम बना बनाया
है। मगर हम हैं जो यह सुन कर ही घबराते हैं कि कोई सब कुछ हम से छीन ना ले। यह भ्रम
हमको सताता है, जो भक्ति मार्ग में चलते हुए हमारे सामने दीवार बन कर खड़ा हो जाता
है लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि सब कुछ तो एक दिन हम से काल छीन लेता है, श्री रघुनाथ
जी के वचन श्रवण करके सब ने कृपानिधान श्री राम जी के चरणों में नतमस्तक किया।
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